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सप्तमातृका पूजन का क्या महत्व है?क्या है षोडश मातृका रहस्य?

सप्तमातृका का क्या महत्व है?-

04 FACTS;-

1-जब हम मंदिरों में दर्शन पूजन को जाते हैं तो वहां अवस्थित मुख्य प्रतिमा के साथ ही विभिन्न मातृ देवियों की प्रतिमाएं भी देखने को मिलती हैं।इन मातृकाओं की संख्या को लेकर भी अलग अलग मत हैं, एक मत के अनुसार इनकी संख्या सात हैं जिनके आधार पर इन्हें सप्तमातृका कहा जाता है।किसी-किसी सम्प्रदाय में मातृकाओं की संख्या आठ (अष्टमातृका) बतायी गयी है। नेपाल में अष्टमातृकाओं की पूजा होती है। दक्षिण भारत में सप्तमातृकाएँ ही पूजित हैं। कुछ विद्वान उन्हें शैव देवी मानते हैं।वैसे ऋग्वेद में सात माताओं का जिक्र है जिनकी देखरेख में सोम की तैयारी होती है। 2-मातृका हिन्दू धर्म में माताओं का प्रसिद्ध समूह है जिनकी उत्पत्ति आदिशक्ति माँ पार्वती से हुई है। सप्तमातृकाओं में सात देविओं की गिनती की जाती है जिनकी पूजा वृहद् रूप से भारत, विशेषकर दक्षिण में की जाती है। नेपाल में विशेषकर अष्टमातृकाओं की पूजा की जाती है जो आठ देवियों का समूह है। इनमे से हर देवी किसी न किसी देवता/देवी की शक्ति को प्रदर्शित करती है। इनमे से पहली छः मातृका तो पूरे विश्व में एक मत से मान्य हैं किन्तु अंतिम दो के बारे में अलग-अलग जगह कुछ शंशय एवं विरोध है।

3-मार्कण्डेय पुराण में वर्णन मिलता है कि युद्ध में चण्डिका की सहायता के लिए सप्तमातृकाएं उत्पन्न हुईं थीं। इन्हीं सप्तमातृकाओं की सहायता से देवी ने रक्तबीज का वध किया था। ये सात देवियां अपने पतियों के वाहन तथा आयुध के साथ यहां उपस्थित होती हैं । यह सात देवियां हैं ब्राह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैेष्णवी, वाराही, नारसिंही व ऐन्द्री। इन सात के साथ जब चामुण्डा को मातृकाओं की गणना में शामिल कर लिया जाता है तो यह संख्या आठ हो जाती हैं। कुछ स्थानों पर नारसिंही के स्थान पर चामुण्डा को जगह दे दिया जाता है। इस तरह हम पाते हैं कि जहां नारसिंही और चामुण्डा दोनों को इसमें शामिल किया जाता है वहां यह संख्या आठ हो जाती है अन्यथा यह सात ही रहती है। सुत्रधारमंडन रचित ग्रंथ रूपमंडन के अनुसार सप्तमातृका के आरंभ में वीरभद्र और अंत में गणेश की प्रतिमा होनी चाहिए। 4-सप्तमातृका की एकल व संयुक्त प्रतिमाएं मुख्यत: तीन रूपों में पायी गई हैं- स्थानक यानी खड़ी प्रतिमा, आसनस्थ यानी बैठी हुई प्रतिमाएं व नृत्यरत प्रतिमा। पुराणों में जो वर्णन है उसके अनुसार मातृका के चार हाथ हैं व गोद में शिशु है। कुछ प्रतिमाओं में उनके वाहन को ध्वजा में अंकित किया गया है तो कुछ स्थानों में उनके आसन पर उनके वाहन या सवारी का अंकन मिलता है। इसके अलावा अन्य प्रसंगों में भी मातृकाओं की चर्चा युद्ध में देवताओं की मदद करने वाली शक्तियों के तौर पर की गई हैं। एकतरफ जहां इन्हें संहारक की भूमिका में देखा गया है तो वहीं उनके पालनकर्ता वाले रूप की भी पर्याप्त चर्चा मिलती है। अष्ट मातृका के रूप स्वरूप की संक्षिप्त जानकारी ;- भारतीय मूर्तिविज्ञान के अनुसार इन मातृकाओं की प्रतिमा की एकल व संयुक्त प्रतिमाएं मुख्यत: तीन रूपों में पायी गई हैं- स्थानक यानी खड़ी प्रतिमा, आसनस्थ यानी बैठी हुई प्रतिमाएं व नृत्यरत प्रतिमा। पुराणों में जो वर्णन है उसके अनुसार मातृका के चार हाथ हैं व गोद में शिशु है। कुछ प्रतिमाओं में उनके वाहन को ध्वजा में अंकित किया गया है तो कुछ स्थानों में उनके आसन पर उनके वाहन या सवारी का अंकन मिलता है।वराह पुराण में सातवीं मातृका के तौर पर यमी का और आठवीं के रूप में योगीश्वरी का विवरण है।इनके अलावा विभिन्न ग्रंथों में मातृकाओं की सूची मे काफी मतभिन्नता है।

08 FACTS;- 1-ब्राह्मणी:-

ये परमपिता ब्रह्मा की शक्ति को प्रदर्शित करती हैं। ये पीत वर्ण की है तथा इनकी चार भुजाएँ हैं। ब्रह्मदेव की तरह इनका आसन कमल एवं वाहन हंस है।ब्रह्माणी की प्रतिमा में वे चार मुखों वाली हैं व चार भुजाएं हैं। एक हाथ वरद मुद्रा में तो दूसरा अभय मुद्रा में और तीसरे हाथ में यज्ञपात्र है। इनका वाहन हंस है और गोद में शिशु है। 2-वैष्णवी:-

ये भगवान विष्णु की शक्ति को प्रदर्शित करती हैं। इनकी भी चार भुजाएँ हैं जिनमे ये भगवान विष्णु की तरह शंख, चक्र, गदा एवं कमल धारण करती है। नारायण की भांति ये विविध आभूषणों से ऐश्वर्य का प्रदर्शन करती हैं तथा इनका वाहन भी गरुड़ है। 3-माहेश्वरी:-

महादेव की शक्ति को प्रदर्शित करने वाली चार भुजाओं वाली ये देवी नंदी पर विराजमान रहती हैं ,जो पंचमुखी हैं। इनका दूसरा नाम रुद्राणी भी है जो महरूद्र की शक्ति का परिचायक है। महादेव की भांति ये भी त्रिनेत्रधारी एवं त्रिशूलधारी हैं। इनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, रुद्राक्षमाला एवं कपाल स्थित रहते हैं। 4-इन्द्राणी:-

ये देवराज इंद्र की शक्ति को प्रदर्शित करती हैं जिन्हे ऐन्द्री, महेन्द्री एवं वज्री भी कहा जाता है। इनकी चार भुजाएं एवं हजार नेत्र बताये गए हैं। इंद्र की भांति ही ये वज्र धारण करती हैं और ऐरावत पर विराजमान रहती हैं। 5-कौमारी;-

शिवपुत्र कार्तिकेय की शक्ति स्वरूपा ये देवी कुमारी, कार्तिकी और अम्बिका नाम से भी जानी जाती हैं। मोर पर सवार हो ये अपने चारो हाथों में परशु, भाला, धनुष एवं रजत मुद्रा धारण करती हैं। वे छः मुखों वाली हैं और मोर पर सवार हैं।कभी-कभी इन्हे स्कन्द की भांति छः हाथों के साथ भी दिखाया जाता है। 6-वाराही:-

ये भगवान विष्णु के अवतार वाराह अथवा यमदेव की शक्ति को प्रदर्शित करती हैं।इनका मुख वाराह का है जो सफेद रंग के भैंसे पर सवार हैं। ये अपने चार हाथों में दंड, हल, खड्ग एवं पानपत्र धारण करती हैं । इन्हे भी अर्ध नारी एवं अर्ध वराह के रूप में दिखाया जाता है। 7-चामुण्डा:-

ये देवी चंडी का ही दूसरा रूप है और उन्ही की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्हे चामुंडी या चर्चिका भी कहा जाता है। इनका रंग रूप महाकाली से बहुत मिलता जुलता है। नरमुंडों से घिरी कृष्ण वर्ण की ये देवी अपने चारों भुजाओं में डमरू, खड्ग, त्रिशूल एवं पानपत्र लिए रहती हैं। त्रिनेत्रधारी ये देवी सियार पर सवार शवों के बीच में अत्यंत भयानक प्रतीत होती हैं। 8-नारसिंहि:-

विष्णु अवतार नृसिंह की प्रतीक इन देवी का स्वरुप भी उनसे मिलता है। इन्हे नरसिंहिका एवं प्रत्यंगिरा भी कहा जाता है।इनका मुख शेरनी का है और उनके हाथ में गदा और खड्ग हैं।

छठी महोत्सव अथार्त सप्त मातृका पूजन साधना;-

07 FACTS;-

1-मातृका शब्द का अर्थ जन्मदात्री, धात्री और मां है। सप्तमातृकाओं की पूजा नवजात शिशु की हर प्रकार के अनिष्टों से रक्षा करती हैं और इसी कारण बच्चे के जन्म पर उनकी पूजा का प्रावधान षष्ठी को है।पर, जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता है, उसके जीवन में संघर्ष और बाधाओं में भी बढ़ोत्तरी होती जाती है। कई बार ये बाधाएं रोग के रूप में आती हैं, तो कई बार बच्चे का सर्वांगीण विकास बाधित हो जाता है। अतएव, एक ऐसी साधना अनिवार्य थी जिससे बच्चों पर आयी ग्रह-जनित बाधा का निराकरण किया जा सके। पर यह साधना आप अपने बच्चों के लिए कर सकते हैं साथ ही साथ स्वयं के लिए कर सकते हैं।

2-“ब्रह्मऋषियों में पहली बार माता बनी लोपामुद्रा (ऋषि अगस्त्य की पत्नी) और अरुंधति (ऋषि वसिष्ठ की पत्नी) दोनों एक ही समय पर प्रसूत हुईं। अगस्त्य-लोपामुद्रा एवं वसिष्ठ-अरुंधति, इन चारों ने अपने अपने बच्चे के लिए जो पहला पूजन किया उसे ’सप्तषष्ठी पूजन’ के नाम से सम्बोधित किया गया।

3-अगर, आपको ऐसा लगता है कि आपको ग्रह-जनित बाधाएं है तो आप इन बाधाओं के निवारण के लिए सीधे ग्रहों की साधना नहीं करके उनकी माताओं की साधना कर सकते हैं, जो अत्यधिक प्रभावकारी हैं, क्योंकि जब आपने मां को प्रसन्न कर लिया तो उस क्षण पुत्र को

भी मां की बात अवश्य माननी पड़ेगी।शास्त्रों में वर्णित है कि शुंभ और निशुंभ नामक राक्षसों से लड़ते समय महासरस्वती की सहायता के लिए सभी देव अपनी-अपनी शक्ति भेजते हैं। वे सात शक्तियों ही सप्तमातृकाएं हैं और उनकी सेनापति हैं काली।

4-इन सप्तमातृकाओं का पूजन ही सप्तषष्ठी पूजन है। कथा है कि शुंभ और निशुंभ का तो युद्ध में सप्तमातृकाओं ने वध कर दिया, पर शुंभ का पुत्र दुर्गम कौए का रूप बनाकर उनसे बच गया, क्योंकि शत्रु के पुत्र के प्रति भी इन सप्तमातृकाओं के मन में वात्सल्य का भाव उमड़

पड़ा।उनके इस कृत्य से प्रसन्न होकर महासरस्वती ने इन सप्तमातृका शक्तियों को आशीर्वाद दिया कि जो भी मनुष्य अपने घर में बच्चे के जन्म के बाद इन सप्तमातृकाओं का पूजन करेगा, उस बच्चे की आप रक्षक बनना। तब से, घर घर में बच्चे के जन्म के पश्चात् इन सात मातृकाओं का पूजन करने की प्रथा शुरू हुई।

5-वास्तव में ही यह साधना अचूक एवं प्रामाणिक है आज तक इसे असफल होते नहीं देखा गया है ।यह साधना एक दिवसीय और रात्रिकालीन है। साधक को चाहिए कि किसी भी शुभ मुहूर्त या शुक्ल पक्ष की षष्ठी अथवा किसी भी गुरुवार को स्नान आदि से निवृत्त होकर रात को श्‍वेत धोती धारण कर उत्तराभिमुख होकर श्‍वेत आसन पर बैठें। फिर अपने समक्ष लकड़ी के एक बाजोट पर श्‍वेत वस्त्र बिछाकर उस पर ‘सप्त माता यंत्र (ताबीज)’ स्थापित कर उसका पंचोपचार से पूजन करें और फिर उस पर निम्न मंत्र का उच्चारण करता हुआ कुंकुम से रंगे हुए चावल अर्पित करें।

ॐ माहेश्‍वरी नमः। ॐ वैष्णवी नमः। ॐ ब्रह्माणी नमः। ॐ ऐन्द्री नमः। ॐ कौमारी नमः। —ॐ नारसिंही नमः। ॐ वाराही नमः।

फिर ‘ रुद्राक्ष माला’ से निम्न मंत्र की 21 मालाएं मंत्र जप करें।

6-मंत्र;-

॥ॐ ऐं क्लीं सौः सप्तमातृकाः सौः क्लीं ऐं ॐ फट्॥

7-साधना के उपरांत व्यक्ति समस्त साधना सामग्री एवं पूजन सामग्री को अगले ही दिन किसी तालाब, कुएं आदि में विसर्जित कर दें। फिर घर आकर 1, 3, 5 या 7 जितनी सामर्थ्य हो उतनी छोटी कन्याओं को भोजन, वस्त्र, दान दक्षिणा दें। ऐसा करने से साधना पूर्ण सफल होती है, और संतान के ऊपर से समस्त ग्रह कोप एवं क्रूर ग्रहों के प्रभाव समाप्त हो जाते हैं।

छठी महोत्सव में सप्त मातृका पूजन कैसे किया जाता है ?-

पूजन की सजावट :

08 FACTS;-

1) एक पाटा लें। उसके नीचे ‘स्वस्तिक’ या ‘श्री’ की रंगोली बनाएँ क्योंकि यह मंगलचिन्ह हैं। पूजन की सजावट पाटे पर ही करें, चौरंग या टेबल पर न करें क्योंकि बड़ी माँ के समक्ष हम सब उसके बच्चे ही हैं। बालक पहला कदम पाटे की ऊँचाई तक ही उठा सकता है इसलिए पूजन की सजावट में पाटे का ही इस्तेमाल करें।

2) पाटे पर शाल/पीताम्बर/चादर बिछाएं। पाटे के इर्दगिर्द रंगोली से सजाएंगे तो भी चलेगा।

3) एक थाली में किनारे तक समतल गेहूं भरें।

4) उसमें बीचोबीच एक और उसके इर्दगिर्द 6 सुपारियां रखें।

5) पाटे पर थाली के दोनों तरफ दो नारियल रखें। नारियल को हल्दी कुमकुम लगाएं।

6) दोनों नारियल के अंदर की तरफ, थाली के समक्ष लाल अक्षताओं की राशि (ढेर) रखें। यह राशियां देवों के वैद्य अश्विनीकुमारों की पत्नियां हैं। यह सगी जुड़वा बहनें हैं और उनके नाम जरा और जीवंतिका हैं। यह दोनों अश्विनीकुमारों की तरह एकदूसरे के बिना नहीं रह सकतीं और यह दोनों छोटे बच्चों के साथ खेलती हैं, उनका लालन-पालन करती हैं, ऐसी धारणा है। बालक तीन महीने का होने तक जब जब हसता है, तब वह हसी बच्चे द्वारा इन दोनों को दिया हुआ प्रत्युत्तर होता है।

6-1-) जरा का अर्थ है बुढ़ापा देनेवाली। बच्चा बहुत बहुत वृद्ध होने तक जीए ऐसा वह आशीर्वाद देती है।

6-2-) जिवंतिका का अर्थ है बच्चे के जीवन के अंत तक उसके स्वास्थ्य का खयाल रखूंगी ऐसा आशीर्वाद देनेवाली।

7) पाटे पर चार दिशाओं में चार बीड़े रखें। उन पर एक एक सुपारी रखें। पूजन में बीड़ा रखने का अर्थ है भगवान को ‘आमंत्रित’ करना। बीड़ा-सुपारी से किया हुआ आमंत्रण किसी भी मंत्र के बिना किया हुआ आमंत्रण होता है। यह साक्षात आदिमाता के कात्यायनी स्वरूप ने कहा है। बीड़ा रखने से भगवान को आमंत्रण पहुँचता ही है क्योंकि यह कात्यायनी का संकल्प है।

8) थाली की पिछली तरफ थाली से टेककर सप्तमातृकाओं का फोटो रखें।

सप्तमातृका-पूजन विधि ;-

12 FACTS;-

1) यह पूजन सूर्योदय से सूर्यास्त के दौरान ही किया जाए। अमावस के दिन भी किया जा सकता है।

2) बच्चे के जन्म के बाद पहला पूजन बच्चे के पिता को ही करना है। पूजन करते हुए पिता बच्चे को, थोड़े समय के लिए ही सही, अपनी गोद में लेकर बैठे। यह पूजन बच्चे के जन्म के पश्चात तीन दिनों के बाद कभी भी किया जा सकता है।किसी कारणवश अगर बालक का पिता पूजन के समय उपलब्ध नहीं है तो पितामह (बालक के दादाजी) या मातामह (बालक के नानाजी) यह पूजन कर सकते हैं। मान लीजिए कि वे भी उपलब्ध नहीं हों तो रिश्तेदारों में से कोई भी नज़दीकी पुरुष यह पूजन करे।

3) पूजन के आरम्भ में सर्वप्रथम ’वक्रतुण्ड महाकाय……..’ यह श्लोक कहें।

4) उसके बाद गुरुक्षेत्रम्‌ मंत्र कहें और उसके बाद सद्गुरु का नाम जपना आवश्यक है।

5) बीडा सुपारी पर हल्दी, कुमकुम, अक्षता और तिलक लगाएं। कुमकुम गीला करके लगाएं। तत्पश्चात थाली में रखी हुई सुपारियों पर हल्दी, कुमकुम, अक्षता और तिलक लगाएं।

6) तत्पश्चात मातृवात्सल्यविन्दानम्‌ में से ‘नवमंत्रमाला स्तोत्रम’ का पाठ करते हुए पूजन करें।

7) स्तोत्र पाठ करते हुए गंधाक्षत पर सुगंधित फूल अर्पण करें। फूल सुपारियों पर, सप्तमातृकाओं की तस्वीर पर तथा जरा जीवंतिका के प्रतीकवाले अक्षताओं के राशियों पर अर्पण करें। अग्निकोण में दीवार पर घी की धार से सात बिन्दुओं को बनाकर गुड़ से एक में मिला देना चाहिए और नाम ले लेकर उनका आह्वान - पूजन करना चाहिए ।स्तोत्रपाठ करते हुए केवल पहले आवर्तन के समय ही फूल अर्पण करें।

8) तत्पश्चात दीप व धूप करें।

9) तत्पश्चात भोग की सात थालियां बनाएं और भोग अर्पण करें। साथ ही साथ गुड-खोपरे (आधा खोपरा) का भोग भी अर्पण करें।

10) भोग अर्पण करने के बाद अंत में सम्भव हो तो कमल के फूल अर्पण करें क्योंकि ‘कमल’ भगवान का पसंदीदा पुष्प है।

11)पूजन के बाद कम से कम 3 घंटों तक सजावट वैसे ही रखी रहे और उसके बाद आप कभी भी सजावट हटा सकते हैं। उस में से फूल और सुपारी का विसर्जन करें। गेहूं अपने घर में ही प्रसाद के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर सम्भव हो सके तो उस में से मुट्ठी भर गेहूं गाय को खिलाना अच्छा होता है। भोग हमेशा की तरह घर के आप्तजन प्रसाद के तौर पर ग्रहण करें। सप्तमातृकाओं की तस्वीर विसर्जन नहीं करनी है। वह तस्वीर घर में किसी भी सुरक्षित स्थान पर रखें। तस्वीर फ्रेम करके पूजाघर/घर के मंदिर में रखें।

12)बच्चा बड़ा होने के बाद यह पूजन माँ अपने बड़े बच्चे के लिए कर सकती है। इसके लिए उम्र का कोई बंधन नहीं है। आप अपने बच्चों का कितनी बार भी यह पूजन कर सकते हैं। उसके जन्मदिन पर, बच्चे की बीमारी दूर हो जाने पर करें, या किसी भी अन्य दिन करें। तभी यह पूजन माता-पिता अकेले अकेले या दोनों साथ मिलकर भी कर सकते हैं। इस तरह एक बार पूजन किया तो फिरसे करना ही चाहिए ऐसा भी नहीं है। बच्चे यदि एक से अधिक हैं तो प्रत्येक के लिए अलग अलग पूजन करना लाभदाई है।

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षोडश मातृका रहस्य;-

04 FACTS;-

1-किसी भी शुभ अवसरों या पर्व त्यौहारों पर एवं विशेषकर विवाह संस्कार में षोडश मातृकाओं, सप्तमातृकाओं एवं नवग्रह की स्थापना कर किए जा रहे कार्य की सफलता के लिए विशेष प्रार्थना की जाती हैं।विवाह जैसे पवित्र कर्म में इनके स्थापन और पूजन विधि विधान से करने पर निर्विघ्न रूप से आजोजन पूर्ण हो जाता हैं। किसी भी कार्य के निर्विध्न संपादन व संचालन के लिए भगवान गजानन के साथ ही षोडश मातृकाओं का स्मरण और पूजन अवश्य करना चाहिए।

2-इससे न केवल कार्य की सिद्धि होती है बल्कि उसका संपूर्ण फल भी प्राप्त होता है। षोडशमातृकाओं की स्थापना के लिए फर्श पर वृत्ताकार मंडल बनाया जाता है। इस आकृति में सोलह कोष्ठक (खाने) बनाए जाते हैं। पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा की ओर मातृकाओं की स्थापना की जाती हैं ।प्रत्येक कोष्ठक में अक्षत, जौ, गेहूँ रखें जाते हैं।

3-अनुष्ठान में अग्निकोण की वेदिका या पाटे पर सोलह कोष्ठक के चक्र की रचना कर उत्तर मुख या पूर्व मुख के क्रम से सुपारी व अक्षत पर क्रमश: इन 16 मातृकाओंकी पूजा का विधान है। ।

किसी भी देवी या देवता की पूजा में आह्वान का सबसे अधिक महत्व होता है क्योंकि उस देवी या देवता के आह्वान के बिना पूजा कार्य प्रारंभ नहीं होता है।पहले कोष्ठक में गौरी का आह्वान किया जाता है।

लेकिन गौरी के आह्वान से पहले भगवान गणेश के आह्वान की परंपरा है। गणेश का आह्वान पुष्प और अक्षत से किया जाता है। अन्य कोष्ठकों में मंत्र उच्चारित करते हुए आह्वान किया जाता हैं।

4-षोडशमातृका पूजन में महादेवियों का आह्वान और स्थापना के लिए मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।षोडशमातृकाओं के नाम है .....

गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, धृति, पुष्टि, तुष्टी एवं 'कुलदेवता', जो हरेक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होते है...

षोडशमातृकाओं का वर्णन ;-

1-माता गौरी ;-

यश, मंगल, सुख-सुविधा आदि व्यवहारिक पदार्थ तथा मोक्ष-प्रदान करना इनका स्वभाविक गुण है।

गौरी शरणगतवत्सला एवं तेज की अधिष्ठात्री देवी है।सूर्य में जो तेज है वह माता गौरी की कृपा से ही है।भगवान शंकर को सदा शक्ति संपन्न बनाए रखने में इनका महत्वपूर्ण योगदान है।

माता गौरी दु:ख, शोक, भय, उद्वेग को सदा के लिए नष्ट कर देती है।इसलिए देवी भागवत में कहा गया है कि बिना गौरी-गणेश की पूजा के कोई कार्य सफल नहीं हो सकता।

आराधना स्त्रोत:-

हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शंकरप्रियाम्। लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयम्यहम्।

2-माता पद्मा;-

पद्मा माता लक्ष्मी का ही रूप है। जब-जब भगवान कल्कि का अवतार ग्रहण करते हैं तब-तब माता लक्ष्मी का नाम पद्मा ही होता है। पद्मा का अविर्भाव समुद्र मंथन के पश्चात हुआ है। वह समस्त ऐश्वर्य, वैभव, धन-धान्य और समृद्धि को प्रदान करती हंै।इसलिए यह विष्णुप्रिया हमेशा कमल पर विराजमान रहती हंै। ्आराधना स्त्रोत-

पद्मापत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नम:। पद्मासनायै पदमिन्यै वैष्णव्यै च नमो नम:।।

3-माता शची ;-

ऋग्वेद के अनुसार विश्व में जितनी भी सौभाग्यशाली नारियां हैं उनमें शची सबसे अधिक सौभ्याग्यशालिनी हैं। इनके रूप से सम्मोहित होकर ही देवराज इन्द्र ने इनका वरण किया। शची पवित्रता में श्रेष्ठ और स्त्री जाति के लिए आदर्श हैं।रूप, यौवन का अभय वरदान प्राप्ति के लिए शची की आराधना श्रेयकर माना जाता है।

आराधना स्त्रोत- दिव्यरूपां विशालाक्षीं शुचिकुण्डलधारिणीम। रत्न मुक्ताद्यलडंकररां शचीमावाहयाम्यहम्।।

4- माता मेधा: -

मत्स्य पुराण के अनुसार यह आदि शक्ति प्राणिमात्र में शक्ति रूप में विद्यमान है। हममें जो र्णयत्मिका बुद्धि शक्ति है वह आदिशक्ति स्वरूप ही है। माता मेधा बुद्धि में स्वच्छता लाती है।

इसलिए बुद्धि को प्रखर और तेजस्वी बनाने एवं उसकी प्राप्ति के लिए मेधा का आह्वाहन करना चाहिए

आराधना स्त्रोत- वैवस्तवतकृत फुल्लाब्जतुल्याभां पद्मवसिनीम्। बुद्धि प्रसादिनी सौम्यां मेधाभावाहयाम्यहम्।।

5- माता सावित्री;-

सविता सूर्य के अधिष्ठातृ देवता होने से ही इन्हें सावित्री कहा जाता है।इनका आविर्भाव भगवान श्रीकृष्ण की जिह्वा के अग्रभाग से हुआ है।सावित्री वेदों की अधिष्ठात्री देवी है। संपूर्ण वैदिक वांडम्य इन्हीं का स्वरूप है। ऋग्वेद में कहा गया है कि माता सावित्री के स्मरण मात्र से प्राणी के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसमें ही अभूतपूर्व नई ऊर्जा के संचार होने लगता है।

आराधना स्त्रोत- ऊॅ हृीं क्लीं श्री सावित्र्यै स्वाहा।

6-माता विजया;-

विजया, विष्णु, रूद्र और सूर्य के श्रीविग्रहों में हमेशा निवास करती है। इसलिए जो भी प्राणी माता विजया का निरंतर स्मरण व आराधना करता है वह सदा विजयी होता है। आराधना स्त्रोत- विष्णु रूद्रार्कदेवानां शरीरेष्पु व्यवस्थिताम्। त्रैलोक्यवासिनी देवी विजयाभावाहयाभ्यहम।

7- माता जया;-

प्राणी को चहुं ओर से रक्षा प्रदान करने वाली माता जया का प्रादुर्भाव आदि शक्ति के रूप में

हुआ है। दुर्गा सप्तशती के कवच में आदि शक्ति से प्रार्थना की गई है कि-

''हे मां आप जया के रूप में आगे से और विजया के रूप में पीछे से मेरी रक्षा करें''।

आवाहन स्त्रोत: सुरारिमथिनीं देवी देवानामभयप्रदाम्। त्रैलोक्यवदिन्तां देवी जयामावाहयाम्यहम्।।

8-माता षष्ठी ;-

'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में छठ को स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत के इतिहास से जोड़ते हुए बताया गया है कि षष्ठी देवी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया। तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों के रक्षिका और संतान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी।लोक कल्याण के लिये माता भगवती ने अपना आविर्भाव ब्रह्मा के मन से किया है। अत: ये ब्रह्मा की मानस कन्या कही जाती है । ये जगत पर शासन करती है। ब्रह्मा की आज्ञा से इनका विवाह कुमार स्कन्द से हुआ। माता षष्ठी जिसे देवसेना भी कहा जाता है मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुई है। इसलिए इनका नाम षष्ठी देवी है। माता पुत्रहीन को पुत्र, प्रियाहीन को प्रिया- पत्नी और निर्धन को धन प्रदान करती हैं। विश्व के तमाम शिशुओं पर इनकी कृपा बरसती है। प्रसव गृह में छठे दिन, 21वें दिन और अन्नप्राशन के अवसर पर षष्ठी देवी की पूजा की जाती है।

आवाहन स्त्रोत :-

मयूरवाहनां देवी खड्गशक्तिधनुर्धराम्। आवाहये देवसेनां तारकासुरमर्दिनीम्।।

9-माता स्वधा ;-

पुराणों के अनुसार जबतक माता स्वधा का आविर्भाव नहीं हुआ था तब तक पितरों को भूख और प्यास से पीडि़त रहना पड़ता था। ब्रह्मवैवत्र्त पुराण के अनुसार स्वधा देवी का नाम लेने मात्र से ही समस्त तीर्थ स्नान का फल प्राप्त हो जाता है, और संपूर्ण पापों से मुक्ति मिल जाती है। यदि स्वधा, स्वधा, स्वधा, तीन बार उच्चारण किया जाए तो श्राद्ध, बलिवैश्वदेव और तर्पण का फल प्राप्त हो जाता है। माता याचक को मनोवंछित वर प्रदान करती है।

आराधना स्त्रोत:-

ब्रह्मणो मानसी कन्यां शश्र्वत्सुस्थिरयौवनाम्। पूज्यां पितृणां देवानां श्राद्धानां फलदां भजे।।

10-माता स्वाहा:-

मनुष्य द्वारा यज्ञ या हवण के दौरान जो आहुति दी जाती है उसे संबंधित देवता तक पहुंचाने

में स्वाहा देवी ही मदद करती है।इन्हीं के माध्यम से देवताओं का अंश उनके पास पहुंचता है।इनका विवाह अग्नि से हुआ है। अर्थात मनुष्य और देवताओं को जोडऩे की कड़ी का काम माता अपने पति अग्नि देव के साथ मिलकर करती हैं। इनकी पूजा से मनुष्य की समस्त अभिलाषाएं पूर्ण होती है।

आराधना स्त्रोत:-

स्वाहां मन्त्राड़्गयुक्तां च मन्त्रसिद्धिस्वरूपिणीम। सिद्धां च सिद्धिदां नृणां कर्मणां फलदां भजे।।

13-माता घृति;-

माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के प्रजापति पद से पदच्युत होने के पश्चात् उनके हित के लिए साठ कन्याओं के रूप में खुद को प्रकट किया। जिसकी पूजा कर राजा दक्ष पुन: प्रजापति हो गए। मत्स्य पुराण के अनुसार पिण्डारक धाम में आज भी देवी घृति रूप में विराजमान हंै। माता घृति की कृपा से ही मनुष्य धैर्य को प्राप्त करता हुआ धर्म मार्ग में प्रवेश करता है।

14- माता पुष्टि ;-

माता पुष्टि की कृपा से ही संसार के समस्त प्राणियों का पोषण होता है। इसके बिना सभी प्राणी क्षीण हो जाते हैं।

आवाहन स्त्रोत :-

पोषयन्ती जगत्सर्व शिवां सर्वासाधिकाम । बहुपुष्टिकरीं देवी पुष्टिमावाहयाम्यहम।।

15 -माता तुष्टि ;-

माता तुष्टि के कारण ही प्राणियों में संतोष की भावना बनी रहती है। माता समस्त प्राणियों का प्रयोजन सद्धि करती रहती हैं।

आवाहन स्त्रोत:-

आवाहयामि संतुष्टि सूक्ष्मवस्त्रान्वितां शुभाम्। संतोष भावयित्रीं च

रक्षन्तीमध्वरंं शुभम्।

16 -लोक माताएं/मातर:(मातृगण:) ;-

1-राक्षसराज अंधकासुर के वध के उपरांत उसके रक्त से उन्पन्न होने वालेे अनगिनत अंधक का भक्षण करने करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने अंगों से बत्तीस मातृकाओं की उत्पति की। ये सभी महान भाग्यशालिनी बलवती तथा त्रैलोक्य के सर्जन और संहार में समर्थ हैं । समस्त लोगों में विष्णु और शिव भक्तों की ये लोकमाताएं रक्षा कर उसका मनोरथ पूर्ण करती हैं। आवाहन स्त्रोत:-

आवाहये लोकमातृर्जयन्तीप्रमुखा:

शुभा:। नानाभीष्टप्रदा शान्ता: सर्वलोकहितावहा:।। आवाहये लोक मातृर्जगत्पालन संस्थिता:। शक्राद्यैरर्चिता

देवी स्तोत्रैराराधनैरतथा।

2-मातर:(मातृगण:)... शुम्भ- निशुम्भ के अत्याचारों से जब समस्त जगत त्राहिमाम कर रहा था तब देवताओं की

स्तुति से प्रसन्न होकर माता जगदंबा हिमालय पर प्रकट हुई। इनके रूप- लावन्य को देखकर राक्षसी सेना मोहित हो गई और एक-एक कर घूम्रलोचन, चंड-मुंड, रक्त- वीज समेत निशुम्भ और शुम्भ माता जगदंबा के विभिन्न रूपों का ग्रास बन गये और समस्त लोको में फिर दैवीय शक्ति की स्थापना हुई। अत: माता अपने अनुयायियों की रक्षा हेतु जब भी आवश्यकता होती है तब- तब प्रकट होकर तमाम राक्षसी प्रकृति से उनकी रक्षा करती हैं।

आवाहन स्त्रोत:-