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कौन है सारथी?


कौन है सारथी? 07 FACTS;- 1-चौंका होगा दुर्योधन भी, जब अर्जुन ने निर्णय दिया कि 'मैं आपको मांग लेता हूं'।सोचा होगा, ये मूढ़ ही रहे पांडव।मांग लेता फौजों को, श्रीकृष्ण को लेकर क्या करेगा? एक श्रीकृष्ण, अकेला श्रीकृष्ण किस मूल्य का है! अहंकारियों को विनम्र व्यक्ति मूढ़ ही मालूम पड़ते हैं। अज्ञानियों को ज्ञानी पागल मालूम पड़ते हैं। नासमझों को समझदार नासमझ मालूम पड़ते हैं। पीलिया के मरीज को सभी कुछ पीला दिखाई पड़ने लगता है। बहुत बुखार के बाद उठे आदमी को स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन भी तिक्त मालूम पड़ते हैं, मिठाई में भी मिठास नहीं मालूम पड़ती। 2-लेकिन यहीं निर्णय हो गया। एक श्रीकृष्ण एक तरफ, सारा संसार दूसरी तरफ, तो भी एक कृष्ण चुनने जैसा है। एक चुनने जैसा है। इक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। एक को पकड़कर अर्जुन जीत गया।लेकिन यह कोई जीतने के लिए एक को नहीं पकड़ा था, यह खयाल रखना। नहीं तो भूल हो जाएगी। तब तो फिर दुर्योधन और अर्जुन के गणित में कोई फर्क न रह जाएगा।जो समझदार है, वह शक्ति नहीं चुनता, शांति चुनता है।श्रीकृष्ण को चुनकर अर्जुन ने शांति चुन ली, साक्षी भाव चुन लिया, बोध चुन लिया, बुद्धत्व चुन लिया। वही वक्त पर काम आया। अंधी फौजें, अंधी ऊर्जा को चुनकर दुर्योधन ने क्या पाया? नौकर—चाकर इकट्ठे कर लिए; मालिक खो गया। 3-तुम भी जीवन में ध्यान रखना, क्योंकि सौ में निन्यानबे मौके पर तुम भी दुर्योधन के गणित से ही सोचते हो। फौज—फाटा चुनते हो। एक को छोड़ देते हो। रोज वही घटना घट रही है। वह एक तुम्हारे भीतर छिपा तुम्हारा विवेक है, उसे तुम छोड़ देते हो। कभी धन चुनते हो, कभी मकान चुनते हो, कभी पद चुनते हो, प्रतिष्ठा चुनते हो, हजार चीजें चुनते हो, फौज—फांटा। और एक को छोड़ देते हो।तुम सोचते भी हो, उस एक में रखा भी क्या है! इतना विस्तार है संसार का, इसे पा लो। इतना बड़ा साम्राज्य है, उस एक को पाकर करोगे भी क्या? होगी आत्मा, होगी विवेक की अवस्था, होगा ध्यान, होगी समाधि, लेकिन एक ही है। और इतना विराट संसार पड़ा है अभी जीतने को; पहले इसे कर लो। फिर उस एक को देख लेंगे। 4-अगर तुम्हारे सामने यह सवाल उठे कि तुम एक परमात्मा को चुन लो या सारे संसार को, तुम क्या करोगे? सौ में निन्यानबे मौके पर तुम वही करोगे, जो दुर्योधन ने किया; और तुम प्रसन्न होओगे। वहीं तुम करते रहे हो ,कर ही रहे हो और करोगे भी..।लेकिन अर्जुन धन्यभागी हुआ। श्रीकृष्ण को पाकर सब पा लिया। मालिक को पा लिया, स्वामी को पा लिया। नौकर—चाकरों का क्या हिसाब है? घोड़े—रथों की क्या कीमत है? और वक्त पर यही एक , सदा एक काम आता है। 5-युद्ध के सघन मैदान में, जब अर्जुन के प्राण कंपने लगे, होश खोने लगा, गांडीव थरथराने लगा, पैर के नीचे की जमीन खिसक गई, कुछ सूझ न पड़े, सब तरफ अंधेरा हो गया। एक क्षण में सब शुरू हो जाने को है, योद्धा तत्पर हो गए, शंखनाद होने लगे, अर्जुन की प्रतीक्षा होने लगी कि देर क्यों हो रही है! और उसका गांडीव मुरदा हो गया, उसकी ऊर्जा जैसे कहीं खो गई। अचानक उसने अपने को असहाय पाया। और इस क्षण में उस एक से ही ज्योति मिली। इस एक क्षण में वही सारथी काम आया। 6-खोजो भीतर, कौन है सारथी? ध्यान की खोज सारथी की खोज है। कौन है, जो तुम्हें वस्तुत: चलाता है? वही सारथी है। कौन है असली मालिक? यदि अहंकार है ,तो तुम सिर के पास बैठे दुर्योधन हो।अहंकार सदा सिर के पास है। और जहां अहंकार है, वहीं चूक हो जाती है। फिर तुम अपने सारथी से नहीं मिल पाते। फिर सब मिल जाएगा, सारथी न मिलेगा।कथा कहती है, श्रीकृष्ण की आंख खुली ..स्वभावत: पहले अर्जुन दिखाई पड़ा।अर्जुन बैठा है पैर के पास वह विनम्र निवेदन है, वह निरअहंकार भाव है। साक्षी मिल ही जाएगा। विनम्र पर आंख पड़ेगी साक्षी की, अहंकारी पर आंख नहीं पडेगी। अहंकारी तो अपने में ऐसा अकड़ा है, वह तो सिर के पीछे बैठा है ,सम्राट होकर बैठा है; श्रीकृष्ण से बडा होकर, श्रीकृष्ण से ऊपर बैठा है। 7-तुम्हारा अहंकार रथ में सवार है। और सारथी से इतने ऊपर बैठ गया है कि सारथी भी अगर देखना चाहे, तो तुम दिखाई न पड़ोगे। और तुम तो अंधे हो, इसीलिए तुम सिर के पास बैठे हो। अगर थोड़ी भी आंख होती, तो दुर्योधन पैर के पास बैठे होता। निर्णय तो सब हो ही गया उसी क्षण। वहीं युद्ध जीत लिया गया।फिर तो बाकी विस्तार की बातें हैं, वे छोड़ी भी जा सकती हैं।अहंकार को बतलाना पड़ता है कि मैं मौजूद हूं। विनम्र, पता ही चल जाता है कि मौजूद है। और जब बतलाना पड़े, तो शोभा चली जाती है। जो जानते हैं, उनके लिए कथा पूरी हो गई।यदि विवेक है ; तो तुम पैर के पास बैठे अर्जुन हो। जीवन के सघन युद्ध में वही काम आएगा।अर्जुन बनो, तो श्रीकृष्ण की गीता तो सदा तुममें जन्म लेने को तत्पर है। तुम जरा जगह दो तो जैसी गीता अर्जुन को मिली, वैसी ही तुम्हें भी मिल सकती है।

....SHIVOHAM.....