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क्या तीर्थ ध्यानियो के लिए एक कांटेक्ट फील्ड है?क्या सभी धर्म तीन एलिमेंट पर आधारित है?


क्या तीर्थ ध्यानियो के लिए एक कांटेक्ट फील्ड है?-

14 FACTS;-

1-तीर्थों को बनाने का एक प्रयोजन यह था कि हम इस तरह से चार्जड, ऊर्जा से भरे हुए स्‍थल पैदा कर लें जहां से कोई भी व्‍यक्‍ति सुगमता से यात्रा कर सके।ये करीब-करीब वैसे ही है जैसे—एक तो होता है कि हम नाव में पतवार लगाकर और नाव को खैवें। दूसरा यह होता है कि हम पतवार को चलाएँ ही न, नाव के पाल खोल दे और उचित समय पर, और उचित हवा की दिशा में नाव को बहने दें। तीर्थ वैसी जगह थी, जहां से चेतना की एक धारा अपने आप प्रवाहित हो रही हो। जिसको प्रवाहित करने के लिए सदियों से मेहनत की गई हो। आप सिर्फ उस धारा में खड़े हो जाएं और आपकी चेतना का पाल तन जाए और आप एक यात्रा पर निकल जाएं। जितनी मेहनत आपको अकेले में करनी पड़े उससे बहुत अल्‍प मेहनत में यात्रा संभव हो सकती है।

2-विपरीत स्‍थल पर खड़े होकर यात्रा अत्‍यंत कठिन भी हो सकती है। हवाएँ जब उल्‍टी तरफ बह रही हो और आप पाल खोल दें, तो बजाय इसके कि आप पहुंचे ओर भटक जाएं, इसकी

पूरी संभावना है।अब जैसे अगर आप किसी ऐसी जगह में ध्‍यान कर रहे है जहां चारों और नकारात्‍मक भावावेश / निगेटिव इमोंशंस प्रवाहित होते है तो आपको कल्‍पना भी नहीं हो सकती कि ध्‍यान करने के क्षण में आप इतने रिसेप्‍टिव हो जाते है कि आस-पास जो भी हो रहा है वह तत्‍काल आप में प्रवेश कर जाता है। ध्‍यान एक रिसेप्‍टिविटि है, एक ग्राहकता है। ध्‍यान में आप वलन्‍रेबल हो जाते है, खुल जाते है और कोई भी चीज आप में प्रवेश कर सकती हे।

3-इसलिए ध्‍यान के समग में चेतना की,विचार की आस-पास कैसी तरंगें है,ये देखना बहुत उपयोगी है। अगर ऐसी तरंगें आपके चारों और है जो कि आपको गलत तरफ झुका सकती है। तो ध्‍यान महंगा भी पड़ सकता है। और यह फिर ध्‍यान एक जद्दोजहद और एक संघर्ष बन जाएगा। जब कभी ध्‍यान में आपको अचानक ऐसे ख्‍याल आने लगते है जो कि आपको कभी भी नहीं आये थे, या एक क्षण भी शांत होना मुश्किल होने लगता है तो आपको कभी ख्‍याल न आया होगा कि ध्‍यान के क्षण में आस-पास जो भी प्रवाहित होता है वह आप में सुगमता से प्रवेश पा जाता है।

4-कारागृह में भी बैठकर भी ध्‍यान किया जा सकता है। पर बड़ा सबल व्‍यक्‍तित्‍व चाहिए। और कारागृह में बैठकर ध्‍यान करना हो तो ऐसी प्रक्रियाएं चाहिए जो पहले आपके चारों तरफ अवरोध की एक सीमा रेखा निर्मित कर दें, जिसके भीतर कुछ प्रवेश न कर सके। पर तीर्थ में वैसे अवरोध की कोई जरूरत नहीं है। तीर्थ में ऐसी ध्‍यान की प्रक्रिया चाहिए जो आपके आस-पास का सब अवरोध सब रेसिस्‍टेंस सब द्वार-दरवाजे खुले छोड़ दे।जैसे हवाएँ वहां बह रहीं है।

5-सैकड़ों लोगों ने उस जगह से अनंत में प्रवाहित होकर एक मार्ग निर्मित किया है। जैसे कि हम सड़को पर या एक जंगल में रास्‍ता बनाते है। दरख़्त गिरा देते है और एक पक्‍का रास्‍ता बना लेते है।ताकि दूसरे पीछे चलनेवाला यात्री को बड़ी सुगमता हो जाए। ठीक आत्‍मिक अर्थों में भी इस तरह के रास्‍ते निर्मित करने की कोशिश की गयी है।जो शक्‍तिशाली थे, उन्होंने सदा कमजोर आदमियों को जिस तरह भी सहायता पहुँचाई जा सके उस तरह की सहायता,पहुंचाने की कोशिश की। तीर्थ उनमें एक बहुत बड़ा प्रयोग है।

6-तीर्थ का प्रयोजन यह है कि आपको जहां हवाएँ शरीर से आत्‍मा की तरफ बह ही रही है, जहां वायुमंडल पूरा तरंगायित है ,जहां से लोग ऊर्ध्‍वगामी हुए, जहां बैठकर लोग समाधिस्‍थ हुए, जहां बैठकर लोगों ने परमात्‍मा का दर्शन पाया ,जहां यह अनूठी घटना घटती रही है। सैकड़ों वर्षों तक वह जगह एक विशेष आविष्ट जगह हो जाती है। उस आविष्ट जगह में आप अपने को पल भर खुला छोड़ दें, कुछ और न करें तो भी आपकी यात्रा शुरू होगी। तो यह तीर्थ का पहला प्रयोग था।

7-इसलिए सभी धर्मों ने तीर्थ निर्मित किए। उन धर्मों ने भी तीर्थ निर्मित किए जो मंदिर के पक्ष में नहीं थे। यह बड़े मजे की बात है कि जो धर्म मंदिर के पक्ष में न थे ,जो धर्म मूर्ति के विरोधी थे ;उनको भी तीर्थ निर्मित करना ही पडा। मूर्ति का विरोध आसान हुआ, मूर्ति हटा दी ;यह भी कठिन न हुआ, लेकिन तीर्थ को हटाया नहीं जा सका। क्‍योंकि तीर्थ का और भी व्‍यापक उपयोग था जिसको कोई धर्म इनकार न कर सका।जैसे कि जैन भी मूलत: मूर्तिपूजक नहीं है।

मुसलमान मूर्तिपूजक नहीं है।सिक्‍ख मूर्तिपूजक नहीं है—प्रांरभ में बुद्ध मूर्तिपूजक नहीं थे ..लेकिन इन सबने भी तीर्थ निर्मित किए या करने ही पड़े। सच तो यह है कि बिना तीर्थ के धर्म का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है।फिर एक-एक व्‍यक्‍ति जो करना चाहे या जो कर सकता है करे। लेकिन फिर समूह में खड़े होने का कोई प्रयोजन, कोई अर्थवत्‍ता नहीं है।..

8- तीर्थ में कुछ बाते घटित होती है। जैसे कि आप कहीं भी जाकर एकांत में बैठकर साधना करें तो बहुत कम संभावना है कि आपको अपने आस पास किन्‍हीं आत्‍माओं की उपस्थिति का अनुभव हो। कहीं भी करें वह अनुभव नहीं होगा, लेकिन तीर्थ में आपको प्रेजेंस मालूम पड़ेगी । और कभी इतनी गहन हो जाती है कि आप स्‍वयं मालूम पड़ेंगे कि कम है, और दूसरे की प्रेजेंस ज्‍यादा है।चाँद के संबंध में खोज हुई है, कि चाँद निर्जन है।जैनों के ग्रंथों में बहुत वर्णन है कि चाँद पर किस-किस तरह के देवता है, कि क्‍या है ।किताब तो आवास का कहती है और अब वैज्ञानिक की रिपोर्ट है कि वहां कोई भी नहीं है। तो साधारण बुद्धि जो कर सकती,वह यह है, कि वे लोग चाँद पर नहीं पहुँचे। क्‍योंकि अगर नहीं सिद्ध कर पाए तो ये मानना पड़ेगा कि हमारा शास्‍त्र गलत हुआ। तो वे जिद बाँध रखेंगे कि नहीं, तुम उस जगह नहीं पहुंचे।

9-पर अब उनके साधु-संन्‍यासी बड़ी मुश्‍किल में है। वह इसके सिवाय और क्‍या कहेंगे कि तुम असली चाँद पर पहुंचे ही नहीं। आदमी असली चांद पर पहुंच गया है।लेकिन जिन्‍होंने कैलाश का अनुभव किया है वह कभी नहीं मानेंगे कि चाँद निर्जन है।कोई अंदाजन बीस

हजार वर्ष से जैनों की धारा है कि चाँद पर आवास है। पर वह उनके ख्‍याल में नहीं है कि वह आवास किस तरह का है। वह आवास कैलास जैसा आवास है।वह आवास तीर्थों जैसा आवास

है।जब आप तीर्थ पर जाएंगे तो एक तीर्थ वह काशी है जो दिखाई पड़ती है। जहां आप ट्रेन पर से उतर जाएँगे। काशी के दो रूप है। तीर्थ के दो रूप है। एक तो मृण्‍मय रूप है। यह जो दिखाई पड़ रहा है। जहां कोई भी जाएगा सैलानी और घूमकर लौट आएगा। और एक उसका चिन्‍मय रूप है। जहां वहीं पहुंच जाएगा जो अंतरस्‍थ होगा, जो ध्‍यान में प्रवेश करेगा, तो उसके लिए काशी बिलकुल और हो जाएगी।

10-इधर काशी के सौंदर्य का इतना वर्णन है, और इस काशी को देखो तो फिर लगता है कि वह कवि की कल्‍पना है।काशी जैसा कोई नगर नहीं आया है इस जगत में ।वह काशी भी है और एक कान्‍टेक्‍ट फील्ड है ..यह काशी, जहां उस काशी और इस काशी का मिलन होता है।

जो यात्री सिर्फ ट्रेन में बैठकर गया है, वह इस काशी से वापस लौटकर आ जाएगा। वह जो ध्‍यान में भी बैठकर गया है वह उस काशी से भी संपर्क साध पाता है। तब इसी काशी के निर्जन घाट पर उनसे भी मिलना हो जाता है जिनसे मिलने की आपको कभी कल्‍पना नहीं होती।

11-करीब-करीब नियमित रूप से कैलास पर अलौकिक निवास है। कम से कम पाँच सौ बौद्ध- वहां रहे है। पाँच सौ बुद्धत्‍व को प्राप्‍त व्‍यक्‍ति कैलाश पर रहेंगे ही। और जब भी उनमें से एक विदा होगा किसी और यात्रा पर, तो दूसरा जब तक न हो तब तक वह विदा नहीं हो सकता। पाँच सौ की संख्‍या वहां पूरी रहेगी। उन पाँच सौ की मौजूदगी कैलाश को तीर्थ बनाती है। लेकिन यह बुद्धि से समझने की बात नहीं हे। इसलिए काशी का भी नियमित आंकड़ा है कि उतने संत वहां रहेंगे ही। उनमें कभी कमी नहीं होगी। उनमें से एक को विदा तभी मिलेगी जब दूसरा उस जगह स्‍थापित हो जाएगा।

12-असली तीर्थ वहीं है। और उनसे जब मिलन होता है तो तीर्थ में प्रवेश करते है। पर उनके मिलन का कोई भौतिक स्‍थल भी चाहिए। आप उनको कहां खोजते फिरेंगे। उस अशरीरी घटना को आप न खोज सकेंगे, इसलिए भौतिक स्‍थल चाहिए। जहां बैठकर आप ध्‍यान कर सकें और उस अंतर् जगत में प्रवेश कर सकें, जहां संबंध सुनिश्‍चित है।इसलिए तीर्थ बुद्धि से

ख्‍याल में नहीं आएगा। बुद्धि से कोई संबंध नहीं है तीर्थ का।तीर्थ का अर्थ जो दिखाई पड़ जाता है वह नहीं है ..वह उसी स्‍थान पर छिपा है।

13-दूसरी बात, इस जमीन पर जब भी कोई व्‍यक्‍ति परम ज्ञान को उपलब्‍ध होकर विदा होता है। तो उसकी करूणा उसे कुछ चिन्‍ह छोड़ देने को कहती है। क्‍योंकि जिनको उसने रास्‍ता बताया। जो उसकी बात मानकर चले, जिन्‍होंने संघर्ष किया, जिन्‍होंने श्रम उठाया, उनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो अभी नहीं पहुंच पाए। उनके पास कुछ संकेत तो चाहिए,जिनसे कभी भी

जरूरत पड़ने पर वह संपर्क पुन; साध सकें।इस जगत में कोई आत्‍मा कभी खोती नहीं। पर शरीर तो खो जाता है। तो उन आत्‍माओं के संपर्क साधने के लिए सूत्र चाहिए। उन सूत्रों के लिए तीर्थों ने ठीक वैसे ही काम किया जैसे कि आज हमारे रडार काम करते है। जहां तक आंखें नहीं पहुँचती वहां तक रडार पहुंच जाते है। जो तारे,आंखों से कभी देखें नहीं गए ;वह राडार देख लेते है। तीर्थ बिलकुल आध्‍यात्‍मिक रडार का इंतजाम है। जो हमसे छूट गए, जिनसे हम छूट गए, उनसे संबंध स्‍थापित किए जा सकते है।

14-इसलिए प्रत्‍येक तीर्थ उन लोगों के द्वारा निर्मित किया गया ;जो अपने पीछे कुछ लोग छोड़ है, जो अभी रास्‍ते पर है, जो पहुंच नहीं गए, और जो अभी भटक सकते है। और जिन्‍हें बार-बार जरूरत पड़ जाएगी कि वह कुछ पूछ लें कुछ जान लें। कुछ आवश्‍यक हो जाए। थोड़ी जानकारी उन्‍हें भटका दे सकती है। क्‍योंकि उन्‍हें भविष्‍य बिलकुल ज्ञात नहीं है। आगे का रास्‍ता उन्‍हें बिलकुल पता नहीं है। तो उन सबने सूत्र छोड़े है। और सूत्रों को छोड़ने के लिए विशेष तरह की व्‍यवस्‍थाएं की है..तीर्थ खड़े किए, मंदिर खड़े किए, मंत्र निर्मित किए। मूर्तियां बनायी सबका आयोजन किया। और सबका आयोजन एक सुनिश्‍चित प्रक्रिया है, जिसे हम ‘रिचुअल’ कहते हे, वह एक सुनिश्‍चित प्रकिया है।

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2-क्या तीर्थ अल्कमिस्ट की प्रक्रियाएं है? क्या गंगा अल्कमिस्ट प्रयोग है,-

08 POINTS;-

1-मनुष्‍य के जीवन में जो भी है वह सिर्फ पदार्थ से निर्मित है ..सिर्फ उसकी आंतरिक चेतना को छोड़कर। लेकिन आंतरिक चेतना का पता तो सिर्फ आपके शरीर का है, और शरीर के सारे संबंध पदार्थ से है। थोड़ी-सी अल्‍केमी समझ लें तो तीर्थ का अर्थ ख्‍याल में आ जाएगा।

अल्क मिस्ट की प्रक्रियाएं है, वह सब गहरी धर्म की प्रक्रियाएं हे। अब अल्क मिस्ट कहते है कि अगर पानी को एक बार बनाया जाए और फिर उसको भाप बनाया जाए , फिर पानी बनाया जाए—ऐसा एक हजार बार किया जाए तो उस पानी में विशेष गुण आ जाते है। जो साधारण पानी में नहीं है।

2-इस बात को पहले मजाक समझा जाता था। क्‍योंकि इससे क्‍या फर्क पड़ेगा, आप एक दफा पानी को डिस्टिल कर लें फिर दोबारा उस पानी को भाप बनाकर डिस्‍टिल्‍ड़ कर लें। फिर तीसरी बार, फिर चौथी बार, क्‍या फर्क पड़ेगा। लेकिन पानी डिस्‍टिल्‍ड़ ही रहेगा। लेकिन अब विज्ञान ने स्‍वीकार किया है कि इसमें क्वालिटी बदलती है।एक हजार बार प्रयोग करने पर उस पानी में विशिष्‍टता आ जाती है। अब वह कहां से आती है अब तक साफ नहीं है। लेकिन वह पानी विशेष हो जाता है। लाख बार भी उसको करने के प्रयोग है और तब वह और विशेष हो जाता है।अब आदमी के शरीर में पचहत्‍तर प्रतिशत पानी हे। थोड़ा बहुत नहीं ..पचहत्तर प्रतिशत,और जो पानी है उस पानी को कैमिकल ढंग वहीं है जो समुद्र के पानी का है। इस लिए नमक के बिना आप मुश्‍किल में पड़ जाते हे।

3-आपके शरीर के भीतर जो पानी है उसमें नमक की मात्रा उतनी ही होनी चाहिए जितनी समुद्र के पानी में है। अगर इस पानी की व्‍यवस्‍था को भीतर बदला जा सके तो आपकी चेतना की व्‍यवस्‍था को बदलने में सुविधा होती है। तो लाख बार डिस्टिल्ड़ किया हुआ पानी अगर पिलाया जा सके तो आपके भीतर बहुत सी वृतियों में एकदम परिर्वतन होगा। अब यह अल्क मिस्ट हजारों प्रयोग ऐसे कर रहे थे। अब एक लाख दफा पानी को डिस्टिल्ड़ करने में सालों लग जाते है।और एक आदमी चौबीस घंटे यही काम कर रहा था।इसके दोहरे परिणाम

होते है। एक तो उस आदमी का चंचल मन ठहर जाता था। क्‍योंकि यह ऐसा काम था। जिसमें चंचल होने का उपाय नहीं था।हमें सोचने में कठिनाई होगी, पहले थोड़े दिन में हम ऊब जाएंगे, ऊबेंगे तो हम बंद कर देंगे।

4-यह मजे की बात है कि जब जहां भी ऊब आ जाए वहीं टर्निंग प्वाइंट होता है। अगर आपने बंद कर दिया तो आप अपनी पुरानी स्‍थिति में लौट जाते है। और अगर जारी रखा तो आप

नयी चेतना को जनम दे लेते है ।जैसे रात को आपको नींद आती है।आप रोज दस बजे सोते है, दस बजे नींद आने लगेगी। अगर आप दस बजे सोने से मना कर दें, तो आप आधा घंटे में..अचानक पाएंगे कि सुबह से भी ज्‍यादा क्रैश हो गए है।होना तो यह चाहिए था कि नींद और जोर से आए। लेकिन आधा घंटे में यह होगा कि नींद आना मुश्‍किल हो जाएगी। अगर सो गए होते तो यह जो प्वाइंट था ;वहां से आप अपनी स्‍थिति में वापस गिर सकते थे, ....तब आप कंटीन्‍यु रहे होते लेकिन आपने भीतर की व्‍यवस्‍था तोड़ दी।शरीर ने देख लिया कि

आप सोने की तैयारी नहीं कर रहे ..जागना ही पड़ेगा। तो शरीर के पास जरूरत के वक्‍त के लिए जो शक्‍ति संरक्षित है/रिजर्व है ..नई शक्‍ति वापस आ गयी और आप ताजे हो गए। इतने ताजे जितने आप सुबह के वक़्त भी नहीं थे।

5-पानी परिवर्तित होता है तो चेतना भी भीतर परिवर्तित होती है।तो लाख बार डिस्टिल्ड़ किया हुआ पानी अगर पिलाया जा सके तो आपके भीतर बहुत सी वृतियों में एकदम परिर्वतन होगा।और फिर इस विशिष्‍ट पानी के प्रयोग से चेतना में परिणाम होते है। उदाहरण के लिए वैज्ञानिक तरीके से जानने के बाद भी अभी तक साफ़ नहीं हो सका की गंगा के पानी में इतनी विशेषतायें क्‍यों है। माना की दुनिया की नदियों के पानी में इतनी विशेषतायें न हो, लेकिन गंगा के बिलकुल बगल से जो नदिया निकलती है उसके पानी में भी विशेषतायें नहीं है।ठीक उसी पहाड़ से जो नदी निकलती है उसके पानी में नहीं। एक ही बादल दोनों नदियों में पानी गिराता हे।और एक ही पहाड़ की बर्फ पिघलकर दोनों नदियों में जाती है। फिर भी उस पानी में वह क्वालिटी नहीं है जो गंगा के पानी में है।

6-अब इस बात को सिद्ध करना मुशिकल होगा। कुछ बातें है जिनको सिद्ध करना एकदम मुश्‍किल है। लेकिन पूरी की पूरी गंगा अल्क मिस्ट का प्रयोग है। गंगा साधारण नदी नहीं है। पूरी की पूरी गंगा को अल्‍केमिकली शुद्ध करने की चेष्‍टा की गयी है। और इसलिए हिंदुओं ने

सारे तीर्थ गंगा के किनारे निर्मित किए है।गंगा को एक विशिष्‍टता देने का ..यह एक महान प्रयोग था ..जो कि दुनिया की किसी नदी में नहीं है। किसी नदी का पानी रख लें,सड़ जायेगा। गंगा का पानी वर्षों नहीं सड़ेगा। इसलिए गंगा जल आप मजे से रख सकते है। उसके पास आप किसी दुसरी बोतल में पानी भरकर रख दें,वह पंद्रह दिन में सड़ जायेगा। पर गंगा जल अपनी पवित्रता और शुद्धता को पूरा कायम रखेगा। किसी जल में भी आप लाशें डाल दें, वह नदी गंदी हो जायेगी। गंगा कितनी ही लाशों को हजम कर जाएगी और कभी गंदी भी नहीं होगी।

7-एक और हैरानी की बात है, कि हड्डी साधारणत: नहीं गलती , पर गंगा में गल जाती है। गंगा पूरा पचा डालती है, कुछ भी नहीं बचता उसमें। सभी लीन हो जाता है पंच तत्‍व में। इसलिए गंगा में लाश को फेंकने का आग्रह बना। क्‍योंकि बाकी सब जगह से पूरे पंच तत्‍वों में लीन होने में सैकड़ों, हजारों और कभी लाखों वर्ष लग जाते है। गंगा का समस्‍त तत्‍वों में वापस लौटा देने के लिए बिलकुल केमिकल काम है। ,वह पूरी की पूरी नदी साधारण पहाड़ से बही हुई नदी नहीं है।वह निर्मित की गई ,बहाई गयी नदी है। पर वह हमारे ख्‍याल में नहीं आ सकता।

8-गंगा एक अल्‍केमिक प्रयोग है, एक बहुत गहरा रासायनिक प्रयोग है। इसमें स्‍नान करके व्‍यक्‍ति तीर्थ में प्रवेश करेगा। इसमे स्‍नान के साथ ही उसके शरीर के भीतर के पानी का जो तत्‍व है वह रूपांतरित होता है। वह रूपांतरण थोड़ी देर ही टिकेगा, लेकिन उस थोड़ी देर में अगर ठीक प्रयोग किए जाएं तो गति शुरू हो जाएगी। रूपांतरण तो थोड़ी देर में विदा हो

जाएगा लेकिन गति शुरू हो जाएगी।और ध्‍यान रहे जिसने एक बार गंगा के पानी को पीकर जीना शुरू कर दिया वह फिर दूसरा पानी नहीं पी सकेगा। फिर बहुत कठिनाई हो जाएगी, क्‍योंकि दूसरा पानी फिर उसके लिए हजार तरह की अड़चनें पैदा करेगा।और भी बहुत जगह गंगा जैसी गंगा पैदा करने की कोशिशें की गई लेकिन कोई भी सफल नहीं हुई। बहुत नदियों में प्रयोग किए है, वह सफल नहीं हो सके, क्‍योंकि पूरी कुंजियां खो गयी हे। शायद ही दो चार आदमी हों, जिनको ख्‍याल हो कि अल्‍केमी का इतना बड़ा प्रयोग हो सकता

है।तीर्थ में और सब तरह के पदार्थों का भी उपयोग है।गंगा में स्‍नान, तत्‍काल प्रार्थना या पूजा या मंदिर में प्रवेश, या तीर्थ में प्रवेश, यह पदार्थ का उपयोग है अंतर-यात्रा के लिए।

क्या गंगोत्री का दर्शन सशरीर नहीं किया जा सकता,वह एस्‍ट्रल ट्रैवलिंग है?-

03 FACTS;-

1-गंगोत्री बहुत छोटी-सी जगह है ,जहां से गंगा बहती है। बड़े मजे की बात यह है कि यात्री जहां गंगात्री को यात्री नमस्‍कार करके लौट आते है ; वह फाल्‍स गंगोत्री है। वह सही गंगोत्री नहीं है। सही को सदा बचाना पड़ता है।वह सिर्फ दिखावा है जहां से यात्री को लौटा दिया जाता है और यात्री नमस्‍कार करके लौट आता है। सही गंगात्री को तो हजारों साल से बचाया गया है। और इस तरह निर्मित किया गया है कि वहां साधारण पहुंचना संभव नहीं है। सिर्फ एस्‍ट्रल ट्रैवलिंग हो सकती है। सही गंगात्री पर, सशरीर पहुंचना संभव नहीं है।

2-जैसा कि सूफियों का अल्‍कुफा है। इसमें सशरीर जा सकता है। इसलिए कभी कोई भूल-चूक से भी पहुंच सकता है। यानी चाहे कोई खोजने वाला न पहुंच सके, क्‍योंकि खोजने वाले को धोखा दे सकते है ,गलत नक्‍शे पकड़ा सकते है। लेकिन जो खोजने नहीं निकला है, अकारण पहुंच जाए तो उसको आप धोखा नहीं दे सकते। वह पहुंच सकता है। लेकिन गंगोत्री पर पहुंचने के लिए सिर्फ सूक्ष्‍म शरीर में ही पहुंचा जा सकता है। इस शरीर में से नहीं पहुंचा जा सकता है। इस तरह का सारा इंतजाम है। गंगोत्री का दर्शन सशरीर कभी नहीं किया जा सकता,वह एस्‍ट्रल ट्रैवलिंग है।

3-ध्‍यान में इस शरीर को यहीं छोड़कर यात्रा की जा सकती है। और जब कोई गंगोत्री को एस्ट्रल ट्रैवलिंग में देख ले, तब उसको पता चलेगा कि गंगा की पूजा का राज क्‍या है। इसलिए सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है। जिस जगह गंगोत्री है,वह जगह बहुत ही विशिष्‍ट रूप से निर्मित है। और वहां से जो पानी प्रवाहित हो रहा है वह अल्केमिकली है। उस अल्केमिकली धारा के दोनों तरफ हिंदुओं ने अपने तीर्थ खड़े किए हे।

गंगा में स्‍नान करके मुक्‍त कैसे हो जाएगा?-

03 FACTS;-

1-तीर्थ सिंबालिक ऐक्‍ट का, प्रतीकात्‍मक कृत्‍य का भारी मूल्‍य है। जैसे जीसस के पास कोई आता है और कहता है 'मैंने यह पाप किए'। वह जीसस के सामने कन्‍फेस कर देता है, सब बता देता है मैंने यह पाप किए। जीसस उसके सिर पर हाथ रख कर कह देते है कि जा तुझे माफ किया।जिस आदमी ने खून किया, उसका क्‍या होगा, या हमने कहा, आदमी पाप करे और गंगा में स्‍नान कर ले, मुक्‍त हो जाएगा। बिलकुल पागलपन मालूम हो रहा है। जिसने हत्‍या की है, चोरी की है, बेईमानी की हे, गंगा में स्‍नान करके मुक्‍त कैसे हो जाएगा।

2-यह दो बातें समझ लेनी जरूरी है। एक तो यह, कि पाप असली घटना नहीं है।असली घटना है-स्‍मृति,मैमोरी ।पाप नहीं, ऐक्‍ट नहीं असली घटना जो आप में चिपकी रह जाती है ;वह स्‍मृति है।आपने हत्‍या की है, यह स्‍मृति कांटे की तरह पीछा करेगी।क्राइस्‍ट कहते हैं, तुम

कन्‍फेस कर दो, मैं तुम्‍हें माफ किए देता हूं।और जो क्राइस्ट पर भरोसा करता है वह पवित्र होकर लौटेगा। असल में क्राइस्‍ट पाप से तो मुक्‍त नहीं कर सकते, लेकिन स्मृति से मुक्‍त कर सकते है। स्‍मृति ही असली सवाल है। गंगा पाप से मुक्‍त नहीं कर सकती, लेकिन स्‍मृति से मुक्त कर सकती है। अगर कोई भरोसा लेकर गया है और ऐसा उसके अनकांशेस में/ चित में है कि गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप से बाहर हो जाऊँगा तो हत्‍या जो हो गई, हो गयी लेकिन यह व्‍यक्‍ति पानी के बाहर जब निकला तो सिंबालिक एक्‍ट हो गया।

3-इसके लिए हिंदुओं ने स्‍थायी व्‍यवस्‍था खोजी है। यह नदी कन्‍फेशन लेती रहेगी ,माफ करती रहेगी, यह अनंत तक रहेगी, और ये धाराएं स्‍थायी हो जाएंगी। यहां के मनीषीयों ने व्‍यक्‍ति से नहीं बांधा, धारा से बाँध दिया।वहां तीर्थ कोई जाएगा ,तो वह मुक्‍त होकर लौटेगा।

अथार्त स्‍मृति से मुक्‍त होगा। स्‍मृति ही तो बंधन है। वह स्वप्न जो आपने देखा, आपका पीछा कर रहा है। असली सवाल वही है, और निश्‍चित ही उससे छुटकारा हो सकता है। लेकिन उस छुटकारे में दो बातें जरूरी है। बड़ी बात तो यह जरूरी है कि आपकी ऐसी निष्‍ठा हो कि मुक्‍ति हो जाएगी। और आपकी निष्‍ठा तभी होगी जब आपको ऐसा ख्‍याल हो कि लाखों वर्ष से ऐसा वहां होता रहा है।और कोई उपाय नहीं है।

क्या सभी धर्म तीन एलिमेंट पर आधारित है?-

07 FACTS;-

1-आप यह जान कर हैरान होंगे कि हिंदुओं के सब तीर्थ नदी के किनारे है और जैनों के सब तीर्थ पहाड़ों पर है। जैन उस पहाड़ पर ही तीर्थ बनाएँगे जो बिलकुल रूखा हो जिस पर हरियाली भी न हो, हरियाली वाले पहाड़ पर वह न चढ़ेंगे।अगर पहाड़ ही चुनना था तो हिमालय से बेहतर कुछ भी न था। पर हिमालय को बिलकुल छोड़ दिया। उन्‍हें सूखा पहाड़ा चाहिए, खुला पहाड़ चाहिए, कम से कम हरियाली हो, कम से कम पानी हो। क्‍योंकि जैन जिस अल्‍केमी का प्रयोग कर रहे थे, वह अल्‍केमी शरीर के भीतर जो ‘’अग्नि तत्‍व’’ है। उससे संबंधित है। और हिंदू जो प्रयोग कर रहे थे वह अल्‍केमी के भीतर जो ‘’पानी तत्‍व’’ है, उससे संबंधित है। दोनों की अपनी कुंजियां है, और दोनों अलग है।

2- नदी के बिना तीर्थ होने का कोई अर्थ हिंदुओं की समझ में नहीं आता है। हरियाली और सौंदर्य और इस सबके बिना तीर्थ हो सकता है, उसकी समझ के बाहर की बात है। वह जिस तत्‍व पर काम कर रहा था। वह जल है। इसलिए उसके सब तीर्थ Water Elementआधारित

है, जल से निर्मित है।जैन जो मेहनत कर रहा था उसका मूल तत्‍व Fire Element है। इसलिए तप पर बहुत जोर है। हिंदू साधना का सूत्र यह है कि संन्‍यासी ,योगी को दूध, घी, दही, पनीर, इनकी पर्याप्‍त मात्रा का उपयोग करना चाहिए। ताकि भीतर आर्द्रता रहे -सूखापन न आ सके। भीतर सूखापन आ जायेगा तो उसकी ‘’की’’ काम नहीं कर सकेगी -वह आर्द्र रहे।

3-जैन की सारी की सारी चेष्‍टा यह है कि भीतर सब सूख जाए, आर्द्रता रहे ही नहीं। इसलिए जैन मुनि ने स्‍नान भी बंद कर दिया।जो उसके कारण है उतना भी पानी का उपयोग नहीं करना है।यह जैन मुनि भी नहीं बता सकता कि वह किस लिए नहीं नाह रहा है ; काहे के लिए

परेशान है।लेकिन जल में उसकी कुंजी/‘’की’’ नहीं है।पंच महा भूतों में उनकी कुंजी है, वह है ..तप, वह है—अग्‍नि। तो सब तरफ से भीतर अग्‍नि को जगाना है। उपर से पानी डाला तो उस अग्‍नि को जगना मुशिकल हो जाएगा। इसलिए सूखे पहाड़ पर जहां हरियाली नहीं पानी नहीं, जहां सब तप्‍त है, वहां जैन साधक खड़ा है। वह धीरे-धीरे पत्‍थरों में खड़ा रहेगा। जहां सब बाहर भी सूखा है।यही बात मुस्लिम धर्म की भी है क्योंकि मूल तत्‍व Fire Element है।

4-दुनिया में सब जगह उपवास है, लेकिन सिर्फ जैनों को छोड़कर उपवास में पानी लेने की मनाही कोई नहीं करेगा।सब दुनियां उपवास में सब चीजें बंद कर देती,लेकिन पानी जारी रखती।सिर्फ जैन है, जो उपवास में पानी का भी निषेध करेंगे।साधारण गृहस्‍थ यही समझता है कि रात्रि का पानी इसलिए त्‍याग करवाया जा रहा है कि पानी में कहीं कोई कीड़ा मकोड़ा न मिल जाए, पर उससे कोई लेना-देना नहीं।असल में अग्नि तत्व की कुंजी के लिए तैयारी करवायी जा रही है।

5-जैन आथेंटिक तीर्थ पहाड़ पर होगा। हिंदू आथेंटिक तीर्थ नदी के किनारे होगा। हरियाली में होगा, सुंदर जगह होगा। जैन जो भी पहाड़ चुनेंगे वह कई हिसाब से कुरूप होगा। क्‍योंकि पहाड़ का सौंदर्य उसकी हरियाली के साथ खो जाता है।वे स्‍नान नहीं करेंगे, दातुन नहीं करेंगे। इतना कम पानी का उपयोग करना है कि दातुन भी नहीं करेंगे।क्‍योंकि पानी जितना कम हो जाए उसके भीतर उतना ही अग्‍नि का संचार हो जाएगा।अगर उनकी वह पूरी बात समझ ली जाए , तो फिर उनके जो सूत्र है वह कारगर होंगे, नहीं तो नहीं कारगर होंगे।उन सूत्रों की साधना से भीतर की अग्‍नि भड़कती है और भीतर की अग्‍नि के भड़काने का यह निगेटिव उपाय है कि पानी का संतुलन तोड़ दिया जाए।

6-और बड़े मजे कि बात है कि अगर पानी कम से कम या न्‍यूनतम ;जितना महावीर की चेष्‍टा है ...उतना पानी लिया जाए, तो ब्रह्मचर्य के लिए अनूठी सहायता मिलती है।क्‍योंकि वीर्य सूखना शुरू हो जाता है।और अंतर-अग्‍नि के जलाने के जो इसके संयुक्‍त प्रयोग है वह बिलकुल सुखा डालते है।जरा-सी भी आर्द्रता वीर्य को प्रवाहित करती है।यह उनकी कुंजी है।जैनों ने सारे के सारे अपने तीर्थों का र्निमार्ण नदियों से दूर किया है।फिर नकल में कुछ पीछे के तीर्थ खड़े कर लिए, उनका कोई प्रयोजन नहीं है।

7-इन सारे तत्‍वों का शरीर के भीतर बैलेंस है।भीतर इस मात्रा में पानी, इस मात्रा में अग्‍नि , इससे ही बैलेंस है। अगर आपको एक तत्‍व से यात्रा करनी है तो बैलेंस देना पड़ेगा और विपरीत से तोडना पड़ेगा।जो भी अग्‍नि पर मेहनत करेगा वह पानी का दुश्‍मन हो जाएगा।

Air Element मध्य का एलिमेंट है। क्रिश्चियनिटी और बुद्धिज्म एयर एलिमेंट पर आधारित है।

....SHIVOHAM....