अपनी प्रकृति (Air ,Fire ,Water Element)को कैसे पहचाने?तीन Element के तीन प्रकार के भोजन आदि का क्या


क्या शुद्ध भोजन से शरीर भी कांच जैसा पारदर्शी हो सकता है ?-

06 FACTS;-

1-अगर हम अपने शरीर में पीछे लौंटें तो प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में इस जगत का पूरा इतिहास छिपा है। यह जगत पहले दिन बना होगा, उस दिन भी आपके शरीर का कुछ हिस्सा मौजूद था; वही विकसित होते आपका शरीर हुआ है। एक छोटे से बीज-कोष में इस अस्तित्व की सारी कथा छिपी है; वह आपका नहीं है, उसकी लंबी परंपरा है। वह बीज-कोष न मालूम कितने मनुष्यों से, कितने पशुओं से, कितने पौधों से, कितने खनिजों से यात्रा करता हुआ आप तक आया है। वह आपकी पहली पर्त है; उस पर्त को ऋषि अन्नकोष कहते हैं। अन्नकोष इसलिए कहते हैं...कि उसके निर्माण की जो प्रक्रिया है वह भोजन से होती है; वह भोजन से बनता है ।

2-प्रत्येक व्यक्ति का शरीर सात साल में बदल जाता है।सभी कुछ बदल जाता है--हड्डी, मांस, मज्जा-सभी कुछ बदल जाती है; एक आदमी सत्तर साल जीता है तो दस बार उसके पूरे शरीर का रूपांतरण हो जाता है।आप जो भोजन ,रोज ले रहे हैं, वह आपके शरीर को बनाता है; और रोज आप अपने शरीर से मृत शरीर को बाहर फेंक रहे हैं। जब हम कहते हैं कि फलां व्यक्ति का देहावसान हो गया, तो हम अंतिम देहावसान को कहते हैं...जब उसकी आत्मा शरीर को छोड़ देती है।

3-वैसे व्यक्ति का देहावसान रोज हो रहा है, व्यक्ति का शरीर रोज मर रहा है; आपका शरीर मरे हुऐ हिस्से को रोज बाहर फेंक रहा है। नाखून आप काटते हैं, दर्द नहीं होता, क्योंकि नाखून आपके शरीर का मरा हुआ हिस्सा है। बाल आप काटते हैं, पीड़ा नहीं होती, क्योंकि बाल आपके शरीर के मरे हुए कोष हैं। अगर बाल आपके शरीर के जीवित हिस्से हैं तो काटने

से पीड़ा होगी।आपका शरीर रोज अपने से बाहर फेंक रहा है...एक आश्चर्यजनक बात है कि अक्सर कब्र में मुर्दे के बाल और नाखून बढ़ जाते हैं; क्योंकि नाखून और बाल का जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं है। वे मरे हुए हिस्से हैं...मुर्दे के भी बढ़ सकते हैं और अपनी प्रक्रिया जारी रख सकते हैं।

4-भोजन आपके शरीर को रोज नया शरीर दे रहा है, और आपके शरीर से मुर्दा शरीर रोज बाहर फेंका जा रहा है। यह सतत प्रक्रिया है। इसलिए शरीर को अन्नमयकोश कहा है, क्योंकि

वह अन्न से ही निर्मित होता है।और इसलिए बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप कैसा भोजन ले रहे हैं। आपका आहार सिर्फ जीवन चलाऊ नहीं है, वह आपके व्यक्तित्व की पहली पर्त निर्मित करता है। और उस पर्त के ऊपर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप भीतर यात्रा कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं; क्योंकि सभी भोजन एक जैसा नहीं है।रुग्ण भोजन हैं, स्वस्थ भोजन हैं, शुद्ध भोजन हैं, अशुद्ध भोजन हैं।

5-कुछ भोजन हैं जो आपको भीतर प्रवेश करने ही न देंगे, जो आपको बाहर ही दौड़ाते रहेंगे। कुछ भोजन आपके भीतर चैतन्य को जन्मने ही न देंगे, क्योंकि वे आपको बेहोश ही करते रहेंगे; कुछ भोजन हैं जो आपको कभी शांत न होने देंगे, क्योंकि उस भोजन की प्रक्रिया में ही आपके शरीर में एक रेस्टलेसनेस, एक बेचैनी पैदा हो जाती है।शुद्ध भोजन उसे कहा गया है,

शुद्ध भोजन से सिर्फ इतना ही अर्थ है कि आपका शरीर आपकी अंतर्यात्रा में बाधा न बने।

6-एक आदमी अपने घर की दीवालें ठोस पत्थर से बना सकता है। कोई आदमी अपने घर की दीवालें कांच से भी बना सकता है; लेकिन कांच पारदर्शी है, बाहर खड़े होकर भी भीतर का दिखाई पड़ता है। ठोस पत्थर की भी दीवाल बन जाती है, तब बाहर खड़े होकर भीतर का

दिखाई नहीं पड़ता है।शरीर भी कांच जैसा पारदर्शी हो सकता है। उस भोजन का नाम शुद्ध भोजन है जो शरीर को पारदर्शी, ट्रान्सपैरेंट बना दे...कि आप बाहर भी चलते रहें तो भी भीतर की झलक आती रहे। शरीर को आप ऐसी दीवाल भी बना सकते हैं कि भीतर जाने का ख़याल ही भूल जाये, भीतर की झलक ही मिलनी बंद हो जाये।

क्या अर्थ है तीन प्रकृति/ ELEMENT का?-

17 FACTS;-

1- भगवतगीता मेंश्रीकृष्ण कहते हैं कि श्रद्धा तुम्हारी परमात्मा की तरफ यात्रा में भिन्न-भिन्न मार्ग पकड़ा देती है।जीवन की क्षुद्रतम बातों में भी तुम्हारी श्रद्धा तुम्हें रंगती है।तो श्रीकृष्ण कहते हैं, भोजन भी इन तीन श्रद्धाओं के अनुसार तीन प्रकार का होता है।और लोग अपनी -अपनी श्रद्धा के अनुसार भोजन की रुचि रखते हैं।जब तक तुम अपनी ठीक से व्याख्या को न समझ पाओगे ,तब तक तुम विज्ञान को न समझ पाओगे, जो तुम्हें त्रिगुणातीत बना दे, गुणातीत बना दे। इसलिए तुम्हें पहले इन तीनों गुणों की अलग -अलग व्यवस्था और तुम्हारे जीवन में इनके ढंग ,ढांचे और इनकी शैली को समझ लेना जरूरी है।

2-श्रीकृष्ण जीवन को तीन गुणों के अनुसार सभी दिशाओं में बांट रहे हैं। उस विभाजन का बोध साधक के लिए बड़ा उपयोगी है क्योंकि इससे एक मापदंड मिल जाएगा।उससे अपनी परीक्षा करने और अपने को कसौटी पर

कसने में सुविधा होगी।क्योंकि जो भी तुम्हें प्रिय है, वह अकारण प्रिय नहीं हो सकता। वह तुम्हारे संबंध में खबर देता है। तुम जो भोजन करते हो, कैसे उठते हो, कैसे बैठते हो, कैसे चलते हो, उससे तुम्हारे भीतर की चेतना की खबर मिलती है। तुम कैसा व्यवहार करते हो, कैसे सोते हो, उस सबसे तुम्हारे संबंध में संकेत मिलते रहते हैं।

3- मनुष्य के व्यवहार को ठीक से जांच लेकर मनुष्य के भीतरी अंतःकरण के संबंध में सभी कुछ पता चल जाता है। और अनजाने भी बहुत बार तुम

ऐसे काम करते हो, जिनका तुम्हें भी खयाल नहीं है।मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर दो आदमी बात कर रहे हैं, और तुम दूर से खड़े होकर चुपचाप गौर से देखो, तो कई बातें, जो उन दो को पता न होंगी, तुम्हें पता चल सकती हैं। जो आदमी ऊब गया है और बातचीत को आगे नहीं बढ़ाना चाहता, तुम उसके चेहरे पर ऊब के लक्षण देखोगे।तो तुम गौर से देख सकते हो कि कौन आदमी सिर्फ दिखला रहा है कि हम बड़े रस से सुन रहे हैं, लेकिन उसके चेहरे पर उबासी आ रही है।

4-जो आदमी जाना चाहता है, तुम पाओगे, उसका शरीर जाने को तैयार है। भले ही वह उत्सुकता दिखला रहा हो ;लेकिन शरीर खबर दे रहा है कि जैसे ही छूटे कि वह तीर की तरह निकल जाए। उसका तीर प्रत्यंचा पर चढ़ा हुआ है। जो आदमी उत्सुक नहीं है बात करने में, उसकी गरदन पीछे को खिंची रहेगी।वह दीवाल खोजेगा ; दीवाल से टिककर खड़ा हो जाएगा। वह यह कह रहा है कि यहां दीवाल है। जो आदमी उत्सुक है, वह आगे को झुका रहेगा।

5-भगवतगीता के अनुसार ..

''आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय, ऐसे आहार सात्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, अति गरम

तथा तीक्ष्ण, रूखे, दाहकारक, दुख, चिंता और रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।और जो भोजन अधपका, रसरहित,

दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह Water Element /तामस पुरुष को प्रिय होता है''।

6-शरीर भोजन से ही बना है। इसलिए बहुत कुछ भोजन पर निर्भर है। भोजन न करोगे, तो तीन महीने में शरीर विदा हो जाएगा। शरीर भोजन का ही रूपांतरण है। इसलिए तुम जैसा भोजन करते हो, उससे शरीर निर्मित

होगा।अगर तुम जरूरत से ज्यादा भोजन कर लो, तो भोजन अल्कोहलिक है हो जाता है, उसमें शराब पैदा हो जाती है।कारण है कि जैसे ही तुम ज्यादा भोजन कर लेते हो, तुम्हारे पूरे शरीर की शक्ति निचुड़कर पेट में आ जाती है। क्योंकि उसको पचाना जरूरी है।

7-तुमने शरीर के लिए एक अस्वाभाविक स्थिति पैदा कर दी।अब शरीर की सारी शक्ति इसको किसी तरह पचाकर और बाहर फेंकने में लगेगी। तो तुम कुछ और न कर पाओगे; सिर्फ सो सकते हो। मस्तिष्क तभी काम करता है, जब पेट हलका हो। इसलिए भोजन के बाद तुम्हें नींद मालूम पड़ती है। और अगर कभी तुम्हें मस्तिष्क का कोई गहरा काम करना हो, तो तुम्हें भूख भूल जाती है।इसलिए जिन लोगों ने मस्तिष्क के गहरे काम किए हैं, वे हमेशा अल्पभोजी लोग हैं।

8-और धीरे-धीरे उन्हीं अल्पभोजियों को यह पता चला कि अगर मस्तिष्क बिना भोजन के इतना सक्रिय हो जाता है, तेजस्वी हो जाता है, तो शायद उपवास में तो और भी बड़ी घटना घट जाएगी। इसलिए उन्होंने उपवास के भी प्रयोग किए। और उन्होंने पाया कि उपवास की एक ऐसी घड़ी आती है, जब शरीर के पास पचाने को कुछ भी नहीं बचता, तो सारी ऊर्जा मस्तिष्क को उपलब्ध हो जाती है। उस ऊर्जा के द्वारा ध्यान में प्रवेश आसान हो जाता है।जैसे भोजन अतिशय हो, तो नींद में प्रवेश आसान हो जाता है। नींद ध्यान की दुश्मन है; मूर्च्छा है। शरीर में भोजन बिलकुल न हो, तो शरीर को पचाने को कुछ न बचने से सारी ऊर्जा मुक्त हो जाती है ...पेट से, सिर को उपलब्ध हो जाती है और ध्यान के लिए उपयोगी हो जाता है।

9-लेकिन उपवास की सीमा है, दो-चार दिन का उपवास सहयोगी हो सकता है। लेकिन कोई व्यक्ति उपवास की अतिशय में पड़ जाए तो फिर मस्तिष्क को ऊर्जा नहीं मिलती। क्योंकि ऊर्जा बचती ही नहीं। इसलिए उपवास तो किसी ऐसे व्यक्ति के पास ही करने चाहिए जिसे उपवास की पूरी कला मालूम हो।क्योंकि उपवास पूरा शास्त्र है। हर कोई, हर कैसे उपवास कर ले, तो नुकसान में पड़ेगा।और प्रत्येक व्यक्ति के लिए गुरु ठीक से खोजेगा कि कितने दिन के उपवास में संतुलन होगा।

10-किसी व्यक्ति को हो सकता है पंद्रह दिन, इक्कीस दिन का उपवास उपयोगी हो। अगर शरीर ने बहुत चर्बी इकट्ठी कर ली है, तो इक्कीस दिन के उपवास में भी उस व्यक्ति के मस्तिष्क को ऊर्जा का प्रवाह मिलता रहेगा। रोज-रोज बढ़ता जाएगा। जैसे-जैसे चर्बी कम होगी शरीर पर, वैसे-वैसे शरीर हलका होगा, तेजस्वी होगा, ऊर्जावान होगा। क्योंकि बढ़ी हुई चर्बी भी शरीर के ऊपर बोझ है और मूर्च्छा लाती है।लेकिन अगर कोई दुबला-पतला व्यक्ति इक्कीस दिन का उपवास कर ले, तो ऊर्जा क्षीण हो जाएगी।

11-उसके पास रिजर्वायर/ संरक्षित कुछ था ही नहीं। उनकी जेब खाली थी। दुबला-पतला आदमी बहुत से बहुत तीन-चार दिन के उपवास से फायदा ले सकता है। बहुत चर्बी वाला आदमी इक्कीस दिन, बयालीस दिन के उपवास से भी फायदा ले सकता है।और अगर अतिशय चर्बी हो, तो तीन महीने का उपवास भी, बहुत फायदे का हो सकता है। लेकिन उपवास के शास्त्र को समझना जरूरी है।तुम तो अभी ठीक विपरीत ..दूसरे छोर पर जीते हो, , जहां खूब भोजन कर लिया, सो गए। जैसे जिंदगी सोने के लिए है।

12-हिंदुओं ने जो वर्ण की व्यवस्था की, वह बड़ी वैज्ञानिक है।वर्ण व्यवस्था का अर्थ है तीन Element ।वह कितनी ही विकृत हो गई हो, पर उसके पीछे बड़ा गहरा विज्ञान है।वर्ण व्यवस्था के तीन खंड कर दिए ''Air ,Fire ,Water Element और मौलिक खंड तीन ही होंगे। क्योंकि अगर तीन ही गुण हैं, तो चार वर्ण नहीं हो सकते। तो चौथा जो वर्ण है.. वैश्य का, वह खिचड़ी है।शूद्र का अर्थ है, तमस -प्रधान ..जो भोजन के लिए जी रहा है।

जो जीने के लिए भोजन नहीं करता, जो जीता ही भोजन करने के लिए है, तमस से घिरा हुआ।शूद्र आलसी होगा, वह ज्यादा काम नहीं करेगा। क्योंकि करना क्या है काम से ..बस, आज का भोजन मिल गया, काफी है।तामसी व्यक्ति अत्यधिक भोजन करेगा।

13-क्षत्रिय का अर्थ है,-रजस प्रधान। राजसी व्यक्ति उतना भोजन नहीं करेगा। उसे बहुत दौड़ना है, लड़ना है, जीना है।राजसी व्यक्ति अक्सर मांसाहारी होंगे, लेकिन अल्पाहारी होंगे। क्षत्रिय उसका वर्ग है।तो दुनिया में सारे क्षत्रिय अल्पभोजी होंगे। थोड़ा सा ले लिया, काफी शक्ति देता है।इसलिए क्षत्रियों की देहयष्टि देखने में सुंदर होगी। जापान के समुराई, या भारत के क्षत्रिय, जिनको युद्ध के मैदान पर लड़ना है वे कोई बड़े-बड़े पेट लेकर युद्ध के मैदान पर नहीं जा सकते। उनके पास सिंह जैसे पेट होंगे, सिंह जैसी छाती होगी।अल्पभोजी होंगे, तभी सिंह जैसा पेट हो सकता है। मांसाहारी होंगे, लेकिन अल्पभोजी होंगे।

14-फिर ब्राह्मण का वर्ग है, सत्व। ध्यान रखना, तामसी व्यक्ति अति भोजन करेगा; राजसी व्यक्ति जरूरत से कम करेगा, सत्व को उपलब्ध व्यक्ति सम्यक भोजन करेगा। न तो तामसी की भांति ज्यादा और न राजसी की भांति कम। उसका भोजन संतुलित होगा, संगीतपूर्ण होगा। वह उतना ही करेगा, जितना जरूरी है। वह वही करेगा, जितना आवश्यक है। उससे न रत्तीभर ज्यादा, न रत्तीभर कम।

15-इसलिए गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी ..दोनों ने सम्यक आहार पर जोर दिया है। वह सत्व का लक्षण है। जब बीमार होगा, उपवास कर लेगा। क्योंकि बीमारी में भोजन घातक है। जब स्वस्थ होगा, थोड़ा ज्यादा लेगा, जब उतना स्वस्थ न होगा, थोड़ा कम लेगा, उसका मापदंड रोज बदलता रहेगा। उसका प्राण हमेशा दिशासूचक यंत्र की तरह बताता रहेगा कि उसे कब कितना.। कभी वह थोडा ज्यादा लेगा, कभी थोड़ा कम लेगा।

16-अगर शाक सब्जी खानी हो, तो थोड़ी सी शाक सब्जी खाने से काफी शक्ति नहीं मिल सकती, काफी शाक सब्जी खानी पड़ेगी, तब मिलेगी। इसलिए तो शाकाहारी जानवर दिनभर चरते रहते हैं। गाय बैठी है,घास चर रही है। इससे ज्यादा शुद्ध अहिंसक और शाकाहारी खोजना मुश्किल है।इसलिए तो हिंदुओं ने इसको गौ माता मान लिया; शुद्ध शाकाहारी है।

बंदर बैठे हैं, चर रहे हैं.. दिनभर चलता है क्योंकि सब्जी से या पत्तियों से या फलों से बहुत थोड़ी ऊर्जा मिलती है।

17-इसलिए तुम देखोगे कि दिगंबर जैन मुनि हैं, उनके बड़े बड़े पेट हैं

जबकि ये तो उपवासी लोग हैं।क्योंकि इनको एक ही बार में इतना भोजन करना पड़ता है कि चौबीस घंटे के लायक ऊर्जा मिल जाए। इसलिए काफी

कर लेते हैं। पेट बड़े हो जाते हैं।हिंदू संन्यासी का पेट बड़ा है, क्योंकि वह

खीर-पकवान पर जीता है। शाकाहार थोड़ी-सी मात्रा देता है;लेकिन बड़ी शुद्ध मात्रा देता है। और थोड़ी मात्रा का काम जब चार घंटे में पूरा हो जाए , तब फिर थोड़ी मात्रा।चार घंटे बाद एक फल या एक ग्लास दूध या फिर थोड़ी सब्जी ले ली। मात्रा थोड़ी, लेकिन लंबे फैलाव पर होनी चाहिए। नहीं तो पेट खराब हो जाएगा।

WATER ELEMENT का भोजन;-

23 FACTS;-

1-छोटी-छोटी बातें तुम्हारे भीतर की खबर देती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, भोजन छोटी नहीं, बहुत बड़ी बात है। तुम कैसा भोजन पसंद करते हो?

जो राजस -Fire Element व्यक्ति है, वह ऐसा भोजन पसंद करेगा, जिससे जीवन में उत्तेजना आए , दौड़ पैदा हो, धक्का लगे।इसलिए उसका भोजन

उत्तेजक आहार होगा। जो तामसी वृत्ति Water Element का व्यक्ति है, वह ऐसा भोजन करेगा, जिससे नींद आए, उत्तेजना न पैदा हों ..बासी ,उच्छिष्ट, ठंडा -जिससे कोई उत्तेजना पैदा न हो, सिर्फ बोझ पैदा हो और वह सो जाए।

2-तमसपूर्ण व्यक्ति हमेशा नींद को खोज रहा है। उसे अगर लेटने का मौका मिले, तो वह बैठेगा नहीं। अगर उसे बैठने का मौका मिले, तो वह खड़ा न होगा। अगर खड़े होने का मौका मिले, तो वह चलेगा नहीं। अगर चलने का मौका मिले, तो वह दौड़ेगा नहीं। वह हमेशा उसको चुनेगा, जिसमें ज्यादा नींद की सुविधा हो, और तंद्रा के लिए बासी भोजन बहुत उपयोगी है।क्योंकि जितना गरम भोजन होता है, उतने जल्दी पच जाता है। जितना बासी भोजन होता है, उतना पचने में देर लेता है। क्योंकि पचने के लिए अग्नि चाहिए। अगर भोजन गरम हो, तत्‍क्षण तैयार किया गया हो, तो भोजन की गरमी और पेट की गरमी मिलकर उसे जल्दी पचा देती है।इसलिए हम पेट की अग्नि को जठराग्नि कहते हैं।

3-लेकिन अगर भोजन बासी हो, ठंडा हो, बहुत देर का रखा हुआ हो, तो पेट की अकेली गरमी के आधार पर ही उसे पचना होता है। तो जो भोजन छ: घंटे में पच जाता, वह बारह घंटे में पचेगा। और पचने में जितनी देर लगती है, उतनी ज्यादा देर तक नींद आएगी। क्योंकि जब तक भोजन न पच जाए, तब तक मस्तिष्क को ऊर्जा नहीं मिलती। क्योंकि मस्तिष्क जो है, वह लक्जरी है। इसे थोड़ा समझना होगा।जैसे जीवन में शरीर की

,एक इकॉनामिक्स है ; वहां बुनियादी जरूरतें पहले पूरी की जाती हैं। फिर उनके ऊपर कम बुनियादी जरूरतें पूरी की जाती हैं। फिर उसके बाद सबसे गैर -बुनियादी जरूरतें भी पूरी की जाती हैं।

4-जब शरीर की जरूरतें पूरी हो जाती हैं , तब मन की जरूरतें शुरू होती हैं।वह फिल्म भी देखता है ; गीता पढ़ता है,भजन भी सुनता है।फिर जैसे

-जैसे जरूरतें उसकी ये मन की जरूरतें भी पूरी हो जाती हैं, तब आत्मा की जरूरतें पैदा होती हैं।तब वह ध्यान की सोचता है, समाधि का विचार

करता है।तो तीन तल हैं शरीर, मन और आत्मा। शरीर पहले है, क्योंकि उसके बिना न तो मन हो सकता है, न आत्मा टिक सकती है। वह आधार है,जड़ है।

5-अगर किसी वृक्ष को ऐसा खतरा आ जाए कि फूल मरें या जडें मरें, तो फूलों को वृक्ष पहले छोड़ देगा। क्योंकि वे तो विलास हैं, उनके बिना जीया जा सकता है। और अगर जीना रहा, तो वे फिर कभी आ सकते हैं। लेकिन जड़ें नहीं छोड़ी जा सकतीं। क्योंकि जड़ें तो जीवन हैं। जड़ें गईं, तो फूल कभी न आ सकेंगे। जड़ें रहीं, तो फूल कभी फिर आ सकते हैं।

अगर वृक्ष से पूछा जाए कि शाखाएं को काट दें या जड़ों को? तो वृक्ष कहेगा कि, अगर यही विकल्प है तो शाखाएं काट दो..। क्योंकि शाखाएं फिर निकल आएंगी; जड़ें होनी चाहिए। ऐसा ही अर्थशास्त्र शरीर के भीतर है। जब तुम भोजन करते हो, तो सारी शक्ति भोजन को पचाने में लगती है। इसलिए भोजन के बाद नींद मालूम होती है, क्योंकि मस्तिष्क को जो शक्ति का कोटा मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता।

6-मस्तिष्क लक्जरी है, उसके बिना जीया जा सकता है।पशु -पक्षी जी रहे हैं, पौधे जी रहे हैं; लाखों -करोडों जीव हैं, जो बिना बुद्धि के जी रहे हैं। मनुष्य हैं, वे भी बिना बुद्धि के जी रहे हैं। बुद्धि कोई अनिवार्य चीज नहीं है। ही, जब शरीर की जरूरतें पूरी हो जाएं और ऊर्जा बचे, तो फिर बुद्धि को मिलती है। और जब बुद्धि भी भर जाए और ऊर्जा बचे, तब आत्मा को

मिलती है।तो जो आदमी तामसी है, वह इस तरह का भोजन करता है कि मस्तिष्क तक ऊर्जा कभी पहुंचती ही नहीं।इसलिए तामसी व्यक्ति बुद्धिहीन हो जाता है।

7-जिसको बुद्धिमान होना हो, उसे तामसी भोजन छोड़ना पड़ेगा।इसलिए Water Element का व्यक्ति शरीर में भयंकर वजन इकट्ठा करने लगेगा।क्योंकि वह सोए जाएगा ,शरीर बनता जाएगा।और शरीर का उपयोग वह कभी न करेगा। तो शरीर पर वजन बढ़ने लगेगा, चर्बी इकट्ठी होने लगेगी। वह सिर्फ बोझ की तरह हो जाएगा।बस वह शरीर में ही जीने लगता है।

तामसी व्यक्ति यानी सिर्फ शरीर।उसमें नाम मात्र को बुद्धि है। इतनी ही बुद्धि है, जिससे वह भोजन जुटा ले और शरीर का काम चला दे, बस।और आत्मा की तो उसे कोई खबर ही नहीं है।आत्मा का उसे सपना भी नहीं आता।आत्मा की बातें लोगों को करते देखकर वह हैरान होता है कि इनको क्या हो गया है! इनका दिमाग ठीक है कि पगला गए है? कैसा परमात्मा, कैसी आत्मा?

8-वह एक ही चीज,एक ही रस जानता है, वह पेट का है। अगर उसका तुम्हें ठीक चित्र बनाना हो, तो पेट ही बनाना चाहिए और पेट में उसका चेहरा बना देना चाहिए। वह बड़ा पेट है। और बाकी सब चीजें छोटी -छोटी उसमें जुड़ी हैं। तामसी व्यक्ति एक असंतुलन है, उसमें और कुछ महत्वपूर्ण

नहीं है।राजसी व्यक्ति का भोजन कडुवा, खट्टा, नमकयुक्त, अतिगरम, तीक्षा, रूखा, दाहकारक होगा। महत्वाकांक्षियों का भोजन इस तरह का होगा। उनको दौड़ना है, नींद नहीं चाहिए। नींद जिसको चाहिए, वह ठंडा बासी भोजन करता है।जिसको दौड़ना है, वह अति गरम भोजन करता है।

वह भी खतरनाक है। क्योंकि अति गरम भोजन दूसरी अति पर ले जाता है, वह तुम्हें दौड़ाता है, भगाता है। धन पाना है, पद पाना है, कोई महत्वाकांक्षा पूरी करनी है,सिकंदर बनना है। तुम ज्वरग्रस्त हो जाते हो।

9-अब यह आश्चर्यजनक बात है कि, तामसी व्यक्ति गहरी नींद सोते हैं। उन्हें कभी ट्रैंक्येलाइजर की जरूरत नहीं पड़ती।और राजसी व्यक्तियों को हमेशा ट्रैंक्येलाइजर की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि वे इतना दौड़ते हैं कि जब रात सोने का वक्त आता है, तब भी भीतर की दौड़ बंद नहीं होती, वह चलती ही चली जाती है।राजसी व्यक्ति कुर्सी पर भी बैठेगा,तो पैर चलाता

रहेगा क्योंकि शरीर रुक गया है, लेकिन भीतर एक बेचैनी सरक रही

है, दौड़ रही है।राजसी व्यक्ति रात भी सोएगा, तो करवटें बदलता रहेगा; हाथ-पैर तड़फड़ाएगा, फेंकेगा।तामसी व्यक्ति मिट्टी के लोंदे की तरह पड़ा रहता है , हिलता-डुलता नहीं और भयंकर रूप से घुर्राता है।

10-Water Element का व्यक्ति घुर्राएगा।उसको अगर बीमारी होगी, तो निद्रा की होगी, वह ज्यादा निद्रा के लिए बीमार होगा।जवान आदमी को

आठ घंटे से ज्यादा नींद की आकांक्षा पैदा हो, तो समझना चाहिए तमस। बूढ़े आदमी को तीन -चार घंटे से ज्यादा नींद की आकांक्षा पैदा हो, तो

समझना चाहिए, तमस।वास्तव में , उम्र के साथ नींद का अनुपात घटता जाएगा। बच्चा पैदा होता है, तो बाईस घंटे सोता है जो उसकी जरूरत है। अगर चौबीस घंटे सोए, तो तमस है।फिर जैसे-जैसे बड़ा होगा, बीस घंटे, अठारह घंटे, कम होता जाएगा।

11-सात साल का होते-होते उसकी नींद आठ घंटे पर आ जानी चाहिए, तो संतुलित है। फिर जीवन के बड़े हिस्से पर यह नींद आठ घंटे पर ही टिकेगी ।लेकिन मरने के सात वर्ष पहले फिर घटना शुरू होगी। छ: घंटे रह जाएगी,पांच घंटे रह जाएगी, चार घंटे रह जाएगी।जिस दिन नींद आठ

घंटे से नीचे कम होनी शुरू हो, उस दिन समझना चाहिए, अब मौत के पहले चरण सुनाई पड़ने लगे। क्योंकि नींद आती है शरीर के निर्माण के

लिए।मां के पेट में बच्चा चौबीस घंटे सोता है। सिर्फ थोड़े-से राजसी बच्चों को छोड्कर, जो मां के पेट में पैर वगैरह चलाते हैं।नहीं तो चौबीस घंटे सोता है।जरूरत है, शरीर बन रहा है, बड़ा काम चल रहा है।नींद से सहयोग मिलता है; नींद टूटने से बाधा पड़ती है।

12-फिर तुम चौबीस घंटे काम करते हो, और तब आठ घंटा नींद काफी है।उतनी देर में शरीर अपना पुनर्निर्माण कर लेता है।मरे हुए सेल फिर से बन जाते हैं ;रक्त शुद्ध हो जाता है और शक्ति पुनरुज्जीवित हो जाती है।लेकिन जब आदमी के शरीर में बनने का काम बंद हो गया;तब मरे सेल मर जाते हैं।इसका अर्थ है कि अब विदाई का क्षण आने लगा,अथार्त नींद कम होने

लगी।परन्तु सत्तर साल का बूढ़ा आदमी कहता है,कुछ नींद का उपाय बताएं।बस, दों -तीन घंटे आती है।

13-वास्तव में, नींद की अब कोई जरूरत ही न रही।वह प्रकृति की व्यवस्था है।बूढ़ा आदमी तीन घंटे सो लेता है, तो बहुत है..पर्याप्त है। इससे ज्यादा की जरूरत नहीं है।मरने के एक दिन पहले तो नींद बिलकुल ही खो जाएगी। क्योंकि अब मौत करीब आ गई...सब टूटने का दिन आ गया।नींद तो बनने के लिए आती है; तो अब नींद कैसे आ सकती है।Water

Element से भरा हुआ व्यक्ति शरीर में जीता है, वह शरीर ही है। बाकी चीजें नाम मात्र को हैं।

16- आलसी व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता ; केवल मांगता है।वह सारी दुनिया के सामने इश्तहार लगाए बैठा है, सब मुझे प्रेम करो। चारों खाने बिस्तर पर पड़ा है, सारी दुनिया उसको प्रेम करे। और उसकी शिकायत है कि कोई प्रेम नहीं करता।तामसी व्यक्ति का भोजन हमेशा अतिशय होगा,

वह ज्यादा खाएगा। वह इतना खाएगा कि नींद के अतिरिक्त और कुछ करने को शेष न बचे। इसलिए तामसी व्यक्ति भोजन करके ही सुस्त होने लगेगा। उसका भोजन एक तरह का नशा है।तामसी व्यक्ति जीने के नाम पर सिर्फ घिसटता है। जैसे सारा काम इतना है कि किसी तरह खा-पीकर सो गए। वह दिन को रात बनाने में लगा है; जीवन को मौत बनाने में लगा है। और उसको एक ही सुख मालूम पड़ता है कि कुछ न करना पड़े। कुल सुख इतना है कि जीने से बच जाए जीना न पड़े। जीने में अड़चन/उपद्रव मालूम पड़ता है। वह तो अपना चादर ओढ़कर सो जाना चाहता है।

17-ऐसा व्यक्ति अतिशय भोजन करेगा। अतिशय भोजन का अर्थ है, वह पेट को इतना भर लेगा कि मस्तिष्क को ध्यान की तो बात दूर, विचार करने तक के लिए ऊर्जा नहीं मिलती। और धीरे-धीरे उसका मस्तिष्क छोटा होता जाएगा; सिकुड़ जाएगा। उसका तंतु-जाल मस्तिष्क का निम्न तल का हो

जाएगा।तो ध्यान के लिए तो शक्ति मिलना मुश्किल ही है, विचार तक के लिए नहीं मिलती। शांत होना तो दूर है,अभी अशांत होने लायक तक शक्ति मस्तिष्क में नहीं जाती। मस्तिष्क खो ही जाता है। वह आदमी शरीर की तरह जी रहा है।

18-वह सूत्र है कि तामसी 'आदमी शरीर की तरह जीता है'। उसकी श्रद्धा शरीर में है, मृत्यु में है, जीवन में नहीं।तुम उसके चेहरे पर एक कालिमा पाओगे। तुम उसके व्यक्तित्व के आस-पास मृत्यु की पदचाप सुनोगे।वैसा

आदमी अगर तुम्हारे पास बैठेगा, तो तुम्हें जम्हाई आने लगेगी और तुम भी शिथिलगात होने लगोगे अथार्त ऐसा लगेगा कि नींद मालूम पड़ती है। वैसा आदमी अपने चारों तरफ तमस की तरंगें पैदा करता है।जहां भी तुम्हें

लगे कि कोई आदमी ऐसा कर रहा है,तत्‍क्षण हट जाना; क्योंकि वह आदमी तुम्हें चूसता है...तुम्हारी ऊर्जा के लिए गड्डे का काम करता है। वह खुद तो गड्डा हो ही गया है। उसका शिखर तो खो गया है। वह तुम्हारे शिखर

को भी चूस लेता है।

19-तामसी व्यक्ति ज्यादा भोजन करेगा और गलत तरह का भोजन करेगा, जिससे बोझ बढ़े, जिसे पचाना मुश्किल हो, जो अपाच्‍य हो, जो ज्यादा देर पेट में रहे, जल्दी पच न जाए। शाक-सब्जी उसे पसंद न आएंगी। फल उसे पसंद न आएंगे। शाकाहारी होने में उसे मजा न मालूम होगा।

फल, शाक, सब्जी, यह इतना सुपाच्‍य है कि निद्रा पैदा नहीं करता। और भोजन की परिभाषा यही है तामसी व्यक्ति को कि उससे तमस बढ़े, मूर्च्छा बढ़े, नींद आ जाए, खो जाए वह, शरीर में खो जाए, आत्मा का बिलकुल पता न चले, बुद्धि में कोई प्रखरता न रहे, शरीर में डूब जाए, शरीर की

अंधकारपूर्ण रात्रि में डूब जाए।

20-तमस शब्द का अर्थ होता है, अंधकार। तो उसकी अंधकार में डूबने की प्रवृत्ति होगी । उसे दिन पसंद न आएगा। उसे रात पसंद आएगी।तमस से भरा हुआ व्यक्ति निशाचर होगा। दिन में सोएगा, रात जागेगा।

रात तुम उसको क्लब में देखोगे, ताश खेलते देखोगे, जुआ खेलते देखोगे, शराब पीते देखोगे। दिन तुम उसे घर्राटे लेते देखोगे।जब सारी

दुनिया जागेगी, तब वह सोएगा।श्रीकृष्ण ने योगी की परिभाषा की है कि योगी तब जागता है जब सारी दुनिया सोती है; तब भी योगी जागता है जब सब सोए हैं ।

21-जब सब जागते हैं, तब भोगी सोता है।तमस उसका लक्षण है, अंधकार उसका प्रतीक है। रात में जीवन मालूम पड़ता है। जैसे-जैसे किसी संस्कृति में,तमस बढ़ता है उसकी रात घटने लगती है। बारह, दो बजे रात तक राग रंग चलता है।अगर भारत के गांव में जाएंगे, तो रात्रि-जीवन जैसी कोई चीज ही नहीं है।सांझ हुई कि लोग विश्राम को चले गए। प्रकृति के साथ एक

तल्लीनता थी।जब सूरज जाग रहा है, तब तुम जागो। जब सूरज डूब गया,

तब तुम डूब जाओ;लयबद्धता थी।

22-तामसी वृत्ति का व्यक्ति प्रकृति से लयबद्धता छोड़ देता है। वह अपने में बंद हो जाता है। वह अपना अलग ही ढांचा बना लेता है। वह इस विस्तार से टूट जाता है। तो जब पक्षी गीत गाते हैं, तब वह गा नहीं सकता। जब सूरज

उगता है, तब वह जाग नहीं सकता।तमस का भरोसा मृत्यु में है।तामसी वृत्ति का व्यक्ति इस तरह जीता है, इस तरह भोजन करता है, कि भोजन से कोई सात्विक ऊर्जा लेनी है, बस, किसी तरह ढो लेना है, जीवन एक बोझ है। तामसी वृत्ति का व्यक्ति आत्मघाती होता है। ज्यादा भोजन करेगा, गलत भोजन करेगा, व्यर्थ चीजें खाएगा। और भोजन उसका केंद्र होगा... जीवन का। उसके वर्तुल में वह घूमेगा। वही सब कुछ है।

23-तामसी वृत्ति के व्यक्ति को उसके भोजन का अध्ययन करके भी समझ सकते हो कि वह तामसी है।उसे बासी भोजन प्रिय होता है, सड़ा-गला उसे स्वाद देता है। घर का भोजन उसे पसंद नहीं आता। बाजार का सड़ा-गला, जिसका कोई भरोसा नहीं कि वह कितना पुराना है और कितना प्राचीन है। होटलों में दो-चार दिन पहले की सब्जी से बने हुए पकोड़े और समोसे उसे प्रिय होते हैं।सात्विक व्यक्ति को जो कूड़ा-करकट जैसा मालूम पड़े, जिसे वह अपने मुंह में न ले सके, उसी पर तामसी की लार टपकती है।

FIRE ELEMENT का भोजन;-

03 FACTS;-

1-Fire Element से भरा व्यक्ति मन में जीता है, वह मन ही है। बाकी चीजें नाम मात्र को हैं। वह मन की आकांक्षा के लिए शरीर की कुर्बानी दे देता है। वह मन की आकांक्षा के लिए आत्मा की भी कुर्बानी दे देता है। वह मन का सिकंदर है।दुनिया पर सारा साम्राज्य फैलाना है ।राजस प्रकृति का व्यक्ति भिन्न तरह के भोजन में रस लेता है। ऐसे भोजन में, जिससे ऊर्जा मिले, गति मिले, दौड़ मिले। क्योंकि राजस प्रकृति का व्यक्ति महत्वाकांक्षी है, उसे दौड़ना है। वह मांसाहारी होगा। इसलिए सारे क्षत्रिय मांसाहारी हैं।

2-राजसी व्यक्ति न तो प्रेम करता है और न मांगता है।उसे इस धंधे में पड़ने की फुरसत नहीं है। उसके लिए प्रेम के सिवाय और भी बहुत काम

हैं। प्रेम सब कुछ नहीं है, प्रेम गौण है।आकांक्षी लोग न तो प्रेम चाहते हैं, न देते हैं। उन्हें फुरसत नहीं। अभी बड़े काम करने हैं। पत्नी वगैरह गौण है, बच्चे गौण हैं। इसलिए बड़े से बड़े धनिको,राजनीतिज्ञों के बच्चे भी

आवारा और बरबाद हो जाते हैं। धनिको के बच्चे सत्य की तरफ नहीं बढ़ पाते; क्योंकि पिता को फुरसत ही नहीं है। वह धन इकट्ठा कर रहा है। हालांकि वह यही कहता है कि इन्हीं के लिए इकट्ठा कर रहा हूं.. लेकिन इनसे कभी मिलना ही नहीं होता।

3-जब वह घर वापस आता है, तब तक बच्चे सो गए होते हैं। जब सुबह वह भागता है,तब तक बच्चे उठे नहीं होते हैं। वह भाग -दौड़ में है। कभी रास्ते पर सीढ़ियां चलते मिल जाते हैं, तो जरा पीठ थपथपा देता है। वह भी उसे ऐसा लगता है कि बेकार का काम है। इतनी शक्ति बचती, तो और धन कमा लेते! इतना ही किसी और को बाजार में थपथपाते ,तो तिजोरी भर

जाती। यह नाहक बीच में आ गया।और बहुत धनियों के बच्चों को उनकी मां से भी मिलना नहीं होता। क्योंकि मां को भी कहां फुरसत है! क्लब

है, सोसाइटी है, पच्चीस जाल हैं। महत्वाकांक्षी व्यक्ति मन की दौड़ में जीता है। न वह प्रेम करता है, न वह मांगता है।

AIR ELEMENT का भोजन;-

09 FACTS;-

1-आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय आहार सात्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।जो व्यक्ति सत्य से भरा है, वह इन दोनों से भिन्न है। वह संतुलित है। न तो वह अति ठंडा भोजन करता है, न वह अति गरम भोजन करता है। वह उतना ही गरम भोजन करता है, जितना शरीर की जठराग्नि से मेल खाता है। वह थोड़ा सा उष्ण ..एकदम गरम नहीं, एकदम ठंडा नहीं ..वैसा भोजन करता है, जिससे उसका शरीर तालमेल पाता है। वह शरीर के ताप केअनुसार भोजन करता है।

2-उसकी आयु स्वभावत: ज्यादा होगी, क्योंकि वह प्रकृति के अनुसार, प्रकृति के समस्वरता में जीता है। उसकी बुद्धि स्वभावत: शुद्ध होगी, तीक्ष्ण होगी, स्वच्छ होगी, निर्मल दर्पण की तरह होगी, क्योंकि वह

शुद्ध आहार कर रहा है।आमतौर से इस तरह का शाकाहारी भोजन लेगा, जो लेते समय उत्तेजना नहीं देता, शांति देता है, एक स्निग्धता देता है। और प्रीति को बढ़ाता है।

3- सात्विक गुणों का व्यक्ति स्वाद के कारण भोजन नहीं करता, यद्यपि भोजन में बहुत स्वाद लेता है, जैसा कोई भी नहीं लेता। लेकिन स्वाद निर्धारक नहीं है। निर्धारक तत्व तो है शरीर की प्रकृति, स्वभाव की अनुकूलता, तारतम्य, संगीत। यद्यपि सात्विक व्यक्ति परम स्वाद को उपलब्ध होता है।सात्विक व्यक्ति के आहार को अगर तुम Water Element को दो, तो वह कहेगा, क्या घास—पात.. इसमें कुछ भी नहीं है, यह क्या खाना है! अगर Fire Element को दो, तो वह कहेगा, इसमें कोई स्वाद नहीं है, तेजी नहीं है।ज्यादा नमक मिर्च नहीं है।

4-ध्यान रखना,जो लोग मिर्च -मसाले पर जीते हैं, वे यह न समझें कि वे स्वाद ले रहे हैं। मिर्च -मसाले की जरूरत ही इसलिए है कि उनका स्वाद मर गया है। उनकी जीभ इतनी मुरदा हो गई है कि वे जब तक उस पर, जहर न रखें ..तब तक उसे कुछ पता नहीं चलता, इसलिए मिर्च रखनी पड़ती है। मिर्च रखने से थोड़ी सी तड़फन जीभ में होती है। वह मरी मराई जीभ थोड़ी कंपती है और उन्हें लगता है, स्वाद आया ।

5-लेकिन जिसकी जीभ जीवित है, उसे मिर्च की जरूरत नहीं है। वह मिर्च को बरदाश्त न कर सकेगा। जिसका स्वाद जीवित है, वह तो साधारण फलों से, सब्जियों से इतने अनूठे स्वाद को ले सकेगा कि वह सोच ही नहीं सकता कि तुम क्यों मिर्च डालकर सब्जियों के स्वाद को नष्ट कर रहे हो! यह स्वाद को नष्ट करना है। मसाला नष्ट करने का उपाय है। मसाले से स्वाद नहीं बढ़ता।

6-लेकिन अगर आज तुम अचानक मसाला छोड़ दो, तो सब बेस्वाद मालूम पडेगा..तुम्हें तकलीफ होगी। क्योंकि स्वाद का अभ्यास करना होगा।

तुम्हें अगर बाजार की आदत हो जाए तो हिमालय तुम्हें सूना मालूम पड़ेगा। अगर तुम्हें झगड़े और उपद्रव की आदत हो जाए तो किसी दिन तुम मौन से बैठो तो ऐसा लगेगा कि समय कटता ही नहीं। तुम्हारी जीभ अगर मसालों से भर गई हो, तो स्वाद खो दिया है। जीभ बड़ा कोमल तत्व है। और स्वाद के जो छोटे से हिस्से हैं जीभ पर, उनसे ज्यादा कोमल कोई चीज नहीं है ..तुम्हारे पास। उनको अगर तुमने बहुत तेज चीजें दी हैं, तो वे मर गए उनकी अनुभव करने की शक्ति चली गई। अब और तेज चाहिए, और तेज चाहिए, तभी थोड़ी-बहुत तड़फन होती है, तो मालूम पड़ता है कुछ स्वाद आ रहा है।

7-सात्विक व्यक्ति स्वाद के लिए भोजन नहीं करता, लेकिन जितना स्वाद वह लेता है, दुनिया में कोई भी नहीं लेता। इसलिए सात्विक को तुम अस्वाद लेने वाला मत समझ लेना। वही परम स्वाद लेता है। न तो वैसा स्वाद तमस को मिलता है, न रजस को। स्वाद मिलता ही उसे है, जो प्रकृति के अनुकूल चलता है। उसे पूरे जीवन का पूरा स्वाद मिलता है। सभी दिशाओं में सात्विक व्यक्ति की संवेदना खुल जाती है। वह ज्यादा सुनता है, ज्यादा देखता है, ज्यादा छूता है, ज्यादा स्वाद लेता है, ज्यादा गंध पाता है।

8-सात्विक व्यक्ति गुलाब के फूल के पास से निकलता है, तो उसे गंध आती है। राजसी निकलेगा, तो उसने बाजार के कचरा इत्र लगा रखे हैं, उन इत्रों की गंध की तेजी में गुलाब के फूल से गंध ही नहीं आती। उसे बाजार में सस्ते बिकने वाले इत्र चाहिए । लेकिन उनसे ही उसको थोड़ी गंध आती है। उसके नासापुट मर गए। अगर कहीं कोई शास्त्रीय संगीत हो रहा हो, तो उसे मजा नहीं आता। वह कहता है, यह क्या हो रहा है!राजसी तो कोई फिल्मी हुड़दंग में रस आएगा ..रीढ़ सीधी हो जाएगी; ध्यान तन्मय हो जाएगा।शास्त्रीय संगीत के लिए तुम्हें एक भीतरी सौमनस्य चाहिए।तुम कहोगे, कुछ हो रहा है। 9-तुम्हारे जीवन की सभी संवेदनाएं क्षीण हो गई हैं। या तो तमस में सो गई हैं, या रजस में उत्तेजना के कारण मर गई हैं। सत्य को उपलब्ध व्यक्ति

परम संवेदनशील है।इसलिए बुद्ध पुरुष प्रगाढ़ता से जीते हैं। फूल उनके लिए ज्यादा गंध देते हैं। हवाएं उन्हें ज्यादा शीतलता देती हैं। नदी का कल -कल नाद उन्हें ओंकार के नाद से भर देता है। वे सन्नाटे को सुनने में समर्थ हो जाते हैं। साधारण भोजन भी उन्हें परम स्वाद देता है। और साधारण मनुष्य भी उन्हें परम सुंदर की प्रतिमाएं मालूम होने लगते हैं। उन्हें सारा जगत सुंदर हो जाता है। वे सत्यम्, शिवम् और सुंदरम् को उपलब्ध हो जाते हैं।

तीन प्रकृति/ ELEMENT का महत्वपूर्ण विवेचन;-

19 FACTS;-

1-रजस व्यक्ति का भोजन क्रोध को बढ़ाता है।तमस व्यक्ति का भोजन

आलस्य को बढ़ाता है।सत्व व्यक्ति का भोजन प्रीति को बढ़ाता है। तुम उसके पास प्रीति की गंध पाओगे। उसके पास एक मधुरिमा होगी, एक मिठास होगी। उसके बोलने में, उसके उठने -बैठने में एक संगीत होगा, एक लयबद्धता होगी। क्योंकि उसका शरीर भीतर भोजन के साथ लयबद्ध है।

2-Air Element/सत्व को उपलब्ध व्यक्ति के जीवन में प्रेम का दान है।

वह मांगता नहीं, वह सिर्फ देता है।तमस मांगता है। Air Element देता है। रजस को फुरसत नहीं है। सत्य तुम्हारी जीवन -ऊर्जा को, इतने प्रेम ,संतोष , ऐसी गहन तृप्ति से भर देता है कि तुम बांटने में उत्सुक हो जाते हो। क्योंकि तुम्हारे पास इतना है, तो तुम करोगे क्या.. और जितना तुम बांटते हो, उतना बढ़ता है।

3-सत्व को उपलब्ध व्यक्ति अनुशासन से नहीं जीते। तामसी व्यक्ति सदा ज्यादा लेगा, राजसी व्यक्ति सदा कम लेगा। सात्विक व्यक्ति संतुलित लेगा। लेकिन उसका संतुलन रोज बदलेगा। थोड़ा इसे समझ लेना चाहिए।

क्योंकि संतुलन रोज बदलना है, जिंदगी रोज बदल जाती है। तुम पैंतीस साल के हो; अभी तुम जितना भोजन करते हो, चालीस साल में उतना करोगे तो नुकसान होगा। पचास साल में उतना करोगे, तो भयंकर बीमारी हो जाएगी। पैंतीस साल पर जीवन-ऊर्जा उतरनी शुरू हो जाती है।अब मौत की तरफ यात्रा शुरू हो गई।आखिरी शिखर छू लिया। सत्तर साल में मरना है, तो पैंतीस साल में शिखर आ गया।अब उतार शुरू हुआ।

4-जैसे-जैसे उतार शुरू हुआ, सात्विक व्यक्ति का भोजन कम होता जाएगा। उसकी नींद भी कम होती जाएगी, भोजन भी कम होता जाएगा। सात्विक व्यक्ति मरते समय नींद से भी मुक्त हो जाएगा, भोजन से भी मुक्त हो जाएगा। सात्विक व्यक्ति की मृत्यु उपवास में होगी, अनिद्रा में होगी। तामसी व्यक्ति अक्सर नींद में मरेंगे। राजसी व्यक्ति संघर्ष में मरेंगे। सात्विक व्यक्ति उपवास में, शांति में, संगीत में मृत्यु को लीन होगा।

5-ब्राह्मण सात्विक का वर्ग है। सात्विक व्यक्ति जीने के लिए भोजन करता है, भोजन करने के लिए नहीं जीता। और सात्विक व्यक्ति के जीवन में कोई महत्वाकांक्षा /एंबीशन नहीं है। इसलिए वह किसी दौड के लिए ऊर्जा इकट्ठी नहीं करता। वह उतनी ही ऊर्जा चाहता है, जो आज जीवन के फूल के खिलने में सहयोगी हो जाए।

6-सात्विक व्यक्ति का भोजन अत्यल्प होगा, शुद्धतम होगा, मौलिक रूप से शाकाहारी होगा। उसके शरीर पर कभी भी भोजन का इतना बोझ न होगा कि मस्तिष्क को नुकसान पहुंचे।बहुत बार वह भोजन लेगा ही नहीं, ताकि ऊर्जा शुद्ध हो जाए, शांत हो जाए और ध्यान में लीन हो जाए।संसार में

जितने लोगों ने भी परम समाधि पाई है, वे सभी लोग उपवास के प्रेमी थे। महावीर, बुद्ध, जीसस, मोहम्मद, सभी ने उपवास किया है। और सभी ने उपवास की ऊर्जा का लाभ लिया है।

7-परम समाधि का क्षण उपवास के क्षण में ही आता है। तब विचार भी बंद हो जाते हैं; शरीर से भी संबंध बहुत दूर का हो जाता है, और ऊर्जा इतनी शुद्ध होती है, इतनी पवित्र होती है, कि उस पर सवार होकर कोई भी समाधि की अवस्था को उपलब्ध हो जाता है।भोजन करते हुए सविकल्प

समाधि संभव है परन्तु निर्विकल्प समाधि संभव नहीं है। अगर निर्विकल्प समाधि कभी भी संभव होती है, तो वह ऐसे ही क्षणों में संभव होती है, जब तुम्हारी स्थिति उपवास की है।

8-यह भी हो सकता है, तुम उपवास न कर रहे हो।जैसे जिस रात

बुद्ध को ज्ञान हुआ है, उस रात वे उपवासे नहीं थे। रात उन्होंने भोजन लिया था, सुबह वे ज्ञान को उपलब्ध हुए।लेकिन सुबह आते-आते शरीर

की अवस्था उपवास की हो जाती है। अंग्रेजी शब्द ब्रेकफास्ट का मतलब होता है, उपवास तोड़ना। शरीर की अवस्था उपवास की हो जाती है। छ: घंटे में, जो तुमने खाया है, वह लीन होने लगता है। आठ घंटे में करीब-करीब लीन हो जाता है। आठ घंटे और बारह घंटे के बीच उपवास की अवस्था आ जाती है, तब भोजन किया, नहीं किया बराबर होता है।

9-जिनको भी जब भी कभी ज्ञान उपलब्ध हुआ है, ऐसी ही घड़ी में हुआ है, जब शरीर उस अवस्था में था, जिसको हम उपवास कहें।शरीर भोजन नहीं पचा रहा था...बिलकुल सम्यक हालत में था। जो भोजन किया था, वह पच गया था या किया ही नहीं था। शरीर का कारखाना बिलकुल बंद होता है तभी तो ध्यान को सारी ऊर्जा मिल पाती है और ध्यान गति कर पाता है।

ये तीन वर्ण-शूद्र , क्षत्रिय , ब्राह्मण ...तमस, रजस, सत्व के वर्ण हैं। वैश्य का वर्ण तीनों का जोड़ है...मिश्रित वर्ग है।चारो वर्ण का जाति से कोई मतलब नहीं है।जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय,शूद्र ,नहीं होता। तो चारो वर्ण में तीनों तरह के लोग तुम पाओगे। शूद्र भी पाओगे, क्षत्रिय भी पाओगे, ब्राह्मण भी पाओगे।

10-ब्राह्मण तो कभी-कभी तुम्हें एकाध मिलेगा।जितने लोग ब्राह्मण की तरह जाने जाते हैं, वे केवल ब्राह्मण घर में जन्मे हैं। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता। ब्राह्मण तो ब्रह्म को जानने से कोई होता है। जिनके जीवन के तीनों गुण संयुक्त हो गए, सम-स्वर/ समवेत हो गए और जिन्होंने तीनों के पार एक को जान लिया, वे ही ब्राह्मण हैं। या उस जानने के मार्ग पर गतिमान हैं, वे ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण के घर में पैदा होने से कोई ब्राह्मण नहीं होता।

दुनिया में सब से बड़ा वर्ग वैश्य का है, सौ में से पंचानबे प्रतिशत लोग वैश्य हैं। शूद्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण सभी धन इकट्ठा करने में लगे है।दुनिया में, चार प्रतिशत लोग शूद्र हैं जो गहन तमस में पड़े हैंऔर मुश्किल से एक प्रतिशत लोग ब्राह्मण हैं।

11-अगर तुम इन तीनों गुणों को ठीक से अपने भीतर समझोगे,तो अपने

आचरण ,व्यवहार , वस्त्र , भोजन , उठने-बैठने में, सब तरफ से तुम धीरे-धीरे तमस को कम करोगे, रजस को कम करोगे, ताकि उन दोनों की ऊर्जा सत्य को मिल जाए, वे बराबर समतुल हो जाएं, तराजू एक सा हो जाए, पलड़े एक तल पर आ जाएं, तो तुम्हारे भीतर ब्राह्मण का जन्म होगा।

कोई ब्राह्मण के घर में पैदा नहीं होता; ब्राह्मण तुम्हारे भीतर पैदा होता है। तुम ब्राह्मण में पैदा नहीं होते। ब्रह्म का बोध ब्राह्मण का लक्षण है।

12-और जैसा भोजन के संबंध में सच है, वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन ही तरह के होंगे। सभी कुछ तीन तरह का होगा।तामसी व्यक्ति यज्ञ करेगा,

तो इसलिए करेगा कि जो उसके पास है, वह खो न जाए।तामसी व्यक्ति

हमेशा इस चिंता में रहेगा कि जो उसके पास है, वह खो न जाए; उसे वह पकड़कर रखता है। वह अगर यश करेगा, तो इसलिए कि जो उसके पास

है, वह बचा रहे।राजसी को चिंता है, जो उसके पास नहीं है, वह उसे मिल जाए। इसलिए अगर राजसी यश करेगा, तो इसलिए, ताकि जो नहीं है, वह मिल जाए। वह कुछ पाने के लिए यज्ञ करेगा। तामसी बचाने के लिए यश करेगा।

13-और सात्विक व्यक्ति अगर यज्ञ करेगा, तो सिर्फ उत्सव के लिए। न कुछ बचाने के लिए, न कुछ पाने के लिए; जो मिला ही हुआ है, जो सदा मिल ही रहा है, उसके अहोभाव, उसके आनंद के लिए, उसके उत्सव के लिए। उसका यज्ञ एक नृत्य है; उसका यज्ञ , परमात्मा की तरफ गाया गया एक गीत है ,एक धन्यवाद है।तामसी मंदिर में जाएगा, तो कहेगा कि जो

मेरे पास है, छीन मत लेना। राजसी जाएगा, तो कहेगा कि जो मेरे पास नहीं है, उसे मेरे लिए जुटा देना। सात्विक जाएगा , तो धन्यवाद देने कि जो है,जो चाहिए, वह जरूरत से बहुत ज्यादा है।मैं धन्यवाद देने आया हूं।

14-प्रार्थना तीनों की अलग-अलग होगी। ऐसे ही तीनों का तप अलग-अलग होगा। ऐसे ही तीनों का दान भी अलग-अलग होगा। तामसी अगर दान देगा, तो वह इसीलिए देगा कि वह जो उसने लूट-खसोट की है, वह बचे। सरकार से टैक्स में लाख रुपया बचा लेगा तो हजार रुपए का एक ट्रस्ट खड़ा कर देगा। वह यह दिखाना चाहता है कि दानी आदमीटैक्स बचाने वाला नहीं हो सकता है। वह चाहेगा कि समाज में खबर फैले कि वह बड़ा दानी है। अखबार में फोटो छपवाएगा कि अस्पताल बना दिया।

15-क्योंकि उससे उसको कुछ छिपाना है, कुछ बचाना है, कुछ ढांकना है। जो है, वह खो न जाए, इसलिए वह थोड़ा सा दान भी देगा। ताकि परमात्मा भी ध्यान रखे, समाज भी ध्यान रखे, लोग भी खयाल रखें। चोर अक्सर दानी होते हैं। मगर उनका दान तामसी होता है। वे इसलिए देते हैं ताकि किसी को खयाल न आए कि इन्होंने इतना छीना होगा।राजसी भी

दान देगा कि जो नहीं मिला है, वह मिले। उसका दान ऐसा है, जैसे कि मछली को पकड़ने वाला कांटे पर आटा लगाता है ;मछली को पकड़ने के लिए। वह दान देता है, ताकि उसकी महत्वाकांक्षा के लिए रास्ता बने।

16-पूंजीपति बड़ा कुशल है। वह सबको देता है।वह कोई फिक्र नहीं करता क्योंकि जो भी आएगा, उससे ही वसूल कर लेगा। उसका कोई पक्ष नहीं है। क्योंकि महत्वाकांक्षी का कोई पक्ष नहीं होता।इसलिए राजनीतिज्ञ करीब -करीब शतरंज के मोहरे हैं। खेलने वाले कोई और ही हैं। उनके चेहरे भी दिखाई नहीं पड़ते कि कौन खेल रहा है।सब को वही धनपति दे रहा है।

तो राजसी भी दान देता है, वह उसको पाने के लिए देता है, जो उसके हाथ में नहीं है। तामसी देता है उसको बचाने के लिए, जो उसके पास है।

17-सात्विक व्यक्ति दान देता है अहोभाव से, प्रेम से, न कुछ बचाने को है, न कुछ पाने को है। जो है, वह बांटने को है ;उसमें दूसरे को भी साझीदार बनाना है। वह इतना आनंदित है कि तुम्हें अपने आनंद में भी मित्र बनाना चाहता है, कि भई तुम आओ।वह भी दान देता है, लेकिन उसका दान बेशर्त है।यह विश्लेषण का सूत्र है कि तुम तामसी हो, कि राजसी हो, कि सात्विक हो। और किसी को धोखा देना नहीं है, इसलिए ठीक-ठीक जांच परख करना।

18-पांच तत्वों में से दो तत्व ..Earth-Space तो बेसिक ही होते हैं।यदि यह दो असंतुलित हो ..तो व्यक्ति सामान्य ही नहीं हो सकता। Space Element असंतुलित होने के कारण ही spastik children जैसी समस्याएं होती हैं।Earth Elementअसंतुलित होने के कारण गूंगे, बहरे ,अंधे या handicapped children जैसी समस्याएं होती हैं।इसलिए केवल तीनों Element के Ratio पर ध्यान रखना होगा।

19-सामान्यतया तुम्हारा एक एलिमेंट तो ज्यादा बढ़ा हुआ होगा। उसका Ratio 40 % या 50% भी हो सकता है।दूसरा और तीसरा 30% हो सकता है।पहले बढ़े हुए एलिमेंट से हम किसी व्यक्ति का एलिमेंट डिसाइड कर लेते हैं कि यह व्यक्ति Air/Fire /Water Element है।संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं।जिनका एक एलिमेंट बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है.. 70% तक। तो उन्हें हम पाइथागोरस कहते हैं।परंतु संसार में ऐसा कोई भी नहीं है जिसके पास तीनों एलिमेंट ना हो।हाँ Ratio कम- ज्यादा हो सकता है।

20-धीरे-धीरे अपने भीतर खोज करना। विश्लेषण ठीक कर लोगे, तो उससे तुम्हारा रास्ता साफ होगा। और तब धीरे धीरे तुम ऊर्जा को रूपांतरित कर सकते हो।जो ऊर्जा तमस में जा रही है, उसे रजस में ला

सकते हो।जो ऊर्जा रजस में जा रही है, उसे सत्य में ला सकते हो।शास्त्र की परिणति है, जब तीनों की ऊर्जाएं समतुल हो जाएंगी, वे तीनों एक -दूसरे को काट देते हैं ..चेतना गुणातीत हो जाती है।गुणातीत हो जाते ही तुम भी कह सकोगे, ''अहं ब्रह्मास्मि''... मैं ब्रह्म हूं।

....SHIVOHAM...