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क्या हैं होली का आध्यात्मिक रहस्य?क्या पुराण की घटनाएं इतिहास नहीं बल्कि मनुष्य के जीवन का अंतर्निहि



क्या हैं होली का महत्व?-

07 FACTS;-

1-होली का पर्व भारतवर्ष में एक प्रमुख पर्व माना जाता है, होली हिंदुओं का विशेष त्यौहार है जो ज्यादातर मार्च के महीने में बनाया जाता है।होलिका दहन, होली त्योहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है।भारत में मनाए जाने

वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है 'होली'। दीवाली की तरह ही इस त्योहार को भी अच्छाई की बुराई पर जीत का त्योहार माना जाता है।

2-होली के रंगों के साथ साथ प्रेम के रंग में रंग जाने की चाह तो भक्त को भी है, और प्रेमी प्रेमिका को भी है।वैष्णव परंपरा मे होली को, होलिका-प्रहलाद की कहानी का प्रतीकात्मक सूत्र मानते हैं।प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। भगवान कृष्ण की लीलाओं में भी होली का वर्णन मिलता है | अन्य रचनाओं में ‘रंग’ नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं।

3-वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवान्नेष्टि’ कहा गया है। इस दिन खेत के अधपके अन्न का हवन कर प्रसाद बांटने का विधान है। इस अन्न को होला कहा जाता है इसलिए इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाया जाता था।इस पर्व को नवसंवत्सर का आगमन तथा बसंतागम के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है। कुछ लोग इस पर्व को अग्निदेव का पूजन मात्र मानते हैं। मनु का जन्म भी इसी दिन का माना जाता है अत: इसे मन्वादि तिथि भी कहा जाता है।

4-होली मनाने के पीछे एक कथा है जो पौराणिक काल से चली आ रही है, इस कथा में ही होली मनाने का रहस्य छिपा हुआ है ।इस त्योहार को लेकर सबसे प्रचलित है प्रहलाद,

होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी। पुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रुद्ध हो उठा और अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुंचा सकती।

5-किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत, होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है।इसे हिन्दू धर्म में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानते हुए प्रतिवर्ष फाल्गुण पूर्णिमा की रात होलिका दहन की परंपरा है। होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं।होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है।.

6-होली की एक कहानी कामदेव की भी है।माता पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन तपस्या में लीन शिव का ध्यान उनकी तरफ गया ही नहीं। ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए और उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चला दिया। तपस्या भंग होने से शिव को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी और उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए।कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई। अगले दिन तक शिव का क्रोध शांत हो चुका था, उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित किया। कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती है और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।

7-होली का श्रीकृष्ण से गहरा रिश्ता है। जहां इस त्योहार को राधा-कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। वहीं, पौराणिक कथा के अनुसार जब कंस को श्रीकृष्ण के गोकुल में होने का पता चला तो उसने पूतना नामक राक्षसी को गोकुल में जन्म लेने वाले हर बच्चे को मारने के लिए भेजा। पूतना को स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराना था। लेकिन कृष्ण उसकी सच्चाई को समझ गए। उन्होंने दुग्धपान करते समय ही पूतना का वध कर दिया। कहा जाता है कि तभी से होली पर्व मनाने की मान्यता शुरू हुई।ब्रज की होली, मथुरा, वृंदावन बरसाने की होली और काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है।

होली का आध्यात्मिक रहस्य;-

07 FACTS;-

1-होली का त्योहार शिवरात्रि के बाद, फाल्गुन पूर्णिमा के दिन आता है और लोग प्रायः चार प्रकार से मनाते हैं...

1-1-एक दूसरे पर रंग डालते हैं, 1-2-अंतिम दिन होलिका जलाते हैं, 1-3-मंगल मिलन मनाते हैं और 1-4-कई लोग झूले में श्रीकृष्ण (श्री नारायण) की झांकी भी सजाते हैं।

2-होली को मनाने की तिथि और उपर्युक्त चार रीतियों पर ध्यान देने से होली के वास्तविक रहस्यों को सहज ही समझा जा सकता है। भारत में, देशी वर्ष फाल्गुन की पूर्णमासी को समाप्त होता है। इसलिए, फाल्गुन की पूर्णमासी की रात्रि को होलिका जलाने का अर्थ पिछले वर्ष की कटु और तीखी स्मृतियों को जलाना और अपने दुखों को जलाना, अपने दुखों को भूलना और हँसते-खेलते नए वर्ष का आह्वान करना है। उत्तर प्रदेश में कई लोग ‘होलिका दहन’ को ‘संवत जलाना’ भी कहते हैं।

3-इसके अतिरिक्त, पुराने वर्ष के अंत में इस त्योहार को मनाया जाना वृहद दृष्टि में इस रहस्य का भी परिचय देता है कि यह त्योहार पहले-पहले कल्प अथवा कलियुग के अंत में मनाया गया था जिसके बाद सतयुग के अंत में होलिका जलाने से मनुष्य का दुख, दरिद्रता और वासना तथा व्यथा सब दूर हो गए थे। परंतु प्रश्न उठता है कि होलिका जलाने से मनुष्य के विकार और विकर्म तथा दुख और क्लेश भला कैसे नाश हो सकते हैं?

4- ‘होलिका’ शब्द का अर्थ है ‘भुना हुआ अन्न’। होलिका के अवसर पर लोग अग्नि में अन्न डालते हैं और गेंहू और जौ कि बालों को भूनते हैं। योगियों की बोलचाल में ज्ञान अथवा योग को अग्नि से उपमा दी जाती है क्योंकि, जैसे भूना हुआ बीज आगे उत्पति नहीं कर सकता वैसे ही ज्ञान-युक्त और योग-युक्त अवस्था में किया गया कर्म भी अकर्म हो जाता है अर्थात वह इस लोक में विकारी मनुष्यों के संग में फल नहीं देता। अतः ‘होलिका’ शब्द भी हमें इस बात की स्मृति दिलाता है कि परमपिता ने पुरानी सृष्टि के अंत में मनुष्यों को ज्ञान-योग रूपी 5-अग्नि द्वारा कर्म रूपी बीज़ को भूनने की जो सम्मति दी थी, हम उस पर आचरण करें।

एक-दूसरे पर रंग डालने तथा छोटे-बड़े, परिचित-अपरिचित सभी से प्रेमभाव से मिलने की जो रीति है, इसका शुरू में यही रूप था कि परमपिता परमात्मा शिव से ज्ञान प्राप्त करके मनुष्यों ने ज्ञान-पिचकारी से एक दूसरे की आत्मा रूपी चोली को रंगा था और एक-दूसरे के प्रति मन-मुटाव तथा मलीन भाव त्यागकर मंगलकारी परमात्मा शिव से मंगल मिलन मनाया था। ज्ञान के बिना मनुष्य मंगल मिलन नही मना सकता है।अज्ञानी और मायावी मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि राक्षसी स्वभावों से दूसरों का अमंगल करता है। 6-होली के उत्सव पर वैष्णव लोग झूले में श्रीकृष्ण (श्री नारायण) की झांकी सजाकर उनके दर्शन करते हैं। उनका यह विश्वास है कि ‘इस दिन जो व्यक्ति झूले में झूलते हुए श्रीकृष्ण जी के दर्शन करता है, वह वैकुंठ में देव-पद का भागी बनता है। वह वैकुंठ में भी श्रीकृष्ण जी का निकट्य प्राप्त करता है अथवा वहाँ भी उनके साथ-साथ झूलने का सौभाग्य प्राप्त होता है। वास्तव में श्रीकृष्ण जी के दर्शन का मतलब है ‘श्री कृष्ण जी की जीवन कहानी का वास्तविक ज्ञान।

7-जो मनुष्य स्वयं को ज्ञान के रंग में रंगता है , उसे वैकुंठ में झूलते हुए श्रीकृष्ण के दर्शन तो होते ही हैं।वह तो इस दुनिया में रहते हुए भी मानो नहीं रहता बल्कि वैकुंठ में श्रीकृष्ण को झूलता देखता है। इतना ही नहीं, वह तो स्वयं भी ज्ञान-आनन्द के झूले में झूलता है। जो एक बार उस झूले में झूलता है, उसे विषय-विकार फिर अपनी ओर आकर्षित नहीं करते। उसके लिए होली का उत्सव ' मंथन' (ज्ञान–मंथन) उत्सव है।

क्या पुराण की घटनाएं इतिहास नहीं बल्कि मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित सत्य है?-

25 FACTS;-

1- सभी शास्त्र कोड लैंग्वेज में लिखे गए है ;जिन्हे डिकोड करना पड़ता है।पुराण भी महाकाव्य है,इतिहास नहीं। पुराण में जो हुआ है, वह कभी हुआ है ऐसा नहीं, वरन सदा होता रहता है।पुराण शाश्वत है।पुराण में किन्हीं घटनाओं का अंकन नहीं है, वरन किन्हीं सत्यों की

ओर इंगित किया गया है।ऐसा कभी हुआ था कि नास्तिक के घर आस्तिक का जन्म हुआ... ऐसा नहीं, सदा ही नास्तिकता में ही आस्तिकता का जन्म होता है और होने का उपाय ही नहीं है।

2-आस्तिक की तरह तो कोई पैदा हो ही नहीं सकता, पैदा तो सभी नास्तिक की तरह होते हैं। फिर उसी नास्तिकता में आस्तिकता का फूल लगता है। तो नास्तिकता आस्तिकता की मां है, पिता है। नास्तिकता के गर्भ से ही आस्तिकता का आविर्भाव होता है।पुराण में जिस तरफ

इशारा है, वह रोज होता है, प्रतिपल होता है, तुम्हारे भीतर हुआ है, तुम्हारे भीतर हो रहा है। और जब भी कभी मनुष्य होगा, कहीं भी मनुष्य होगा, पुराण का सत्य दोहराया जाएगा। पुराण सार/निचोड़ है, घटनाएं , इतिहास , मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित सत्य है।

3-साधारणत : हम समझते है कि नास्तिक ,आस्तिक का विरोधी है।नास्तिकता को आस्तिकता का पता नहीं है।यह गलत है। नास्तिकता आस्तिकता से अपरिचित है, मिलन नहीं हुआ।लेकिन विरोध में नहीं हो सकती , क्योंकि आस्तिकता तो नास्तिकता के भीतर से ही आविर्भूत होती है।नास्तिकता तो बीज की तरह है और आस्तिकता उसी का अंकुरण है। बीज का अभी अपने अंकुर से मिलना नहीं हुआ और हो भी कैसे सकता है क्योंकि जब अंकुर होगा तो बीज न होगा। जब तक बीज है तब तक अंकुर नहीं है। अकुंर तो तभी होगा जब बीज टूटेगा और भूमि में खो जाएगा।

4-जब तक बीज है तब तक अंकुर हो नहीं सकता। यह विरोधाभासी बात हमें समझ लेनी

चाहिए।बीज से ही अंकुर पैदा होता है, लेकिन बीज के विसर्जन से, बीज के खो जाने से, बीज के तिरोहित हो जाने से। बीज तो अंकुर की सुरक्षा है। वह जो खोल बीज की है, वह भीतर अंकुर को ही सम्हाले हुए है—ठीक समय के लिए, ठीक ऋतु के लिए, ठीक अवसर की तलाश में। लेकिन, बीज को अंकुर का कुछ पता नहीं है। अंकुर का पता हो भी नहीं सकता। और इसी अज्ञान में बीज,अपने को बचाने का संघर्ष भी कर सकता है ।वह डरेगा, भयभीत होगा..कि टूट न जाऊं, खो न जाऊं, मिट न जाऊं! । उसे पता नहीं कि उसी की मृत्यु से महाजीवन का सूत्र उठेगा। उसे पता नहीं, उसी की राख से फूल उठनेवाले हैं। इसलिए बीज क्षमायोग्य है, दयायोग्य है। बीज बचाने की कोशिश करता है। यह स्वाभाविक है... अज्ञान में।

5-हिरण्यकश्‍यप पिता है। पिता से ही पुत्र आता है। पुत्र पिता में ही छिपा है। पिता बीज है। पुत्र उसी का अंकुर है। हिरण्यकश्‍यप को भी पता नहीं कि मेरे घर भक्त पैदा होगा। वह सोच भी नहीं सकता कि मेरे प्राणों से आस्तिकता जन्मेगी ...इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन प्रहलाद जन्मा हिरण्यकश्‍यप से। हिरण्यकश्‍ययप ने अपने को बचाने की चेष्टा शुरू कर दी। घबड़ा गया होगा। डरा होगा कि यह छोटा-सा अंकुर था प्रहलाद, फिर यह अपना ही था, इससे भय भी क्या था। लेकिन जीवनभर की मान्यताएं, जीवनभर की धारणाएं दांव पर लग गई होंगी।

6-हर पिता बेटे से लड़ता है।हर बेटा पिता के खिलाफ बगावत करता है।और ऐसा पिता और बेटे का ही सवाल नहीं है ..हर आज 'बीते कल 'के खिलाफ बगावत है। वर्तमान अतीत से छुटकारे की चेष्टा है। अतीत पिता है, वर्तमान पुत्र है। बीते कल से तुम्हारा आज पैदा हुआ है। बीता कल जा चुका, फिर भी उसकी पकड़ गहरी है, विदा हो चुका, फिर भी तुम्हारी गर्दन पर उसकी फांस है। तुम उससे छूटना चाहते हो : अतीत भूल-जाए, विस्मृत हो जाए। पर अतीत तुम्हें ग्रसता है, पकड़ता है।

7-वर्तमान अतीत के प्रति विद्रोह है। अतीत से ही आता है वर्तमान, लेकिन अतीत से मुक्त न

हो तो दब जाएगा, मर जाएगा।हर बेटा पिता से पार जाने की कोशिश है।तुम प्रतिपल अपने अतीत से लड़ रहे हो–वह पिता से संघर्ष है।सम्प्रदाय अतीत है, धर्म वर्तमान है।

इसलिए जब भी कोई धार्मिक व्यक्ति पैदा होगा, सम्प्रदाय से संघर्ष निश्चित ही होगा । सम्प्रदाय यानी हिरण्यकश्यप, धर्म यानी प्रहलाद।निश्चित ही हिरण्यकश्यप शक्तिशाली है, प्रतिष्ठित है।सब ताकत उसके हाथ में है। प्रहलाद की सामर्थ्य क्या है ..केवल एक नया-नया उगा, कोमल अंकुर है।सारी शक्ति तो अतीत की है,

8- क्या बल है वर्तमान का ..वह तो अभी- नया-नया आया है, ताजा है।पर मजा यही है कि वर्तमान जीतेगा और अतीत हारेगा, क्योंकि वर्तमान जीवन्तता है और अतीत मौत है।

हिरण्यकश्यप के पास सब था–फौज-फांटे थे, पहाड़-पर्वत थे। वह जो चाहता, करता। जो चाहा उसने करने की कोशिश भी की, फिर भी हारता गया। शक्ति नहीं जीतती, जीवन जीतता है। प्रतिष्ठा नहीं जीतती, सत्य जीतता है। सम्प्रदाय पुराने हैं।जीसस पैदा हुए, बहुत

पुराना सम्प्रदाय था, सूली लगा दी जीसस को। लेकिन मार कर भी नहीं मार पाए। इसीलिए पुराण की कथा है कि फेंका प्रहलाद को पहाड़ से, डुबाया नदी में–नहीं डुबा पाए,जलाया आग में–नहीं जला पाए।

9-इससे तुम यह मत समझ लेना कि किसी को तुम आग में जलाओगे तो वह न जलेगा।यह केवल एक बड़ा प्रतीक है .. तथ्य नहीं है, सत्य है।तुम अगर यह सिद्ध करने निकल

जाओ कि आग जला न पाई प्रहलाद को, तो तुम गलती में , भूल में पड़ जाओगे,और तुम्हारी दृष्टि भ्रान्त हो जाएगी। तुम अगर यह समझो कि पहाड़ से फेंका और चोट न खाई, तो तुम गलती में पड़ जाओगे। क्योंकि बात इससे कहीं बहुत गहरी है। यह कोई ऊपर की चोटों की

बात नहीं है।क्योंकि हम जानते हैं, जीसस को सूली लगी, जीसस मर गए।सुकरात को जहर दिया, सुकरात मर गए। लेकिन क्या सच में मर गए या प्रतीत हुआ कि मर गए? जीसस अब भी जिंदा है–मारनेवाले मर गए। सुकरात अभी भी जिंदा है–जहर पिलानेवालों का कोई पता नहीं।

10-सुकरात ने कहा था कि ''ध्यान रखो कि तुम मुझे मारकर भी न मार पाओगे, और तुम्हारे नाम की अगर कोई याद रहेगी तो सिर्फ मेरे साथ, कि तुमने मुझे जहर दिया था, तुम जियोगे भी ...तो मेरे नाम के साथ''। निश्वित ही आज सुकरात के मारनेवालों का अगर कहीं कोई नाम है तो बस इतना ही कि सुकरात को उन्होंने मारा था।थोड़ा सोचने की बात है कि क्या

हिरण्यकश्यप का नाम होता, प्रहलाद के बिना? उसका नाम प्रहलाद के कारण ही हैं। अन्यथा कितने हिरण्यकश्यप होते हैं, होते रहते हैं।

11-जीसस को हम मारकर भी मार न पाए–इतना ही अर्थ है। जीवन को मिटाकर भी तुम मिटा नहीं सकते। सत्य को तुम छिपाकर भी छिपा नहीं सकते, दबाकर भी दबा नहीं सकते। उभरेगा, हजार-हजार रूपों में वह उभरेगा; हजार-हजार गुना बलशाली होकर उभरेगा। लेकिन सदा यह भ्रम है कि ताकत तो अतीत ,समाज , सम्प्रदाय और राज्य के हाथ में होती है। जब कोई धार्मिक व्यक्ति पैदा होता है तो कोंपल-सा कोमल होता है; लगता है जरा-सा धक्का दे देंगे, मिट जाएगा, लेकिन आखिर में वही जीतता है। उस कोमल-सी कोंपल की चोट से महासाम्राज्य गिर जाते हैं।

12-क्या बल है निर्बल का.. लेकिन निर्बल के बल राम होते हैं । कुछ एक शक्ति है, जो व्यक्ति की नहीं है, परमात्मा की है। वही तो भक्त का अर्थ है। भक्त का अर्थ है जिसने कहा,’’ मैं नहीं हूं, तू है’’ ।भक्त ने कहा,’’ अब जले तो तू जलेगा; मरे तो तू मरेगा; हारे तो तू हारेगा;

जीते तो तू जीतेगा। हम बीच से हटे जाते हैं।भक्त का इतना ही अर्थ है कि भक्त बांस की पोंगरी की भांति हो गया।भगवान से कहता है,’’ गाना हो गा लो, न गाना हो न गाओ–गीत तुम्हारे हैं.. मैं सिर्फ बांस की पोंगरी हूं। तुम गाओगे तो बांसुरी जैसा मालूम होऊंगा; तुम न गाओगे तो बांस की पोंगरी रह जाऊंगा। गीत तुम्हारे हैं, मेरा कुछ भी नहीं। हां, अगर गीत में कोई बाधा पड़े, सुर भंग हो, तो मेरी भूल समझ लेना–बांस की पोंगरी कहीं इरछी-तिरछी है; जो मिला था उसे ठीक-ठीक बाहर न ला पाई; जो पाया था उसे अभिव्यक्त न कर पाई। भूल अगर हो जाए तो मेरी समझ लेना। लेकिन अगर कुछ और हो, सब तुम्हारा है’’।

13-भक्त का इतना ही अर्थ है।नास्तिकता में ही आस्तिक पैदा होगा।हम सभी नास्तिक है ।

हिरण्यकश्यप बाहर नहीं है, न ही प्रहलाद बाहर है। हिरण्यकश्यप और प्रहलाद दो नहीं हैं–प्रत्येक व्यक्ति के भीतर घटनेवाली दो घटनाएं हैं। जब तक तुम्हारे मन में संदेह है–हिरण्यकश्यप है–तब तक तुम्हारे भीतर उठते श्रद्धा के अंकुरों को तुम पहाड़ों से गिराओगे, पत्थरों से दबाओगे, पानी में डुबाओगे, आग में जलाओगे–लेकिन तुम जला न पाओगे। उनको जलाने की कोशिश में तुम्हारे ही हाथ जल जाएंगे।

14-कितनी बार तुम्हारे मन में श्रद्धा का भाव उठता है,लेकिन संदेह झपटकर पकड़ लेता है। कितनी बार तुम किनारे आ जाते हो ..छलांग लगाने के, संदेह पैर में जंजीर बनकर रोक लेता है, ''क्या कर रहे हो! कुछ घर-द्वार की सोचो! कुछ परिवार की सोचो! कुछ धन, प्रतिष्ठा,

पद की सोचो! कुछ संसार की सोचो! क्या कर रहे हो?'' पैर रुक जाते हैं।सोचते

हो, कल कर लेंगे, इतनी जल्दी क्या है..कितनी बार तुम्हारे भीतर क्रांति का झंझावात आता है और तुम बार- बार संदेह का साथ पकड़कर रुक जाते हो! यह कथा कुछ पुराण में खोजने की नहीं है। यह तुम्हारे प्राण में ,भीतर खोजने की है।यह पुराण तुम्हारे प्राणों में लिखा हुआ है।

15-संदेह भी है तुम्हारे भीतर ,और श्रद्धा भी है तुम्हारे भीतर, भाव भी है तुम्हारे भीतर, दोनों ही द्वार खुले हैं। हिरण्यकश्‍यप, प्रहलाद दोनों ने पुकारा है—किसकी सुनोगे? कारण क्या है कि तुम बार-बार संदेह की ही सुन लेते हो ? क्योंकि संदेह बलशाली मालूम होता है। सारा समाज, संसार साथ मालूम होता है। श्रद्धा निर्बल करती मालूम होती है क्योकि अकेले जाना

होगा।संदेह के राजपथ हैं...वहां भीड़ साथ है। श्रद्धा की पगडंडियां हैं, वहां तुम एकदम अकेले हो जाते हो, 'एकाकी'। वही एकाकी हो जाना संन्यास है। अकेले होने का साहस ही श्रद्धा में ले जा सकता है।

16-हिरण्यकश्‍यप बलशाली है ...वही उसकी निर्बलता सिद्ध हुई। प्रहलाद बिलकुल निर्बल है—वही उसका बल सिद्ध हुआ। लेकिन वह चलता रहा। उसका गीत ,उसका भजन ..न रुका। पिता के विपरीत भी चलता रहा!संदेह श्रद्धा का पिता है, शत्रु नहीं है।संदेह से ही श्रद्धा

जन्मती है।और संदेह हजार चेष्टा करेगा कि श्रद्धा जन्मे न, क्योंकि श्रद्धा अगर जन्मी तो संदेह को खोना पड़ेगा, मिटना पड़ेगा। तो संदेह लड़ेगा आखिरी दम तक। उसी लड़ाई में वह विध्यंस करता है।

17-अब यह भी समझना जरूरी है कि संदेह की क्षमता सिर्फ विध्यंस की है, सृजन की नहीं है। संदेह मिटा सकता है, बना नहीं सकता। संदेह के पास सृजनात्मक ऊर्जा नहीं है। वह 'नहीं' कह सकता है, क्योकि 'हां' उसके प्राणों में उठती ही नहीं है। और बिना 'हां' के जगत में कुछ निर्मित नहीं होता। सारा सृजन 'हां 'से है,और सारा विध्यंस 'नहीं' से है। तो 'नहीं' हिंसात्मक है,और 'हां 'अहिंसात्मक है। संदेह 'नहीं' कहे चले जाता है, मिटाने के उपाय सुझा देता है। कहता है,’’ यह छोटा-सा बालक श्रद्धा का ...गिरा दो पहाड़ से! समाप्त करे यह झंझट डुबा दो पानी में! आग में जला दो’’ !

18-मगर ध्यान रखना, जब भी सृजन और विध्यंस का संघर्ष होगा, विध्यंस हारेगा, सृजन जीतेगा। क्योंकि सृजन परमात्मा की ऊर्जा है। जब भी हां और ना में संघर्ष होगा, हां जीतेगी, ना हारेगी। ना में बल ही क्या है? कितनी ही बलशाली दिखाई पड़ती हो, लेकिन सारा बल

नकार का है। बल नहीं है,केवल झूठा दावा है।जब भी तुम किसी बात पर 'नहीं 'कहते हो तो बड़ी शक्‍ति मालूम पड़ती है । और जब भी तुम 'हां' कहते हो, ऐसा लगता है कहनी पड़ी।उदाहरण के लिए, एक छोटा बच्चा मां से कहता है कि जरा बाहर खेल आऊं ..परन्तु ”नहीं’’ ! बाहर खेल के लिए कह रहा था, कुछ’’ नहीं’’ कहने की बात भी न थी लेकिन ''नहीं’’ के साथ बल है।

19- जब तुम्हें’’ नहीं’’ कहने का मौका मिलता है तो तुम छोड़ते नहीं। क्योंकि’’ नहीं’’ कहने से लगता है,’’ देखो! अटका दिया! मेरे पर निर्भर हो..।''नहीं’’ के साथ एक नकार बल की प्रतीति

होती है जो कि झूठा है, वह असली बल नहीं है। अब इसे तुम खयाल करो। अगर तुम असली बलशाली हो तो तुम’’ नहीं’’ कहने से बल इकट्ठा करोगे । जहां बल है, वहां ''नहीं’’ की जरूरत

या प्रयोजन ही नहीं है।जहां वास्तविक शक्‍ति है वहां तो’’ हां’’ से भी शक्‍ति ही प्रगट होती है। लेकिन तुम्हारी तकलीफ यह है कि वास्तविक शक्‍ति नहीं है,’’ नहीं’’ कहते हो, तो ही थोड़ी- सी झंझट खड़ी करके तुम शक्‍ति का अनुभव कर पाते हो।’’ हां’’ कहते हो, तो लगता है हां कहनी पड़ी .. ''हां’’ तुम मजबूरी में कहते हो। तुम्हें ''हां’’ कहने का सलीका न आया। तुम्हारे पास ताकत नहीं है।

20-हिरण्यकश्‍यप प्रहलाद के सामने कमजोर मालूम होने लगा होगा। आनंद के सामने दुख सदा ही कमजोर हो जाता है। दुख नकार है.. आनंद सकारात्मक ऊर्जा का आविर्भाव है। दुख में कभी कोई फूल नहीं खिलते हैं,केवल कांटे ही लगते हैं। प्रहलाद के फूल के सामने हिरण्यकश्‍यप का कांटा शर्मिंदा हो उठा होगा, लज्जा से भर गया होगा, वह ईष्या से जल गया होगा। यह ताजगी, यह सुगंध, यह संगीत, ये प्रहलाद के भगवान के नाम पर गाए गए गीत—उसे बहुत बेचैन करने लगे होंगे। वह घबड़ाने लगा। उसकी सांसें घुटने लगीं। उसे एकबारगी वही सूझा जो सूझता है नकार को, नास्तिक को, निर्बल- दुर्बल को ..वही सूझा उसे कि 'मिटा दो इसे'।केवल विध्वंस सूझा।

21-दुनिया में दो तरह के बल हैं ... दो उपाय हैं शक्‍ति अनुभव करने के—या तो सृजन या विध्यंस। अगर तुम सृजन के द्वारा शक्‍ति अनुभव न कर सके, तो फिर विध्वंस के द्वारा शक्‍ति अनुभव करोगे। हिटलर, मुसोलिनी, नेपोलियन और सिकंदर, ये विध्वंस के द्वारा शक्‍ति अनुभव कहते हैं, बुद्ध, सुकरात, जीसस, सृजन के द्वारा शक्‍ति अनुभव करते हैं।

शायद तुम्हें पता न हो... हिटलर मूलत: चित्रकार होना चाहता था। उसने आर्ट-अकेडमी में अर्जी भी दी थी, लेकिन स्वीकार न हुई। वह कुछ बनाना चाहता था–''चित्र''.. और वह चोट उसे भारी पड़ी। सारी जीवन-ऊर्जा उसकी विध्यंस से उलझ गई।

22-इतने लाखों लोगों की हत्या के बाद भी रात जब उसे फुर्सत मिलती थी तो वह चित्र बनाता था। डांवाडोल था। हिटलर ने लिखा है कि ''आदमी को मारकर, मिटाकर भी अपने बल का

अनुभव होता है।बना नहीं सकता, मिटा तो सकता हूं।''सकने’’ का पता चलता है।चलो, उतनी ऊंचाई न सही बनाने की, लेकिन मिटाने की ऊंचाई तो हो ही सकती है!''

23-वास्तव में,नास्तिकता विध्बंसात्मक है; आस्तिकता सृजनात्मक है। और आस्तिक और नास्तिक में जब भी संघर्ष होगा, नास्तिक की हार सुनिधित है। हां, आस्तिक असली होना चाहिए। कभी अगर तुम नास्तिक को जीतता हुआ देखो तो उसका केवल इतना ही अर्थ होता है कि आस्तिक नकली है।नकली आस्तिकता से तो असली नास्तिकता भी जीत जाएगी, कम-से-कम असली तो है! इतना सत्य तो है वहां कि असली है और सत्य ही जीतता है।

तुम्हारी आस्तिकता अगर झूठी है तो नास्तिकता से हारेगी, तो तुम नास्तिक से डरोगे। तुम्हारी आस्तिकता अगर सच्ची है तो नास्तिक को करने दो विध्यंस, कर-करके खुद ही टूट जाएगा , हार जाएगा।

24-प्रहलाद अपने गीत गाए चला गया; अपनी गुनगुन उसने जारी रखी; अपने भजन में उसने अवरोध न आने दिया। पहाड़ से फेंका, पानी में डुबाया, आग में जलाया–लेकिन उसकी आस्तिकता पर आच न आई। उसके आस्तिक प्राणों में पिता के प्रति दुर्भाव पैदा न हुआ।

जिस क्षण तुम्हारे मन में दुर्भाव आ जाए, उसी क्षण आस्तिक मर गया।जीसस को सूली

लगी।अंतिम क्षण में उन्होंने कहा,''हे परमात्मा! इस सभी को माफ कर देना, क्योंकि ये जानते नहीं क्या कर रहे हैं। ये नासमझ हैं। कहीं ऐसा न हो कि तू इनको दण्ड दे दे। ये दया के योग्‍य हैं, दण्ड के योग्य नहीं''।

25-शरीर मर गया, जीसस को मारना मुश्किल है। इस आस्त्किता को कैसे मारोगे; किस सूली पर लटकाओगे, किस आग में जलाओगे? यही अर्थ है कि हिरण्यकश्यप की बहन है

अग्नि–वह बहन है,वह छाया की तरह साथ लगी है।और आश्वर्य तो यही है कि वह सभी जगह बच जाता है और प्रभु के गुण गाता है।जिसे प्रभु का गुणगान आ गया, जिसने एक बार उस स्वाद को चख लिया, फिर उसे कोई आग दुखी नहीं कर सकती। जिसने एक बार उसका

सहारा पकड़ लिया,फिर उसे कोई बेसहारा नहीं कर सकता।स्वभावत: तब से इस देश में उस परम विजय के दिन को हम उत्सव की तरह मनाते रहे हैं। होली जैसा उत्सव पृथ्वी पर खोजने से न मिलेगा।रंग गुलाल है, आनंद उत्सव है ...तल्लीनता का, मदहोशी का, मस्ती का, नृत्य का -बड़ा सतरंगी उत्सव है।

....SHIVOHAM...