Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

ध्यान में शारीरिक दर्द बाधा क्यों डालते हैं?क्या ध्यान मृत्यु से साक्षात्कार है ?


ध्यान में, ज्यादातर शारीरिक दर्द बाधा डालते हैं ..तब उस समय ध्यान कैसे किया जाए?-

14 FACTS;-

1-ध्यान शरीर में रसायनिक बदलाव लाता है। नई चीजें होना शुरू हो जाती हैं; शरीर में एक अव्यवस्था होती है। कई बार पेट प्रभावित होता है क्योंकि पेट में तुमने बहुत सी भावनाएं दमित की हुई हैं, और उनमें उथल-पुथल मचती है। कई बार तुम्हें उल्टी आने को होगी, जी मिचलाएगा। कई बार तुम्हें तेज सिर दर्द महसूस होगा क्योंकि ध्यान तुम्हारे दिमाग का अन्दरूनी ढांचा बदल रहा होता है। ध्यान में तुम वास्तव में एक अव्यवस्था से गुजरते हो। जल्द ही चीजें व्यवस्थित हो जायेंगी। लेकिन, कुछ समय के लिए, हर चीज अव्यवस्थित होगी।

2-तो तुम्हें क्या करना है?वास्तव में,दर्द और आनंद उसी ऊर्जा के दो आयाम हैं।वह ऊर्जा जिसने दर्द पैदा किया ;उसे यदि सिर्फ देखा जाये तो दर्द गायब हो जाएगा और वही ऊर्जा आनंद बन जाएगी।उदाहरण के लिए सिर में हो रहे दर्द को देखो; इसे देखते रहो। दृष्टा बने रहो। भूल जाओ कि तुम कर्ता हो, और धीरे-धीरे हर चीज शांत हो जाएगी और इतनी खूबसूरती और इतनी सौम्यतापूर्वक कि तुम इसका विश्वास नहीं कर सकोगे।और इतना ही नहीं.. सिर दर्द भी गायब हो जाएगा।यदि तुम खामोशी से बैठे रहते हो और व्यवधानों पर ध्यान देते हो, सभी व्यवधान गायब हो जाएंगे। और जब सभी व्यवधान गायब हो जाएंगे, तुम्हें अचानक पता चलेगा कि सारा शरीर गायब हो गया है।

3-ये चीजें क्यों हो रही थी...और जब तुम ध्यान नहीं करते हो तब वे नहीं होतीं।वास्तव में,ध्यान के माध्यम से, तुम सभी चीजें बदल रहे हो; यह एक महान क्रांति है।और कोई भी सम्राट ताकत नहीं छोड़ना चाहता।तुम सारे दिन मौजूद हो और हाथ कभी खुजली नहीं करते, सिर में दर्द नहीं होता और पेट भी बिल्कुल सही है और पैर भी सही हैं। सभी चीजे सही हैं। ये चीजें ध्यान के दौरान अचानक शुरु हो जाती हैं क्योंकि शरीर लंबे समय तक प्रभुत्व में रहा है,और ध्यान में तुम शरीर को उसके प्रभुत्व के बाहर फेंक रहे हो। तुम इसे अपदस्थ कर रहे हो।यह चिपका रहता है; यह हर संभव तरीके से प्रभुत्व में रहने की कोशिश करता है। यह तुम्हें हटाने के लिए बहुत सी चीजे पैदा करेगा जिससे कि ध्यान खत्म हो जाये; तुम संयम खो देते हो और शरीर प्रभुत्व में आ जाता है। अब तक, शरीर प्रभुत्व में रहा है और तुम गुलाम रहे हो।

4-शरीर राजनैतिक दांव-पेंच करता है ..इसलिए यह हो रहा है।जब वह काल्पनिक दर्द पैदा करता है, तो खुजली होती है, चींटी चल रही होती हैं, शरीर तुम्हें भटकाने की कोशिश करता है। और यह स्वाभाविक है, क्योंकि शरीर लंबे समय से शासक रहा है, बहुत से जन्मों से यह सम्राट रहा है और तुम गुलाम। अब तुम हर चीज को पूरा बदल रहे हो। तुम अपनी सत्ता पुन: पाना चाह रहे हो, और यह स्वाभाविक है कि शरीर तुम्हें भटकाने की जो भी कोशिश कर सकता है करेगा। यदि तुम विचलित हो जाते हो, तुम खो जाओगे। साधारणतः, लोग इन चीजों को दबा देते हैं। वे मंत्र का उच्चारण शुरू देंगे; वे शरीर को नहीं देखेंगे।

5-तुम्हें किसी तरह का दमन नहीं बल्कि होश सीखना है।यदि तुम दर्द महसूस करते हो तो इसके बारे में सतर्क रहो, कुछ करो नहीं। ध्यान बहुत बड़ी तलवार है। तुम सिर्फ दर्द पर ध्यान दो ,देखो और क्योंकि यह काल्पनिक है, यह तुरंत गायब हो जाएगा। जब सभी दर्द , खुजली और चीटियां गायब हो जाएंगी ; तब शरीर गुलाम की तरह सही जगह पर स्थिर हो जाएगा। अचानक बहुत-सा आनंद उत्पन्न होता है; जो कि इस संसार का नही है।तुम उसे संजो नहीं सकते। अचानक इतना उत्सव पैदा होता है कि तुम प्रकट नहीं कर सकते; तुम्हारे भीतर से एक ऐसी शांति छलकती है जो समझ से परे है।

6-उदाहरण के लिए, तुम ध्यान के आखिरी चरण में शांति से बैठे हो... बिना हिले-डुले, और तुम बहुत सी परेशानियां शरीर में महसूस करोगे।यह संभव है, क्योंकि ध्यान में सारे शरीर में बदलाव आते हैं। तुम महसूस करोगे कि पैर मरते जा रहे हैं, सिर में भी खुजली हो रही है, तुम महसूस करोगे कि शरीर पर चींटियां रेंग रही हैं और तुमने बहुत बार देखा ..वहां चींटियां नहीं हैं।क्योंकि रेंगना अन्दर महसूस हो रहा है, बाहर नहीं। तुम महसूस करते हो पैर मरने जा रहे हैं ...इसको सिर्फ सम्पूर्ण ध्यान दो। खुजली महसूस करो – तो खुजलाना मत, क्योंकि वह मदद नहीं करेगा। अपनी आंखें भी मत खोलो। सिर्फ अंदर से ध्यान दो और सिर्फ इंतजार करो और देखो, और कुछ क्षणों में खुजली गायब हो जाएगी। चाहे कुछ भी हो -तेज दर्द पेट में या सिर में...सिर्फ अंदर से ध्यान दो और सिर्फ इंतजार करो।

7- गौतम बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को एक सूत्र दिए थे कि जब तुम्हें पीड़ा हो, दर्द हो, चोट लगे, तो ऐसा मत मान लेना कि मुझे दर्द हो रहा है, या मुझे पीड़ा लगी है।ऐसी मान्यता से ही उपद्रव है।अगर हाथ में चोट लगी या सिर में दर्द है, तो आंख बंद कर लेना और सारी चेतना को वहीं इकट्ठी कर लेना।जैसे सारी चेतना की ज्योति-किरणें इकट्ठी हो गयीं, और वहीं एक ही जगह फोकस हो गया तो वहीं केंद्रित कर लेना,और पूरी तरह गौर से सिरदर्द को देखना।इसी देखने में तुम अलग हो जाओगे अथार्त देखने वाला और जो दिखायी पड़ रहा है, वह अलग हो जाएगा।

8-और जब तुम्हारा दर्द पूरी तरह दिखायी पड़ने लगे, तब सिर्फ तीन दफे भीतर ही कहना, दर्द...दर्द...दर्द...। पर बड़े सजगता से कहना, दर्द को देखते हुए कहना।यह मत कहना कि मुझे दर्द हो रहा है, क्योंकि वही तो सम्मोहन है जिसमें आदमी उलझ जाता है। तुम सिर्फ इतना कहना, यह रहा दर्द... यह रहा दर्द...यह रहा दर्द...। तीन बार दर्द-दर्द कहना और समझना कि दर्द वहां है। और गौतम बुद्ध कहते हैं कि दर्द विलीन हो जाएगा। 9-उदाहरण के लिए,एक व्यक्ति का कार एक्सीडेंट हो गया और उसके हाथ में भयंकर पीड़ा थी। वे किसी जंगल की राह से गुजर रहे थे,अस्पताल भी बहुत दूर था।उसकी पीड़ा असह्य थी।

उसकी पत्नी कार में बैठी ध्यान के ऊपर एक किताब पढ़ रही थी। उस स्त्री ने कहा कि यह किताब में 'ऐसा' लिखा हुआ है। उस व्यक्ति ने कहा,''इस किताब को बाहर फेंको।मैं मरा जा रहा हूं, तुम्हें ज्ञान की पड़ी है।यह सब बकवास है। इधर मेरा हाथ...इतना भयंकर पीड़ा हो रही है, अब यहां ध्यान करने का यह कोई अवसर है?''लेकिन न कोई दवा थी और न कोई उपाय। अस्पताल पहुंचते- पहुंचते घंटों लगते। पंद्रह-बीस मिनट बाद उसने कहा, ''अच्छा क्या हर्ज है, कोशिश कर के देख लें। कोई और उपाय भी नहीं है।''

10-निरुपाय आदमी कभी-कभी ठीक बातें कर लेता है।कोई उपाय न देखकर, मजबूरी में, असहाय अवस्था में, वह कार में लेट गया और उसने कहा, 'अच्छा, मैं ऐसा कर के देखता हूं'। सारी चेतना तो अपने आप दौड़ी जा रही थी।जब कहीं चोट होती है तो चेतना अपने आप उस तरफ दौड़ती है, और गौतम बुद्ध ने कहा, सब इकट्ठा कर लेना, जैसे पूरा शरीर भूल ही जाए, बस उतनी ही जगह याद रह जाए जहां दर्द है।वह चेतना को दर्द के करीब लाया, दर्द ऐसा हो गया जैसे कि छुरी की धार हो।तेज हो गया, पैना हो गया, भयंकर हो गया, और भी त्वरा पकड़ ली उसने, तेजी आ गयी, एक लपट की तरह मालूम होने लगा, और तब उसने कहा, दर्द...दर्द...दर्द...।और वह चकित हुआ, उसे भरोसा न आया कि क्या

हुआ... दर्द एकदम विलीन हो गया...तादात्म्य टूट गया।

11-गौतम बुद्ध अपने भिक्षुओं को कहते थे,प्यास लगे तो ध्यान रखना, तुम्हें नहीं लगी है, शरीर को लगी है। तीन बार कहना, प्यास...प्यास...प्यास...! और तुम पाओगे प्यास अलग हो गयी।और जैसे ही प्यास अलग हो जाती है, उसकी पकड़ छूट जाती है।जब भी कोई तुम्हें चीज ज्यादा सताने लगे तो ध्यान करके ,तीन बार कहना,तब तुम्हें ऐसा लगेगा है जैसे प्यास किसी और को लगी, भूख किसी और को लगी, बूढ़ा कोई और हुआ, रोग किसी और को आया, तुम अलग हो जाते हो।यह अलग हो जाने की कला ही अप्रमाद है।

12-और जो जीवन के रोज-रोज के छोटे कामों में अलग होता गया, तो अज्ञान की चट्टान पर बूंद-बूंद चोट पड़ती है।जब प्यास लगी तब भी उसने ध्यान से अपने को अलग किया; पानी दिया, तृप्ति हुई, तो भी अपने को अलग रखा; कहा कि शरीर को प्यास थी, शरीर को तृप्ति हुई; शरीर को भूख थी, शरीर की भूख मिटी; शरीर को रोग था, शरीर का रोग गया; और हर घड़ी अपने को अलग रखा, अपने को बचाया और दूर रखा।होश को खोने न दिया, शरीर के साथ जुड़ने न दिया; तो जो अंतिम घटना घटेगी वह यह, कि जब मौत आएगी तब यह जीवनभर का अनुभव तुम्हारे साथ होगा।तुम मौत को भी देख पाओगे कि मौत शरीर को आती है ,मुझे नहीं।

13-लेकिन इसे आज से साधोगे तो ही मौत में सध पाएगा।ऐसा मत सोचना कि मरते वक्त ही साध लेंगे। जब प्यास में न सधेगा तो मौत में कैसे सधेगा? जब सिरदर्द में न सधेगा तो मौत में कैसे सधेगा?एक दिन में कोई भूख से नहीं मर जाता है।अगर आदमी तीन महीने भूखा रहे, तब मरेगा। जब एक दिन की भूख में न सधा और तुम खो गए, और एक हो गए शरीर के साथ, तो मृत्यु में कैसे सधेगा? मृत्यु में तो चेतना शरीर से पूरी तरह अलग होगी, और तुम्हारा ध्यान शरीर पर रहेगा। क्योंकि जिंदगी भर उसी का अभ्यास किया, उसी का सम्मोहन किया। तो तुम भूल ही जाओगे कि तुम नहीं मर रहे हो, तुम समझोगे कि मैं मर रहा हूं।वास्तव में,न कोई कभी मरा है और न कभी कोई मर सकता है।

14-इस संसार में जो है वह सदा से है, सदा रहेगा। रूपांतरण होते हैं, घर बदलते हैं, देह बदलती है, वस्त्र बदलते हैं, मृत्यु होती ही नहीं। मृत्यु असंभव है। कोई मरेगा कैसे? जो है, वह नहीं कैसे हो जाएगा? जो है, वह रहेगा; सदा-सदा रहेगा।लेकिन, फिर भी लोग रोज मरते हैं ,रोज तड़फते हैं।जब गौतम बुद्ध कहते हैं अप्रमादी नहीं मरते, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मरते नहीं, और उनको मरघट नहीं ले जाना पड़ता।वह तो गौतम बुद्ध को भी ले जाना पड़ा।वे नहीं मरते, क्योंकि वे जानते हैं कि वे अलग हैं। तुम्हारे लिए तो वे भी मरते हैं,लेकिन वे स्वयं के लिए नहीं मरते क्योंकि मृत्यु की घड़ी में भी वे अपने भीतर के दीए को देखते चले जाते हैं।संयमी तो अंधेरी रात में भी; नींद में ही नहीं मृत्यु की घनघोर अमावस में भी, जागा रहता है, देखता रहता है और सजग रहता है''।

ध्यान के चमत्कारिक अनुभव;-

03 FACTS;-

1-ध्यान के अनुभव निराले हैं और प्रत्येक ध्यानी को ध्यान के अलग-अलग अनुभव होते हैं। यह उसकी शारीरिक रचना और मानसिक बनावट पर निर्भर करता है कि उसे शुरुआत में क‍िस तरह के अनुभव होंगे। लेकिन ध्यान के एक निश्चित स्तर पर जाने के बाद सभी के अनुभव लगभग समान होने लगते हैं।शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता

है।यह गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृष्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है।

2- नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है। नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है। पीला रंग जीवात्मा का प्रकाश है। इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत

होने का लक्षण भी माना जाता है।कुछ दिनों बाद इसका पहला लाभ यह मिलता है कि व्यक्ति के मन और मस्तिष्क से तनाव और चिंता हट जाती है और वह शांति का अनुभव

करता है।लगातार भृकुटी पर ध्यान लगाते रहने से कुछ माह बाद व्यक्ति को भूत, भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं।

3-जो व्यक्ति सतत चार से छह माह तक ध्यान करता रहा है उसे कई बार एक से अधिक शरीरों का अनुभव होने लगता है। अर्थात एक तो यह स्थूल शरीर है और उस शरीर से निकलते हुए 2 अन्य शरीर। ऐसे में बहुत से ध्यानी घबरा जाते हैं और वह सोचते हैं कि यह ना जाने क्या है। उन्हें लगता है कि कहीं मेरी मृत्यु न हो जाए। इस अनुभव से घबराकर वे ध्यान करना छोड़ देते हैं। जब एक बार ध्यान छूटता है तो फिर पुन: उसी अवस्था में लौटने में मुश्किल होती है।

इस अनुभव का क्या अर्थ है ?-

03 FACTS;-

1-जो दिखाई दे रहा है वह हमारा स्थूल शरीर है। दूसरा सूक्ष्म शरीर हमें दिखाई नहीं देता, लेकिन हम उसे नींद में महसूस कर सकते हैं। इसे ही मनोमय शरीर कहा है। तीसरा शरीर

हमारा कारण शरीर है जिसे विज्ञानमय शरीर कहते हैं।वास्तव में,सूक्ष्म शरीर ने हमारे स्थूल शरीर को घेर रहा है। हमारे शरीर के चारों तरफ जो ऊर्जा का क्षेत्र है वही सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर भी हमारे स्थूल शरीर की तरह ही है यानि यह भी सब कुछ देख सकता है, सूंघ सकता है, खा सकता है, चल सकता है, बोल सकता है आदि। इसके अलावा इस शरीर की और भी कई क्षमता है जैसे वह दीवार के पार देख सकता है। किसी के भी मन की बात जान सकता है। वह कहीं भी पल भर में जा सकता है। वह पूर्वाभास कर सकता है और अतीत की हर बात जान सकता है आदि।

2- तीसरा शरीर कारण शरीर कहलाता है। कारण शरीर ने सूक्ष्म शरीर को घेर के रखा है। इसे बीज शरीर भी कहते हैं। इसमें शरीर और मन की वासना के बीज विद्यमान होते हैं। यह हमारे विचार, भाव और स्मृतियों का बीज रूप में संग्रह कर लेता है। मृत्यु के बाद स्थूल शरीर कुछ दिनों में ही नष्ट हो जाता है और सूक्ष्म शरीर कुछ महिनों में विसरित होकर कारण की ऊर्जा में विलिन हो जाता है, लेकिन मृत्यु के बाद यही कारण शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है और इसी के प्रकाश से पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की प्राप्ति होती है अर्थात नया जन्म होता है।

3-कारण शरीर कभी नहीं मरता।इसी कारण शरीर से कई सिद्ध योगी परकाया प्रवेश में समर्थ हो जाते हैं। जब व्यक्ति निरंतर ध्यान करता है तो कुछ माह बाद यह कारण शरीर हरकत में आने लगता है। अर्थात व्यक्ति की चेतना कारण में स्थित होने लगती है। ध्यान से इसकी शक्ति बढ़ती है। यदि व्यक्ति निडर और होशपूर्वक रहकर निरंतर ध्यान करता रहे तो निश्चित ही वह मृत्यु के पार जा सकता है। मृत्यु के पार जाने का मतलब यह कि अब व्यक्ति ने स्थूल और सूक्ष्म शरीर में रहना छोड़ दिया।

क्या ध्यान मृत्यु से साक्षात्कार है ?

18 FACTS;-

1-जो लोग भी ध्यान में नहीं जा पाते हैं, उनके न जाने का बुनियादी कारण मृत्यु का भय है।और जो भी मृत्यु से डरे हुए हैं, वे कभी समाधि में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। समाधि अपने हाथ से मृत्यु को निमंत्रण है कि आओ, मैं मरने को तैयार हूं... मैं जानना चाहता हूं कि मौत हो जाएगी, मैं बचूंगा कि नहीं बचूंगा? और अच्छा है कि मैं होशपूर्वक जान लूं क्योंकि बेहोशी में यह घटना घटेगी तो मैं कुछ भी न जान पाऊंगा।

2-उदाहरण के लिए एक बूंद है, और हजार बूंदों के बीच में पड़ी है। सूरज की किरण आई और उस एक बूंद पर जोर से पड़ी और वह बूंद भाप बनकर उड़ गई। आसपास की बूंदों ने समझा कि वह मर गई, वह खतम हो गई। और ठीक ही सोचा उन बूंदों ने, क्योंकि उन्हें दिखाई पड़ा कि अब तक थी, अब नहीं है। लेकिन वह बूंद अब भी बादलों में है।यह वे बूंदें कैसे जानें जो खुद भी बादल न हो जाएं। या बूंद अब सागर में जाकर फिर बूंद बन गई होगी, यह भी बूंदें कैसे जानें, जब तक कि वे खुद उस यात्रा पर न निकल जाएं।

3-हम सब आसपास जब किसी को मरते देखते हैं तो हम समझते हैं कि गया, एक आदमी मरा। हमें पता नहीं कि वह वाष्पीभूत/इवोपरेट हुआ। वह फिर सूक्ष्म में गया और फिर नई यात्रा पर निकल गया। वह बूंद भाप बनी और फिर बूंद बनने के लिए भाप बन गई। यह हमें कैसे दिखाई पड़े? हम सबको लगता है कि एक व्यक्ति और खो गया, एक व्यक्ति और मर गया। और ऐसे रोज कोई मरता जाता है, और रोज कोई बूंद खोती चली जाती है, और धीरे -धीरे हमें भी पक्का हो जाता है कि मुझे भी मर जाना पड़ेगा। । और तब दूसरों को देखकर एक भय पकड़ लेता है कि मैं मर जाऊंगा। दूसरों को देखकर ही हम जीते हैं, इसलिए हमारी बड़ी कठिनाई है।

4-मृत्यु से न तो मुक्त होना है और न मृत्यु को जीतना है। मृत्यु को जानना है और जानना ही मुक्ति बन जाता है, जीत बन’ जाता है। इसलिए ज्ञान शक्ति है, मुक्ति है, विजय है। मृत्यु का ज्ञान मृत्यु को विलीन कर देता है, तब अनायास ही हम पहली बार जीवन से संबंधित हो पाते हैं।ध्यान स्वेच्छा से

मृत्यु में प्रवेश है और जो स्वेच्छा से मृत्यु में प्रवेश करता है, वह अनायास ही जीवन में प्रविष्ट हो जाता है। वह जाता तो है मृत्यु को खोजने, लेकिन मृत्यु को नहीं बल्कि परम जीवन को पा लेता है।मृत्यु के भवन में खोज करते-करते, जीवन के मंदिर में पहुंच जाता है।और जो मृत्यु के भवन से भागता है, वह जीवन के मंदिर में नहीं पहुंच पाता है।

5-ध्यान या समाधि का यही अर्थ है कि हम बादाम की तरह अपनी खोल और गिरी को अलग करना सीख जाएं। वे अलग हो सकते हैं,अलग -अलग जाने जा सकते हैं, क्योंकि वे अलग हैं।इसलिए ध्यान है स्वेच्छा से मृत्यु में प्रवेश, अपनी ही इच्छा से मौत में प्रवेश...वालेंटरी एन्ट्रेस इनटू डेथ।और जो आदमी अपनी इच्छा से मौत में प्रवेश कर जाता है, वह मौत का साक्षात्कार कर लेता है कि यह रही मौत और मैं अभी भी हूं।

6-उदाहरण के लिए प्राचीन यूनान के प्रमुख दार्शनिक सुकरात का आखिरी क्षण है। जहर पीसा जा रहा है उसे मारने के लिए। और वह बार -बार पूछता है कि बड़ी देर हो गई, जहर कब तक पिस पाएगा! उसके मित्र रो रहे हैं और कह रहे हैं कि आप पागल हो गए हैं। हम तो चाहते हैं कि थोड़ी देर और जी लें। तो हमने जहर पीसने वाले को रिश्वत दी है, समझाया -बुझाया है कि थोड़े धीरे -धीरे पीसना।लेकिन सुकरात बाहर उठकर पहुंच जाता है और जहर पीसनेवाले से पूछता है कि बड़ी देर लगा रहे हो, बड़े अकुशल मालूम होते हो, नए -नए पीस रहे हो? क्या पहले किसी फांसी की सजा दिए हुए आदमी को तुमने जहर नहीं दिया है?

7-वह आदमी कहता है, जिंदगी भर से दे रहा हूं। लेकिन तुम जैसा पागल आदमी मैंने नहीं देखा। तुम्हें इतनी जल्दी क्या पड़ी है? और थोड़ी देर सांस ले लो, और थोड़ी देर जी लो, और थोड़ी देर जिंदगी में रह लो। तो मैं धीरे पीस रहा हूं। और तुम खुद ही पागल की तरह बार -बार पूछते हो कि बड़ी देर हुई जा रही है। इतनी जल्दी क्या है मरने की?

8-सुकरात कहता है कि बड़ी जल्दी है, क्योंकि मैं मौत को देखना चाहता हूं। मैं देखना चाहता हूं कि मौत क्या है।और मैं यह भी देखना चाहता हूं कि मौत भी हो जाए और फिर भी मैं बचता हूं या नहीं बचता हूं। अगर नहीं बचता हूं, तब तो सारी बात ही समाप्त हो जाती है। और अगर बचता हूं तो मौत समाप्त हो जाती है। असल में मैं यह देखना चाहता हूं कि मौत की घटना में कौन मरेगा, मौत मरेगी कि मैं मरूंगा।मैं बचूंगा या मौत बचेगी, यह मैं देखना चाहता हूं। तो बिना जाए कैसे देखूं।

9-फिर सुकरात को जहर दे दिया गया। सारे मित्र रो रहे हैं, वे होश में नहीं हैं, और सुकरात उनसे कह रहा है कि मेरे पैर मर गए, लेकिन अभी मैं जिंदा हूं। सुकरात कह रहा है, मेरे घुटने तक जहर चढ़ गया है, मेरे घुटने तक के पैर बिलकुल मर चुके हैं। अब अगर तुम इन्हें काटो, तो भी मुझे पता नहीं चलेगा। लेकिन मित्रो, मैं तुमसे कहता हूं कि मेरे पैर तो मर गए हैं, लेकिन मैं जिंदा हूं। यानी एक बात पक्की पता चल गई कि मैं पैर नहीं था। मैं अभी हूं मैं पूरा का पूरा हूं। मेरे भीतर अभी कुछ भी कम नहीं हो गया है। फिर सुकरात कहता है कि अब मेरे पूरे पैर ही जा चुके, जांघों तक सब समाप्त हो चुका है। अब अगर तुम मेरी जांघों तक मुझे काट डालो, तो मुझे कुछ भी पता नहीं चलेगा, लेकिन मैं हूं! और वे मित्र हैं कि रोए चले जा रहे हैं।

10-और सुकरात कह रहा है कि तुम रोओ मत, एक मौका तुम्हें मिला है, देखो। एक आदमी मर रहा है और तुम्हें खबर दे रहा है कि फिर भी वह जिंदा है। मेरे पैर तुम पूरे काट डालो तो भी मैं नहीं मरा हूं? मैं अभी हूं। और फिर वह कहता है कि मेरे हाथ भी ढीले पड़े जा रहे हैं, हाथ भी मर जाएंगे। आह, मैंने कितनी बार अपने हाथों को स्वयं समझा था, वे हाथ भी चले जा रहे हैं, लेकिन मैं हूं। और वह आदमी, वह सुकरात मरता हुआ कहता चला जाता है। वह कहता है, धीरे- धीरे सब शांत हुआ जा रहा है, सब डूबा जा रहा है, लेकिन मैं उतना का ही उतना हूं।

11-और सुकरात कहता है, हो सकता है थोड़ी देर बाद मैं तुमको खबर देने को न रह जाऊं, लेकिन तुम यह मत समझना कि मैं मिट गया। क्योंकि जब इतना शरीर मिट गया और मैं नहीं मिटा, तो थोड़ा शरीर और मिट जाएगा, तब भी मैं क्यों मिटूगा! हो सकता है, मैं तुम्हें खबर न दे सकूं, क्योंकि खबर शरीर के द्वारा ही दी जा सकती है। लेकिन मैं रहूंगा। और फिर वह आखिरी क्षण कहता है कि शायद आखिरी बात तुमसे कह रहा हूं। जीभ मेरी लड़खड़ा गई है। और अब इसके आगे मैं एक शब्द नहीं बोल सकूंगा, लेकिन मैं अभी भी कह रहा हूं कि मैं हूं। वह आखिरी वक्त तक यह कहता हुआ मर गया है कि' मैं हूं'।

12-ध्यान में भी धीरे- धीरे ऐसे ही भीतर प्रवेश करना पड़ता है।और धीरे -धीरे एक-एक चीज छूटती चली जाती है, फासला पैदा होता चला जाता है। और फिर वह घड़ी आ जाती है कि लगता है कि सब दूर पड़ा है -जैसे तट पर किसी और की लाश पड़ी होगी, ऐसा लगेगा -'और मैं हूं'। और शरीर वह पड़ा है और फिर भी मैं हूं..अलग और भिन्न और बिलकुल दूसरा।

जैसे ही यह अनुभव हो जाता है, हमने जीते हुए मृत्यु का साक्षात्कार कर लिया। फिर अब मृत्यु से हमारा कोई संबंध कभी नहीं होगा। मृत्यु आती रहेगी, लेकिन तब वह पड़ाव होगी, वस्त्र का बदलना होगा, जहां हम नए नए शरीरों पर सवार हो जाएंगे और नई यात्रा पर निकलेंगे, नए मार्गों पर, नए लोकों में। लेकिन मृत्यु हमें मिटा नहीं जाएगी।

13-इस बात का पता साक्षात्कार से , एनकाउंटर से ही हो सकता है।हमें जानना ही पडेगा,गुजरना ही पडेगा।और मरने से हम इतना डरते हैं, इसीलिए ध्यान भी नहीं कर पाते।वास्तव में उनकी असली तकलीफ, उनके मरने का डर है और ध्यान मरने की एक प्रक्रिया है।पूरे ध्यान में ,हम वहीं पहुंच जाते हैं, जहां मरा हुआ आदमी पहुंचता है। फर्क सिर्फ एक होता है कि मरा हुआ आदमी बेहोश पहुंचता है, हम होश में पहुंच जाते हैं।मरे हुए आदमी को पता नहीं होता है कि क्या हो गया, खोल कैसे टूट गई और गिरी बच गई।और हमें पता होता है कि गिरी अलग हो गई है और खोल अलग हो गई।

14-सूफी फकीर बड़ा सम्मानित शब्द है। इसका अर्थ है, जो परमात्मा के लिए भिखारी हो गया--फकीर। जिसकी आकांक्षा सिवाय परमात्मा के और कुछ भी नहीं मांगती। जिसका भिक्षापात्र कुछ और स्वीकार नहीं करता, सिवाय परमात्मा के। जिसके जीवन में एक ही धुन सतत बज रही है। एकतारे की भांति जिसका एक ही तार एक ही आवाज देता रहता है...परमात्मा की। जो न धन चाहता है, न पद चाहता है। जो न यश चाहता है, न प्रतिष्ठा चाहता है। न जो सम्मान चाहता है, न जो जीवन चाहता है। जो एक ही चीज चाहता है, कि उसको पा लूं जिससे मैं आया हूं और जिसमें मैं चला जाऊंगा। जो परम सत्य का भिखारी है।जिसके भिक्षापात्र में परमात्मा से कम कुछ स्वीकार न होगा। वह उसी को मांगने निकला है। जिसने अपनी सारी आकांक्षाओं को जोड़कर एक ही अभीप्सा बना ली।

15-तुम्हारी आकांक्षायें अनंत हैं। छोटे-छोटे कणों की भांति हैं, तिनकों की भांति हैं। फकीर की एक ही आकांक्षा है। उसने सभी आकांक्षाओं के तिनकों को जोड़ कर एक रस्सी बना ली है जिसका नाम, अभीप्सा है। उसकी बस एक ही अभीप्सा है कि जो है उसे जान लूं। सत्य को जान लूं।

वह सत्य का भिखारी है। धर्म में दो तरह के धर्म हैं। एक तो तांत्रिक, जो कामवासना के तथ्य से खोज शुरू करेगा। क्योंकि जब जीवन के सत्य को जानना है, तो जीवन जहां से उदगमित होता है, उसके सत्य को जानना होगा। अगर एक वैज्ञानिक को पदार्थ के सत्य को जानना है, तो वह विश्लेषण करता है और पदार्थ के अंतिम परमाणु को पकड़ता है। क्योंकि वहीं से पता चलेगा। जिस चीज को भी खोजना हो, उसकी अंतर्धारा में प्रवेश करना जरूरी है। तो एक तरह का धर्म है जो तंत्र से शुरू होता है, ताकि जीवन की आखिरी बुनियाद को पकड़ लिया जाए। वहीं से हम परमात्मा का द्वार खोज सकेंगे।

16-दूसरा धर्म दूसरी यात्रा कर सकता है। वह है, मृत्यु की खोज से। तो या तो कामवासना की गहरी खोज करो, या मृत्यु की गहरी खोज करो--दो ही द्वार हैं। या तो जन्म, या मृत्यु; ये दोनों द्वार हैं परमात्मा में प्रवेश के। और दोनों से तुम डरे हुए हो। इसलिए तुम कहीं भी नहीं पहुंच पाते। तुम मध्य

को पकड़े हो और दोनों छोर से डरे हुए हो।सूफी मृत्यु के छोर से सत्य की खोज किए हैं। जैसा तंत्र, कामवासना के छोर से सत्य की खोज किया है। ऐसे ही सूफी, मृत्यु के छोर से सत्य की खोज किए हैं। या तो वहां से शुरू करो, जहां से जीवन आविर्भूत होता है, या वहां से शुरू करो, जहां जीवन विलीन होता है। जिससे जीवन आता है उसे खोजो, या जिसमें जीवन जाता है उसे खोजो। या तो वर्तुल का प्रथम चरण या वर्तुल का अंतिम चरण। या तो यह छोर, या वह छोर। दोनों के बीच में तो तुम पकड़े हो; दोनों छोरों से तुम भयभीत हो।

17- मृत्यु के भय के कारण हमने मृत्यु को टाला, बीच में पर्दे खड़े किए। और जब हमने मृत्यु को छिपाया, तभी हमें समझ में आ गया कि 'काम' को भी छिपाना पड़ेगा। क्योंकि वे दोनों एक ही चीज के दो छोर हैं। इसलिए सारी दुनिया में कामवासना का दमन शुरू हुआ। क्योंकि यह बात बहुत सीधा साफ तर्क है।अगर डंडे का एक छोर तुम्हें पता है, तो दूसरे छोर पर जाने का मन होगा। तुम चाहोगे कि दूसरे छोर का भी पता लगा लो। अगर डंडे का एक छोर भूलता है, तो दोनों ही छोर भूल जाना उचित है। एक याद रहा, तो दूसरे की याद दिलायेगा। एक को अगर तुम न भूल सके, तो दूसरे को भी तुम विस्मृत न कर पाओगे।

18-उनका तर्क तो साफ है,कि अगर दूसरे छोर से बचना है, तो पहले छोर को नष्ट कर दो। तो दोनों चीजों से छुटकारा हो जायेगा।लेकिन आंख बंद

करने से, शुतुर्मुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ा लेने से सत्य से कोई बच नहीं सकता। सत्य को तो आंख खोल कर देखना ही होगा। और आश्चर्य तो यह है कि जितनी तुम आंख बंद करते हो, उतनी मुसीबत में पड़ते हो। जितनी आंख खोलते हो, उतनी ही मुसीबत से छुटकारा हो जाता है।

मृत्यु का स्मरण क्यों?-

12 FACTS;-

1-यह ध्यान का सूत्र है , 'मृत्यु के प्रति होश रखो, जब तक मृत्यु को जान ही

न लो''।और तब तक यह होश रखना होगा, जब तक मृत्यु से साक्षात्कार न

हो। इस सूत्र को एक क्षण को भी मत भूलो, कि मृत्यु है। क्योंकि जब तुम मृत्यु को भूलते हो, तभी तुम भटकते हो। जैसे ही तुम मृत्यु को भूले, कि तुम्हारे जीवन में गलत प्रवेश कर जाता है।उदाहरण के लिए तुम किसी से लड़ रहे हो, गालियां दे रहे हो, अपमान कर रहे हो, छुरा उठाकर छाती में भोंकने जा रहे हो और तभी तुम्हें कोई कहे, कि क्षण भर बाद तुम्हारी मृत्यु है। क्या होगा? हाथ ढीला पड़ जायेगा, छुरा नीचे गिर जाएगा। शायद जिसे तुम मारने जा रहे थे उससे तुम क्षमा मांगोगे और कहोगे, 'क्षमा कर दो। मेरे मरने का वक्त आ गया है।'

2-तुम अभी धन कमा रहे थे, तुम पागल हुए जा रहे थे और किसी ने बताया कि क्षण भर बाद मर जाओगे। सब महत्वाकांक्षा खो गई। अब धन में कोई सार न रहा। अब धन मिट्टी से बदतर हो गया। अब तुमे इसे ढोना न चाहोगे। अभी तुम पद की यात्रा कर रहे थे, कि बड़े से बड़े पद तक पहुंच जाऊं। अचानक खबर आ गई मृत्यु की, सब यात्रा बंद हो गई। मृत्यु के

स्मरण के साथ ही जीवन दूसरा हो जाता है।तुम्हारा जीवन गलत है क्योंकि मृत्यु का स्मरण नहीं है। तब तुम व्यर्थ में उलझे रहते हो। तब तुम क्षुद्र सी बातों में बड़ा समय लगाते हो। तब कंकड़-पत्थर बीनते हो, उनसे तिजोड़ी भरते रहते हो। जैसे ही मृत्यु का स्मरण आयेगा, तुम्हारे जीवन का सारा मूल्यांकन ,वैल्युएशन बदल जायेगा। मृत्यु की स्मृति में क्या सार्थक है, वही बचेगा। जो व्यर्थ है, वह खो जायेगा। मृत्यु को भूले तो व्यर्थ को पकड़ते रहोगे। ऐसा लगता है, सदा रहना है। कूड़ा-कर्कट भी इकट्ठा करते रहते हो।

3-मृत्यु का पता चला, तो याद आता है कि सदा तो रहना नहीं है। तो तुम्हारे झगड़ों का कितना मूल्य है? अदालती मुकदमों का कितना मूल्य है? तुम्हारे पत्नी-बच्चों का कितना मूल्य है? अपने-पराये में क्या फर्क है? जैसे ही तुम्हें मृत्यु का स्मरण आता है, घर घर नहीं रह जाता, केवल प्रतीक्षालय हो जाता

है।रेलवे स्टेशन पर, एयरपोर्ट पर तुम बैठे हो वेटिंगरूम में। वह तुम्हारा घर नहीं है। कोई अगर वहां कचरा भी फेंक दे, तो तुम बैठे देखते रहते हो। तुम यह भी नहीं कहते कि 'उठाओ यह कचरा। घर गंदा कर दिया।' तुम किसी से वहां झगड़ते भी नहीं। किसी का पैर भी तुम्हारे पैर पर पड़ जाये, तो तुम जानते हो धक्कमधुक्की है, लोग जा रहे हैं, आ रहे हैं। कोई तुम्हारा घर नहीं है। अभी लोग जा रहे हैं, घड़ी भर बाद तुम्हारा भी समय आ जायेगा और तुम भी चले जाओगे।

4-जैसे ही मृत्यु का स्मरण आता है, जीवन एक प्रतीक्षालय हो गया। वहां बसने को तुम नहीं हो, वहां थोड़ी देर का विश्राम है। वह पड़ाव है। वह मंजिल नहीं है, वहां से जाना ही होगा। और जहां से जाना है, वहां की बातों में कितना अर्थ? जहां से जाना है, वहां की क्षुद्र समस्याओं में उलझने का

क्या सार! लेकिन तुम तो उलटा कर रहे हो। मृत्यु की तरफ पीठ किए हुए हो, भाग रहे हो, कि कहीं साक्षात्कार न हो जाये; कहीं मृत्यु सामने न मिल जाये।सूत्र कह रहा है कि तुम उसका सामना ही कर लो। क्योंकि जैसे ही तुम उसे देख लोगे, भय से मुक्त हो जाओगे।क्योंकि जिस दिन

मृत्यु देख ली जाती है, उस दिन देखने वाला मृत्यु से अलग हो जाता है। दृश्य और द्रष्टा अलग हो जाते हैं। तब मृत्यु भी इस जगत की एक घटना हो जाती है और तुम साक्षी हो जाते हो। जब तुम मृत्यु को ठीक से देख लेते हो, तुम अमृत हो जाते हो। मृत्यु का साक्षात्कार मनुष्य को अमरत्व दे देता है।

5- मृत्यु को अगर तुम देख लो, तो अमृत।'काम' से अगर तुम डर-डरे, भागे-भागे रहे तो तुम्हें समाधि की कोई झलक कभी न मिलेगी। मृत्यु से तुम भयभीत रहे, तो तुम्हें अमृत का कभी कोई पता न चलेगा। मृत्यु सीढ़ी है अमृत के दर्शन की। 'काम' सीढ़ी है समाधि की झलक की। और जैसे ही समाधि की झलक मिली, काम व्यर्थ हुआ। और जैसे ही अमृत दिखाई पड़ा,

मृत्यु गई। फिर तुम मरने वाले नहीं हो।सिद्धांत दूसरों से मिलते हैं, प्रतीति अपनी होती है।

6-जीवन शाश्वत है। रूप बदलते हैं, घर बदलते हैं, वस्त्र बदलते हैं, आकार बदलते हैं, लेकिन जो आकारों के भीतर छिपा निराकार

है,वह सदा वही है।सागर में भी खो कर नदी खोती थोड़ी है.. फिर बादल बन जाती है, फिर गंगोत्री पर बरस जाती है, फिर धारा बहने लगती है--एक वर्तुल है जीवन का--उसका कोई अंत नहीं है।यह सभी ध्यान का

सूत्र है ..या तो 'काम' पर ध्यान को गड़ाओ, तो वहां से तुम्हें कुंजी मिलेगी। या मृत्यु में ध्यान को गड़ाओ, तो वहां से कुंजी मिलेगी। उन्हीं दो छोरों से छलांग लगती है, वहीं तट है; वहां से तुम सागर में कूद सकते हो।

धार्मिक व्यक्ति परमात्मा को धन्यवाद देता है। अधार्मिक प्रार्थना करता है। धार्मिक की प्रार्थना सदा धन्यवाद है। अधार्मिक की प्रार्थना सदा मांग है, कुछ दो। और धार्मिक की प्रार्थना सदा यह है कि तूने इतना दिया है कि मैं अनुगृहीत हूं। अब और क्या मांगना है?

7-मृत्यु के प्रति जो जागेगा, वह शरीर के प्रति भी जागेगा। क्योंकि शरीर और मृत्यु एक ही अर्थ रखते हैं। जैसे ही तुम शरीर के प्रति जागोगे, मृत्यु के प्रति जागोगे। वैसे ही फासला होना शुरू हो जायेगा। और फासला इतना बड़ा है कि उससे