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श्रीविद्या साधना/माता कामाख्ये साधना(IN NUTSHELL)

श्रीविद्या साधना संसार की सर्वश्रेष्ठ साधनाओ मे से एक हैं।ध्यान के बिना केवल मन्त्र का जाप करना श्री विद्या साधना नही है।बिना ध्यान के केवल दस प्रतिशत का ही लाभ मिल सकता है।श्रीविद्या साधना में ध्यान का विशेष महत्व हैं। इसलिए पहले ध्यान का अभ्यास करे व साथ-साथ जप करे,अन्त मे केवल ध्यान करें। 1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म, श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:- ॐ - ऐं - क्लीं – सौः मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर 2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ 3-षोडशी त्रिपुर सुंदरी(पंचदशी मंत्र):- ॐ क ए इ ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं ॥ मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है । 3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:- ''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥ मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है। 4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष ललिता माता का पवित्र मंत्र :- 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।' मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

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माता कामाख्ये का मन्त्र

ॐ त्रीं त्रीं त्रीं हूं, हूं स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये प्रसीद स्त्रीं स्त्रीं हूं हूं त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा!! (22 Letters) EXPLANATION OF MANTRA IN HINDI ;- ACCORDING TO"तन्त्रे देवीश्वर" - (संवादे चतुर्थः पटलः) त्रीं त्रीं त्रीं हूँ हूँ स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये ! प्रसीद स्त्रीं स्त्रीं हूँ हूँ त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा 07 FACTS;- 1-हे पार्वती ! श्रेष्ठ मन्त्र बताऊँगा, जिसके प्रसाद से ब्रह्मा, विष्णु, शिव भी और इन्द्रादि सभी देवता कामनापूर्ण होते हैं । हे देवी ! गन्धर्व, किन्नर और विद्याक्षर आदि तथा योगिनी, डाकिनी, भैरवी, नायिका आदि विद्याएँ जिसके प्रसाद से आकर अपने विषय को पूर्ण करती हैं । इस कामाख्या मन्त्र को पाकर स्वर्ग, मृत्यु - लोक और पाताल में जो - जो सिद्ध साधक हैं, वे श्रेष्ठ योग्यता को प्राप्त करते हैं । उसे आदर सहित सुनो । ( त्रीं त्रीं त्रीं हूँ हूँ स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये ! प्रसीद स्त्रीं स्त्रीं हूँ हूँ त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा ) 2-हे देवी ! अपने तीन बीज ( त्रीं त्रीं त्रीं ), उसके बाद दो ' क्रोध - बीज ' ( हूँ हूँ ) और तीन ' वधू - बीज ' ( स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं ), फिर ' कामाख्ये ' कहना चाहिए, तब ' प्रसीद ' शब्द और पूर्वोक्त बीजों की पुनः कल्पना करनी चाहिए । अन्त में दो ठ ' ( स्वाहा ) - यह सभी तन्त्रों में दुर्लभ मन्त्र कहा गया है । हे महादेवी ! उक्त मन्त्र के आदि में ' प्रणव ' ( ॐ ) लगाने से यह चारों वर्ग ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) देनेवाली, महापापों को नष्ट करनेवाली साक्षात् देवी - स्वरुप बन जाता है । हे पार्वति ! इस मन्त्र का स्मरण करते ही सभी विघ्न उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि में पतंगे जलकर भस्म हो जाते हैं । 3-मन्त्र लेते ही मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है । भोग और मोक्ष उसके हाथ में आ जाते हैं और वह सबका प्रिय बन जाता है । स्वयं लक्ष्मी उसे वरण कर लेती हैं और सरस्वती उसके मुख में निवास करती हैं तथा उसके पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र चिरंजीवी होते हैं । 4-हे शंकरि ! पृथ्वी पर कामाख्या आदि सभी पीठों में उसी का लेख प्रचलित होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं । उसके नाम का स्मरण कर सुयोग्य लोग प्रणाम करते हैं और उस नाम को सुनते ही हिंसक प्राणी खड़े होते हैं । स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल में जितनी सिद्धियाँ हैं, वे सभी साधकों की सेवा करती हैं, इसमें सन्देह नहीं । उस साधकेन्द्र को देखकर शास्त्रार्थ करनेवाला कुण्ठित हो जाता है और सभा में सभी सज्जन उसे करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी देखते हैं । 5-हे महेश्वरी ! करोड़ों हजार जीभों से और करोड़ों सैकड़े मुखों से भी इस मन्त्र की महिमा का वर्णन मैं नहीं कर सकता । हे वरानने ! इसके न्यास, पूजन आदि सभी बातें पहले कही जा चुकी हैं किन्तु इसके पुरश्चरण में मन्त्र का जप छः हजार करना चाहिए । यथा विधि छः सौ होमादि करना चाहिए । इससे साधक को मन्त्र सिद्ध होता है और तब वह इसका प्रयोग करने में समर्थ होता है । 6-हे देवी ! महादेवी का ध्यान सुनो, जो धन - धान्य और पुत्रदायक है तथा क्षणभर में ही दरिद्रता का नाश कर देता है, इसमें सन्देह नहीं । मैं योनिरुपा भवानी का भजन करता हूँ, जो कलिकाल के पापों का नाश करती हैं और समस्त लोगों को भोगविलास के उल्लास से पूर्ण कर देती हैं । वे अत्यन्त सुन्दर केशवाली, हँसमुखी हैं, त्रिनेत्रा हैं और उनकी सुन्दर कान्ति के आगे मेघों की छवि भी फीकी पड़ जाती है । रेशमी वस्त्रों से वे प्रकाशमान हैं । उनके हाथ अभय और वर मुद्राओं से युक्त हैं । रत्न - जटित आभूषणों से वे बड़ी भव्य हैं । देव - वृक्ष के नीचे पीठ रत्न - जटित सिंहासन पर वे विराजमान हैं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश द्वारा वन्दिता वे बुद्धि वृद्धिस्वरुपा हैं । कामदेव के मनोमोहक बाण के समान वे अत्यन्त कमनीयता एवं सभी की कामनाओं को पूर्ण करनेवाली हैं । हे देवी ! यह ध्यान गुप्त से भी गुप्त है और दरिद्रता का नाशक है । सभी तन्त्रों में यह गुप्त है । तुम्हारे प्रेम से मैंने प्रकट किया है श्लोक २२ से ३७ तक उक्त मन्त्र की साधना का वर्णन है,।

.....SHIVOHAM...