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श्रेष्ठ संतान हेतु दिव्य आत्मा का आह्वान क्यों किया जाता है?


श्रेष्ठ आत्माएं कैसे जन्म लेती है?-

15 FACTS;-

1-हम अपने ही शरीर में कैसे प्रविष्ट हो गए हैं इसका हमें कोई पता नहीं। हम अपने ही शरीर में कैसे जी रहे हैं इसका भी कोई पता नहीं। हम अपने ही शरीर से पृथक होकर अपने को देख सकें इसका भी कोई अनुभव नहीं। जब मां के पेट में एक आत्मा प्रविष्ट होती है तब वह

बहुत छोटे शरीर में प्रवेश हो रही है, एटॉमिक बॉडी में प्रवेश हो रही है ।

2-वह जो पहले दिन मां के पेट में अणु बनता है, वह अणु आपके शरीर की रूपाकृति अपने में छिपाए हुए है। पचास साल बाद आपके बाल सफेद हो जाएंगे, यह संभावना भी उस छोटे से बीज में छिपी हुई है। आपकी आंख का रंग कैसा होगा, यह संभावना भी उस बीज में छिपी हुई है, आपके हाथ कितने लंबे होंगे, आप स्वस्थ हों कि बीमार, आप गोरे होंगे कि काले, बाल घुंघराले होंगे, ये सारी बातें उस छोटे बीज में छिपी हुई है।

3-वह छोटी देह/ एटॉमिक बॉडी है, अणु शरीर है, उस अणु शरीर में आत्मा प्रविष्ट होती है। उस अणु शरीर की जो संरचना है उस अणु शरीर की जो स्थिति है, उसके अनुकूल आत्मा उसमें प्रविष्ट होती है और दुनिया में जो मनुष्य जाति का जीवन और चेतना रोज नीचे गिरती जा रही है उसका एक मात्र कारण है कि दुनिया के दंपति श्रेष्ठ आत्माओं के जन्म लेने की सुविधा पैदा नहीं कर रहे हैं। जो सुविधा पैदा की जा रही है वह अति निकृष्ट आत्माओं के पैदा होने की सुविधा है। आदमी के मर जाने के बाद जरूरी नहीं है कि उस आत्मा को जल्दी जन्म लेने का अवसर मिल जाए।

4-साधारण आत्माएं, जो न बहुत श्रेष्ठ होती हैं, न बहुत निकृष्ट होती हैं, तेरह दिन के भीतर नए शरीर की खोज कर लेती हैं लेकिन निकृष्ट आत्माएं भी रुक जाती हैं क्योंकि उतना निकृष्ट अवसर मिलना मुश्किल होता है। उन निकृष्ट आत्माओं को ही हम प्रेत और भूत कहते हैं। बहुत श्रेष्ठ आत्माएं भी रुक जाती हैं क्योंकि उतने श्रेष्ठ अवसर का उपलब्ध होना मुश्किल होता है। उन श्रेष्ठ आत्माओं को ही हम देवता कहते हैं।

5-पुरानी दुनिया में भूत प्रेम की संख्या बहुत कम थी और देवताओं की संख्या बहुत ज्यादा। आज की दुनिया में भूत-प्रेतों की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है और देवताओं की संख्या कम, क्योंकि देवता पुरुषों का अवसर पैदा होने का कम हो गया है, भूत प्रेत पैदा होने का अवसर बहुत तीव्रता से उपलब्ध हुआ। 6-तो जो भूत-प्रेत रुके रह जाते हैं मनुष्य के भीतर प्रवेश करने से वे सारे मनुष्य जाति में प्रविष्ट हो गए। इसीलिए आज भूत-प्रेतों का दर्शन मुश्किल हो गया है क्योंकि उनके दर्शन की कोई जरूरत नहीं है। आप आदमी को ही देख लें और उसके दर्शन हो जाते हैं। देवता पर हमारा विश्वास कम हो गया क्योंकि देवपुरुष ही जब दिखाई नहीं पड़ते हों तो देवता पर विश्वास करना बहुत कठिन है। एक जमाना था कि देवता उतनी ही वास्तविकता थीं, उतनी ही एक्चुअलटी थी जितना कि हमारे और जीवन के दूसरे सत्य हैं।

7-अगर हम वेद के ऋषियों को पढ़ें तो ऐसा मालूम पड़ता है कि वे ऐसे देवता की बात कह रहे हैं जो उनके साथ गीत गाता है, हंसता है, बात करता है, जो पृथ्वी पर उनके अत्यंत निकट चलता है। हमारा देवता से सारा संबंध नष्ट हुआ है क्योंकि हमारे बीच ऐसे पुरुष नहीं हुए जो सेतु बन सकें, जो ब्रिज बन सकें, जो देवताओं और मनुष्यों के बीच में खड़े होकर घोषणा कर सकें कि देवता कैसे होते हैं। इसका सारा जिम्मा मनुष्य जाति के दांपत्य की जो व्यवस्था है.. उस पर निर्भर है।

8-मनुष्य जाति की दांपत्य की सारी की सारी व्यवस्था कुरूप है। पहली बात तो यह है कि हमने हजारों साल से प्रेमपूर्ण विवाह बंद कर दिए हैं और विवाह हम बिना प्रेम के कर रहे हैं। जो विवाह प्रेम के बिना होगा उस दंपति के बीच कभी भी वह आध्यात्मिक संबंध उत्पन्न नहीं होगा जो प्रेम से संभव था। उन दोनों के बीच कभी भी वह एकरूपता और संगीत पैदा नहीं हो सकता जो एक श्रेष्ठ आत्मा के जन्म के लिए जरूरी है। उनके प्रेम में वह आत्मा का आंदोलन नहीं होता जो दो प्राणों को एक कर देता है।

9-प्रेम के बिना जो बच्चे पैदा होते हैं प्रेमपूर्ण नहीं हो सकते, वह देवता जैसा नहीं हो सकते, उनकी स्थिति भूत-प्रेत-जैसी ही होगी, उनका जीवन घृणा भर देगा और हिंसा का ही जीवन होगा। जरा सी बात फर्क पैदा करती है। अगर व्यक्तित्व की बुनियादी लयबद्धता नहीं है तो

अदभुत परिवर्तन होते हैं।मां के पेट में जो बच्चा निर्मित होता है उसके पहले अणु में चैबीस जीवाणु पुरुष के होते हैं और चैबीस जीवाणु स्त्री के होते हैं। अगर चैबीस-चैबीस के दोनों जीवाणु मिलते हैं तो अड़तालीस जीवाणुओं का पहला सेल निर्मित होता है। अड़तालीस सेल से जो प्राण पैदा होता है वह स्त्री का शरीर बन जाता है। उसके दोनों बाजू 24-24 सेल के संतुलित होते हैं। पुरुष का जो जीवाणु होता है वह सैंतालिस जीवाणुओं को होता है। एक तरफ चैबीस होते हैं, एक तरफ तेईस।

10-मां से जो जीवाणु मिलता है वह चैबीस का बना हुआ है और पिता से जो मिलता है वह तेईस का बना हुआ है। पुरुष के जीवाणुओं में दो तरह के जीवाणु होते हैं, चैबीस कोष्ठधारी और तेईस कोष्ठधारी। तेईस कोष्ठधारी जीवाणु अगर मां के चैबीस कोष्ठ-धारी जीवाणु से मिलता है तो पुरुष का जन्म होता है। इसलिए पुरुष में एक बेचैनी जीवन भर बनी रहती है, एक असंतोष बना रहता है। क्या करूं, क्या न करूं, एक चिंता, एक बेचैनी, यह कर लूं, यह कर लूं, वह कर लूं। पुरुष की जो बेचैनी है वह एक छोटी-सी घटना से शुरू होती है और यह घटना है कि उसके एक पलड़े पर एक अणु कम है।

11-पुरुष ने सारी सयता विकसित की, एक छोटी ही बात के कारण। उसमें एक अणु कम है। स्त्री ने सारी सयताएं विकसित नहीं की क्योकि उसमें एक अणु पूरा है। उतनी सी घटना व्यक्तित्व का भेद ला सकती है। तो पुरुष और स्त्री के मिलने पर जिस बच्चे का जन्म होता है वह उन दोनों व्यक्तियों में कितना गहरा प्रेम है, कितनी आध्यात्मिकता, कितनी पवित्रता है, कितने प्रार्थनापूर्ण हृदय से वे एक दूसरे के पास आए हैं इस पर निर्भर करेगा। कितनी ऊंची आत्मा उनकी तरफ आकर्षित होती है, कितनी विराट आत्मा उनकी तरफ आकर्षित होती है, कितना महान दिव्य चेतना उस घर में अपना अवसर बनाती है.. यह इस पर निर्भर करेगा। 12-मनुष्य जाति क्षीण और दीन-दरिद्र और दुखी होती चली जा रही है।उसके बहुत गहरे में

दांपत्य का विकृत होना कारण है। और जब तक हम मनुष्य के दांपत्य जीवन को स्वीकृत नहीं कर लेते, जब तक उसे हम आध्यात्मिक नहीं कर लेते तब तक हम मनुष्य के भविष्य में सुधार नहीं कर सकते। और इस दुर्भाग्य में उन लोगों का भी हाथ है जिन लोगों ने गृहस्थ जीवन की निंदा की है और संन्यास जीवन का बहुत ज्यादा शोरगुल मचाया है। क्योंकि एक बार गृहस्थ जीवन निंदित हो गया तो उस तरफ हमने विचार करना छोड़ दिया।

13-संन्यास के रास्ते से बहुत थोड़े से लोग ही परमात्मा तक पहुंच सकते हैं। कुछ विशिष्ट तरह के लोग तथा कुछ अत्यंत निम्न तरह के लोग संन्यास के रास्ते से परमात्मा तक पहुंचते हैं। अधिकतम लोग गृहस्थ के रास्ते से और दांपत्य के रास्ते से ही परमात्मा तक पहुंचते हैं। और आश्चर्य की बात यह है कि गृहस्थ के मार्ग से पहुंच अत्यंत सरल और सुलभ है लेकिन उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया। आज तक का सारा धर्म संन्यासियों के प्रति प्रभाव से पीड़ित है। आज तक पूरा धर्म गृहस्थ के लिए विकसित नहीं हो सका।

14-अगर गृहस्थ के लिए धर्म विकसित होता तो हमने जन्म के पहले चरण में ही विचार किया होता कि कैसी आत्मा को आमंत्रित करना है, कैसी आत्मा को पकड़ना है, कैसी आत्मा

को जीवन में प्रवेश देना है।अगर धर्म की ठीक-ठीक शिक्षा हो सके और एक-एक व्यक्ति को धर्म का विचार, कल्पना और भावना दी जा सके तो बीस वर्षों में आनेवाले मनुष्य की पीढ़ी को बिल्कुल नया बनाया जा सकता है।

15-वह पापी है,अपराधी है.. जो आनेवाली आत्मा के लिए प्रेमपूर्ण आमंत्रण भेजे बिना भोग में उतरता है और उसके बच्चे नाजायज हैं, चाहे उसे बच्चे विवाह के द्वारा हुए हों। जिसने बच्चों को अत्यंत प्रार्थना और पूजा से और परमात्मा को स्मरण करके नहीं बुलाया है, वह अपराधी है और अपराधी रहेगा। कौन हमारे भीतर प्रविष्ट होता है इस पर निर्भर करता है

सारा भविष्य।हम शिक्षा की फिक्र करते हैं, हम वस्त्रों की फिक्र करते हैं, हम बच्चों के स्वास्थ्य की फिक्र करते हैं लेकिन बच्चे की आत्मा की फिक्र हमने बिल्कुल ही छोड़ दी है। इससे कभी भी कोई अच्छी मनुष्य जाति पैदा नहीं हो सकती। पुराणों के अनुसार एक आत्मा का भ्रूण में तब प्रवेश होता है जब उसका शरीर थोड़ा बन जाता है। आत्मा पुरुष के शुक्राणुओं में पहले से नहीं कैद रहती है। वो शुक्राणु और अंडे के मिलने के बाद शरीर में प्रवेश करती है।इसलिए वेदों में दिव्यात्मा के आह्वान के बारे में बात हुई है। क्योंकि आप किसी का आह्वान तभी कर सकेंगे जब आपके पास उनको बिठाने की कोई जगह हो। वेदों के अनुसार शरीर एक रथ की तरह है जिसमें आत्मा एक यात्री की तरह बैठी है।

गर्भधारण के पूर्व कर्तव्य:-

05 FACTS;- 1-किसी भी घर ,परिवार और देश का भविष्य बालकों पर निर्भर करता है जो दम्पति सुविचारी, सदाचारी एवं पवित्रात्मा हैं तथा शास्त्रोक्त नियमों के पालन में तत्पर हैं ऐसे दम्पति के घर में दिव्य आत्माएँ जन्म लेती हैं। ऐसी संतानों में बचपन से ही सुसंस्कार, सदगुणों के प्रति आकर्षण एवं दिव्यता देखी जाती है। वर्त्तमान में देश के सामने बालकों में संस्कारों की कमी एक प्रमुख समस्या है। जिससे उबरने हेतु संतानप्राप्ति के इच्छुक दम्पति को ब्रह्मज्ञानी संतों-महापुरुषों के दर्शन-सत्संग का लाभ लेकर स्वयं सुविचारी, सदाचारी बनना चाहिए।साथ ही उत्तम संतानप्राप्ति के नियमों को भी जान लेना चाहिए।

2-उत्त्म संतानप्राप्ति के लिए सर्वप्रथम पति-पत्नी का तन-मन स्वस्थ होना चाहिए।रात्रि तथा समय कम-से-कम तीन दिन पूर्व निश्चित कर लेना चाहिए। निश्चित रात्रि में शाम होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर सदगुरु व इष्टदेवता की पूजा करनी चाहिए ।संभव हो तो हवन करना चाहिए।गर्भाधान एक प्रकार का यज्ञ है इसलिए इस सतत यज्ञ की भावना रखनी चाहिए, विलास की दृष्टि नहीं रखनी चाहिए।

3-पति-पत्नी दोंनो को अपनी चित्तवृत्तियाँ परमात्मा में स्थिर करनी चाहिए व उत्तम आत्माओं से प्रार्थना करते हुए उनका आह्वान करना चाहिए....

''हे ब्रह्माण्ड में विचरण कर रहीं सूक्ष्म रूपधारी पवित्र आत्माओं ! हम दोंनो आपको प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे यहाँ जन्म धारण करके हमें कृतार्थ करें। हम दोंनो अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बानायेंगे '' 4-पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर आरोहण करे और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में श्य्या पर चढ़े तत्पश्चात शय्या पर निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए... ''अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता त्वां दधातु विधाता त्वां दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेति ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोम सूर्यस्तथाऽश्विनौ भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम्'' ‘'हे गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो धाता (सबके पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें तुम ब्रह्मतेज से युक्त होओ।ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनीकुमार और मित्रावरुण जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें''। 5-दोंनो गर्भ विषय में मन लगाकर रहें ऐसा करने से तीनों दोष अपने-अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज ग्रहण करती है विधिपूर्वक गर्भधारण करने से इच्छानुकूल फल प्राप्त होता है

गर्भाधान सम्बन्धी नियम;-

07 FACTS;- 1-शास्त्रों ने हर चीज की मर्यादा निश्चित की है। हर काम के लिए नियम बनाये हैं। धर्मशास्त्र से लेकर आयुशास्त्र,तथा कामशास्त्र तक ने काम की मर्यादा सुनिश्चित की है। श्रीकृष्ण ने तो मर्यादित काम को अपना स्वरुप ही कह दिया है। ऋतुस्नान के पश्चात् अपनी विवाहिता पत्नी के साथ शास्त्र-मर्यादित सम्भोग करने को भी गृहस्थ-धर्म कहा गया है। पारस्करगृह्यसूत्रम्,तथा धर्मसिन्धु आदि ग्रन्थों में इसका विस्तार से वर्णन है।

2-हमने सुन रखा है कि पुरुष वीर्य(शुक्र)में कुछ क्रोमोजोम होते हैं जो जिम्मेवार हैं नर वा मादा सन्तति के लिए। स्त्री का डिम्ब तो न्यूट्रल होता है।यह केवल X+ X,X+Y क्रोमोजोमों का ही कमाल है ,पर अलग-अलग ग्रह-स्थितियां और रात्रियां इसके लिए जिम्मेवार है- यह सैद्धान्तिक भेद है... ’

3-ज्योतिष में लग्न और चन्द्र को सर्वाधिक महत्त्व पूर्ण कहा गया है। ज्योतिषीय भविष्यवाणी का मूलाधार ये ही दोनों हैं।चन्द्रमा को मन का अधिपति माना गया है। इन्हीं बातों का सार- मुहूर्त चिन्तामणि नामक ज्योतिष ग्रन्थ में सुसम्भोगकाल का निर्देश कुछ इस प्रकार किया गया है-

'''तीनों प्रकार के गण्डान्त,दम्पति का वधतारा,दम्पति का जन्मनक्षत्र,मूल,भरणी,अश्विनी,रेवती,मघा आदि चन्द्रनक्षत्र,सूर्य-चन्द्र के ग्रहण- काल, व्यतिपात, वैधृति योग,माता-पिता के निधन दिवस, श्राद्ध-दिवस, किसी भी दिन का दिवाकाल, संध्या,गोधूलि,उषादि काल में,जन्म राशि से अष्टम लग्न,और पापयुक्त लग्न-नक्षत्रों में समागम न करे। भद्रा,षष्ठी, अमावश्या, पूर्णिमा, एकादशी, पंचमी, चतुर्दशी आदि तिथियां,पर्व के दिन, रिक्ता तिथि, रवि,मंगल,गुरु,शनिवार तथा रजोदर्शन की चार रात्रियों में गर्भाधान त्याज्य है।

तथा तीनों उत्तरा, मृगशिरा,हस्ता,अनुराधा,रोहिणी,स्वाती,श्रवण,धनिष्ठा,शतभिष नक्षत्र गर्भाधान के लिए उत्तम हैं।

4-गर्भाधान के समय शुभग्रह केन्द्रत्रिकोण में हों तो अति उत्तम है। चित्रा,पुनर्वसु,पुष्य,और अश्विनी नक्षत्र गर्भाधान के लिए मध्यम कहे गये हैं। इस प्रकार अन्य भी बहुत से नियम कहे गये हैं,जिनका यथा सम्भव पालन करना चाहिए। ध्यान देने की बात है कि ऊपर कहे गये नियमों में सम्भोग के लिए अनुकूल समय,और गर्भाधान के लिए अनुकूल समय दोनों बातों पर इशारा है।सन्तान कामना से ही सम्भोग करना सर्वश्रेष्ठ नियम है,किन्तु सिर्फ कामोन्माद में उन्मत्त होकर अवसर तलाशना .. जो लोग विशेष कर मनोनुकूल सन्तानेच्छु हैं,उन्हें तो और भी नियमों का ध्यान रखना चाहिए।

5-यज्ञरुपी कामधेनु के अनादर और त्याग के कारण ही आज संसार विपत्तियों घिरा हुआ है । जिस सन्तान के लिए पूर्व पुरुषों ने बड़ी-बड़ी तपस्यायें की हैं,उन्हीं सन्तान-वृद्धि से आज का संसार उब रहा है,उनके आचरण से त्रस्त है,और कृत्रिम विधियों का पालन कर गर्भनिरोध पर बल दे रहा है। इसे ही अपना परम कर्तव्य समझ रहा है। गर्भनिरोध के लिए अनेक उपायों का सहारा ले रहा है। इसका दुश्परिणाम मानव समाज को भुगतना पड़ रहा है,विशेष कर महिलायें इसका शिकार अधिक हो रही है। व्यभिचार भी बढ़ रहा है। स्त्रियों में प्रदर,रजोरोध, युटेरिनकैंसर,स्तनकैंसर,हिस्टिरीया,कामोन्माद वा कामशैथिल्य जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं।

6-श्रीकृष्ण कहते हैं- ''यज्ञ के लिए ही कर्म होना चाहिए''। गर्भाधान भी एक कर्म ही है,एक महान यज्ञ ही है। छान्दोग्यश्रुति कहती है- '' हे गौतम ! पुरुष अग्नि है,उसकी वाणी समित् है, प्राण धूम है,जिह्वा ज्वाला है,आँख अंगारे हैं,कान चिनगारियां हैं,उसी अग्नि में देवता अन्न का होम करते हैं। उसी आहुति से वीर्य बनता है''। पुनः कहते हैं- ''हे गौतम ! स्त्री अग्नि है। उसका उपस्थ समित् है। उस समय जो बातें करता है वही धूम है। स्त्री की योनि ही ज्वाला है। सम्भोग अंगारा है। मुख चिनगारियां हैं। उसी अग्नि में देवता लोग वीर्य का होम करते हैं। उसी आहुति से गर्भ बनता है।'' 7-जरा सोचिये यह कितना पवित्र कर्म है ..यदि मर्यादित हो। किन्तु बिडम्बना ये है कि अपने उत्पन्न सन्तान के सुख-दुःख के लिए माता-पिता सदैव चिन्तित रहते हैं,और ज्योतिषियों के पास दौड़ लगाते रहते हैं,उनकी ग्रहदशा जानने को,परन्तु इन सभी के मूल में जो बात है उस पर जरा भी ध्यान नहीं जाता। यह परम्परा ही लुप्त हो गयी है।

गर्भाधान-काल के महत्त्व और चमत्कार ;-

05 FACTS;-

1-यूं तो शास्त्रों में चालीस संस्कार कहे गये हैं,जिनमें वाल्य संस्कार आठ हैं,और उनमें प्रथम और प्रधान है गर्भाधान संस्कार। उसके बाद क्रमशः पुंसवन,सीमन्त,जातकर्म,नामकरण, अन्नप्राशन, चौल, और उपनयन की बारी आती है। ये सब संस्कार माता-पिता द्वारा किये जाने

वाले संस्कार हैं।अब भला इनमें बीजारोपण ही गलत तरीके से,गलत समय में हो जायेगा तो भविष्य की बातों पर कितना नियन्त्रण रखा जा सकेगा !

2-गर्भाधान के कालदोष का ही कमाल है कि कश्यप जैसे पिता से हिरण्याक्ष और

हिरण्यकशिपु सरीखे राक्षस पैदा हुए। इस काल का ही बल हावी हुआ और उच्चकुल पुलस्त्य के पुत्र विसश्रवा के घर रावण पैदा हुआ। इस काल ने ही विभीषण भी बनाया। ध्रुव और प्रह्लाद भी इसी गर्भाधान काल के अप्रतिम उदाहरण कहे जा सकते हैं।गर्भाधान काल में माता-पिता की मनःस्थिति और परिवेश के साथ-साथ काल भी प्रबल होता है ।

3-मनुस्मृति का कथन है कि रजस्वला होने के सोलह दिन तक का काल ऋतुकाल है। इनमें पहली चाररात्रि,और बाद में ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि गर्भधारण के अयोग्य हैं,शेष रात्रियों में समागम प्रशस्त है।(३-४५,४७,५०) इस सम्बन्ध में ज्योतिषशास्त्र बड़ा ही सरल तरीका सुझाता है।ज्योतिर्विद वराहमिहिर कहते हैं- गर्भाधान काल में लग्न,पंचम,नवम में पुंग्रह यानी सूर्य,मंगल,गुरु होंगे तो सुपुत्र की प्राप्ति होगी,और तत्स्थानों में चन्द्रमा वा शुक्र (स्त्रीग्रह) होंगे तो कन्या सन्तान होगी। इसी भांति लग्न,सूर्य और चन्द्रमा विषम राशिस्थ वा नवांश में होंगे तो पुत्र और सम में पुत्री के सूचक होते हैं। लग्न एवं चन्द्रमा पर जिस तरह के ग्रह की दृष्टि होगी तदनुरुप ही सन्तान भी होने की सम्भावना होती है।

5-गर्भाधान सम्बन्धी एक और नियम(तथ्य)ध्यान रखने योग्य है कि स्त्री की कुण्डली में लग्न, सूर्य, चन्द्रमा के जो-जो नक्षत्र होंगे,उससे सातवें चौदहवें और इक्कीसवें नक्षत्र पर गोचर के चन्द्रमा के आने पर ही स्त्री गर्भधारण कर सकती है,अन्यथा नहीं। हां,कभी-कभी उससे ठीक एक नक्षत्र आगे और पीछे भी स्थिति बन जाती है। इस प्रकार सूक्ष्म गणना करके देखने पर किसी भी स्त्री के लिए किसी भी महीने में केवल तीन दिन(रात्रि)ही गर्भाधान के योग्य हो सकते हैं।’’

स्वरसिद्धान्त से गर्भाधान की प्रक्रिया;-

03 FACTS;- 1-नर-मादा सन्तान के लिए एक और सिद्धान्त है ।स्वरोदय स्वरसिद्धान्त से गर्भाधान की प्रक्रिया का निर्देश है ... पुरुष-स्त्री दोनों के दक्षिण स्वर जारी हों (या जारी कराये जायें) सम्भोग काल में तो पुत्र की प्राप्ति होगी,और इसके विपरीत यानी वामस्वर जारी हों तो कन्या की प्राप्ति होगी। परन्तु इसके लिए स्वर परीक्षण और मनोवांछित परिवर्तन का ज्ञान करके अभ्यास करना होगा,और भोगकाल में भी सांस पर नियन्त्रण रखना होगा।

2-दीर्घायु और सर्वगुणसम्पन्न सन्तान-प्राप्ति हेतु माता-पिता को खान-पान,रहन-सहन आदि अन्य बातों का भी ध्यान रखना चाहिए। पुरुष को चाहिए कि सात्विक(वा सामान्य राजसिक)आहार ले, साथ ही आवश्यकतानुसार असगन्ध,शतावरी,श्वेत-श्याम मुसली, मुलहठी, तुलसी बीज, रेवन्दचीनी,पोस्तादाना आदि का सेवन गोदुग्ध के साथ किया करें, ताकि ओजस्वी सन्तान प्राप्त हो। तथा स्त्री को गर्भधारण की योजना बनाते समय तीन वा छः माह तक गर्भाशय एवं शोणित-शोधन हेतु कशीस,मुसब्बर, हींग,सुहागा,अरिष्ठा,ऐंठा,चित्रक,इन्द्रवारुणी,लक्ष्मणा,मालकांगनी आदि द्रव्यों का सेवन करना चाहिए।

3-मनोवांछित सन्तान-प्राप्ति हेतु सारणी ;- ‘ ध्यान देने योग्य बात ये है कि मासिक शुरु होने के तीन दिनों तक तो स्त्री अपवित्र ही कही गयी है,उसके साथ भोग कदापि नहीं करना चाहिए। चौथी रात्रि में भी स्वस्थ सन्तान की कामना वाले व्यक्ति को इससे परहेज ही करना चाहिए। इस सारणी को समझकर नोट भी कर ले... क्रम -रात्रि>>>>>फल 1-चौथी रात्रि>>>>>>अल्पायु / दरिद्रपुत्र 2-पांचवीं रात्रि>>>>>पुत्रवती,योग्य पुत्री 3- छठी रात्रि>>>>>सामान्य आयु वाला पुत्र 4-सातवीं रात्रि>>>>>वंध्या पुत्री 5-आठवीं रात्रि>>>>>ऐश्वर्यवान पुत्र 6-नौवीं रात्रि>>>>>ऐश्वर्यवान पुत्री 7-दसवीं रात्रि>>>>>बुद्धिमान पुत्र 8-ग्यारहवीं रात्रि>>>>>दुश्चरित्रा पुत्री 9-बारहवीं रात्रि>>>>>उत्तम पुत्र 10-तेरहवीं रात्रि>>>>>कुलघातिनी पुत्री 11-चौदहवीं रात्रि>>>>>अति उत्तम पुत्र 12-पन्द्रहवीं रात्रि>>>>>सौभाग्यवती,सुचरित्रा पुत्री 13-सोलहवीं रात्रि>>>>>सर्वगुणसम्पन्न पुत्र

NOTE;-

सोलहवीं रात्रि के बाद यदि गर्भस्थापन करने का प्रयास किया जाय तो मरुभूमि में बीज बोने के समान है।या तो अंकुरण ही नहीं होगा,या होगा तो विकृतिपूर्ण ही।शिवपंचाक्षर और देवी नवार्ण से विधिवत संस्कार करना अति आवश्यक है- इस विशेष विधि को तो आज लोग बिलकुल विसार चुके हैं।जगदम्बा की कृपा से, इन विधियों के पालन से सन्तान की मनोकामना अतिशीध्र ही पूरी होती है। गर्भधारण हो जाने के बाद नित्य सन्तानगोपालस्तोत्र और नारायण कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए।साथ ही उक्त विधि से संस्कारित करके गर्भपाल रसायन का भी सेवन शुरु कर देना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की दिक्कत न हो।

...SHIVOHAM...