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जब कभी कोई ध्यान में भिन्न-भिन्नप्रकाश की आकृतियां व रंग अनुभव करता है जैसे कि लाल, पीला, नीला, गेरु


प्रकाश स्वयं रंगहीन है। सारे रंग प्रकाश के हैं, परंतु प्रकाश का कोई रंग नहीं है। प्रकाश मात्र रंगों का अभाव है। प्रकाश सफेद है। सफेद कोई रंग नहीं होता। जब प्रकाश विभाजित किया जाता है, विश्लेषित, किया जाता है अथवा प्रि म में से गुजारा जाता है, तो वह सात रंगों में बंट जाता है। मन भी प्रि म की तरह ही काम करता है-एक आंतरिक प्रि म की भांति। बाहर का प्रकाश यदि प्रि म में से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है। आंतरिक प्रकाश भी यदि मन से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है। इसलिए आंतरिक यात्रा में रंगों का अनुभव हो, तो इसका मतलब है कि आप अभी भी मन में ही है। प्रकाश का अनुभव मन से अतीत है, किंतु रंगों का अनुभव मन के भीतर है। यदि आपको अभी भी रंग ही दिखलाई पड़ते हैं, तो आप अभी मन में ही हैं। मन का अतिक्रमण अभी नहीं हुआ। इसलिए, पहली बात जो स्मरण रखने की है, वह यह है कि रंगों का अनुभव मन के भीतर ही है, क्योंकि मन प्रि म की तरह काम करता है, जिसमें से कि आंतरिक प्रकाश को बांटा जा सकता है। इसलिए सब से पहले कोई रंगों को अनुभव करना प्रारंभ करता है। फिर रंग विलीन हो जाते हैं और केवल प्रकाश ही रह जाता है। प्रकाश सफेद होता है। सफेद कोई रंग नहीं है। जब सारे प्रकाश एक हो जाते हैं, जब सारे रंग एक हो जाते हैं, तब सफेद निर्मित होता है। जब सारे रंग मौजूद हों-अविभाजित, तब आप सफेद का अनुभव करते हैं। जब कोई रंग न हो, तब आप काले का अनुभव करते हैं। काला व सफेद दोनों की रंग नहीं है। जब काई रंग नहीं है, तब काला होता है। जब सारे रंग उपस्थित हों अविभा य तो फिर सफेद है। और बाकी सारे रंग केवल विभाजित प्रकाश हैं। इसलिए यदि आप भीतर रंगों को अनुभव करते हैं, तो फिर आप मन में हैं। अतः रंगों का अनुभव मानसिक है, वह आध्यात्मिक नहीं है। प्रकाश का अनुभव आध्यात्मिक है, किंतु रंगों का नहीं, क्योंकि जब मन नहीं है तो आप रंगों का अनुभव नहीं कर सकते। तब केवल प्रकाश का अनुभव होता है। दूसरी बात, रंगों की कोई निश्चित श्रंखला नहीं है। हो भी नहीं सकती, क्योंकि प्रत्येक मन भिन्न है। किंतु प्रकाश का अनुभव बिल्कुल एक जैसा है। प्रकाश का अनुभव चाहे बुद्ध करते हों, चाहे जीसस, अनुभव वही है। वह भिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि वह जो कि भेद निर्मित करता था, अब नहीं है। मन ही भेद निर्मित करता है। हम यहां हैं, हम सब अलग-अलग हैं-हमारे मनके कारण। यदि मन हनीं है तो वह जो कि बांटता है जो कि भिन्नता पैदा करता है, नहीं है। इसलिए प्रकाश का अनुभव एक जैसा है, किंतु रंगों का अनुभव भिन्न-भिन्न है और श्रंखला भी भिन्न है। इसीलिए, प्रत्येक धर्म में अलग-अलग श्रंखला दी गई है। कोई विश्वास करते हैं कि यह रंग पहले आता है और वह रंग आखिर में आता है। दूसरे बिल्कुल ही अलग विश्वास करते हैं। वह भेद वस्तुतः मनों का भेद है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो कि भयभीत है, जो कि गहराई से जड़ों तक भयातुर है, वह पीले रंग का सबसे पहले अनुभव करेगा। पहला जो रंग आएगा वह पीला होगा, क्योंकि पीला मृत्यु का रंग है-प्रतीकात्मक रूप से नहीं, वरन वस्तुतः भी। यदि आप तीन बोतलें लें-एक लाल, एक पीली, और एक सफेद बिना किसी रंग की-और इसमें खाली पानी भर दें, तो पीले रंग की बोतल का पानी सब से पहले सड़ेगा, फिर बाद में दूसरी बोतलों का सड़ेगा। लाल रंग की बोतल का पानी सबसे अंत में सड़ेगा। पीला मृत्यु का रंग है। इसीलिए बुद्ध ने अपने भिक्षुओं के लिए पीले रंग के वस्त्र चुने, क्योंकि बुद्ध कहते हैं कि इस अस्तित्व से बिल्कुल मर जाना ही निर्वाण है। इसलिए पीला रंग मृत्यु-रंग की तरह चुना गया। हिंदुओं ने अपने संन्यासियों के लिए गेरुए रंग को चुना जो कि लाल का ही शेड (प्रकार) है, क्योंकि लाल अथवा गेरुआ प्रकाश का रंग है, जो कि पीले के विपरीत है। यह आपको अधिक जीवंत, अधिक चमकीला होने में मदद करता है। यह यादा ऊर्जा पैदा करता है-प्रतीकात्मक रूप से नहीं बल्कि वास्तव में, भौतिक रूप से वह रासायनिक रूप से नहीं बल्कि वास्तव में, भौतिक रूप से व रासायनिक रूप से भी। इसलिए जो व्यक्ति यादा शक्तिशाली जीवंत व जीवन के प्रति अधिक प्रेम से भरा हो, वह सर्वप्रथम लाल रंग का अनुभव करेगा, क्योंकि उसका मन लाल के प्रति यादा खुला होगा। एक भय-केंद्रित व्यक्ति पीले के प्रति यादा खुला होगा। इसलिए श्रंखला भिन्न-भिन्न होगी। एक बहुत शांत आदमी, जो कि बहुत कुछ स्थिर है वह नीले रंग का सर्वप्रथम अनुभव करेगा। अतः यह सब निर्भर करेगा मन की वृत्ति पर, स्थिति पर। कोई निश्चित श्रंखला नहीं है, क्योंकि तुम्हारे मन की कोई निश्चित श्रंखला नहीं है। प्रत्येक चित्त भिन्न है अपने केंद्र में, अपनी प्रवृत्तियों में, अपनी बनावट में, अपने चरित्र में। प्रत्येक मन अलग-अलग है। इन भिन्नताओं के कारण, श्रंखला भी भिन्न होगी। किंतु एक बात तय है कि प्रत्येक रंग का एक निश्चित अर्थ है। श्रंखला निश्चित नहीं है; वह हो भी नहीं सकती। लेकिन रंग का अर्थ निश्चित है। उदाहरण के लिए, पीला मृत्यु का रंग है। इसलिए जब कभी वह पहला हो, तो उसका अर्थ होता है कि आप भय-केंद्रित व्यक्ति हैं। आपके मन का प्रथम द्वार भय के लिए है। अतः आप जब भी चल रहे होंगे, तो पहली चीज जो आपके ध्यान में आएगी वह भय होगा, अथवा आपके मन की पहली प्रतिक्रिया जो कि किसी भी नई स्थिति में होगी, वह भय की होगी। जब कभी कुछ भी विचित्र होगा, तोप्रथम संवेदन उसके प्रति भयपूर्ण होगा। यदि लाल रंग प्रथम है आपकी अंतर्यात्रा में, तो आप जीवन के प्रति अधिक प्रेम से भरे हैं, और आपकी प्रतिक्रियाएं भिन्न होंगी। आप अधिक जीवंत होंगे, और आपकी प्रतिक्रियाएं जीवन के प्रति अधिक सहमति की होंगी। एक व्यक्ति जिसका कि प्रथम अनुभव पीले का है, वह प्रत्येक चीज की मृत्यु के अर्थों में विवेचना करेगा, और जो व्यक्ति लाल रंग का प्रथम अनुभव करेगा, वह सदैव अपने अनुभवों को जीवन के अर्थों में बतलाएगा। यहां तक कि यदि एक आदमी मर भी रहा हो, तो भी वह सोचेगा कि वह कहीं न कहीं फिर से पैदा होगा। मृत्यु में भी वह पुनर्जन्म की विवेचना करेगा। परंतु जिस व्यक्ति का पहला अनुभव पीले का होगा, यदि कोई जन्म भी ले रहा होगा, तो भी वह सोचने लगेगा कि वह एक दिन मर रहो होगा। ये रुख होंगे। अतः लाल रंग-केंद्रित व्यक्ति मृत्यु में भी प्रसन्न रह सकता है, किंतु पीला रंग-केंद्रित व्यक्ति जन्म में भी प्रसन्न नहीं हो सकता। वह निषेधात्मक होगा। भय निषेधात्मक भाव है। सब जगह वह कुछ न कुछ ऐसा खोज लेगा, जो कि उदासीनता पूर्ण व निषेधात्मक हो। उदाहरण के लिए, जैसे मैंने कहा कि एक बहुत शांत व्यक्ति नीले रंग का अनुभव करेगा, किंतु इसका अर्थ है एक शांत व्यक्ति जो कि साथ ही निष्क्रिय भी है। एक और शांत व्यक्ति जो कि साथ ही सक्रिय भी है, वह हरे रंग का अनुभव पहले करेगा। मोहम्मद ने अपने फकीरों के लिए हरे रंग का चुनाव किया। इस्लाम का प्रतीकात्मक रंग हरा है। वह उनके झंडे का रंग है। हरा दोनों हैः शांत, स्थिर, किंतु सक्रिय भी। नीला शांत है, परंतु निष्क्रिय। अतएव इसलिए लाओत्सू जैसा व्यक्ति नीला रंग सबसे पहले अनुभव करेगा। एक मोहम्मद की तरह का व्यक्ति सबसे पहले हरे रंग का अनुभव करने लगेगा। इसलिए रंगों का प्रतीकात्मक ढंग एक निश्चित चीज है, किंतु श्रंखला निश्चित नहीं है। एक और बात भी ख्याल में रखनी है और वह है सात रंग शुद्ध रंग हैं। किंतु आप दो को या तीन रंगों को मिला सकते हैं और एक नया रंग उससे निकल सकता है। इसलिए ऐसा हो सकता है कि आपकोप्रारंभ में शुद्ध रंग का अनुभव न हो। आप दो, तीन या चार रंगों का मिश्रण अनुभव कर सकते हैं। फिर यह आपके मन पर निर्भर करता है। यदि आपका मन बहुत यादा उलझन से भरा है, तो आपका यह उलझाव रंगों में दिखलाई पड़ेगा। अभी पश्चिमी मनोविज्ञान में मनोविदों ने रंग-परीक्षण की विधि बताई है और वह बहुत अर्थपूर्ण सिद्ध हो रही है। आपको रंग दे दिए जाते हैं और फिर उनमें से अपनी पसंद के अनुसार पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा रंग चुनने को कहा जाता है और यह बहुत कुछ बतलाता है। यदि आप सच्चे व ईमानदार हैं, तो यह आपके मन के बाबत कुछ खबर देता है, क्योंकि आप बिना आंतरिक कारण के चुनाव नहीं कर सकते। यदि आप प्रथम पीला चुनते हैं, तो लाल अंतिम होगा। यह उनका अपना तर्क है। यदि मृत्यु (रंग) आपका प्रथम है तो जीवन आपका अंतिम होगा। और आप लाल को अंत में रखेंगे। और जो कोई लाल कोप्रथम चुनेगा, वह अपने आप ही पीले को अंतिम चुनेगा। और वह जो क्रम होगा, वह मन की बनावट को बतलाएगा। परंतु आपको बार-बार अवसर दिया जाता है कि आप एक बार, दो बार, तीन बार चुनाव करें। और यह बड़ा विचित्र हैः पहली बार आप पीले का चुनाव प्रथम करते हैं। दूसरी बात फिर आपको वे ही कार्ड दिए जाते हैं। परंतु आप पीले कोप्रथम नहीं चुनते और तीसरी बार आप कुछ और ही चुन लेते हैं और तब सारी श्रंखला ही बदल जाती है। इसलिए सात बार कार्ड दिए जाते हैं। यदि कोई आदमी सातों बार पीले को ही चुनता चलता जाता है, अपनी प्रथम पसंदगी की तरह तो फिर यह एक बहुत निश्चित मन को दर्शाता है-बहुत कुछ स्थिर-तय। यह आदमी बराबर भय में डूबा रहता है। यह बहुत प्रकार के भयों में रह रहा होगा, क्योंकि उसके समक्ष हर चीज भयप्रद रूप ले लेगी। किंतु उसे पुनः सात बार कार्ड चुनवा करने को दिए जाएं और अब वह बदल जाता है कि एक बार नीला, एक बार हरा और फिर कुछ और तो फिर दोधाराएं हैं। एक रंगा को ही सात की पहली धारा में सात बार चुना गया और दूसरी धारा में हर बार अलग-अलग रंग चुने गए, यह भी बहुत कुछ बतलाता है। यदि दूसरी धारा में वह दोबारा एक ही रंग प्रथम पसंद की तरह नहीं दोहराता है तो वह यह बतलाता है कि वह बहुत डांवांडोल आदमी है और निश्चित होकर उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उसके बारे में पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। धारा भी बदल जाती है, क्योंकि उसका मन निरंतर बदलता रहता है। अभी-अभी, एल एस डी्, मारीजुआना और इस तरह के दूसरे नशीले पदार्थों की वजह से बहुत-सी बातें अचेतन मन से ऊपर आई हैं। जब आल्डुअस हक्सले ने एल एस डी के साथ स्वयं के अनुभव कहे, तो उसने बतलाया कि जैसे वह स्वर्ग में पहुंच गया। प्रत्येक चीज बहुत सुंदर रंगीन, कल्पनाजन्य, और काव्यात्मक थी। उसमें कुछ भी तो बुरा नहीं था। उसमें कुछ भी दुःस्वप्न जैसा-कुछ भी भयपूर्ण या मृत्यु के जैसा नहीं था। हर चीज जीवंत थी, भरपूर जीवंत व समृद्ध। किंतु जब जेहनर ने उसे लिया तो वह नरक में प्रवेश कर गया। उसी एल एस डी से वह नरक में प्रवेश कर गया और वह एक लंबा दुःस्वप्न था जो कि भय से भरा हुआ था। दोनों ने अपने-अपने अनुभवों को बतलाया है। आल्डुअस हक्सले ने कहा कि यही एल एस डी का गुण है और स्वर्ग का अनुभव एल एस डी की वजह से हुआ है। जेहनर ने हक्सले के बिल्कुल ही विपरीत बात कही और उसने कहा कि यह मात्र एक दुःस्वप्न है, एक गहन भय। किसी को भी इसमें नहीं जाना चाहिए। यह पागल कर सकती है। परंतु दोनों की विवेचना एक समान बात बतलाती है कि यह एल एस डी ही वह वस्तु है, जिसके कारण से यह अनुभव हुआ है। वास्तविकता बिल्कुल भिन है। एल एस डी सिर्फ एक कैटेलिटिक एजेंट की तरह से कार्य करती है। एल एस डी को स्वर्ग निर्मित नहीं कर सकती; एल एस डी किसी नरक का भी निर्माण नहीं कर सकती। एल एस डी तो सिर्फ आपको उघाड़ सकती है, और जो कुछ भी आपके भीतर छिपा है, प्रक्षेपित हो जाता है। इसलिए यदि जेहनर का अनुभव रंगहीन है, तो जेहनर के अपने मन के कारण है। और यदि हक्सले का अनुभव रंगपूर्ण है, तो वह हक्सले के मन के कारण है। एल एस डी तो सिर्फ आपको अपने मन की आंतरिक खबर देती है। वह आपके अपने मन की गहरी पर्तों को खोल सकती है। यदि आपके भीतर बहुत दबाया गया अचेतन मन है, तो आप नरक में प्रवेश कर सकते हैं; और यदि आपके पास कुछ भी दमित नहीं है, एक सहज मन है तो आप स्वर्ग में प्रवेश कर जाते हैं। परंतु यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पास किस तरह का मन है। जब कोई आंतरिक यात्रा पर जाता है, तो वही बात होती है। जो कुछ आपके समक्ष प्रकट होता है, वह आपका ही मन होता है। इसे याद रखें कि जो कुछ भी आप देखते हैं, वह आपका ही मन होता है। रंग पर श्रंखला भी आपके अपने मन की श्रंखला ही है। किंतु रंगों के पार जाना होता है। कुछ भी क्रम क्यों न हो, उसके पार जाना ही पड़ता है। इसलिए एक बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए कि रंग केवल मानसिक हैं। वे बिना मन के नहीं हो सकते मन ही है जो प्रि म की तरह काम कर रहा होता है। जब आप मन के पार जाते हैं, तोप्रकाश होता है-बिना किसी रंग के, बिल्कुल सफेद। और जब यह सफेदपन होने लगे, तभी समझें कि आप मन के पार जाने लगे। जैनों ने अपने साधुओं व साध्वियों के लिए सफेद रंग चुना, और यह चुनाव अर्थपूर्ण है। जैसे कि बौद्धों ने पीला और हिंदुओं ने गेरुआ चुना, जैनों ने सफेद चुना, क्योंकि वे कहते हैं, जब सफेद शुरू होता है, तभी केवल अध्यात्म का प्रारंभ होता है। मोहम्मद ने हरा रंग चुना, क्योंकि उन्होंने कहा कि यदि शांति मृत है, तो फिर अर्थहीन है। शांति को सक्रिय होनी चाहिए। उसे तो जगत में भाग लेना चाहिए। इसलिए एक साधु को सिपाही भी होना चाहिए। अतएव मोहम्मद ने हरा चुना। सारे रंग अर्थपूर्ण है। एक सूफी परंपरा है जो कि काले का इस्तेमाल करता हैं-काले कपड़े काम में लाता है अपने फकीरों के लिए। काला भी बहुत ही अर्थपूर्ण है। यह अभाव बतलाता है-कोई रंग नहीं। सब कुछ गैर-हाजिर है। यह सफेद का बिल्कुल उलटा है। सूफी कहते हैं कि जब तक हम बिल्कुल ही अनुपस्थित न हो जाएं, परमात्मा हमारे लिए उपस्थित नहीं हो सकता। इसलिए काले की तरह होना चाहिए-बिल्कुल गैर-हाजिर, कुछ नहीं होना, न कुछ हो जाना, एक शून्य की भांति। इसलिए, उन्होंने काले रंग को चुना। इसलिए काले की तरह होना चाहिए-बिल्कुल गैर-हाजिर, कुछ नहीं होना, न कुछ हो जाना, एक शून्य की भांति। इसलिए, उन्होंने काले रंग को चुना। रंग बड़े महत्वपूर्ण हैं। आप जो कुछ भी चुनते हैं, उससे बहुत कुछ पता चलता है। यहां तक कि आपके कपड़े भी बहुत कुछ संकेत करते हैं। कुछ भी सांयोगिक नहीं है। यदि आपने अपने कपड़ों के लिए कोई खास रंग चुना है, तो वह संयोगिक नहीं है। आपको भले ही पता न हो कि आपने वह रंग क्यों चुना, परंतु विज्ञान को पता है और वह बहुत कुछ बतलाता है। आपके कपड़े बहुत कुछ बतलाते हैं, क्योंकि वे आपके मन के हिस्से हैं और आपका मन चुनाव करता है। आप बिना अपने मन के झुकाव के, कुछ आदतों के, कुछ भी चुन नहीं सकते। इसलिए श्रंखला भिन्न होगी, किंतु सारी श्रंखलाएं और सारे रंग आपके मन से संबंधित हैं। इसलिए उनकी यादा परवाह न करें। जो भी रंग प्रतीत हो बस गुजर जाए उससे, उसे पकड़ें नहीं। उसको पकड़ रखना प्राकृतिक स्वभाव है। यदि कोई सुंदर रंग नजर आता है, तो हम फौरन उससे चिपक जाते हैं। ऐसा न करें। नहीं। इसे स्मरण रखें कि रंग मन से संबंधित। और यदि कोई रंग भयपूर्ण है, तो कोई उससे लौट सकता है, ताकि वह अनुभव में न आए। यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि आप वापस लौट जाते हैं तो कोई रूपांतरण संभव नहीं है। उससे गुजर जाएं। कोई रंग चाहे भयपूर्ण, बदसूरत, अराजक, सुंदर या लयबद्ध जो कुछ भी क्यों न हो, उसके पार चले जाएं। आपको उस बिंदु को पहुंच जाना है, जहां कि रंग नहीं हैं वरन खाली प्रकाश बच रहता है। उस प्रकाश में प्रवेश ही अध्यात्म है, उसके पहले कुछ भी नहीं।

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ध्यान में, आंतरिक प्रकाश की प्रतीति के लिए कौन-कौन सी भौतिक व साइकिक (आत्मगत) बातें आवश्यक हैं, और कैसे कोई उनमें प्रगति कर सकता है?

तीन बातें याद रखने जैसी हैंः प्रथम, कि आप सचेतन रूप से ट्जिंदगी के प्रति निराश हों-सचेतन रूप से निराश। हम सब निराश हैं, परंतु अचेतन रूप से। और जब कभी हम अचेतन रूप से निराशा होते हैं, तो हम अपनी कामनाओं की चीजें बदल लेते हैं। किंतु एक वस्तु को दूसरी से बदल लेना आपको भीतर जाने में मदद नहीं करता। आप बाहर ही बने रहते हैं। आप एक वस्तु को दूसरी से बदल लेते हैं और फिर तीसरी से। चूंकि आप अ से निराश हो गए हैं, इसलिए आप अपनी इच्छा को ब से भर लेते हैं। फिर आप ब से भी निराश हो जाते हैं, तो आप स के पास चले जाते हैं। आप वस्तुएं बदलते रहते हैं क्योंकि आप केवल अचेतन रूप से निराश हैं। यदि आप सचेतन हो जाएं, तो फिर आप वस्तुएं नहीं बदलेंगे; फिर आप दिशा ही बदलेंगे। मैं सोचता हूं कि ‘अ’ ठीक नहीं है और कदाचित ‘ब’ ठीक हो, इसलिए मैं ‘ब’ को चुनता हूं। तब फिर ‘ब’ भी ठीक नहीं है, और हो सकता है, ‘स’ ठीक हो, अतः मैं ‘स’ को चुन लेता हूं। यह अचेतन निराशा है। यदि आप सचेतन हो जाएं तो फिर वह प्रश्न अ, ब, और स का नहीं होता। तब यह प्रश्न संबंधों का है, उस आशा का है, उस कामना का है। यह कामना कि आप किसी और से सुख ले सकते हैं, यही मूल जड़ है। आप व्यक्ति बदलते चले जाते हैं, किंतु यह दिशा कभी नहीं बदली जाती। जब मैं कहा हूं कि सचेतन रूप से निराश होओ, तो मेरा मतलब है कि इसे भली-भांति जान लो कि व्यक्ति असंगत है। जब तक कि आप अपनी दिशा ही न बदलें, सुख की तलाश से कुछ भी नहीं हो सकता। अतः दो रास्ते हैंः या तो अ वस्तु को ब वस्तु से बदल लो अथवा अ दिशा को‘ब’ दिशा से बदल लो। ‘अ’ बाहर जाने का मार्ग है, ‘ब’ भीतर जाने का रास्ता है। अतः मार्ग ही बदल लें। दिशा बदल कर आप स्वयं को बदलने लगते हैं। वस्तुओं को बदल कर आप वही के वही रहते हैं। मैं सालों तक, जीवनों के बाद जीवनों तक चीजों को बदलता रह सकता हूं। मत्त वही का वही रहूंगा और हर वस्तु के साथ, चूंकि मैं वही का वही हूं, इसलिए परिणाम भी वही होने वाला है, वही दुःख फिर घटित होने वाला है। जब मैं कहता हूं कि सचेतन रूप से निराश हों, तो मेरा मतलब है दूसरों से निराश न हों। स्वयं से ही निराश हो जाएं, अपने से हताश हो जाएं। तभी केवल दिशा बदली जा सकती है। हम सब एक दूसरे से निराश हैं। पति निराश है पत्नी से, पत्नी निराश है पति से, और बेटा बाप से निराश है, और बाप बेटे से निराश है। प्रत्येक दूसरे से निराश हैं। यह बाहर जाता हुआ मन है। स्वयं अपने में ही निराश हो जाएं और तब दिशा परिवर्तित हो जाती है। आप भीतर जाने लगते हैं। और जब तक आप स्वयं से निराश नहीं हो जाते, तब तक रूपांतरण की कोई संभावना नहीं। एक बुद्ध वस्तुतः संसार से निराश नहीं है। यदि वे संसार से निराश हैं, तो फिर उन्हें दूसरा संसार प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। वे वस्तुतः स्वयं से निराश हैं, इसलिए वे अपने को ही बदलने में लग जाते हैं। निराशा का विषय ही रूपांतरण का बन जाता है। इसलिए आंतरिक यात्रा प्रारंभ होती है, अंतर की खोज शुरू होती है, जब आप यह अनुभव करने लगते हैं कि बाहर कुछ और नहीं है बल्कि सिर्फ अंधकार है। और जब तक आप अपनी दृष्टि भीतर की ओर नहीं मोड़ते, प्रकाश नहीं मिलता। अतः पहली बातः सचेतन रूप से निराश हों। किंतु इतना ही काफी नहीं है। यह अनिवार्य है, किंतु पर्याप्त नहीं, क्योंकि आप स्वयं से निराश हो सकते हैं और अपने विचार में ही जीते चले जा सकते हैं। तब आप एक जिंदा लाश की भांति होंगे। आप सिर्फ मृत होंगे-स्वयं के लिए एक बोझ। यह अनिवार्य है, किंतु पर्याप्त नहीं। दूसरी बात जो कि जानने जैसी है वह यह है कि जो कुछ भी आप हैं, वह सब कुछ आप अपने ही कारण हैं। हम कहते हैं कि ‘मैं ऐसा-ऐसा हूं भाग्य के कारण, उस दिव्य स्रष्टा के कारण, प्रकृति की शक्तियों के कारण, वंशपरंपरा के कारण, वातावरण के कारण, समाज के कारण। जो कुछ भी मैं हूं, मैं सदैव ही किसी और के कारण हूं।’ वह स्वर्ग में बैठे परमात्मा के कारण हो सकता है अथवा जैविकशास्त्र की किताबों के अनुसार वंश-परंपरा के कारण हो सकता है, अथवा वह समाज के कारण हो सकता है, अथवा साम्यवादियों के कारण हो सकता है, अथवा वह फ्रायड के अनुसार बचपन की व्यवस्था के कारण हो सकता है, परंतु सदैव कुछ अन्य ही कारण है। आप स्वयं जिम्मेवार नहीं हैं। समाज कारण बदलता चला जाता है। कभी कारण परमात्मा होता है, तब आप आराम से होते हैं। तब आप जो कुछ भी हैं, आप कुछ भी नहीं कर सकते। फिर कभी कर्मों के कारण से हैं; अतीत के कर्म जिन्होंने कि आपको निर्मित किया जैसे कि आप है, और ‘कुछ भी नहीं किया जा सकता।’ फिर साम्यवाद कहता है कि समाज कारण है। साम्यवाद कहता है कि चेतना समाज को निर्मित नहीं करती, इसके विपरीत समाज चेतना को निर्मित किया है। अब आप पुनः बच्चे नहीं हो सकते, और वे सात वर्ष अब बदले नहीं जा सकते। अतः जो कुछ भी आप हैं, हैं। यादा से यादा, मनोविश्लेषण से आप अपने साथ तालमेल बैठा कर सकते हैं। आप ‘सब ठीक है’-ऐसा महसूस कर सकते हैं। अब कुछ भी नहीं किया जा सकता, और ‘मैं जैसा हूं, वैसा हूं।’ आप फिर नीचे गिरने लगते हैं। आप स्वयं से निराश हो सकते हैं; यह निषेधात्मक हिस्सा है। विधायक बात दूसरी है कि जो कुछ भी आप हैं, उसके लिए आप ही जिम्मेवार है। समाज ने भले ही अपना पार्ट अदा किया हो, और यहां तक कि भाग्य ने भी अपना काम पूरा किया हो, और बचपन ने भी अपना पार्ट निभाया हो, किंतु अंततः जिम्मेवार आप ही है। यह अनुभूति, ऐसा अनुभव ही सारे धर्मों की बुनियाद है। इसलिए यदि फ्रायड के मानने वाले जीत जाएं, अथवा मार्क्स के मानने वाले जीत जाएं, तोधर्म विलीन हो जाएगा, क्योंकि धर्म की बुनियाद ही इस संभावना पर निर्भर है कि आप बदल सकते हैं, उसकी संभावना है कि आप स्वयं को रूपांतरित कर सकते हैं। और यह संभावना इस भावना पर निर्भर करती है कि आप अपने लिए जिम्मेवार हैं या नहीं। यदि मैं मेरे कोषों द्वारा जाना जाता हूं, वंश-परंपरा के द्वारा निर्मित किया जाता हूं, तो फिर मैं क्या कर सकता हूं? मैं अपने जीव-कोष्ठों को नहीं बदल सकता। वह संभव ही नहीं है। और यदि मेरे जीव-कोष्ठों में बिल्ट-इन-प्रोग्राम, पूर्व-निश्चित-कार्यक्रम मौजूद है, तो वे फिर खुलते चले जाएंगे। फिर उसमें मैं क्या कर सकता हूं? और यदि परमात्मा ने पहले से तय कर लिया है, तो उसमें मैं क्या कर सकता हूं! और फिर इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि वह परमात्मा है, या बायो-सेल्स हैं, या वंश परंपरा है, या बचपन है। बुनियादी बात यह है कि यदि आप अपनी जिम्मेवारी किसी और पर रख देते हैं-किसी क, ख, ग पर, तो फिर आप भीतर की यात्रा नहीं कर सकते। अतः दूसरी बातः स्मरण रखें, जो कुछ भी आप हैं-यदि आप कामुक हैं, तो आप जिम्मेवार हैं। यदि आप क्रोधी हैं, यदि आप भयभीत हैं-यदि भय ही आपका मुखय चारित्रिक गुण है, तो भी आप ही जिम्मेवार हैं। बाकी सब चीजों ने भले ही अपना पार्ट अदा किया हो, किंतु वह पार्ट ही है, और वह पार्ट तभी पूरा किया जा सकता है, जब आपने उसमें सहयोग दिया हो। और यदि आप अपना सहयोग इसी क्षण काट दें, तो आप दूसरे ही आदमी हो जाएंगे। इसलिए दूसरी विधायक बात जो कि निरंतर ध्यान में रखनी है, वह यह है कि जो कुछ भी आप हैं उसके लिए आप जिम्मेवार हैं। यह मुश्किल है। विषाद को अनुभव करना आसान है। यहां तक कि स्वयं से निराश होना भी कठिन नहीं है। परंतु यह अनुभव करना कि ‘जो कुछ मैं हूं, उसके लिए मैं ही जिम्मेवार हूं’ बड़ा कठिन है-बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि तब कोई बचने की राह नहीं है, कोई बहाना नहीं है। यह एक बात है। और दूसरी बातः जो कुछ भी मैं हूं, यदि मैं ही जिम्मेवार हूं तो यदि मैं नहीं बदलता हूं तो उसके लिए भी मैं ही जिम्मेवार हूं। यदि मैं रूपांतरित नहीं हो रहा हूं, तब कोई और नहीं, मैं ही दोषी हूं। इसीलिए हम कितने ही सिद्धांतों को निर्मित करते हैं-अपने स्वयं के दायित्वों से बचने के लिए। दायित्व ही आधार है समस्त धार्मिक रूपांतरण के लिए। आपने किसी को कहते हुए सुना होगा कि परमात्मा में विश्वास ही धर्म का आधार है। वह सत्य नहीं है। कोई बिना किसी परमात्मा के भी धार्मिक हो सकता है। और कोई सारे परमात्माओं के साथ भी अधार्मिक हो सकता है। कोई कहता है कि पुनर्जन्म ही आधार है धर्म के लिए। वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि आप पुनर्जन्म में विश्वास करते चले जा सकते हैं और आपके जीवन का समय लंबा हो सकता है, किंतु कैसे और अधिक लंबे समय के कारण आप धार्मिक हो सकते हैं? समय आपके धार्मिक होने के लिए कोई कारण नहीं है। आप शाश्वत हो सकते हैं। कैसे वह आपकोधार्मिक बनाने में सहायक हो सकता है? नहीं वास्तविक बात, सब धर्मों की आधारशिला दायित्व के इसी अनुभव पर रखी गई है, कि अपने लिए आप ही जिम्मेवार है। तब अचानक आपके भीतर कुछ खुलता है। यदि दायित्व आपका है, तो फिर आप बदल सकते हैं। इस बात के साथ आप भीतर प्रवेश कर सकते हैं। अतः अपने प्रति निराशा से भर जाएं। नीत्शे ने कही कहा है, बड़े ही सुंदर ढंग से कि ‘वह दिन महामृत्यु का होगा जिस दिन कि कोई भी अपने प्रति निराशा से नहीं भरा होगा, क्योंकि तब आगे विकास के लिए कोई संभावना नहीं होगी।’ लेकिन मुझे इतना और जोड़ने दें; यदि प्रत्येक निराशा अनुभव करता हो, किंतु कोई और उसके लिए जिम्मेवार न हो, तो वह दिन उससे भी बड़ा महामृत्यु का होगा। विषाद निषेधात्मक है। दायित्व का अनुभव विधायकता से करें, और तब आप बहुत शक्तिप्राप्त करते हैं। जिस क्षण भी आप यह जानते हैं कि यदि आप बुरे हैं तो इसके लिए आप ही जिम्मेवार हैं, तो आप अच्छे बन सकते हैं। तब फिर वह आपके हाथ की बात है। आप शक्ति अर्जित करते हैं; आप शक्तिशाली बनते हैं। आप काफी ऊर्जा पैदा करते हैं और यह ऊर्जा का जन्म ही आंतरिक यात्रा के लिए उपयोग में लाया जा सकता है, जैसे कि किसी अणु का विस्फोट और ऊर्जा का उसमें से प्रगट होना। यही अणु की शक्ति का मतलब है। ऐसे ही, यदि यह बात आपके मन में गहरी चली जाए कि ‘जो कुछ भी मैं हूं उसके लिए मैं ही जिम्मेवार हूं और जो कुछ भी मैं चाहता हूं, मैं हो सकता हूं,’ यह धारणा बहुत-सी ऊर्जा को मुक्त करेगी। और इस ऊर्जा से आप आंतरिक प्रकाश तक पहुंच सकते हैं। और तीसरी बात, निरंतर असंतुष्ट रहें, जब तक कि प्रकाश उपलब्ध न हो जाए। निरंतर असंतुष्ट! यह एक धार्मिक चित्त का बुनियादी गुण है। साधारणतः हम सोचते हैं कि एक धार्मिक व्यक्ति संतुष्ट आदमी होता है। यह बेवकूफी की बात है। वह संतुष्ट दिखलाई पड़ता है, क्योंकि उसकी असंतुष्टि दूसरे ही आयाम की है। वह तृप्त, संतुष्ट दिखलाई पड़ता हैः वह गरीब घर में रह सकता है; वह साधारण कपड़ों में रह सकता है; वह नंगा रह सकता है; वह वृक्ष के नीचे रह सकता है। वह संतुष्ट प्रतीत हो सकता है, क्योंकि वह इन चीजों से संतुष्ट है, किंतु चूंकि उसकी असंतुष्टि दूसरी चीजों की तरफ मुड़ गई है, वह इन चीजों से परेशान नहीं हो सकता। वह आंतरिक क्रांति के लिए इतना अतृप्त है, वह अंतस के प्रकाश की आशा में इतना असंतुष्ट है कि वह इन बातों की परवाह हो नहीं सकता। ये चीजों बाट परिधि की हो गई हैं। वस्तुतः अब वे उसके लिए कुछ अर्थ नहीं रखती। ऐसा नहीं है कि वह तृप्त है। ठीक ऐसा है कि वे उसके लिए कोई अर्थ की नहीं, वे सब असंगत हैं। वे सब कहीं बाहर परिधि पर हैं; उसका उनसे कोई मतलब नहीं। परंतु वह एक अतृप्ति में जीता है। और केवल वह अतृप्ति ही तुम्हें भीतर की ओर ले जा सकती है। स्मरण रहे, यह अतृप्ति ही है जो कि आपको बाहर की ओर ले जाती है। यदि आप अपने घर में अतृप्त हैं, तो आप एक बड़ा घर बना सकते हैं। यदि आप अपनी आर्थिक स्थिति से निराश हैं, तो आप उसे बदल सकते हैं। बाहर की यात्रा में भी असंतुष्टि ही है, जो कि आपको आगे और आगे ले जाती है। वही बात भीतर की यात्रा में भी होती है। अतृप्त रहें। जब तक कि आपकोप्रकाश न मिल जाए, जब तक कि आप मन के पार न चले जाएं अतृप्त रहें; असंतुष्ट बने रहें। यह तीसरी बात है। ये तीन बातें-स्वयं से निराशा-दूसरों से नहीं; स्वयं पर दायित्व-दूसरों पर नहीं; और एक नई अतृप्ति आंतरिक उपलब्धि के लिए-ये मदद कर सकती हैं। एक क्षण में भी अंतिम लक्ष्य को पहुंचा जा सकता है। पर तब आपको संपूर्णतः अतृप्त होना पड़ेगा। तब यह कुनकुनी अतृप्ति नहीं चलेगी। तब आप बिल्कुल समझौते के लिए राजी नहीं होंगे। तब फिर कुछ भी आपको हिला नहीं सकता, कुछ भी आपके रास्ते में नहीं आ सकता। बाहर कुछ भी होता है, उससे आपका कोई संबंध नहीं, क्योंकि आपके पास कोई ऊर्जा ही बाकी नहीं जो कि आपको उस तरफ ले जाए। सारी ही ऊर्जा भीतर की ओर जा रही है। ये तीन चीजें आपकी सहायता कर सकती है। ये मात्र सहायता कर सकती हैं। मुखय बात तो ध्यान है। ध्यान करें और इनकी सहायता से अंतर्प्रकाश उपलब्ध हो सकता है। वह यहां है, वह दूर नहीं है। केवल इतना ही है कि आपके पास अतृप्ति नहीं है, केवल इतना ही कि आपमें अभीप्सा ही नहीं है। आपकी अभीप्सा बाहर ही बिखर जाती है। उसे इकट्ठा करें, संजोए और उसकी दिशा को मोड़ें। तीर आपसे संसार की ओर न जाए। तीर आपसे आपकी ही ओर जाए-केंद्र की ओर। इसलिए ध्यान करना पड़ता है। ये तीन तो मात्र सहायक हैं। बिना ध्यान के ये तीनों कुछ भी सहायता नहीं कर सकते। किंतु ध्यान इनके बिना भी सहायता कर सकता है। ये तो सिर्फ सहायक हैं। परंतु जब मैं कहता हूं कि ध्यान इनके बिना भी सहायता कर सकता है, तो मुझे गलत न समझें; ऐसा न सोचें कि उनकी जरूरत ही नहीं है। निन्यानबे प्रतिशत लोगों के लिए इनकी सहायता अनिवार्य है, क्योंकि जब तक ये तीन चीजें नहीं हैं, आप ध्यान करने वाले नहीं हैं। केवल एक प्रतिशत लोगों के लिए इन तीन की आवश्यकता नहीं है-इसलिए नहीं कि वे अनिवार्य नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि ध्यान अपने आप में ही एक ऐसा पूरे हृदय का प्रयास है कि उसके लिए बाहरी किसी चीज की आवश्यकता नहीं है। मुझे एक सूफी फकीर का स्मरण आता है। वह अपने गुरु के पास गया। उसने गुरु से पूछा, ‘मुझे बतलाएं कि मैं क्या करूं?’ गुरु ने उसको समझाना शुरू किया; वह उसे एक लंबा भाषण देने वाला था। यह हसन बिल्कुल नया ही था। वह उसे नहीं जानता था। उसने इतना ही कहा ‘ध्यान’। यह प्रारंभ का शब्द था। हसन ने अपनी आंखें बंद कर लीं। गुरु ने उसकी ओर देखा और कहा कि ‘क्या तुम्हें नींद आती है?’किंतु वह तो भीतर चला गया था। गुरु को घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ी। जब वह ध्यान से वापस लौटा, तो गुरु ने कहा, ‘तुम यह क्या कर रहे थे? मैं तो तुम्हें बतलाने जो रहा था और तुमने अपनी आंखें बंद कर लीं। तुम मेरे पास फिर किसलिए आए हो?’ हसन ने कहा-‘किंतु आपने मुझे मुखय कुंजी तो बतला दी। आपने कहा-ध्यान-इतना पर्याप्त है। इसके आगे और क्या चाहिए! मैं भीतर चला गया और मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे कुंजी दी।’किंतु यह एक प्रतिशत टाइप के लोग बहुत कम हैं; एक हसन को खोजना बहुत मुश्किल है। वे बहुत कम हैं-एक शब्द भी अचानक कुछ खोल सकता है। वह किनारे पर ही खड़ा था। मात्र एक धक्के की आवश्यकता थीः वह ‘ध्यान’ शब्द सुनता है और वह छलांग लगा जाता है। यहां तक कि इसकी भी आवश्यकता न हो। कई बार ऐसा हुआ है कि चिड़िया आकाश में उड़ती है और किसी कोप्रकाश की उपलब्धि हो जाती है। ‘ध्यान’ शब्द भी उच्चारित नहीं किया जाता। मात्र एक चिड़िया आकाश में सूरज की ओर उड़ती है और किसी को ध्यान प्राप्त हो जाता है! एक सूखा पत्ता पेड़ से गिर जाता है और कोई उसे देख लेता है और उसे सत्योपलब्धि हो जाती है-वह पा लेता है। ऐसे लोग बिल्कुल किनारे पर खड़े होते हैं। कोई भी बात जो कि बड़ी असंगत प्रतीत होती हो, चमत्कार कर सकती है। इसका क्या अर्थ हुआ? इससे कोई संतत्व को कैसे उपलब्ध होता है? लाओत्सू कोप्रकाश की उपलब्धि इसी भांति हुई थी। वह एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था और एक सूखा पत्ता नीचे गिर पड़ा। उसने उस नीचे गिर पत्ते की ओर देखा और वह उठकर नाचने लगा। और यदि कोई भी उससे पूछता, तो वह कहता-‘मैं कैसे तुम्हें बतला सकता हूं?’ वह बहुत ही कठिन है। एक वृक्ष के नीचे बैठ जाओ, एक सूखे पत्ते को गिरने दो, उसकी तरफ देखा और वह हो जाता है, और कोई नाचने लगता है।’ और वस्तुतः वह कोई मजाक नहीं कर रहा था। ऐसा उसके साथ घटित हुआ था। किंतु इतना सरल, निर्दोष चित्त पाना बहुत मुश्किल है। वह जीवन पर ध्यान और ध्यान कर रहा था, मृत्यु पर ध्यान कर रहा था और तब अचानक एक सूखा पत्ता गिर पड़ता है और सब कुछ खुल जाता है। जीवन खो जाता है, मृत्यु ही वास्तविक हो जाती है। और पत्ते के गिर जाने में वह अपनी मृत्यु भी देख लेता है, और सब कुछ खो जाता है। किंतु यह बहुत कम लोगों की बात है। निन्यानबे प्रतिशत लोगों के लिए सहायता अनिवार्य है। अतएव मुझे गलत न समझें। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; चूंकि अकसर कोई एक टाइप से दूसरे में डोलता रहता है-भावनात्मक और बौद्धिक में-तो कैसे कोई अंतिम निर्णय पर पहुंचे कि वह किस टाइप का है? यह मुश्किल है। सर्वप्रथम, तीन मूल टाइप हैंः बौद्धिक-जानने वाला; भावनात्मक-भावपूर्ण; तीसरा-सक्रिय (एक्टिव)। बौद्धिक (इंटलेक्चुअल) का मतलब हैः वह जिसकी कि सच्ची, वास्तविक प्यास ‘जानने’ की है। वह जानने के लिए अपनी जान भी दे सकता है। कोई अभी विष पर काम कर रहा है, वह विष खा भी सकता है, मात्र यह जानने के लिए कि क्या होता है। हम सोच भी नहीं सकते। यह बड़ा मूर्खतापूर्ण लगता है, क्योंकि वह मर जाएगा। और ऐसे जानने का क्या अर्थ है, यदि आप मर ही जाएं! ऐसे ज्ञान से आप क्या करेंगे? किंतु तब बौद्धिक टाइप जानने को-ज्ञान को जीवित रहने से, जीवन से पहले रखता है। ‘जानना’ ही उसके लिए जीवन है, ‘न जानना’ ही उसके लिए मृत्यु है। जानना ही उसका प्रेम है; न जानकर वह जैसे बिल्कुल बेकार हो जाता है। एक सुकरात, एक बुद्ध, एक नीत्शे, वे सब ज्ञान की, जानने की खोज में हैं-क्या है होना, क्या हैं हम? उसके लिए यही आधारभूत है। सुकरात कहता हैः एक अज्ञानी का जीवन जीने योग्य नहीं है। यदि तुम नहीं जानते कि जीवन क्या है, तो फिर यह अर्थहीन है। हमारे लिए यह कतई अर्थपूर्ण नहीं लगता है। यह कथन कोई महत्व न रखता हो, क्योंकि हम जीते चले जाते हैं, और हम इस आवश्यकता को महसूस ही नहीं करते कि जानें कि जीवन क्या है। यह टाइप है जो कि जानने के लिए जीता है। ज्ञान ही प्रेम है। ऐसा टाइप दर्शन को विकसित करता है। फिलॉसफी का मतलब होता हैः ज्ञान का प्रेम-जानना। दूसरा टाइप भावना का है-इमोटिव। ज्ञान पाना उनके लिए अर्थहीन है, जब तक कि कोई अनुभव न हो। कुछ भी उसके लिए तभी अर्थपूर्ण है जबकि कोई उसे महसूस भी करे। ‘अनुभव अवश्य हो।’ उनके लिए अनुभूति और भी अधिक गहरे केंद्र से-हृदय से है। जानना पहले केंद्र से जुड़ा है-बुद्धि से। अनुभव करना चाहिए-‘वन मस्ट फील’-कवि इस कैटेगरी (कोटि) से संबंधित है। चित्रकार, नर्तक, संगीतकार-इनके लिए जानना पर्याप्त नहीं है। यह बहुत रूखा है-यह बिना किसी हृदय के है-हृदयरहित, बिना अनुभूति के। अतः एक बौद्धिक टाइप एक फूल को काट-पीट सकता है केवल जानने के लिए कि ‘वह क्या है’, किंतु एक कवि उसे चीर-फाड़ नहीं सकता, वह उसे प्रेम कर सकता है। प्रेम कैसे चीरे-फाड़े? वह महसूस कर सकता है और वह जानता है, कि केवल अनुभूति के द्वारा ही वास्तविक जानना हो सकता है। अतः ऐसा हो सकता है कि एक वैज्ञानिक एक फूल के बारे में अधिक जानता हो, परंतु एक कवि मान ही नहीं सकता कि वह अधिक जानता है। एक कवि जानता है कि वह अधिक जानता है, और वह गहरे जानता है। एक वैज्ञानिक तो खाली परिचित है जबकि वह (कवि) हृदय से हृदय को जानता है। उसकी फूल से बात हुई है, हृदय से हृदय की। उसने उसे चीरा-फाड़ा नहीं है। वह नहीं जानता कि उसकी केमेस्ट­ी क्या है। वह कुछ नहीं जानता! हो सकता है वह उसका नाम भी नहीं जानता हो, उसे यह भी पता नहीं कि वह फूलों की कि