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TANTRA


तंत्र, मंत्र, यन्त्र और योग साधना के अंग हैं।

तंत्र, तांत्रिक या टोने-टोटके का नाम भारत में प्राय: अनिष्टकारी शक्तियों के साथ जोड़ा जाता है, यद्यपि इसमें मनुष्य के उपकार की शक्ति-संभावना अधिक होती है।यह एक ऐसी विद्या है, जो व्यक्ति को अनुशासित बनाती है, शरीर पर नियंत्रण बढ़ाती है।

तंत्र तन अर्थात शरीर से जुड़ा है। ऐसी सिद्धियाँ जिनके लिए तन को साधना पड़े या जिन्हें शरीर की साधना के माध्यम से पाया जाये तंत्र कहलाती हैं। इनका केंद्र शरीर होता है। तंत्र शास्त्र का प्रारंभ भगवान् शिव से है। शिव और शक्ति ही तंत्र शास्त्र के अधिष्ठाता देवता हैं। शिव और शक्ति की साधना के बिना तंत्र सिद्धि को हासिल नहीं किया जा सकता।

माता पार्वती ने भगवान् शिव से प्रश्न किया कि हे महादेव! कलियुग में धर्म या मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग होगा? उनके इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् शिव ने उन्हें समझाते हुए कहा कि जो भी व्यक्त किया गया है, उसी को तंत्र कहते हैं।

कलियुग में वैदिक मंत्र विष हीन सर्प के समान हो जायेंगे। ऐसा कलियुग में शुद्ध और अशुद्ध के बीच में कोई भेद -भाव न रह जाने की वजह से होगा। कलियुग में लोग वेद में बताये गए नियमों का पालन नही करेंगे। इसलिए नियम और शुद्धि रहित, वैदिक मंत्र का उच्चारण करने से कोई लाभ नही होगा। जो व्यक्ति वैदिक मंत्रों का कलियुग में उच्चारण करेगा, उसकी व्यथा एक ऐसे प्यासे मनुष्य के समान होगी, जो गंगा नदी के समीप प्यासे होने पर, कुआँ खोद कर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश में, अपना समय और ऊर्जा को व्यर्थ करता है। कलियुग में वैदिक मंत्रों का प्रभाव ना के बराबर रह जाएगा और गृहस्थ लोग, जो वैसे ही बहुत कम नियमों को जानते हैं, उनकी पूजा का फल उन्हें पूर्णतः नही मिल पायेगा। [योगिनी तंत्र]

वैदिक मंत्रों का पूर्ण फल सतयुग, द्वापर तथा त्रेता युग में ही मिलेगा। माँ पार्वती ने भगवान् शिव से फिर पूछा कि कलियुग में मनुष्य अपने पापों का नाश कैसे करेंगे और जो फल उन्हें पूजा अर्चना से मिलता है, वह उन्हें कैसे मिलेगा? इस पर भगवान् शिव ने कहा कि कलियुग में तंत्र साधना ही सतयुग की वैदिक पूजा की तरह फल देगी। तंत्र में साधक को बंधन मुक्त कर दिया जायेगा और वह कार्य सिद्धि के लिए अनेकों प्रकार के तौर-तरीके अपनायेगा।

ऐसा करने के लिए साधक के अन्दर कार्य सिद्धि की तीव्र इच्छा होनी चाहिए। तंत्र की प्रायोगिक क्रियाओं को करने के लिए एक तांत्रिक अथवा साधक को सही मंत्र, तंत्र और यन्त्र का सही उचित ज्ञान जरुरी है।

तंत्र कोई एक प्रणाली नहीं है, अपितु इसमें अनेक पंथ और शैलियाँ हैं। तंत्र आदि काल से ही धर्म का अभिन्न अंग है। वेदों में भी इसका उल्लेख है और कुछ ऐसे मंत्र भी हैं, जो पारलौकिक शक्तियों से संबंधित हैं।

तंत्र साधना में नारी :: सृष्टि के प्रारंभ में अंधकार था एवं जल की प्रधानता थी और संसार की उत्पत्ति जल से ही हुई है। जल का ही एक पर्यायवाची ‘नार’ है। [ऋग्वेद नासदीय सूक्त (अष्टक 8, मं. 10 सू. 129]

सृजन के समय भगवान् श्री हरी विष्णु जल की शैया पर विराजमान होते हैं और नारायण कहलाते हैं एवं उस समय उनकी नाभि से प्रस्फुटित कमल की कर्णिका पर स्थित ब्रह्मा जी ही संसार का सृजन करते हैं और नारी का नाभि से ही सृजन प्रारंभ होता है तथा उसका प्रस्फुटन नाभि के नीचे के भाग में स्थि‍त सृजन पद्म में होता है।

सृजन की प्रक्रिया में नारायण एवं नारी दोनों समान धर्मी हैं एवं अष्टकमल युक्त तथा पूर्ण हैं, जबकि पुरुष केवल सप्त कमलमय है, जो अपूर्ण है। इसी कारण तंत्र शास्त्र में तंत्रराज श्रीयंत्र की रचना में रक्तवर्णी अष्ट कमल विद्यमान होता है, जो नारी की अथवा शक्ति की सृजनता का प्रतीक है। इसी श्रीयंत्र में अष्ट कमल के पश्चात षोडश दलीय कमल सृष्टि की आद्या शक्ति चन्द्रा के सृष्टि रूप में प्रस्फुटन का प्रतीक है। चंद्रमा 16 कलाओं में पूर्णता को प्राप्त करता है। इसी के अनुरूप षोडशी देवी का मंत्र 16 अक्षरों का है तथा श्रीयंत्र में 16 कमल दल होते हैं। तदनुरूप नारी 27 दिन के चक्र के पश्चात 28वें दिन पुन: नवसृजन के लिए पुन: कुमारी रूपा हो जाती है।

यह संपूर्ण संसार द्वंद्वात्मक है, मिथुनजन्य है एवं इसके समस्त पदार्थ स्त्री तथा पुरुष में विभाजित हैं। इन दोनों के बीच आकर्षण शक्ति ही संसार के अस्तित्व का मूलाधार है, जिसे आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया है।

शिव:शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं। न चेदेवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि।

यह आकर्षण ही कामशक्ति है, जिसे तंत्र में आदि शक्ति कहा गया है। यह परंपरागत पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। तंत्र शास्त्र के अनुसार नारी इसी आदि शक्ति का साकार प्रति रूप है। षटचक्र भेदन व तंत्र साधना में स्त्री की उपस्थिति अनिवार्य है, क्योंकि साधना स्थूल शरीर द्वारा न होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है।

वेदों के कर्म, उपासना और ज्ञान के तीन विषय संक्षिप्त और गुँथे हुए रूप में वर्णित हैं, जिन्हें सरल रूप में युगानुसार विस्तारपूर्वक तंत्र में वर्णित किया गया है।

जिस तरह वर्णों में ब्राह्मण, देवियों में दुर्गा, देवताओं में इन्द्र, वृक्षों में पीपल, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा और अवतारों में विष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी तरह शास्त्रों में तंत्र श्रेष्ठ हैं। [मत्स्य-सूक्त]

अध्यात्म में तंत्र एक ऐसी शाखा है, जिसका अवलंबन करके सर्वथा सामान्य व्यक्ति भी साँसारिक स्तर से ऊपर उठ सकता है।

तंत्र-साधनाओं का लक्ष्य बड़ा विस्तृत है। वशीकरण, मारण, मोहन, उच्चाटन, दृष्टिबंध, परकाया प्रवेश, सर्प विद्या, प्रेत विद्या, अदृश्य वस्तुओं को देखना, भविष्य ज्ञान, संतान, सुयोग, आकर्षण, मोहन मंत्र, घात-प्रतिघात आदि की क्रियायें; इससे संचालित की जा सकती है। इस साधना द्वारा दूसरों के मन को प्रभावित किया जा सकता है और उसकी गतिविधियों को अपनी इच्छानुसार तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। निर्बल मन व शरीर वाले व्यक्तियों को स्वस्थ बनाया जा सकता है। बिच्छू एवं सर्पदंश तथा विषैले फोड़ों का समाधान भी तंत्र द्वारा मिलता है। अनिष्टग्रह, भूतोन्माद, नजर लगने आदि के उपचार तंत्र द्वारा होते हैं। मानसिक उद्वेग, असहनीय वेदना व अन्य शारीरिक अव्यवस्थाओं में तंत्र सहायक सिद्ध होता है।

तंत्र शास्त्र में कहा गया है कि जहाँ भोग है, वहाँ मोक्ष नहीं है और जहाँ मोक्ष है, वहाँ भोग नहीं है, किंतु जो मनुष्य भगवती महाशक्ति की सेवा में संलग्न हैं, उनको भोग और मोक्ष दोनों ही सहज साध्य हैं।

तंत्र में पंचमकार की साधना की जाती है। इन साधनाओं में मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन के प्रयोग का निर्देश अलंकारिक भाषा में गया है, जिसको साधारण कोटि के साधक-मनुष्य समझ नहीं सके और इनका प्रत्यक्ष प्रयोग करके, इस उच्चस्तरीय साधना क्षेत्र को भ्रष्ट कर दिया, जिससे बौद्धिक क्षेत्र में इनके प्रति घृणा के बीज उत्पन्न हो गये। निकृष्ट लोग इनका भौतिक अर्थ लेते हैं। गोरखनाथ के बाद में भयानन्द आदि जो लोग हुए, उन्होंने तंत्र को एक विकृत रूप दे दिया। उन्होंने तंत्र का तात्पर्य भोग, विलास, मद्य, मांस, पंचमकार को ही मान लिया।

जहाँ ‘मद्य’ के प्रयोग का आदेश है, वहाँ नशा उत्पन्न करने वाले पेय से अभिप्राय नहीं है, वरन् वह दिव्य ज्ञान है जिससे साधक बाहरी जगत से नाता तोड़कर आँतरिक-अलौकिक क्षेत्र में प्रवेश करता है।

परमात्मा को सर्वस्व समर्पित करना ही ‘माँस’ का सेवन कहलाता है।

‘मत्स्य’ का अभिप्राय उस स्थिति से है, जब मनुष्य के सभी तरह के सुख-दुख एक समान हो जाते हैं।

दुर्गुणों के त्याग को ‘मुद्रा’ कहते हैं।

सहस्रार में शिव-शक्ति का कुँडलिनी के साथ मिलन ‘मैथुन’ कहलाता है। उच्चकोटि के साधक इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत होकर साधना करते हैं।

ताँत्रिक को भैरव, छाया पुरुष, ब्रह्मराक्षस, मसान, पिशाच, आदि सिद्ध हैं। अदृश्य लोक की चेतना ग्रंथियों की प्रक्रिया इस प्रकार से होती है कि तंत्र साधनाओं द्वारा उन्हें पकड़ा जाता है, उनको प्राणवान बनाया जाता है, जाग्रत, क्रियाशील और चैतन्य बनाया जाता है। चैतन्य होने पर वह साधक पर आक्रमण करती हैं। यदि साधक इस आक्रमण से भयभीत न हुआ तो वह ग्रंथियाँ उस साधक के वश में हो जाती हैं और अप्रत्यक्ष शरीर से उसके सभी कार्य सिद्ध करती हैं। यदि वह भयभीत हो जाे तो उसे हानि की भी संभावना होती है। तंत्र सही उपयोग से अदृश्य लोक की इन चेतना ग्रंथियों को जाग्रत कर, वे सभी कार्य सिद्ध करता है जो सामान्यतया असंभव प्रतीत होते है।

तंत्र का सीधा संबंध चेतना-चित्त शक्ति से है। यह साधना पंचकोशों को पार करने एवं षट्चक्र जागरण कुण्डलिनी उन्नयन की उच्चतम प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करती है। अन्नमय कोष से आनंदमय कोष की ओर बढ़ते हुए चलना ही इनका उद्देश्य है।

तंत्र का मत है कि जो साधक इन्द्रियों और प्राणों को रोककर कुल मार्ग में सक्रिय नहीं हो जाता, वह शक्ति की निकृष्ट उपासना का भी अधिकारी नहीं है। जो व्यक्ति-साधक पर द्रव्य के लिए अंधा है, पर-स्त्री के लिए नपुँसक है, पर निंदा के लिए मूक है और इन्द्रियों को सदा वश में रखता है, ऐसा ब्रह्म परायण व्यक्ति ही वाममार्गी तंत्र साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धाँतों का गंभीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्वक अनुगमन आवश्यक है, तभी दिव्य शक्तियों का वरद् हस्त प्राप्त हो सकता है।[मेरु तंत्र]

तंत्र का अभ्यास सक्षम-समर्थ गुरु के अधीन ही किया जाता है।

तंत्र साधना :: तंत्र साधना में छः प्रकार के प्रयोग बताए गए हैं, जिन्हें षटकर्म कहते हैं। षटकर्म तंत्र, मंत्र, यन्त्र, तांत्रिक और तंत्र साधना मंत्रों के प्रयोग के पूर्व की जानकारी है। तंत्र के आदि गुरु भगवान् शिव माने जाते हैं। तंत्र श्रृष्टि में पाए गए रासायनिक या प्राकृतिक वस्तुओं के सही समाहार की कला को कहते हैं। इस समाहार से बनने वाली उस औषधि या वस्तु से प्राणियों का कल्याण होता है। तंत्र तन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। जो वस्तु इस तन की रक्षा करे, उसे ही तंत्र कहते हैं। यन्त्र: मंत्र और तंत्र को यदि सही तरीके से प्रयोग किया जाये, तो वह प्राणियों के कष्ट दूर करने में सफल है। तंत्र के लिये एक उचित पात्र की आवश्यकता होती है, ताकि साधारण मनुष्य उस पात्र को आसानी से अपने पास रख सके या उसका प्रयोग कर सके। इस पात्र या साधन को ही यन्त्र कहते हैं। एक ऐसा पात्र जो तंत्र और मन्त्र को अपने में समिलित कर के आसानी से प्राणियों के कष्ट दूर करे, वही यन्त्र है। हवन कुंड को सबसे श्रेष्ठ यन्त्र मन गया है। आसन, तलिस्मान, ताबीज इत्यादि भी यंत्र माने जाते है। कई प्रकार की सिद्ध आकृतियों को भी यन्त्र माना गया है। जैसे श्री यन्त्र, काली यन्त्र, महा मृतुन्जय यन्त्र इत्यादि। यन्त्र शब्द यं तथा त्र के मिलाप से बना है। यं को पूर्व में यम यानी काल कहा जाता था। इसलिए जो यम से मनुष्य की रक्षा करे, उसे ही यन्त्र कहा जाता है।

तांत्रिक साधक को मंत्र, तंत्र और यन्त्र का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। यदि तीनों अंगों में से किसी की भी मात्रा या प्रकार ग़लत हुआ, तो सफलता नही मिलेगी।

तंत्र साधना, मंत्र साधना, यन्त्र साधना, योग साधना, सिद्धि प्राप्त करने के लिये हैं तथा सिद्धियाँ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार से लाभकारी हैं। ये मनुष्य को मोक्ष से दूर, जन्म-मरण के चक्र से बाँधे रखती हैं।

तांत्रिक साधना :: (1). वाम मार्गी और (2). दक्षिण मार्गी।

वाम मार्गी :: यह बेहद कठिन है। इसमें 6 प्रकार के कर्म षट् कर्म हैं।

शांति, वक्ष्य, स्तम्भनानि, विद्वेषणोच्चाटने तथा। गोरणों तनिसति षट कर्माणि मणोषणः॥

शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छ: तांत्रिक षट् कर्म।

इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:-

मारण मोहनं स्तम्भनं विद्वेषोच्चाटनं वशम्‌। आकर्षण यक्षिणी चारसासनं कर त्रिया तथा॥

मारण, मोहनं, स्तम्भनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये 9 प्रयोग हैं।

रोग कृत्वा गृहादीनां निराण शन्तिर किता। विश्वं जानानां सर्वेषां निधयेत्व मुदीरिताम्‌॥

पूधृत्तरोध सर्वेषां स्तम्भं समुदाय हृतम्‌। स्निग्धाना द्वेष जननं मित्र, विद्वेषण मतत॥

प्राणिनाम प्राणं हरपां मरण समुदाहृमत्‌।

जो कर्म करना हो, उसके आरंभ में उसकी पूजा करें।

तंत्र के अंग ::

(1). शांति कर्म :: इससे रोग, कुकृत्य और ग्रह आदि की शांति होती है। इसकी अधिष्ठात्री देवी रति हैं। ईशान कोण की दिशा में मुख करके मंत्र जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। इसका प्रयोग गुरुवार से आरंभ करने से सिद्धि प्राप्त होती है। हेमन्त ऋतु में शान्ति कर्म करना उचित है। दोपहर में शांति कर्म का प्रयोग करना चाहिए। हवन सामग्री :- शान्ति कर्म में दूध, तिल, शुद्ध धृत और समिधा आम की लकड़ी।

(2). वशीकरण (पुष्टि कर्म) :- इसकी देवी माता सरस्वती हैं। किसी निश्चित व्यक्ति को अपने अनुकूल कर लेना और उससे अपने इच्छित कार्य करवाना वशीकरण है। बसंत ऋतु में, सोमवार को उत्तर की ओर मुख करके मंत्र जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। दिवस के पहले प्रहर में वशीकरण का प्रयोग करना चाहिए। हवन सामग्री :- वशीकरण में सरसों, नमक और राई का हवन सामान्य है तथा पुष्टि कर्म में शुद्ध घी, बेलपत्र, चमेली के पुष्प, कमल गट्टा, चंदन, जौ, काले तिल तथा अन्न के मिश्रण से, धूप, समिधा ढाक की प्रयोग करें।

सम्मोहन :- व्यक्तियों के पूरे समूह को अपने अनुकूल करना, मोहन तंत्र के अन्तर्गत आता है।

(3). स्तम्भन :- जिस कर्म से प्राणियों की प्रवृत्ति रोक दी जाये वह स्तम्भन है। इसकी देवी माता लक्ष्मी हैं। शत्रुओं की बुद्धि, बल को इस प्रकार से भ्रष्ट कर देना कि वो समझ ही ना पाये कि क्या करना है और क्या नहीं स्तम्भन है। तीसरे प्रहर में, गुरुवार के दिन, पूर्व दिशा की ओर मुख करके, मंत्र जप करने से यह सिद्धि प्राप्त होती है।

(4). विद्वेषण :- जिस क्रिया के द्वारा दो प्राणियों की परस्पर प्रीति को छुड़ा दिया जाये वह विद्वेषण है। इसकी देवी ज्येष्ठा हैं। इसका उद्देश्य किन्ही 2 व्यक्तियों के बीच में ऐसा भयंकर झगडा करवाना है, ताकि वे आपस में मरने-मारने को उतारू हो जायें। दिन के पहले प्रहर में, नेऋत्य दिशा में मुँह करके, शनिवार के दिन से, ग्रीष्म ऋतु में आरंभ करने से, यह सिद्धि प्राप्त होती है। हवन सामग्री :- तेल और सरसों का हवन करें।

(5). उच्चाटन :- किसी व्यक्ति या शत्रु को देश आदि से पृथक करना, किसी विशेष कार्य से मोह-ध्यान भंग कर देना, ताकि वो उस कार्य को छोड़ दे उच्चाटन है। इसकी देवी माता दुर्गा हैं। वर्षा ऋतु में, दिन के पहले प्रहर में, मंगलवार के दिन से, वायव्य कोण की ओर मुख करके, मंत्र जप करने से यह सिद्धि प्राप्त होती है। हवन सामग्री :- तेल और सरसों का हवन करें। काग पंख, घी में सानकर धतूरे के बीज मिलाकर, हवन करना चाहिए।

(6). मारण :- किसी के प्राण लेना या मृत्यु तुल्य कष्ट देना, मारण के तहत आता है। इसकी देवी माँ भद्र काली हैं। सिद्धि के लिये इसका प्रयोग, मंत्र जप, आग्नेय दिशा की ओर मुख करके, शनिवार के दिन से आरंभ करके, शरद ऋतु में, संध्या काल में करना चाहिये। हवन सामग्री :- तेल और सरसों का हवन करें।

धन प्राप्ति, व्यापार-काम-धंधे, हेतु साधना पश्चिम दिशा में मुँह करके करनी चाहिये। हवन सामग्री :- लक्ष्मी प्राप्ति के लिए धूप, खीर मेवा इत्यादि का हवन करें और समिधा चन्दन व पीपल की लकड़ी की हो।

मंत्र साधना :: मंत्र मन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। मं का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना-साधना, ध्यानस्थ होना तथा त्र का अर्थ है, रक्षा करना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है, तब वह सिद्ध होने लगता है। मन्त्र के उच्चारण या मनन से मनुष्य की रक्षा होती है। यह भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है। इससे देवी या देवता को प्रसन्न किया जाता है अथवा भूत-प्रेत, पिशाच आदि को साधा जाता है।

3 प्रकार के मंत्र :: (1). वैदिक मंत्र, (2). तांत्रिक मंत्र और (3). शाबर मंत्र।

मंत्र जप के भेद :: (1). वाचिक जप, (2). मानस जप और (3). उपाशु जप।

वाचिक जप :: ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है।

मानस जप :: मन ही मन जप करना।

उपांशु जप :: जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती। बिलकुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है।

मंत्र-साधना में उच्चारण सही होना चाहिये। जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्ठान करना है, उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखा जाए। प्रति दिन के जप से ही सिद्धि होती है। किसी विशिष्ट सिद्धि या शीघ्र लाभ के लिए, सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के समय नदी में या तालाब-सरोवर आदि में खड़े होकर जप करना चाहिए। जप का दशांश हवन करना चाहिए और ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन कराना चाहिए।

“क्रिंग ह्रंग स्वाहा” एक सिद्ध मंत्र है।

मंत्र नियम :: मंत्र-साधना में विशेष ध्यान देने वाली बात है, मंत्र का सही उच्चारण। जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्ठान करना है, उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र और इसकी सिद्धि को गुप्त रखा जाए। प्रतिदिन के जप से ही सिद्धि होती है।

मंत्र जाप के नियमों का पालन करने से घर में सुख-शांति, उत्तम स्‍वास्‍थ्‍य बना रहता है। मंत्र में दीक्षिति को चाहिए कि वह अपने इष्ट देव के मंत्र की साधना विधि-विधान से करे।

मंत्र संस्‍कार ::

(1). जनन संस्‍कार :- पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर शुद्धि पूर्वक बैठने के बाद, भोजपत्र पर गोरेचन, कुमकुम एवेम चंदन से आत्माविमुख त्रिभुज बनायें और तीनों कोनों से छः-छः रेखाए खींचें। ऐसा करने से 49 त्रिभुज प्रकोष्ठ बन जायेंगे। इशान कोण से आरंभ कर, एक एक खाने में क्रमशः एक-एक मातृका वर्ण लिखें। प्रत्येक वर्ण के देवता का आह्वाहन करते हुए पूजन कर, उसका उद्धार कर, उसे अलग से भोज पत्र पर लिखकर मन्त्र से संपृक्त भी करना चाहिए। अंत में मन्त्र को जल में विसर्जित कर देना चाहिये।

संपृक्त :: जिससे संपर्क हुआ हो, संबद्ध, मिश्रित; मिला हुआ, पूर्ण, भरा हुआ, लगा; जुड़ा-सटा हुआ; concerned, connected.

(2). दीपन :– इस संस्कार हेतु “हंस मन्त्र” से मूल को संपुटित करके एक हजार जप करना आवश्यक होता है यथा “ॐ हंस शिवाये नम: सो हम”।

(3). बोधन संस्‍कार :- “हूं” बिज मन्त्र से मूल मंत्र को संपुटित कर पाँच हजार जप करने से मन्त्र का बोधन हो जाता है यथा “हूं शिवाये नम : हूं”।

(4). ताड़न संस्‍कार :-“फट” से सम्पुटित करके एक हजार बार मंत्र जाप करना चाहिए यथा “फट शिवाये नम:फट”।

(5). अभिषेक संस्‍कार :- मंत्र को भोजपत्र पर लिखकर :ऊँ हंसः ऊँ” मंत्र से अभिमंत्रित करें, तत्पश्चात एक हजार बार जप करते हुए जल से अश्वत्थ-पीपल के पत्ते द्वारा मंत्र का अभिषेक संस्कार करें।

(6). विमलीकरण संस्‍कार :- “ॐ त्रोम वष्ट” या “ऊँ त्रौं वषट” वर्ण से संपुटित करते हुए, मूल मंत्र का एक हजार जप करने से यह संस्कार सम्पन्न होता है यथा “ॐ त्रोम वष्ट शिवाये नम:वष्ट त्रोम ॐ”।

(7). जीवन संस्‍कार :- “स्वधा वष्ट“ संपुटित मूल मंत्र का एक हजार जप करने से यह संस्कार संपन होता है यथा “स्वधा वष्ट शिवाये नम:वष्ट स्वधा ”।

(8). तर्पण संस्‍कार :- मूल मंत्र से दूध,जल और घी द्वारा सौ बार तर्पण करना चाहिए।

(9). गोपन संस्‍कार :- मंत्र को “ह्रीं” बीज मंत्र से सम्पुटित करके एक हजार बार मंत्र जाप करना चाहिए।

(10). आप्यायन संस्‍कार :- मंत्र को ’ह्रीं’ या “ह्रों” यथा “ह्रों नम:शिवाये ह्रों” से सम्पुटित करके एक हजार बार मंत्र जाप करना चाहिये। इस प्रकार दीक्षा ग्रहण कर चुके जातक द्वारा उपरोक्त विधि के अनुसार, अपने ईष्ट मंत्र का संस्कार करके, नित्य जाप करने से सभी प्रकार के दुःखों का अन्त होता है।

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भगवन शिव के डमरू से जिन सात करोड़ मंत्रो का पादुर्भाव हुआ वे कालअंतर में किसी न किसी दोष से ग्रसित हो गये। शाश्त्रो में मंत्रों के दोष माने गये हैं। जनन ,दीपन,बोधन,तदन,अभिषेक,विम्लीकर्ण ,जीवन, तर्पण ,गोपन व् आप्यायन यह दस संस्कार है जो किसी व् मन्त्र को सिद्ध करने से पूर्व आवश्यक हैं । १.जनन - पूर्व की और मुख करके आसन पर शुधि पूर्वक बैठने के बाद भोजपत्र पर गोरोचन, कुमकुम एवं चंदन से आत्माविमुख त्रिकोण बनावे एवम तीनो कोनो से यथावत रेखाए खींचे .एसा करने से ४९ त्रिकोण कोष्ठ बन जायेगे .फिर इशान कोण से आरंभ कर एक एक खाने में एक एक मात्रिका वरण लिखना चाहिए । प्रतिएक वर्ण का ,देवता का आह्वाहन करते हुए पूजन कर उसका उद्धार करना चाहिए एवं उसे अलग से भोजपत्र पर लिखकर मन्त्र से संपृक्त भी करना चाहिए । अंत में मन्त्र को जल में विसर्जित कर देना चाहिए। इस प्रकार सम्पूर्ण वर्णों को लेकर करने से प्रथम संस्कार संपन होता है । २.दीपन - इस संस्कार हेतु ' हंस ' मन्त्र से मूल को संपुटित के एक हजार जप करना आवश्यक होता है । ३.बोधन - 'हूं' बिज मन्त्र से मूल मंत्र को संपुटित कर पञ्च हजार जप करने से मन्त्र का बोधन हो जाता है। ४.ताडन- फट मन्त्र से मूल मन्त्र को संपुटित क्र एक हजार जप करने से मन्त्र का ताडन हो जाता है । ५.अभिषेक - इस हेतु भोज पत्र पर मूल मन्त्र को लिखना चाहिए बाद में एक हजार बार 'ॐ हंस: ॐ " मन्त्र से अभिमंत्रित जल लेकर पीपल के पते द्वारा मूल मन्त्र का अभिषेक करने यह संपन हो जाता है। ६.विम्लीकर्ण- 'ॐ त्रोम वषट" इन वर्ण से संपुटित करते हुए मूल मंत्र का एक हजार जप करने से यह संस्कार संपन होता है। ७.जीवन -"स्वधा वषट "संपुटित मूओल मंत्र का एक हजार जप करने से यह संस्कार संपन होता है । ८.तर्पण - दूध, जल तथा घी को मिलकर मूल मंत्र से सो बार तर्पण करना ही उस मन्त्र का तर्पण संस्कार होता है। ९.गोपन- 'ह्रीं " का सम्पुट देकर मूल मंत्र का एक हजार जप करना नवम संस्कार होता है। १०.अप्यायन- "ह्रों" बीज का संपुटित देकर मूल मन्त्र का एक हजार जप करने अंतिम व् महाताव्पूरण संस्कार संपन होता है । इस परकार प्रयतन पूर्वक मूल मंत्र का संस्कार कर उसका जप करने ओत अभीशत सफलता अधिक सरलता से मिलती है . उपर संस्कार विधान के इलावा कूर्म चक्र विचार,कुल्लुका विचार ,मंत्रो का कीलन- उत्कीलन,मन्त्र सिधि के विभिन उपाए अदि कई ऐसे भाग है जिनका यदि साधक प्रारंभ में विचार करे तो कम समय व् कम मेहनत में ही सिधि प्राप्त होने की सम्भावना बढ जाती है.

...SHIVOHAM...