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मनुष्य के सात प्रकार के शरीर और सात चक्र..IN NUTSHELL

सात प्रकार के शरीर;-

मनुष्य के पास सात प्रकार के शरीर हैं। इन सात शरीरों के संबंध में थोड़ा समझेंगे तो फिर कुंडलिनी की बात पूरी तरह समझ में आ सकेगी।

1-एक शरीर तो जो हमें दिखाई पड़ता है—फिजिकल बॉडी— भौतिक शरीर।

2-दूसरा शरीर जो उसके पीछे है और जिसे भाव शरीर/ इमोशन बॉडी कहें — आकाश शरीर।

3- तीसरा शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे कारण शरीर/एस्ट्रल बॉडी कहें—सूक्ष्म शरीर।

4- चौथा शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे मेंटल बॉडी कहें— मनस शरीर।

5- पांचवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे स्पिरिचुअल बॉडी कहें— आत्मिक शरीर।

6-छठवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे हम कास्मिक बॉडी कहें—ब्रह्म शरीर।

7--सातवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे हम निर्वाण शरीर, बॉडीलेस बॉडी कहें।

1-फिजिकल बॉडी/ भौतिक शरीर;- जीवन के पहले सात वर्ष में भौतिक शरीर ही निर्मित होता है, बाकी सारे शरीर बीजरूप होते हैं; उनके विकास की संभावना होती है, लेकिन वे विकसित उपलब्ध नहीं होते। इसलिए पहले सात वर्ष, इमिटेशन, अनुकरण के ही वर्ष हैं। पहले सात वर्षों में कोई बुद्धि, कोई भावना, कोई कामना विकसित नहीं होती,सिर्फ भौतिक शरीर विकसित होता है।कुछ लोग सात वर्ष से

ज्यादा कभी आगे नहीं बढ़ पाते; सिर्फ भौतिक शरीर ही रह जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों में और पशु में कोई अंतर नहीं होगा। पशु के पास भी सिर्फ भौतिक शरीर ही होता है, दूसरे शरीर अविकसित होते हैं।

2-भाव शरीर/ इमोशन बॉडी ;-

दूसरे सात वर्ष में भाव शरीर का विकास होता है, या आकाश शरीर का। इसलिए दूसरे सात वर्ष व्यक्ति के भाव जगत के विकास के वर्ष हैं।इसीलिए चौदह वर्ष की उम्र में 'काम' मैच्योरिटी उपलब्ध होती है; वह भाव का बहुत प्रगाढ़ रूप है। कुछ लोग चौदह वर्ष के होकर ही रह जाते हैं, शरीर की उम्र बढ़ती जाती है, लेकिन उनके पास दो ही शरीर होते हैं।

3- कारण शरीर/एस्ट्रल बॉडी ;-

05 POINTS;-

1-तीसरे सात वर्षों में सूक्ष्म शरीर विकसित होता है— इक्कीस वर्ष की उम्र तक। दूसरे शरीर में भाव का विकास होता है; तीसरे शरीर में तर्क, विचार और बुद्धि का विकास होता है।

इसलिए सात वर्ष के पहले दुनिया की कोई अदालत किसी बच्चे को सजा नहीं देगी, क्योंकि उसके पास सिर्फ भौतिक शरीर है; और बच्चे के साथ वही व्यवहार किया जाएगा जो एक पशु के साथ किया जाता है। उसको जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। और अगर बच्चे ने कोई पाप भी किया है, अपराध भी किया है, तो यही माना जाएगा कि किसी के अनुकरण में किया है, मूल अपराधी कोई और होगा। 2-दूसरे शरीर के विकास के बाद— चौदह वर्ष—एक तरह की प्रौढ़ता मिलती है; लेकिन वह प्रौढ़ता यौन—प्रौढ़ता है। प्रकृति का काम उतने से पूरा हो जाता है। इसलिए पहले शरीर और दूसरे शरीर के विकास में प्रकृति पूरी सहायता देती है, लेकिन दूसरे शरीर के विकास से मनुष्य 'मनुष्य' नहीं बन पाता। तीसरा शरीर—जहां विचार, तर्क और बुद्धि विकसित होती है—वह शिक्षा, संस्कृति, सभ्यता का फल है। इसलिए दुनिया के सभी मुल्क इक्कीस वर्ष के व्यक्ति

को मताधिकार देते हैं।

3-जैसे जिस व्यक्ति की बुद्धि विकसित न हुई हो, वह गणित में कोई आनंद नहीं ले सकता।आइंस्टीन के लिए गणित कोई काम नहीं है, खेल है। पर उसके लिए बुद्धि का उतना विकास चाहिए कि वह गणित को खेल बना सके।कोई आइंस्टीन उसमें उतना ही रसमुग्ध होता है, जितना कोई संगीतज्ञ वीणा में होता हो, कोई चित्रकार रंग में होता हो।

4-जब भी किसी कौम या समाज की जिंदगी में तीसरे शरीर का विकास महत्वपूर्ण हो जाता है, तो बड़ी वैचारिक क्रांतियां घटित होती हैं।बुद्ध और महावीर के वक्त में बिहार ऐसी ही हालत में था कि उसके पास तीसरी क्षमता को उपलब्ध बहुत बड़ा समूह था। सुकरात और प्लेटो के वक्त यूनान की ऐसी ही हालत थी। कनफ्यूशियस और लाओत्से के समय चीन की ऐसी ही हालत थी। और बड़े मजे की बात है कि ये सारे महान व्यक्ति पांच सौ साल के भीतर सारी दुनिया में हुए। उस पांच सौ साल में मनुष्य के तीसरे शरीर ने बड़ी ऊंचाइयां छुई।लेकिन आमतौर से तीसरे शरीर पर मनुष्य रुक जाता है, अधिक लोग इक्कीस वर्ष के बाद कोई विकास नहीं करते।

5-अठारह वर्ष का मताधिकार इसी बात की सूचना है कि मनुष्य, जो काम इक्कीस वर्ष में पूरा हो रहा था, उसे अब और जल्दी पूरा करने लगा है, वह अठारह वर्ष में भी पूरा

कर ले रहा है।लेकिन साधारणत: इक्कीस वर्ष लगते हैं तीसरे शरीर के विकास के लिए। और अधिकतम लोग तीसरे शरीर पर रुक जाते हैं; मरते दम तक उसी पर रुके रहते हैं; चौथा शरीर, मनस शरीर भी विकसित नहीं हो पाता।

4-मेंटल बॉडी /मनस शरीर;-

05 POINTS;-

1-चौथे शरीर /साइकिक की दुनिया है -मनस शरीर की। उसके बड़े अदभुत और अनूठे अनुभव हैं।चौथे शरीर के बड़े अनूठे अनुभव हैं। जैसे सम्मोहन, टेलीपैथी, क्लेअरवायंस -ये सब चौथे शरीर की संभावनाएं हैं। आदमी बिना समय और स्थान की बाधा के दूसरे से संबंधित हो सकता है; बिना बोले दूसरे के विचार पढ़ सकता है या अपने विचार दूसरे तक पहुंचा सकता है; बिना कहे, बिना समझाए, कोई बात दूसरे में प्रवेश कर सकता है और उसका बीज बना सकता है, शरीर के बाहर यात्रा कर सकता है—एस्ट्रल प्रोजेक्शन—शरीर के बाहर घूम सकता है, अपने इस शरीर से अपने को अलग जान सकता है।

2-इस चौथे शरीर की, मनस शरीर की, साइकिक बॉडी की बड़ी संभावनाएं हैं, जो हम बिलकुल ही विकसित नहीं कर पाते हैं, क्योंकि इस दिशा में खतरे बहुत हैं और इस दिशा में मिथ्या की बहुत संभावना है । क्योंकि जितनी चीजें सूक्ष्म होती चली जाती हैं, उतनी ही मिथ्या और फाल्स संभावनाएं बढ़ती चली जाती हैं।अब एक आदमी अपने शरीर के बाहर गया या नहीं—वह सपना भी देख सकता है अपने शरीर के बाहर जाने का, जा भी सकता है। और उसके अतिरिक्त, स्वयं के अतिरिक्त और कोई गवाह नहीं होगा। इसलिए धोखे में पड़ जाने की बहुत गुंजाइश है; क्योंकि इस शरीर से दुनिया जो शुरू होती है , वह सब्जेक्टिव है; इसके पहले की दुनिया ऑब्जेक्टिव है।

3-अगर किसी के हाथ में रुपया है, तो आप भी देख सकते हैं, मैं भी देख सकती हूं, पचास लोग देख सकते हैं। यह कॉमन रियलिटी है, जिसमें हम सब सहभागी हो सकते हैं और जांच हो सकती है कि रुपया है या नहीं ।लेकिन किसी के विचारों की दुनिया में आप सहभागी नहीं हो सकते, वह निजी दुनिया शुरू हो गई। जहां से निजी दुनिया शुरू होती है, वहां से खतरा शुरू होता है; क्योंकि किसी चीज की वैलिडिटी, किसी चीज की सच्चाई के सारे बाह्य नियम खतम हो जाते हैं।

4-असली धोखा का जो जगत है, वह चौथे शरीर से शुरू होता है।उसके पहले के सब धोखे पकड़े जा सकते हैं।हमारा जो शरीर विकसित होता है, उस शरीर के अनंत—अनंत आयाम हमारे लिए खुल जाते हैं। जिसका भाव शरीर विकसित नहीं हुआ, जो सात वर्ष पर ही रुक गया है, उसके जीवन का रस खाने—पीने पर समाप्त हो जाएगा। जिस कौम में पहले शरीर के लोग ज्यादा मात्रा में हैं, उसकी जीभ के अतिरिक्त कोई संस्कृति नहीं होगी।

5-जिस कौम में अधिक लोग दूसरे शरीर के हैं, वह कौम 'कामवासना' से सेंटर्ड हो जाएगी; उसका सारा व्यक्तित्व—उसकी कविता, उसका संगीत, उसकी फिल्म, उसका नाटक, उसके चित्र, उसके मकान आदि सब किसी अर्थों में वासना से भर जाएंगी।जिस सभ्यता में तीसरे शरीर का ठीक से विकास हो पाएगा , वह सभ्यता अत्यंत बौद्धिक चिंतन और विचार से भर जाएगी।लेकिन जो चौथा शरीर है उसके अपने अनूठे अनुभव हैं ।

5-स्पिरिचुअल बॉडी/आत्म शरीर:-

04 POINTS;-

1-पांचवां शरीर बहुत कीमती है, जिसको अध्यात्म शरीर या स्पिरिचुअल बॉडी कहें।वह अगर ठीक से जीवन का विकास हो, तो पैंतीस वर्ष की उम्र तक, उसको विकसित हो जाना चाहिए।

लेकिन वह तो बहुत दूर की बात है, चौथा शरीर ही नहीं विकसित हो पाता। इसलिए आत्मा वगैरह हमारे लिए बातचीत है, सिर्फ चर्चा है; उस शब्द के पीछे कोई कंटेंट नहीं है। जब हम कहते हैं ‘ आत्मा ‘, तो उसके पीछे कुछ नहीं होता, सिर्फ शब्द होता है, जब हम कहते हैं ‘ दीवाल’, तो सिर्फ शब्द नहीं होता, पीछे कंटेंट होता है। हम जानते हैं, दीवाल यानी क्या।

2-आत्मा’ के पीछे कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि आत्मा हमारा अनुभव नहीं है।वह पांचवां शरीर है। और चौथे शरीर में कुंडलिनी जगे तो ही पांचवें शरीर में प्रवेश हो सकता है, अन्यथा पांचवें शरीर में प्रवेश नहीं हो सकता। चौथे का पता नहीं है, इसलिए पांचवें का पता नहीं हो पाता। और पांचवां भी बहुत थोड़े से लोगों को पता हो पाता है। जिसको हम आत्मवादी कहते हैं, कुछ लोग उस पर रुक जाते हैं, और वे कहते हैं बस यात्रा पूरी हो गई; आत्मा पा ली और सब पा लिया।यात्रा अभी भी पूरी नहीं हो गई।

3-इसलिए जो लोग इस पांचवें शरोर पर रुकेंगे, वे परमात्मा को इनकार कर देंगे, वे कहेंगे, कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा वगैरह नहीं है। जैसे जो पहले शरीर पर रुकेगा, वह कह देगा कि कोई आत्मा वगैरह नहीं है। तो एक शरीरवादी है, एक मैटीरियलिस्ट है, वह कहता है. शरीर सब कुछ है; शरीर मर जाता है, सब मर जाता है। ऐसा ही आत्मवादी है, वह कहता है. आत्मा ही सब कुछ है, इसके आगे कुछ भी नहीं; बस परम स्थिति आत्मा है। लेकिन वह पांचवां शरीर ही है।

4-पांचवें शरीर तक बात बड़ी वैज्ञानिक ढंग से चलती है। सारी बात साफ हो सकती है। छठवें शरीर पर बात की सीमाएं खोने लगती है। शब्‍द अर्थहीन होने लगता है लेकिन फिर भी इशारे किये जा सकते है क्‍योंकि अब खुद का होना ही गिर जाता है।

6- कास्मिक बॉडी/ब्रह्म शरीर;-

02 POINTS;-

1-छठवां शरीर ब्रह्म शरीर है, वह कास्मिक बॉडी है। जब कोई आत्मा को विकसित कर ले और उसको खोने को राजी हो, तब वह छठवें शरीर में प्रवेश करता है।अगर दुनिया में मनुष्य वैज्ञानिक ढंग से विकास करे, तो बयालीस वर्ष की उम्र तक सहज हो जाना चाहिए।

ऐब्सौल्यूट बीइंग (परम अस्‍तित्‍व) को छठवें शरीर तक और छठवें केंद्र से जाना जा सकता है।इसलिए जो लोग ब्रह्म की तलाश में है, वे भृकुटि के मध्‍य में आज्ञा चक्र पर ध्‍यान करेंगे; वह उससे संबंधित चक्र है; उस शरीर का चक्र है। और जो वहां उस चक्र पर पूरा काम करेंगे, तो वहां से उन्‍हें जो अनंत का विस्‍तार दिखाई पड़ना शुरू होगा उसको वे तृतीय नेत्र / थर्ड आई कहना शुरू कर देंगे।

2-और कुछ लोग छठवें शरीर पर ही रूक जायेंगे, क्‍योंकि ब्रह्म शरीर ( काज्मिक बॉडी ) आ गया, ब्रह्म हो गया मैं, अहम ब्रह्मास्‍मि की हालत आ गयी—अब ‘’मैं’’ नहीं रहा, ब्रह्म ही रह गया है। अब और कहां है खोज? अब कैसी खोज? अब किसको खोजना है? अब तो खोजने को भी कुछ नहीं है; अब तो सब पा लिया है; क्‍योंकि ब्रह्म का मतलब है—दि टोटल; सम, समग्र।तो साधक की परम खोज में ब्रह्म आखिरी बाधा है—द लास्‍ट बैरियर। बीइंग (अस्‍तित्‍व) रह गया है अब लेकिन अभी भी एक और शेष रह गया—'न होना,' नॉन बीइंग(अनस्‍तित्‍व)/ नास्ति।

7-बॉडीलेस बॉडी/ निर्वाण काया:-

03 POINTS;-

1-इसलिए सातवां शरीर है निर्वाण काया। उसका चक्र है सहस्त्र सार। और उसके सबंध में कोई बात नहीं की जा सकती है। खींच-तानकर;ब्रह्म तक बात जा सकती है।और वह सातवां

शरीर निर्वाण काया है,जो उनचास वर्ष तक हो जाना चाहिए। वह कोई शरीर नहीं है, वह बॉडीलेसनेस की हालत है। वह परम है। वहां शून्य ही शेष रह जाएगा। वहां ब्रह्म भी शेष नहीं है। वहां कुछ भी शेष नहीं है। वहां सब समाप्त हो गया है।

2-इसलिए बुद्ध से जब भी कोई पूछता है, वहां क्या होगा? तो वे कहते हैं जैसे दीया बुझ जाता है, फिर क्या होता है? खो जाती है ज्योति, फिर तुम नहीं पूछते, कहां गई? फिर तुम नहीं पूछते, अब कहां रहती होगी? बस खो गई।निर्वाण शब्द का मतलब होता है, दीये का

बुझ जाना। इसलिए बुद्ध कहते हैं, निर्वाण हो जाता है। पांचवें शरीर तक मोक्ष की प्रतीति होगी, क्योंकि परम मुक्ति हो जाएगी; ये चार शरीरों के बंधन गिर जाएंगे और आत्मा परम मुक्त होगी।तो जो मोक्ष है, वह पांचवें शरीर की अवस्था का अनुभव है।अगर चौथे शरीर पर कोई रुक जाए, तो स्वर्ग का या नरक का अनुभव होगा; वे चौथे शरीर की संभावनाएं हैं।

3-निर्वाण काया का मतलब है, शून्य-काया—जहां हम होने से न होने में छलांग लगा जाते है। क्‍योंकि जो जानने को शेष रह गया ..उसे भी जान लेना जरूरी है कि 'न होना' क्‍या है। इसलिए सातवां शरीर जो है वह एक अर्थ में महामृत्‍यु है।और निर्वाण का अर्थ है , दीये का बुझ जाना है; वह जो हमारा होना था, वह जो हमारा मैं था, मिट गया; वह जो हमारी अस्‍मिता थी; मिट गई, लेकिन अब हम सर्व के साथ एक होकर फिर हो गये है; अब हम ब्रह्म हो गये है।अब उसे भी छोड़ देना पड़ेगा। और जिसकी जितनी छलांग की तैयारी है, वह ‘’जो है’’, उसे जो जान ही लेता है; ‘’जो नहीं है’’ उसे भी जान लेता है।

NOTE;-

अगर पहले, दूसरे और तीसरे शरीर पर कोई रुक जाए, तो यही जीवन सब कुछ है—जन्म और मृत्यु के बीच; इसके बाद कोई जीवन नहीं है।अगर चौथे शरीर पर चला जाए,तो इस

जीवन के बाद नरक और स्वर्ग का जीवन है,वहां दुख और सुख की अनंत संभावनाएं हैं ।अगर पांचवें शरीर पर पहुंच जाए, तो मोक्ष का द्वार है।अगर छठवें पर पहुंच जाए,तो मोक्ष के

भी पार ब्रह्म की संभावना है; वहां न मुक्त है, न अमुक्त है, वहां जो भी है उसके साथ वह एक हो गया। 'अहं ब्रह्मास्मि' की घोषणा इस छठवें शरीर की संभावना है।लेकिन अभी एक

कदम और, जो लास्ट जंप है—जहां न अहं है, न ब्रह्म है, जहां मैं और तू दोनों नहीं हैं; जहां कुछ है ही नहीं, जहां परम शून्य है— टोटल, एब्सोल्युट वॉयड—वह निर्वाण है।

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सात शरीर और सात चक्र 1 -मूलाधार चक्र :-

04 POINTS;- 1-यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह “आधार चक्र” है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है, उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

2-मंत्र : “लं”

3-कैसे जाग्रत करें : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है.! इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यािन लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

4-प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतरवीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है। 2 - स्वाधिष्ठान चक्र; –

04 POINTS;- 1-यह वह चक्र लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है, जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है, वह आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

2-मंत्र : “वं”

3-कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती. लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।

4-प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो, तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी। 3 -मणिपुर चक्र : 04 POINTS;- 1-नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत “मणिपुर” नामक तीसरा चक्र है, जो दस कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

2-मंत्र : “रं”

3-कैसे जाग्रत करें: आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।

4-प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं। 4-अनाहत चक्र;-

04 POINTS;- 1-हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही “अनाहत चक्र” है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं.

2-मंत्र : “यं”

3-कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और “सुषुम्ना” इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।

4-प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है। 5- विशुद्ध चक्र;-

04 POINTS;- 1-कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां “विशुद्ध चक्र” है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

2-मंत्र : “हं”

3-कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

4-प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है। 6-आज्ञाचक्र :- 04 POINTS;- 1-भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में “आज्ञा-चक्र” है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है, तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। “बौद्धिक सिद्धि” कहते हैं।

2-मंत्र : “ॐ”

3-कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

4-प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस “आज्ञा चक्र” का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं, व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है। 7- सहस्रार चक्र :

03 POINTS;-

1-“सहस्रार” की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

2-कैसे जाग्रत करें : “मूलाधार” से होते हुए ही “सहस्रार” तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह “चक्र” जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

3-प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही “मोक्ष” का द्वार है।

....SHIVOHAM...