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हिन्दू धर्म की कालगणना के अनुसार युग, योनियां ,जीवों की सात अवस्थायें का क्या विज्ञान हैं?

07 FACTS;- 1-हिन्दू धर्म में विकासवादी सिद्धांत को चक्रों के अनुसार बताया गया है। विकास के दो आयाम है। पहला शारीरिक विकासक्रम जो कि प्राकृतिक विकासक्रम का एक हिस्सा है और दूसरा मानसिक विकास क्रम जो कि चेतना के विकासक्रम का एक हिस्सा है।चेतना या कहें कि आत्मा ने पहले खुद को जड़ जगत अर्थात पत्थर, पेड़-पौधे इत्यादि में व्यक्त किया, फिर प्राण जगत अर्थात पशु और पक्षियों में, फिर मनुष्य अर्थात मन के जगत में खुद को अभिव्यक्त किया। शरीर के आकार-प्रकार की यह यात्रा चेतना के विकास से भी जुड़ी हुई है। 2-संसार के इतिहास और संवतसरों की गणना पर दृष्टि डालें तो ईसाई संवत सबसे छोटा अर्थात 2016 वर्षों का है। सभी संवतों की गणना करें तो ईसा संवत से अधिक दिन मूसा द्वारा प्रसारित मूसाई संवत 3,583 वर्ष का है। इससे भी प्राचीन 'संवत' युधिष्ठिर के प्रथम राज्यारोहण से प्रारंभ हुआ था। उसे 4,172 वर्ष हो गए हैं। इससे पहले कलियुगी संवत शुरू 5,117 वर्ष पहले शुरू हुआ। 3-सतयुग में प्रतिकात्मक तौर पर धर्म के चार पैर थे, त्रैता में तीन पैर, द्वापर में दो पैर और अब कलिकाल में धर्म के पैरों का कोई नामोनिशान नहीं है। धर्म अब पंगु बन गया है। यह धर्म के उत्थान, विकास और पतन के अनुसार युगों का निर्धाण किया गया है। साथ ही मनुष्य की ऊंचाई, योग्यता, क्षमता और मानसिक दृढ़ता के भी उत्थान, विकास और पतन के अनुसार युग की धारणा नियुक्त की गई है। 4-मनुष्य जन्म लेता है तो बच्चा होता है फिर बढ़ता है तो किशोर होता है, फिर वह जवान होता है और अंत में वह बुढ़ा होकर मर जाता है। उसी तरह हिन्दू धर्मानुसार संपूर्ण मनुष्य जाति और इस जगत की भी उम्र तय है। धरती का शैशवकाल, किशोरकाल, युवा काल और अंत में वृद्धकाल। चारों युगों की धारणा इसी पर टिकी हुई है। 5-हिन्दू धर्म की कालगणना वृहत्तर है। पंद्रह तिथियों का एक पक्ष या पखवाड़ा माना गया है। शुक्ल और कृष्ण पक्ष मिलाकर दो पक्ष का एक मास। फिर दो मास की एक ऋतु और इस तरह तीन ऋतुएँ मिलकर एक अयन बनता है और दो अयन यानी उत्तरायन और दक्षिणायन। इस तरह दो अयनों का एक वर्ष पूरा होता है। 6-15 मानव दिवस एक पितृ दिवस कहलाता है यही एक पक्ष है। 30 पितृ दिवस का एक पितृ मास कहलाता है। 12 पितृ मास का एक पितृ वर्ष। यानी पितरों का जीवनकाल 100 का माना गया है तो इस मान से 1500 मानव वर्ष हुए।और इसी तरह पितरों के एक मास से कुछ दिन कम यानी मानव के एक वर्ष का देवताओं का एक दिव्य दिवस होता है, जिसमें दो अयन होते हैं पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। तीस दिव्य दिवसों का एक दिव्य मास। बारह दिव्य मासों का एक दिव्य वर्ष कहलाता है। 12000 दिव्य वर्ष अर्थात 4 युग अर्थात एक महायुग जिसे दिव्य युग भी कहते हैं।ब्रह्मा का एक दिवस 10000 भागों में बँटा होता है, जिसे चरण कहते हैं। 7-चार युग हैं; - 1- सत्ययुग 2- त्रेतायुग 3- द्वापर युग 4- कलयुग चारों युग के चरण;- 4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष) सत युग 3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग 2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग 1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग 1) सत्ययुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-4,800 दिव्य वर्ष अर्थात सतयुग। मानव वर्ष के मान से सत्ययुग की अवधि 17 लाख 28 हजार वर्ष है। मनुष्य की आयु प्रारम्भ में दस लाख वर्ष होती है। अन्त में एक लाख वर्ष होती है।वर्तमान वराह कल्प में हुए कृत या सत्य को 4800 दिव्य वर्ष का माना गया है। 2-सतयुग में मनुष्य की लंबाई 32 फिट अर्थात लगभग 21 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्र 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है। पुण्य की मात्रा 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है। 2) त्रेतायुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-3,600 दिव्य वर्ष अर्थात एक त्रेता युग। मानव वर्ष के मान से त्रेतायुग की अवधि 12 लाख 96 हजार वर्ष होती है। मनुष्य की आयु प्रारम्भ में एक लाख वर्ष होती है, अंत में दस हजार वर्ष होती है।त्रेतायुग को 3600 दिव्य वर्ष का माना गया है ।त्रेता युग मानवकाल के द्वितीय युग को कहते हैं। यह काल श्री राम के देहान्त से समाप्त होता है। 2-त्रेतायुग में मनुष्य की लंबाई 21 फिट अर्थात लगभग 14 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्रा 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है और पुण्य की मात्रा 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है। 3) द्वापरयुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-2,400 दिव्य वर्ष अर्थात एक द्वापर युग। मानव वर्ष के मान से द्वापरयुग की अवधि 8 लाख 64 हजार वर्ष होती है। मनुष्य की आयु दस हजार प्रारम्भ में होती है। अंत में एक हजार रह जाती है।द्वापर मानवकाल के तृतीय युग को कहते हैं। यह काल श्री कृष्ण के देहान्त से समाप्त होता है। 2-द्वापरयुग में मनुष्य की लंबाई 11 फिट अर्थात लगभग 7 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्रा 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है जबकि पुण्य की मात्रा 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है। 4) कलयुग का वर्णन:- 02 POINTS;- 1-1,200 दिव्य वर्ष अर्थात एक कलि युग। मानव वर्ष के मान से कलयुग की अवधि 4 लाख 32 हजार वर्ष होती है। मनुष्य की आयु एक हजार वर्ष से प्रारम्भ होती है, अंत में 20 वर्ष रह जाती है। 1200 दिव्य वर्ष का एक कलियुग माना गया है। कलियुग चौथा युग है। आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ था। श्री कृष्ण का इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात देहान्त हुआ, तभी से कलियुग का आरम्भ माना जाता है। 2-कलियुग में मनुष्य की लंबाई 5 फिट 5 इंच अर्थात लगभग साढ़े तीन हाथ बतायी गई है। इस युग में धर्म का सिर्फ एक चैथाई अंश ही रह जाता है। इस युग में पाप की मात्रा 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है, जबकि पुण्य की मात्रा 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है। NOTE;- वर्तमान में जो युग चल रहें है ऐसे चार युग पहले भी बहुत से हो चुके हैं।