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दो जन्‍मों के बीच आत्मा की क्या स्थिति है?देवता और प्रेतात्मातएं में क्या अंतर है?


संसार में छह बड़े धर्म है। इनको दो वर्गों में बटा जा सकता है। पहला वर्ग है: यहूदी, ईसार्इ, और इस्‍लाम धर्म है। ये एक ही जीवन में विश्‍वास करते है। तुम सिर्फ जीवन और मृत्‍यु के बीच हो—जन्‍म और मृत्‍यु के पार कुछ भी नहीं है—यह जीवन ही सब कुछ है। जब कि ये स्‍वर्ग, नरक और परमात्‍मा में विश्‍वास करते है। फिर भी ये इनको एक ही जीवन का अर्जन मानते है। दूसरे वर्ग के अंतर्गत हैं: हिंदू, जैन, और बौद्ध धर्म। वे पुनर्जन्‍म के सिद्धांत में विश्‍वास करते है। आदमी को तब तक बार-बार जन्‍म होता है। जब ते कि वो बुद्धत्‍व, एनलाइटेनमेंट, पाप्‍त नहीं कर लेता है, और तब यह चक्र रूक जाता है।

दो जन्‍मों के बीच आत्मा की क्या स्थिति है?

शरीर छोड़ने के बाद और नया शरीर ग्रहण करने के पहले जो अंतराल का क्षण है, अंतराल का काल है, उसके संबंध में दो-तीन बातें समझना आवश्यक है।

एक तो कि उस क्षण जो भी अनुभव होते है वह स्‍वप्‍नवत है। ड्रीम लाइफ है। इसलिए जब होते है तब तो बिलकुल वास्‍तविक होते है, लेकि जब आप याद करते है तब सपने जैसे हो जाते है। स्‍वप्‍नवत इसलिए है वे अनुभव कि इंद्रियों का उपयोग नहीं होता। आपके यथार्थ का जो बोध है, यथार्थ की जो आपकी प्रतीति है, वह इंद्रियों के माध्‍यम से है, शरीर के माध्‍यम से नहीं।

अगर मैं देखता हूं कि आप दिखाई पड़ते है, और छूता हूं और छूने में नहीं आते। तो मैं कहता हूं कि फैंटम है। है नहीं आदमी। वह टेबल में छूता हूं, और छूने में नहीं आती। और मेरा हाथ उसके आर पार चला जाता है। तो मैं कहता हूं कि सब झूठ है। मैं किसी भ्रम में पड़ गया हूं, कोई हैलूसिनेशन है। आपके यथार्थ की कसौटी आपकी इंद्रियों के प्रमाण है। तो एक शरीर छोड़ने के गाद और दूसरा शरीर लेने के बीच इंद्रियाँ तो आपके पास नहीं होती। शरीर आपके पास नहीं होता। तो जो भी आपको प्रतीतियां होती है। वे बिलकुल स्‍वप्‍नवत है—जैसे आप स्‍वप्‍न देख रहे है।

जब आप स्‍वप्‍न देखते है तो स्‍वप्‍न बिलकुल ही यथार्थ मालूम होता है, स्‍वप्‍न में कभी संदेह नहीं होता। यह बहुत मजे की बात है। यथार्थ में कभी-कभी संदेह हो जाता है। स्‍वप्‍न में कभी संदेह नहीं होता। स्‍वप्‍न बहुत श्रद्धावान है। यथार्थ में कभी-कभी ऐसा होता है। जो दिखाई पड़ता है, वह सच में है या नहीं। लेकिन स्‍वप्‍न में ऐसा कभी नहीं होता कि जो दिखाई पड़ रहा है वह सच में है या नहीं। क्‍यों? क्‍योंकि स्‍वप्‍न इतने से संदेह को सह न पाएगा, वह टूट जाएगा, बिखर जाएगा।

स्‍वप्‍न इतनी नाजुम घटना है कि इतना सा संदेह भी मौत के लिए काफी है। इतना ही ख्‍याल आ गया कि कहीं यह स्‍वप्‍न तो नहीं है। कि स्‍वप्‍न टूट गया। या आप समझिए कि आप जाग गए। तो स्‍वप्‍न के होने के लिए अनिवार्य है कि संदेह तो कण भर भी न हो। कण भर संदेह भी बड़े से बड़े प्रगाढ़ स्‍वप्‍न को छिन-भिन्‍न कर सकता है। तिरोहित कर देगा।

तो स्‍वप्‍न को कभी पता नहीं चलता कि जो हो रहा है, वह हो रहा है। बिलकुल हो रहा है। इसका यह भी मतलब हुआ कि स्‍वप्‍न जब होता है तब यथार्थ से ज्‍यादा यथार्थ मालूम पड़ता है। यथार्थ कभी इतना यथार्थ नहीं मालूम पड़ता। क्‍योंकि यथार्थ में संदेह की सुविधा है। स्‍वप्‍न तो अति यथार्थ होता है। इतना अति यथार्थ होता है कि स्‍वप्‍न के दो यथार्थ में विरोध भी हो, तो विरोध दिखाई नहीं पड़ता।

एक आदमी चला आ रहा है, अचानक कुत्‍ता हो जाता है, और आपने मन में यह भी ख्‍याल नहीं आता कि यह कैसे हो सकता है। यह आदमी था, कुत्‍ता कैसे हो गया। नहीं, यह ख्‍याल नहीं आ सकता, संदेह जरा भी नहीं। संदेह उठा नहीं की स्‍वप्‍न खत्‍म। जागने के बाद आप सोच सकते है कि यह क्‍या गड़बड़ झाला है। लेकिन स्‍वप्‍न में कभी नहीं सोच सकते। स्‍वप्‍न में यह बिलकुल ही रीज़नेबल है, इसमें कहीं कोई असंगति नहीं है। बिलकुल ठीक है। एक आदमी अभी मित्र और एकदम से वहीं आदमी बंदूक तान कर खड़ा हो गया। तो आपके मन में कहीं ऐसा सपने में नहीं आता है कि अरे, मित्र होकर और बंदूक तान रहे हो।

स्‍वप्‍न में असंगति होती ही नहीं, स्‍वप्‍न में सब असंगत भी संगत है। क्‍योंकि जरा सा शक, कि स्‍वप्‍न बिखर जाएगा। लेकिन जागने के बाद, सब खो जायेगा। कभी ख्‍याल न किया होगा कि जाग कर ज्‍यादा से ज्‍यादा घंटे भर के बीच सपना या