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हिन्दू धर्म की कालगणना के अनुसार युग, योनियां ,जीवों की सात अवस्थायें का क्या विज्ञान हैं?

07 FACTS;- 1-हिन्दू धर्म में विकासवादी सिद्धांत को चक्रों के अनुसार बताया गया है। विकास के दो आयाम है। पहला शारीरिक विकासक्रम जो कि प्राकृतिक विकासक्रम का एक हिस्सा है और दूसरा मानसिक विकास क्रम जो कि चेतना के विकासक्रम का एक हिस्सा है।चेतना या कहें कि आत्मा ने पहले खुद को जड़ जगत अर्थात पत्थर, पेड़-पौधे इत्यादि में व्यक्त किया, फिर प्राण जगत अर्थात पशु और पक्षियों में, फिर मनुष्य अर्थात मन के जगत में खुद को अभिव्यक्त किया। शरीर के आकार-प्रकार की यह यात्रा चेतना के विकास से भी जुड़ी हुई है। 2-संसार के इतिहास और संवतसरों की गणना पर दृष्टि डालें तो ईसाई संवत सबसे छोटा अर्थात 2016 वर्षों का है। सभी संवतों की गणना करें तो ईसा संवत से अधिक दिन मूसा द्वारा प्रसारित मूसाई संवत 3,583 वर्ष का है। इससे भी प्राचीन 'संवत' युधिष्ठिर के प्रथम राज्यारोहण से प्रारंभ हुआ था। उसे 4,172 वर्ष हो गए हैं। इससे पहले कलियुगी संवत शुरू 5,117 वर्ष पहले शुरू हुआ। 3-सतयुग में प्रतिकात्मक तौर पर धर्म के चार पैर थे, त्रैता में तीन पैर, द्वापर में दो पैर और अब कलिकाल में धर्म के पैरों का कोई नामोनिशान नहीं है। धर्म अब पंगु बन गया है। यह धर्म के उत्थान, विकास और पतन के अनुसार युगों का निर्धाण किया गया है। साथ ही मनुष्य की ऊंचाई, योग्यता, क्षमता और मानसिक दृढ़ता के भी उत्थान, विकास और पतन के अनुसार युग की धारणा नियुक्त की गई है। 4-मनुष्य जन्म लेता है तो बच्चा होता है फिर बढ़ता है तो किशोर होता है, फिर वह जवान होता है और अंत में वह बुढ़ा होकर मर जाता है। उसी तरह हिन्दू धर्मानुसार संपूर्ण मनुष्य जाति और इस जगत की भी उम्र तय है। धरती का शैशवकाल, किशोरकाल, युवा काल और अंत में वृद्धकाल। चारों युगों की धारणा इसी पर टिकी हुई है। 5-हिन्दू धर्म की कालगणना वृहत्तर है। पंद्रह तिथियों का एक पक्ष या पखवाड़ा माना गया है। शुक्ल और कृष्ण पक्ष मिलाकर दो पक्ष का एक मास। फिर दो मास की एक ऋतु और इस तरह तीन ऋतुएँ मिलकर एक अयन बनता है और दो अयन यानी उत्तरायन और दक्षिणायन। इस तरह दो अयनों का एक वर्ष पूरा होता है। 6-15 मानव दिवस एक पितृ दिवस कहलाता है यही एक पक्ष है। 30 पितृ दिवस का एक पितृ मास कहलाता है। 12 पितृ मास का एक पितृ वर्ष। यानी पितरों का जीवनकाल 100 का माना गया है तो इस मान से 1500 मानव वर्ष हुए।और इसी तरह पितरों के एक मास से कुछ दिन कम यानी मानव के एक वर्ष का देवताओं का एक दिव्य दिवस होता है, जिसमें दो अयन होते हैं पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। तीस दिव्य दिवसों का एक दिव्य मास। बारह दिव्य मासों का एक दिव्य वर्ष कहलाता है। 12000 दिव्य वर्ष अर्थात 4 युग अर्थात एक महायुग जिसे दिव्य युग भी कहते हैं।ब्रह्मा का एक दिवस 10000 भागों में बँटा होता है, जिसे चरण कहते हैं। 7-चार युग हैं; - 1- सत्ययुग 2- त्रेतायुग 3- द्वापर युग 4- कलयुग चारों युग के चरण;- 4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग 3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग 2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग 1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग 1) सत्ययुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-4,800 दिव्य वर्ष अर्थात सतयुग। मानव वर्ष के मान से सत्ययुग की अवधि 17 लाख 28 हजार वर्ष है। मनुष्य की आयु प्रारम्भ में दस लाख वर्ष होती है। अन्त में एक लाख वर्ष होती है।वर्तमान वराह कल्प में हुए कृत या सत्य को 4800 दिव्य वर्ष का माना गया है। 2-सतयुग में मनुष्य की लंबाई 32 फिट अर्थात लगभग 21 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्र 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है। पुण्य की मात्रा 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है। 2) त्रेतायुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-3,600 दिव्य वर्ष अर्थात एक त्रेता युग। मानव वर्ष के मान से त्रेतायुग की अवधि 12 लाख 96 हजार वर्ष होती है। मनुष्य की आयु प्रारम्भ में एक लाख वर्ष होती है, अंत में दस हजार वर्ष होती है।त्रेतायुग को 3600 दिव्य वर्ष का माना गया है ।त्रेता युग मानवकाल के द्वितीय युग को कहते हैं। यह काल श्री राम के देहान्त से समाप्त होता है। 2-त्रेतायुग में मनुष्य की लंबाई 21 फिट अर्थात लगभग 14 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्रा 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है और पुण्य की मात्रा 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है। 3) द्वापरयुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-2,400 दिव्य वर्ष अर्थात एक द्वापर युग। मानव वर्ष के मान से द्वापरयुग की अवधि 8 लाख 64 हजार वर्ष होती है। मनुष्य की आयु दस हजार प्रारम्भ में होती है। अंत में एक हजार रह जाती है।द्वापर मानवकाल के तृतीय युग को कहते हैं। यह काल श्री कृष्ण के देहान्त से समाप्त होता है। 2-द्वापरयुग में मनुष्य की लंबाई 11 फिट अर्थात लगभग 7 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्रा 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है जबकि पुण्य की मात्रा 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है। 4) कलयुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-1,200 दिव्य वर्ष अर्थात एक कलि युग। मानव वर्ष के मान से कलयुग की अवधि 4 लाख 32 हजार वर्ष होती है। मनुष्य की आयु एक हजार वर्ष से प्रारम्भ होती है, अंत में 20 वर्ष रह जाती है। 1200 दिव्य वर्ष का एक कलियुग माना गया है। कलियुग चौथा युग है। आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ था। श्री कृष्ण का इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात देहान्त हुआ, तभी से कलियुग का आरम्भ माना जाता है। 2-कलियुग में मनुष्य की लंबाई 5 फिट 5 इंच अर्थात लगभग साढ़े तीन हाथ बतायी गई है। इस युग में धर्म का सिर्फ एक चैथाई अंश ही रह जाता है। इस युग में पाप की मात्रा 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है, जबकि पुण्य की मात्रा 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है। NOTE;- वर्तमान में जो युग चल रहें है ऐसे चार युग पहले भी बहुत से हो चुके हैं। अनुमानत: चार युगों का यह 22वाँ या 23वाँ चक्र चल रहा है। उपरोक्त आँकड़ों में दोष हो सकता हैं, क्योंकि पुराणों में युगों की काल अवधि को लेकर अलग-अलग धारणा मिलती है।

कर्मों की योनियाँ 〰〰🌼〰〰 प्रश्न :- कितने प्रकार की और कितनी योनियां हैं?

उत्तर :- तीन प्रकार की योनियाँ हैं-

१.कर्म योनि। २.भोग योनि। ३.उभय योनि।

कुल योनियाँ चौरासी लाख कही जाती है। कुल्लियात आर्य मुसाफिर में स्वर्गवासी पं. लेखराम जी ने अनेक महात्माओं की साक्षी देकर यह लिखा है।चौरासी लाख योनियों की गणना इस प्रकार कही गयी है।

जल-जन्तु ७ लाख,पक्षी १० लाख,कीड़े-मकोड़े ११ लाख,पशु २० लाख,मनुष्य ४ लाख और जड़ (अचल,स्थावर) ३२ लाख योनियाँ हैं।(देखो गीता रहस्य ले. तिलककृत पृष्ठ १५४)

श्रेष्ठतम योनि:- 〰〰〰〰 प्रश्न :- कर्म योनि और भोग योनि तो मैंने भी सुनी हैं।कर्म योनि तो मनुष्यों की है और भोग योनि पशुओं की।परन्तु यह उभय योनि तो आज ही नई सुनी है।इसका क्या आशय है?

उत्तर :- जो तुमने सुन रखा है,वह भी यथार्थ नहीं। वास्तव में भोग योनि वही है जिसमें केवल भोग ही भोगा जाता है और कर्म नहीं किया जाता। वह बंदी के समान है,उसे ही पशु योनि कहते हैं।उभय योनि वह है जिसमें पिछले कर्मों का फल भी भोगा जाता है और आगे के लिए कर्म भी किया जाता है।वह योनि मनुष्य योनि कहलाती है। फिर यह कर्म योनि भी दो प्रकार की है। एक तो वह जो आदि सृष्टि में बिना माता-पिता के मुक्ति से लौटे हुए जीव सृष्टि उत्पन्न करने मात्र के लिए पैदा होते हैं। उसे अमैथुनी कहते हैं,दूसरे वह जो माता-पिता के संयोग से पैदा होते हैं। वह मैथुनी कहलाते हैं। उनका जन्म केवल मोक्ष प्राप्ति के साधन और मुक्ति पाने योग्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही होता है। ऐसे कर्म योनि वाले जीवों ने जन्म-जन्मान्तरों में तप किया होता है। वह उसके प्रभाव से अपनी केवल थोड़ी सी कसर पूरी करने के लिए जन्म लेते हैं। उन पर भगवान की दया होती है।वह कर्म योग,ज्ञान योग अथवा भक्ति योग द्वारा किसी फल की इच्छा किये बिना निष्काम-भावना से कर्म करते हैं,इसलिए वह मुक्त हो जाते हैं।जैसे आदि सृष्टि में अग्नि,वायु,अंगिरा आदि ऋषि बिना माता-पिता के हुए और वर्तमान काल में महाराजा जनक,महात्मा बुद्ध,भगवान शंकर,महर्षि दयानन्द कपिल मुनि आदि हो चुके हैं।

योनि-चक्र:- 〰〰〰 प्रश्न :- मनुष्य किन-किन कर्मों के कारण पशु योनि में पहुंच जाता है? और क्या यह प्रसिद्ध लोकोक्ति सत्य नहीं कि- मनुष्य जन्म दुर्लभ है मिले न बारम्बार। तरुवर से पत्ता झड़े,फिर न लागे डार ।।

अर्थात् - जब मनुष्य एक बार पशु-योनि में चला जाता है तो फिर उसको मनुष्य जन्म नहीं मिलता।

उत्तर:- यह महात्माओं का अपना-अपना अनुभव है।उनका यह विचार है कि प्रभु बड़े दयालु हैं।अपने अमृत पुत्रों (जीवों) को उनके कर्मानुसार ,केवल उनके सुधारने के लिए जन्म देते हैं।वह उन्हें अपनी ओर बार-बार उठने और आने का अवसर देते हैं।जैसे मान लो,कोई मनुष्य ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ,परन्तु उसने वहाँ शुभ कर्म नहीं किये।प्रभु को भूल गया,कभी याद नहीं किया तो भगवान् अगले जन्म में उसे गिराकर क्षत्रिय कुल में जन्म देंगे,कि वह फिर सँभलकर अपनी उन्नति कर सके।यदि यहाँ भी उसने अपनी योग्यता को सिद्ध नहीं किया तो तीसरा जन्म उसे वैश्य के घर में देंगे।यदि वह वहाँ भी न उठा और भगवान को भूला रहा,तो उसे शूद्र योनि में डालेंगे।यदि वह वहाँ भी न संभला और भगवान् ने देखा कि यह मूढ़मति भूलकर भी मेरा नाम नहीं लेता,उपकार नहीं मानता और शुभकर्मों की और रुचि नहीं करता और नित्य बुरे कर्मों में ही लीन रहता है,तो उसे पशु-पक्षी की योनि में डाल देंगे।कर्मानुसार यथोचित योनियां भुगताकर फिर कभी किसी समय नये सिरे से मनुष्य योनि प्रदान करेंगे,जिससे वह पहले समय किये हुए अशुभ कर्मों के प्रभाव से मुक्त और पवित्र होकर,यदि चाहे तो फिर अपना उद्धार कर ले और धीरे-धीरे आवागमन से छुटकारा पाकर परम पद प्राप्त कर सके। परन्तु यह भयानक कथा साधारण मनुष्यों के लिए है कि वह मनुष्य योनि का मूल्य समझें और इसको अपनावे।पापों से बचते रहें और परमात्मा को न भूलें।

वेद-शास्त्रों केअनुसार प्रभु वास्तव में जीव को उसके सुधार तथा उपकार के लिए बार-बार जन्म देते हैं।परन्तु ऐसा नहीं करते कि एक ही बार उसे मनुष्य जातियों की उत्तम योनियां देकर फिर नीच पशु आदि योनियों में भेज दें वरन् उनके भले-बुरे कर्मानुसार उनका योनि-क्रम साथ ही साथ बदलता रहता है।

शारीरिक कर्म-दोष से मनुष्य स्थावरता (पेड़ आदि योनियों)को,वाणी के कर्म-दोष से पशु-पक्षी आदि योनियों को और मानसिक पापों के कारण चाण्डाल आदि की नीच मनुष्य की योनियों को प्राप्त होता है।

शुभाशुभ फल देने वाले कर्मों का उत्पत्ति स्थान मन,वचन और शरीर है।इन कर्मों से ही उत्तम,मध्यम और अधम गति प्राप्त होती है।

इस देह सम्बन्धी त्रिविध (तीन प्रकार के उत्तम,मध्यम और अधम) तथा दस लक्षणों से युक्त तीन(मानसिक,वाचिक और दैहिक) अधिष्ठानों के आश्रित कर्मों का प्रवर्तक मन ही है।अर्थात् मन ही अच्छे और बुरे कर्मों का कारण है।

अन्याय से दूसरों का धन छीनने की बात सोचते रहना,दूसरों का अनिष्ट(बुरा सोचना)चिंतन,मन में मिथ्या भयनिवेश अर्थात् यह सोचना कि यह शरीर ही आत्मा है और परलोक कोई नहीं,यह तीन प्रकार के मानस कर्म हैं जो अशुभ फल देने वाले होते हैं।

कठोर बोलना,झूठ बोलना,दूसरे के दोषों को कहते रहना और निरभिप्राय बात करना,ये चार वाणी के पाप हैं,अशुभ फल के दाता हैं।

दूसरों की वस्तुओं को बलपूर्वक ले लेना,अवैध हिंसा और परस्त्री गमन यह तीन प्रकार के शारीरिक पाप-कर्म हैं जिनका फल कभी शुभ नहीं हो सकता।

इससे आगे महर्षि मनु कहते हैं:-

जब मनुष्य के पाप अधिक और पुण्य कम होते हैं,तब उसका जीव पशु आदि नीच योनियों में जाता है।जब धर्म अधिक और पाप वा अधर्म कम होता है,तब उसे विद्वानों का शरीर मिलता है और जब पाप तथा पुण्य बराबर-बराबर होते हैं,तब साधारण मनुष्य जन्म पाता है।

प्रश्न :- तो फिर पशु से मनुष्य कैसे बनता है?

उत्तर:- जब पाप अधिक होने का फल पशु आदि योनि में भोग लिया तो पाप और पुण्य समतुल्य रह जाने से फिर मनुष्य शरीर मिल जाता है और पुण्य के फल भोग से साधारण मनुष्य शरीर प्राप्त करता है।

जीवों की सात अवस्थायें और उसका विज्ञान

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जीवात्मा क्या है? कहाँ से आया है? विश्व में वह किस स्थिति में है और कहाँ पहुँच कर वह पूर्णता प्राप्त करता है? इस संबंध में पूर्व और पाश्चात्य, ज्ञान और विज्ञान जगत् दोनों ही आदि काल से खोज करते रहे हैं। किन्तु अति सूक्ष्म विज्ञान होने के कारण उसे अच्छी तरह समझा नहीं जा सका। इस संदर्भ में उपलब्ध दर्शनों में वेद और उपनिषद् संबंधी मीमाँसा को सर्व शुद्ध और प्रामाणिक माना गया है।


1.भूः 2. भुव 3. स्वः 4. महः 5. जनः 6. तपः और 7. सत्यम्-यह सात लोक,


1.बीज जागृत 2. जागृत 3. महा जागृत 4. जागृत स्वप्न 5. स्वप्न 6. स्वप्न जागृत और 7. सुषुप्ति-यह जीव की सात अवस्थायें,


1. रस 2. रक्त 3. माँस 4. मज्जा 5. मेद 6. अस्थि और 7. वीर्य-यह सप्त धातुयें, तथा


1. स्वप्न जागर 2. संकल्प जागर 3. केवल जागर 4. चिर जागर 5. धन जागर 6. जागृत स्वप्न और 7. क्षीण जागर-यह जीवों के सात प्रकार।


इन सबकी विधिवत् जानकारी दिलाना भारतीय तत्व-दर्शन का उद्देश्य रहा है। यह सप्तक केले के पत्तों के अनुसार जीव-चेतना के विकास की सात अवस्थाओं का विज्ञान है। इसे समझ लेने पर परमात्मा की स्थिति से लेकर संसार के विस्तार, जीवात्मा के विज्ञान से लेकर पुनः मुक्त अवस्था प्राप्त होने तक का शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन अवस्थाओं को ‘एस्ट्रल’ शरीर के नाम से थियोसोफिस्ट और पाश्चात्य वैज्ञानिक भी जानने लगे हैं, तथापि उनकी सबसे अच्छी व्याख्या योग-ग्रन्थों और उपनिषदों में ही प्राप्त है।

सर्वप्रथम सृष्टि विस्तार की प्रक्रिया को लेते हैं। भारतीय दर्शन की मान्यता यह है कि प्रारम्भ में एक ही ‘महातत्व’ या परमात्मा था, उसकी इच्छा हुई-’एकोऽहं बहुस्याम्’ मैं एक हूँ, अनन्त हो जाऊं। उसकी इस इच्छा से ही पंच-तत्वों की रचना हुई और क्रमशः अनेक लोक-लोकान्तरों और जीवधारियों की रचना होती चली गई। यों ब्रह्माण्डों की संख्या अनन्त है-बहवो ह वा......आदित्यात् पराच्चो लोकाः (जैमिनी ब्रह्माण 1/11) अर्थात् आदित्य से परे लोक है तथापि पंच तत्वों की न्यूनाधिक मात्रा के अनुपात से लोकों की संख्या सात ही मानी गई, 5 लोक पाँच तत्वों की मिश्रित बहुलता वाले अर्थात् किसी में आकाश तत्व अधिक है, शेष 4 कम मात्रा में। किसी में अग्नि तत्व अधिक है, शेष 4 कम ऐसे। एक इन समस्त तत्वों से परे महत्तत्व और अन्तिम तमिस्र लोक अर्थात् जिसमें स्थूलता-ही-स्थूलता, अन्धकार-ही-अन्धकार है।


इन लोकों की स्थिति पृथक-पृथक न होकर अंतर्वर्ती है अर्थात् एक लोक में ही शेष 6 भी हैं। एक ही स्थान पर सातों लोक विद्यमान हैं। जीव-चेतना अपने तत्वों की जिस बहुलता में होती है, वह उसी प्रकार के लोक का अनुभव करती है। पृथ्वी पर रहते हुए भी हम सूर्यलोक, आदित्य या स्वर्गलोक में स्थित हो सकते हैं, यदि हमारी चेतना अग्नि, सोम और महत्त्व में परिणित हो चुकी हो। जैमिनी ब्रात्म में इसी बात को-’अनन्तर्हितान् एश्वेत् उध्वनि लोकान् जयति’ कहा है, जिसका अर्थ होता है-ईश्वर को प्रयत्नपूर्वक धारण करने वाला व्यक्ति न पृथक् हुए ही ऊर्ध्व लोकों को जीतता है।


लोक हमारे भीतर है, हम जिस लोक के तत्व का विकास कर लेते हैं। स्थूल रूप से शरीर में होने पर भी अपने भीतर उसी लोक में अनुभव करते हैं, वैसी ही सूक्ष्म दृष्टि और शक्ति के स्वामी भी हम होते हैं। भूलोक स्थूल धातुओं और खनिजों का लोक है। इस लोक में रहने वाले व्यक्ति में इच्छाएं और वासनाएँ बनी रहती हैं। इस तत्व से प्रभावित व्यक्ति में नेतृत्व, सर्व विद्या विनोदी, रोगमुक्त, काव्य और लेखन की सामर्थ्य आदि विकसित होते हैं।


भुवः लोक जल तत्व प्रधान सिन्दूर वर्ण का है। इस लोक में निवास करने वाले व्यक्तियों का अहंकार, मोह, ममत्व नष्ट हो जाता है। ईश्वरीय मनन में प्रसन्नता अनुभव होने लगती है। रचना-शक्ति का विकास होने लगता है, सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा वह अधिक उन्नतिशील होता है स्वःलोक अग्नि तत्व की प्रधानता की अवस्था है। सूर्य में अग्नि तत्वों वाले जीव ही रह सकते हैं या यों कहना चाहिये कि सूर्य का ध्यान करते रहने से अग्नि अर्थात् उष्णता, विद्युत् और प्रकाश के परमाणुओं का शरीर में विकास होता है। ऐसे शरीर वाले व्यक्ति में संहार और पालन की शक्ति, वचन-सिद्धि आदि गुण होते हैं। उस शक्ति को दुर्गुणों से घृणा होने लगती है तथा परमार्थ व सेवा में आनन्द मिलने लगता है।


महः लोक वायु तत्व की प्रधानता का प्रतीक है। इसके ध्यान और प्राप्ति से इन्द्रिय संयम, ज्ञान-प्राप्ति की उत्कण्ठा और परकाया प्रदेश आदि सिद्धियों का स्वामित्व मिलता है। इसी स्थिति में परिणित हो जाने पर आत्म-चेतना इन शक्तियों सामर्थ्यों का अधिकार सामान्य रूप में प्राप्त कर लेती हैं। जनः लोक, जिसके परमाणु धूम्र वर्ण के, आकाश तत्व की प्रधानता वाले होते हैं। इस स्थिति में जीवात्मा दीर्घ जीवन, तेजस्विता, सर्व हित परायणता और भूत-भविष्य को देखने का अधिकार प्राप्त करती है। इस स्थिति पर पहुँच गई आत्मायें कठिन परिस्थिति में भी अतीव शान्ति अनुभव करती हैं। उनके मस्तिष्क में से सदैव सुखद विचार उठते रहते हैं।


तप लोक शुभ्र वर्ण के शुद्ध ज्योतिर्मय परमाणुओं से बना होता है। इसे ही महत्तत्व कहते हैं, उसके ध्यान करने से ॐ कार का सुखद नाद सुनाई देता है और तीनों लोकों में जो कुछ है वह स्थूल नेत्रों की तरह आत्मा में प्रतिभासित होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचे हुए साधक के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। अन्तिम सत्यलोक, जहाँ से परमात्मा का संकल्प स्फुरित होता है, जो निराकार और सभी तत्वों से अतीत है। यहाँ पहुँची हुई आत्मायें जन्म-मृत्यु के बंधनों से छूटकर सहस्रदल कमल की तरह आकार वाले दिव्यलोक का स्वामित्व प्राप्त करती हैं। इन सातों लोकों की क्रमशः सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम अवस्थायें हैं। इनमें आत्म-चेतना की क्रमशः परिणिति को ही जीव की सात अवस्थायें कहा गया है।


यों ब्रह्माँड के विस्तार के संबंध में पाश्चात्य विद्वानों के अनेक मत हैं, पर उनमें से जिन जिन सिद्धान्तों को पाश्चात्य देशों में प्रमाणिक माना गया हैं, उनका सार इन तथ्यों का प्रतिपादन ही करता है।


पहला ब्रिटिश खगोलशास्त्री फ्रायड हायल का ‘अपरिवर्ती’ सिद्धाँत है। इसके अनुसार ब्रह्माँड का अस्तित्व हमेशा रहा है। हम भी मानते हैं कि परमात्मा अनादि तत्व है, वह कालातीत है अर्थात् ऐसा कोई भी समय नहीं, जब वह न रहा हो। इस तत्व को हाइड्रोजन कहते हैं। इसी से अनेक आकाश गंगायें बनीं और क्रमशः घनत्व वाले ब्रह्माँडों का विस्तार होता चला गया है।


दूसरा सिद्धाँत कैम्ब्रिज विश्व-विद्यालय के रेडियो खगोल शास्त्री डॉ0 मार्टिन रैले का ‘बृहत् विस्फोट’ का सिद्धान्त कहलाता है। उसके अनुसार 10 अरब वर्ष पूर्व एक अत्यन्त सघन परमाणुओं वाला तत्व था, उसमें एका-एक जोर का विस्फोट हुआ। उस विस्फोट से बिखरे पदार्थ-खण्ड ही आकाश गंगायें बनीं और उनसे सूर्य, सूर्य से पृथ्वी आदि ग्रह-नक्षत्र बने। गुब्बारा फूलने की तरह यह ब्रह्माँड विकसित होता जा रहा है और वह अनन्त विस्तार में समाता चला जायेगा। इस मत के मानने वाले ब्रह्माँड की समाप्ति कर नहीं, विस्तार पर ही विश्वास करते हैं।


तीसरा सिद्धान्त पुनरावृत्ति का या दोलायमान स्थिति का सिद्धाँत कहलाता है और जो ऐलेन सैण्डेज तथा पालोमर वेधशाला के वैज्ञानिकों की देन है-ये और सब बातें वृहत् विस्फोट के सिद्धान्त की ही हैं, पर इनके अनुसार 80 अरब वर्ष पीछे ब्रह्माँड के विस्तार की अन्तिम स्थिति होगी अर्थात् उस समय प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न होने से सारे पंचभूत नष्ट होकर पुनः एक ही तत्व में चले जायेंगे। इसके बाद सृष्टि-निर्माण की प्रक्रिया पुनः प्रारम्भ होगी।


यह सिद्धान्त प्रकारान्तर से भारतीय सिद्धान्तों की ही पुष्टि करते हैं। एक ही तत्व के विकास और काल-विभाजन की हमारे यहाँ गणनायें तक हुई हैं और उन्हें देव-युगों से लेकर पृथ्वी के युगों तक बाँटकर एक-एक युग में तत्वों की कमी या आधिक्य के साथ यह तक बता दिया है कि अमुक युग में ऐसी मनःस्थिति, अमुक युग में अमुक मन-स्थिति के लोग होंगे। ब्रह्माँड के विकास के साथ चेतना के विकास का जितना अच्छा समन्वय और सामंजस्य भारतीय तत्व-दर्शन ने प्रस्तुत किया है, उतना संसार के अन्य किसी भी विद्वान ने नहीं किया। वे अभी तक स्थूल विवेचन तक ही सीमित है, इसलिये आगे जीव की जिन सात अवस्थाओं का विवेचन करेंगे, उनका वैज्ञानिक दृष्टि से कोई प्रमाण नहीं मिलेगा। उनको प्रमाणित करने वाले तत्व केवल मनोवैज्ञानिक और घटनापरक तथ्य ही होंगे, जिनका विवरण अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में लगातार दिया जा रहा हैं।


अब तक सप्त लोकों की स्थिति का अध्ययन और पुष्टि वैज्ञानिक नहीं कर सके तथापि ब्रह्माँड में कुछ धुँधली रहस्यमयी वस्तुयें दिखाई दी हैं, जिन्हें आकाश की जबर्दस्त शक्ति-स्त्रोत के रूप में देखा जा रहा है। इन वस्तुओं का नाम ‘क्वासार’ रखा गया है। उनका अध्ययन तो ज्योतिर्विज्ञान के अध्याय में अन्यत्र करेंगे, पर यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इन शक्ति-स्रोतों के वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) सात रंग के पाये जाते हैं

1. बैंगनी

2. नीला

3. आसमानी

4. हरा

5. पीला

6. नारंगी

7. लाल।


इनमें से कुछ वर्ण भेद समीपवर्ती रंगों के सम्मिश्रण हो सकते हैं। यदि ऐसा हो, तो उनकी पूर्ति अत्यन्त दिव्य और अत्यन्त अन्धकारपूर्ण वे दो रंग हो सकते हैं, जिन्हें अपने वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में पालोमर वेधशाला के वैज्ञानिक डॉ0 एलन सैडेज और जीस ग्रीनस्टेन ने प्राप्त किया। बड़े परिश्रम से जब उन्होंने अत्यन्त सूक्ष्म वर्ण क्रम प्राप्त किया, तो उसमें यह दो ही रंग उपलब्ध हुए।


इन अवस्थाओं और शक्ति स्रोतों को इकट्ठा चित्रित करना कठिन है, पर यह निश्चित है कि यह अनजाने शक्ति-स्त्रोत सात लोकों के सात तत्व केन्द्र ही हैं। उन पर और विस्तृत खोजें हुईं, तो लोग देखेंगे कि भारतीय तत्व-दर्शन कितना अत्याधुनिक और प्रमाणिक रहा है।


...SHIVOHAM...