कोई ध्यान में भिन्न-भिन्न प्रकाश की आकृतियां व रंग क्यों अनुभव करता है?


ध्यान में रंग;-

10 FACTS;-

1- सारे रंग प्रकाश के हैं, परंतु प्रकाश का कोई रंग नहीं है;रंगहीन है।सफेद कोई रंग नहीं होता।प्रकाश सफेद है;रंगों का अभाव है।जब प्रकाश विभाजित किया जाता है अथवा प्रिज्म में से गुजारा जाता है, तो वह सात रंगों में बंट जाता है।मन भी एक आंतरिक प्रिज्म की भांति ही काम करता है।बाहर का प्रकाश यदि प्रिज्म में से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है।आंतरिक प्रकाश भी यदि मन से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है।इसलिए आंतरिक यात्रा में रंगों का अनुभव हो, तो इसका मतलब है कि आप अभी भी मन में ही है।प्रकाश का अनुभव मन से दूर है, किंतु रंगों का अनुभव मन के भीतर है। यदि आपको ध्यान में अभी भी रंग ही दिखलाई पड़ते हैं, तो आप अभी मन में ही हैं।मन का अतिक्रमण अभी नहीं हुआ हैं।इसलिए रंगों का अनुभव मन के भीतर ही है, क्योंकि मन प्रिज्म की तरह काम करता है, जिसमें से कि आंतरिक प्रकाश को बांटा जा सकता है।इसलिए सब से पहले कोई रंगों को अनुभव करना प्रारंभ करता है।फिर रंग विलीन हो जाते हैं और केवल प्रकाश ही रह जाता है। 2-जब सारे प्रकाश एक हो जाते हैं, जब सारे रंग एक हो जाते हैं, तब सफेद निर्मित होता है।जब सारे रंग अविभाजित मौजूद हों, तब आप सफेद का अनुभव करते हैं। जब कोई रंग न हो, तब आप काले का अनुभव करते हैं। काला व सफेद दोनों ही रंग नहीं है। जब कोई रंग नहीं है, तब काला होता है।जब सारे रंग उपस्थित हों तो फिर सफेद है। और बाकी सारे रंग केवल विभाजित प्रकाश हैं।इसलिए यदि आप भीतर रंगों को अनुभव करते हैं, तो फिर आप मन में हैं। अतः रंगों का अनुभव मानसिक है, वह आध्यात्मिक नहीं है। प्रकाश का अनुभव आध्यात्मिक है, किंतु रंगों का नहीं, क्योंकि जब मन नहीं है तो आप रंगों का अनुभव नहीं कर सकते। तब केवल प्रकाश का अनुभव होता है। रंगों की कोई निश्चित श्रंखला नहीं है क्योंकि प्रत्येक मन भिन्न है। किंतु प्रकाश का अनुभव बिल्कुल एक जैसा है।प्रकाश का अनुभव चाहे श्रीकृष्ण करते हों या गौतम बुद्ध अनुभव वही है ...भिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि वह जो कि भेद निर्मित करता था, अब नहीं है। 3-मन ही भेद निर्मित करता है।हमारे मन के कारण ही हम सब अलग-अलग हैं।इसलिए प्रकाश का अनुभव एक जैसा है, किंतु रंगों का अनुभव और श्रंखला भी भिन्न-भिन्न है।कोई विश्वास करते हैं कि यह रंग पहले आता है और वह रंग आखिर में आता है। दूसरे बिल्कुल ही अलग विश्वास करते हैं। वह भेद वस्तुतः मनों का भेद है।उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो कि भयभीत है, वह पीले रंग का सबसे पहले अनुभव करेगा क्योंकि पीला मृत्यु का रंग है।प्रतीकात्मक रूप से नहीं, वरन वस्तुतः भी।यदि आप तीन बिना किसी रंग की खाली बोतलें लें-एक लाल, एक पीली, और एक सफेद -और इसमें पानी भर दें, तो पीले रंग की बोतल का पानी सब से पहले सड़ेगा, फिर बाद में दूसरी बोतलों का सड़ेगा।लाल रंग की बोतल का पानी सबसे अंत में सड़ेगा।पीला रंग मृत्यु-रंग की तरह चुना गया।इसीलिए गौतम बुद्ध ने अपने भिक्षुओं के लिए पीले रंग के वस्त्र चुने, क्योंकि इस अस्तित्व से बिल्कुल मर जाना ही निर्वाण है। 4-हिंदु धर्म में संन्यासियों के लिए गेरुए रंग को चुना गया जो कि लाल का ही शेड (प्रकार) है, क्योंकि लाल अथवा गेरुआ प्रकाश का रंग है, जो कि पीले के विपरीत है। यह आपको अधिक जीवंत, अधिक चमकीला होने में मदद करता है। यह सदा ऊर्जा पैदा करता है-प्रतीकात्मक रूप से नहीं बल्कि भौतिक व रासायनिक रूप से भी।इसलिए जो व्यक्ति सदा शक्तिशाली जीवंत व जीवन के प्रति अधिक प्रेम से भरा हो, वह सर्वप्रथम लाल रंग का अनुभव करेगा, क्योंकि उसका मन लाल के प्रति सदा खुला होगा। एक भय-केंद्रित व्यक्ति पीले के प्रति सदा खुला होगा। इसलिए श्रंखला भिन्न-भिन्न होगी। एक बहुत शांत व्यक्ति जो कि बहुत कुछ स्थिर है वह नीले रंग का सर्वप्रथम अनुभव करेगा। अतः यह सब मन की वृत्ति पर, स्थिति पर निर्भर करेगा ।कोई निश्चित श्रंखला नहीं है, क्योंकि तुम्हारे मन की कोई निश्चित श्रंखला नहीं है। प्रत्येक चित्त अपने केंद्र में, अपनी प्रवृत्तियों में, अपनी बनावट में, अपने चरित्र में भिन्न है । प्रत्येक मन अलग-अलग है। इन भिन्नताओं के कारण, श्रंखला भी भिन्न होगी।

5-किंतु एक बात तय है कि प्रत्येक रंग का एक निश्चित अर्थ है। श्रंखला निश्चित नहीं है लेकिन रंग का अर्थ निश्चित है। उदाहरण के लिए, पीला मृत्यु का रंग है। इसलिए जब कभी वह पहला हो, तो उसका अर्थ होता है कि आप भय-केंद्रित व्यक्ति हैं। आपके मन का प्रथम द्वार भय के लिए है। अतः किसी भी नई स्थिति में आपके मन की पहली प्रतिक्रिया भय की होगी। यदि आपकी अंतर्यात्रा में लाल रंग प्रथम है , तो आप जीवन के प्रति अधिक प्रेम से भरे हैं, और आपकी प्रतिक्रियाएं भिन्न होंगी। आप अधिक जीवंत होंगे, और आपकी प्रतिक्रियाएं जीवन के प्रति अधिक सहमति की होंगी।एक व्यक्ति जिसका कि प्रथम अनुभव पीले का है, वह प्रत्येक चीज की मृत्यु के अर्थों में विवेचना करेगा, और जो व्यक्ति लाल रंग का प्रथम अनुभव करेगा, वह सदैव अपने अनुभवों को जीवन के अर्थों में बतलाएगा। यहां तक कि यदि एक व्यक्ति मर भी रहा हो, तो भी वह सोचेगा कि वह कहीं न कहीं फिर से पैदा होगा। मृत्यु में भी वह पुनर्जन्म की विवेचना करेगा।अतः लाल रंग-केंद्रित व्यक्ति मृत्यु में भी प्रसन्न रह सकता है, किंतु पीला रंग-केंद्रित व्यक्ति जन्म में भी प्रसन्न नहीं हो सकता। वह नेगेटिव होगा। भय नेगेटिव भाव है। सब जगह वह कुछ न कुछ ऐसा खोज लेगा, जो कि उदासीनता पूर्ण व नेगेटिव हो। 6- एक बहुत शांत व्यक्ति नीले रंग का अनुभव करेगा, किंतु इसका अर्थ है कि वह शांत व्यक्ति निष्क्रिय भी है। एक और शांत व्यक्ति जो कि साथ ही सक्रिय भी है, वह हरे रंग का अनुभव पहले करेगा। मोहम्मद साहब ने अपने फकीरों के लिए हरे रंग का चुनाव किया। इस्लाम का प्रतीकात्मक रंग हरा है। वह उनके झंडे का रंग है। हरा दोनों हैः शांत, स्थिर, किंतु सक्रिय भी। नीला शांत है, परंतु निष्क्रिय।इसलिए रंगों का प्रतीकात्मक ढंग निश्चित है, किंतु श्रंखला निश्चित नहीं है।एक और बात भी ख्याल में रखनी है और वह है सात रंग ...शुद्ध रंग हैं। किंतु आप दो को या तीन रंगों को मिला सकते हैं और एक नया रंग उससे निकल सकता है। इसलिए ऐसा हो सकता है कि आपको प्रारंभ में शुद्ध रंग का अनुभव न हो। आप दो, तीन या चार रंगों का मिश्रण अनुभव कर सकते हैं। फिर यह आपके मन पर निर्भर करता है। यदि आपका मन बहुत ज्यादा उलझन से भरा है, तो आपका यह उलझाव रंगों में दिखलाई पड़ेगा। 7-मनोवैज्ञानिको की एक रंग-परीक्षण विधि के अनुसार आपको रंग दे दिए जाते हैं और फिर उनमें से अपनी पसंद के अनुसार पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा रंग चुनने को कहा जाता है और यह बहुत कुछ बतलाता है। यदि आप सच्चे व ईमानदार हैं, तो यह आपके मन के बाबत कुछ खबर देता है, क्योंकि आप बिना आंतरिक कारण के चुनाव नहीं कर सकते। यदि आप प्रथम पीला चुनते हैं, तो लाल अंतिम होगा क्योकि यदि मृत्यु (रंग) आपका प्रथम है तो जीवन आपका अंतिम होगा। और आप लाल को अंत में रखेंगे। और जो कोई लाल को प्रथम चुनेगा, वह अपने आप ही पीले को अंतिम चुनेगा। और वह जो क्रम होगा, वह मन की बनावट को बतलाएगा। परंतु आपको बार-बार अवसर दिया जाता है कि आप एक बार, दो बार, तीन बार चुनाव करें।और यह बड़ा विचित्र है कि पहली बार आप पीले का चुनाव प्रथम करते हैं। दूसरी बात फिर आपको वे ही कार्ड दिए जाते हैं। परंतु आप पीले को प्रथम नहीं चुनते और तीसरी बार आप कुछ और ही चुन लेते हैं और तब सारी श्रंखला ही बदल जाती है। 8-इसलिए सात बार कार्ड दिए जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति सातों बार प्रथम पीले को ही चुनता चलता जाता है, तो फिर यह एक बहुत निश्चित मन को दर्शाता है। यह व्यक्ति बराबर भय में डूबा रहता है। किंतु उसे पुनः सात बार कार्ड चुनवा करने को दिए जाएं और अब वह बदल जाता है कि हर बार अलग-अलग रंग चुने गए, यह भी बहुत कुछ बतलाता है। तो वह यह बतलाता है कि वह बहुत डांवांडोल है और उसके बारे में पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उसका मन निरंतर बदलता रहता है।उदाहरण के लिए नशीली दवाये सिर्फ एक कैटेलिटिक एजेंट की तरह से कार्य करती है।न स्वर्ग निर्मित कर सकती है और न ही किसी नरक का निर्माण कर सकती है। सिर्फ आपको उघाड़ सकती है, और मन की गहरी पर्तों को खोल सकती है। यदि आपके भीतर बहुत दबाया गया अचेतन मन है, तो आप नरक में प्रवेश कर सकते हैं; और यदि आपके पास कुछ भी दमित नहीं है, एक सहज मन है तो आप स्वर्ग में प्रवेश कर जाते हैं। परंतु यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पास किस तरह का मन है। जब कोई आंतरिक यात्रा पर जाता है, तो वही बात होती है। जो कुछ आपके समक्ष प्रकट होता है, वह आपका ही मन होता है। 9-रंग पर श्रंखला भी आपके अपने मन की श्रंखला ही है। किंतु कुछ भी क्रम क्यों न हो, रंगों के पार जाना ही पड़ता है। इसलिए एक बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए कि रंग केवल मानसिक हैं; वे बिना मन के नहीं हो सकते।जब आप मन के पार जाते हैं, तो प्रकाश होता है-बिना किसी रंग के, बिल्कुल सफेद। और जब यह सफेदपन होने लगे, तभी समझें कि आप मन के पार जाने लगे। जैनों ने अपने साधुओं व साध्वियों के लिए सफेद रंग चुना, और यह चुनाव अर्थपूर्ण है। जैसे कि बौद्धों ने पीला और हिंदुओं ने गेरुआ चुना, जैनों ने सफेद चुना, क्योंकि वे कहते हैं, जब सफेद शुरू होता है, तभी केवल अध्यात्म का प्रारंभ होता है।मोहम्मद साहब ने हरा रंग चुना, क्योंकि उन्होंने कहा कि यदि शांति मृत है, तो फिर अर्थहीन है। शांति को सक्रिय होनी चाहिए। उसे तो जगत में भाग लेना चाहिए। इसलिए एक साधु को सिपाही भी होना चाहिए। अतएव मोहम्मद साहब ने हरा चुना। सारे रंग अर्थपूर्ण है।एक सूफी परंपरा है जो किअपने फकीरों के लिए काले कपड़े काम में लाता है। काला भी बहुत ही अर्थपूर्ण है। यह अभाव बतलाता है...कोई रंग नहीं। सब कुछ गैर-हाजिर है। यह सफेद का बिल्कुल उलटा है।सूफी कहते हैं कि जब तक हम बिल्कुल ही अनुपस्थित न हो जाएं, परमात्मा हमारे लिए उपस्थित नहीं हो सकता। इसलिए काले की तरह होना चाहिए-बिल्कुल गैर-हाजिर, कुछ नहीं होना, न कुछ हो जाना, एक शून्य की भांति।रंग बड़े महत्वपूर्ण हैं। आप जो कुछ भी चुनते हैं, उससे बहुत कुछ पता चलता है।

10-यहां तक कि आपके कपड़े भी बहुत कुछ संकेत करते हैं। कुछ भी सांयोगिक नहीं है। यदि आपने अपने कपड़ों के लिए कोई खास रंग चुना है, तो वह संयोगिक नहीं है। आपको भले ही पता न हो कि आपने वह रंग क्यों चुना, परंतु विज्ञान को पता है और वह बहुत कुछ बतलाता है। आपके कपड़े बहुत कुछ बतलाते हैं, क्योंकि वे आपके मन के हिस्से हैं और आपका मन चुनाव करता है। आप बिना अपने मन के झुकाव के, कुछ आदतों के, कुछ भी चुन नहीं सकते। इसलिए श्रंखला भिन्न होगी, किंतु सारी श्रंखलाएं और सारे रंग आपके मन से संबंधित हैं। इसलिए उनकी ज्यादा परवाह न करें।जो भी रंग प्रतीत हो बस उससे गुजर जाए , उसे पकड़ें नहीं। उसको पकड़ रखना प्राकृतिक स्वभाव है। यदि कोई सुंदर रंग नजर आता है, तो हम फौरन उससे चिपक जाते हैं। ऐसा न करें..इसे स्मरण रखें कि रंग मन से संबंधित है।और यदि कोई रंग भयपूर्ण है, तो कोई उससे लौट सकता है, ताकि वह अनुभव में न आए। यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि आप वापस लौट जाते हैं तो कोई रूपांतरण संभव नहीं है।उससे गुजर जाएं। कोई रंग चाहे भयपूर्ण, बदसूरत, अराजक, सुंदर या लयबद्ध जो कुछ भी क्यों न हो, उसके पार चले जाएं।आपको उस बिंदु को पहुंच जाना है, जहां कि रंग नहीं हैं वरन खाली प्रकाश बच रहता है। उस प्रकाश में प्रवेश ही अध्यात्म है, उसके पहले कुछ भी नहीं।

....SHIVOHAM.....