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2-SHORT QUESTIONS OF SADHANA


क्या आत्मक्रांति का प्रथम सूत्र अबैर हैं?

'उसने मुझे डांटा, उसने मुझे मारा, मुझे जीत लिया, मेरा लूट लिया-जो ऐसी गांठें मन में नहीं बनाए रखते हैं, उनका बैर शात हो जाता है।’

और बैर नर्क है। कहीं और कोई नर्क नहीं; शत्रुता में जीना नर्क है। तुम जितनी शत्रुता अपने चारों तरफ बनाते हो, उतना तुम्हारा नर्क बड़ा हो जाता है। तुम जितनी मित्रता अपने चारों तरफ बनाते हो, उतना स्वर्ग खड़ा हो जाता है। स्वर्ग मित्रों के बीच जीने का नाम है। नर्क शत्रुओं के बीच जीने का नाम है। और सब तुम पर निर्भर है। नर्क कोई भौगोलिक जगह नहीं है, और न स्वर्ग कोई भौगोलिक जगह है। नक्शो में मत पड़ना। मनोदशाएं हैं। स्टेट्स आफ माइंड।

जब तुम सारे जगत को मित्र की तरह देखते हो-ऐसा नहीं कि सारा जगत मित्र हो जाएगा, इस भूल में मत पड़ना--लेकिन तुम जब सारे जगत को मित्र की भांति देखते हो, तुम्हारे लिए जगत मित्र हो गया, तुम्हारे शत्रु समाप्त हो गए। और अगर कोई तुम्हारी शत्रुता करेगा, तो वह शत्रुता उसके मन में होगी, वह उसकी पीड़ा पाएगा। लेकिन तुम्हें कोई पीड़ा नहीं दे सकता।

क्या हैं दुख का कारण?- 'मन सभी प्रवृत्तियों का पुरोगामी है, मन उनका प्रधान है; वे मनोमय हैं। यदि कोई दोषयुक्त मन से बोलता है या कर्म करता है, तो दुख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी का चक्का खींचने वाले बैलों के पैर का।’

बुद्ध ने एक सूत्र पाया : जीवन में दुख. है। हम भी जीवन में दुखी हैं। और जब हमें दुख पकड़ता है तो हम पूछते हैं, किसने दुख पैदा किया? कौन मेरा दुख पैदा कर रहा है-पत्नी, पति, बेटा, बाप, मित्र, समाज? कौन मेरा दुख पैदा कर रहा है-आर्थिक-व्यवस्था, सामाजिक-ढांचा? कौन मेरा दुख पैदा कर रहा है?

मार्क्स से पूछो तो वह कहता है, दुख पैदा हो रहा है क्योंकि समाज का आर्थिक ढांचा गलत है। गरीबी है, अमीरी है, इसलिए दुख पैदा हो रहा है।

फ्रायड से पूछो तो वह कहता है, दुख इसलिए पैदा हो रहा है कि मनुष्य को अगर उसकी वृत्तियों के प्रति पूरा खुला छोड़ दिया जाए, तो वह जंगली जानवर जैसा हो जाता है। दुख पैदा होगा उससे। सभ्यता नष्ट हो जाएगी। अगर उसे समझाया- बुझाया जाए, तैयार किया जाए, परिष्कृत किया जाए, तो दमन हो जाता है। दमन होने से दुख पैदा होता है।

इसलिए फ्रायड ने कहा, दुख कभी भी न मिटेगा। अगर आदमी को बिलकुल खुला छोड़ दो, तो मार-काट हो जाएगी; क्योंकि आदमी के भीतर हजार तरह की जानवरी वृत्तियां हैं। अगर दबाओं, ढंग का बनाओ, सज्जन बनाओ, तो दमन हो जाता है। दमन होता है, तो दुख होता रहता है, वृत्तियां पूरी नहीं हो पातीं। पूरी करो तो मुसीबत, न पूरी करो तो मुसीबत।

तो फ्रायड ने तो अंत में कहा कि आदमी जैसा है, कभी सुखी हो ही नहीं सकता। सुख असंभव है।

फ्रायड और मार्क्स, इनका विश्लेषण ही अगर अकेला विश्लेषण होता तो पक्का है कि आदमी कभी सुखी नहीं हो सकता। क्योंकि रूस में गरीब-अमीर मिट गए लेकिन दुख नहीं मिटा। गरीब-अमीर मिट गए, तो दूसरे वर्ग खड़े हो गए। कोई पद पर है, कोई पद पर नहीं है। कोई कम्युनिस्ट पार्टी में है, कोई कम्युनिस्ट पार्टी में नहीं है। जो पद पर है, वह इतना शक्तिशाली हो गया है जितना धनी पुराने दिनों में कभी भी न था। और जो पद पर नहीं है, वह इतना निर्बल हो गया है जितना भूखा, भिखमंगा, गरीब कभी नहीं था। धनी के हाथ में इतनी ताकत कभी नहीं थी जितनी रूस में पदाधिकारी के हाथ में है। संघर्ष वहीं का वहीं खड़ा है। भेद वहीं का वहीं खड़ा है। वर्ग नए बन गए, पुराने मिटे तो। कुछ ऐसा लगता है, आदमी बीमारी बदलता जाता है। क्रांतियों के नाम से केवल बीमारी बदलती है, कुछ भी बदलता नहीं। ऊपर के ढंग बदलते हैं, भीतर का रोग जारी रहता है।

सब क्रांतियां व्यर्थ हो गयी हैं; सिर्फ बुद्ध की एक क्रांति अभी भी सार्थकता रखती है। बुद्ध कहते हैं, तुम्हारे मन में ही कारण है। बाहर खोजने गए, पहला कदम ही गलत पड़ गया। अब तुम ठीक कभी न हो पाओगे। तुम्हारे मन में ही दुख का कारण है। जब भी तुम किसी को दुख देना चाहते हो, तुम दुख पाओगे। जब भी तुम दुख देने की आकांक्षा से भरे किसी विचार के पीछे जाते हो, तम दुख के बीज बो रहे हो। दूसरे को दुख मिलेगा या नहीं मिलेगा, तुम्हें दुख जरूर मिलेगा। तुम अगर आज दुख पा रहे हो, तो बुद्ध कहते हैं, कल बोए बीजों का फल है। और अगर कल तुम चाहते हो दुख न पाओ, तो आज कृपा करना, आज बीज मत बोना।

'यदि कोई दोषयुक्त मन से बोलता है, सोचता है, व्यवहार करता है, या वैसे कर्म करता है, तो दुख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी जाती है तो बैलों के पीछे चाक चले आते हैं।'

तुम्हारे मन में अगर किसी को भी दुख देने का जरा सा भी भाव है, तो तुम अपने लिए बीज बो रहे हो। क्योंकि तुम्हारे मन में जो दुख देने का बीज है, वह तुम्हारे ही मन की भूमि में गिरेगा, किसी दूसरे के मन की भूमि मैं नहीं गिर सकता। बीज तो तुम्हारे भीतर है, वृक्ष भी तुम्हारे भीतर ही होगा। फल भी तुम्हीं भोगोगे।

अगर बहुत गौर से देखा जाए, तो जब तुम दूसरे को दुख देना चाहते हो, तब तुमने अपने को दुख देना शुरू कर ही दिया। तुम दुखी होने शुरू हो ही गए। तुम क्रोधित हो, किसी पर क्रोध करके उसे नष्ट करना चाहते हो; उसे तुम करोगे या नहीं, यह दूसरी बात है, लेकिन तुमने अपने को नष्ट करना शुरू करे दिया।

बुद्ध कहते थे, क्रोध से बड़ी कोई मूढ़ता नहीं है। दूसरे के कसूर के लिए तुम अपने को दंड देते हो। एक आदमी ने तुम्हें गाली दी, कसूर उसका होगा, अब क्रोधित तुम हो रहे हों-दंड तुम अपने को दे रहे हो, कसूर उसका था। इससे ज्यादा मूढ़ता और क्या हो सकती है? उसने गाली दी, उसकी समस्या है; तुम क्यों बीच में आते हो? तुम गाली मत लो। लेने पर निर्भर है। लेना आवश्यक नहीं है। आप मुझे गाली दे सकते हैं, लेकिन लेने पर थोड़े ही मजबूर कर सकते हैं। देना आपके बस में है, लेना मेरे बस में है। उस मालकियत को मुझसे कोई कभी नहीं छीन सकता। मैं कह सकता हूं कि नहीं लेता, फिर तुम क्या करोगे? तुम्हारी गाली तुम्हीं पर लौट जाएगी। तुमने गाली देने के लिए जो तैयारी में दुख भोगा, वह भोगा, अब गाली लौटेगी तब तुम जो दुख भोगोगे, वह भोगोगे। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; संवृत्ति मार्ग की कौन-सी पांच मूल बातें हैं?

1. ध्यान में जियो यानी बंद आंख में जो निराकार दिखता है, उसके प्रति जागो। 2. समाधि में जियो यानी अंतर-आकाश के प्रति जागो। अंतर-आकाश का अर्थ है, गहराई के साथ निराकार को देखना। 3. साक्षी में जियो यानी आत्मस्मरण में जियो और कर्म करो। 4. सुमिरन में जियो यानी परमात्मा को जानो और उसके प्रेम में जियो, भक्त बनकर जियो। 5. अभी और यहीं में जियो यानी आती सांस परमात्मा की याद में और जाती सांस आत्मा की याद में चले। सनातन परंपरा में अध्यात्म के दो मार्ग हैं- एक है निवृत्ति मार्ग यानी ज्ञानमार्ग, ऑल एक्सक्लूजिव। यह बड़ा शुष्क मार्ग है। दूसरा है- प्रवृत्ति मार्ग यानी भक्ति मार्ग, ऑल इन्क्लूजिव। तीसरे मार्ग यानी संवृत्ति मार्ग में इन दोनों का समावेश है। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

*बहिर्मुखी व्यक्ति और अंतर्मुखी व्यक्ति*

एकांत दो प्रकार का हो सकता है, क्योंकि मनुष्य-जाति दो भागों में बंटी है। एक, जिसको कार्ल गुस्ताव जुंग ने बहिर्मुखी व्यक्ति कहा है, ऐक्स्ट्रोवर्ट और एक, जिसको अंतर्मुखी व्यक्ति कहा है, इंट्रोवर्ट।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक, जिनके लिए आंख खोलकर देखना सहज है; जो अगर परमात्मा के सौंदर्य को देखना चाहेंगे तो इन वृक्षों की हरियाली में दिखाई पड़ेगा, चांदत्तारों में दिखाई पड़ेगा, आकाश में मंडराते शुभ्र बादलों में दिखाई पड़ेगा, सूरज की किरणों में, सागर की लहरों में, हिमालय के उत्तुंग हिमाच्छादित शिखरों में, मनुष्यों की आंखों में, बच्चों की किलकिलाहट में।

बहिर्मुखी का अर्थ है, उसका परमात्मा खुली आंख से दिखेगा। अंतर्मुखी का अर्थ है, उसका परमात्मा बंद आंख से दिखेगा, अपने भीतर। वहां भी रोशनी है। वहां भी कुछ कम चांदत्तारे नहीं हैं। कबीर ने कहा है हजार-हजार सूरज। भीतर भी हैं! इतने ही चांदत्तारे, जितने बाहर हैं। इतनी ही हरियाली, जितनी बाहर है। इतना ही विराट भीतर भी मौजूद है, जितना बाहर है।

बाहर और भीतर संतुलित हैं, समान अनुपात में हैं। भूलकर यह मत सोचना कि तुम्हारी छोटी-सी देह, इसमें इतना विराट कैसे समाएगा; यह विराट तो बहुत बड़ा है, बाहर विराट है, भीतर तो छोटा होगा! भूलकर ऐसा मत सोचना। तुमने अभी भीतर जाना नहीं। भीतर भी इतना ही विराट है--भीतर, और भीतर, और भीतर! उसका भी कोई अंत नहीं है। जैसे बाहर चलते जाओ, चलते जाओ, कभी सीमा न आएगी विश्व की--ऐसे ही भीतर डूबते जाओ, डूबते जाओ, डूबते जाओ, कभी सीमा नहीं आती अपनी भी। यह जगत्‌ सभी दिशाओं में अनंत है। इसलिए हम परमात्मा को अनंत कहते हैं; असीम कहते हैं, अनादि कहते हैं । सभी दिशाओं में!

महावीर ने ठीक शब्द उपयोग किया है। महावीर ने अस्तित्व को "अनंतानंत' कहा है। अकेले महावीर ने--और सब ने अनंत कहा है। लेकिन महावीर ने कहा, अनंतता भी अनंत प्रकार की है; एक प्रकार की नहीं है; एक ही दिशा में नहीं है; एक ही आयाम में नहीं है--बहुत आयाम में अनंत है, अनंतानंत! इधर भी अनंत है, उधर भी अनंत है! नीचे की तरफ जाओ तो भी अनंत है, ऊपर की तरफ जाओ तो भी अनंत! भीतर जाओ, बाहर जाओ--जहां जाओ वहां अनंत है। यह अनंता एकांगी नहीं है, बहु रूपों में है। अनंत प्रकार से अनंत है--यह मतलब हुआ अनंतानंत का।

तो तुम्हारे भीतर भी उतना ही विराट बैठा है। अब या तो आंख खोलो--और देखो; या आंख बंद करो--और देखो! देखना तो दोनों हालत में पड़ेगा। द्रष्टा तो बनना ही पड़ेगा। चेतना तो पड़ेगा ही। चैतन्य को जगाना तो पड़ेगा। सोए-सोए काम न चलेगा।

बहुत लोग हैं जो आंख खोलकर सोए हुए हैं। और बहुत लोग हैं जो आंख बंद करके सो जाते हैं। सो जाने से काम न चलेगा; फिर तो आंख बंद है कि खुली है, बराबर है; तुम तो हो ही नहीं, देखनेवाला तो है ही नहीं--तो न बाहर देखोगे न भीतर देखोगे। यह आंख बीच में है। पलक खुल जाए तो बाहर का विराट; पलक झप जाए तो भीतर का विराट।

बहिर्मुखी का अर्थ है, जिसे परमात्मा बाहर से आएगा। अंतर्मुखी का अर्थ जिसे परमात्मा भीतर से आएगा। अंतर्मुखी ध्यानी होगा; बहिर्मुखी, भक्त। इसलिए अंतर्मुखी परमात्मा की बात ही नहीं करेगा। परमात्मा की कोई बात ही नहीं; परमात्मा तो "पर' हो गया। अंतर्मुखी तो आत्मा की बात करेगा। इसलिए महावीर ने, बुद्ध ने परमात्मा की बात नहीं की। वे परम अंतर्मुखी व्यक्ति हैं। और मीरां, चैतन्य, इन्होंने परमात्मा की बात की। ये परम बहिर्मुखी व्यक्ति हैं। अनुभव तो एक का ही है क्योंकि बाहर और भीतर जो है वह दो नहीं है; वह एक ही है। मगर तुम कहां पहुंचोगे? बाहर से पहुंचोगे या भीतर से, इससे फर्क पड़ जाता है।

इधर से कान पकड़ोगे या उधर से, इतना ही फर्क है। कान तो वही हाथ में आएगा। आता तो परमात्मा ही हाथ में है। जब भी कुछ हाथ में आता है, परमात्मा ही हाथ में आता है। और तो कुछ है ही नहीं हाथ में आने को। जिस हाथ में आता है वह हाथ भी परमात्मा है। परमात्मा ही परमात्मा के हाथ में आता है।

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जीवन वही है जो आप हैं।*

एक छोटे से गांव के बाहर एक सुबह ही सुबह एक बैलगाड़ी आकर रुकी थी। और उस बैलगाड़ी में बैठे हुए आदमी ने उस गांव के द्वार पर बैठे हुए एक बूढ़े से पूछा, इस गांव के लोग कैसे हैं? मैं इस गांव में हमेशा के लिए स्थायी निवास बनाना चाहता हूं। उस बूढ़े ने कहा: मेरे मित्र, अजनबी मित्र, इसके पहले कि मैं तुम्हें बताऊं कि इस गांव के लोग कैसे हैं, क्या मैं पूछ सकता हूं कि उस गांव के लोग कैसे थे, जिससे तुम आ रहे हो?

उस आदमी ने कहा: उनका नाम और उनका ख्याल ही मुझे क्रोध और घृणा से भर देता है। उन जैसे दुष्ट लोग इस पृथ्वी पर कहीं भी नहीं होंगे। उन शैतानों के कारण ही, उन पापियों के कारण ही तो मुझे वह गांव छोड़ना पड़ा है। मेरा हृदय जल रहा है। मैं उनके प्रति घृणा से और प्रतिशोध से भरा हुआ हूं। उनका नाम भी न लें। उस गांव की याद भी न दिलाएं।

उस बूढ़े ने कहा: फिर मैं क्षमा चाहता हूं। आप बैलगाड़ी आगे बढ़ा लें। इस गांव के लोग और भी बुरे हैं। मैं उन्हें बहुत वर्षों से जानता हूं।

वह बैलगाड़ी आगे बढ़ी भी नहीं थी कि एक घुड़सवार आकर रुक गया और उसने भी यहीपूछा उस बूढ़े से कि इस गांव में निवास करना चाहता हूं। कैसे हैं इस गांव के लोग? उस बूढ़े ने कहा: उस गांव के लोग कैसे थे जहां से तुम आते हो? उस घुड़सवार की आंखों में आनंद के आंसू आ गए। उसकी आंखें किसी दूसरे लोक में चली गईं। उसका हृदय किन्हीं की स्मृतियों से भर गया और उसने कहा, उनकी याद भी मुझे आनंद से भर देती है। कितने प्यारे लोग थे। और मैं दुखी हूं कि उन्हें छोड़ कर मुझे मजबूरियों में आना पड़ा है। लेकिन एक सपना मन में है कि कभी फिर उस गांव में वापस लौट कर बस जाऊं। वह गांव ही मेरी कब्र बने, यही मेरी कामना है। बहुत भले थे वे लोग। उनकी याद न दिलाना। उनकी याद से ही मेरा दिल टूटा जाता है। उस बूढ़े ने कहा: इधर आओ, हम तुम्हारा स्वागत करते हैं। इस गांव के लोगों को तुम उस गांव के लोगों से भी अच्छा पाओगे। मैं इस गांव के लोगों को भलीभांति जानता हूं।

काश, वह पहला बैलगाड़ी वाला आदमी भी इस बात को सुन लेता। लेकिन वह जा चुका था। लेकिन आपको मैं ये दोनों बातें बताए देता हूं। इसके पहले कि आपकी बैलगाड़ी पृथ्वी के द्वार से आगे बढ़ जाए, मैं आपको यह कह देना चाहता हूं कि इस पृथ्वी पर आप वैसे ही लोग पाएंगे जैसे आप हैं। इस पृथ्वी को आप आनंदपूर्ण पाएंगे, अगर आपके हृदय में आनंद की वीणा बजनी शुरू हो गई हो। और इस पृथ्वी को आप दुख से भरा हुआ पाएंगे, अगर आपके हृदय का दीया बुझा है और अंधकारपूर्ण है। आपके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है पृथ्वी! जीवन वही है जो आप हैं।

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कर्मयोग का आधार-सूत्र:*

अधिकार है कर्म में, फल में नहीं; करने की स्वतंत्रता है, पाने की नहीं। क्योंकि करना एक व्यक्ति से निकलता है, और फल समष्टि से निकलता है। मैं जो करता हूं, वह मुझसे बहता है; लेकिन जो होता है, उसमें समस्त का हाथ है। करने की धारा तो व्यक्ति की है, लेकिन फल का सार समष्टि का है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, करने का अधिकार है तुम्हारा, फल की आकांक्षा अनधिकृत है।

लेकिन हम उलटे चलते हैं, फल की आकांक्षा पहले और कर्म पीछे। हम बैलगाड़ी को आगे और बैलों को पीछे बांधते हैं। कृष्ण कह रहे हैं, कर्म पहले, फल पीछे आता है--लाया नहीं जाता। लाने की कोई सामर्थ्य मनुष्य की नहीं है; करने की सामर्थ्य मनुष्य की है। क्यों? ऐसा क्यों है? क्योंकि मैं अकेला नहीं हूं, विराट है।

मैं सोचता हूं, कल सुबह उठूंगा, आपसे मिलूंगा। लेकिन कल सुबह सूरज भी उगेगा? कल सुबह भी होगी? जरूरी नहीं है कि कल सुबह हो ही। मेरे हाथ में नहीं है कि कल सूरज उगे ही। एक दिन तो ऐसा जरूर आएगा कि सूरज डूबेगा और उगेगा नहीं। वह दिन कल भी हो सकता है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि अब यह सूरज चार हजार साल से ज्यादा नहीं चलेगा। इसकी उम्र चुकती है। यह भी बूढ़ा हो गया है। इसकी किरणें भी बिखर चुकी हैं। रोज बिखरती जा रही हैं न मालूम कितने अरबों वर्षों से! अब उसके भीतर की भट्ठी चुक रही है, अब उसका ईंधन चुक रहा है। चार हजार साल हमारे लिए बहुत बड़े हैं, सूरज के लिए ना-कुछ। चार हजार साल में सूरज ठंडा पड? जाएगा--किसी भी दिन। जिस दिन ठंडा पड़ जाएगा, उस दिन उगेगा नहीं; उस दिन सुबह नहीं होगी। उसकी पहली रात भी लोगों ने वचन दिए होंगे कि कल सुबह आते हैं--निश्चित।

लेकिन छोड़ें! सूरज चार हजार साल बाद डूबेगा और नहीं उगेगा। हमारा क्या पक्का भरोसा है कि कल सुबह हम ही उगेंगे! कल सुबह होगी, पर हम होंगे? जरूरी नहीं है। और कल सुबह भी होगी, सूरज भी उगेगा, हम भी होंगे, लेकिन वचन को पूरा करने की आकांक्षा होगी? जरूरी नहीं है। एक छोटी-सी कहानी कहूं।

सुना है मैंने कि चीन में एक सम्राट ने अपने मुख्य वजीर को, बड़े वजीर को फांसी की सजा दे दी। कुछ नाराजगी थी। लेकिन नियम था उस राज्य का कि फांसी के एक दिन पहले स्वयं सम्राट फांसी पर लटकने वाले कैदी से मिले, और उसकी कोई आखिरी आकांक्षा हो तो पूरी कर दे। निश्चित ही, आखिरी आकांक्षा जीवन को बचाने की नहीं हो सकती थी। वह बंदिश थी। उतनी भर आकांक्षा नहीं हो सकती थी।

सम्राट पहुंचा--कल सुबह फांसी होगी--आज संध्या, और अपने वजीर से पूछा कि क्या तुम्हारी इच्छा है? पूरी करूं! क्योंकि कल तुम्हारा अंतिम दिन है। वजीर एकदम दरवाजे के बाहर की तरफ देखकर रोने लगा। सम्राट ने कहा, तुम और रोते हो? कभी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता, तुम्हारी आंखें और आंसुओं से भरी!

बहुत बहादुर आदमी था। नाराज सम्राट कितना ही हो, उसकी बहादुरी पर कभी शक न था। तुम और रोते हो! क्या मौत से डरते हो? उस वजीर ने कहा, मौत! मौत से नहीं रोता, रोता किसी और बात से हूं। सम्राट ने कहा, बोलो, मैं पूरा कर दूं। वजीर ने कहा, नहीं, वह पूरा नहीं हो सकेगा, इसलिए जाने दें। सम्राट जिद्द पर अड़ गया कि क्यों नहीं हो सकेगा? आखिरी इच्छा मुझे पूरी ही करनी है।

तो उस वजीर ने कहा, नहीं मानते हैं तो सुन लें, कि आप जिस घोड़े पर बैठकर आए हैं, उसे देखकर रोता हूं। सम्राट ने कहा, पागल हो गए? उस घोड़े को देखकर रोने जैसा क्या है? वजीर ने कहा, मैंने एक कला सीखी थी; तीस वर्ष लगाए उस कला को सीखने में। वह कला थी कि घोड़ों को आकाश में उड़ना सिखाया जा सकता है, लेकिन एक विशेष जाति के घोड़े को। उसे खोजता रहा, वह नहीं मिला। और कल सुबह मैं मर रहा हूं, जो सामने घोड़ा खड़ा है, वह उसी जाति का है, जिस पर आप सवार होकर आए हैं।

सम्राट के मन को लोभ पकड़ा। आकाश में घोड़ा उड़ सके, तो उस सम्राट की कीर्ति का कोई अंत न रहे पृथ्वी पर। उसने कहा, फिक्र छोड़ो मौत की! कितने दिन लगेंगे, घोड़ा आकाश में उड़ना सीख सके? कितना समय लगेगा? उस वजीर ने कहा, एक वर्ष। सम्राट ने कहा, बहुत ज्यादा समय नहीं है। अगर घोड़ा उड़ सका तो ठीक, अन्यथा मौत एक साल बाद। फांसी एक साल बाद भी लग सकती है, अगर घोड़ा नहीं उड़ा। अगर उड़ा तो फांसी से भी बच जाओगे, आधा राज्य भी तुम्हें भेंट कर दूंगा।

वजीर घोड़े पर बैठकर घर आ गया। पत्नी-बच्चे रो रहे थे, बिलख रहे थे। आखिरी रात थी। घर आए वजीर को देखकर सब चकित हुए। कहा, कैसे आ गए? वजीर ने कहानी बताई। पत्नी और जोर से रोने लगी। उसने कहा, तुम पागल तो नहीं हो? क्योंकि मैं भलीभांति जानती हूं, तुम कोई कला नहीं जानते, जिससे घोड़ा उड़ना सीख सके। व्यर्थ ही झूठ बोले। अब यह साल तो हमें मौत से भी बदतर हो जाएगा। और अगर मांगा ही था समय, तो इतनी कंजूसी क्या की? बीस, पच्चीस, तीस वर्ष मांग सकते थे! एक वर्ष तो ऐसे चुक जाएगा कि अभी आया अभी गया, रोते-रोते चुक जाएगा।

उस वजीर ने कहा, फिक्र मत कर; एक वर्ष बहुत लंबी बात है। शायद, शायद बुद्धिमानी के बुनियादी सूत्र का उसे पता था। और ऐसा ही हुआ। वर्ष बड़ा लंबा शुरू हुआ। पत्नी ने कहा, कैसा लंबा! अभी चुक जाएगा। वजीर ने कहा, क्या भरोसा है कि मैं बचूं वर्ष में? क्या भरोसा है, घोड़ा बचे? क्या भरोसा है, राजा बचे? बहुत-सी कंडीशंस पूरी हों, तब वर्ष पूरा होगा। और ऐसा हुआ कि न वजीर बचा, न घोड़ा बचा, न राजा बचा। वह वर्ष के पहले तीनों ही मर गए।

कल की कोई भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। फल सदा कल है, फल सदा भविष्य में है। कर्म सदा अभी है, यहीं। कर्म किया जा सकता है। कर्म वर्तमान है, फल भविष्य है। इसलिए भविष्य के लिए आशा बांधनी, निराशा बांधनी है। कर्म अभी किया जा सकता है, अधिकार है। वर्तमान में हम हैं। भविष्य में हम होंगे, यह भी तय नहीं। भविष्य में क्या होगा, कुछ भी तय नहीं। हम अपनी ओर से कर लें, इतना काफी है। हम मांगें न, हम अपेक्षा न रखें, हम फल की प्रतीक्षा न करें, हम कर्म करें और फल प्रभु पर छोड़ दें--यही बुद्धिमानी का गहरे से गहरा सूत्र है।

इस संबंध में यह बहुत मजेदार बात है कि जो लोग जितनी ज्यादा फल की आकांक्षा करते हैं, उतना ही कम कर्म करते हैं। असल में फल की आकांक्षा में इतनी शक्ति लग जाती है कि कर्म करने योग्य बचती नहीं। असल में फल की आकांक्षा में मन इतना उलझ जाता है, भविष्य की यात्रा पर इतना निकल जाता है कि वर्तमान में होता ही नहीं। असल में फल की आकांक्षा में चित्त ऐसा रस से भर जाता है कि कर्म विरस हो जाता है, रसहीन हो जाता है।

इसलिए यह बहुत मजे का दूसरा सूत्र आपसे कहता हूं कि जितना फलाकांक्षा से भरा चित्त, उतना ही कर्महीन होता है। और जितना फलाकांक्षा से मुक्त चित्त, उतना ही पूर्णकर्मी होता है। क्योंकि उसके पास कर्म ही बचता है, फल तो होता नहीं, जिसमें बंटवारा कर सके। सारी चेतना, सारा मन, सारी शक्ति, सब कुछ इसी क्षण, अभी कर्म पर लग जाती है।

गीता दर्शन

कामनाएं मूलतः तीन ही हैं--संभोग, संपत्ति और शक्ति की कामनाएं। शेष सब इनकी ही संतान हैं। इनमें भी फ्रायड संभोग को बुनियादी बताते हैं; माक्र्स संपत्ति को; और एडलर शक्ति को। और हालांकि तीनों अपने-अपने ढंग से सही मालूम पड़ते हैं, तो भी उलझन नहीं मिटती।

माक्र्स, फ्रायड और एडलर तीनों सही भी हैं और तीनों गलत भी। सही इसलिए कि प्रत्येक ने आंशिक सत्य को कहा है। गलत इसलिए कि प्रत्येक ने आंशिक सत्य को ही संपूर्ण सत्य है--ऐसा सिद्ध करने की चेष्टा की है। वासनाएं तीन हो सकती हैं, तेरह हो सकती हैं, लेकिन उनका मूल उत्स एक है। यूं समझो कि जैसे अस्तित्व के तीन आयाम होते हैं लेकिन अस्तित्व एक है। वैसे ही वासना एक है, उसके ये तीन आयाम हैं, उसके ये तीन पहलू हैं। ये त्रिकोण हैं। और तीनों कोने अपने आप में सही हैं। पर जैसे ही कोई अपने कोने को ही पूरा महल घोषित करता है, झूठ शुरू हो जाता है। केंद्र क्या है वासना का? मूल उत्स क्या है? मूल उत्स एक ही है और वह है--मनुष्य का स्वयं को न जानना, आत्म-अज्ञान, आत्म-मूर्च्छा। चूंकि मनुष्य स्वयं को नहीं जानता; इसलिए सब तरह की चेष्टाएं करता है इस अज्ञान को किस तरह ढांक ले; इस अज्ञान को किस तरह विस्मृत कर दे; इस अज्ञान को किस भांति स्वयं भी भूल जाए और दूसरों को भी पता न पड़ने दे। इस भुलावे की चेष्टा से ही, इस आत्म-वंचना की चेष्टा से ही ये तीन आयाम पैदा होते हैं। निश्चित ही अगर तुम्हारे पास संपत्ति हो, तो तुम भुलावा पैदा कर सकते हो; बहुत भुलावा पैदा कर सकते हो। संपत्ति हो तो लोग गधों को भी साष्टांग दंडवत करते हैं। संपत्ति हो तो सम्मान मिलता है। संपत्ति हो, समादर मिलता है, पूजा मिलती है। हमारा शब्द है ईश्वर, वह बना है ऐश्वर्य से। जिसके पास ऐश्वर्य है, वह अपने को ईश्वर समझने की भ्रांति में पड़ सकता है। ऐश्वर्य ऐसा भ्रमजाल खड़ा कर दे सकता है कि फिर स्वयं को जानने की जरूरत न मालूम पड़े। हम दूसरों की आंखों में अपनी तस्वीर देखकर जीते हैं। हमारी अपनी तो कोई पहचान नहीं। स्वयं की तो कोई प्रत्यभिज्ञा नहीं। दूसरे क्या कहते हैं, वही हमारी जानकारी है, अपने संबंध में। अगर लोग कहते हैं--सुंदर हो, तो हम मान लेते हैं कि सुंदर हैं। और लोग कहते हैं कि सुंदर नहीं हो; तो पीड़ा होती है, तो कांटा चुभता है। लोग कहते हैं बुद्धिमान हो, तो फूल बरस जाते हैं। और लोग कहते हैं बुद्धू हो, तो हम गङ्ढे में गिर जाते हैं। जिसके पास संपत्ति है, वह कुछ भी कहला लेगा। संपत्ति क्या नहीं खरीद सकती है! सम्मान खरीद सकती है। स्तुति खरीद सकती है। प्रशंसा खरीद सकती है। सम्राटों के दरबारों में भाट हुआ करते थे, जो उस समय महाकवि समझे जाते थे। और उनका कुल काम इतना था कि वे सम्राटों की प्रशंसा और स्तुति में गीत लिखते रहें। ऐसे झूठे गीत; ऐसी व्यर्थ की कल्पनाएं, असंभव कल्पनाएं! लेकिन आदमी का मन उनको भी मान लेता है। जब तुम्हारी कोई प्रशंसा करता है, तुम्हें अगर समझ में भी आता हो कि यह बात झूठ है, तो भी तुम इनकार नहीं कर पाते। रस मिलता है। गुदगुदी होती है। भीतर हृदय गदगद होता है। किसी मूर्खाधिराज को भी कहो कि आप महापंडित हो, तो वह भी इनकार नहीं करता। क्योंकि चाहा तो उसने यही था सदा कि लोग महापंडित कहें। लेकिन कोई कहने वाला न मिला था। अरबी कहावत है कि परमात्मा जब लोगों को बनाकर दुनिया में भेजता है, तो सभी के साथ एक मजाक कर देता है। बनाया आदमी को, और इसके पहले कि फेंके दुनिया में, कान में फुसफुसा देता है कि तुझ जैसा सुंदर, तुझ जैसा बुद्धिमान, तुझ जैसा अद्वितीय, प्रतिभाशाली, मेधावी मैंने न कभी बनाया और न कभी मैं फिर बनाऊंगा। तू बेजोड़ है। तू लाखों में एक है। और कंकड़-पत्थर--तू हीरा है। तू कोहिनूर है। और यही बात हर आदमी अपने मन के भीतर दबाए बैठा है। कहना तो चाहता है, लेकिन कहने के लिए अवसर चाहिए। संपत्ति अवसर दे देती है। न फिर खुद कहना पड़ता है, दूसरे कहने लगते हैं। इसलिए तो तुम नेताओं के पास चमचों को इकट्ठे देखते हो। ये चमचे क्या हैं? ये कुछ नए नहीं हैं। ये बड़े पुराने हैं। ये उतने ही प्राचीन हैं, जितना प्राचीन आदमी है। और इन्हीं चमचों की भाषा तुम्हारे महात्मा बोलते रहे हैं। वे भी परमात्मा की खुशामद यूं करते हैं, जैसे लखनऊ के किसी नवाब की खुशामद कर रहे हों। को मो सम खल कुटिल कामी, मैं तो नमक हरामी! अपने को ऐसा दीन दिखा रहे हैं! और परमात्मा को बड़ा करके बता रहे हैं। दोनों एक ही चीज के पहलू हैं। अपने को छोटा करके दिखाना; परमात्मा को बड़ा करके दिखाना। कि मैं तो कुछ नहीं; धूल हूं। पापी हूं। और तुम--तुम पावन हो! तुम तीर्थ हो! तुम उद्धारक हो! तुम्हीं पापियों के एकमात्र सहारे हो! और मुझ जैसा कौन महापापी! यूं अपनी लकीर को जितना छोटा किया जा सके, कर रहे हैं; और परमात्मा की लकीर को जितना बड़ा कर सकें, कर रहे हैं। यह भाषा दरबारियों की भाषा है। सोचते रहे लोग कि जब राजा-महाराजा, धनी-मानी आनंदित होते हैं स्तुति से, खुशामद से, तो परमात्मा भी होगा ही। वही भाषा परमात्मा के लिए बोली जा रही है। और जब कोई महात्मा यह भाषा बोलता है, तो तुम सोचते हो: कितना विनम्र! कितना निरअहंकारी! को मो सम कुटिल खल कामी! अहा, तुम भी गदगद होते हो कि महात्मा भी गजब है! लेकिन अगर गौर से देखो, तो इसमें भी अहंकार है। वह यह कह रहा है कि मुझ जैसा कुटिल खल कामी कोई और नहीं! बस, मैं अद्वितीय हूं! मुझसे नीचे और कोई भी नहीं! तुम सबसे ऊपर--मैं सबसे नीचे। तुम भी अद्वितीय--मैं भी अद्वितीय! और हम दोनों का मिलन हो जाए, तो गजब हो जाए, तो चमत्कार हो जाए! यह कुछ निर-अहंकार नहीं है। निर-अहंकार ऐसी भाषा बोल ही नहीं सकता। यह तो अहंकार की ही भाषा है। हां, मगर अहंकार शीर्षासन कर रहा है; सिर के बल खड़ा है। धन खरीद सकता है स्तुति, खुशामद, गीत, काव्य, महाकाव्य। तुम्हारे सारे महाकाव्य स्तुतियां हैं धनपतियों की, साम्राज्यवादियों की। छोटे-मोटे कवियों की तो छोड़ दो, तुम्हारे बड़े-बड़े कवि भी दरबारी ही हैं, भाट ही हैं। धन के लिए गीत लिखे हैं। पद और प्रतिष्ठा के लिए स्तुति की है। धन खरीद सकता है; लोगों की आंखें खरीद सकता है। लोग तुम्हारी ऐसी तस्वीर दिखाने लगें, जैसी तुम देखना चाहते हो। है वैसी या नहीं--यह और बात। और वही काम शक्ति से भी होता है। राष्ट्रपति है कोई, सम्राट है कोई, सिकंदर है कोई, प्रधानमंत्री है कोई, तो बस स्तुतियां शुरू हो जाती हैं। जब तक पद पर है, तब तक चारों तरफ से गुणगान होता है। पद पर बैठे लोगों को बड़ी भ्रांति पैदा हो जाती है कि जब इतने लोग कह रहे हैं तो ठीक ही कहते होंगे। आखिर क्यों इतने लोग झूठ कहेंगे! पद से उतरते ही पता चलता है कि अब कोई पूछता भी नहीं। मनोवैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जैसे ही कोई व्यक्ति पद से नीचे उतरता है, उसकी उम्र दस साल कम हो जाती है। वह दस साल पहले मर जाता है। अगर पद पर रह जाता तो दस साल और जी जाता। गर्मी पैदा होती है लोगों की प्रशंसा से; बल आता है। बूढ़े भी जवान मालूम होते हैं। मुर्दा भी जिंदा मालूम होते हैं। पद की आकांक्षा, शक्ति की आकांक्षा--लेकिन कारण वही है, कि कोई बता दे कि मैं कौन हूं। कोई कह दे, कोई प्रमाण दे दे कि मैं कौन हूं। कोई मुझे बढ़ा-चढ़ाकर गौरीशंकर का शिखर बता दे। मुझे तो पता नहीं कि मैं कौन हूं, औरों पर ही निर्भर रहना होगा। तुम जरा सोचना कि तुम्हारी अपने संबंध में जो जानकारी है, वह क्या है! वह कतरन है लोगों के विचारों की। चिंदियां इकट्ठी कर रहे हो लोगों के मंतव्यों की। और उन्हीं का ढेर संजोए बैठे हो, और सोचते हो यही मैं हूं। और इसी बीच तुम्हारी विडंबना पैदा होती है। क्योंकि कोई तुम्हें अच्छा कह देता है, कोई तुम्हें बुरा कह देता है। कोई प्यारा कह देता है, कोई दुष्ट कह देता है। कोई महात्मा कह देता है, कोई पापी कह देता है। तुम बड़ी बिबूचन में पड़ जाते हो कि फिर मैं कौन हूं! तुम्हारे संबंध में मंतव्य लोगों के अलग-अलग हैं। हर दर्पण तुम्हारी अलग तस्वीर बताता है। तुम कभी ऐसे दर्पणगृह में गए हो, जहां बहुत दर्पण लगे हों। कोई दर्पण तुम्हारा लंबा रूप बताता हो। कोई दर्पण तुम्हें बिलकुल ठिगना बनाकर बताता हो। कोई दर्पण मोटा करके बताता हो। कोई बिलकुल सींकिया पहलवान कर देता हो। कोई सुंदर--कोई असुंदर। इस दर्पणगृह में तुम बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे कि आखिर मैं कौन हूं! दूसरों पर जो निर्भर रहेगा, वह मुश्किल में तो पड़ेगा ही। क्योंकि नौकर तो कहेगा कि मालिक आप जैसा सुंदर कोई भी नहीं। लेकिन तुम्हारा जो मालिक है, वह यह नहीं कहेगा। वह क्यूं कहेगा? वह तो तुमसे कहलवाएगा कि सुंदर मैं हूं। और तुमसे यह भी कहलवाएगा कि तुम कुरूप हो। क्योंकि ये सारी बातें सापेक्ष्य हैं और तुलनात्मक हैं। इसलिए तुम्हारा मन द्वंद्वग्रस्त होता है। धन कितनी ही स्तुति खरीद ले, लेकिन निर्द्वंद्वता नहीं खरीद सकता, अद्वैत नहीं खरीद सकता। पद कितना ही लोगों का समादर पा ले, लेकिन कहीं न कहीं स