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क्या ज्‍योतिष एकात्‍म का बोध है ?PART-01

क्या मनुष्य तभी बीमार होता है ;जब उसके और उसके जन्‍म के साथ जुड़े हुए नक्षत्रों के

बीच का तारतम्‍य टूट जाता है?-

11 FACTS;-

1-ज्‍योतिष की सर्वाधिक गहरी मान्‍यताएं भारत में पैदा हुईं।ज्‍योतिष की गणना के लिए ही सबसे पहले गणित का जन्‍म हुआ। इसलिए सारी दुनिया की भाषाओं में अंक गणित के जो अंक है वह भारतीय है।जिसे आप अंग्रेजी में नाइन कहते है

वह संस्‍कृत के नौ का ही रूपांतरण है। जिसे आप एठ कहते है, वह संस्‍कृत के अष्‍ट का ही रूपान्‍तरण है। एक से लेकर नौ तक जगत की समस्‍त सभ्‍य भाषाओं में गणित के नौ अंकों का जो प्रचलन है वह भारतीय ज्‍योतिष के प्रभाव में ही हुआ है।

ज्‍योतिष शायद सबसे पुराना विषय है और एक अर्थ में सबसे ज्‍यादा तिरस्‍कृत भी। सबसे पुराना इसलिए कि मनुष्‍य जाति के इतिहास की जितनी खोजबीन हो सकी है;उसमें से ऐसा कोई भी समय नहीं था जब ज्‍योतिष मौजूद न रहा हो। जीसस से पच्‍चीस हजार वर्ष पूर्व सुमेर में मिले हुए हडडी के अवशेषों पर ज्‍योतिष के चिन्‍ह और चंद्र की यात्रा के चिन्ह अंकित है।ऋग्‍वेद

में पच्‍चान्‍नबे हजार वर्ष पूर्व-नक्षत्रों की जैसी स्‍थिति थी उसका उल्‍लेख है।क्‍योंकि उस समय नक्षत्रों की जो स्‍थिति थी उसे बाद में जानने का कोई भी उपाय नहीं था।अब जरूर हमारे पास ऐसे वैज्ञानिक साधन उपलब्‍ध हो सके हैं कि हम जान सकें कि अतीत में नक्षत्रों की स्‍थिति कब कैसी रही होगी

2-उन्‍नीस सौ बीस में चीजेवस्‍की नाम के एक रूसी वैज्ञानिक ने इस बात की गहरी खोजबीन शुरू की और पाया कि सूर्य पर हर ग्‍यारह वर्ष में आणविक विस्‍फोट होता है।और जब भी सूर्य पर ग्‍यारह वर्षों में आणविक विस्‍फोट होता है;तभी पृथ्‍वी पर युद्ध और क्रांतियों के सूत्रपात होते है। और उसके अनुसार विगत सात सौ साल के लम्‍बे इतिहास में सूर्य पर जब भी कभी ऐसी घटना घटी है ;तभी पृथ्‍वी पर दुर्घटनाएँ घटी है।सूरज, जैसा हम साधारण: सोचते है ऐसा कोई निष्कृत अग्रि का गोला नहीं है। वरन अत्‍यन्‍त सक्रिय और जीवन्‍त अग्‍नि संगठन है। और प्रतिफल सूरज की तरंगों में रूपांतरण होते रहते है। और सूरज की तरंगों का जरा सा रूपांतरण भी पृथ्‍वी के प्राणों को कंपित कर जाता है । इस पृथ्‍वी पर कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता जो सूरज

पर घटित हुए बिना घटित हो जाता है।जब सूर्य का ग्रहण होता है तो पक्षी जंगलों में चौबीस घण्‍टे पहले से ही गीत गाना बंद कर देते है। पूरे ग्रहण के समय तो सारी पृथ्‍वी मौन हो जाती है। पक्षी गीत बंद कर देते है और सारे जंगलों के जानवर भयभीत हो जाते है। किसी बड़ी आशंका से पीड़ित हो जाते है।बन्‍दर वृक्षों को छोड़कर नीचे आ जाते है। वे भीड़ लगा कर किसी सुरक्षा का उपाय करने लगते है। और एक आश्चर्य कि बन्‍दर तो निरन्‍तर बातचीत और शोर-गुल में लगे रहते हे। सूर्य ग्रहण के वक्‍त इतने मौन हो जाते है जितने कि साधु और संन्‍यासी भी ध्‍यान में नहीं होते है।

3-जीसस से छह हजार वर्ष पहले सुमेर में यह धारणा थी की पृथ्‍वी पर जो भी बीमारी पैदा होती है, जो भी महामारी पैदा होती है वह सब नक्षत्रों से सम्‍बन्‍धित है। अब तो इसके लिए वैज्ञानिक आधार भी मिल गए है।वास्तव में, भारत से ज्‍योतिष की पहली किरणें सुमेर की सभ्‍यता में पहुंची। सुमेर वासियों ने सबसे पहले ईसा से छह हजार साल पूर्व पश्‍चिम जगत के लिए ज्‍योतिष का द्वार खोला। उन्‍होंने सबसे पहले नक्षत्रों के वैज्ञानिक अध्‍ययन की आधार शिलाएं रखी। उन्‍होंने बड़े ऊंचे, सात सौ फिट ऊंचे मीनार बनाए और उन मीनारों पर सुमेर के पुरोहित चौबीस घण्‍टे आकाश का अध्‍ययन करते थे।और आज हा जाता

है कि सुमेर वासियों ने मनुष्‍य जाति का असली इतिहास प्रांरभ किया। सुमेर के बाद पैरासेल्‍सस नाम के स्‍विस चिकित्‍सक ने इसकी पुनर्स्थापना की। उसने एक बहुत अनूठी मान्‍यता स्‍थापित की, और वह मान्‍यता समस्‍त चिकित्‍सा विज्ञान को बदलने वाली सिद्ध होगी।पैरासेल्‍सस ने एक मान्‍यता को गति दी और वह मान्‍यता यह थी कि व्यक्ति तभी बीमार होता है ;जब उसके और उसके जन्‍म के साथ जुड़े हुए नक्षत्रों के बीच का तारतम्‍य टूट जाता है

4-अब तक उस मान्‍यता पर बहुत जोर नहीं दिया गया है। क्‍योंकि ज्‍योतिष सर्वाधिक पुरानी, लेकिन सर्वाधिक तिरस्‍कृत विषय है; यद्यपि सर्वाधिक मान्‍य भी।ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व पाइथागोरस ने व्यक्ति और नक्षत्रों के बीच एक प्लैनेटोरियम हार्मोनी है ...इसके संबंध में एक बहुत बड़े दर्शन को जन्‍म दिया था।ज्‍योतिष विज्ञान है ..फ्रांस में, तो सैंतालीस प्रतिशत लोग ज्‍योतिष में

विश्‍वास करते है।अमरीका में पाँच हजारो बड़े ज्‍योतिषी दिन रात काम में लगे रहते है। और उनके पास इतने ग्राहक हैं कि वे पूरा काम भी निपटा नहीं पाते है। अमरीका प्रति वर्ष करोड़ों डालर ज्‍योतिषियों को चुकाता है। अन्‍दाज है कि सारी पृथ्‍वी पर कोई अठहत्‍तर प्रतिशत लोग ज्योतिष में विश्‍वास करते है । लेकिन वे अठहत्तर प्रतिशत लोग सामान्‍य है। वैज्ञानिक, विचारक,

बुद्धिवादी ज्‍योतिष की बात सुनकर ही चौंक जाते है।ज्‍योतिष के संबंध में जो-जो दावे किए गए थे उनको अब तक सिद्ध करने का उपाय नहीं था। लेकिन अब उनको सिद्ध करने का उपाय है।

5- 16 वीं शती के प्रतिष्ठ एलकेमिस्ट ,पैरासेल्‍सस को यूरोप में औषध रसायन का प्रवर्तक माना जाता है। वे रोग और स्वास्थ्य पर ग्रहों के प्रभाव को भी मानते थे। विश्व के समस्त पदार्थो में वे जीवन का अस्तित्व मानते थे। वे वायु, जल और अग्नि में शरीर और प्राण (जीवन) तो मानते थे, पर आत्मा नहीं। सब पदार्थो के मूल में वे तीन तत्व मानते थे : लवण (शरीर), गंधक (आत्मा) और पारा (प्राण)।ये चिकित्‍सक किसी मरीज को दवा नहीं देता था जब तक उसकी जन्‍म कुण्‍डली न देख ले और बड़ी हैरानी की बात है कि पैरासेल्‍सस ने जन्‍म कुण्‍डलियां देखकर ऐसे मरीजों को ठीक किया जिनको कि अन्‍य चिकित्‍सक कठिनाई में पड़ गए थे और ठीक नहीं कर पा रहे थे। उसका कहना था, जब तक मैं न जान लूं कि यह व्‍यक्‍ति किन नक्षत्रों की स्‍थिति में पैदा हुआ है ...तब तक इसके अंतरर्संगीत के सूत्र को भी पकड़ना सम्‍भव नहीं है। और जब तक मैं यह न जान लूं कि इसके अंतरर्संगीत की व्‍यवस्‍था क्‍या है तो इसे कैसे हम स्‍वस्‍थ करें।

6-अगर साधारण: हम चिकित्‍सक से पूछे कि स्‍वास्‍थ्‍य का क्‍या अर्थ है तो वह इतना ही कहेगा कि बिमारी का न होना। पर उसकी परिभाषा निगेटिव है और स्‍वास्‍थ्‍य तो पॉजिटिव अवस्‍था है...स्‍वभाव है,। बीमारी निगेटिव है ... आक्रमण है।

स्‍वास्‍थ्‍य तो हमारे साथ है ...हम लेकर पैदा होते है। बीमारी कभी होती है ...उस पर आती है। पर हम स्‍वास्‍थ्‍य की परिभाषा अगर चिकित्‍सकों से पूछे तो वे यही कह पाते है कि बीमारी नहीं है तो स्‍वास्‍थ्‍य है। पैरासेल्‍सस कहता था, यह व्‍याख्‍या गलत है। स्‍वास्‍थ्‍य की पॉजिटिव डेफिनेशन होनी चाहिए। पर उस पाजीटिव डेफिनेशन को तुम्‍हारे अन्‍तर्निहित संगीत से ही पकड़ेगे

क्‍योंकि वहीं तुम्‍हारा स्‍वास्‍थ्‍य है। उन्‍नीस सौ पचास में एक नई साइंस ..कास्‍मिक केमिस्‍ट्री, ब्रह्म-रसायन का जन्‍म हुआ। उसको जन्‍म देने वाले है , जियारजी जिआ डी जिन्होंने वैज्ञानिक आधारों पर प्रयोगशालाओं में अनन्‍त प्रयोगों को करके यह सिद्ध किया है कि जगत पूरा एक आर्गैनिक यूनिटी है।

7-पूरा जगत एक शरीर है और अगर हमारी उँगली बीमार पड़ जाती है तो हमारा पूरा शरीर प्रभावित होता है। शरीर का अर्थ होता है -टुकड़े अलग-अलग नहीं है ... संयुक्‍त है, जीवन्‍त रूप से इकट्ठे है। अगर हमारी आँख में तकलीफ होती है तो हमारे पैर का अंगूठा भी उसे अनुभव करता है। और अगर हमारे पैर को चोट लगती है तो ह्रदय को भी खबर मिलती हे। और अगर हमारा मस्‍तिष्‍क रूग्‍ण हो जाता है तो पूरा का पूरा शरीर बेचैन हो जाता है। और अगर हमारा पूरा शरीर नष्‍ट कर दिया जाए तो हमारे मस्‍तिष्‍क को खड़े होने के लिए जगह मिलनी मुश्‍किल हो जाएगी। हमारा शरीर एक आर्गैनिक यूनिटी है ..एक एकता है ..जीवन्‍त। उसमें कोई भी एक को छुओ तो सब तरंगित होता है, सब प्रभावित हो जाता है।

8-कास्‍मिक केमिस्‍ट्री कहती है कि पूरा ब्रह्माण्‍ड एक शरीर है। उसमें कोई भी चीज अलग-अलग नहीं है, सब संयुक्‍त है। इसलिए कोई तारा कितनी ही दूर क्‍यों न हो। जब वह हर ग्‍यारह वर्षों में....ज्‍यादा ज्योतिर्मय, होता है तब हमारे खून की

धाराएं बदल जाती है ।पिछली बार जब सूरज पर बहुत ज्‍यादा गतिविधि चल रही थी और अग्‍नि के विस्‍फोट चल रहे थे तो एक जापानी चिकित्‍सक तोमा जो बीस वर्षों से स्‍त्रियों के खून पर निरन्‍तर काम कर रहा था। स्‍त्रियों के खून की एक विशेषता है जो पुरूषों के खून की नहीं है। उनके मासिक धर्म के समय उनका खून पतला हो जाता है। और पुरूष का खून पूरे समय एक-सा रहता है।

9-लेकिन जब सूरज पर बहुत जोर से आणविक शक्‍तियों के तूफान चल रहे थे—जो कि हर ग्‍यारह वर्ष में चलते है। तब वह चकित हुआ कि जब सूरज पर आणविक तूफान चलता है पुरूषों का खून भी पतला हो जाता है। वह बड़ी नयी घटना थी और उसके पहले कभी रिकार्ड नहीं की गयी थी कि पुरूष के खून पर सूरज पर चलने वाले तूफान का कोई प्रभाव पड़ेगा। और

अगर खून पर प्रभाव पड़ सकता है तो फिर किसी भी चीज पर प्रभाव पड़ सकता है।लेकिन अरस्तू के बाद दो हजार साल से ऐसा समझा जाता है कि अन्‍तरिक्ष शून्‍य है, वहां कुछ है ही नहीं। दो सौ मील के बाद पृथ्‍वी पर हवाएँ समाप्‍त हो जाती है। और फिर अन्‍तरिक्ष शून्‍य है। लेकिन अन्तरिक्ष यात्रियों की खोज ने सिद्ध किया कि वह बात गलत है। अन्‍तरिक्ष शून्‍य नहीं है, बहुत भरा हुआ है। और न तो शून्‍य है, न मृत है ...बहुत जीवन्‍त है। सच तो यह है कि पृथ्‍वी की दो सौ मील की हवाओं की पर्तें सारे प्रभावों को हम तक आने से रोकती है।

10-अन्तरिक्ष में तो अद्भुत धाराएं बहती रहती है ...उसको मनुष्य सह भी पायेगा या नहीं।सबसे बड़ी विचारणीय बात यही थी कि पृथ्‍वी को छोड़ते ही अन्‍तरिक्ष में न मालूम रेडिएशन की किरणों की कितनी धाराएं होंगी ...वह मनुष्य पर क्‍या

प्रभाव करेंगी।एक अमरीकन विचारक फ्रैंक ब्राउन ने अन्‍तरिक्ष यात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाने का काम किया है। उसने अन्‍तरिक्ष में आदमी को भेजने के पहले आलू भेजे । क्‍योंकि ब्राउन का कहना है कि आलू और मनुष्य में बहुत भीतरी फर्क नहीं। अगर आलू सड़ जाएगा तो मनुष्य भी नहीं बच सकेगा और अगर आलू बच सकता है तो ही मनुष्य बच सकेगा। आलू बहुत मजबूत प्राणी है और मनुष्य तो बहुत संवेदनशील है। अगर आलू जीवंत लौट आता है .. मरता नहीं है और उसे जमीन में बोने पर अंकुर निकल आता है तो फिर मनुष्य को भेजा जा सकता है।

11-इसमें एक और हैरानी की बात ब्राउन ने सिद्ध की है कि जमीन के भीतर पडा हुआ आलू , या कोई भी बीज जमीन के भीतर पडा हुआ बढ़ता है... सूरज ही उसे जगाता, उठाता है। उसके अंकुर को पुकारता और ऊपर उठाता है। ब्राउन एक

दूसरे शास्‍त्र.. प्‍लेनटरी हेरिडिटी, उपग्रही वंशानुक्रमका भी अन्‍वेषक है। अंग्रेजी में शब्‍द है, होरोस्‍कोप। वह यूनानी होरोस्‍कोपस का रूप है।युनानी शब्‍द .. होरोस्‍कोपस का अर्थ होता है, ‘’मैं देखता हूं जन्‍मते हुए ग्रह को''।वास्तव में,

जब एक बच्‍चा पैदा होता है; तब उसी समय पृथ्‍वी के चारों ओर, क्षितिज पर अनेक नक्षत्र जन्‍म लेते हैं, उठते है। जैसे सुबह.. सूरज उगता है और सांझ डूबता है।ऐसे ही चौबीस घण्‍टे अन्‍तरिक्ष में नक्षत्र उगते है और डूबते है।उदाहरण के लिए सुबह छह बजे बच्‍चा पैदा हो रहा है। वहीं वक्‍त सूरज भी पैदा हो रहा है।उसी वक्‍त और कुछ नक्षत्र पैदा हो रहे है । कुछ नक्षत्र ऊपर है, कुछ नक्षत्र उतार पर चले गए है और कुछ नक्षत्र चढ़ाव पर है।

ग्रह-नक्षत्रों की स्‍थिति का किसी बच्‍चे के पैदा होने से, होरोस्‍कोप से.. क्‍या संबंध हो सकता है?

11 FACTS;-

1-जब एक बच्‍चा पैदा हो रहा है ;तब अन्‍तरिक्ष में नक्षत्रों की एक स्‍थिती है। अब तक ऐसा समझा जाता था और अभी भी जो लोग बहुत गहराई से परिचित नहीं है; वे ऐसा ही सोचते है कि चाँद-तारों से व्‍यक्‍ति के जन्‍म का क्‍या लेना देना। चाँद तारे कहीं भी हों इससे एक गांव में बच्‍चा पैदा हो रहा है, इससे क्‍या फर्क पड़ेगा।फिर यह भी कहते है कि , एक तिथि में, एक नक्षत्र की स्‍थिति में लाखों बच्‍चे पैदा होते है ...एक ही बच्‍चा पैदा नहीं होता। उनमें से एक किसी मुल्‍क का, प्रैजिडेंट बन जाता

है ..बाकी तो नहीं बन पाते। एक उनमें से सौ वर्ष का होकर मरता है, तो दूसरा दो दिन का ही मर जाता है । एक उसमें से

बहुत बुद्धिमान होता है और एक निर्बुद्धि ही रह जाता है ।तो साधारणत: देखने पर पता चलता है कि इन ग्रह-नक्षत्रों की स्‍थिति का.. किसी बच्‍चे के पैदा होने से, होरोस्‍कोप से ..क्‍या संबंध हो सकता है। फिर चाँद तारे एक बच्‍चे के जन्‍म की चिन्‍ता नहीं करते और फिर एक बच्‍चा ही पैदा नहीं होता, एक स्‍थिति में लाखों बच्‍चें पैदा होते है। पर लाखों बच्‍चे एक से नहीं होते । तीन सौ वर्षों से यह तर्क दिये जा रहे है कि व्‍यक्‍ति के जन्‍म का कोई संबंध नक्षत्रों से नहीं है।

2-लेकिन सारे लोगों की खोज का एक अद्भुत परिणाम हुआ है कि ये वैज्ञानिक कहते है कि अभी हम यह तो नहीं कह सकते कि व्‍यक्‍तिगत रूप से कोई बच्‍चा प्रभावित होता है ;लेकिन जीवन निश्‍चित रूप से प्रभावित होता है। और अगर जीवन प्रभावित होता है तो हमारी खोज जैसे-जैसे सूक्ष्‍म होगी वैसे-वैसे हम पाएंगे कि व्‍यक्‍ति भी प्रभावित होता है। ऐसा सोचा जाता

है कि ज्‍योतिष विकसित विज्ञान नहीं है ; जबकि ये तथ्‍य नहीं है। उसका प्रांरभ हुआ फिर वह विकसित नहीं हो सका। लेकिन स्‍थिति उल्‍टी है, ज्‍योतिष किसी सभ्‍यता के द्वारा बहुत बड़ा विकसित विज्ञान है ;लेकिन फिर वह सभ्‍यता खो

गयी और हमारे हाथ में ज्‍योतिष के अधूरे सूत्र रह गए।ज्‍योतिष कोई नया विज्ञान नहीं है जिसे विकसित होना है, बल्‍कि कोई विज्ञान है जो पूरी तरह विकसित हुआ था और फिर जिस सभ्‍यता ने उसे विकसित किया वह खो गयी। और सभ्‍यताएं रोज आती हैं और खो जाती है। फिर उनके द्वारा विकसित चीजें भी अपने मौलिक आधार खो देती है। सूत्र भूल जाते हैं, उनकी आधार शिलाएं खो जाती है ।

3-विज्ञान, आज इसे स्‍वीकार कर रहा है कि जीवन प्रभावित होता है और अगर जीवन प्रभावित होता है, तो ही ज्‍योतिष की कोई संभावना निर्मित होती है।एक छोटे बच्‍चे के जन्‍म के समय उसके चित की स्‍थिति ठीक वैसी ही होती है जैसे बहुत

सेंसिटिव फोटो-प्‍लेट की।उदाहरण के लिए दो तरह के जुड़वाँ बच्‍चे होते हे। एक तो जुड़वाँ बच्‍चे होते है ;जो एक ही अण्‍डे से पैदा होते है। और दूसरे जो जुड़वाँ जरूर होते है लेकिन दोनों अलग-अलग अण्‍डे से पैदा होते है। मां के पेट में दो अण्‍डे होते है तो दो बच्‍चे पैदा होते है। कभी-कभी एक अण्‍डा होता है और एक अण्‍डे के भीतर दो बच्‍चे होते है। एक अण्‍डे से जो दो बच्‍चे पैदा होते है;वे बड़े महत्‍वपूर्ण है। क्‍योंकि उनके जन्‍म का क्षण‍ बिलकुल एक होता है । दो अण्‍डों से जो बच्‍चे पैदा होते हैं उन्‍हें हम जुड़वाँ बच्‍चे कहते जरूर है लेकिन उनके जन्‍म का क्षण एक नहीं होता।

4-वास्तव में, जन्‍म दोहरी बात है। जन्‍म का पहला अर्थ तो है ..गर्भधारण। ठीक जन्‍म तो उसी दिन होता है जिस दिन मां के पेट में गर्भ आरोपित होता है। जिसको आप जन्‍म कहते है अथार्त जब बच्‍चा मां के पेट से बाहर आता है..वह नम्‍बर दो का जन्‍म है। अगर हमें ज्‍योतिष की पूरी खोजबीन करनी हो -तो असली सवाल यह नहीं है कि बच्‍चा कब पैदा होता है। असली सवाल यह है कि बच्‍चा कब गर्भ में प्रारम्‍भ करता है ..अपनी यात्रा अथार्त गर्भ कब निर्मित होता है। क्‍योंकि ठीक जन्‍म वहीं है।

इसलिए हिन्‍दुओं ने तो यह भी तय किया था कि ठीक जिस भांति के बच्‍चे को जन्‍म देना हो उसे उस भांति के ग्रह-नक्षत्र में यदि सम्बन्ध बनाया जाए और गर्भ धारण हो जाए तो उस तरह का बच्‍चा पैदा होगा। साधारण: हम सोचते हैं कि जब एक बच्‍चा सुबह छह बजे पैदा होता है तो छह बजे प्रभात में जो नक्षत्रों की स्‍थिति होती है; उससे प्रभावित होता है।

5-लेकिन जो ज्‍योतिष को गहरे से जानते है ;वे कहते है कि वह छह बजे पैदा होने की वजह से ग्रह-नक्षत्र उस पर प्रभाव डालते है ..ऐसा नहीं। वह जिस तरह के प्रभावों के बीच पैदा होना चाहता है ;उस घड़ी और नक्षत्र को ही अपने जन्‍म के लिए चुनता है। यह बिलकुल भिन्‍न बात है।ज्‍योतिष की गहन खोज करने वाले कहेंगे कि बच्‍चा जब पैदा हो रहा है, तब वह अपने ग्रह-नक्षत्र चुनता है कि कब उसे पैदा होना है। और गहरे जाएंगे तो वह अपना गर्भ धारण भी चुनता है।प्रत्‍येक आत्‍मा अपना

गर्भ धारण चुनती है, कि कब, किस क्षण में उसे गर्भ स्‍वीकार करना है। क्षण छोटी घटना नहीं है। क्षण का अर्थ है कि पूरा विश्‍व उस क्षण में कैसा है। और उस क्षण में पूरा विश्‍व किस तरह की सम्‍भावनाओं के द्वार खोलता है। जब एक अण्‍डे में दो बच्‍चे एक साथ गर्भ धारण कर लेते है तो उनके गर्भ धारण का क्षण एक ही होता है और उनके जन्‍म का क्षण भी एक होता है।

6-वास्तव में, एक ही अण्‍डे से पैदा हुए दो बच्‍चों का जीवन इतना एक जैसा होता है कि यह कहना मुशिकल है कि जन्‍म का क्षण प्रभाव नहीं डालता। एक अण्‍डे से पैदा हुए दो बच्‍चों का आई क्‍यू./ बुद्धि माप करीब-करीब बराबर होता है। और जो थोड़ा सा भेद दिखता है, वह हमारी मेजरमेन्‍ट की गलती के कारण है। अभी तक हम ठीक मापदण्‍ड विकसित नहीं कर पाए हैं ;

जिनसे हम बुद्धि का अंक नाप सकें। अगर एक अण्‍डे से पैदा हुए दो बच्‍चों को बिलकुल अलग-अलग पाला जाए तो भी उनके बुद्धि-अंक में कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसी कुछ घटनाएं घटी है जब दोनों बच्‍चे अलग-अलग पले- बड़े हुए लेकिन उनके बुद्धि अंक में कोई फर्क नहीं पडा।

7-बड़ी हैरानी की बात है, बुद्धि-अंक तो ऐसी चीज है कि जनम की पोटेंशियलिटी से जुड़ी है।एक को भारत में पाला जाए और एक को अमेरिका में पाला जाए और कभी एक दूसरे को पता भी न चलने दिया जाए। लेकिन यह जो एक ही अण्‍डे का जुड़वाँ बच्‍चा है, तो अमेरिका में जब उसको जुकाम होगा। तब जो भारत में बच्‍चा है उसको भी जुकाम होगा। आमतौर से एक अण्‍डे से पैदा हुए बच्‍चे एक ही साल में मरते है। ज्‍यादा से ज्‍यादा उनकी मृत्‍यु में फर्क तीन महीने का होता है। और कम से कम तीन दिन का ..पर वर्ष वहीं होता है। अब तक ऐसा नहीं हो सका है कि एक ही अण्‍डे से पैदा हुए बच्‍चों के बीच वर्ष का फर्क पडा हो। तीन महीने से ज्‍यादा का फर्क नहीं पड़ता है। अगर एक बच्‍चा मर गया है तो हम मान सकते है कि तीन दिन के

बाद या तीन महीने के बीच दूसरा बच्‍चा भी मर जाएगा। इनके रुझान, इनके ढंग, इनके भाव समानांतर है। अगर करीब-करीब ऐसा मालूम पड़ता है कि ये दोनों एक ही ढंग से जीते है। एक दूसरे की कॉपी की भांति होते है। इनका इतना एक जैसा होना और बहुत सी बातों से सिद्ध होता है।

8-हम सबकी Skin अलग-अलग हैं, इण्‍डीवीजुअल है। इस पूरी जमीन पर कोई व्यक्ति नहीं खोजा जा सकता, जिसकी Skin दूसरे के काम आ जाए। क्‍या कारण है?Skin में जो तत्‍व निर्मित करते है उसमें कोई भेद नहीं है ,उसके रसायन में कोई भेद नहीं है। अगर हम एक वैज्ञानिक को जांच करने के लिए रख दें तो वह यह न बता पाएगा कि ये दो व्यक्तियों की Skin है।Skin में कोई भेद नहीं है। लेकिन फिर भी हैरानी की बात है कि एक व्यक्ति पर दूसरे की Skin नहीं बिठाई जा सकती।हमारा शरीर उसे इनकार कर देगा। वैज्ञानिक जिसे नहीं पहचान पाते कि कोई भेद है, लेकिन हमारा शरीर पहचानता है... इसे स्‍वीकार नहीं करता।

9-परन्तु केवल,एक ही अण्‍डे से पैदा हुए दो बच्‍चें की Skin ट्रांसप्‍लांट हो सकती है ... शरीर इनकार नहीं करेगा। क्‍या कारण होगा। अगर हम कहें, एक ही माता- पिता के बेटे है तो दो भाई भी एक ही माता- पिता के है;परन्तु उनकी Skin नहीं बदली जा सकती। सिवाय इसके कि ये दोनों बेटे एक क्षण में निर्मित हुए है और कोई इनमें समानता नहीं है ।सिर्फ इनका बर्थ

मूवमेंट..... अथार्त जन्‍म का क्षण महत्‍वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है कि दोनों बीमार पड़ते है तो एक-सी बीमारियों से, दोनों स्‍वस्‍थ होते हे, तो एक सी दवाओं से। क्‍या जन्‍म का क्षण इतना प्रभावी हो सकता है ?ज्‍योतिष कहता रहा है कि इससे भी ज्‍यादा प्रभावी है, ''जन्‍म का क्षण''।लेकिन आज तक ज्‍योतिष के लिए वैज्ञानिक सहमति नहीं थी। पर अब सहमति बढ़ती जा रही है। इस सहमति में कई नये प्रयोग सहयोगी बने है। एक तो जैसे ही हमने आर्टीफीशियल सेटेलाइट / कृत्रिम उपग्रह अन्‍तरिक्ष में छोड़े ;वैसे ही हमें पता चला कि सारे जगत से सारे ग्रह-नक्षत्रों से, सारे ताराओं से निरंतर अनंत प्रकार की किरणों का जाल प्रवाहित होता है। जो पृथ्‍वी पर टकराता है और पृथ्‍वी पर कोई भी ऐसी चीज नहीं है जो उससे अप्रभावित छूट जाए।

10-हम जानते है कि चाँद से समुद्र प्रभावित होता है। लेकिन हमे ख्‍याल नहीं है कि समुद्र में पानी और नमक का जो अनुपात है वही व्यक्ति के शरीर में पानी और नमक का अनुपात है ...द सेम प्रोपोर्शन । और व्यक्ति के शरीर में पैंसठ प्रतिशत पानी है और नमक और पानी का वहीं अनुपात अरब की खाड़ी में है। अगर समुद्र का पानी चाँद से प्रभावित होता है तो व्यक्ति के

शरीर के भीतर का पानी क्‍यों प्रभावित नहीं होगा। सत्य यह है कि पूर्णिमा के निकट आते-आते सारी दुनिया में पागलपन की संख्‍या बढ़ती है। अमावस के दिन दुनिया में सबसे कम लोग पागल होते है। पूर्णिमा के दिन पागलख़ानों में सर्वाधिक लोग प्रवेश करते है ओर अमावस के दिन पागलख़ानों से सर्वाधिक लोग बाहर आते है। अब तो इसके स्‍टेटिक्‍स अपलब्‍ध है।अंग्रेजी में शब्‍द है, लुनाटिक,,जिसका मतलब होता है,चांद मारा। लुनार...हिन्‍दी में भी पागल के लिए चांद मारा ... बहुत पुराना शब्‍द है । और लुनाटिक भी कोई तीन हजार साल पुराना शब्‍द है।

11-इससे पता चलता है वे लोग जानते थे कि चाँद पागल के साथ कुछ न कुछ करता है। आखिर मस्तिष्क की बनावट, आदमी के शरीर के भीतर की संरचना तो एक जैसी है। हां यह हो सकता है कि पागल पर थोड़ा ज्‍यादा करता होगा और गैर-पागल पर थोड़ा कम करता होगा।यह मात्रा का भेद होगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि गैर पागल पर बिलकुल नहीं करता होगा।

प्रोफेसर ब्राउन ने एक अध्‍ययन किया है।जबकि वह खुद ज्‍योतिष में विश्‍वास नहीं करते थे और अपने लेखों में उन्‍होंने ज्‍योतिष की बहुत मजाक उड़ायी थी। लेकिन बाद में उन्‍होंने खोजबीन के लिए मिलिट्री के बड़े-बड़े जनरलस की ...डाक्‍टर्स की, अलग-अलग प्रोफेशंस की, व्‍यवसायों की जन्‍म कुण्‍डलियां इकट्ठी कीं और वह बड़ी मुश्‍किल में पड़ गए ।

क्या प्रत्‍येक नक्षत्र की गति विशेष ध्‍वनि पैदा करती है?

14 FACTS;-

1-प्रत्‍येक नक्षत्र या प्रत्‍येक ग्रह या उपग्रह जब अंतरिक्ष में,यात्रा कहता है, तो उसकी यात्रा के कारण एक विशेष ध्‍वनि पैदा होती है। प्रत्‍येक नक्षत्र की गति विशेष ध्‍वनि पैदा करती है। और प्रत्‍येक नक्षत्र की अपनी व्‍यक्‍तिगत निजी ध्‍वनि है। और इन

सारे नक्षत्रों की ध्‍वनियों का एक ताल-मेल है, जिसे वह विश्‍व की संगीतवद्धता, हार्मनी कहते है।जब कोई मनुष्‍य जन्‍म लेता है तब उस जन्‍म के क्षण में इन नक्षत्रों के बीच जो संगीत की व्‍यवस्‍था होती है। वह उस मनुष्‍य के प्राथमिक, सरल तम, संवेदनशील चित पर अंकित हो जाती है। वही उसे जीवन भर स्‍वस्‍थ और अस्‍वस्‍थ करती है। जब भी वह अपनी उस मौलिक जन्‍म के साथ पायी गई, संगीत व्‍यवस्‍था के साथ ताल मेल बना लेता है तो स्‍वस्‍थ हो जाता है। और जब उसका ताल मेल उस मूल संगीत से छूट जाता है तो वह अस्‍वस्‍थ हो जाता है।

2- प्रत्येक प्रोफेशन के व्यक्ति एक विशेष ग्रह ,एक विशेष नक्षत्र स्‍थिति में पैदा होते है।उदाहरण के लिए

जितने भी बड़े प्रसिद्ध जनरलस है, मिलिट्री के सेनापति, योद्धा है ..उनके जीवन में मंगल का भारी प्रभाव है। वही प्रभाव प्रोफेसर की जिन्‍दगी में बिलकुल नहीं है। ब्राउन ने कोई पचास हजार व्‍यक्‍तियों की कुण्‍डलियां का अध्‍ययन किया, जो भी सेनापति है उनके जीवन में मंगल के जन्‍म के समय मंगल का प्रभाव भारी है । आमतौर से जब वे पैदा होते है तब मंगल जन्‍म

ले रहा होता है। उनके जन्‍म की घड़ी मंगल के जन्‍म की घड़ी होती है।ठीक उससे विपरीत जितने शान्‍तिवादी है, वह कभी मंगल के जन्‍म के साथ पैदा नहीं होते। एकाध मामले में यह संयोग हो सकता है। लेकिन लाखों मामले में संयोग नहीं हो सकता। गणितज्ञ एक खास नक्षत्र में पैदा होते है। कवि उस नक्षत्र में कभी पैदा नहीं होते। यह कभी एकाध मामले में संयोग हो सकता है। लेकिन बड़े पैमाने पर संयोग नहीं हो सकता।

3-असल में कवि के ढंग और गणितज्ञ के ढंग में इतना भेद है कि उनके जन्‍म के क्षण में भेद होना ही चाहिए। ब्राउन ने कोई दस अलग-अलग व्‍यवसाय के लोगों का जिनके बीच तीव्र फासले है जैसे कवि है, और गणितज्ञ है, या युद्ध खोर सेनापति है ओ एक शान्‍तिवादी है। एक व्यक्ति जो कहता हैविश्‍व में शान्‍ति होना चाहिए और एक व्यक्तिजो कहता है जिस दिन युद्ध न

होंगे उस दिन दुनिया में कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।इनके बीच बौद्धिक विवाद ही नक्षत्रों का भी विवाद है। इनके बीच केवल बौद्धिक फासले है या इनकी जन्‍म की घड़ी भी हाथ बँटाती है।वास्तव में, जितना अध्‍ययन बढ़ता जाता है;उतना ही पता चलता है कि प्रत्‍येक व्यक्ति जन्‍म के साथ विशेष क्षमताओं की सूचना देता है। ज्‍योतिष के साधारण जानकार कहते है कि वह इसलिए ऐसा करता है क्‍योंकि वह विशेष नक्षत्रों में पैदा हुआ है।

4- हर बच्‍चा हर आने वाला नया जीवन इनसिस्‍ट करता है,अपनी घड़ी में ही पैदा होना चाहता है , अपनी घड़ी के लिए जोर देता है।अपनी घड़ी में गर्भाधान लेना चाहता है। दोनो अन्योन्यश्रित /इन्टर डिपेंडेंट है ।विशेष नक्षत्रों की व्‍यवस्‍था में पैदा होने को उसने चुना। वह जैसा होना चाह सकता था ;जो उसके होने की आंतरिक संभावना थी; जो उसके पिछले जन्‍मों का पूरा

का पूरा रूप था ;जो उसकी संयोजित अर्जित चेतना थी ...वह इस नक्षत्र में पैदा होगी।जैसे नक्षत्रों से समुद्र का पानी प्रभावित होता है, सारा जीवन पानी से निर्मित है ;वैसे ही पानी के बिना कोई जीवन की संभावना नहीं है। इसलिए भारत, चीन या यूनान में पुराने दार्शनिक कहते थे कि पानी से ही जीवन जन्‍मा है या पानी ही जीवन है।आज विकास को मानने वाले वैज्ञानिक

भी कहते है कि जीवन का जन्‍म पानी से है।शायद पहला जन्‍म काई, वह जो पानी पर जम जाती है ...वह जीवन का पहला रूप है, फिर मनुष्‍य तक विकास। जो लोग पानी के ऊपर गहन शोध करते है, वे कहते है पानी सर्वाधिक रहस्‍यमय तत्‍व है।

5-जगत से, अन्‍तरिक्ष से तारों का जो भी प्रभाव आदमी तक पहुंचता है उसमें मीडियम/माध्‍यम पानी है।मनुष्‍य के शरीर जल को ही प्रभावित करके कोई भी रेडिएशन ,कोई भी विकीर्णन मनुष्‍य में प्रवेश करता है। जल पर बहुत काम हो रहा है और

जल के बहुत से मिस्‍टीरियस/रहस्‍यमय गुण खयाल में आ रहे है ।जल का सर्वाधिक रहस्‍यमय गुण यह है कि सर्वाधिक संवेदनशीलता जल के पास है ...सबसे ज्‍यादा सेंसिटिव। और हमारे जीवन में चारों और से जो भी प्रभाव गतिमान होते है वह

जल को ही कम्‍पित करके गति करते है।हमारा जल ही सबसे पहले प्रभावित होता है। और एक बार हमार जल प्रभावित हुआ तो फिर हमारा प्रभावित होने से बचना बहुत कठिन हो जाएगा। मां के पेट में बच्‍चा जब तैरता है ;तब भी वह ठीक ऐसे ही तैरता है जैसे सागर के जल में। और मां के पेट में भी जिस जल में बच्‍चा तैरता है उसमें भी नमक का वहीं अनुपात होता है जो सागर के जल में है। और मां के पेट से जो-जो प्रभाव बच्‍चे तक पहुंचते है उनमें कोई सीधा संबंध नहीं होता।

6-यह आश्चर्यजनक है कि मां और उसके पेट में बनने वाले गर्भ का कोई सीधा संबंध नहीं होता, दोनों के बीच में जल है।और मां से जो भी प्रभाव बच्‍चे तक पहुंचते है;वह जल के माध्‍यम से ही पहुंचते है। फिर जीवन भर भी हमारे शरीर में जल का

वहीं काम है जो काम सागर में है।सागर की बहुत सी मछलियों का अध्‍ययन किया गया है। ऐसी मछलियाँ है, जो जब सागर का पूर उतार पर होता है, तभी सागर के तट पर आकर अण्‍डे रख जाती है। सागर उतर रहा है... वापस मछलियाँ रेत पर आएँगी, सागर की लहरों पर सवार होकर। वे अण्‍डे देंगी,और सागर की लहरों पर वापस लौट जाएंगी। पंद्रह दिन में फिर सागर की लहरें फिर उस जगह आएँगी तब तक अण्‍डे फूटकर चूज़े आ गए होंगे। आने वाली लहरें वापस उन चूजों को सागर में ले जाएंगी।

7-जिन वैज्ञानिकों ने इन मछलियों का अध्‍ययन किया है वे बड़े हैरान हुए है। क्‍योंकि मछलियाँ सदा ही उस समय अण्‍डे देने आती है जब सागर का तूफान उतरता होता है। अगर वह चढ़ते तूफान में अण्‍डे दे दें तो अण्‍डे तो तूफान में बह जाएंगे। वह अण्‍डे तभी देती है जब तूफान उतरता होता है, एक-एक कदम सागर की लहरें पीछे हटती जाती है। वह जहां अण्‍डे देती है

वह लहरें फिर दुबारा नहीं आती , नहीं तो लहरें अण्‍डे वहाँ लें जाएंगी।वैज्ञानिक बहुत परेशान रहे है कि इन मछलियों को कैसे पता चलता है कि सागर अब उतरेगा। सागर के उतरने की घड़ी आ गयी है। क्‍योंकि समय की जरा-सी भूल चूक और अण्‍डे तो सब बह जाएंगे, और उन्‍होंने लाखों साल में कभी भूल चूक नहीं की, नहीं तो वे खत्‍म हो गयी होतीं।पर इन मछलियों के पास कुछ तो उपाय है जिनसे ये जान पाती है।

8- इनके पास कौन-सी इन्‍द्रिय है जो इनको बताती है कि अब सागर उतरेगा। लाखों मछलियाँ एक क्षण में किनारे पर इकट्ठी हो जाएगी। इनके पास जरूर कोई संकेत लिपि या कोई सूचना का यंत्र होना ही चाहिए। एक खास घड़ी में करोड़ो

मछलियाँ दूर-दूर हजारों मील सागर तल पर इकट्ठी होकर अण्‍डे रख जाएंगी।वास्तव में, चाँद से ही इनको संवेदनाएं मिलती

है।इन मछलियों को उन संवेदनाओं से हीं पता चलता है।वैज्ञानिकों ने इन मछलियों को ऐसी जगह रखा जहां सागर की लहर ही नहीं है।झील पर रखा, अंधेरे कमरों पर पानी में रखा। लेकिन बड़ी हैरानी की बात है कि अंधेरे में बंद मछलियाँ जिनको चाँद का कोई पता नहीं, आकाश का कोई पता नहीं, पर जब चांद ठीक जगह पर आया, तब समुद्र की मछलियाँ जाकर तट पर अण्‍डे देने लगीं-तब उन मछलियों ने पानी में ही अण्‍डे दे दिए। उनका पानी में ही अण्‍डे छोड़ देना... क्‍योंकि कोई तट नहीं,कोई किनारा नहीं, तब तो लहरों का कोई सवाल ही नहीं रहा।

9-अगर कोई कहता होगा कि दूसरी मछलियों को देख कर यह दौड़ पैदा हो जाती होगी तो वह भी सवाल न रहा। अकेली मछलियों को रखकर भी देखा। ठीक जब करोड़ो मछलियाँ सागर के तट पर आएँगी...। इनके दिमाग को सब तरह से गड़बड़ करने की कोशिश की—चौबीस घण्‍टे अंधेरे में रखा ताकि उन्‍हें पता न चलें की कब सुबह होती है। झूठे चाँद की रोशनी पैदा कर के देखी, रोज रोशनी को कम करते जाओ, बढ़ाते जाओ, लेकिन मछलियों को धोखा नहीं दिया जा सका। ठीक चाँद जब अपनी जगह पर आया तब मछलियों ने अण्‍डे दे दिए। जहां भी थीं, वहीं उन्‍होंने अण्‍डे दे दिए।हजारों लाखों पक्षी हर साल यात्रा

करते है ...लाखों हजारों मील की। सर्दियों आने वाली है, बर्फ पड़ेगी तो बर्फ के इलाके से पक्षी उड़ना शुरू हो जाएंगे। हजारों मील दूर किसी जगह वे पड़ाव डालेंगे। वहां तक पहुंचने में भी उन्‍हें दो महीने लगेंगे, महीना भर लगेगा। अभी बर्फ गिरनी शुरू नहीं हुई, महीने भर बाद गिरेगी। पक्षी कैसे हिसाब लगाते है कि महीने भर बाद बर्फ गिरेगी। क्‍योंकि अभी हमारी मौसम को बताने वाली जो वेधशालाएं है वह भी पक्की खबर नहीं दे पाती है ।

10- मनुष्य ने अभी तक जो-जो व्‍यवस्‍था की है वह बचकानी मालूम पड़ती है। यह पक्षी एक डेढ़ महीने, दो महीने पहले पता करते है कि अब बर्फ कब गिरेगी, और हजारों प्रयोग करके देख लिया गया है कि जिस दिन पक्षी उड़ते है, हर पक्षी की जाति क