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तादात्म तोड़ना या नान -आइडेंटिफिकेशन का क्या अर्थ है ?क्या हैं 'उन्मनी गति'?PART-02


कैसे करे उस प्रकाश की खोज?-

14 FACTS;-

1-हम स्वयं को सदा अतीत से जोड़ लेते हैं, तो वह पुराना हो जाता है। कल भी किया था ध्यान..आज भी कर रहे हैं ध्यान। तो कल जो ध्यान किया था, वह अतीत की स्मृति

बन गई , वह आज नहीं किया जा सकता है क्योंकि न आज वह आकाश है, न आज वे किरणें हैं, न आज वह आप हैं, सब तो बदल गया।अगर अतीत से जोड़ेंगे, तो सब पुराना हो जाता है और अतीत से नहीं जोड़ेंगे तो सब नया है.. पल -पल जीएंगे/मोमेंट टु मोमेंट।

2-इस जगत में पुराने को करने का उपाय ही कहां है; इसलिये संन्यासी नित -नूतन

चेष्टा करता है। उसकी कोई चेष्टा पुरानी नहीं पड़ती। पुरानी पड़ने से ऊब भी पैदा हो जाती है।सब प्रवाह है, बहा जा रहा है और जो अप्रवाह है, उसका अभी हमें पता नहीं, उसकी हम खोज कर रहे हैं। संसार तो परिवर्तन है और संसार में जो भी किया जाता है, वह भी परिवर्तनशील है।सब चेष्टाएं परिवर्तित हैं, वही फिर नहीं की जा सकती।

3-संन्यासी वह है, जो क्षण -क्षण जीता है..मोमेंट टु मोमेंट।न पीछे के क्षण से जोड़ता है, न आगे के क्षण से जोड़ता है..एक क्षण ही काफी है ..तब सब चेष्टा नई है।वह सुबह उठकर फिर हाथ जोड़कर परमात्मा के सामने खड़ा होता है, बिलकुल नया, ताजा, फ्रेश।कुछ पुराना नहीं, कल की धूल है ही नहीं।कल भी हाथ जोड़े थे, इसका खयाल , इसका हिसाब किसको है? लेकिन हम बड़ा हिसाब रखते हैं।उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध से जब कोई मिलने आता, नमस्कार करता, जाते वक्त विदा लेता, तो कहते ..''ध्यान रखना! जिसने नमस्कार किया था, वही विदा नहीं ले रहा है। घंटे भर में नदी का बहुत पानी बह गया''।

4-लेकिन मन बहुत चालाक है और सब चालाकी हिसाब -किताब/कैलक्यूलेशन होती है..माइंड इज कनिग एंड कैलअलेटिंग।तीन दिन हो गए ध्यान करते, अभी कुछ नहीं हुआ..हिसाब भीतर चलता ही रहता है।'तीन दिन हो गए' ..सो हू इज कैलक्यूलेटिंग...।

संन्यासी कुछ जोड़ता नहीं, वह परमात्मा से यह नहीं कहता कि पंद्रह दिन हो गए प्रार्थना करते, अब कहां हो? नित -नूतन चेष्टा करता रहता है। कल की बात ही छोड़ देता है केवल यह क्षण काफी है।

5-और सवाल यह नहीं है कि ध्यान से कुछ मिले...ध्यान ही काफी है। यह भी सवाल नहीं है कि कोई फल मिले, ध्यान ही फल है। इसलिए वह रोज नई -नई चेष्टा करता चला जाता है। उसकी चेष्टा कभी पुरानी नहीं पड़ती। वह जन्मों -जन्मों तक प्रतीक्षा करता है, चेष्टा करता है। कभी यह नहीं कहता कि कितना मैं कर चुका, अभी तक दर्शन नहीं, अन्याय हो रहा है। इतने उपवास किए, इतने ध्यान किए, इतनी प्रार्थनाएं हो चुकीं, अभी तक कुछ फल नहीं मिला।संन्यासी सब हिसाब -किताब छोड्कर जीता है।और अगर किसी दिन परमात्मा उसे मिले, तो वह कहेगा, कैसे मिल गए तुम.. मैंने तो कुछ भी नहीं किया!

6-इसीलिए जिन्होंने परमात्मा को जाना, उन्होंने कहा, वह प्रसाद रूप से मिलता है। उससे हमारे करने का कोई संबंध नहीं है।वह तो उसकी अनुकंपा है,उसकी दया है, करुणा है, इसलिए मिलता है। हमारे किए हुए का क्या मूल्य? लेकिन यह वही कह सकता है, जिसने हिसाब न रखा हो, नहीं तो किए हुए का मूल्य मालूम पड़ता है। जो हिसाब-किताब

रख रहा है ,बैलेंस कर रहा है कि इतना नुकसान, इतना लाभ , इतना दिया, इतना लिया। वह लगा है हिसाब -किताब में।और जिसने भी ऐसा सोचा, वह गृहस्थ है, संन्यासी नहीं।

7-अंधकार के कारण ही तो जीवन के सारे विकार ,उलझन ,उपद्रव ,रोगऔर सारी विक्षिप्तता है।उसी के कारण ही तो सारा भटकाव है क्योंकि हमें टटोलकर जीना पड़ता है।और उसके कारण ही तो कुछ पता नहीं चलता कि हम कहां खड़े हैं, क्यों खड़े हैं; कहां जा रहे हैं, कहां से आ रहे हैं।प्रकाश का अर्थ है, एक ऐसी चित्त की दशा जहां सब स्वच्छ, निर्मल है, आलोकित है,जैसा है, वैसा दिखाई पड़ता है..क्रिस्टल क्लियर।कहां जा रहे हैं, कहां से आ रहे हैं, कहां खड़े हैं, कौन हैं, क्या है चारों तरफ.... दिखाई पड़ता है। प्रकाश की आकांक्षा मूलत: सत्य के दर्शन की आकांक्षा है। क्योंकि दर्शन प्रकाश के बिना नहीं हो सकेगा।

8-बाहर प्रकाश होता है, तो चीजें दिखाई पड़ती हैं; और जब भीतर प्रकाश होता है, तो परमात्मा दिखाई पड़ता है। बाहर अंधेरा हो जाता है, तो पदार्थ नहीं दिखाई पड़ता; भीतर अंधेरा छा जाता है, तो परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता।तो प्रकाश की आकांक्षा.. भीतर जो

छिपा है, उसके दर्शन की आकांक्षा है। और जिसे अपने भीतर का छिपा हुआ दिखाई पड़ गया, उसे सबके भीतर का दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। क्योंकि हम दूसरे के भीतर वहीं तक देख सकते हैं, जहां तक अपने भीतर देख सकते हैं।

9-हम दूसरे के भीतर उससे ज्यादा गहरा कभी नहीं देख सकते, जितनी गहराई में हमने अपने भीतर झांका है।जो हम अपने को जानते हैं, वही हम दूसरे में देख भी पाते हैं। जिस दिन हम अपने भीतर परमात्मा को देख लेते हैं, उस दिन इस जगत में कोई कण परमात्मा से खाली नहीं रह जाता। वह सबकी आंतरिकता में दिखाई पड़ जाता है।लेकिन भीतर प्रकाश चाहिए।

उस प्रकाश की आकांक्षा, अभीप्सा, प्यास,उसकी ही पुकार, नित -नूतन चेष्टा है। वे थकते नहीं, वे निरंतर उस प्रकाश की खोज में लगे रहते हैं।

10-उदाहरण के लिए एक सूफी फकीर से उसके शिष्यों ने पूछा कि ''तुमने कभी बताया नहीं तुम्हारा गुरु कौन था। और जानने का मन होता है कि तुम इतने आलोकित, तुम्हारा गुरु कौन था?'' फकीर ने कहा, ''नहीं बताने का कारण यह नहीं है कि गुरु को छिपाना चाहता हूं। नहीं बताने का कारण है कि इतने गुरु थे कि बताना मुश्किल है ...थोड़ी दुविधा भी होती है''। तो उन्होंने कहा कि पहली बात तो समझ में आई, लेकिन यह दूसरी बात समझ में नहीं आती कि बताने में थोड़ी दुविधा भी होती है।

11-फकीर ने कहा, होती है।अब जैसे एक गांव में आधी रात पहुंचा और रास्ता भटक गया। सारा गांव सो गया था। सराय का दरवाजा खटखटाया, कोई उठा नहीं।एक मकान के पास से गुजरता था कि अकेला जागा आदमी दिखा...दीवार में सेंध लगाता एक चोर। उससे मैंने कहा कि भाई, बड़ी मुश्किल में पड़ा हूं। ठहरने की कोई जगह है? उसने कहा, जरूर ठहरा दूंगा। फकीर मालूम पड़ते हो। मेरे घर ठहरने की हिम्मत हो, तो मेरे घर ही ठहर जाओ ,परन्तु मैं एक चोर हूं।

12-फकीर ने कहा, इतना ईमानदार आदमी मुझे इससे पहले नहीं मिला था, जिसने कहा, मैं एक चोर हूं। मेरा मन भी डरा कि ठहरूं इसके घर कि नहीं, क्योंकि कल सुबह गांव के लोग क्या कहेंगे! मगर जब चोर ने आमंत्रण इतने प्रेम से दिया है और कहकर दिया कि मैं चोर हूं तो इंकार करते नहीं बना। चोर के घर जाकर ठहर गया। चोर ने कहा, तुम विश्राम करो। मैं भोर होते -होते आ जाऊंगा और तुम्हारी सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा।

13-कोई पांच बजे चोर आया, फकीर ने दरवाजा खोला और पूछा, कुछ पाया? चोर ने कहा, आज तो नहीं। लेकिन जिंदगी लंबी है और रातों की क्या कमी है।फकीर ने

कहा है कि मैं महीने भर उस चोर के घर था। और रोज चोर आता और मैं पूछता, कुछ मिला? वह कहता, नहीं। लेकिन कल मिलेगा। जिंदगी लंबी है और रातों की क्या कमी है। महीने भर बाद ,जिस दिन फकीर ने उसका घर छोड़ा, उस दिन भी यही बात थी।

14-और फकीर ने कहा कि जब मैं परमात्मा को खोजता था, तो बार-बार थक जाता था।और सोचता था, अब तक नहीं मिला ..तब वह चोर मेरे सामने खड़ा हो जाती और वह कहता, रातों की क्या कमी है, जिंदगी लंबी है। तब फिर मैं हैरान होता कि जब एक चोर, साधारण धन की तलाश से नहीं थकता, इतनी आशा से, तो मैं परम धन को खोजने निकला हूं और

इतनी जल्दी..।तो जिस दिन मुझे परमात्मा की प्रतीति हुई, मैंने परमात्मा को पहले धन्यवाद नहीं दिया, पहले उस चोर को आंख बंद करके नमस्कार किया कि तुझे मिला हो या न मिला हो, बाकी तू मेरा गुरु है। इसलिए दुविधा होती है।

क्या जागरूकता मन की एक वृत्ति है?-

05 FACTS;-

1-मन केवल एक उपकरण है। जागरूकता उसका हिस्सा नहीं है, लेकिन जागरूकता उसके द्वारा प्रवाहित होती है। जब मन का अतिक्रमण हो जाता है,जागरूकता अपने आप बनी रहती है।किसी बुद्ध को भी मन का ही प्रयोग करना होगा, यदि उन्हें तुमसे बात करनी हो, तुमसे संबंधित होना हो। क्योंकि तब उन्हें एक प्रवाह की आवश्यकता होगी ..उनके आंतरिक स्रोत का प्रवाह।उन्हें भी उपकरणों का, माध्यमों का प्रयोग करना पड़ेगा और फिर मन कार्य करेगा।

2-जागरूकता बल्व की भांति है, जिसके द्वारा विद्युत प्रवाहित होती है, लेकिन विद्युत बल्व का हिस्सा नहीं है। यदि तुम बल्व को तोड़ते हो, तो तुमने बिजली को नहीं तोड़ा है। उसकी अभिव्यक्ति में रुकाव आ जायेगा, लेकिन दूसरा बल्व रखते ही बिजली प्रवाहित होने लगती है।

तुम कार में जाते हो, हवाई जहाज द्वारा उड़ान करते हो, लेकिन तुम वाहन नहीं हो। मन वाहन मात्र है। और तुम मन की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर रहे हो। यदि तुम इसकी पूरी क्षमता का उपयोग करो, तो यह सम्यक ज्ञान हो जायेगा।

3-हम मन का उपयोग ऐसे कर रहे हैं जैसे कोई हवाई जहाज का उपयोग बस की भांति कर रहा हो। तुम हवाई जहाज के पंख काट सकते हो और सड़क पर उसे बस की तरह चला सकते हो;वह बस की तरह काम करेगा।लेकिन तुम उसकी भरपूर क्षमता का उपयोग नहीं कर रहे हो।तुम अपने

मन का सपनों, कल्पनाओं और पागलपन के लिए उपयोग कर रहे हो। तुम इसका उपयोग ठीक से नहीं कर रहे; तुमने इसके पंख काट दिये हैं। यदि 4-तुम पंख सहित इसका उपयोग करो, तो यह सम्यक ज्ञान , प्रज्ञा बन सकता है। लेकिन वह भी मन का ही हिस्सा है, वह भी एक साधन है। उपयोग करने वाला पीछे बना रहता है, उपयोग करने वाले का उपयोग नहीं किया जा सकता। तुम मन का उपयोग कर रहे हो। तुम स्वयं जागरूकता हो। और ध्यान की सारी कोशिशों का अर्थ है इसी चैतन्यता को इसकी शुद्धता में जान लेना, बिना किसी माध्यम के। तुम्हें इसका बोध हो सकता है बिना किसी साधन के..लेकिन केवल तभी..जब मन ने कार्य करना बंद कर दिया हो।

5-जब मन ने कार्य करना बंद कर दिया हो, तब तुम सचेत हो जाओगे कि चैतन्यता वहां है। तुम इससे भरे हुए हो, मन तो केवल एक वाहन था, एक मार्ग। अब यदि तुम चाहो, तो मन का उपयोग कर सकते हो और न चाहो, तो इसके उपयोग की कोई जरूरत नहीं।शरीर और मन दोनों वाहन

हैं।लेकिन तुम वाहन नहीं हो बल्कि वाहन के पीछे छिपे मालिक हो। लेकिन तुम इसे पूरी तरह से भूल चुके हो और वाहन बन गये हो। इसे ही योगियों ने कहा तादात्‍म्‍य...तादात्‍म्य बना लेना किसी उस चीज के साथ, जो तुम नहीं हो।

क्या हैं''उन्मनी दशा''?-

10 FACTS;- 1-जब तक मन है तब तक तरंग है। मन एक तरह की तरंगायित अवस्था है। मन का अर्थ है, झील पर बहुत लहरें उठ रही हैं। न-मन का अर्थ है, सब लहरें शांत हो गयीं, झील बिलकुल दर्पण की तरह मौन हो गयी, जरा भी तरंग नहीं होती। सतह कंपती ही नहीं ..अकंप हो गई। ये निर्विचार रूप दशा है, जहां कोई विचार और विमर्श नहीं उठता, जहां सब शून्य और शांत हुआ है। जहां झील पर एक भी तरंग नहीं रही--झील बिलकुल विश्रांत हो गयी, शांत हो गयी--अपने में लीन ,मन से मुक्त हो गयी दशा; ऐसी इस शून्य की दशा को -जिसको झेन फकीर नो-मांइड कहते हैं।ये चित्तमुक्ति की दशा; जिसको कबीर ने अ-मनी दशा कहा है और नानक ने उन्मनी दशा कहा है । 2-एक ही बच रहता है। भक्त ..Water Element-उस 'एक 'को कहता है, भगवान।वह अपने को डुबा देता है, और परमात्मा को बचा लेता है।Fire Element- उस एक को कहता है, ...परमात्मा। ज्ञानी...Air Element- उस एक को कहता है, शून्य, पूर्ण, सत्य ।ज्ञानी स्वरूप को बचा लेता है और सब डुबा देता है।जनक की भाषा ज्ञानी की भाषा है। जनक कहते हैं कि न तो मैं ज्ञानी हूं और न मैं मूढ़ क्योंकि अज्ञानी/मूढ़ और ज्ञानी होना एक साथ चलते हैं।इसलिए जहां सुकरात ने कहा है कि मैं अज्ञानी हूं, वहां जनक का वचन एक कदम और ऊपर जाता है। 3-पहले सुकरात मानता था, मैं ज्ञानी हूं, फिर उसने माना कि मैं अज्ञानी हूं, लेकिन जनक एक कदम और ऊपर जाते हैं। वह कहते हैं, मैं अज्ञानी हूं यह भी कैसे कहूं? जानने को कुछ नहीं बचा तो न जानने को भी कुछ नहीं बचा। ज्ञान और अज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए न तो मैं कह सकता हूं कि मैं बोध को उपलब्ध हुआ हूं, न मैं कह सकता हूं, मैं मूढ़ हूं। दोनों गये, जो बचा है वह निर्विशेष है, विशेषणशून्य है, निराकार है। अब उसके ऊपर कोई भी नाम नहीं थोपा जा सकता ,कोई रूप नहीं दिया जा सकता;किसी भी कोटि/क्लासीफिकेशन में उसे रखने का उपाय नहीं है। 4-चेतना के दो तल हैं। पहला तल व्यक्तित्व या अहंकार का है। दूसरा तल आत्मा का तल है। जहां तक व्यक्तित्व या अहंकार है, मैं-पन है, अपने होने का भाव है; वहां आनंद नहीं है।आनंद हमारा स्वभाव ,अंतर्यात्रा है।व्यक्तित्व परिधि है, मगर निजता हमारी प्रकृति है,केंद्रीय तत्व है।आनंद जब भी मिलेगा, भीतर से ही मिलेगा।आनंद उन्मनी दशा है ,जहां मन नहीं , विचार नहीं , वहीं आनंद है। संत कबीर इसी आनंद को सहज समाधि कहते हैं। 5-विराट के साथ एक हो जाना आनंद है। जब तक हम अकेले हैं, जब तक हम द्वैत में हैं, तब तक आनंद नहीं है। जब हम विराट के साथ एकाकार होते हैं, जहां हमारी अलग सत्ता समाप्त हो जाती है-वहां आनंद है। आनंद के अनुभव के लिए अपने भीतर लौटना होगा। अंतस की यात्रा शुरू होती है साक्षी से, ध्यान से। साक्षीभाव का मतलब है किसी वस्तु या विषय को साक्षी बनकर देखना। आनंद प्राप्ति का दूसरा कदम है-स्वीकार भाव। हर स्थिति को स्वीकार करना। तीसरा कदम है, सद्गुरु का साथ । साक्षी और स्वीकार भाव तो हम स्वयं भी साध सकते हैं, लेकिन आगे की अंतर्यात्रा अगर अकेले की हैं, तो भटकने की भी संभावना रहेगी। 6-प्रभु का सुमिरन ही एक दिन समाधि तक पहुंचा देता है। समाधि का अर्थ है-प्रभु से मिलन के आनंद का गहरा जाना। समाधि अहंकार, मन, विचार-इन सभी को मिटा देती है और रह जाती है केवल शुद्ध चेतना। विराट के साथ जब हम एक होते हैं..तो उस समाधि का नाम ही आनंद है। समाधि में गए बगैर कोई आनंद का अहसास नहीं कर सकता। वह आनंद अस्थायी नहीं है। सुख की मनोदशा में भौतिक स्थितियों को भी विशेष महत्व दिया जाता है, लेकिन आनंद मानसिक शांति की सर्वोच्च मनोदशा है।विचार में भेद होते हैं; निर्विचार में भेद नहीं होते। मन में भेद होते हैं, लेकिन अमन में नहीं । उन्मनी दशा में कैसा भेद ...जहां मन ही न रहा वहां सब भेद गए। 7-और वे अ-मन में ही गति करते है..उन्मनी गति।यह अदभुत सूत्र वैसा ही है जैसा कि आइंस्टीन ने एनर्जी का फार्मूला खोजा।बल्कि यह सूत्र उससे भी ज्यादा कीमती है क्योंकि आइंस्टीन के बिना दुनिया में कुछ बड़ा फर्क न पड़ेगा।अगर एनर्जी का फार्मूला न हो, तो भी आदमी हो सकता है।वास्तव में, एनर्जी के फार्मूले के बाद ही दिक्कत शुरू हुई है।हिरोशिमा और नागासाकी नहीं बनता ,अगर एनर्जी का फार्मूला नहीं होता।उस दिशा में,जहां मन नहीं...उनकी एक ही गति या यात्रा है। वे मन को छोड़कर बढ़ते चले जाते हैं और एक दिन आता है , जब मन गिर जाता है। 8-हम भी गति करते हैं, पर मन में और मन के लिए। हम जो भी करते हैं, वह मन का पोषण है। हम 'मन' को बढ़ाते हैं, मजबूत करते हैं। हमारे अनुभव, हमारा ज्ञान, हमारा संग्रह, सब हमारे मन को मजबूत और शक्तिशाली करने के लिए है।एक आदमी कहता है, मुझे सत्तर साल का अनुभव है; अथार्त उनके पास सत्तर साल पुराना मजबूत मन है। और लोग सोचते हैं, पुराना मन भी अच्छा होता है। मगर चेतना नहीं बदलती, चेतना तो वही बनी रहती है।मन की पर्त चारों तरफ घिर जाती है। मांग वही बनी रहती है, वासना वही बनी रहती है।जिसको संसार का अनुभव कहते हैं, वह सिर्फ मन का पोषण है । इसलिये संन्यासी अ-मन की तरफ चलता है और गृहस्थ मन की तरफ चलता है। 9-सभी लोग मन लेकर जन्मते हैं, लेकिन अभागे हैं वे, जो मन को लेकर ही मर जाते हैं। फिर जीवन में कोई फायदा न हुआ। फिर यह यात्रा बेकार गई। अगर मृत्यु के पहले मन खो जाए, तो मृत्यु समाधि बन जाती है और मृत्यु के बाद फिर दूसरा जन्म नहीं होता, क्योंकि जन्म के लिए मन जरूरी है।मन ही अपूर्ण वासनाओं के कारण, पुन:- पुन: जन्म की आकांक्षा करवाता है। जब मन ही नहीं रहता, तो जन्म नहीं रहता। मृत्यु पूर्ण हो जाती है। 10-हम सब भी मरते हैं, हम अधूरे मरते हैं, क्योंकि वहां जन्म की आकांक्षा भीतर जीती चली जाती है। वह जन्म की वासना फिर नया शरीर ग्रहण कर लेती है। संन्यासी जब मरता है, तो पूरा मरता है -टोटल डेथ। शरीर ही नहीं मरता, मन भी मरता है। भीतर कोई और जीने की वासना नहीं रह जाती है। और जो पूरा मर जाता है, वह उस जीवन को उपल्बध हो जाता है, जिसका फिर कोई अंत नहीं। लेकिन अ-मन का मार्ग क्या है? 15 FACTS;-

1-अ-मन/ नो -माइंड का मार्ग है,धीरे -धीरे मन को गलाना, छुड़ाना, हटाना, मिटाना है। ऐसा कर लेना है कि भीतर चेतना तो रहे, परन्तु मन न रह जाए। चेतना और बात है क्योंकि यह हमारा स्वभाव है और मन हमारा संग्रह है।इसलिए दुनिया जितनी सुशिक्षित और सभ्य होती जाती है, ध्यान उतना ही मुश्किल होता चला जाता है। क्योंकि सुशिक्षा और सभ्यता का एक ही मतलब है कि 'ट्रेनिंग आफ द माइंड'। इसलिए मनुष्य जितना सुशिक्षित और जितना सभ्य होता जाता है , उतना ही मन से छूटना मुश्किल होता जाता है, क्योंकि मन का इतना प्रशिक्षण हो जाता है। 2-हमारी सारी शिक्षा, हमारी सारी व्यवस्था, हमारा सारा अनुशासन मन की मजबूती के लिए तैयारी है कि बाजार में , धंधे में ,संघर्ष में, प्रतियोगिता में, प्रतिस्पर्धा में मन सफल हो सके..।तो उसको हम ट्रेण्ड कर रहे हैं।और उपनिषद के अनुसार तो मन को विसर्जित करना है, डिसपर्स द माइंड अथार्त उलटी बात। 3-यह ठीक है कि अगर संसार में गति करनी हो, तो मन प्रशिक्षित होना चाहिए और यदि परमात्मा में गति करनी हो, तो मन विसर्जित होना चाहिए। अगर पदार्थ को पाने जाना हो, तो बहुत सुशिक्षित मन ,सुआयोजित, सुसंगठित, वेल आर्गनाइब्द मन चाहिए। लेकिन अगर परमात्मा में जाना हो, तो मन चाहिए ही नहीं ।कोई भी मन नहीं चाहिए..न शिक्षित न अशिक्षित ,न संगठित न असंगठित। अ-मन ही उनकी गति है।वे निरंतर इस चेष्टा में ही लगे रहते हैं कि मन कैसे कम होता चला जाए। 4-'मन कैसे बढ़ता है' यदि हम यह समझ लें, तो घटने का ढंग भी खयाल में आ जाएगा ।पहली बात.. हम मन को सहारा देते हैं /वी कोआपरेट विद इट। रास्ते से गुजर रहे हैं, भूख बिलकुल नहीं है, लेकिन रेस्तरां दिखाई पड़ गया। मन कहता है, भूख लगी है। पैर रेस्तरां की तरफ बढ़ने लगते हैं। पूछते भी नहीं अपने से कि भूख तो जरा भी न लगी थी, जब तक यह बोर्ड नहीं दिखाई पड़ा था। यह बोर्ड दिखाई पड़ने से भूख लगती है! यह मन है। मन से भूख का कोई संबंध नहीं है, स्वाद की आकांक्षा है। मन को शरीर से प्रयोजन नहीं है, मन को स्वाद से प्रयोजन है।तो भूख तो बिलकुल नहीं लगी थी,लेकिन इसको देखकर भूख लग गई जो झूठी है।अब आप अगर पैर रेस्तरां की तरफ बढ़ाते हैं, तो आप मन को बढ़ाते हैं, मजबूत करते हैं। 5-यदि एक क्षण विवेक से खड़े होकर ठहर जाएं ,तो रेस्तरां में प्रवेश नहीं करना पड़ेगा,पैर ठहर जाएंगे।भीतर खोजें...क्या भूख है? क्योंकि मन कितना ही शक्तिशाली दिखाई पड़े, विवेक के सामने बहुत ही निर्बल है।लेकिन विवेक हो ही न, तो फिर मन बहुत सबल है। जैसे अंधेरा कितना ही हो, एक छोटा सा दीया पर्याप्त है।लेकिन दीया हो ही न, तो अंधेरा बहुत सघन है। 6-मनुष्य अकेला कामवासना को मन से जी रहा है, शरीर से नहीं।इसलिए आदमी को छोड्कर इस पृथ्वी पर कोई भी जानवर कामुकता से पीड़ित नहीं है।मनुष्य को छोड्कर सभी जानवरों का 'काम' पीरिआडिकल है।उसकी एक अवस्था है ;वर्ष में महीने, दो महीने, तीन महीने आता है, बाकी नौ महीने काम से रिक्त हो जाते हैं।उनमें कामवासना है, कामुकता नहीं है।शरीर से सारे पशु जी रहे हैं, पौधे जी रहे हैं, वृक्ष जी रहे हैं, सारी प्रकृति जी रही है,लेकिन मनुष्य मन से भी जी रहा है। तो कामवासना तो प्राकृतिक है, लेकिन कामुकता विकृति है। कामवासना से ऊपर उठ जाना तो परम क्रांति है। लेकिन मनुष्य कामवासना से भी नीचे गिर गया है, वह कामुकता में है।

7-तो जब एक सुंदर पुरुष /सुंदर स्त्री को देखकर मन में कामवासना जगने लगे , तब एक क्षण खड़े हो जाना और कहना कि यह बायलाजिकल है, यह कहीं कोई जैविक प्राण की

कोई गति है या मन का ही खेल है?और जहां -जहां मन का खेल दिखे, सहयोग न करें/डोंट कोआपरेट विद इट, नान -कोआपरेशन विल डू। असहयोग करें..सिर्फ खड़े रह जाएं और कहें कि यह मन की बात है। एकदम गिर जाएगी। और ऐसे मन क्षीण होगा, नहीं तो सहयोग से मन बढ़ता चला जाएगा।

8-शरीर में कोई मल नहीं है। शरीर में जो भी विकार आते हैं, वे मन से आते हैं।खाली बैठे हैं ...मन बेकार के विचार कर रहा है, जिनसे कुछ लेना-देना नहीं; और आप उसमें भी सहयोग दिए चले जा रहे हैं।तो रुके और कहें कि इस सबकी क्या जरूरत है? यह सब मैं क्या कर रहा हूं? यह कैसा पागलपन है, जो मेरे भीतर मैं ही चलाता हूं? असहयोग करें..और मन धीरे -धीरे विसर्जित होता है। और अगर चौबीस घंटे असहयोग चले और उसके साथ ध्यान हो, तो अ-मन में गति हो जाती है।

9-लेकिन हम बड़े होशियार हैं। हम कहते हैं कि शरीर हममें विकार पैदा करवाता है।वास्तव

में शरीर विकार पैदा नहीं करवाता। विकार तो मन शरीर में डालता है और शरीर सहयोग देता है। क्योंकि शरीर आपका सेवक है।आप कहते हैं, चोरी करनी है, तो पैर खजाने की तरफ चल पड़ते हैं। आप कहते हैं, प्रार्थना करनी है, पैर मंदिर की तरफ चल पड़ते हैं। न तो पैरों का आग्रह है कि हम चोरी करने जाएंगे, न पैरों का आग्रह है कि हम प्रार्थना करने जाएंगे। पैसे का कोई आग्रह ही नहीं है। अगर आप कामवासना में उत्सुक होते हैं, शरीर की ग्रंथियां कामवासना के लिए तैयार हो जाती हैं। अगर आप ब्रह्म की तरफ यात्रा करते हैं, शरीर की वही ग्रंथियां ब्रह्म -यात्रा के लिए, ब्रह्मचर्य के लिए तैयार हो जाती हैं।

10-शरीर को कोई भी आग्रह नहीं है। शरीर बिलकुल तटस्थ शक्ति है ;जो भी होता है, वह मन से होता है।मन ही सारा विकार पैदा करता है।और जिसका मन शांत हो जाए, मन अ-मन हो

जाए, तो उसका शरीर बड़ा निर्मल हो जाता है, स्वच्छ जल की भांति।क्योंकि जब मन न बचा, तो शरीर में कौन सा पाप बच जाएगा। शरीर ने कोई पाप कभी किया ही नहीं है। सब पाप मन के हैं। शरीर ने कोई पुण्य भी नहीं किया।सब पुण्य भी मन के हैं। शरीर ने न शुभ किया है, न ही अशुभ किया है। लेकिन शरीर को बड़े दंड भोगने पड़ते हैं ...अकारण। और हम शरीर को ही जिम्मेवार ठहराते हैं।

11-और जब मन नहीं रह जाता, तो उनका कोई आलंबन नहीं रह जाता। वे किसी चीज का सहारा नहीं लेते, वे किसी चीज के सहारे नहीं जीते, वे किसी चीज को साधन नहीं बनाते। और जब कोई व्यक्ति सब भांति निरालंब हो जाता है, तो उसे परमात्मा का आलंबन मिलता है, उसके पहले नहीं। जब तक हम सोचते हैं, हम ही अपने सहारे खड़े कर लेंगे, तब तक परमात्मा प्रतीक्षा करता है। ठीक भी है।हमें सहारा तभी मिल सकता है , जब हम बिलकुल बेसहारे हो जाए ..टोटली हेल्पलेस ;उसके पहले नहीं।

12-लेकिन मन कहता है, क्या चाहिए तुम्हें...क्या जरूरत है बेसहारा होने की.. सहारा हम देते हैं।मन कहता है, शास्त्र का अध्ययन कर लो, ज्ञान मिल जाएगा।लेकिन मन शास्त्र से जो

इकट्ठा करेगा, वह सिर्फ स्मृति/मेमोरी होगी, ज्ञान नहीं । वह आत्म -अनुभव नहीं होगा। वह पराए का अनुभव होगा। मन धोखा दे देगा, कहेगा कि अपना ही अनुभव है।मन सब

सहारे देने को तैयार है। वह कहता है कि क्या जरूरत है.. मैं तो हूं! मैं सब कर दूंगा। मन परमात्मा बनने को भी तैयार है.. सदा। वह कहता है कि परमात्मा के लिए प्रार्थना करने जाने की क्या जरूरत है!

13-उदाहरण के लिए एक नाव डूबने के करीब है। सभी यात्री हाथ जोड़कर, घुटने टेककर प्रार्थना कर रहे हैं।कोई यात्री कह रहा है कि हे प्रभु, बचाओ। मेरा जो मकान है, वह मैं दान कर दूंगा। कोई कह रहा है कि बचाओ, अब मैं व्रत -उपवास रखूंगा, नियम से जीऊंगा, कोई बुराई न करूंगा। कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ कह रहा है। आखिर में एक शांत यात्री जोर से चिल्लाया कि ठहरो, जरूरत से ज्यादा वचन मत दे देना। जमीन दिखाई पड़ रही है।प्रार्थना/ नमाज टूट गई। लोग उठ गए, सामान बांधने लगे। वे वचन, वे प्रतिज्ञाएं भूल गईं।

14-उस शांत यात्री ने कहा, ''एक दफे मैं भी फंस गया था, तो बड़ी झंझट हुई थी। जरूरत से ज्यादा वचन मत दे देना। एक बार इसी तरह मेरी नाव डूबने लगी थी, तो मैं कह फंसा कि अगर मैं बच जाऊंगा तो अपना मकान बेच दूंगा और बेचकर सारा धन गरीबों को बांट दूंगा। बड़ा मकान था,कहने के बाद तो मैं सोचने लगा कि अब न ही बचूं, तो अच्छा। लेकिन बच गया

और झंझट सिर आ गई''।

15-''लेकिन मैंने एक तरकीब निकाली।जब मकान नीलाम किया , तो उसके साथ एक कुत्ता भी बांध दिया और कहा कि दोनों साथ बिकेंगे। मकान का दाम तो सौ रुपया है, कुत्ता का दाम बीस लाख रुपया है। कई लोगों ने कहा, हम तो मकान खरीदने आए हैं।मैंने कहा, हमें दोनों साथ ही बेचने हैं। फिर लोगों ने देखा कि कोई हर्जा तो है नहीं, बीस लाख में कुत्ता खरीद लो, सौ रुपए में मकान मिल रहा है।मकान के दाम इतने थे ही। मैंने बीस लाख में कुत्ता बेचा, और सौ रुपए में मकान। सौ रुपया गरीबों में बांट दिया।''

तो मन सब भांति के सहारे देता है। जो मन से रहित हो जाते हैं, वे ही निरालंब हो पाते हैं। वे कहते हैं, अब परमात्मा ही है। अब वह जो करे ठीक।तब अपनी तरफ से करने को कुछ नहीं बचता।

क्या है सम्यक ज्ञान?-

11 FACTS;-

1-सम्यक ज्ञान की क्षमता मन की पांच क्षमताओं में से एक है। सम्यक ज्ञान का केन्द्र मन के भीतर है।लेकिन यह अ -मन की अवस्था नहीं है।अज्ञान

मन का होता है और ज्ञान भी मन का होता है। जब तुम मन के पार चले जाते हो,तो वहां कुछ नहीं होता ..न तो अज्ञान होता है और न ही ज्ञान। ज्ञान भी एक बीमारी है। लेकिन यह एक अच्छी बीमारी है, एक सुनहरी बीमारी। इसलिए किसी चीज का दावा नहीं किया जा सकता कि बुद्ध जानते हैं ,नहीं जानते हैं या वे पार चले गये हैं।

2-जब कोई मन ही नहीं,तो तुम नहीं जान सकते हो ' क्योंकि जानना मन के द्वारा होता है। मन के द्वारा तुम ठीक ढंग से जान सकते हो, मन के द्वारा ही तुम गलत ढंग से जान सकते हो। लेकिन जब मन नहीं है तो ज्ञान -अज्ञान दोनों समाप्त हो जाते हैं। जब मन न हो .. तो न तुम अज्ञानी हो सकते हो और न ही ज्ञानी।तुम हो, लेकिन जानना और न जानना दोनों समाप्त हो गये हैं।

3-मन के दो केंद्र हैं। एक मिथ्या ज्ञान का और दूसरा सम्यक ज्ञान का। यदि सम्यक ज्ञान केंद्र क्रियाशील होता है.. तो एकाग्रता, ध्यान, मनन, प्रार्थना के द्वारा ;जो कुछ भी तुम जान लेते हो ..सत्य होता है।लेकिन एक मिथ्या ज्ञान का केंद्र भी है। जब यह कार्य करता है तो तुम उनींदे होते हो, सम्मोहित होने जैसी अवस्था में होते हो, किसी न किसी चीज द्वारा..संगीत, नशे आदि से।

4-तब तुम भोजन के आदी हो सकते हो ; शायद तुम खाने के लिए पागल और भोजन -ग्रसित हो सकते हो..यह नशा हो जाता है।कोई भी चीज जो तुम्हारे मन पर स्वामित्व जमा लेती है, कोई चीज जिसके बिना तुम जी नहीं सकते, नशा देने वाली बन जाती है। और यदि तुम नशों द्वारा जीते हो तब तुम्हारा मिथ्या ज्ञान का केंद्र कार्य करता है और जो कुछ भी तुम जानते हो मिथ्या है, असत्य है। तुम झूठ के संसार में जीते हो।

5-लेकिन ये दोनों केंद्र मन से ही संबंध रखते हैं। जब मन छूट जाता है और ध्यान अपनी समग्रता में पहुंच जाता है, तब तुम अ -मन तक पहुंच जाते हो। संस्कृत में हमारे पास दो शब्द हैं : एक शब्द तो है ध्यान और दूसरा शब्द है समाधि।'समाधि' का अर्थ होता है, ध्यान की परिपूर्णता; जहां ध्यान तक अनावश्यक बन जाता है, जहां ध्यान करना अर्थहीन है। तुम उसे करते नहीं हो, तुम वही बन गये हो, तब यह समाधि है।

6-समाधि की इस अवस्था में मन नहीं बचता। वहां न ज्ञान होता है और न ही अज्ञान। वहां केवल शुद्ध अस्तित्व होता है। यह शुद्ध होना बिलकुल ही अलग आयाम है। यह जानने का आयाम नहीं है। यह होने का आयाम है।