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ध्यान करने की अनेकों विधियों वॉकिंग मेडिटेशन/Walking meditation


ध्यान करने की अनेकों विधियों में एक विधि यह है कि ध्यान किसी भी विधि से किया नहीं जाता, हो जाता है। ध्यान की योग और तंत्र में हजारों विधियां बताई गई है। हिन्दू, जैन, बौद्ध तथा साधु संगतों में अनेक विधि और क्रियाओं का प्रचलन है। विधि और क्रियाएं आपकी शारीरिक और मानसिक तंद्रा को तोड़ने के लिए है जिससे की आप ध्यानपूर्ण हो जाएं। यहां प्रस्तुत है ध्यान की सरलतम विधियां, लेकिन चमत्कारिक। विशेष : ध्यान की हजारों विधियां हैं। lord shiv ने माँ पार्वती को 112 विधियां बताई थी जो ‘विज्ञान भैरव तंत्र‘ में संग्रहित हैं। इसके अलावा ved , puran और upnishad में ढेरों विधियां है। संत, महात्मा विधियां बताते रहते हैं। उनमें से खासकर ‘ओशो रजनीश’ ने अपने प्रवचनों में ध्यान की 150 से ज्यादा विधियों का वर्णन किया है।

कुछ महत्‍वपूर्ण ध्‍यान: (1) साक्षी को खोजना— ओशो शिव ने कहा: होश को दोनों भौहों के मध्‍य में लाओ और मन को विचार के समक्ष आने दो। देह को पैर से सिर तक प्राण तत्‍व से भर जाने दो, ओर वहां वह प्रकाश की भांति बरस जाए।

वह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस वह विधि लेकर ग्रीस गया। और वास्‍तव में यह पश्‍चिम में सारे रहस्‍यवाद का उद्गम बन गया। स्‍त्रोत बन गया। वह पश्‍चिम में पूरे रहस्‍यवाद का जनक है।

यह विधि बहुत गहन पद्धतियों में से है। इसे समझने का प्रयास करो: “होश को दोनों भौहों के मध्‍य में लाओ।”

आधुनिक मनोविज्ञान और वैज्ञानिक शोध कहती है कि दोनों भौंहों के मध्‍य में एक ग्रंथि है जो शरीर का सबसे रहस्‍यमय अंग है। यह ग्रंथि, जिसे पाइनियल ग्रंथि कहते है। यही तिब्‍बतियों का तृतीय नेत्र है—शिवनेत्र : शिव का, तंत्र का नेत्र। दोनों आंखों के बीच एक तीसरी आँख का अस्‍तित्‍व है, लेकिन साधारणत: वह निष्‍कृय रहती है। उसे खोलने के लिए तुम्‍हें कुछ करना पड़ता है। वह आँख अंधी नहीं है। वह बस बंद है। यह विधि तीसरी आँख को खोलने के लिए ही है।

“होश को दोनों भौंहों के मध्‍य में लाऔ।”……अपनी आंखें बंद कर लो, और अपनी आंखों को दोनों भौंहों के ठीक बीच में केंद्रित करो। आंखे बंद करके ठीक मध्‍य में होश को केंद्रित करो, जैसे कि तुम अपनी दोनों आँखो से देख रहे हो। उस पर पूरा ध्‍यान दो।

वह विधि सचेत होने के सरलतम उपायों में से है। तुम शरीर के किसी अन्‍य अंग के प्रति इतनी सरलता से सचेत नहीं हो सकते। यह ग्रंथि होश को पूरी तरह आत्‍मसात कर लेती है। यदि तुम उस पर होश को भ्रूमध्‍य पर केंद्रित करो तो तुम्‍हारी दोनों आंखें तृतीय नेत्र से सम्‍मोहित हो जाती है। वे जड़ हो जाती है, हिल भी नहीं सकती। यदि तुम शरीर के किसी अन्‍य अंग के प्रति सचेत होने का प्रयास कर रहे हो तो यह कठिन है। यह तीसरी आँख होश को पकड़ लेती है। होश को खींचती है। वह होश के लिए चुम्‍बकीय है। तो संसार भर की सभी पद्धतियों ने इसका उपयोग किया है। होश को साधने का यह सरलतम उपाय है। क्‍योंकि तुम ही होश को केंद्रित करने का प्रयास नहीं कर रहे हो; स्‍वयं वह ग्रंथि भी तुम्‍हारी मदद करती है; वह चुम्‍बकीय है। तुम्‍हारा होश बलपूर्वक उनकी और खींच लिया जाता है। वह आत्‍मसात हो जाता है।

तंत्र के प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि होश तीसरी आँख का भोजन है। वह आँख भूखी है; जन्‍मों-जन्‍मों से भूखी है। यदि तुम उस पर होश को लाओगे तो वह जीवंत हो जाती है। उसे भोजन मिल जाता है। एक बार बस तुम इस कला को जान जाओं। तुम्‍हारा होश स्‍वयं ग्रंथि द्वारा ही चुम्‍बकीय ढंग से खिंचता है। आकर्षित होता है। तो फिर होश को साधना कोई कठिन बात नहीं है। व्‍यक्‍ति को बस ठीक बिंदु जान लेना होता है। तो बस अपनी आंखें बंद करों, दोनों आँखो को भ्रूमध्‍य की और चले जाने दो, और उस बिंदु को अनुभव करो। जब तुम उस बिंदु के समीप आओगे तो अचानक तुम्‍हारी आँख जड़ हो जाएंगी। जब उन्‍हें हिलाना कठिन हो जाए तो जानना कि तुमने ठीक बिंदु को पकड़ लिया है।

‘’होश को दोनों भौंहों के मध्‍य में लाओ और मन को विचार के समक्ष आने दो।‘’……यदि यह होश लग जाए तो पहली बार तुम्‍हें एक अद्भुत अनुभव होगा। पहली बार तुम विचारों को अपने सामने दौड़ता हुआ अनुभव करोगे। तुम साक्षी हो जाओगे। यह बिलकुल फिल्‍म के परदे जैसा होता है। विचार दौड़ रहे है और तुम एक साक्षी हो।

सामान्‍यतया तुम साक्षी नहीं होते: तुम विचारों के साथ एकात्‍म हो। यदि क्रोध आता है तो तुम क्रोध ही हो जाते हो। कोई विचार उठता है तो तुम उसके साक्षी नहीं हो सकते। तुम विचार के साथ एक हो जाते हो। एकात्‍म हो जाते हो, और इसके साथ ही चलने लगते हो। तुम एक विचार ही बन जाते हो। जब काम उठता है तो तुम काम ही बन जाते हो। जब क्रोध उठता है तो तुम क्रोध ही बन जाते हो। जब लोभ बनता है तो तुम लोभ ही बन जाते हो। कोई चलता हुआ विचार और उनसे तुम्‍हारा तादात्म्य हो जाता है। विचार और तुम्‍हारे बीच में कोई अंतराल नहीं होता।

लेकिन तृतीय नेत्र पर केंद्रित होकर तुम अचानक एक साक्षी हो जाते हो। तृतीय नेत्र के द्वारा तुम विचारों को ऐसे ही देख सकते हो जैसे की आकाश में बादल दौड़ रहे हों, अथवा सड़क पर लोग चल रहे है।

साक्षी होने का प्रयास करो। जो भी हो रहा हो, साक्षी होने का प्रयास करो। तुम बीमार हो, तुम्‍हारा शरीर दुःख रहा है और पीड़ित है, तुम दुःखी और पीड़ित हो , जो भी हो रहा है, स्‍वयं का उससे तादात्‍म्‍य मत करो। साक्षी बने रहो। द्रष्‍टा बने रहो। फिर यदि साक्षित्‍व संभव हो जाए तो तुम तृतीय नेत्र मे केंद्रित हो जाओगे।

दूसरा, इससे उल्‍टा भी हो सकता है। यदि तुम तृतीय नेत्र में केंद्रित हो तो तुम साक्षी बन जाओगे। ये दोनों चीजें एक ही प्रक्रिया के हिस्‍से है। तो पहली बात: तृतीय नेत्र में केंद्रित होने से साक्षी का प्रादुर्भाव होगा। अब तुम अपने विचारों (से साक्षात्‍कार कर सकते हो। यह पहली बात होगी। और दूसरी बात यह होगी कि अब तुम श्‍वास के सूक्ष्‍म और कोमल स्‍पंदन को अनुभव कर सकोगे। अब तुम श्‍वास के प्रारूप को श्‍वास के सार तत्व को अनुभव कर सकेत हो।

पहले यह समझने का प्रयास करो कि ‘’प्रारूप’’ का, श्‍वास के सार तत्व का क्‍या अर्थ है। श्‍वास लेते समय तुम केवल हवा मात्र भीतर नहीं ले रहे हो। विज्ञान कहता है कि तुम केवल वायु भीतर लेते हो—बस ऑक्‍सीजन, हाइड्रोजन व अन्‍या गैसों का मिश्रण। वे कहते है कि तुम ‘’वायु’’ भीतर ले रहे हो। लेकिन तंत्र कहता है कि वायु बस एक वाहन है, वास्‍तविक चीज नहीं है। तुम प्राण को, जीवन शक्‍ति को भीतर ले रहे हो। वायु केवल माध्‍यम है; प्राण उसकी अंतर्वस्‍तु है। तुम केवल वायु नहीं, प्राण भीतर ले रहे हो।

तृतीय नेत्र में केंद्रित होने से अचानक तुम श्‍वास के सार तत्व को देख सकते हो—श्‍वास को नहीं बल्‍कि श्‍वास के सार तत्व को, प्राण को। और यदि तुम श्‍वास के सार तत्व को, प्राण को देख सको तो तुम उसे बिंदु पर पहुंच गए जहां से छलांग लगती है, अंतस क्रांति घटित होती है।

(2) पंख की भांति छूना ध्‍यान शिव ने कहा: आँख की पुतलियों को पंख की भांति छूने से उसके बीच का हलका पन ह्रदय में खुलता है।

अपनी दोनों हथेलियों का उपयोग करो, उन्‍हें अपनी बंद आँखो पर रखो, और हथेलियों को पुतलियों पर छू जाने दो—लेकिन पंख के जैसे, बिना कोई दबाव डाले। यदि दबाव डाला तो तुम चूक गए, तुम पूरी विधि से ही चूक गए। दबाव मत डालों; बस पंख की भांति छुओ। तुम्‍हें थोड़ा समायोजन करना होगा क्‍योंकि शुरू में तो तुम दबाब डालोगे। दबाव का कम से कम करते जाओ जब तक कि दबाब बिलकुल समाप्‍त न हो जाए—बस तुम्‍हारी हथैलियां पुतलियों को छुएँ। बस एक स्‍पर्श, बाना दबाव का एक मिलन क्‍योंकि यदि दबाव रहा तो यह विधि कार्य नहीं करेगी। तो बस एक पंख की भांति।

क्‍यों?—क्‍योंकि जहां सुई का काम हो वहां तलवार कुछ भी नहीं कर सकती। यदि तुमने दबाव डाला, तो उसका गुणधर्म बदल गया—तुम आक्रामक हो गए। और जो ऊर्जा आंखों से बह रहा है वह बहुत सूक्ष्‍म है: थोड़ा सा दबाव, और वह संघर्ष करने लगती है जिससे एक प्रतिरोध पैदा हो जाता है। यदि तुम दबाव डालोगे तो जो ऊर्जा आंखों से बह रही है वह एक प्रतिरोध, एक लड़ाई शुरू कर देगी। एक संघर्ष छिड़ जाएगा। इसलिए दबाव मत डालों आंखों की ऊर्जा को थोड़े से दबाव का भी पता चल जाता है।

वह ऊर्जा बहुत सूक्ष्‍म है, बहुत कोमल है। दबाव मत डालों—बस पंख की भांति, तुम्‍हारी हथैलियां ही छुएँ, जैसे कि स्‍पर्श हो ही न रहा हो। स्‍पर्श ऐसे करो जैसे कि वह स्‍पर्श ने हो, दबाव जरा भी न हो; बस एक स्‍पर्श, एक हलका-सा एहसास कि हथेली पुतली को छू रही है, बस। इससे क्‍या होगा? जब तुम बिना दबाव डाले हलके से छूते हो तो ऊर्जा भीतर की और जाने लगती है। यदि तुम दबाव डालों तो वह हाथ के साथ, हथेली के साथ लड़ने लगती है। और बहार निकल जाती है। हल्‍का-सा स्‍पर्श, और ऊर्जा भीतर जाने लगती है। द्वार बंद हो जाता है। बस द्वार बंद होता है और ऊर्जा वास लौट पड़ती है। जिस क्षण ऊर्जा वापस लौटती है, तुम आपने चेहरे और सिर पर एक हलकापन व्‍याप्‍त होता अनुभव करोगे। यह वापस लौटती ऊर्जा तुम्‍हें हल्‍का कर देती है।

और इन दोनों आंखों के बीच में तीसरी आंख, प्रज्ञा-चक्षु है। ठीक दोनों आंखों के मध्‍य में तीसरी आँख है। आँखो से वापस लोटती ऊर्जा तीसरी आँख से टकराती है। यहीं कारण है कि व्‍यक्‍ति हल्‍का और जमीन से उठता हुआ अनुभव करता है। जैसे कि कोई गुरुत्वाकर्षण न रहा हो। और तीसरी आँख से ऊर्जा ह्रदय पर बरस जाती है; यह एक शारीरिक प्रक्रिया है: बूंद-बूंद करके ऊर्जा टपकती है। और तुम अत्‍यंत हल्‍कापन अपने ह्रदय में प्रवेश करता अनुभव करोगे। ह्रदय गति कम हो जाएगी। श्‍वास धीमी हो जाएगी। तुम्‍हारा पूरा शरीर विश्रांत अनुभव करेगा।

यदि तुम गहन ध्‍यान में प्रवेश नहीं भी कर रहे हो, तो भी यह प्रयोग तुम्‍हें शारीरिक रूप से उपयोगी होगा। दिन में किसी भी समय, आराम से कुर्सी पर बैठ जाओ—या तुम्‍हारे पास यदि कुर्सी न हो, जब तुम रेलगाड़ी में सफर कर रहे हों—तो अपनी आंखें बंद कर लो। पूरे शरीर में एक विश्रांति अनुभव करो। और फिर दोनों हथेलियों को अपनी आंखों पर रख लो। लेकिन दबाव मत डालों—यह बड़ी महत्‍वपूर्ण बात है। बस पंख की भांति छुओ।

जब तुम स्‍पर्श करो और दबाव न डालों, तो तुम्‍हारे विचार तत्‍क्षण रूक जाएंगे। विश्रांत मन में विचार नहीं चल सकते। वे जम जाते है। विचारों को उन्‍माद और बुखार की जरूरत होती है। उनके चलने के लिए तनाव की जरूरत होती है। वे तनाव के सहारे ही जीते है। जब आंखें शांत व शिथिल हों और ऊर्जा पीछे लौटने लगे तो विचार रूक जायेंगे। तुम्‍हें एक मस्‍ती का अनुभव होगा। जो रोज-रोज गहराता जाएगा। तो इस प्रयोग को दिन में कई बार करो। एक क्षण के लिए छूना भी अच्‍छा रहेगा। जब भी तुम्‍हारी आंखे थकी हुई ऊर्जा विहीन और चुकी हुई महसूस करें—पढ़कर, फिल्‍म देखकर, या टेलिविजन देखकर। जब भी तुम्‍हें ऐसा लगे, अपनी आंखे बंद कर लो। और स्‍पर्श करो मोर पंखी। तत्‍क्षण प्रभाव होगा। लेकिन यदि तुम इसे एक ध्‍यान बनाना चाहते हो तो इसे कम से कम चालीस मिनट के लिए करो। और पूरी बात यही है कि दबाव नहीं डालना। एक क्षण के लिए तो पंख जैसा स्‍पर्श सरल है; चालीस मिनट के लिए कठिन है। कई बार तुम भूल जाओगे और दबाव डालने लगोगे।

दबाव मत डालों। चालीस मिनट के लिए वह बोध बनाए रहो कि तुम्‍हारे हाथों में कोई बोझ नहीं है। वे बस स्‍पर्श कर रहे है। यह बोध बनाए रहो कि वे दबाव नहीं डाल रहे है, बस स्‍पर्श कर रहे है। यह एक गहन बोध बन जाएगा। बिलकुल ऐसे जैसे श्‍वास-प्रश्‍वास। जैसे बुद्ध कहते है कि पूरे जाग कर श्‍वास लो। ऐसा ही स्‍पर्श के साथ भी होगा। तुम्‍हें सतत स्‍मरण रखना होगा कि तुम दबाव नहीं डाल रहे। तुम्‍हारा हाथ बस एक पंख, एक भारहीन वस्‍तु बन जाना चाहिए। जो बस छुए। तुम्‍हारा चित समग्ररतः: सचेत होकर वहां आंखों के पास लगा रहेगा। और ऊर्जा सतत बहती रहेगी। शुरू में तो वह बूंद-बूंद करके ही टपकेगी। कुछ ही महीनों में तुम्‍हें लगेगा वह सरिता सी हो गई है, और एक साल बीतते-बीतते तुम्‍हें लगेगा कि वह एक बाढ़ की तरह हो गई है। और जब ऐसा होता है—‘’आँख की पुतलियाँ को पंख की भांति छूने से उनके बीच का हलकापन…।‘’ जब तुम स्‍पर्श करोगे तो तुम्‍हें हलकापन महसूस कर सकते हो। जैसे की तुम स्‍पर्श करते हो, तत्क्षण एक हलकापन आ जाता है। और वह ‘’उनके बीच का हलकापन ह्रदय में खुलता है।‘’…वह हलकापन ह्रदय में प्रवेश कर जाता है, खुल जाता है। ह्रदय में केवल हलकापन ही प्रवेश कर सकता है। कोई भी बोझिल चीज प्रवेश नहीं कर सकती है। ह्रदय के साथ बहुत हल्‍की फुलकी घटनाएं ही घट सकती है।

दोनों आंखों के बीच का यह हलकापन ह्रदय में टपकने लगेगा। और ह्रदय उसको ग्रहण करने के लिए खुल जाएगा—‘’और वहां ब्रह्मांड व्‍याप जाता है।‘’ और जैसे-जैसे यह बहती ऊर्जा पहले एक धारा, फिर एक सरिता और फिर एक बाढ़ बनती है तुम पूरी तरह बह जाओगे, दूर बह जाओगे। तुम्‍हें लगेगा ही नहीं कि तुम हो। तुम्‍हें लगेगा कि बस ब्रह्मांड ही है। श्‍वास लेते हुए, श्‍वास छोड़ते हुए तुम्‍हें ऐसा ही लगेगा। कि तुम ब्रह्मांड बन गए हो। ब्रह्मांड भीतर आता है और ब्रह्मांड बाहर जाता है। वह इकाई जो तुम सदा बने रहे—अहंकार—वह नहीं बचता।

(3) नासाग्र को देखना (ध्‍यान)— यह प्रयोग तुम्‍हें तृतीय नेत्र की रेखा पर ले आता है। जब तुम्‍हारी दोनों आंखें नासाग्र पर केंद्रित होती है तो उससे कई बातें होती है। मूल बात यह है कि तुम्‍हारा तृतीय नेत्र नासाग्र की रेखा पर है—कुछ इंच ऊपर, लेकिन उसी रेखा में। और एक बार तुम तृतीय नेत्र की रेखा में आ जाओ तो तृतीय नेत्र का आकर्षण उसका खिंचाव, उसका चुम्‍बकत्‍व रतना शक्‍तिशाली है कि तुम उसकी रेखा में पड़ जाओं तो अपने बावजूद भी तुम उसकी और खींचे चले आओगे। तुम बस ठीक उसकी रेखा में आ जाना है, ताकि तृतीय नेत्र का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण सक्रिय हो जाए। एक बार तुम ठीक उसकी रेखा में आ जाओं तो किसी प्रयास की जरूरत नहीं है।

अचानक तुम पाओगे कि गेस्‍टाल्‍ट बदल गया, क्‍योंकि दो आंखें संसार और विचार का द्वैत पैदा करती है। और इन दोनों आंखों के बीच की एक आँख अंतराल निर्मित करती है। यह गेस्‍टाल्‍ट को बदलने की एक सरल विधि है।

मन इसे विकृत कर सकता है—मन कह सकता है, “ठीक अब, नासाग्र को देखो। नासाग्र का विचार करो, उस चित को एकाग्र करो।” यदि तुम नासाग्र पर बहुत एकाग्रता साधो तो बात को चूक जाओगे, क्‍योंकि होना तो तुम्‍हें नासाग्र पर है, लेकिन बहुत शिथिल ताकि तृतीय नेत्र तुम्‍हें खींच सके। यदि तुम नासाग्र पर बहुत ही एकाग्रचित्त, मूल बद्ध, केंद्रित और स्‍थिर हो जाओ तो तुम्‍हारा तृतीय नेत्र तुम्‍हें भीतर नहीं खींच सकेगा क्‍योंकि वह पहले कभी भी सक्रिय नहीं हुआ। प्रारंभ में उसका खिंचाव बहुत ज्‍यादा नहीं हो सकता। धीरे-धीरे वह बढ़ता जाता है। एक बार वह सक्रिय हो जाए और उपयोग में आने लगे, तो उसके चारों और जमी हुई धूल झड़ जाए, और यंत्र ठीक से चलने लगे। तुम नासाग्र पर केंद्रित भी हो जाओ तो भी भीतर खींच लिए जाओगे। लेकिन शुरू-शुरू में नहीं। तुम्‍हें बहुत ही हल्‍का होना होगा, बोझ नहीं—बिना किसी खींच-तान के। तुम्‍हें एक समर्पण की दशा में बस वहीं मौजूद रहना होगा।…..

“यदि व्यक्ति नाक का अनुसरण नहीं करता तो यह तो वह आंखें खोलकर दूर देखता है जिससे कि नाक दिखाई न पड़े अथवा वह पलकों को इतना जोर से बंद कर लेता है कि नाक फिर दिखाई नहीं पड़ती।”

नासाग्र को बहुत सौम्‍यता से देखने का एक अन्‍य प्रयोजन यह भी है: कि इससे तुम्‍हारी आंखें फैल कर नहीं खुल सकती। यदि तुम अपनी आंखे फैल कर खोल लो तो पूरा संसार उपलब्‍ध हो जाता है। जहां हजारों व्‍यवधान है। कोई सुंदर स्‍त्री गुजर जाती है और तुम पीछा करने लगते हो—कम से कम मन में। या कोई लड़ रहा है; तुम्‍हारा कुछ लेना देना नहीं है, लेकिन तुम सोचने लगते हो कि “क्‍या होने वाला है?” या कोई रो रहा है और तुम जिज्ञासा से भर जाते हो। हजारों चीजें सतत तुम्‍हारे चारों और चल रही है। यदि आंखे फैल कर खुली हुई है तो तुम पुरूष ऊर्जा—याँग—बन जाते हो।

यदि आंखे बिलकुल बंद हो तो तुम एक प्रकार सी तंद्रा में आ जाते हो। स्‍वप्‍न लेने लगते हो। तुम स्‍त्रैण ऊर्जा—यन—बन जाते हो। दोनों से बचने के लिए नासाग्र पर देखो—सरल सी विधि है, लेकिन परिणाम लगभग जादुई है।

और ऐसा केवल ताओ को मानने वालों के साथ ही है। बौद्ध भी इस बात को जानते है, हिंदू भी जानते है। ध्‍यानी साधक सदियों से किसी न किसी तरह इस निष्‍कर्ष पर पहुंचते रहे है कि आंखे यदि आधी ही बंद हों तो अत्‍यंत चमत्‍कारिक ढंग से तुम दोनों गड्ढों से बच जाते हो। पहली विधि में साधक बह्म जगत से विचलित हो रहा है। और दूसरी विधि में भीतर के स्‍वप्‍न जगत से विचलित हो रहा है। तुम ठीक भीतर और बाहर की सीमा पर बने रहते हो और यही सूत्र है: भीतर और बाहर की सीमा पर होने का अर्थ है उस क्षण में तुम न पुरूष हो न स्‍त्री हो तुम्‍हारी दृष्‍टि द्वैत से मुक्‍त है; तुम्‍हारी दृष्‍टि तुम्‍हारे भीतर के विभाजन का अतिक्रमण कर गई। जब तुम अपने भीतर के विभाजन से पार हो जाते हो, तभी तुम तृतीय नेत्र के चुम्‍बकीय क्षेत्र की रेखा में आते हो।

“मुख्‍य बात है पलकों को ठीक ढंग से झुकाना और तब प्रकाश को स्‍वयं ही भीतर बहने देना।” इसे स्‍मरण रखना बहुत महत्‍वपूर्ण है: तुम्‍हें प्रकाश को भीतर नहीं खींचना है, प्रकाश को बलपूर्वक भीतर नहीं लाना है। यदि खिड़की खुली हो तो प्रकाश स्‍वयं ही भीतर आ जाता है। यदि द्वार खुला हो तो भीतर प्रकाश की बाढ़ जा जाती है। तुम्‍हें उसे भीतर प्रकाश की बाढ़ आ जाती है। तुम्‍हें उसे भीतर लाने की जरूरत नहीं है। उसे भीतर धकेलने की जरूरत नहीं है। भीतर घसीटने की जरूरत नहीं है। और तुम प्रकाश को भी तर कैसे घसीट सकते हो? प्रकाश को तुम भीतर कैसे धकेल सकते हो? इतना ही चाहिए कि तुम उसके प्रति खुले और संवेदनशील रहो।…..

“दोनों आंखों से नासाग्र को देखना है।” स्‍मरण रखो, तुम्‍हें दोनों आँखो से नासाग्र को देखना है ताकि नासाग्र पर दोनों आंखे अपने द्वैत को खो दें। तो जो प्रकाश तुम्‍हारी आंखों से बाहर बह रहा है वह नासाग्र पर एक हो जाता है। वह एक केंद्र पर आ जाता है। जहां तुम्‍हारी दोनों आंखें मिलती है, वहीं स्‍थान है जहां खिड़की खुलती है। और फिर सब शुभ है। फिर इस घटना को होने दो, फिर तो बस आदत मनाओ, उत्‍सव मनाओ, हर्षित होओ। प्रफुल्‍लित होओ। फिर कुछ भी नहीं करना है।

“दोनों आंखों से नासाग्र को देखना है, सीधा होकर बैठता है।” सीधी होकर बैठना सहायक है। जब तुम्‍हारी रीढ़ सीधी होती है। तुम्‍हारे काम-केंद्र की ऊर्जा भी तृतीय नेत्र को उपलब्‍ध हो जाती है। सीधी-सादी विधियां है, कोई जटिलता इनमें नहीं है, बस इतना ही है कि जब दोनों आंखें नासाग्र पर मिलती है, तो तुम तृतीय नेत्र के लिए उपलब्‍ध कर दो। फिर प्रभाव दुगुना हो जाएगा। प्रभाव शक्तिशाली हो जाएगा, क्‍योंकि तुम्‍हारी सारी ऊर्जा काम केंद्र में ही है। जब रीढ़ सीधी खड़ी होती है तो काम केंद्र की ऊर्जा भी तृतीय नेत्र को उपलब्‍ध हो जाती है। यह बेहतर है कि दोनों आयामों से तृतीय नेत्र पर चोट की जाए, दोनों दिशाओं से तृतीय नेत्र में प्रवेश करने की चेष्‍टा की जाए।

“व्‍यक्‍ति सीधा होकर और आराम देह मुद्रा में बैठता है।” सदगुरू चीजों को अत्‍यंत स्‍पष्‍ट कर रहे है। सीधे होकर, निश्‍चित ही, लेकिन इसे कष्‍टप्रद मत बनाओ; वरन फिर तुम अपने कष्‍ट से विचलित हो जाओगे। योगासन का यही अर्थ है। संस्‍कृत शब्‍द ‘’आसन’’ का अर्थ है: एक आरामदेह मुद्रा। आराम उसका मूल गुण है। यदि वह आरामदेह न हो तो तुम्‍हारा मन कष्‍ट से विचलित हो जाएगा। मुद्रा आरामदेह ही हो….. “और इसका अर्थ अनिवार्य रूप से सिर के मध्‍य में होना नहीं है।” और केंद्रिय होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्‍हें सिर के मध्‍य में केंद्रित होना है।

“केंद्र सर्वव्‍यापी है; सब कुछ उसमें समाहित है; वह सृष्‍टि की समस्‍त प्रक्रिया के निस्‍तार से जुड़ा हुआ है।” और जब तुम तृतीय नेत्र के केंद्र पर पहुंच कर वहां केंद्रित हो जाते हो और प्रकाश बाढ़ की भांति भीतर आने लगता है, तो तुम उस बिंदु पर पहुंच गए, जहां से पूरी सृष्‍टि उदित हुई है। तुम निराकार और अप्रकट पर पहुच गए। चाहो तो उसे परमात्‍मा कह लो। यही वह बिंदु है, यह वह आकाश है, जहां से सब जन्‍मा है। यही समस्‍त अस्‍तित्‍व का बीज है। यह सर्वशक्‍तिमान है। सर्वव्‍यापी है, शाश्‍वत है।……

“ध्‍यान की साधन अपरिहार्य है।” ध्‍यान क्‍या है?—निर्विचार का एक क्षण। निर्विचार की एक दशा, एक अंतराल। और यह सदा ही घट रहा है, लेकिन तुम इसके प्रति सजग नहीं हो; वरना तो इसमें कोई समस्‍या नहीं है। एक विचार आता है, फिर दूसरा आता है, और उन दो विचारों के बीच में सदा एक छोटा सा अंतराल होता है। और वह अंतराल ही दिव्‍य का द्वार है, वह अंतराल ही ध्‍यान है। यदि तुम उस अंतराल ही ध्‍यान है। यदि तुम उस अंतराल में गहरे देखो, तो वह बड़ा होने लगता है। मन ट्रैफिक से भरी हुई एक सड़क की तरह है; एक कार गुजरती है फिर दूसरी कार गुजरती है फिर दूसरी कार गुजरती है। और तुम कारों से इतने ज्‍यादा ग्रसित हो कि तुम्‍हें वह अंतराल तो दिखाई ही नहीं पड़ता जो दो कारों के बीच सदा मौजूद है। वरना तो कारें आपस में टकरा जाएंगी। वे टकराती नहीं; उनके बीच में कुछ है जो उन्‍हें अलग रखता है। तुम्‍हारे विचार आपस में नहीं टकराते, एक दूसरे पर नहीं चढ़ते, एक दूसरे में नहीं मिल जाते। वे किसी भी तरह एक दूसरे पर नहीं चढ़ते। हर विचार की अपनी सीमा होता है, हार विचार परिभाष्‍य होता है। लेकिन विचारों का जुलूस इतना तेज होता है, इतना तीव्र होता है कि अंतराल को तुम तब तक नहीं देख सकते, जब तक कि तुम उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहे हो। उसकी खोज नहीं कर रहे हो। ध्‍यान का अर्थ है गेस्‍टाल्‍ट को बदल डालना। साधारणत: हम विचारों को देखते है: एक विचार, दूसरा विचार, फिर कोई और विचार। जब तुम गेस्‍टाल्‍ट को बदल देते हो तो तुम एक अंतराल को देखते हो, फिर दूसरे अंतराल को देखते हो। तुम्‍हारा आग्रह विचार पर नहीं रहता। अंतराल पर आ जाता है। ‘’यदि सांसारिक विचार उठे तो व्‍यक्‍ति जड़ न बैठा रहे, वरन निरीक्षण करे कि विचार कहां से शुरू हुआ, और कहां विलीन हुआ।‘’ यह पहले ही प्रयास में नहीं होने वाला है। तुम नासाग्र पर देख रहे होओगे और विचार आ जाएंगे। वे इतने जन्‍मों से आते रहे है कि इतनी सरलता से तुम्‍हें नहीं छोड़ सकते। वे तुम्‍हारा हिस्‍सा बन गए है। तुम करीब-करीब एक पूर्वनिर्धारित जीवन जी रहे हो। ऐसा होता है: जब लोग ध्‍यान में शांत होकर बैठते है, तो सामान्‍यत: जितने विचार आते है। तब उससे अधिक विचार आते है—असमान्‍य विस्‍फोट होते है। लाखों विचार दौड़ें चले आते है, क्‍योंकि उनका अपना स्‍वार्थ है तुम्हें, और तुम उनकी ताकत से बाहर निकलने की चेष्‍टा कर रहे हो? तुम शांत होकर बैठे नहीं रह सकते। तुम्‍हें कुछ करना पड़ेगा। संघर्ष से तो कोई लाभ नहीं होगा। क्‍योंकि तुम यदि संघर्ष करने लगे तो तुम नासाग्र पर देखना भूल जाओगे। तृतीय नेत्र का, प्रकाश के प्रवाह को बोध खो जाएगा; तुम सब भूल कर विचारों के जंगल में खो जाओगे। यदि तुम विचारों का पीछा करने लगे तो तुम खो गए। उसका अनुसरण करने लगे तो तुम खो गए। उनके साथ तुम संघर्ष करने लगे तो भी तुम खो गए। तो फिर क्‍या करना? और यही राज है। बुद्ध भी इसी राज को उपयोग में लाए। वास्‍तव में सभी राज तो लगभग एक से ही है क्‍योंकि मनुष्‍य यही है—ताला वही है, जो कुंजी भी वहीं होनी चाहिए। यही राज है; बुद्ध इसे सम्मा सती, सम्‍यक स्‍मृति कहते है। इतना स्‍मरण रखो: यह विचार आया है, बिना किसी विरोध, बिना किसी दलील , बिना किसी निंदा के देखो कि वह है, कहां एक वैज्ञानिक की भांति निरीक्षक हो रहो। देखो कि वह कहां है, कहां से आ रहा है। कहां जा रहा है। उसके आने को देखो उसके रूकने को देखो उसके जाने को देखो। और विचार बहुत गत्‍यात्‍मक है; वे देर तक नहीं रुकते। तुम्‍हें तो बस विचार के उठने उसके रूकने, उसके जाने को देखना भर है। न संघर्ष करने की चेष्‍टा करो। न अनुसरण करो, बस एक मौन निरीक्षक बने रहो। और तुम्‍हें हैरानी होगी; निरीक्षक जितना थिर हो जाता है, विचार उतने ही कम आएँगे। जब निरीक्षक बिलकुल पूर्ण हो जाता है तो विचार समाप्‍त हो जाते है। बस एक अंतराल, एक मध्‍यांतर ही बचता है। लेकिन एक बात और याद रखना: मन फिर से एक चाल चल सकता है। ‘’प्रतिबिंब को आगे सरकाने से कुछ भी प्राप्‍त नहीं होता।‘’ यही फ्रायडियन मनोविश्‍लेषण भी है: विचारों की मुक्‍त साहचर्य शृंखला। एक विचार आता है, और फिर तुम दूसरे विचार की प्रतीक्षा करते हो, और फिर तीसरे की, और यह पूरी शृंखला है। … हर मनोविश्‍लेषण यही कहता है—तुम अतीत में पीछे जाने लगते हो। एक विचार दूसरे से जुड़ा होता है। और यह शृंखला अनंत तक चलती है। उसका काई अंत नहीं है। यदि तुम उसके भीतर जाने लगो तो तुम एक अनंत यात्रा पर निकल जाओगे। और यह बिलकुल अपव्‍यय होगा। मन ऐसा कर सकता है। तो इसके प्रति सजग रहो।…. मन के द्वारा तुम मन के पार नहीं जा सकेत। इसलिए व्‍यर्थ में अनावश्‍यक चेष्‍टा मत करो। वरना एक बात तुम्‍हें दूसरे में ले जाएगी। और ऐस आगे से आगे चलता रहेगा। और तुम बिलकुल भूल ही जाओगे कि तुम क्‍या करने का प्रयास कर रहे थे। नासाग्र गायब हो जाएगा। तृतीय नेत्र भूल जाएगा। और प्रकाश का प्रवाह तो तुमसे मीलों दूर चला जाएगा। तो ये दो बातें स्‍मरण रखने की है, ये दो पंख है। एक: जब अंतराल आ जाएं, कोई विचार न चलता हो, तो ध्‍यान करो। जब कोई विचार आए तो बस इन तीन बातों को देखो: विचार कहां है, वह कहां से आया है और कहां जा रहा है। एक क्षण के लिए अंतराल को देखना छोड़ दो और विचार को देखो, उसे अलविदा करो। जब वह चला जाए, तो फिर से ध्‍यान के अभ्‍यास पर वापस लौट आओ। ‘’जब विचारों की उड़ान आग बढती जाए, जो व्‍यक्‍ति को रूक कर विचारों का निरीक्षण करना चाहिए। इस प्रकार वह ध्‍यान भी करे और तब फिर से निरीक्षण शुरू करे।‘’ तो जब भी विचार आता है, तब निरीक्षण करो। जब भी विचार जाता है तब ध्‍यान करो। ‘’यह संबोधि को तीव्रता से लाने का दोहरा उपाय है। संबोधि का अर्थ है प्रकाश का वृताकार प्रवाह। प्रवाह है निरीक्षण और प्रकाश है ध्‍यान।‘’ जब भी तुम ध्‍यान करोगे तो प्रकाश को भीतर प्रवेश करता पाओगे, और जब भी तुम एकाग्र होकर देखोगें तो प्रवाह को निर्मित करोगे। प्रवाह को संभव बनाओगे। दोनों की ही जरूरत है। ‘’प्रकाश ध्‍यान है। ध्‍यान के बिना निरीक्षण का अर्थ है प्रकाश के बिना प्रवाह।‘’ यही हुआ है। हठयोग के साथ यही दुर्घटना घटी है। वे निरीक्षण तो करते है, चित को एकाग्र तो करते है, लेकिन प्रकाश को भूल जाते है। अतिथि के विषय में वक बिलकुल भूल गए है। वे बस घर को तैयार किए चले जाते है; वे घर को तैयार करने में इतने उलझ गए है कि वे उस प्रयोजन को ही भूल गए है। जिसके लिए घर की तैयारी है। हठ योगी सतत अपने शरीर को तैयार करता है, शरीर को शुद्ध करता है, योगासन, प्राणायाम करता है। और आजीवन करता ही चला जाता है। वह भूल ही गया है कि यह सब वह कर किस लिए रहा है। और प्रकाश बाहर खड़ा है लेकिन हठ योगी उसे भीतर नहीं आने दे रहे है। क्‍योंकि प्रकाश तभी भीतर आ सकता है तब तुम पूर्णता: समर्पण की दशा में आ जाओ। ‘’ध्‍यान के बिना निरीक्षण का अर्थ है प्रकाश के बिना प्रवाह।‘’ तथाकथित योगियों के साथ यही दुर्घटना घटी है। दूसरी दुर्घटना मनोविश्‍लेषकों और दार्शनिकों के साथ घटी है। ‘’निरीक्षण के बिना ध्‍यान का अर्थ है प्रवाह के बिना प्रकाश।‘’ वे प्रकाश पर विचार करते है, लेकिन उन्‍होंने प्रकाश की बाढ़ भीतर आ सके इसके लिए तैयारी नहीं की है; वे प्रकाश पर केवल विचार करते है। वे अतिथि के विषय में सोचते है, अतिथि के विषय में हजारों बातों की कल्‍पना करते है, लेकिन उनका घर तैयार नहीं है। दोनों की चूक रहे है। ‘’इसका ख्‍याल रखो।‘’ दोनों में से किसी भी भ्रांति में मत गिरो। यदि तुम सचेत रह सको तो यह अत्‍यंत सरल सी प्रक्रिया है और गहन रूप से रूपांतरणकारी है। जो व्‍यक्‍ति ठीक ढंग से समझ ले वह एक क्षण में ही एक भिन्‍न वास्‍तविकता में प्रवेश कर सकता है।न

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परमात्मा की वाणी

हर रात को सोने के पहले तुम एक छोटा सा प्रयोग कर सकते हो जो बहुत ही सहायक होगा। प्रकाश बुझा लो, सोने के लिए तैयार हो कर अपने बिस्तर पर बैठ जाओ--पंद्रह मिनट के लिए। आंखें बंद कर लो और फिर कोई निरर्थक एकसुरी आवाज निकालना शुरू करो। उदाहरण के लिए ल ल ल ल--और प्रतीक्षा करो कि मन तुम्हें नई ध्वनियां देता जाए। एक ही बात याद रखनी है कि वे आवाजें या शब्द उस किसी भाषा के न हों जो तुम जानते हो। यदि तुम अंग्रेजी, जर्मन और इटालियन भाषा जानते हो तो उच्चारित शब्द इन भाषाओं के न हों। कोई भी भाषा जो तुम नहीं जानते हो--जैसे मान लो तिब्बती, चीनी, जापानी--उनकी ध्वनियां तुम उच्चारित कर सकते हो। लेकिन यदि तुम जापानी भाषा जानते हो, तो उसका उपयोग तुम नहीं कर सकते; तब इटालियन भाषा अच्छी होगी। वह कोई भाषा बोलो जिससे तुम अपरिचित हो। पहले दिन कुछ क्षणों के लिए तुम अड़चन में पड़ोगे, क्योंकि वह भाषा तुम कैसे बोल सकते हो जो तुम जानते ही नहीं? एक बार प्रारंभ भर हो जाए, फिर वह बोली जा सकती है। कोई भी आवाज, अर्थहीन शब्द--ताकि सतही चेतन मन को शिथिल करके, अचेतन मन को बोलने दिया जा सके। जब मन का अचेतन हिस्सा बोलता है, तो वह तो कोई भाषा नहीं जानता।... यह एक बहुत ही प्राचीन विधि है। यह ओल्ड टेस्टामेंट में, पुरानी बाइबिल में उल्लिखित है। उन दिनों इस विधि को ‘ग्लोसोलालिया’ कहा जाता था और अमेरिका के कुछ चर्च अभी भी इसका उपयोग करते हैं। वे इसे ‘जीभ की बोली’ कहते हैं। और यह एक अद्भभुत विधि है--अचेतन का भेदन करने वाली गहनतम विधियों में से यह एक विधि है। तुम ‘ल, ल, ल,’ के उच्चार से शुरू कर सकते हो, फिर बाद में जो कुछ ध्वनि आए उसके साथ बहो। केवल पहले दिन तुम थोड़ी कठिनाई अनुभव करोगे। एक बार यह चल पड़े फिर तुम इसका राज़, इसका गुर जान गए। फिर पंद्रह मिनट तक तुममें उतर रही इस अज्ञात भाषा का उपयोग करो; और इसका उपयोग एक बोलचाल की भाषा की तरह ही करो; वास्तव में तुम इस भाषा में बातचीत ही कर रहे हो। इस विधि का पंद्रह मिनट का अयास तुम्हारे चेतन मन को गहरा विश्राम दे देगा और तब तुम बस लेट जाओ और निद्रा में डूब जाओ। तुम्हारी नींद गहरी हो जाएगी। कुछ ही सप्ताह में तुम अपनी नींद में एक गहराई का अनुभव करोगे और सुबह तुम बिलकुल ताजा अनुभव करोगे।

निर्देश: देववाणी का अर्थ है परमात्मा की वाणी। इसमें साधक को माध्यम बनाकर दिव्यता ही गति करती है और बोलती है; साधक एक रिक्त पात्र और ऊर्जा प्रवाह के लिए एक मार्ग बन जाता है। यह ध्यान जीभ का लातिहान है। यह विधि चेतन मन को इतनी अधिक गहराई से शिथिल करती है कि जब इसका प्रयोग रात सोने के पहले किया जाए, तो निश्चित ही इसके बाद गहन निद्रा आने वाली है। इस विधि में पंद्रह-पंद्रह मिनट के चार चरण हैं। सभी चरणों में आंखें बंद रखो।

पहला चरण: पंद्रह मिनट

शांत बैठ जाओ कोमल संगीत को सुनो।

दूसरा चरण: पंद्रह मिनट

निरर्थक आवाजें निकालना शुरू करो, उदाहरण के लिए ‘ल, ल, ल’ से प्रारंभ करो और इसे उस समय तक जारी रखो जब तक कि एक अज्ञात भाषा-प्रवाह जैसे लगने वाले शब्द न आने लगें। ये आवाजें मस्तिष्क के उस अपरिचित हिस्से से आनी चाहिए जिसका उपयोग बचपने में शब्द सीखने के पहले तुम करते थे। बातचीत की शैली में कोमल ध्वनि वाले शब्द-प्रवाह को आने दो। न रोओ, न हंसो, न चीखो, न चिल्लाओ।

तीसरा चरण: पंद्रह मिनट

खड़े हो जाओ और अनजानी भाषा में बोलना जारी रखो और अब उच्चारित शब्दों के साथ एक लयबद्धता में शरीर को धीरे-धीरे गति करने दो, मुद्राएं बनाने दो। यदि तुम्हारा शरीर शिथिल है तो सूक्ष्म ऊर्जाएं तुम्हारे भीतर एक लातिहान नामक मुद्राएं और गतियां पैदा करेंगी, जो तुम्हारे कुछ भी किये बिना ही जारी रहेंगी।

चौथा चरण: पंद्रह मिनट

लेट जाओ, शांत और निष्क्रिय बने रहो।

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यह ध्यान शरीर और मन के भीतर पुराने गहरे खुदे हुए ढाँचे को तोड़ने के लिए है जो व्यक्ति को अतीत के कारागृह में बंद रखते हैं; और साथ ही उन कारागृहों की दीवालों के पीछे छिपी हुई स्वतंत्रता, साक्षीभाव, मौन और शांति को अनुभव करने का यह तीव्र, सघन और गहन मार्ग है। इस ध्यान को सुबह-सुबह करना है, जब "पूरी प्रकृति जीवंत हो उठी है, रात जा चुकी है, सूरज उग आया है, और सब-कुछ चेतन और सजग हो गया है।"इस ध्यान को आप अकेले कर सकते हैं लेकिन शुरुआत में इसे समूह में करना मददगार हो सकता है।यह एक व्यक्तिगत अनुभव है, इसलिए अपने आस-पास के अन्य लोगों के प्रति बेखबर बने रहें। ढीले और आरामदेह वस्त्र पहनें।यह एक घंटे का ध्यान है और इसमें पांच चरण हैं। पूरे समय अपनी आंखें बंद रखें। यदि आवश्यक हो तो आंखों पर पट्टी का उपयोग कर सकते हैं।यह एक ऐसा ध्यान है जिसमें आपको सतत जागरूक, सचेत और होशपूर्ण रहना है, चाहे आप जो भी करें। साक्षी बने रहें। और जब--चौथे चरण में आप पूर्णतः निष्क्रिय हो जाएं, जैसे जम गए हों, तब यह जागरूकता अपने चरम शिखर पर पहुंचेगी। प्रथम चरण : 10 मिनट नाक से अराजक श्वास लें और ज़ोर हमेशा श्वास बाहर फेंकने पर हो। शरीर स्वयं श्वास भीतर लेने की चिंता ले लेगा। श्वास फेफड़ों तक गहरी जानी चाहिये। श्वास जितनी शीघ्रता से ले सकें, लें और ध्यान रहे कि श्वास गहरी रहे। इसे यथाशक्ति अपनी अधिकतम समग्रता से करें - और फिर थोड़ी और शक्ति लगायें, जब तक कि आप वस्तुत: श्वास ही न हो जाएं। ऊर्जा को ऊपर ले जाने के लिये अपनी स्वाभाविक दैहिक क्रियाओं को प्रयोग में लायें। ऊर्जा को बढ़ता हुआ अनुभव करें परंतु पहले चरण में अपने को ढीला मत छोड़ें।

दूसरा चरण :-

10 मिनट विस्फोट हो जाएं! उस सब को अभिव्यक्त करें जो बाहर फेंकने जैसा है। पूर्णतया पागल हो जायें। चीखें, चिल्लाएं, रोएं, कूदें, शरीर हिलायें-डुलायें, नाचें, गाएं, हंसें; स्वयं को खुला छोड़ दें। कुछ भी न बचाएं; अपने पूरे शरीर को प्रवाहमान होने दें। कई बार थोड़ा सा अभिनय भी आपको खुलने में सहायता देता है। जो भी हो रहा है उसमें मन को हस्तक्षेप करने की अनुमति न दें। समग्र हो रहें, पूरे प्राण लगा दें, जान लगा दें।

तीसरा चरण:-

10 मिनट पूरा समय अपने बाजू ऊपर उठा कर रखें और जितनी गहराई से संभव हो "हू! हू! हू!" की ध्वनि करते हुए ऊपर नीचे कूदें । प्रत्येक बार जब आपके पांव धरती पर आयें तो पूरे पांव के तलवे को धरती को छूने दें, ताकि ध्वनि आपके काम-केंद्र पर गहराई से चोट कर सके। आप अपना सर्वस्व लगा दें, कुछ भी पीछे बचायें नहीं।

चौथा चरण:-

15 मिनट रुक जायें! जहाँ भी, जिस स्थिति में भी स्वयं को पायें, उसी में स्थिर हो रहें। शरीर को किसी तरह से भी संभालें नहीं। खांसी अथवा कोई भी क्रिया - कुछ भी, आपकी ऊर्जा की गति में बिखराव ले आयेगा और आपका अब तक का पूर्ण प्रयास व्यर्थ चला जायेगा। जो भी आपके साथ घट रहा है उसके प्रति साक्षी रहें।

पांचवां चरण:-

15 मिनट अस्तित्व के प्रति अपना अनुग्रह प्रगट करते हुए नृत्य करें, उत्सव मनायें। इस अनुभव को दिन भर की अपनी चर्या में फैलने दें। ध्यान दें:आप जिस जगह ध्यान कर रहे हैं, वहां यदि आवाज करना संभव न हो, तो यह मौन विकल्प प्रयोग में ला सकते हैं: दूसरे चरण में आवाजें निकालने की अपेक्षा रेचन को अपनी शारीरिक गतियों से होने दें। तीसरे चरण में ‘हू’ ध्वनि की चोट मौन रूप से भीतर ही भीतर की जा सकती है। पांचवां चरण अभिव्यक्तिपूर्ण नृत्य बन सकता है।

NOTE;-

"साक्षी बनें रहें। भटक मत जायें। खो जाना आसान है। जब आप तीव्र श्वास ले रहे हैं तो संभव है आप भूल जायें - श्वास के साथ इतना तादात्मय कर लें कि साक्षी होना भूल जायें। तब आप चूक गये। लेकिन फिर आप मुख्य बिंदु से चूक गए। तीव्र से तीव्र श्वास लें, गहरे से गहरा; अपने पूरे प्राण लगा दें, लेकिन साक्षी भी बने रहें। जो भी घट रहा है उसे ऐसे देखें जैसे आप मात्र दर्शक हैं, जैसे यह सब किसी और को घट रहा हो, जैसे यह सब शरीर में घट रहा हो और चेतना सिर्फ केंद्रित हो कर देख रही है। साक्षी को तीनों चरणों तक लेकर जाना है और जब सब रुक जाता है और चौथे चरण में आप पूर्णतः शिथिल हो जाते हैं, थम जाते हैं और आपकी सजगता अपने चरम शिखर को छू लेती है।”"इसमें समय लगता है - कम से कम तीन हफ्ते चाहियें इसके एहसास के लिए, और तीन माह एक अलग दुनिया में जाने के लिए। लेकिन वह भी तय नहीं है। हर व्यक्ति के लिए भिन्न होता है। अगर आपकी तीव्रता बहुत सघन है तो यह तीन दिन में भी हो सकता है।"

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कितना अच्छा हो, कि अगर चलते हुए ध्यान किया जाए। इसके लिए वॉकिंग मेडिटेशन अच्छा विकल्प है। यह एक कला है, जो आपको चलने के साथ जागरूक होना भी सिखाती है। इसे आप कहीं भी ऑफिस में, पार्क में चलते हुए, दैनिक कार्य करते हुए, बाजार से सामान खरीदते हुए कर सकते हैं। यह ध्यान खुली आंखों और सक्रिय शरीर के साथ किया जाता है। हालांकि, यह बैठने के दौरान किए गए ध्यान से काफी अलग है। यह ध्यान उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प है, जो बैठने और चिंतन करने के बजाए चलना पसंद करते हैं। तो चलिए, आज के इस आर्टिकल में हम आपको मेडिटेशन वॉक के बारे में बता रहे हैं। साथ ही बताएंगे इसके फायदे और करने का सही तरीका भी। वॉकिंग मेडिटेशन क्या है – What is walking meditation in Hindi

मेडिटेशन वॉक मेडिटेशन का ही एक प्रकार है। हालांकि, ये बहुत ज्यादा पॉपुलर नहीं है, क्योंकि अब भी बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं। मेडिटेटिव वॉक का मतलब है, चलते हुए मेडिटेशन या ध्यान करने से है। इसमें पूरा ध्यान चलने पर होता है और हर मूवमेंट को एनालिस करना पड़ता है। वॉकिंग मेडिकेशन पार्क में चलने से कई ज्यादा होता है। मेडिटेटिव वॉक का मुख्य उद्देश्य चलना है, किसी डेस्टिनेशन तक पहुंचना नहीं। इस प्रकार का ध्यान आमतौर पर नियमित रूप से चलने की तुलना में बहुत धीमी गति से किया जाता है। यह मुश्किल नहीं है, हर कोई इसे कर सकता है।

इस विधि में न केवल ध्यान चलने पर होता है, बल्कि आगे बढ़ने के लिए एक एक्ट्रीम पॉवर मिलती है। इस प्रकार के मेडिटेशन में सबसे ज्यादा मायने रखती है आपकी स्पीड, जो बहुत स्लो होनी चाहिए। इसके अलावा इसमें सांस के साथ समन्वय भी बैठाना होता है। हालांकि, बहुत से लोग मानते हैं कि सिटिंग मेडिटेशन की तुलना में वॉकिंग मेडिटेशन ज्यादा अच्छा है, लेकिन चलते हुए ध्यान करने के दौरान आपकी आंखें खुली रहती हैं और ध्यान के दौरान आपको हर कदम पर फोकस करना होता है, जिससे आपकी एकाग्रता बढ़ती है। वॉकिंग मेडिटेशन आपको चलने और सक्रिय ध्यान के स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करता है।

वॉकिंग मेडिटेशन के फायदे – Benefits of walking meditation in Hindi

वॉकिंग मेडिटेशन के कई फायदे हैं। वॉकिंग मेडिटेशन हमें आनंद और शांति की ओर ले जाता है। जब हम चलते हैं, तो हमारा सारा तनाव गायब हो जाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि इस वक्त हमारा ध्यान केवल हमारे चलने पर केंद्रित होता है।

चलते हुए ध्यान करने के कई फायदों के बारे में हम आपको नीचे बता रहे हैं:-

वॉकिंग मेडिटेशन करने से आपको लंबी दूरी तक चलने के लिए धैर्य रखने में मदद मिलती है। यह हमारी शारीरिक फिटनेस और सहनशीलता को विकसित करता है। वॉकिंग मेडिटेशन को अच्छे से किये जाने पर यह आपकी एकाग्रता में भी सुधार लाता है। गठिया रोग को दूर करने के लिए मेडिटेटिव वॉक बहुत फायदेमंद है। यह हर व्यक्ति को वर्तमान क्षण में जीने में मदद करता है साथ ही जागरूकता भी बढ़ाता है। यह मन को शांति प्रदान करने के साथ मन में एकाग्रता लाने में मददगार है। इस दौरान आप ओम का भी जाप कर सकते हैं। आपको बहुत शांति और खुशी मिलेगी। भोजन के बाद मेडिटेटिव वॉक करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और खाने के बाद यह उनिंदापन को कम करता है। मन और शरीर के बीच संबंध स्थापित करने के लिए वॉकिंग मेडिटेशन बहुत फायदेमंद है। यह नए दृष्टिकोण और विचारों के लिए आपका दिमाग खोलता है। वॉकिंग मेडिटेशन आपको पर्यावरण से अधिक गहराई से जोड़ता है। इमोशन्स और स्ट्रेस को कम करने के लिए वॉकिंग मेडिटेशन अधिक लाभकारी है। वॉकिंग मेडिटेशन करने से आपका स्टैमिना लंबे समय तक बना रहता है। साथ ही शारीरिक शक्ति भी बढ़ती है। वैकल्पिक रूप से चलते हुए ध्यान करने से स्वास्थ्य में काफी सुधार होता है। यह अच्छे स्वास्थ्य निर्माण में आपकी बहुत मदद करता है। चलने से आपके आसन में बदलाव होता है और सकुर्लेशन को भी बढ़ावा मिलता है। मेडिटेटिव वॉक में न आपको केवल चलने पर, बल्कि अन्य मूवमेंट्स पर भी ध्यान देना होता है, इससे आपका मानसिक प्रयास बढ़ता है। एकाग्रता में सुधार करने के लिए वॉकिंग मेडिटेशन बहुत अच्छा है। यदि आप काम में पूरा दिन मन लगाना चाहते हैं, तो सुबह के समय चलते हुए ध्यान करना बहुत अच्छा तरीका है। (और पढ़े – पैदल चलने के फायदे हिंदी में…)

वॉकिंग मेडिटेशन कैसे करें – How to do meditative walk in Hindi

ध्यान रखें, कि साधारण चलना वॉकिंग मेडिटेशन नहीं होता। इसके लिए आपको निर्देशों की आवश्यकता होती है। नीचे हम एक सरल प्रक्रिया के जरिए आपको बता रहे हैं, कि वॉकिंग मेडिटेशन कैसे करना चाहिए।

सबसे पहले एक आदर्श स्थान चुनें एक लेन या एक मार्ग या आप अपने आंगन को चुनना भी अच्छा विकल्प है। व्यस्त सड़क या उबड़ खाबड़ लेन से बचना सबसे अच्छा है। ऐसी जगह चुनें, जहां आप दस से बीस मिनट चल सकते हों। लेकिन सुनिश्चित करें, कि यह स्थान खाली हो। क्योंकि आपका धीमी गति से चलना उन लोगों को आकर्षित करेगा, जो इस बारे में कुछ नहीं जानते। (और पढ़े – मॉर्निंग वॉक के फायदे और स्वास्थ्य लाभ…)

अब सही ठहराव लें वॉकिंग मेडिटेशन करने के लिए आपको एक पैटर्न बनाने की जरूरत है। इस तरह आपका मन और शरीर एक निश्चित तरीके से आदी हो जाएगा और आपके लिए ध्यान केंद्रित करना आसान हो जाएगा। 20 से 40 कदम तक चलें और फिर रूक जाएं। अब खड़े रहें और सांस लें। अब फिर से पीछे जाएं और इस प्रक्रिया को दोहराए, जब तक की आप इसके आदी न हो जाएं। (और पढ़े – मेडिटेशन के दौरान ध्यान केंद्रित करने के बेहतर तरीके…)

हर स्टेप का ध्यान रखें वॉकिंग मेडिटेशन करने के लिए चलने के लिए एक विशेष पैटर्न अपनाएं। आपके द्वारा उठाए जाने वाले हर कदम का अवलोकन करना बेहद महत्वपूर्ण है। चलते समय अलग-अलग घटक होते हैं, जिन्हें देखने की आपको जरूरत होती है। अपने पैरों को उठाने, इसे आगे ले जाने, जमीन पर रखने और अपने पैरों पर जमीन के स्पर्श को महसूस करने जैसे कदमों के बारे में जागरूक रहें। उसी तरह आपको यह भी देखना होगा, कि शरीर का वजन दूसरे पैर पर कैसे जाता है।

अपनी स्पीड को बनाएं रखें मेडिटेटिव वॉक में आपको फास्ट नहीं, बल्कि थोड़ा आराम से चलना है। जितना आमतौर पर हम चलते हैं, उससे थोड़ा धीमा। लेकिन जिस गति से चल रहे हैं, उसी गति से चलते रहें। बीच-बीच में गति को धीमा या तेज न करें। विशेषज्ञों की सलाह है, कि गति हमेशा धीमी रखें और अच्छे अनुभवों के लिए छोटे-छोटे कदम उठाएं।

अपने हाथों की पोजीशन पर ध्यान दें जब आप माइंडफुल वॉक के लिए जाते हैं, तो आपको समझ नहीं आता, कि आप अपने हाथों को कैसे रखें। इसे फ्री छोड़ दें , जैसे आप टहलते हैं या फिर इनके लिए कोई विशेष पोजीशन को अपनाएं। वैसे, आपको जो स्थिति आरामदायक लगे, उसे अपनाएं। आप अपने हाथों को पीठ के पीछे रखकर या फिर सामने की ओर लहराते हुए चल सकते हैं।

अपने ध्यान को संतुलित करें वॉक करते समय फोकस किस जगह रहना चाहिए, ये देखना बेहद महत्वपूर्ण है। अपने ध्यान को संतुलित करें। वॉक करते समय आंखें नीचे की ओर रहनी चाहिए। नीचे का मतलब अपने कदमों में नहीं, बल्कि थोड़ा आगे देखकर चलें। लेकिन वहां पर घूरना नहीं है। बस कैज्युअली देखते जाएंगे और चलते जाएंगे। चलते हुए एक रिदम के साथ आप एक्टिविटी भी कर सकते हैं। अपनी चाल के साथ जोड़कर ये एक्टिविटी कर सकते हैं।

वॉकिंग मेडिटेशन कितने समय तक करना चाहिए –

मेडिटेटिव वॉक कितने समय तक करना चाहिए, ये व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। शुरूआत में आप पांच मिनट से भी कर सकते हैं और फिर इसे घंटों तक बढ़ा सकते हैं, क्योंकि जब हम बैठकर मेडिटेशन करते हैं, चलते हुए मेडिटेशन उससे ज्यादा लंबे वक्त तक कर सकते हैं।

मेडिटेशन वॉक की शुरूआत कैसे करें – How to start walking meditation in Hindi

सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि मेडिटेशन वॉक शुरू कैसे करें। पहला कदम क्या उठाएं।

सबसे पहले सीधे खड़े हो जाएं, दोनों पैर पर बराबर का वजन डालें और सेंसेशन महसूस करें, कि दोनों पैरों में बराबर का वजन है। तीन से चार लंबी-लंबी सांस लें। यह आपको अपने ऊपर फोकस लाने में मदद करेगी।

इसके बाद अपना फोकस अपने पैरों की तरफ लाना है। इसके बाद अलग-अलग प्रकार की तकनीक का प्रयोग करना है। वैसे, तो एक बार में एक ही तकनीक का यूज करेंगे, लेकिन हम आपको अन्य तकनीकों के बारे में भी बता रहे हैं। आप अपनी इच्छानुसार इनका प्रयोग कर सकते हैं।

दूसरी तकनीक सांसों पर आधारित है। यानि सांस और कदमों को मिलाकर चलें। इसके लिए जानना जरूरी है कि सांस लेने में कितने स्टेप्स होते हैं। सांस लेने की प्रक्रिया में आमतौर पर चार स्टेप होते हैं। पहला जब हम सांस अंदर ले जाते हैं। दूसरा, जब कुछ देर रूकते हैं। तीसरा स्टेप, जब हम सांस छोड़ते हैं और चौथा सांस लेने से छोड़ने के बीच जो वक्त आता है, वो। अगर इन चारों स्टेप्स को बराबर कदम के आधार पर करें।

तीसरी तकनीक है, आपका वॉकिंग पैटर्न। क्लॉकवाइज और एंटी क्लॉक वाइज चलने का भी आप एक तरीका बना सकते हैं। एक पॉश्चर या मुद्रा बना लें। ये मुद्रा बनाकर क्लॉकवाइस राउंड लगाएं और वापस आते समय मुद्रा को एंटीक्लॉक वाइस कर लें। यापि दोनों बारी में मुद्रा अलग-अलग होनी चाहिए।

मेडिटेटिव वॉक का समय शुरूआत में केवल पांच मिनट का रखें। अगर आप बिगनर हैं, तो हम आपको इस पांच मिनट की मेडिटटिव एक्सरसाइज को कैसे करना है, इस बारे में बता रहे हैं।

सबसे पहले हमें महसूस करना होगा कि 5 मिनट चलने वाला यह ध्यान वह समय है, जो हम खुद को समर्पित कर रहे हैँ। इस व्यायाम को करते हुए आप आरामदायक कपड़े और जूते पहनें। अब हम सही जगह का चुनाव करें। ऐसा पार्क या बगीचा, जहां बहुत ज्यादा लोग या शोर न हो। स्थान चुनने के बाद मानसिक रूप से शुरूआती और आखिरी बिंदु को तय करना होगा। इससे पहले कि हम चलना शुरू करें, कुछ क्षण लें और हमें जो करना है, उस पर ध्यान केंद्रित करें। इसे सेल्फ टॉक कहा जाता है। अब अपने पैरों पर ध्यान लगाएं और महसूस करें, कि वो जमीन को छू रहे हैं। चलना शुरू करने से पहले ध्यान रखें, कि बहुत तेजी से नहीं चलना है। हमें धीरे-धीरे चलते हुए छोटे-छोटे कदम लेने हैं। जब आप चलना शुरू करें, तो हर चाल के बारे में आपको पता होना चाहिए। इस दौरान आपको जमीन और अपने पैरों के बीच संपर्क महसूस होना चाहिए। आप सीधे, शांत और आराम से चलें। इस दौरान अपनी गर्दन और कंधों को ढीला छोड़ें और पेट की मांसपेशियों को भी। चलते समय आप अपने आसपास की प्रकृति को निहार सकते हैं। एक बार जब आप चलना शुरू करें, तो अपने कदमों के साथ श्वास को समन्वयित करें। यानि की जब सांस ले रहे हैं, तो कदम गिनना शुरू करें, जब सांस छोड़ रहे हैं, तो कदम उठा रहे हैं, उसे भी गिनें। अभ्यास के साथ आप महसूस करेंगे, कि प्रत्येक सांस के लिए कदमों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी। मेडिटेटिव वॉक शुरू करने से पहले और खत्म होने के बाद पानी जरूर पी लें।

वॉकिंग मेडिटेशन करते समय ध्यान रखने वाली बातें – Things to keep in mind while walking meditation in Hindi वॉकिंग मेडिटेशन करते समय ध्यान रखने वाली बातें - Things to keep in mind while walking meditation in Hindi

पहली बार इसे करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन धीरे-धीरे रोजाना करने पर आपके लिए ये आसान हो जाएगा। कुछ बातों को ध्यान में रखते हुए मेडिटेटिव वॉक करना आपके लिए बेहद आसान हो जाएगा।

हर दिन पैदल चलने वाले रास्तों को बदलें। इससे आप समण् पाएंगे कि आपके लिए कौन सा बेहतर है। चलते हुए ध्यान करने के दौरान अपने शरीर के प्रति अधिक जागरूक रहें। मेडिटेटिव वॉक करते समय अपनी भावनाओं से अवगत रहें। अपनी मानसिक और भावनात्मक अवस्थाओं से अवगत रहें। ध्यान करने के दौरान चेतना की वस्तुओं के प्रति जागरूक रहें। फोकस करने की क्षमता विकसित करें। जब भी आप मेडिटेटिव वॉक करें, वर्तमान में रहें। मेडिटेटिव वॉक करते समय हमेशा अपनी आंखें खुली रखें। वरना आप अनजाने में खुद को चोट पहुंचा सकते हैं। मेडिटेटिव वॉक करना बहुत कठिन नहीं, बल्कि बहुत आसान है। बैठकर मेडिटेशन करने के बजाए कुछ लोग चलते हुए मेडिटेशन करना ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि इसमें अवेयरनेस बनी रहती है और हम खुद में ज्यादा इन्वॉल्व हो जाते हैं। चलते हुए भौतिक शरीर की क्रियाएं भी एक्टिव हो जाती हैं और कई स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं।

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शिवनेत्र ध्यान:

यह एक घंटे का ध्यान है और इसमें दस-दस मिनट के छह चरण हैं। साधकों के सामने जरा हट कर, थोड़ी ऊंचाई पर, एक नीले रंग का प्रकाश--यानी बिजली का बल्ब जलता है, जो प्रकाश को घटाने-बढ़ाने वाले एक यंत्र के द्वारा, दस मिनट में तीन बार, बारी-बारी धीमा और तेज किया जाता है। उसके सहारे ही यह ध्यान संचालित होता है।

पहला चरण :

बिलकुल स्थिर बैठें। हलके-हलके, बिना आंखों में कोई तनाव लाए सामने जल रहे प्रकाश को देखें।

दूसरा चरण :

आंखें बंद कर लें और कमर से ऊपर के भाग को हौले-हौले दाएं से बाएं और बाएं से दाएं हिलाएं। और साथ ही साथ यह भी अनुभव करते रहें कि आपकी आंखों ने पहले चरण के समय जो प्रकाश पीया है, वह अब "शिवनेत्र'--यानी "तीसरी आंख' में प्रवेश कर रहा है। यह सचमुच घटित होता है।

दोनों चरणों को बारी-बारी तीन बार दोहराएं।

प्रकाश को घटाने-बढ़ाने वाले यंत्र (डिमिंग स्विच) के साथ तीन सौ वॉट का नीले रंग का प्रकाश इसके लिए आदर्श है, लेकिन साधारण नीले प्रकाश या मोमबत्ती से भी काम चलाया जा सकता है। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; NOTE;- अच्छा हो कि शाम के समय अग्निशिखा ध्यान किया जाए। और यदि मौसम गर्म हो तो कपड़े उतारकर। इस ध्यान-विधि में पांच-पांच मिनट के तीन चरण हैं। पहला चरण कल्पना करें कि आपके हाथ में एक ऊर्जा का गोला है—गेंद है। थोड़ी देर में यह गोला कल्पना से यथार्थ सा हो जाएगा। वह आपके हाथ पर भारी हो जाएगा। दूसरा चरण ऊर्जा की इस गेंद के साथ खेलना शुरू करें। इसके वजन को, इसके द्रव्यमान को अनुभव करें। जैसे-जैसे यह ठोस होता जाए, इसे एक हाथ से दूसरे हाथ में फेंकना शुरू करें।

ध्यान विधि यदि आप दक्षिणहस्तिक हैं तो दाएं हाथ से शुरू करें और बाएं हाथ से अंत; और यदि वामहस्तिक हैं तो यह प्रक्रिया उलटी होगी। गेंद को हवा में उछालें, अपने चारों ओर उछालें, अपने पैरों के बीच से उछालें-लेकिन ध्यान रखें कि गेंद जमीन पर न गिरे। अन्यथा खेल फिर से शुरू करना पड़ेगा। इस चरण के अंत में गेंद को बाएं हाथ में लिए हुए दोनों हाथ सिर के ऊपर उठा लें और फिर गेंद को दोनों हथेलियों के बीच में रख लें। अब गेंद को नीचे लाएं और अपने सिर पर आकर उसे टूट-फूट जानें दें; ताकि उसकी ऊर्जा से आपका शरीर आपूरित हो जाए। कल्पना करें कि आप पर ऊर्जा की वर्षा हो रही है—और आपके शरीर के चारों ओर ऊर्जा का आवरण बन गया है।

अब आपके चारों तरफ से ऊर्जा आपकी तरफ आकर्षित होने लगेगी; उसकी पर्त दर पर्त आप पर बरसेगी। यहां तक कि दूसरे चरण के अंत में आप ऊर्जा की सात पतों में समा जाएंगे। भाव के साथ नाचे, इसका मजा लें, इसमें स्नान करें—और अपने शरीर को भी इस उत्सव में भाग लेने दें।

तीसरा चरण जमीन पर झुक जाएं और दोनों हाथों को प्रार्थना की मुद्रा में सामने फैला दें—और फिर कल्पना करें कि आप ऊर्जा की अग्निशिखा हैं-आपसे होकर ऊर्जा भूमि से ऊपर उठ रही है। धीरे-धीरे आपके हाथ, आपकी भुजाएं आपके सिर के भी ऊपर उठ जाएंगी और आपका शरीर अग्निशिखा का आकार ले लेगा। लेट जाएं और सर्वथा निष्क्रिय हो रहें, साक्षी हो रहें।

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कुंडलिनी ध्यान :

घंटेभर के इस शक्तिशाली ध्यान में पंद्रह-पंद्रह मिनट के चार चरण हैं। पहला चरण खड़े होकर करना है; दूसरा बैठकर; तीसरा और चौथा सर्वथा निष्क्रिय होकर। सूर्योदय के बाद या सूर्यास्त के पहले, इसे कभी भी किया जा सकता है।

पहला चरण -

आंखें खुली रखकर एक ही स्थान पर खड़े-खड़े दौड़ें। जहां तक बन पड़े घुटनों को ऊपर उठाएं। श्वास को गहरा और सम रखें। इससे ऊर्जा सारे शरीर में घूमने लगेगी।

दूसरा चरण Osho

आंखें बंद कर बैठ जाएं। मुंह को शिथिल और खुला रखें—और धीमे-धीमे चक्राकार झूमें—जैसे हवा में पेड़-पौधे झूमते हैं। इससे भीतर जागी ऊर्जा नाभि-केंद्र पर आ जाएगी।

तीसरा चरण

अब आंखें खोलकर पीठ के बल सीधे लेट जाएं—और दोनों आंखों की पुतलियों को क्लॉकवाइज़-बाएं से दाएं वृत्ताकार घुमाएं। पहले धीरे-धीरे घुमाना शुरू करें, क्रमशः गति को तेज और वृत्त को बड़ा करते जाएँ। मुंह को शिथिल व खुला रखें तथा सिर को बिलकुल स्थिर। श्वास मंद एवं कोमल बनी रहे। इससे नाभि-केंद्रित ऊर्जा तीसरी-आंख पर आ जाएगी।

चौथा चरण

आंखें बंद कर निष्क्रिय हो रहें। विश्राम में चले जाएं—ताकि तीसरी-आंख पर एकत्रित हो गयी ऊर्जा अपना काम कर सके। ;;;;;;;;;;;;;;;;; सुरक्षा प्रभा मंडल ध्‍यान: (काया कल्‍प करने के लिए)

क्‍या आप जानते है कि सप्ताहांत में आप इतना थक जाते है कि खड़े भी नहीं हो पाते। एक विधि प्रस्‍तुत है—कायाकल्‍प करने के लिए नहीं, अपितु आपकी क्‍लांति को यथासंभव कम करने के लिए। हमारी थकावट के कई कारण हो सकते है—चारों और का शोर, हलचल, गंध दूसरों की भावनाएं, उनके विचार—सभी आपको प्रभावित कर सकते है। हम निरंतर एक दूसरे को भला बुरा कहते रहते है। एक दूसरे को डाँटते-फटकारते रहते है। निरंतर अपने नकारात्‍मक भाव व विचार क्रोध-आक्रोश भय चिंता, विवशता आदि-आदि दूसरों को संप्रेषित करते रहते है। यदि हम स्‍वयं को इनके आक्रमणों से बचाना नहीं जानते तो यह बात समझ में आती है कि हम क्‍यों थक जाते है।

कब: प्रात: पहला और रात्रि में अंतिम काम।

प्रथम चरण: बिस्‍तर पर बैठ जाइए, कल्‍पना कीजिए कि आपके शरीर के चारों और केवल छह इंच की दूरी पर आपके शरीर के आकार का एक प्रभा मंडल है। आप इस सुरक्षा कवच को निर्मित कर सकते है। ताकि बह्म प्रभावों से ‘’स्‍वयं को बचा सकें।‘’

दूसरा चरण: इसी अनुभूति को बनाए रखते हुए आप सो जाएं ऐसा अनुभव करते हुए कि आप इस प्रभा मंडल में एक कंबल की भांति लपेटे सो रहे है जो आपको किसी भी प्रकार के बाहरी तनाव, हलचल विचारों या भावों से सुरक्षित रखेंगे।

तीसरा चरण: प्रात: जैसे ही आप नींद से जागें इससे पहले कि आप आंखे खोले आपने शरीर के इर्द गिर्द इस सुरक्षा मंडल को 4-5 मिनट अनुभव करे, देखें। चौथा चरण: प्रात: स्‍नान करते समय प्रात: भोजन लेते समय अपने सुरक्षा-आभा मंडल चक्र को स्‍मरण रखें। दिन में किसी भी समय जब भी आपको ख्‍याल आए—कार में या ट्रेन में किसी भी समय जब आप खाली बैठे—इसमे विश्राम करें। इस विधि को तीन सप्‍ताह से लेकिन तीन महीनों तक करें और इस विधि का प्रयोग करने से लगभग तीन सप्‍ताह और तीन महीनों में आपको एक सशक्‍त सुरक्षा की अनुभूति होने लगेगी।

;;;;;;;;;;;;;; गौरीशंकर ध्यान निर्देश:- रात्रि के इस ध्यान में 15-15 मिनट के चार चरण हैं। तीसरे चरण में घटने वाले सहज लातिहान के लिये पहले तीन चरण भूमिका का कार्य करते हैं। यदि पहले चरण में श्वसन प्रक्रिया सही ढ़ंग से की जाये तो रक्त- प्रवाह में पैदा हुई कार्बन डायआक्साइड आपको गौरीशंकर के शिखर का अनुभव देगी।

पहला चरण: 15 मिनट

आंखें बंद करके बैठ जाएं। नाक से गहरी श्वास लेकर फेफड़ों को भर लें। श्वास को जितनी देर बन पड़े रोके रखें, तब धीरे-धीरे मुख के द्वारा श्वास को बाहर छोड़ दें और जितनी देर संभव हो फेफड़ों को खाली रखें। फिर नाक से श्वास भीतर लें और पूरी प्रक्रिया को दोहराएं। पहले चरण में पूरे समय इस श्वास की प्रक्रिया को जारी रखें।

दूसरा चरण: 15 मिनट

सामान्य श्वास प्रक्रिया पर लौट आएं और किसी मोमबत्ती की लौ अथवा जलते-बुझते नीले प्रकाश को सौम्यता से देखते रहें। अपने शरीर को स्थिर रखें।

तीसरा चरण: 15 मिनट

आंखें बंद रखे हुए ही, खड़े हो जाएं और अपने शरीर को शिथिल एवं ग्रहणशील हो जाने दें। आपके सामान्य नियंत्रण के पार शरीर को गतिशील करती हुई सूक्ष्म ऊर्जाओं की अनुभूति होगी। इस लातिहान को होने दें। आप गति न करें, गति को सौम्यता से और प्रसादपूर्वक स्वयं ही होने दें।

चौथा चरण: 15 मिनट

आंखें बंद किए हुए ही, शांत और स्थिर होकर लेट जाएं।