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अपनी प्रकृति (Air ,Fire ,Water Element)को कैसे पहचाने?तीन Element के तीन प्रकार के भोजन आदि का क्या


क्या शुद्ध भोजन से शरीर भी कांच जैसा पारदर्शी हो सकता है ?-

06 FACTS;-

1-अगर हम अपने शरीर में पीछे लौंटें तो प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में इस जगत का पूरा इतिहास छिपा है। यह जगत पहले दिन बना होगा, उस दिन भी आपके शरीर का कुछ हिस्सा मौजूद था; वही विकसित होते आपका शरीर हुआ है। एक छोटे से बीज-कोष में इस अस्तित्व की सारी कथा छिपी है; वह आपका नहीं है, उसकी लंबी परंपरा है। वह बीज-कोष न मालूम कितने मनुष्यों से, कितने पशुओं से, कितने पौधों से, कितने खनिजों से यात्रा करता हुआ आप तक आया है। वह आपकी पहली पर्त है; उस पर्त को ऋषि अन्नकोष कहते हैं। अन्नकोष इसलिए कहते हैं...कि उसके निर्माण की जो प्रक्रिया है वह भोजन से होती है; वह भोजन से बनता है ।

2-प्रत्येक व्यक्ति का शरीर सात साल में बदल जाता है।सभी कुछ बदल जाता है--हड्डी, मांस, मज्जा-सभी कुछ बदल जाती है; एक आदमी सत्तर साल जीता है तो दस बार उसके पूरे शरीर का रूपांतरण हो जाता है।आप जो भोजन ,रोज ले रहे हैं, वह आपके शरीर को बनाता है; और रोज आप अपने शरीर से मृत शरीर को बाहर फेंक रहे हैं। जब हम कहते हैं कि फलां व्यक्ति का देहावसान हो गया, तो हम अंतिम देहावसान को कहते हैं...जब उसकी आत्मा शरीर को छोड़ देती है।

3-वैसे व्यक्ति का देहावसान रोज हो रहा है, व्यक्ति का शरीर रोज मर रहा है; आपका शरीर मरे हुऐ हिस्से को रोज बाहर फेंक रहा है। नाखून आप काटते हैं, दर्द नहीं होता, क्योंकि नाखून आपके शरीर का मरा हुआ हिस्सा है। बाल आप काटते हैं, पीड़ा नहीं होती, क्योंकि बाल आपके शरीर के मरे हुए कोष हैं। अगर बाल आपके शरीर के जीवित हिस्से हैं तो काटने

से पीड़ा होगी।आपका शरीर रोज अपने से बाहर फेंक रहा है...एक आश्चर्यजनक बात है कि अक्सर कब्र में मुर्दे के बाल और नाखून बढ़ जाते हैं; क्योंकि नाखून और बाल का जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं है। वे मरे हुए हिस्से हैं...मुर्दे के भी बढ़ सकते हैं और अपनी प्रक्रिया जारी रख सकते हैं।

4-भोजन आपके शरीर को रोज नया शरीर दे रहा है, और आपके शरीर से मुर्दा शरीर रोज बाहर फेंका जा रहा है। यह सतत प्रक्रिया है। इसलिए शरीर को अन्नमयकोश कहा है, क्योंकि

वह अन्न से ही निर्मित होता है।और इसलिए बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप कैसा भोजन ले रहे हैं। आपका आहार सिर्फ जीवन चलाऊ नहीं है, वह आपके व्यक्तित्व की पहली पर्त निर्मित करता है। और उस पर्त के ऊपर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप भीतर यात्रा कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं; क्योंकि सभी भोजन एक जैसा नहीं है।रुग्ण भोजन हैं, स्वस्थ भोजन हैं, शुद्ध भोजन हैं, अशुद्ध भोजन हैं।

5-कुछ भोजन हैं जो आपको भीतर प्रवेश करने ही न देंगे, जो आपको बाहर ही दौड़ाते रहेंगे। कुछ भोजन आपके भीतर चैतन्य को जन्मने ही न देंगे, क्योंकि वे आपको बेहोश ही करते रहेंगे; कुछ भोजन हैं जो आपको कभी शांत न होने देंगे, क्योंकि उस भोजन की प्रक्रिया में ही आपके शरीर में एक रेस्टलेसनेस, एक बेचैनी पैदा हो जाती है।शुद्ध भोजन उसे कहा गया है,

शुद्ध भोजन से सिर्फ इतना ही अर्थ है कि आपका शरीर आपकी अंतर्यात्रा में बाधा न बने।

6-एक आदमी अपने घर की दीवालें ठोस पत्थर से बना सकता है। कोई आदमी अपने घर की दीवालें कांच से भी बना सकता है; लेकिन कांच पारदर्शी है, बाहर खड़े होकर भी भीतर का दिखाई पड़ता है। ठोस पत्थर की भी दीवाल बन जाती है, तब बाहर खड़े होकर भीतर का

दिखाई नहीं पड़ता है।शरीर भी कांच जैसा पारदर्शी हो सकता है। उस भोजन का नाम शुद्ध भोजन है जो शरीर को पारदर्शी, ट्रान्सपैरेंट बना दे...कि आप बाहर भी चलते रहें तो भी भीतर की झलक आती रहे। शरीर को आप ऐसी दीवाल भी बना सकते हैं कि भीतर जाने का ख़याल ही भूल जाये, भीतर की झलक ही मिलनी बंद हो जाये।

क्या अर्थ है तीन प्रकृति/ ELEMENT का?-

17 FACTS;-

1- भगवतगीता मेंश्रीकृष्ण कहते हैं कि श्रद्धा तुम्हारी परमात्मा की तरफ यात्रा में भिन्न-भिन्न मार्ग पकड़ा देती है।जीवन की क्षुद्रतम बातों में भी तुम्हारी श्रद्धा तुम्हें रंगती है।तो श्रीकृष्ण कहते हैं, भोजन भी इन तीन श्रद्धाओं के अनुसार तीन प्रकार का होता है।और लोग अपनी -अपनी श्रद्धा के अनुसार भोजन की रुचि रखते हैं।जब तक तुम अपनी ठीक से व्याख्या को न समझ पाओगे ,तब तक तुम विज्ञान को न समझ पाओगे, जो तुम्हें त्रिगुणातीत बना दे, गुणातीत बना दे। इसलिए तुम्हें पहले इन तीनों गुणों की अलग -अलग व्यवस्था और तुम्हारे जीवन में इनके ढंग ,ढांचे और इनकी शैली को समझ लेना जरूरी है।

2-श्रीकृष्ण जीवन को तीन गुणों के अनुसार सभी दिशाओं में बांट रहे हैं। उस विभाजन का बोध साधक के लिए बड़ा उपयोगी है क्योंकि इससे एक मापदंड मिल जाएगा।उससे अपनी परीक्षा करने और अपने को कसौटी पर

कसने में सुविधा होगी।क्योंकि जो भी तुम्हें प्रिय है, वह अकारण प्रिय नहीं हो सकता। वह तुम्हारे संबंध में खबर देता है। तुम जो भोजन करते हो, कैसे उठते हो, कैसे बैठते हो, कैसे चलते हो, उससे तुम्हारे भीतर की चेतना की खबर मिलती है। तुम कैसा व्यवहार करते हो, कैसे सोते हो, उस सबसे तुम्हारे संबंध में संकेत मिलते रहते हैं।

3- मनुष्य के व्यवहार को ठीक से जांच लेकर मनुष्य के भीतरी अंतःकरण के संबंध में सभी कुछ पता चल जाता है। और अनजाने भी बहुत बार तुम

ऐसे काम करते हो, जिनका तुम्हें भी खयाल नहीं है।मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर दो आदमी बात कर रहे हैं, और तुम दूर से खड़े होकर चुपचाप गौर से देखो, तो कई बातें, जो उन दो को पता न होंगी, तुम्हें पता चल सकती हैं। जो आदमी ऊब गया है और बातचीत को आगे नहीं बढ़ाना चाहता, तुम उसके चेहरे पर ऊब के लक्षण देखोगे।तो तुम गौर से देख सकते हो कि कौन आदमी सिर्फ दिखला रहा है कि हम बड़े रस से सुन रहे हैं, लेकिन उसके चेहरे पर उबासी आ रही है।

4-जो आदमी जाना चाहता है, तुम पाओगे, उसका शरीर जाने को तैयार है। भले ही वह उत्सुकता दिखला रहा हो ;लेकिन शरीर खबर दे रहा है कि जैसे ही छूटे कि वह तीर की तरह निकल जाए। उसका तीर प्रत्यंचा पर चढ़ा हुआ है। जो आदमी उत्सुक नहीं है बात करने में, उसकी गरदन पीछे को खिंची रहेगी।वह दीवाल खोजेगा ; दीवाल से टिककर खड़ा हो जाएगा। वह यह कह रहा है कि यहां दीवाल है। जो आदमी उत्सुक है, वह आगे को झुका रहेगा।

5-भगवतगीता के अनुसार ..

''आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय, ऐसे आहार सात्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, अति गरम

तथा तीक्ष्ण, रूखे, दाहकारक, दुख, चिंता और रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।और जो भोजन अधपका, रसरहित,

दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह Water Element /तामस पुरुष को प्रिय होता है''।

6-शरीर भोजन से ही बना है। इसलिए बहुत कुछ भोजन पर निर्भर है। भोजन न करोगे, तो तीन महीने में शरीर विदा हो जाएगा। शरीर भोजन का ही रूपांतरण है। इसलिए तुम जैसा भोजन करते हो, उससे शरीर निर्मित

होगा।अगर तुम जरूरत से ज्यादा भोजन कर लो, तो भोजन अल्कोहलिक है हो जाता है, उसमें शराब पैदा हो जाती है।कारण है कि जैसे ही तुम ज्यादा भोजन कर लेते हो, तुम्हारे पूरे शरीर की शक्ति निचुड़कर पेट में आ जाती है। क्योंकि उसको पचाना जरूरी है।

7-तुमने शरीर के लिए एक अस्वाभाविक स्थिति पैदा कर दी।अब शरीर की सारी शक्ति इसको किसी तरह पचाकर और बाहर फेंकने में लगेगी। तो तुम कुछ और न कर पाओगे; सिर्फ सो सकते हो। मस्तिष्क तभी काम करता है, जब पेट हलका हो। इसलिए भोजन के बाद तुम्हें नींद मालूम पड़ती है। और अगर कभी तुम्हें मस्तिष्क का कोई गहरा काम करना हो, तो तुम्हें भूख भूल जाती है।इसलिए जिन लोगों ने मस्तिष्क के गहरे काम किए हैं, वे हमेशा अल्पभोजी लोग हैं।

8-और धीरे-धीरे उन्हीं अल्पभोजियों को यह पता चला कि अगर मस्तिष्क बिना भोजन के इतना सक्रिय हो जाता है, तेजस्वी हो जाता है, तो शायद उपवास में तो और भी बड़ी घटना घट जाएगी। इसलिए उन्होंने उपवास के भी प्रयोग किए। और उन्होंने पाया कि उपवास की एक ऐसी घड़ी आती है, जब शरीर के पास पचाने को कुछ भी नहीं बचता, तो सारी ऊर्जा मस्तिष्क को उपलब्ध हो जाती है। उस ऊर्जा के द्वारा ध्यान में प्रवेश आसान हो जाता है।जैसे भोजन अतिशय हो, तो नींद में प्रवेश आसान हो जाता है। नींद ध्यान की दुश्मन है; मूर्च्छा है। शरीर में भोजन बिलकुल न हो, तो शरीर को पचाने को कुछ न बचने से सारी ऊर्जा मुक्त हो जाती है ...पेट से, सिर को उपलब्ध हो जाती है और ध्यान के लिए उपयोगी हो जाता है।

9-लेकिन उपवास की सीमा है, दो-चार दिन का उपवास सहयोगी हो सकता है। लेकिन कोई व्यक्ति उपवास की अतिशय में पड़ जाए तो फिर मस्तिष्क को ऊर्जा नहीं मिलती। क्योंकि ऊर्जा बचती ही नहीं। इसलिए उपवास तो किसी ऐसे व्यक्ति के पास ही करने चाहिए जिसे उपवास की पूरी कला मालूम हो।क्योंकि उपवास पूरा शास्त्र है। हर कोई, हर कैसे उपवास कर ले, तो नुकसान में पड़ेगा।और प्रत्येक व्यक्ति के लिए गुरु ठीक से खोजेगा कि कितने दिन के उपवास में संतुलन होगा।

10-किसी व्यक्ति को हो सकता है पंद्रह दिन, इक्कीस दिन का उपवास उपयोगी हो। अगर शरीर ने बहुत चर्बी इकट्ठी कर ली है, तो इक्कीस दिन के उपवास में भी उस व्यक्ति के मस्तिष्क को ऊर्जा का प्रवाह मिलता रहेगा। रोज-रोज बढ़ता जाएगा। जैसे-जैसे चर्बी कम होगी शरीर पर, वैसे-वैसे शरीर हलका होगा, तेजस्वी होगा, ऊर्जावान होगा। क्योंकि बढ़ी हुई चर्बी भी शरीर के ऊपर बोझ है और मूर्च्छा लाती है।लेकिन अगर कोई दुबला-पतला व्यक्ति इक्कीस दिन का उपवास कर ले, तो ऊर्जा क्षीण हो जाएगी।

11-उसके पास रिजर्वायर/ संरक्षित कुछ था ही नहीं। उनकी जेब खाली थी। दुबला-पतला आदमी बहुत से बहुत तीन-चार दिन के उपवास से फायदा ले सकता है। बहुत चर्बी वाला आदमी इक्कीस दिन, बयालीस दिन के उपवास से भी फायदा ले सकता है।और अगर अतिशय चर्बी हो, तो तीन महीने का उपवास भी, बहुत फायदे का हो सकता है। लेकिन उपवास के शास्त्र को समझना जरूरी है।तुम तो अभी ठीक विपरीत ..दूसरे छोर पर जीते हो, , जहां खूब भोजन कर लिया, सो गए। जैसे जिंदगी सोने के लिए है।

12-हिंदुओं ने जो वर्ण की व्यवस्था की, वह बड़ी वैज्ञानिक है।वर्ण व्यवस्था का अर्थ है तीन Element ।वह कितनी ही विकृत हो गई हो, पर उसके पीछे बड़ा गहरा विज्ञान है।वर्ण व्यवस्था के तीन खंड कर दिए ''Air ,Fire ,Water Element और मौलिक खंड तीन ही होंगे। क्योंकि अगर तीन ही गुण हैं, तो चार वर्ण नहीं हो सकते। तो चौथा जो वर्ण है.. वैश्य का, वह खिचड़ी है।शूद्र का अर्थ है, तमस -प्रधान ..जो भोजन के लिए जी रहा है।

जो जीने के लिए भोजन नहीं करता, जो जीता ही भोजन करने के लिए है, तमस से घिरा हुआ।शूद्र आलसी होगा, वह ज्यादा काम नहीं करेगा। क्योंकि करना क्या है काम से ..बस, आज का भोजन मिल गया, काफी है।तामसी व्यक्ति अत्यधिक भोजन करेगा।

13-क्षत्रिय का अर्थ है,-रजस प्रधान। राजसी व्यक्ति उतना भोजन नहीं करेगा। उसे बहुत दौड़ना है, लड़ना है, जीना है।राजसी व्यक्ति अक्सर मांसाहारी होंगे, लेकिन अल्पाहारी होंगे। क्षत्रिय उसका वर्ग है।तो दुनिया में सारे क्षत्रिय अल्पभोजी होंगे। थोड़ा सा ले लिया, काफी शक्ति देता है।इसलिए क्षत्रियों की देहयष्टि देखने में सुंदर होगी। जापान के समुराई, या भारत के क्षत्रिय, जिनको युद्ध के मैदान पर लड़ना है वे कोई बड़े-बड़े पेट लेकर युद्ध के मैदान पर नहीं जा सकते। उनके पास सिंह जैसे पेट होंगे, सिंह जैसी छाती होगी।अल्पभोजी होंगे, तभी सिंह जैसा पेट हो सकता है। मांसाहारी होंगे, लेकिन अल्पभोजी होंगे।

14-फिर ब्राह्मण का वर्ग है, सत्व। ध्यान रखना, तामसी व्यक्ति अति भोजन करेगा; राजसी व्यक्ति जरूरत से कम करेगा, सत्व को उपलब्ध व्यक्ति सम्यक भोजन करेगा। न तो तामसी की भांति ज्यादा और न राजसी की भांति कम। उसका भोजन संतुलित होगा, संगीतपूर्ण होगा। वह उतना ही करेगा, जितना जरूरी है। वह वही करेगा, जितना आवश्यक है। उससे न रत्तीभर ज्यादा, न रत्तीभर कम।

15-इसलिए गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी ..दोनों ने सम्यक आहार पर जोर दिया है। वह सत्व का लक्षण है। जब बीमार होगा, उपवास कर लेगा। क्योंकि बीमारी में भोजन घातक है। जब स्वस्थ होगा, थोड़ा ज्यादा लेगा, जब उतना स्वस्थ न होगा, थोड़ा कम लेगा, उसका मापदंड रोज बदलता रहेगा। उसका प्राण हमेशा दिशासूचक यंत्र की तरह बताता रहेगा कि उसे कब कितना.। कभी वह थोडा ज्यादा लेगा, कभी थोड़ा कम लेगा।

16-अगर शाक सब्जी खानी हो, तो थोड़ी सी शाक सब्जी खाने से काफी शक्ति नहीं मिल सकती, काफी शाक सब्जी खानी पड़ेगी, तब मिलेगी। इसलिए तो शाकाहारी जानवर दिनभर चरते रहते हैं। गाय बैठी है,घास चर रही है। इससे ज्यादा शुद्ध अहिंसक और शाकाहारी खोजना मुश्किल है।इसलिए तो हिंदुओं ने इसको गौ माता मान लिया; शुद्ध शाकाहारी है।

बंदर बैठे हैं, चर रहे हैं.. दिनभर चलता है क्योंकि सब्जी से या पत्तियों से या फलों से बहुत थोड़ी ऊर्जा मिलती है।

17-इसलिए तुम देखोगे कि दिगंबर जैन मुनि हैं, उनके बड़े बड़े पेट हैं

जबकि ये तो उपवासी लोग हैं।क्योंकि इनको एक ही बार में इतना भोजन करना पड़ता है कि चौबीस घंटे के लायक ऊर्जा मिल जाए। इसलिए काफी

कर लेते हैं। पेट बड़े हो जाते हैं।हिंदू संन्यासी का पेट बड़ा है, क्योंकि वह

खीर-पकवान पर जीता है। शाकाहार थोड़ी-सी मात्रा देता है;लेकिन बड़ी शुद्ध मात्रा देता है। और थोड़ी मात्रा का काम जब चार घंटे में पूरा हो जाए , तब फिर थोड़ी मात्रा।चार घंटे बाद एक फल या एक ग्लास दूध या फिर थोड़ी सब्जी ले ली। मात्रा थोड़ी, लेकिन लंबे फैलाव पर होनी चाहिए। नहीं तो पेट खराब हो जाएगा।

WATER ELEMENT का भोजन;-

23 FACTS;-

1-छोटी-छोटी बातें तुम्हारे भीतर की खबर देती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, भोजन छोटी नहीं, बहुत बड़ी बात है। तुम कैसा भोजन पसंद करते हो?

जो राजस -Fire Element व्यक्ति है, वह ऐसा भोजन पसंद करेगा, जिससे जीवन में उत्तेजना आए , दौड़ पैदा हो, धक्का लगे।इसलिए उसका भोजन

उत्तेजक आहार होगा। जो तामसी वृत्ति Water Element का व्यक्ति है, वह ऐसा भोजन करेगा, जिससे नींद आए, उत्तेजना न पैदा हों ..बासी ,उच्छिष्ट, ठंडा -जिससे कोई उत्तेजना पैदा न हो, सिर्फ बोझ पैदा हो और वह सो जाए।

2-तमसपूर्ण व्यक्ति हमेशा नींद को खोज रहा है। उसे अगर लेटने का मौका मिले, तो वह बैठेगा नहीं। अगर उसे बैठने का मौका मिले, तो वह खड़ा न होगा। अगर खड़े होने का मौका मिले, तो वह चलेगा नहीं। अगर चलने का मौका मिले, तो वह दौड़ेगा नहीं। वह हमेशा उसको चुनेगा, जिसमें ज्यादा नींद की सुविधा हो, और तंद्रा के लिए बासी भोजन बहुत उपयोगी है।क्योंकि जितना गरम भोजन होता है, उतने जल्दी पच जाता है। जितना बासी भोजन होता है, उतना पचने में देर लेता है। क्योंकि पचने के लिए अग्नि चाहिए। अगर भोजन गरम हो, तत्‍क्षण तैयार किया गया हो, तो भोजन की गरमी और पेट की गरमी मिलकर उसे जल्दी पचा देती है।इसलिए हम पेट की अग्नि को जठराग्नि कहते हैं।

3-लेकिन अगर भोजन बासी हो, ठंडा हो, बहुत देर का रखा हुआ हो, तो पेट की अकेली गरमी के आधार पर ही उसे पचना होता है। तो जो भोजन छ: घंटे में पच जाता, वह बारह घंटे में पचेगा। और पचने में जितनी देर लगती है, उतनी ज्यादा देर तक नींद आएगी। क्योंकि जब तक भोजन न पच जाए, तब तक मस्तिष्क को ऊर्जा नहीं मिलती। क्योंकि मस्तिष्क जो है, वह लक्जरी है। इसे थोड़ा समझना होगा।जैसे जीवन में शरीर की

,एक इकॉनामिक्स है ; वहां बुनियादी जरूरतें पहले पूरी की जाती हैं। फिर उनके ऊपर कम बुनियादी जरूरतें पूरी की जाती हैं। फिर उसके बाद सबसे गैर -बुनियादी जरूरतें भी पूरी की जाती हैं।

4-जब शरीर की जरूरतें पूरी हो जाती हैं , तब मन की जरूरतें शुरू होती हैं।वह फिल्म भी देखता है ; गीता पढ़ता है,भजन भी सुनता है।फिर जैसे

-जैसे जरूरतें उसकी ये मन की जरूरतें भी पूरी हो जाती हैं, तब आत्मा की जरूरतें पैदा होती हैं।तब वह ध्यान की सोचता है, समाधि का विचार

करता है।तो तीन तल हैं शरीर, मन और आत्मा। शरीर पहले है, क्योंकि उसके बिना न तो मन हो सकता है, न आत्मा टिक सकती है। वह आधार है,जड़ है।

5-अगर किसी वृक्ष को ऐसा खतरा आ जाए कि फूल मरें या जडें मरें, तो फूलों को वृक्ष पहले छोड़ देगा। क्योंकि वे तो विलास हैं, उनके बिना जीया जा सकता है। और अगर जीना रहा, तो वे फिर कभी आ सकते हैं। लेकिन जड़ें नहीं छोड़ी जा सकतीं। क्योंकि जड़ें तो जीवन हैं। जड़ें गईं, तो फूल कभी न आ सकेंगे। जड़ें रहीं, तो फूल कभी फिर आ सकते हैं।

अगर वृक्ष से पूछा जाए कि शाखाएं को काट दें या जड़ों को? तो वृक्ष कहेगा कि, अगर यही विकल्प है तो शाखाएं काट दो..। क्योंकि शाखाएं फिर निकल आएंगी; जड़ें होनी चाहिए। ऐसा ही अर्थशास्त्र शरीर के भीतर है। जब तुम भोजन करते हो, तो सारी शक्ति भोजन को पचाने में लगती है। इसलिए भोजन के बाद नींद मालूम होती है, क्योंकि मस्तिष्क को जो शक्ति का कोटा मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता।

6-मस्तिष्क लक्जरी है, उसके बिना जीया जा सकता है।पशु -पक्षी जी रहे हैं, पौधे जी रहे हैं; लाखों -करोडों जीव हैं, जो बिना बुद्धि के जी रहे हैं। मनुष्य हैं, वे भी बिना बुद्धि के जी रहे हैं। बुद्धि कोई अनिवार्य चीज नहीं है। ही, जब शरीर की जरूरतें पूरी हो जाएं और ऊर्जा बचे, तो फिर बुद्धि को मिलती है। और जब बुद्धि भी भर जाए और ऊर्जा बचे, तब आत्मा को

मिलती है।तो जो आदमी तामसी है, वह इस तरह का भोजन करता है कि मस्तिष्क तक ऊर्जा कभी पहुंचती ही नहीं।इसलिए तामसी व्यक्ति बुद्धिहीन हो जाता है।

7-जिसको बुद्धिमान होना हो, उसे तामसी भोजन छोड़ना पड़ेगा।इसलिए Water Element का व्यक्ति शरीर में भयंकर वजन इकट्ठा करने लगेगा।क्योंकि वह सोए जाएगा ,शरीर बनता जाएगा।और शरीर का उपयोग वह कभी न करेगा। तो शरीर पर वजन बढ़ने लगेगा, चर्बी इकट्ठी होने लगेगी। वह सिर्फ बोझ की तरह हो जाएगा।बस वह शरीर में ही जीने लगता है।

तामसी व्यक्ति यानी सिर्फ शरीर।उसमें नाम मात्र को बुद्धि है। इतनी ही बुद्धि है, जिससे वह भोजन जुटा ले और शरीर का काम चला दे, बस।और आत्मा की तो उसे कोई खबर ही नहीं है।आत्मा का उसे सपना भी नहीं आता।आत्मा की बातें लोगों को करते देखकर वह हैरान होता है कि इनको क्या हो गया है! इनका दिमाग ठीक है कि पगला गए है? कैसा परमात्मा, कैसी आत्मा?

8-वह एक ही चीज,एक ही रस जानता है, वह पेट का है। अगर उसका तुम्हें ठीक चित्र बनाना हो, तो पेट ही बनाना चाहिए और पेट में उसका चेहरा बना देना चाहिए। वह बड़ा पेट है। और बाकी सब चीजें छोटी -छोटी उसमें जुड़ी हैं। तामसी व्यक्ति एक असंतुलन है, उसमें और कुछ महत्वपूर्ण

नहीं है।राजसी व्यक्ति का भोजन कडुवा, खट्टा, नमकयुक्त, अतिगरम, तीक्षा, रूखा, दाहकारक होगा। महत्वाकांक्षियों का भोजन इस तरह का होगा। उनको दौड़ना है, नींद नहीं चाहिए। नींद जिसको चाहिए, वह ठंडा बासी भोजन करता है।जिसको दौड़ना है, वह अति गरम भोजन करता है।

वह भी खतरनाक है। क्योंकि अति गरम भोजन दूसरी अति पर ले जाता है, वह तुम्हें दौड़ाता है, भगाता है। धन पाना है, पद पाना है, कोई महत्वाकांक्षा पूरी करनी है,सिकंदर बनना है। तुम ज्वरग्रस्त हो जाते हो।

9-अब यह आश्चर्यजनक बात है कि, तामसी व्यक्ति गहरी नींद सोते हैं। उन्हें कभी ट्रैंक्येलाइजर की जरूरत नहीं पड़ती।और राजसी व्यक्तियों को हमेशा ट्रैंक्येलाइजर की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि वे इतना दौड़ते हैं कि जब रात सोने का वक्त आता है, तब भी भीतर की दौड़ बंद नहीं होती, वह चलती ही चली जाती है।राजसी व्यक्ति कुर्सी पर भी बैठेगा,तो पैर चलाता

रहेगा क्योंकि शरीर रुक गया है, लेकिन भीतर एक बेचैनी सरक रही

है, दौड़ रही है।राजसी व्यक्ति रात भी सोएगा, तो करवटें बदलता रहेगा; हाथ-पैर तड़फड़ाएगा, फेंकेगा।तामसी व्यक्ति मिट्टी के लोंदे की तरह पड़ा रहता है , हिलता-डुलता नहीं और भयंकर रूप से घुर्राता है।

10-Water Element का व्यक्ति घुर्राएगा।उसको अगर बीमारी होगी, तो निद्रा की होगी, वह ज्यादा निद्रा के लिए बीमार होगा।जवान आदमी को

आठ घंटे से ज्यादा नींद की आकांक्षा पैदा हो, तो समझना चाहिए तमस। बूढ़े आदमी को तीन -चार घंटे से ज्यादा नींद की आकांक्षा पैदा हो, तो

समझना चाहिए, तमस।वास्तव में , उम्र के साथ नींद का अनुपात घटता जाएगा। बच्चा पैदा होता है, तो बाईस घंटे सोता है जो उसकी जरूरत है। अगर चौबीस घंटे सोए, तो तमस है।फिर जैसे-जैसे बड़ा होगा, बीस घंटे, अठारह घंटे, कम होता जाएगा।

11-सात साल का होते-होते उसकी नींद आठ घंटे पर आ जानी चाहिए, तो संतुलित है। फिर जीवन के बड़े हिस्से पर यह नींद आठ घंटे पर ही टिकेगी ।लेकिन मरने के सात वर्ष पहले फिर घटना शुरू होगी। छ: घंटे रह जाएगी,पांच घंटे रह जाएगी, चार घंटे रह जाएगी।जिस दिन नींद आठ

घंटे से नीचे कम होनी शुरू हो, उस दिन समझना चाहिए, अब मौत के पहले चरण सुनाई पड़ने लगे। क्योंकि नींद आती है शरीर के निर्माण के

लिए।मां के पेट में बच्चा चौबीस घंटे सोता है। सिर्फ थोड़े-से राजसी बच्चों को छोड्कर, जो मां के पेट में पैर वगैरह चलाते हैं।नहीं तो चौबीस घंटे सोता है।जरूरत है, शरीर बन रहा है, बड़ा काम चल रहा है।नींद से सहयोग मिलता है; नींद टूटने से बाधा पड़ती है।

12-फिर तुम चौबीस घंटे काम करते हो, और तब आठ घंटा नींद काफी है।उतनी देर में शरीर अपना पुनर्निर्माण कर लेता है।मरे हुए सेल फिर से बन जाते हैं ;रक्त शुद्ध हो जाता है और शक्ति पुनरुज्जीवित हो जाती है।लेकिन जब आदमी के शरीर में बनने का काम बंद हो गया;तब मरे सेल मर जाते हैं।इसका अर्थ है कि अब विदाई का क्षण आने लगा,अथार्त नींद कम होने

लगी।परन्तु सत्तर साल का बूढ़ा आदमी कहता है,कुछ नींद का उपाय बताएं।बस, दों -तीन घंटे आती है।

13-वास्तव में, नींद की अब कोई जरूरत ही न रही।वह प्रकृति की व्यवस्था है।बूढ़ा आदमी तीन घंटे सो लेता है, तो बहुत है..पर्याप्त है। इससे ज्यादा की जरूरत नहीं है।मरने के एक दिन पहले तो नींद बिलकुल ही खो जाएगी। क्योंकि अब मौत करीब आ गई...सब टूटने का दिन आ गया।नींद तो बनने के लिए आती है; तो अब नींद कैसे आ सकती है।Water

Element से भरा हुआ व्यक्ति शरीर में जीता है, वह शरीर ही है। बाकी चीजें नाम मात्र को हैं।

16- आलसी व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता ; केवल मांगता है।वह सारी दुनिया के सामने इश्तहार लगाए बैठा है, सब मुझे प्रेम करो। चारों खाने बिस्तर पर पड़ा है, सारी दुनिया उसको प्रेम करे। और उसकी शिकायत है कि कोई प्रेम नहीं करता।तामसी व्यक्ति का भोजन हमेशा अतिशय होगा,

वह ज्यादा खाएगा। वह इतना खाएगा कि नींद के अतिरिक्त और कुछ करने को शेष न बचे। इसलिए तामसी व्यक्ति भोजन करके ही सुस्त होने लगेगा। उसका भोजन एक तरह का नशा है।तामसी व्यक्ति जीने के नाम पर सिर्फ घिसटता है। जैसे सारा काम इतना है कि किसी तरह खा-पीकर सो गए। वह दिन को रात बनाने में लगा है; जीवन को मौत बनाने में लगा है। और उसको एक ही सुख मालूम पड़ता है कि कुछ न करना पड़े। कुल सुख इतना है कि जीने से बच जाए जीना न पड़े। जीने में अड़चन/उपद्रव मालूम पड़ता है। वह तो अपना चादर ओढ़कर सो जाना चाहता है।

17-ऐसा व्यक्ति अतिशय भोजन करेगा। अतिशय भोजन का अर्थ है, वह पेट को इतना भर लेगा कि मस्तिष्क को ध्यान की तो बात दूर, विचार करने तक के लिए ऊर्जा नहीं मिलती। और धीरे-धीरे उसका मस्तिष्क छोटा होता जाएगा; सिकुड़ जाएगा। उसका तंतु-जाल मस्तिष्क का निम्न तल का हो

जाएगा।तो ध्यान के लिए तो शक्ति मिलना मुश्किल ही है, विचार तक के लिए नहीं मिलती। शांत होना तो दूर है,अभी अशांत होने लायक तक शक्ति मस्तिष्क में नहीं जाती। मस्तिष्क खो ही जाता है। वह आदमी शरीर की तरह जी रहा है।

18-वह सूत्र है कि तामसी 'आदमी शरीर की तरह जीता है'। उसकी श्रद्धा शरीर में है, मृत्यु में है, जीवन में नहीं।तुम उसके चेहरे पर एक कालिमा पाओगे। तुम उसके व्यक्तित्व के आस-पास मृत्यु की पदचाप सुनोगे।वैसा

आदमी अगर तुम्हारे पास बैठेगा, तो तुम्हें जम्हाई आने लगेगी और तुम भी शिथिलगात होने लगोगे अथार्त ऐसा लगेगा कि नींद मालूम पड़ती है। वैसा आदमी अपने चारों तरफ तमस की तरंगें पैदा करता है।जहां भी तुम्हें

लगे कि कोई आदमी ऐसा कर रहा है,तत्‍क्षण हट जाना; क्योंकि वह आदम