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क्या हैं सच्चिदानंदघन परमात्मा को स्मरण की कला?


इसलिए हे अर्जुन, तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मेरे में अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त हुआ निःसंदेह मेरे को ही प्राप्त होगा।

और हे पार्थ, परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त अन्य तरफ न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ पुरुष परम दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।

इससे जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले, अचिंत्यस्वरूप, सूर्य के सदृश प्रकाशरूप, अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानंदघन परमात्मा को स्मरण करता है…।

प्रभु का स्मरण या तो थोड़ी देर को हो सकता है। लेकिन थोड़ी देर को किया हुआ स्मरण प्राणों की गहराई तक प्रवेश नहीं कर पाता है। सतह ही छूती है उससे, अंतस्तल अछूता रह जाता है। श्वास की भांति सतत स्मरण चाहिए। श्वास जैसे बीच में बंद हो जाए, तो जीवन से संबंध छूट जाता है, ऐसे ही स्मरण का धागा भी क्षणभर को भी छूट जाए, तो परमात्मा से संबंध टूट जाता है। स्मरण श्वास है परमात्मा की तरफ व्यक्ति के जीवन से बहती हुई। शरीर से जुड़े रहना हो, तो श्वास चाहिए; प्रभु से जुड़ा रहना हो, तो स्मरण चाहिए।

लेकिन हम चौबीस घंटे यदि प्रभु का स्मरण करें, तो और शेष सब काम कब कर पाएंगे? यदि चौबीस घंटे प्रभु का स्मरण ही करना हो, तो कब करेंगे भोजन, कब सोएंगे, कब जागेंगे; कब दुकान, कब बाजार, कब युद्ध–यह सब कब होगा? इसलिए एक समझौता आदमी ने खोजा, और वह यह कि और सब काम भी हम करें, घड़ी आधी घड़ी को प्रभु का स्मरण कर लें।

यह ऐसे ही हुआ, जैसे कोई सोचे कि शेष समय दूसरे काम करें, घड़ी आधी घड़ी को श्वास ले लें! यह नहीं हो सकता। यह असंभव है।

कृष्ण अर्जुन को इसलिए कहते हैं, इसलिए हे अर्जुन, तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। यह स्मरण तेरे युद्ध में बाधा नहीं बनेगा। और तू अगर सोचता हो कि प्रभु को स्मरण करना है, तो जंगल में भाग जाना पड़ेगा, तो गलत सोचता है। तू युद्ध भी कर और स्मरण भी कर।

इसका अर्थ हुआ, जो व्यक्ति जो कर रहा है, उसे करता रहे, और स्मरण भी करे। लेकिन कठिनाई मालूम पड़ती है। क्योंकि जब भी हम स्मरण करेंगे, तब दूसरे काम के करने में बाधा पड़ेगी।

चित्त की व्यवस्था ऐसी है कि चित्त की नोक पर एक चीज से ज्यादा एक साथ नहीं हो सकती। जब आप एक बात को स्मरण करते हैं, तब दूसरी बात से चित्त हट जाता है। दूसरी बात पर लगाते हैं, तो पहली बात से हट जाता है। चित्त का स्वभाव एकाग्र होना है।

तो युद्ध करते हुए प्रभु को कैसे स्मरण किया जा सकता है? अगर युद्ध करते समय भी कोई राम-राम की धुन लगाए रहे, तो या तो उसका मन राम-राम में उलझेगा, और तब युद्ध से छूट जाएगा; और या युद्ध में उलझेगा, तो राम-राम को भूल जाएगा। और कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, तू दोनों साथ ही साथ कर। तो निश्चित ही यह स्मरण किसी और तरह का होगा–उसे हम समझ लें–जिससे युद्ध में कोई बाधा नहीं पड़ेगी।

परमात्मा का स्मरण या तो उसके नाम के दोहराने से जुड़ जाता है, जो कि सच्चा स्मरण नहीं है। सच्चे स्मरण में नाम की भी जरूरत नहीं रह जाती। असल में नाम तो बहाना है स्मरण को रखने का। जैसे कोई आदमी बाजार जाता है और कोई चीज लाने की तैयारी करके जाता है, और भूल न जाए, तो अपने कपड़े में एक गांठ लगा लेता है। भूल न जाए, इस डर से कपड़े में गांठ लगा लेता है। भूल न जाए इस डर से, जिसे भूलने का डर है, उसे गांठ लगानी पड़ती है। लेकिन जो भूल सकता है, वह बाजार जाकर यह भी भूल सकता है कि गांठ किसलिए लगाई थी।

मैंने सुना है कि रूजवेल्ट जब बोलते थे, तो अक्सर भूल जाते थे और काफी लंबा बोल जाते थे। बीस मिनट बोलना हो, तो साठ मिनट बोल जाते, अस्सी मिनट बोल जाते। बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती थी। और जब वे प्रेसिडेंट हुए, तो उनके मित्रों ने कहा, अब ऐसी भूल-चूक नहीं चलेगी। तो पहले ही दिन बोलने खड़े हुए, तो उन्होंने घड़ी हाथ से निकालकर टेबल पर रख ली और कहा कि मैं घड़ी सामने रखे लेता हूं, ताकि मुझे पता रहे कि मैं ज्यादा तो नहीं बोल गया। लेकिन शर्त एक ही है कि मुझे यह याद रह जाए कि मैंने कब बोलना शुरू किया था। घड़ी तो बता देगी कि अब दस बज गए, लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि बोलना शुरू कब किया था! जो भूल सकता है, वह कुछ भी भूल सकता है।

अगर प्रभु को बिना नाम के स्मरण नहीं रखा जा सकता, तो नाम के साथ भी भूला जा सकता है। और यही हुआ है। नाम लोग दोहराते रहते हैं और प्रभु को बिलकुल स्मरण नहीं कर पाते। गांठ ही हाथ में रह जाती है; किसलिए लगाई थी, वह भूल जाता है। गांठ सहयोगी हो सकती है। लेकिन सहयोगी हो सकती है, अगर भीतर याद मौजूद हो। नाम भी सहयोगी हो सकता है। लेकिन सिर्फ सहयोगी है। नाम ही स्मरण नहीं है, सिर्फ गांठ है।

कृष्ण जिस स्मरण को कह रहे हैं, वह और है। एक तो मैं भीतर याद रखूं, परमात्मा है, परमात्मा है। और एक मैं अनुभव करूं, ज्योति है चारों ओर। दिखाई पड़ता है जो, सुनाई पड़ता है जो, सामने जो खड़ा है दुश्मन की तरह प्रत्यंचा पर तीर को चढ़ाकर, छाती को बेध देने को, वह भी प्रभु है। यह जो चारों तरफ विस्तार है, यह उसका ही विस्तार है, इसका बोध, इसकी अवेयरनेस अगर बनी रहे, तो फिर आप कुछ भी काम कर सकते हैं, स्मरण बाधा नहीं बनेगा, क्योंकि कोई भी काम स्मरण के लिए ही गांठ सिद्ध होगा।

ध्यान रखिए, एक तो नाम की गांठ लगानी पड़ती है, वह दूसरे कामों में बाधा बनेगी। लेकिन हम दूसरे समस्त कामों को ही परमात्मा को समर्पित हिस्सा समझ लेते हैं।

तो कृष्ण कहते हैं, तू युद्ध कर और स्मरण कर। युद्ध करता हुआ स्मरण कर।

इसका एक ही अर्थ है, युद्ध जो कर रहा है वह, दुश्मन जो खड़ा है वह, जो भी हो रहा है चारों ओर; कोई भी जीते, और कोई भी हारे, और कोई भी परिणाम हो; इस सबके बीच परमात्मा ही सक्रिय है। यह बोध अगर हो, तो आप दुकान पर बैठकर, दुकान का काम करते वक्त, ग्राहक से बात करते वक्त, प्रभु का स्मरण रख सकते हैं।

क्या कठिनाई है कि ग्राहक में प्रभु को न देखा जा सके? कौन-सी कठिनाई है कि जब आप कोई सामान हाथ में उठाते हों, तो उसमें प्रभु को अनुभव न किया जा सके? स्नान करते हों, तो जल की धार सिर पर पड़ती हो, वह परमात्मा की धार न बन जाए, इसमें बाधा क्या है? भोजन जब करते हों, तब वह प्रभु का ही प्रसाद हो, प्रभु ही हो, इसमें अड़चन क्या है?

अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन की समस्त धारा के कण-कण में प्रभु को स्मरण कर पाए, तो ही स्मरण अलग काम नहीं बनता। समस्त कामों के बीच, इसे ऐसे पिरो दिया जाता है, जैसे कि माला के मनकों के बीच धागा पिरोया हो। दिखाई भी नहीं पड़ता, और सब मनकों को वही सम्हाले, भीतर पिरोया होता है।

स्मरण का अर्थ है, धागे की तरह जीवन के सारे कामों के भीतर प्रवेश कर जाए और जीवन की एक माला बन जाए, और उस माला को हम प्रभु के चरणों में रखने में समर्थ हो जाएं। वह स्मरण आपके प्रत्येक काम को ही ध्यान बना दे।

कबीर कपड़ा बुनते हैं, तो भी वे गा रहे हैं, झीनी झीनी बीनी री चदरिया! वे कपड़ा बेचने जा रहे हैं, तो भी वे ऐसे भागे जा रहे हैं कि जैसे राम बाजार में कपड़ा खरीदने को आया होगा। ग्राहक सामने है, तो वे उसे चादर ऐसी फैलाकर बताते हैं। और बड़े मजे की बात है कि कबीर जब किसी ग्राहक को चादर बेचते थे, तो उससे कहते थे, राम! बहुत सम्हालकर रखना। बहुत याददाश्त के साथ इसे बुना है। इसके रोएं-रोएं में तुम्हें ही बुना है।

ग्राहक तो कभी चौंक भी जाता था कि यह किस पागल से हम चादर खरीदने आ गए! वह मुझे राम कह रहा है!

कबीर जब ज्ञानी हो गए, परम ज्ञानी हो गए, तो शिष्यों ने कहा कि अब यह कपड़े बुनने का काम बंद कर दो, यह शोभा नहीं देता। महाज्ञानी को यह शोभा नहीं देता कि वह कपड़े बुने और बाजार में बेचे, और एक बुनकर का काम करे!

कबीर ने कहा, अगर ज्ञानी को कोई काम शोभा नहीं देता, तो फिर यह परमात्मा को इतना बड़ा काम विराट विश्व का कैसे शोभा देता होगा? और अगर परमात्मा इतने विराट के काम में लीन है और छोड़कर नहीं भाग जाता, तो मैं तो छोटे-मोटे काम में लगा हूं कपड़ा बुनने के, इसे छोड़कर भाग जाने की मैं कोई जरूरत नहीं मानता हूं।

ज्ञानी छोड़कर भागे क्यों? ज्ञानी जहां है, वहीं क्यों न राम को पिरो दे? ज्ञानी जहां है, जो कर रहा है, उसी को ही क्यों न प्रभु का स्मरण बना ले? काश, ज्ञानी कम भागे होते, तो जीवन ज्यादा सुंदर होता। ज्ञानियों के भागने से जीवन अज्ञानियों के हाथ में पड़ गया है।

लेकिन कहा नहीं जा सकता। कभी किसी ज्ञानी को भागने का कर्म ही ऐसा पकड़ लेता है कि वही उसके लिए प्रभु का स्मरण बन जाता है। वह दूसरी बात है।

लेकिन अर्जुन से कृष्ण कहते हैं, तू युद्ध कर। अर्जुन की तकलीफ, अर्जुन की चिंता यही है कि वह कहता है कि यह युद्ध और धर्म दो अलग चीजें हैं। अगर मुझे युद्ध करना है, तो मैं अधार्मिक हो जाऊंगा। और अगर मुझे धार्मिक होना है, तो मुझे युद्ध छोड़कर भाग जाना चाहिए। यह अर्जुन की ही चिंता नहीं, हम सभी की चिंता है।

आज ही कोई मित्र मेरे पास थे। वे कहते थे, आप कहते हैं संन्यास। यदि मुझे संन्यास लेना है, तो मुझे घर छोड़कर जाना ही पड़ेगा। और अगर मुझे घर में रहना है, तो संन्यास मुझे नहीं लेना चाहिए।

क्यों? घर और संन्यास में ऐसा क्या विरोध है? अगर युद्ध और परमात्मा के स्मरण में विरोध नहीं, तो घर और संन्यास में क्या विरोध हो सकता है? उनसे मैंने कहा कि संन्यास भी लो और घर में भी रहो। उन्होंने कहा, आप कैसी उलटी बातें कहते हैं!

अर्जुन के मन में भी ऐसा ही हुआ होगा कि कैसी उलटी बातें कहते हैं! अगर संन्यास लेना है, घर छोड़ दो। यह समझ में आता है। घर में रहना है, संन्यास की बात छोड़ दो। यह भी समझ में आता है। यह गणित बहुत साफ है।

लेकिन साफ गणित अक्सर ही जिंदगी के गणित नहीं होते। जिंदगी बहुत बेबूझ है। और जिंदगी के मामले में जो बहुत सफाई करने की कोशिश करता है, उसके हाथ में मुर्दा चीजें हाथ लगती हैं, जिंदगी हाथ नहीं लगती। काटते ही चीजें मर जाती हैं, बांटते ही चीजें मर जाती हैं। अगर संश्लिष्ट, सिंथेटिक जीवन को समझना हो, तो जीवन बड़ा बेबूझ है। वहां युद्ध करते हुए अगर कोई ध्यान कर सके, तो ही जीवन की गहन धारा में प्रवेश करता है।

जीवन में चुनाव नहीं है। ध्यान के साथ युद्ध हो सकता है। स्मरण के साथ युद्ध हो सकता है। और सच तो यह है, जब स्मरण के साथ युद्ध होता है, तो युद्ध युद्ध नहीं रह जाता है। वही कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। तू स्मरण कर और युद्ध कर, क्योंकि स्मरण के साथ ही युद्ध युद्ध नहीं रह जाता। और अगर तू युद्ध से भी भाग गया और स्मरण की कला न जानी, तो तेरा संन्यास भी संन्यास नहीं हो सकेगा।

अगर स्मरण की कला ज्ञात हो, तो कसाई का काम करने वाला भी मंदिर के पुजारी से बहुत पहले प्रभु के मंदिर में प्रवेश कर जा सकता है। और अगर स्मरण की कला ज्ञात न हो, तो जीवनभर मंदिर के पूजागृह में बैठकर भी, सिर पटकने पर भी कोई परिणाम नहीं होता है।

सवाल है स्मरण की कला का, दि आर्ट आफ रिमेंबरिंग। उसे हम कैसे याद करें? और उसकी याद करते-करते ही हम बदल जाते हैं। सच तो यह है, एक बार भी कोई हृदयपूर्वक प्रभु का स्मरण करे, तो फिर वही आदमी नहीं रह जाता, जिसने स्मरण किया था। यह हो नहीं सकता। अगर स्मरण किया गया है, तो स्मरण इतनी बड़ी घटना है कि उस व्यक्ति का आमूल जीवन बदल जाता है। हां, स्मरण नहीं किया गया है, तब बात और है।

युद्ध करते हुए प्रभु का स्मरण कर। इस प्रकार मेरे में अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त हुआ निस्संदेह मेरे को ही प्राप्त होगा।

और तू भय मत कर। और तू डर मत। युद्ध से भाग मत। मन-बुद्धि से युक्त होकर मेरा स्मरण कर, तो तू निश्चय ही मुझे प्राप्त होगा। मन-बुद्धि से युक्त हुआ, इस बात को ठीक से समझ लेना चाहिए।

निरंतर ऐसा होता है। हृदय कुछ कहता है, बुद्धि कुछ कहती है, और दोनों में कभी योग नहीं हो पाता। दोनों में कभी योग नहीं हो पाता। बुद्धि कहती है, यह ठीक है; हृदय कहता है, कुछ और ठीक है। और निरंतर भीतर एक कलह, एक कांफ्लिक्ट निरंतर चलती रहती है।

हृदय कहता है, डूब जाओ भजन में। बुद्धि कहती है, पागल हुए हो? हृदय कहता है, कब तक रुके रहोगे पदार्थों के साथ; खोजो प्रभु को! बुद्धि कहती है, अभी समय बहुत है; अभी समय कहां हुआ; अभी तो जीवन बहुत पड़ा है। पहले थोड़ा संसार का तो और अनुभव ले लो। और परमात्मा को तो फिर कभी भी पाया जा सकता है। वह प्रतीक्षा करता ही रहेगा। वह कोई चुक जाने वाला नहीं है। और इस जन्म में नहीं, तो अगले जन्म में हो जाएगा। लेकिन यह संसार का तो भोग ठीक से कर ही लो।

बुद्धि और हृदय के बीच दरार है। और कोई व्यक्ति अगर इस दरार के साथ स्मरण करेगा, तो वह स्मरण पूरा नहीं हो पाएगा।

कुछ लोग बुद्धि से ही स्मरण करते हैं। जो लोग बुद्धि से स्मरण करते हैं, उनका स्मरण एक तरह का इनवेस्टमेंट होता है। वे सोचते हैं कि अगर प्रभु को स्मरण न किया, तो कहीं नर्क न जाना पड़े। वे सोचते हैं कि अगर प्रभु को स्मरण किया, तो स्वर्ग मिल जाएगा। वे सोचते हैं कि प्रभु को स्मरण किया, तो जीवन में सफलता मिलेगी; दुख कम आएगा, सुख ज्यादा होगा। वे सोचते हैं, अगर कुछ भी न हुआ, तो भी स्मरण करने में हर्ज क्या है! अगर कहीं कोई ईश्वर है और स्मरण न किया, तो नुकसान हो सकता है। अगर नहीं है, और स्मरण कर भी लिया, तो हर्ज क्या है! कोई नुकसान तो नहीं है। ऐसा जो लोग सोचते हैं हिसाब-किताब की भाषा में, इनके हृदय में, इनके मन की गहराइयों में कहीं भी प्रभु के लिए कोई प्यास नहीं है। यह बौद्धिक व्यापार है।

लेकिन हम सभी को प्रभु के संबंध में इसी तरह का बौद्धिक व्यापार सिखाया जाता है। बचपन से कहा जाता है, प्रभु का स्मरण करो, तो परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाओगे। हमने हिसाब की बातें सिखानी शुरू कर दीं।

हमें पता नहीं है कि हम आदमी को किस भांति अधार्मिक बनाते हैं। अगर यह बच्चा, जिससे हमने कहा कि प्रभु का स्मरण करो, परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाओगे, अगर उत्तीर्ण हो गया, तो समझेगा कि स्मरण करने में लाभ है। तो भी यह आदमी अधार्मिक हो गया, क्योंकि लाभ के लिए जो स्मरण करता है, वह धार्मिक नहीं है।

लाभ के लिए स्मरण करने में धर्म क्या है? लाभ ही लक्ष्य है; स्मरण तो केवल साधन है। तो हमने प्रभु से भी थोड़ी नौकरी-चाकरी ले ली! बस, इतनी ही उस पर कृपा की। थोड़ी सेवा उससे भी ले ली। या ज्यादा कहें तो ऐसा कि थोड़ी खुशामद की कि तेरा नाम लेने से तू प्रसन्न होता है, तो चलो ठीक है। तेरा नाम लेने से तू प्रसन्न हो ले, और हमें जो पाना है, वह देकर हमें प्रसन्न कर दे। तो एक समझौता है, एक सौदा है।

अगर उस बच्चे को सफलता मिल गई, तो भी वह अधार्मिक हो जाएगा। क्योंकि लाभ-केंद्रित हो जाएगा, प्राफिट-ओरिएंटेड हो जाएगा। और अगर असफल हो गया, तो वह सदा के लिए समझ लेगा कि प्रभु वगैरह कुछ भी नहीं है, उसके नाम लेने से कुछ भी नहीं होता।

मुल्ला नसरुद्दीन के मकान में आग लगी है। और वह अपने मकान के बाहर एक वृक्ष के नीचे आराम से टिका हुआ बैठा है। आधी रात का सन्नाटा है। रास्ते पर कोई नहीं है। पड़ोसी सब सोए हुए हैं। एक अजनबी आदमी राह भटक गया है। उसने गांव में आग लगी देखी, तो भागा हुआ सड़क से आया। दरवाजे के भीतर घुसा। मुल्ला को बैठे देखा दरख्त के नीचे। उसने कहा, क्या कर रहे हो? पागल हो गए हो? मकान में आग लगी है! मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि मैं प्रार्थना कर रहा हूं। और देखना है आज कि परमात्मा है या नहीं। मैं प्रार्थना कर रहा हूं कि वर्षा हो जाए, और देखना है आज कि परमात्मा है या नहीं!

हर आदमी इसी तरह देख रहा है। छोटे-मोटे दांव लगाकर कहता है कि अच्छा, इसको करके दिखा दो!

दिदरो पश्चिम का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ। वह अक्सर सभाओं में खड़े होकर अपनी जेब से घड़ी निकाल लेता था और कहता था, इस वक्त घड़ी में नौ बजे हैं। अगर कहीं कोई परमात्मा हो, आठ बजाकर बता दे, तो मैं मान लूं! घड़ी में नौ बजकर एक मिनट बज जाता, नौ बजकर दो मिनट बज जाते। तो फिर वह कहता, देख लो। मिल गया काफी प्रमाण कि परमात्मा नहीं है।

यदि कोई असफल होता है, तो प्रमाण मिल जाता है कि परमात्मा नहीं है। और अगर सफल होता है, तो प्रमाण मिल जाता है कि परमात्मा को भी खुशामद से फुसलाया जा सकता है; वह भी स्तुति से प्रसन्न होता है। और लाभ अगर चाहिए हो, तो उसका भी उपयोग किया जा सकता है।

प्रेम उपयोग करना नहीं जानता। प्रार्थना भी उपयोग के लिए नहीं हो सकती। और जहां उपयोग है, वहां कोई संबंध नहीं है, वहां कोई हार्दिक संबंध नहीं है।

तो बुद्धि तो या तो नास्तिक बना देती है या नास्तिक से भी बदतर आस्तिक बना देती है। नास्तिक भी ठीक है फिर भी; कहता है, नहीं है। आस्तिक से बेहतर है। आस्तिक, तथाकथित आस्तिक, तो परमात्मा का इस बुरी तरह अपमान किए चला जाता है, जिसका कोई हिसाब लगाना मुश्किल है। क्योंकि लाभ! बीमारी है, तो ठीक हो जाए; और नौकरी नहीं मिलती है, तो नौकरी मिल जाए–तो परमात्मा है, इसका प्रमाण मिलता है। नहीं तो सब प्रमाण खो जाते हैं।

नहीं, बुद्धि काफी नहीं है। लेकिन हमारा सारा शिक्षण बुद्धि का है। और बुद्धि के नीचे छिपा हुआ जो गहन मन है, जो भाव जगत है, वह जो अंतस्तल है हृदय का, वह बिलकुल अछूता रह जाता है। कभी-कभी उस अछूते हृदय से भी आवाज आती है। लेकिन बुद्धि उसे दबाती रहती है।

आज ही एक मित्र मेरे सामने ही खड़े थे। कई बार मैंने अनुभव किया कि उनके भीतर तरंग आती है कि वे डूब जाएं कीर्तन में, लेकिन फिर आंख खोलकर अपने को सम्हालकर रोक लेते हैं।

यह कौन रोक रहा है भीतर? यह बुद्धि रोक रही है; वह कहती है कि आप सुशिक्षित हैं, सज्जन हैं। ऐसा नाचकर ग्रामीण जैसा काम कैसे करेंगे? विश्वविद्यालय से उपाधि-प्राप्त हैं। कोई देख लेगा, क्या सोचेगा? पागल हो गए हैं? हृदय में झनक आती है। घूंघर बजते हैं भीतर कहीं। उनके पैर कंपते हैं। फिर वे आंख खोलकर अपने को सम्हालकर खड़े हो जाते हैं! प्रतिपल आप अनुभव करेंगे, हृदय अंकुर भेजना चाहता है, लेकिन बुद्धि उसे तत्काल दबा देती है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, मन-बुद्धि से युक्त हुआ।

मन भी कहे हां और बुद्धि भी कहे हां, तो ही दोनों के बीच तालमेल निर्मित हो जाता है। दोनों के बीच सेतु बन जाता है। और उस सेतु के बंधे हुए क्षण में ही व्यक्ति पूरा का पूरा प्रभु को स्मरण कर पाता है।

कैसे यह होगा? अगर बुद्धि की ही सुनते रहे, तो यह कभी न होगा। क्योंकि बुद्धि बहुत ऊपरी बात है।

अगर कोई सागर अपनी लहरों की ही मानता चला जाए, तो उसके अंतरगर्भ में छिपे हुए मोतियों के ढेर का उसे कभी भी पता न चल सकेगा। क्योंकि लहरों को मोतियों की कोई भी खबर नहीं है। और लहरों से अगर पूछेगा कि क्या भीतर मोती हैं? तो लहरें कहेंगी, पागल हो। भीतर कुछ भी नहीं है। क्योंकि लहरें! लहरें सदा ऊपर हैं। उन्हें भीतर का कुछ भी पता नहीं है। लहरें कहेंगी, मोती! नासमझ हो। कभी-कभी सूखे पत्ते बहते हुए जरूर आ जाते हैं। कचरा-कबाड़ जरूर कभी-कभी लहरों पर आ जाता है। उन्हीं को लहरों ने जाना है; मोतियों की गहराइयों का उन्हें कुछ भी पता नहीं। अगर सागर लहरों की माने, तो अपनी ही संपदा से वंचित हो जाता है।

हम भी अपनी बुद्धि की लहरों की–बुद्धि बहुत ऊपरी सतह है। बुद्धि हमारी वह सतह है मन की, जिससे हम जगत के साथ संबंध स्थापित करते हैं। बुद्धि ठीक वैसी है, जैसे किसी राजमहल के द्वार पर कोई पहरेदार बैठा हो। वह पहरेदार बाहर के जगत और राजमहल के बीच में है।

लेकिन अगर हम, घर का मालिक भी, सम्राट भी पहरेदार से ही पूछने लगे कि इस महल के भीतर कुछ है? तो पहरेदार कहेगा, वहां क्या रखा है! जो कुछ है, यहां मेरे इस स्टूल पर बैठे रहने में है। यहीं; सारा जगत यहीं है। और मेरे पास आए बिना कभी कोई भीतर नहीं गया। इसलिए भीतर अगर कभी कुछ जाएगा भी, तो मेरे पास से गुजरकर ही जाएगा। अब तक तो मैंने कोई खजाना भीतर जाते नहीं देखा। कोई खजाना-वजाना भीतर नहीं है।

बुद्धि सिर्फ पहरा है, बाहर के जगत से हमारा संबंध है सुरक्षा का, सिक्योरिटी मेजर है। लेकिन जब हम उसी से पूछने लगते हैं अंतरतम की बातें, तो हमारी नासमझी है। हम जिससे पूछ रहे हैं, उसे पता ही नहीं है। लेकिन जिसे कुछ भी पता नहीं है, वह भी जवाब तो देने में कुशल होता ही है।

अक्सर तो ऐसा होता है, जिन्हें कुछ भी पता नहीं होता, वे जवाब देने के लिए बड़े आतुर होते हैं। कभी-कभी जिन्हें पता होता है, वे जवाब देने से रुक भी जाते हैं; लेकिन जिनको पता नहीं होता, वे बहुत जल्दी जवाब दे देते हैं। शायद इसीलिए कि कहीं झिझकें, तो पता न चल जाए कि पता नहीं है। जल्दी जवाब दे देते हैं।

बुद्धि बड़े जल्दी जवाब दे देती है। अगर आप बुद्धि से ही पूछते चले गए, तो परमात्मा की कोई सन्निधि, कोई सुगंध, कोई संगीत, कभी नहीं मिल सकेगा। जरा बुद्धि को हटाएं और भीतर के हृदय से पूछें। हां, बुद्धि का उपयोग करें। हृदय की आवाज हो; बुद्धि का उपयोग हो। हृदय से पूछें कि क्या करना है; और फिर बुद्धि से पूछें कि कैसे करना है। तब, तब बुद्धि और हृदय में एक सुसंगति बन जाती है।

इसे ठीक से समझ लें।

हृदय से पूछें लक्ष्य, बुद्धि से पूछें साधन। हृदय से पूछें अंतिम सिद्धि, बुद्धि से पूछें पहुंचने का मार्ग। हमेशा हृदय से पूछें कि क्या चाहिए और बुद्धि से पूछें कि यह चाहिए, अब इसे पाने के लिए क्या करना है। बुद्धि मैथडॉलाजी दे सकती है, विधि दे सकती है, मार्ग दे सकती है। लेकिन बुद्धि कभी लक्ष्य नहीं देती। और हम सब बुद्धि से लक्ष्य पूछकर भटक जाते हैं।

इसे ऐसा समझें तो बहुत आसान हो जाएगा। बुद्धि का जो चरम विकास है, वह विज्ञान में हुआ है। हृदय का जो चरम विकास है, वह धर्म में हुआ है।

अगर विज्ञान से पूछें कि हम किसलिए जीते हैं, तो विज्ञान कहेगा, हमें पता नहीं। अगर विज्ञान से पूछें कि हम किस तरह जीएं कि ज्यादा जी सकें, स्वस्थ जी सकें, तो विज्ञान रास्ता बता देगा। अगर विज्ञान से आपने पूछा कि जीवन का लक्ष्य क्या है, तो विज्ञान कहेगा, हमें कुछ पता नहीं है।

आइंस्टीन मरते वक्त पीड़ित था कि मैंने भी अणुबम के बनने में सहायता दी है। लेकिन मुझे यह पता ही नहीं था कि तुम क्या उपयोग करोगे। हम तो केवल इतना ही बता सकते थे कि अणुबम कैसे बन सकता है। तुम क्या करोगे, यह हमने सोचा भी नहीं था!

विज्ञान बता नहीं सकता कि क्या करो। धर्म ही बता सकता है कि क्या करो। विज्ञान बता सकता है कि कैसे करो, दि हाउ, कैसे! लेकिन किसलिए, फार व्हाट! विज्ञान के पास इसका कोई उत्तर नहीं है। बुद्धि के पास भी कोई उत्तर नहीं है।

हृदय से पूछें, क्या पाना है। और फिर बुद्धि को आज्ञा दे दें कि यह पाना है। खोजो मार्ग, खोजो विधि, खोजो व्यवस्था। और तब बुद्धि और हृदय संयुक्त हो जाते हैं। बुद्धि और हृदय का संयोग जहां है, वहीं योग फलित होता है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, मेरे में अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त हुआ निस्संदेह तू मुझे उपलब्ध होता है।

मेरे में अर्पण किए हुए! मजे की बात है। हृदय सदा ही अर्पण करना चाहता है। और बुद्धि सदा अर्पण करवाना चाहती है। बुद्धि कहती है, करो समर्पण। बुद्धि सदा दूसरे से समर्पण करवाना चाहती है। बुद्धि समर्पण करना जानती ही नहीं। बुद्धि अहंकार है। और हृदय! हृदय आक्रमण करना जानता ही नहीं। हृदय समर्पण है; हृदय अपूर्व विनम्रता है।

अगर कोई बुद्धि से ही खोजता रहा, तो परमात्मा के संबंध में सिर्फ तर्क कर-करके समाप्त हो जाएगा। उसे कोई भी उत्तर मिलने वाला नहीं है। अगर परमात्मा स्वयं भी सामने खड़ा हो और बुद्धि से अगर आपने पूछा कि तुम कौन हो? तो परमात्मा चुप रह जाएगा। इसलिए नहीं कि आपका प्रश्न गलत था; सिर्फ इसलिए कि बुद्धि से पूछा गया था। बुद्धि से पूछे गए इस तरह के प्रश्नों के उत्तर देने का कोई भी अर्थ नहीं है।

हृदय से पूछो, तो परमात्मा को उत्तर देना भी नहीं पड़ता, वह हृदय के ऊपर सब भांति छा जाता है, जैसे कोई बादल किसी पहाड़ को घेरकर छा ले, जैसे किसी फूल के आस-पास सब तरफ से सूरज की किरणें उसे घेर लें और छा लें। हृदय से पूछें, तो परमात्मा मौजूद भी न हो सामने, तो भी चारों तरफ से वह हृदय को घेर लेता है और हृदय की कली खिल जाती है, जैसे सुबह फूल खिल जाता है और सब तरफ से सूरज की रोशनी उसे घेर लेती है। लेकिन हृदय का सूत्र है, अर्पण।

तो कृष्ण कहते हैं, मेरे को अर्पण हुआ, मन-बुद्धि से युक्त, निस्संदेह–फिर कोई संदेह नहीं–मुझको ही उपलब्ध हो जाता है।

समर्पण ही उपलब्धि है, समर्पण ही पहुंच जाना है। जिसने रोका समर्पण से अपने को, वह वंचित रह जाएगा। जिसने छोड़ा अपने को, साहस किया, वह पहुंच जाता है।

हम सब बहुत डरे-डरे होते हैं। हम कभी भी अपने को छोड़ते नहीं। हमें जीवन में ऐसा एक भी स्मरण नहीं आता, जब हम अपने को कभी छोड़ते हैं। जिसे हम प्रेम कहते हैं, उसमें भी अपने को छोड़ते नहीं। कुछ न कुछ सदा ही पीछे बचा लिया जाता है। वही बचा हुआ, कभी भी प्रेम के अनुभव तक भी हमें नहीं पहुंचने देता।

अगर मैं किसी को प्रेम भी करता हूं, तो अपने को रोककर, बहुत-सा हिस्सा पीछे छोड़ देता हूं, जरा-सा हिस्सा बाहर भेजता हूं फीलर्स की तरह, कि जरा देख तो लें कि कहां तक मामला है। जब सुरक्षित हो जाएंगे पूरे, तब थोड़ा और हृदय का हिस्सा देंगे। अगर जरा ही डर लगा, तो जैसे कछुआ सिकुड़ जाता है अपने भीतर, हम भी सिकुड़ जाएंगे।

प्रेम में भी हम अपने को बचा लेते हैं। और प्रार्थना में तो हम और भी बचा लेते हैं। क्योंकि प्रेम करने में तो सामने कोई दिखाई पड़ता है, प्रार्थना में तो वह भी नहीं दिखाई पड़ता है। तो प्रेम में कभी-कभी थोड़ी सचाई की झलक भी आ जाती है, प्रार्थना तो बिलकुल ही झूठी हो जाती है। घुटने टेकते हैं। हाथ जोड़ते हैं। नमाज पढ़ते हैं। सिर झुकाते हैं। और सब करीब-करीब एक्सरसाइज होकर रह जाता है, व्यायाम होकर रह जाता है।

क्यों ऐसा होता है? क्योंकि हमें पता ही नहीं कि हम हृदयपूर्वक कैसे करें। अर्पण का भाव ही हमें पता नहीं है। अर्पण के भाव को भी सीखना पड़ता है।

कुछ न करें, रोज सुबह जब उठें, तो कुछ भी न करें, खाली जमीन पर लेट जाएं चारों हाथ-पैर फैलाकर। छाती को लगा लें जमीन से। अगर नग्न लेट सकें, तो और भी प्रीतिकर है। जैसे कि पृथ्वी मां है और उसकी छाती पर पूरे लेट गए चारों हाथ-पैर छोड़कर। सिर रख दें जमीन में और थोड़ी देर को अनुभव करें कि अपने को सब का सब पृथ्वी में समा दिया, छोड़ दिया। मिट्टी है दोनों तरफ, इसलिए बहुत जल्दी संबंध बन जाता है; देर नहीं लगती। यह शरीर भी उसी पृथ्वी का टुकड़ा है। बहुत जल्दी इस शरीर के कणों में और पृथ्वी के कणों में तालमेल शुरू हो जाता है, संगीत प्रतिध्वनित होने लगता है। और थोड़ी ही देर में आप अनुभव करेंगे कि आप पृथ्वी हो गए। और इतने आह्लाद का अनुभव होगा, ऐसी अपूर्व प्रसन्नता का अनुभव होगा, जैसा कभी भी नहीं हुआ।

कभी सूरज की किरणों में ही लेट जाएं नग्न और सूरज की किरणों को छू लेने दें पूरे शरीर को। आंख बंद कर लें और किरणों में अपने को समर्पित कर दें। क्योंकि सूरज की किरण के बिना इस शरीर के भीतर जीवन नहीं है। इसलिए शरीर के भीतर जो भी ऊर्जा है, जीवन है, वह सूरज की किरण से जुड़ा है।

जैसे ही समर्पण का भाव होगा कि हो गए एक, ले चल सूरज मुझे अपनी किरणों पर दूर की यात्रा पर; मैं राजी हूं, मैं छोड़ता हूं अपने को। जहां तू मार्ग दिखाएगा, वहीं चल पडूंगा! थोड़ी ही देर में पाएंगे कि किरणें अब सिर्फ चमड़ी को नहीं छूतीं, कहीं भीतर हृदय को गुदगुदाना उन्होंने शुरू कर दिया है। कहीं कोई हृदय की पंखुड़ी पर भी उनकी चोट पड़ने लगी, और कहीं कोई प्राणों का पक्षी भी पंख खोलकर उड़ जाने को आतुर हो गया है।

कहीं भी सीखें, किसी तरह भी सीखें। कहीं भी सीखें, किसी तरह भी सीखें। पत्नी को भी प्रेम देते हों, तो पूरा दे दें। मां की गोद में सिर रखते हों, तो पूरा रख दें। मित्र का हाथ भी लेते हों, तो फिर पूरा ही हाथ हाथ में ले लें। किसी को गले भेंटते हों, तो सिर्फ हड्डियां ही न छुएं; छोड़ दें अपने को। एक क्षण को ले जाने दें। तो धीरे-धीरे अर्पण का भाव खयाल में आएगा।

और उस अर्पण के भाव को ही जब सर्व विराट परमात्मा के प्रति कोई लगा देता है, क्योंकि बाकी सब अनुभव में कोई न कोई मौजूद है। परमात्मा गैर-मौजूदगी है। इसलिए मौजूदगी से अनुभव लें और जब अनुभव गहरा हो जाए, तो फिर गैर-मौजूदगी की तरफ, अनुपस्थित की तरफ, जो नहीं दिखाई पड़ता, उसकी तरफ समर्पण कर दें।

वह समर्पण इसीलिए कठिन है। कोई मौजूद हो, तो समर्पण आसान मालूम पड़ता है। कोई मौजूद ही नहीं, तो समर्पण किसके प्रति? लोग पूछते हैं, किसके प्रति समर्पण?

लेकिन आदमी की चालाकी का कोई अंत नहीं है। एक बहुत अजीब अनुभव मुझे हुआ। वह यह हुआ कि अगर किसी को बताओ कि इसके प्रति समर्पण करो, तो वह कहता है, इसके प्रति समर्पण? इसमें तो इतनी खामियां हैं! और कहो कि इसके प्रति समर्पण करो, तो अहंकार को चोट लगती है कि मैं और इसके प्रति समर्पण करूं? यह भी तो मेरे जैसा आदमी है; हड्डी-मांस का बना है। भूख इसे लगती है, तो क्रोध भी जरूर लगता ही होगा। नींद इसे आती है, तो कामवासना भी सताती ही होगी। कहीं न कहीं छिपाए होगा सब। और मैं इसके प्रति! मैं भी तो ऐसा ही आदमी हूं!

अगर बताओ किसी को कि इसके प्रति करो–बुद्ध सामने खड़े हों, तो भी वही कठिनाई आ जाती है। कृष्ण सामने खड़े हों, तो भी वही कठिनाई आ जाती है। और अगर कोई सामने न हो, तो आदमी का चालाक मन कहता है, किसके प्रति समर्पण करूं? कोई दिखाई तो पड़ता नहीं!

आदमी की इस बेईमानी से बचाने के लिए, जो बहुत बुद्धिमान लोग थे, उन्होंने परमात्मा की मूर्तियां बनाईं। मूर्ति बीच की व्यवस्था थी। न तो व्यक्ति है वहां–बुद्ध और कृष्ण और महावीर और मोहम्मद नहीं हैं वहां–मूर्ति पत्थर है, तो आप यह भी न कह सकेंगे कि इस पत्थर को कहीं क्रोध तो नहीं आता! और कुछ मौजूद भी है, तो आप यह भी न कह सकेंगे कि जो मौजूद नहीं है, उसके प्रति समर्पण कैसे करूं!

लेकिन आदमी की चालाकी का कोई अंत नहीं है। उसने कहा, इस पत्थर को! पत्थर के प्रति समर्पण करवा रहे हैं! इस पत्थर में रखा ही क्या है। अभी चाहूं, तो दो टुकड़े करके इसके बता सकता हूं। जो अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता, वह क्या खाक मेरी रक्षा करेगा!

दयानंद की सारी क्रांति इसी नासमझी से पैदा हुई। इसी नासमझी से, कि परमात्मा की मूर्ति को एक चूहा परेशान करता रहा। तो दयानंद ने कहा कि चूहे से अपनी रक्षा नहीं कर पाते, तो मेरी क्या रक्षा करोगे और जगत की क्या रक्षा करोगे! सब बेकार है। चूहे की इस प्रतीति पर सारा आर्यसमाज खड़ा हुआ है! सारी दृष्टि इतनी छोटी-सी है। लेकिन मूर्ति के विरोधी हो गए दयानंद, क्योंकि मूर्ति अपनी रक्षा न कर पाई।

और पता नहीं, यह आदमी कैसा है! कुछ भी उसे कहो, वह तरकीब निकालेगा