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ज्ञान तो सिर्फ एक ही है, ''स्वयं का ज्ञान'' बाकी सब परिचय है?


क्या अर्थ है ''स्वयं ज्ञान'' का?-

17 FACTS;-

1-भगवतगीता में श्रीकृष्ण कहते है ''हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन, यज्ञों के परिणामरूप ज्ञानामृत को भोगने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं और यज्ञरहित पुरुष को यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है, तो फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा''?इस सूत्र में

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि जिनका जीवन यज्ञरूप है अथार्त वासनारहित, अहंकारशून्य, है;ऐसे पुरुष परात्पर ब्रह्म को उपलब्ध होते हैं, अमृत को , आनंद को उपलब्ध होते हैं। लेकिन जिनका जीवन यज्ञ नहीं है, ऐसे पुरुष तो इस पृथ्वी पर ही आनंद को उपलब्ध नहीं होते,तो परलोक की बात करनी तो व्यर्थ है।

2-तो पहली बात,जीवन के यज्ञ बन जाने का क्या अर्थ है... वास्तव में, जब तक जीवन स्वयं के अहंकार और वासनाओं के आस-पास घूमता है, तब तक जीवन यज्ञ नहीं होता।जैसे ही व्यक्ति वासनाओं को क्षीण करता है तो स्वयं के आस-पास नहीं, परमात्मा के आस-पास परिभ्रमण करने लगता है…।उदाहरण के लिए हम हजारों बार मंदिर में गए होंगे और वेदी के आस-पास परिक्रमा लगाकर घर लौट आए होंगे।लेकिन उसके अर्थ को हम नहीं जानते।

3-मंदिर में परमात्मा की वेदी के आस-पास जो परिक्रमा है, वह प्रतीक है उस पुरुष का, जिसका अपना अहंकार नहीं रहा, जो अब परमात्मा के आस-पास ही जीवन में परिभ्रमण करता है/चारों ओर घूमता है।क्योंकि अब अपना कोई केंद्र नहीं रहा, जिस पर वह घूम सके तो परमात्मा का उपग्रह बन जाता है। परमात्मा केंद्र में हो जाता है,और हम हो जाते है परिधि

पर;उसके आस-पास ही घूमते हैं।जैसे ही कोई व्यक्ति वासना और अहंकार से शून्य होता है, उसका जीवन यज्ञ हो जाता है।

4-दूसरी बात, श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा पुरुष ज्ञानरूपी अमृत को उपलब्ध होता है।वास्तव में,

इस जगत में अज्ञान के अतिरिक्त और कोई मृत्यु नहीं है।अज्ञान ही अज्ञानरूपी विष,

अज्ञानरूपी मृत्यु है; इग्नोरेंस इज़ डेथ।इसका अर्थ है कि अगर अज्ञान मृत्यु है, तो ही ज्ञान अमृत हो सकता है।वास्तव में, मृत्यु कहीं है ही नहीं। हम नहीं जानते हैं, इसलिए मृत्यु मालूम पड़ती है।मृत्यु इस पृथ्वी पर सर्वाधिक असंभव घटना है, जो हो ही नहीं सकती, जो कभी हुई नहीं, जो कभी होगी भी नहीं। लेकिन रोज यह मृत्यु हमें मालूम पड़ती है, क्योंकि हम जानते नहीं हैं। हम अंधेरे में खड़े हैं, अज्ञान में खड़े हैं। जो नहीं मरता, वह मरता हुआ दिखाई पड़ता है। इस अर्थ में अज्ञान ही मृत्यु है।और जिस दिन हम जान लेते हैं, उस दिन मृत्यु तिरोहित हो जाती है। अमृत ही, अमृतत्व शेष रह जाता है, इम्मारटेलिटी ही शेष रह जाती है।

5-अगर कोई पूछे कि , आपने किसी आदमी को मरते देखा है तो आप कहेंगे, बहुत लोगों को देखा है। पर सत्य ये है कि आज तक किसी व्यक्ति ने किसी को मरते नहीं देखा। मरने की प्रक्रिया आज तक नहीं देखी गई। जो हम देखते हैं, वह केवल जीवन के विदा हो जाने की

प्रक्रिया है, मरने की नहीं।हमने बटन दबाई , बिजली का बल्ब बुझ गया। जो नहीं जानता, वह कहेगा, बिजली मर गई। जो जानता है, वह कहेगा, बिजली अभिव्यक्त थी, अब अप्रकट हो गई। प्रकट थी, अप्रकट हो गई; मर नहीं गई। फिर बटन दबेगा, बिजली फिर वापस लौट आएगी। फिर बटन दबाएंगे, बिजली फिर भीतर तिरोहित हो जाएगी।

6-जीवन समाप्त नहीं होता, केवल शरीर से विदा होता है। लेकिन विदाई हमें मृत्यु मालूम पड़ती है। क्योंकि हमने कभी अपने भीतर शरीर से अलग किसी अस्तित्व का अनुभव नहीं किया है। हमारा अनुभव यही है कि मैं शरीर हूं, इसलिए जब शरीर समाप्त होगा, जलाने के योग्य हो जाएगा, तब स्वभावतः निष्कर्ष होगा कि मर गए।शरीर से अलग जिसने अपने

भीतर किसी तत्व को नहीं जाना, वह अज्ञानी है। अज्ञानी का मतलब यह नहीं कि जिसे यूनिवर्सिट