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क्या ध्यान की छाया है समर्पण?


अध्‍याय—10

सूत्र:

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्थरम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।। 9।।

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोग तं येन मामुययान्ति ते।। 10।।

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानज तम:।

नाशयाम्पात्मभावस्थो ज्ञानदीयेन भास्वता।। 11।।

और वे निरंतर मेरे में मन लगाने वाले और मेरे में ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जनाते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझ में ही निरंतर रमण करते हैं।

उन निरंतर मेरे ध्यान में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्वज्ञान रूय योग देता हूं जिससे वे मेरे को ही प्राप्त होते हैं।

और हे अर्जुन उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए ही मैं स्वयं उनके अंत—करण में एकीभाव से स्थित हुआ अज्ञान से उत्पन्‍न हुए अंधकार को प्रकाशमय तत्वज्ञान रूप दीयक द्वारा नष्ट करता हूं।

मन की दो अवस्थाएं हैं, एक दौड़ता हुआ मन, एक ठहरा हुआ मन। दौड़ता हुआ मन, निरंतर ही जहां होता है, वहां नहीं होता। ऐसा समझें कि दौड़ता हुआ मन कहीं भी नहीं होता। दौड़ता हुआ मन सदा ही भविष्य में होता है। आज नहीं होता, अभी नहीं होता, यहां नहीं होता। कल, आगे, कहीं और, कल्पना में, सपने में, कहीं दूर भविष्य में होता है। और भविष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। अस्तित्व है वर्तमान का, अभी का, इसी क्षण का।

जब मैं कहता हूं इसी क्षण का, इतना कहने में भी वह क्षण वर्तमान का जा चुका। इतनी भी देर हुई, तो हम वर्तमान के क्षण को चूक जाते हैं। जानने में जितना समय लगता है, उतने में भी वर्तमान जा चुका होता है।

एक क्षण हमारे हाथ में है अस्तित्व का, लेकिन मन सदा वासना में, भविष्य में होता है। भविष्य का कोई अस्तित्व नहीं। इसलिए दौड़ता हुआ मन कहीं होता ही नहीं। जहां हो सकता है, वहां होता नहीं; और जहां हो ही नहीं सकता, वहां होता है। वर्तमान में हो सकता था, लेकिन वर्तमान में दौड़ता हुआ मन नहीं होता।

आप वर्तमान में दौड़ नहीं सकते, जगह नहीं है, स्पेस नहीं है। दौड़ने के लिए भविष्य का विस्तार चाहिए। वासना के लिए अनंत विस्तार चाहिए। वर्तमान का क्षण बहुत छोटा है। उस छोटे—से क्षण में आपकी वासना न समा सकेगी।

यह जो दौड़ता हुआ मन है, यह दौड़ता ही रहता है। कहीं भी ठहरने का इसे उपाय नहीं है। जहां ठहर सकता है, वर्तमान में, वहां ठहरता नहीं। और भविष्य तो है नहीं। वहां सिर्फ दौड़ सकता है। ठहरने की वहां कोई सुविधा नहीं है। यह दौड़ता हुआ मन ही हमारी बीमारी है, रोग है।

अगर अधार्मिक आदमी की हम कोई परिभाषा करना चाहें, तो वह परिभाषा ऐसी नहीं हो सकती है कि वह आदमी, जो ईश्वर को न मानता हो। क्योंकि ऐसे बहुत—से व्यक्ति हुए हैं, जो ईश्वर को नहीं मानते और धार्मिक हैं। महावीर हैं, बुद्ध हैं, वे ईश्वर को नहीं मानते हैं, पर परम धार्मिक हैं। उनकी आस्तिकता में रत्तीभर भी संदेह नहीं। और अगर बुद्ध और महावीर की धार्मिकता में संदेह होगा, तो इस पृथ्वी पर फिर कोई भी आदमी धार्मिक नहीं हो सकता।

अधार्मिक आदमी उसे नहीं कह सकते हैं, जो ईश्वर को न मानता हो। अधार्मिक आदमी उसे भी नहीं कह सकते, जो वेद को न मानता हो, बाइबिल को न मानता हो, कुरान को न मानता हो। अधार्मिक आदमी केवल उसे कह सकते हैं कि जिसके पास केवल दौड़ता हुआ मन है, ठहरे हुए मन का जिसे कोई अनुभव नहीं। फिर वह कुछ भी मानता हो—ईश्वर को मानता हो, आत्मा को मानता हो; वेद को, कुरान को, बाइबिल को मानता हो— अगर दौड़ता हुआ मन है, तो वह आदमी धार्मिक नहीं है। और फिर चाहे वह कुछ भी न मानता हो, लेकिन अगर ठहरा हुआ मन है, तो वह आदमी धार्मिक है। क्योंकि मन जहां ठहरता है, वही तत्‍क्षण उस परम सत्ता से संबंध जुड़ जाता है।

हम उसे क्या नाम देते हैं, यह गौण बात है। कोई उसे ईश्वर कहे, यह उसकी मर्जी। और कोई उसे आत्मा कहे, यह भी उसकी मर्जी। और कोई उसे कोई भी नाम न देना चाहे, यह भी उसकी मर्जी। और कोई उसके संबंध में चुप रह जाए, यह भी उसकी मर्जी। कोई उसे शून्य कहे, कोइ उसे मिट जाना कहे, कोई उसे पूरा हो जाना कहे, यह उसकी मर्जी की बात है। लेकिन जहां मन ठहरा, वहीं आदमी धार्मिक हो जाता है।

इस मन को ठहराने के लिए कल के सूत्र में कृष्ण ने जो शब्द उपयोग किया है, उसे हम थोड़ा ठीक से समझ लें, तो इस सूत्र में प्रवेश आसान हो जाएगा। समझना कहना शायद ठीक नहीं, क्योंकि समझ तो हम बहुत बार लेते हैं, फिर भी कोई समझ पैदा नहीं होती। शायद उचित होगा कहना कि हम उस सूत्र को थोड़ा कर लें, तो यह सूत्र समझ में आ सकेगा।

कृष्ण ने कहा है, निश्चल ध्यान योग को जो उपलब्ध होता है, वह मेरे में एकीभाव से ठहर जाता है।

निश्चल ध्यान योग क्या है, एक बात है; कैसे किया जा सकता है, बिलकुल दूसरी बात है। निश्चल ध्यान योग का अर्थ समझ लेना एक बात है; निश्चल ध्यान योग की प्रक्रिया में उतर जाना बिलकुल दूसरी बात है। और प्रक्रिया में उतरे बिना कोई भी जान नहीं पाएगा; समझ कितना ही ले।

इसलिए बहुत बार जिन्हें हम समझदार कहते हैं, उनसे नासमझ आदमी खोजने मुश्किल होते हैं। वे सब समझते हैं और जानते कुछ भी नहीं। सच तो यह है कि वे इतना समझते हैं कि सोचते हैं, जानने की अब कोई जरूरत ही न रही। शब्द का उनके पास भंडार हो सकता है, अनुभव का उनके पास कण भी नहीं होता। अनुभव का संबंध, ध्यान क्या है, इसे समझने से नहीं है, ध्यान कैसे होता है, इसमें उतर जाने से है।

ध्यान एक अनुभूति है। ध्यान के सैकड़ों प्रकार हैं। और सैकड़ों मार्गों से लोग ध्यान को उपलब्ध हो सकते हैं। निश्चल ध्यान योग की तरफ पहुंचने के लिए भी सैकड़ों रास्ते हैं। और पृथ्वी पर अनेक— अनेक रास्तों से चलकर लोग उस क्षण को उपलब्ध हो गए हैं, जिसे हम मन का ठहर जाना कहें। एक छोटी—सी प्रक्रिया मैं आपसे कहूंगा, सरल, जिसे आप कर सकें।

और आपको निश्चल मन की थोड़ी—सी झलक और छाया भी मिलनी शुरू हो जाए, तो आपकी जिंदगी रूपांतरित होने लगेगी। एक नये आदमी का जन्म आपके भीतर हो जाएगा। पुराना आदमी बिखरने, पिघलने लगेगा, और एक नई चेतना, एक नया केंद्र, देखने का एक नया ढंग, जीने की एक नई प्रक्रिया, होने की एक नई व्यवस्था आपके भीतर पैदा हो जाएगी। जैसे अचानक अंधे की आंख खुल जाए, या जैसे अचानक बहरे को कान मिल जाएं, या जैसे अचानक कोई मरा हुआ पुनरुज्जीवित हो जाए; ठीक ध्यान के अनुभव से ऐसी ही व्यापक क्रांतिकारी घटना चेतना में घटती है। मन तो एक अंडे की तरह है। अंडा जब टूटता है, तो पक्षी पंख फैलाकर आकाश में उड़ता है। और अंडा अगर रुका रह जाए, तो जो अंडा पक्षी को सम्हालने के लिए था, उसकी सुविधा और व्यवस्था के लिए था, उसकी सुरक्षा के लिए था, वही—वही उसके लिए कब्र बन जाएगा। अंडे को टूटना ही चाहिए।

मन जरूरी है। आदमी बिना मन के पैदा हो, तो वैसा ही होगा जैसा बिना अंडे के कोई पक्षी पैदा हो, तो मुश्किल में पड़ जाए। मन बिलकुल जरूरी है; लेकिन अंडे की तरह ही जरूरी है। एक सीमा तक साथी है, एक सीमा के बाद दुश्मन हो जाता है। एक जगह तक बचाता है, एक सीमा के बाद हानि पहुंचाने लगता है। एक सीमा तक सहारा है, एक सीमा के बाद कारागृह हो जाता है।

और हमारा मन करीब—करीब कारागृह है। अनेक—अनेक जन्मों से हम उस मन को लेकर चल रहे हैं, जो हमें कभी का तोड़ देना चाहिए था। लेकिन अंडे के भीतर जो छिपा हुआ पक्षी है, उसे भी तो कुछ पता नहीं आकाश का। और उसे यह भी तो डर समाता होगा कि अंडे को तोड़ दूं तो फिर मेरा क्या होगा! वही तो मेरी सुरक्षा है, वही मेरी आडू है, उसी से तो मैं बचा हूं; वह मेरा घर है।

स्वाभाविक है कि हम मन को ही अपनी सुरक्षा मानकर जीते हैं। इसलिए अगर कोई आपके शरीर को बीमार कह दे, तो आप नाराज नहीं होते। कोई अगर कह दे कि आप दुबले दिखाई पड़ते हैं, बीमार मालूम होते हैं, तबीयत खराब है! तो सहानुभूति मालूम पड़ती है। लगता है, यह आदमी मित्र है। लेकिन कोई आपसे कह दे कि आपका मन बीमार मालूम पड़ता है, कुछ मन में ज्वर मालूम होता है, मन में कुछ विक्षिप्तता दिखाई पड़ती है, पागलपन मालूम पड़ता है। तो फिर यह आदमी मित्र नहीं मालूम पड़ता, यह दुश्मन मालूम पड़ता है। क्योंकि शरीर को हम अपने से दूर मान पाते हैं, लेकिन मन के साथ तो हम अपने को एक ही मानते हैं। इसलिए जब कोई कहता है, आपका शरीर बीमार है, तो वह यह नहीं कहता कि आप बीमार हैं। आपका शरीर बीमार है। लेकिन जब कोई कहता है कि आपका मन रुग्ण है, तो आपको तत्काल लगता है कि इसका मतलब हुआ कि मैं पागल हूं मैं रुग्ण हूं!

मन के साथ हमारा तादात्म्य, हमारी आइडेंटिटी गहरी है। हमने अपने को मन के साथ एक समझ रखा है। और इस तरह पक्षी अंडे के बाहर होने में असुविधा पाता है, उपाय नहीं रह जाता। अंडे को ही पक्षी समझ ले कि मेरा होना है, तो कठिनाई हो जाती है।

ध्यान मन के तोड्ने का नाम है। या कहें मन के ठहरने का नाम, या कहें मन के तोड्ने का नाम, या कहें मन के पार हो जाने का नाम, इससे कोई भेद नहीं पड़ता। एक छोटी प्रक्रिया आपसे कहता हूं जिससे आप इस अंडे के बाहर आ सकते हैं।

अगर आपने चित्र देखे हों बच्चों के उनके मां के पेट में, गर्भ में। मां के पेट में बच्चा जिस हालत में होता है, गर्भ में, उस अवस्था में मनोवैज्ञानिक कहते हैं, योग की गहरी खोज कहती है, कि मां के पेट में जब बच्चा होता है जिस पोश्चर में, जिस आसन में, उस समय बच्चे के पास न्यूनतम मन होता है, न के बराबर मन होता है। कह सकते हैं, होता ही नहीं। और बच्चे की चेतना मस्तिष्क में नहीं होती मां के पेट में। और न ही बच्चे की चेतना हृदय में होती है। शायद आपको पता न हो कि मां के पेट में बच्चे का हृदय नहीं धड़कता। नौ महीने बच्चा बिना हृदय धड़कने के होता है।

इसलिए एक बात और समझ लेना कि हृदय की धड़कन से जीवन का कोई संबंध नहीं, क्योंकि बच्चा बिना हृदय की धड़कन के नौ महीने जिंदा रहता है। जीवन और गहरी बात है।

हमसे अगर कोई पूछे कि आपकी चेतना कहां है, तो सिर पर हाथ जाएगा। चेतना जब मन में केंद्रित होती है, तो सिर केंद्र हो जाता है। जब प्रेम में केंद्रित होती है, भाव में केंद्रित होती है, तो हृदय केंद्र हो जाता है। इसलिए प्रेमी हृदय पर हाथ रखेगा। और गणित को सुलझाने वाला आदमी अगर गणित में उलझ जाए, तो सिर को खुजलाएगा, हृदय पर हाथ नहीं रखेगा। हाथ जाएगा ही नहीं हृदय पर। और प्रेमी अगर प्रेम में पड़ा हो और सिर पर हाथ रखे, तो बहुत बेहूदा मालूम पड़ेगा। सिर से कोई संबंध नहीं है।

चेतना_ जब भाव में होती है, तो हृदय केंद्र होता है। और चेतना जब विचार में होती है, तो मस्तिष्क केंद्र होता है। लेकिन मस्तिष्क बहुत बाद में विकसित होता है। और हृदय भी नौ महीने के बाद धड़कता है। उसके भी पहले चेतना एक केंद्र पर होती है, वह नाभि है। बच्चा मां से नाभि से जुड़ा होता है। जीवन का पहला अनुभव बच्चे को नाभि पर होता है।

जिन लोगों को मन के पार जाना है, उन्हें हृदय, मस्तिष्क दोनों से उतरकर नाभि के पास वापस लौटना होता है। अगर आप फिर से अपनी चेतना को नाभि के पास अनुभव कर सकें, तो आपका मन तत्‍क्षण ठहर जाएगा।

तो इस ध्यान की प्रक्रिया के लिए, जिसको मैं निश्चल ध्यान योग की तरफ एक विधि कहता हूं दो बातें ध्यान में रखने जैसी जरूरी हैं। जैसा कि सूफी फकीरों को अगर आपने देखा हो प्रार्थना

करते, या मुसलमानों को आपने नमाज पढ़ते देखा हो, तो जिस भांति घुटने मोड़कर वे बैठते हैं वैसे घुटने मोड़कर बैठ जाएं। बच्चे के घुटने ठीक उसी तरह मुड़े होते हैं मां के गर्भ में। आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें और श्वास को बिलकुल शिथिल छोड़ दें, रिलैक्स छोड़ दें, ताकि श्वास जितनी धीमी और जितनी आहिस्ता आए—जाए, उतना अच्छा। श्वास जैसे न्यून हो जाए, शांत हो जाए। श्वास को दबाकर शांत नहीं किया जा सकता है। अगर आप रोकेंगे, तो श्वास तेजी से चलने लगेगी। रोकें मत, सिर्फ ढीला छोड़ दें।

आंख बंद कर लें, और अपनी चेतना को भीतर नाभि के पास ले आएं। सिर से उतारें हृदय पर, हृदय से उतारें नाभि पर। नाभि के पास चेतना को ले जाएं। श्वास का हल्का—सा कंपन पेट को नीचे—ऊपर करता रहेगा। आप अपने ध्यान को आंख बंद करके वहीं ले आएं, जहां नाभि कंपित हो रही है। श्वास के धक्के से पेट ऊपर—नीचे हो रहा है, आंख बंद करके ध्यान को वहीं ले आएं। शरीर को ढीला छोड़ते जाएं। थोड़ी ही देर में शरीर आपका आगे झुकेगा और सिर जाकर जमीन से लग जाएगा। उसे छोड़ दें और झुक जाने दें।

जब सिर आपका जमीन से लग जाएगा, तब आप ठीक उस हालत में आ गए, जिस हालत में बच्चा मां के पेट में होता है। शांत होने के लिए इससे ज्यादा कीमती आसन जगत में कोई भी नहीं है। आसन ऐसा हो जाए, जैसा गर्भ में बच्चे का होता है; और आपका ध्यान नाभि पर चला जाए। बच्चे का ध्यान और चेतना नाभि में होती है। आपका ध्यान भी नाभि पर चला जाए।

अनेक बार ध्यान उचट जाएगा, कहीं कोई आवाज होगी, ध्यान चला जाएगा। कहीं कोई बोल देगा कुछ, ध्यान चला जाएगा। नहीं कहीं कुछ होगा, तो भीतर कोई विचार आ जाएगा, और ध्यान हट जाएगा। उससे लड़े मत। अगर ध्यान हट जाए, चिंता मत करें। जैसे ही खयाल में आए कि ध्यान हट गया, वापस अपने ध्यान को नाभि पर ले आएं। किसी कलह में न पड़े, किसी कांफ्लिक्ट में न पड़े कि यह मन मेरा क्यों हटा! यह मन बड़ा चंचल है, यह क्यों हटा! नहीं हटना चाहिए। इस सब व्यर्थ की बात में मत पड़े। जब भी खयाल आ जाए, वापस नाभि पर अपने ध्यान को ले आएं।

और चालीस मिनट कम से कम— ज्यादा कितनी भी देर कोई रह सकता है—ठीक ऐसे बच्चे की हालत में मां के गर्भ में पड़े रहें। संभावना तो यह है कि दो—चार—आठ दिन के प्रयोग में ही आपको

एक गहरी निश्चलता भीतर अनुभव होनी शुरू हो जाएगी। ठीक आप बच्चे के जैसी सरल चेतना में प्रवेश कर जाएंगे। मन ठहरा हुआ मालूम पड़ेगा। जितना नाभि के पास होंगे, उतनी देर मन ठहरा रहेगा। और जब नाभि के पास रहना आसान हो जाएगा, तो मन बिलकुल ठहर जाएगा।

मन भी चलता है, हृदय भी चलता है, नाभि चलती नहीं। मन की भी दौड़ है, विचार की भी दौड़ है, भाव की भी दौड़ है, नाभि की कोई दौड़ नहीं। अगर ठीक से समझें, तो मन भी भविष्य में होता है, हृदय भी भविष्य में होता है, नाभि वर्तमान में होती है—जस्ट इन दि मोमेंट, हियर एंड नाउ, अभी और यहीं।

जो आदमी नाभि के पास जितना जाएगा अपनी चेतना को लेकर, उतना ही वर्तमान के करीब आ जाएगा। जैसे बच्चा नाभि से जुड़ा होता है मां से, ऐसे ही एक अज्ञात नाभि के द्वार से हम अस्तित्व से जुड़े हैं। नाभि ही द्वार है।

जिन लोगों को—शायद दो—चार लोगों को यहां भी— कभी अगर शरीर के बाहर होने का कोई अनुभव हुआ हो। पृथ्वी पर बहुत लोगों को कभी—कभी, अचानक, आकस्मिक हो जाता है। अचानक लगता है कि मैं शरीर के बाहर हो गया। तो जिन लोगों को भी शरीर के बाहर होने का आकस्मिक, या ध्यान से, या किसी साधना से अनुभव हुआ हो, उनको एक अनुभव निश्चित होता है, कि जब वे अपने को शरीर के बाहर पाते हैं, तो बहुत हैरानी से देखते हैं कि उनके और उनके शरीर के बीच, जो नीचे पड़ा है, उसकी नाभि से कोई एक प्रकाश की किरण की भांति कोई चीज उन्हें जोड़े हुए है। पश्चिम में वैज्ञानिक उसे सिल्वर कॉर्ड, रजत— रज्जु का नाम देते हैं। जैसे हम मां से जुड़े होते हैं इस भौतिक शरीर से, ऐसे ही इस बड़े जगत, इस बड़े अस्तित्व से, इस प्रकृति या अस्तित्व के गर्भ से भी हम नाभि से ही जुड़े होते हैं। तो जैसे ही आप नाभि के निकट अपनी चेतना को लाते हैं, मन निश्चल हो जाता है।

जीसस का बहुत अदभुत वचन है— शायद ही ईसाई उसका अर्थ समझ पाए—जीसस ने कहा है कि तुम तभी मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर सकोगे, जब तुम छोटे बच्चों की भांति हो जाओ।

लेकिन मोटे अर्थ में इसका यही अर्थ हुआ कि हम बच्चों की तरह सरल हो जाएं। लेकिन गहरे वैज्ञानिक अर्थ में इसका अर्थ होता है कि हम बच्चे की उस आत्यंतिक अवस्था में पहुंच जाएं, जब बच्चा होता ही नहीं, मां ही होती है। और बच्चा मां के सहारे ही जी रहा होता है। न अपनी कोई हृदय की धड़कन होती है, न अपना कोई मस्तिष्क होता; बच्चा पूरा समर्पित, मां के अस्तित्व का अंग होता है।

ठीक ऐसी ही घटना निश्चल ध्यान योग में घटती है। आप समाप्त हो जाते हैं और परमात्मा के साथ एकीभाव हो जाता है। और परमात्मा के द्वारा आप जीने लगते हैं।

यह जो कृष्‍ण ने कहा है कि निश्चल ध्यान योग से मुझमें एकीभाव को स्थित हो जाता है, इसका ठीक वही अर्थ है, जो बच्चे और मां के बीच स्थूल अर्थ है, वही अर्थ साधक और परमात्मा के बीच सूक्ष्म अर्थ है। इस प्रयोग को थोड़ा करेंगे, तो जो अर्थ स्पष्ट होंगे, वे अर्थ शब्दों से स्पष्ट नहीं किए जा सकते।

अब हम इस सूत्र में प्रवेश करें।

और वे मेरे में निरंतर मन लगाने वाले और मेरे में ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन, सदा ही आपस में मेरे प्रभाव को जनाते हुए तथा मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझमें ही निरंतर रमण करते हैं।

अब इस सूत्र का पूरा अर्थ बदल जाएगा, अगर आपने मेरी पहली बात समझी तो। क्योंकि निश्चल ध्यान योग के बाद ही इस सूत्र का अर्थ खुल सकता है, अन्यथा इस सूत्र का गलत अर्थ किया जाएगा।

गीता पर हजारों टीकाएं हैं। अधिक टीकाएं पंडितों के द्वारा हैं, जिनके पास काफी ज्ञान है, लेकिन शायद ध्यान नहीं है। इसलिए भारी विवाद है शब्दों का। सैकड़ों अर्थ किए गए हैं। स्वाभाविक है। सैकड़ों अर्थ होंगे ही। सैकड़ों मन अर्थ करेंगे, तो सैकड़ों अर्थ होंगे।

ध्यान रहे, ध्यान तो एक ही होता है, चाहे कोई भी ध्यान को उपलब्ध हो; लेकिन मन तो उतने ही होते हैं, जितने लोग होते हैं। शायद यह भी कहना कम है, क्योंकि एक आदमी के पास भी एक ही मन नहीं होता। सुबह दूसरा था, दोपहर दूसरा है, सांझ तीसरा है! शायद यह कहना भी ठीक नहीं है, एक ही आदमी के पास भी एक साथ बहुत—से मन होते हैं। अभी, एक ही साथ कई मन होते हैं। इसलिए पुराने एक मन की धारणा को मनोविज्ञान धीरे— धीरे तिलांजलि दे रहा है। मनोविज्ञान अब कहता है कि आदमी पोलीसाइकिक है, बहु—चित्तवान है। बहुत—से मन हैं उसके पास, एक मन नहीं है।

तो मन से जो अर्थ किए जाएंगे, वे तो अनेक होंगे ही। अगर एक ही आदमी जिंदगी में दो—चार—पाच बार गीता का अर्थ करे, तो दो—चार—पाच अर्थ निकलेंगे, क्योंकि उसका मन बदलता चला जाएगा। तो एक तो वे अर्थ हैं, वे कमेंट्रीज और टीकाएं हैं, जो मन से की गई हैं, उनका बहुत मूल्य नहीं है। वे कितनी ही गहरी हों, फिर भी छिछली होगी, क्योंकि मन और बुद्धि का कोई गहरा होना होता ही नहीं। बुद्धि कितना ही शोरगुल मचाए, वह सतह पर ही होती है, गहरी कभी जाती नहीं। ध्यान गहरा जाता है।

तो एक तो उपाय यह है कि गीता के शब्दों को समझें, उनकी व्याख्याएं समझ लें, और तृप्त हो जाएं। उसका अर्थ हुआ कि आप गीता से चूक गए; गीता आपके काम न आई। शायद नुकसान भी हुआ, क्योंकि आपको भ्रम होगा कि आपने जान भी लिया।

दूसरा रास्ता है कि ध्यान से प्रवेश करें और फिर गीता को समझें। और तब एक मजेदार बात घटती है। जो लोग मन से गीता को समझेंगे, वे गीता की भी हजार टीकाएं करेंगे। दो टीकाकार दुश्मन की तरह लड़ेंगे। मन से, तो गीता की भी हजार टीकाएं हो जाएंगी, और हर टीकाकार गीता का एक अर्थ करेगा और शेष को गलत कहेगा। अगर ध्यान से कोई प्रवेश करे, तो एक और दूसरी घटना घटती है, गीता का भी वही अर्थ होगा, बाइबिल का भी वही अर्थ होगा, कुरान का भी वही अर्थ होगा।

मन से कोई चले, तो गीता के हजार अर्थ होंगे। और ध्यान से कोई चले, तो दुनिया में जितनी गीताए हैं, जितने धर्म—ग्रंथ हैं, उन सबका अर्थ एक हो जाएगा। ध्यान एक नया पर्सपेक्टिव, एक नया परिप्रेक्ष्य दे देता है, देखने का एक नया ढंग, जानने का, स्पर्श करने की एक नई व्यवस्था।

तो इसलिए मैंने कहा, इस सूत्र को अब समझें, तो फर्क पड़ेगा। अगर हम पहले समझते, तो इसका अर्थ होता, वे मेरे में निरंतर मन लगाने वाले, तो इसका अर्थ होगा कि निरंतर ईश्वर को स्मरण करने वाले, निरंतर उसका नाम लेने वाले। और मेरे में ही प्रायों को अर्पण करने वाले भक्तजन, मुझमें ही जो अपने को समर्पण कर देते हैं, ऐसे लोग, सदा मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जनाते हुए, एक—दूसरे को मेरा प्रभाव समझाते हुए, तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझमें ही निरंतर रमण करते हैं। तब इसका अर्थ बहुत साधारण होगा। जो कि भक्त प्रभु—चर्चा में, सत्संग में, ईश्वर का गुणगान करने में, ईश्वर की स्तुति करने में करते हैं। यह अर्थ ध्यान से बिलकुल बदल जाएगा। ध्यान इसकी सारी की सारी दिशा को मोड़ दे देता है।

मेरे में निरंतर मन लगाने वाले का अर्थ ध्यान से जो जानेगा उसको पता चलेगा, वही, जिसका कोई मन न रहा। क्योंकि परमात्मा में मन वही लगा सकता है, जिसका मन समाप्त हो जाए। अगर आपका मन जारी है, तो मन संसार में ही लगा रहेगा। आप बीच—बीच में परमात्मा का नाम ले सकते हैं, लेकिन मन संसार में ही लगा रहेगा।

इसलिए हम देखते हैं कि भक्तजन, तथाकथित भक्तजन मंदिरों में बैठे हैं, पर आप इस भूल में मत रहना कि उनका मन वहां है। मंदिरों में बैठना आसान है, प्रभु का नाम उच्चार करना भी बहुत आसान है, लेकिन मन का वहां होना उतना आसान नहीं है।

नानक के जीवन में उल्लेख है कि नानक एक गांव में आए। उस गांव के मुसलमान नवाब ने नानक को कहा कि सुना है मैंने, तुम कहते हो कि हिंदू—मुसलमान सब एक हैं! नानक ने कहा, एक हैं ही; मैं कहता हूं इसलिए नहीं। एक हैं, इसलिए मैं कहता हूं। तो उस नवाब ने कहा कि आज नमाज का दिन है, तो हमारे साथ मस्जिद में चलकर नमाज पढ़ो। सोचा उसने कि नानक इनकार करेंगे। एक हिंदू मस्जिद जाने से इनकार करेगा। नानक तो बड़ी खुशी से तैयार हो गए। नवाब थोड़ा चिंतित हुआ। उसने कहा, लेकिन ध्यान रखिए, नमाज में मेरे साथ सम्मिलित होना पड़ेगा। नानक ने कहा कि अगर तुम नमाज पढ़ोगे, तो मैं भी पढूंगा।