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ध्यान और समाधि के प्रायोगिक रहस्य


जीवन क्या है, मनुष्य इसे भी नहीं जानता है। और जीवन को ही हम न जान सकें, तो मृत्यु को जानने की तो कोई संभावना ही शेष नहीं रह जाती। जीवन ही अपरिचित और अज्ञात हो, तो मृत्यु परिचित और ज्ञात नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि चूंकि हमें जीवन का पता नहीं, इसलिए ही मृत्यु घटित होती प्रतीत होती है। जो जीवन को जानते 'हैं, उनके लिए मृत्यु एक असंभव शब्द है, जो न कभी घटा, न घटता है, न घट सकता है। जगत में कुछ शब्द बिलकुल ही झूठे हैं, उन शब्दों में कुछ भी सत्य नहीं है। उन्हीं शब्दों में मृत्यु भी एक शब्द है, जो नितांत असत्य है। मृत्यु जैसी घटना कहीं भी नहीं घटती। लेकिन हम लोगों को तो रोज मरते देखते हैं, चारों तरफ रोज मृत्यु घटती हुई मालूम होती है। गांव—गांव में मरमट हैं। और ठीक से हम समझें तो ज्ञात होगा कि जहां—जहां हम खड़े हैं, वहां —वहां न मालूम कितने मनुष्यों की अर्थी जल चुकी है। जहां हम निवास बनाए हुए हैं, उस भूमि के सभी स्थल मरघट रह चुके हैं।

करोड़ों —करोड़ों लोग मरे हैं, रोज मर रहे हैं, और अगर मैं यह कहूं कि मृत्यु जैसा झूठा शब्द नहीं है मनुष्य की भाषा में, तो आश्चर्य होगा। एक फकीर था तिब्बत में मारपा। उस फकीर के पास कोई गया और पूछने लगा कि मैं जीवन और मृत्यु के संबंध में कुछ पूछने आया हूं। मारपा बहुत हंसने लगा और उसने कहा, अगर जीवन के संबंध में पूछना हो, तो जरूर पूछो, क्योंकि जीवन का मुझे पता है। रही मृत्यु, तो मृत्यु से आज तक मेरा कोई मिलना नहीं हुआ,मेरी कोई पहचान नहीं है। मृत्यु के संबंध में पूछना हो, तो उनसे पूछो जो मरे ही हुए हैं या मर चुके हैं। मैं तो जीवन हूं मैं जीवन के संबंध में बोल सकता हूं,बता सकता हूं। मृत्यु से मेरा कोई परिचय नहीं।

यह बात वैसी ही है जैसी आपने सुनी होगी कि एक बार अंधकार ने भगवान से जाकर प्रार्थना की थी कि यह सूरज तुम्हारा, मेरे पीछे बहुत बुरी तरह पड़ा हुआ है। मैं बहुत थक गया हूं। सुबह से मेरा पीछा होता है और सांझ मुश्किल से मुझे छोड़ा जाता है। मेरा कसूर क्या है? दुश्मनी कैसी है यह? यह सूरज क्यों मुझे सताने के लिए मेरे पीछे दिन —रात दौड़ता रहता है? और रात भर में मैं दिन भर की थकान से विश्राम भी नहीं कर पाता हूं कि फिर सुबह सूरज द्वार पर आकर खड़ा हो जाता है। फिर भागो! फिर बची! यह अनंत काल से चल रहा है। अब मेरी धैर्य की सीमा आ गई और मैं प्रार्थना करता हूं? इस सूरज को समझा दें।

सुनते हैं, भगवान ने सूरज को बुलाया और कहा कि तुम अंधेरे के पीछे क्यों पड़े हो? क्या बिगाड़ा है अंधेरे ने तुम्हारा? क्या है शत्रुता? क्या है शिकायत? सूरज कहने लगा, अंधेरा! अनंत काल हो गया मुझे विश्व का परिभ्रमण करते हुए, लेकिन अब तक अंधेरे से मेरी कोई मुलाकात नहीं' हुई। अंधेरे को मैं जानता ही नहीं। कहां है अंधेरा? आप उसे मेरे सामने बुला दें, तो मैं क्षमा भी मांग लूं और आगे के लिए पहचान लूं कि वह कौन है ताकि उसके प्रति कोई भूल न हो सके।

इस बात को हुए भी अनंत काल हो गए। भगवान की फाइल में यह बात वहीं की वहीं पड़ी है। वह अब तक अंधेरे को सूरज के सामने नहीं बुला सके हैं। नहीं बुला सकेंगे। यह मामला हल नहीं होने का है। सूरज के सामने अंधकार कैसे बुलाया जा सकता है? अंधकार की कोई सत्ता ही नहीं है, कोई एग्झिस्टेंस नहीं है। अंधकार की कोई पॉजिटिव, कोई विधायक स्थिति नहीं है। अंधकार तो सिर्फ प्रकाश के अभाव का नाम है। वह तो प्रकाश की गैर मौजूदगी है, वह तो एबसेस है, वह तो अनुपस्थिति है। तो सूरज के सामने ही सूरज की अनुपस्थिति को कैसे बुलाया जा सकता है?

नहीं! अंधकार को सूरज के सामने नहीं लाया जा सकता है। सूरज तो बहुत बड़ा है, एक छोटे से दीये के सामने भी अंधकार को लाना मुश्किल है। दीये के प्रकाश के घेरे में अंधकार का प्रवेश मुश्किल है। दीये के सामने मुठभेड़ मुश्किल है। प्रकाश है जहां, वहां अंधकार कैसे आ सकता है! जीवन है जहां, वहां मृत्यु कैसे आ सकती है! या तो जीवन है ही नहीं, और या फिर मृत्यु नहीं है। दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं।

हम जीवित हैं, लेकिन हमें पता नहीं कि जीवन क्या है। इस अज्ञान के कारण ही हमें ज्ञात होता है कि मृत्यु भी घटती है। मृत्यु एक अज्ञान है। जीवन का अज्ञान ही मृत्यु की घटना बन जाती है। काश! हम उस जीवन से परिचित हो सकें जो भीतर है, तो उसके परिचय की एक किरण भी सदा—सदा के लिए इस अज्ञान को तोड़ देती है कि मैं मर सकता हूं, या कभी मरा हूं, या कभी मर जाऊंगा। लेकिन उस प्रकाश को हम जानते नहीं हैं जो हम हैं, और उस अंधकार से हम भयभीत होते हैं जो हम नहीं हैं। उस प्रकाश से हम परिचित नहीं हो पाते जो हमारा प्राण है, जो हमारा जीवन है, जो हमारी सत्ता है; और उस अंधकार से हम भयभीत होते हैं, जो हम नहीं हैं।

मनुष्य मृत्यु नहीं है, मनुष्य अमृत है। समस्त जीवन अमृत है। लेकिन हम अमृत की ओर आख ही नहीं उठाते हैं। हम जीवन की तरफ, जीवन की दिशा में कोई खोज ही नहीं करते हैं, एक कदम भी नहीं उठाते। जीवन से रह जाते हैं अपरिचित और इसलिए मृत्यु से भयभीत प्रतीत होते हैं। इसलिए प्रश्न जीवन और मृत्यु का नहीं है, प्रश्न है सिर्फ जीवन का।

मुझे कहा गया है कि मैं जीवन और मृत्यु के संबंध में बोलूं। यह असंभव है बात। प्रश्न तो है सिर्फ जीवन का और मृत्यु जैसी कोई चीज ही नहीं है। जीवन ज्ञात होता है, तो जीवन रह जाता है। और जीवन शात नहीं होता, तो सिर्फ मृत्यु रह जाती है। जीवन और मृत्यु दोनों एक साथ कभी भी समस्या की तरह खड़े नहीं होते। या तो हमें पता है कि हम जीवन हैं, तो फिर मृत्यु नहीं है। और या हमें पता नहीं है कि हम जीवन हैं, तो फिर मृत्यु ही है, जीवन नहीं है। ये दोनों बातें एक साथ मौजूद नहीं होती हैं, नहीं हो सकती हैं। लेकिन हम सारे लोग तो मृत्यु से भयभीत हैं।

मृत्यु का भय बताता है कि हम जीवन से अपरिचित हैं। मृत्यु के भय का एक ही अर्थ है —जीवन से अपरिचय। और जीवन हमारे भीतर प्रतिपल प्रवाहित हो रहा है —श्वास—श्वास में, कण—कण में, चारों ओर, भीतर—बाहर सब तरफ जीवन है और उससे ही हम अपरिचित हैं। इसका एक ही अर्थ हो सकता है कि आदमी किसी गहरी नींद में है। नींद में ही हो सकती है यह संभावना कि जो हम हैं, उससे भी अपरिचित हों। इसका 'एक ही अर्थ हो सकता है कि आदमी किसी गहरी मूर्च्छा में है। इसका एक ही अर्थ हो सकता है कि आदमी के प्राणों की पूरी शक्ति सचेतन नहीं है, अचेतन है, अनकाशस है, बेहोश है।

एक आदमी सोया हो तो उसे फिर कुछ भी पता नहीं रह जाता कि मैं कौन हूं? क्या हूं? कहां से हूं? नींद के अंधकार में सब डूब जाता है और उसे कुछ पता नहीं रह जाता कि मैं हूं भी या नहीं हूं? नींद का पता भी उसे तब चलता है, जब वह जागता है। तब उसे पता चलता है कि मैं सोया था, नींद में तो इसका भी पता नहीं चलता कि मैं सोया हूं। जब नहीं सोया था, तब पता चलता था कि मैं सोने जा रहा हूं। जब तक जागा हुआ था, तब तक पता था कि मैं अभी जागा हुआ हूं, सोया हुआ नहीं हूं। जैसे ही सो गया, उसे यह भी पता नहीं चलता कि मैं सो गया हूं। क्योंकि अगर यह पता चलता रहे कि मैं सो गया हूं,तो उसका यह अर्थ है कि आदमी जागा हुआ है, सोया हुआ नहीं है। नींद चली जाती है तब पता चलता है कि मैं सोया था, लेकिन नींद में पता नहीं चलता कि मैं हूं भी या नहीं हूं। जरूर मनुष्य को कुछ भी पता नहीं चलता है कि मैं हूं या नहीं हूं? या क्या हूं।

इसका एक ही अर्थ हो सकता है कि कोई बहुत गहरी आध्यात्मिक नींद, कोई स्प्रिचुअल हिप्नोटिक स्लीप, कोई आध्यात्मिक सम्मोहन की तंद्रा मनुष्य को घेरे हुए है। इसलिए उसे जीवन का ही पता नहीं चलता कि जीवन क्या है।

नहीं, लेकिन हम इनकार करेंगे। हम कहेंगे, कैसी आप बात करते हैं? हमें पूरी तरह पता है कि जीवन क्या है। हम जीते, हैं, चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं, सोते हैं।

एक शराबी भी चलता है, उठता है, बैठता है, चलता है, श्वास लेता है, आख खोलता है, बात करता है। एक पागल भी उठता है, बैठता है, सोता है,श्वास लेता है, बात करता है, जीता है। लेकिन इससे न तो शराबी होश में कहा जा सकता है और न पागल सचेतन है, यह कहा जा सकता है।

एक सम्राट की सवारी निकलती थी एक रास्ते पर। एक आदमी चौराहे पर खड़ा होकर पत्थर फेंकने लगा और अपशब्द बोलने लगा और गालियां बकने लगा। सम्राट की बड़ी शोभायात्रा थी। उस आदमी को तत्काल सैनिकों ने पकड़ लिया और कारागृह में डाल दिया। लेकिन जब वह गालियां बकता था और अपशब्द बोलता था, तो सम्राट हंस रहा था। उसके सैनिक हैरान हुए, उसके वजीरों ने कहा, आप हंसते क्यों हैं? उस सम्राट ने कहा, जहां तक मैं समझता हूं,उस आदमी को पता नहीं है कि वह क्या कर रहा है। जहां तक मैं समझता हूं वह आदमी नशे में है। खैर, कल सुबह उसे मेरे सामने ले आएं। कल सुबह वह आदमी सम्राट के सामने लाकर खड़ा कर दिया गया। सम्राट उससे पूछने लगा, कल तुम मुझे गालियां देते थे, अपशब्द बोलते थे, क्या था कारण उसका? उस आदमी ने कहा, मैँ! मैं और अपशब्द बोलता था! नहीं महाराज, मैं नहीं रहा होऊंगा, इसलिए अपशब्द बोले गए होंगे। मैं शराब में था, मैं बेहोश था, मुझे कुछ पता— नहीं कि मैंने क्या बोला, मैं नहीं था।

हम भी नहीं हैं। नींद में हम चल रहे हैं, बोल रहे हैं, बात कर रहे हैं, प्रेम कर रहे हैं, घृणा कर रहे हैं, युद्ध कर रहे हैं। अगर कोई दूर के तारे से देखे मनुष्य—जाति को, तो वह यही समझेगा कि सारी मनुष्य—जाति इस भांति व्यवहार कर रही है जिस तरह नींद में, बेहोशी में कोई व्यवहार करता हो। तीन हजार वर्षों में मनुष्य—जाति ने पंद्रह हजार युद्ध किए हैं। यह जागे हुए मनुष्य का लक्षण नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु तक की सारी कथा, चिंता की, दुख की,पीड़ा की कथा है। आनंद का एक क्षण भी उपलब्ध नहीं होता। आनंद का एक कण भी नहीं मिलता है जीवन में। खबर भी नहीं मिलती कि आनंद क्या है। जीवन बीत जाता है और आनंद की झलक भी नहीं मिलती। यह आदमी होश में नहीं कहा जा सकता है। दुख, चिंता, पीड़ा, उदासी और पागलपन—सारे जन्म से लेकर मृत्यु तक की कथा है।

लेकिन शायद हमें पता नहीं चलता, क्योंकि हमारे चारों तरफ भी हमारे जैसे ही सोए हुए लोग हैं। और कभी अगर एकाध जागा हुआ आदमी पैदा हो जाता है, तो हम सोए हुए लोगों को इतना क्रोध आता है उस जागे हुए आदमी पर कि हम बहुत जल्दी ही उस आदमी की हत्या कर देते हैं। हम ज्यादा देर उसे बर्दाश्त नहीं करते।

जीसस को हम इसीलिए सूली पर लटका देते हैं कि तुम्हारा कसूर है कि तुम जागे हुए आदमी हो। हम सोए हुए लोगों को तुम्हें देखकर बहुत अपमानित होना पड़ता है। हम सोए हुए आदमियों के लिए तुम एक अपमानजनक चिह्न बन जाते हो कि तुम सोए हुए लोग हो। तुम्हारी मौजूदगी हमारी नींद में बाधा डालती है। हम तुम्हारी हत्या कर देंगे। हम सुकरात को जहर पिलाकर मार डालते हैं, हम मैसूर की गरदन काट डालते हैं। हम जागे हुए आदमियों के साथ वही व्यवहार करते हैं, जो पागलों की बस्ती में उस आदमी के साथ होगा, जो पागल नहीं है। आपको इसका अंदाज नहीं है।

मेरे एक मित्र पागल थे। और वह एक पागलखाने में बंद कर दिए गए। पागलपन में उन्होंने फिनाइल की एक बाल्टी, जो पागलखाने में रखी थी, वह पी गए। उसके पी जाने से उनको इतनी उल्टियां हुईं, इतने दस्त लगे कि पंद्रह दिन तक सारा शरीर रूपांतरित हो गया। उनकी सारी गर्मी जैसे शरीर से निकल गई और वह ठीक हो गए। लेकिन उन्हें छह महीने के लिए पागलघर में भेजा गया था। वह ठीक हो गए और उन्होंने मुझसे कहा कि जब मैं पागल था तब,और जब मैं ठीक हो गया उस पागलपन से और तीन महीने तक ठीक होकर जब मैं पागलघर में रहा, तब जो पीड़ा मैंने अनुभव की, उसका हिसाब लगाना बहुत मुश्किल है। जब तक मैं पागल था, तब तक कोई कठिनाई न थी, क्योंकि और सब भी मेरे जैसे लोग थे। जब मैं ठीक हो गया, तब मुझे लगा कि मैं कहौ हूं! क्योंकि मैं सो रहा हूं और दो आदमी मेरी छाती पर सवार हो गए हैं। मैं चल रहा हूं और कोई मुझे धक्के मार रहा है। उस सबका मुझे पहले कुछ भी पता नहीं चला था, क्योंकि मैं भी पागल था। मुझे यह भी पता नहीं चला था कि ये लोग पागल हैं जब तक मैं पागल था। जब मैं पागल न रहा तो मुझे पता चला कि ये सारे लोग पागल हैं। और जैसे ही मैं पागल न रहा, मैं उन सारे पागलों का शिकार बन गया। और मेरी कठिनाई यह थी कि मुझे सब समझ में आ रहा था कि अब मैं बिलकुल ठीक हूं और अब क्या होगा और क्या नहीं होगा, और अब मैं कैसे बाहर निकलूं! और अगर मैं चिल्लाकर कहता कि मैं पागल नहीं हूं तो सभी पागल यही चिल्लाकर कहते हैं कि हम पागल नहीं हैं, कोई डाक्टर मानने को राजी नहीं था।

हमारे चारों तरफ सोए हुए लोगों की भीड़ है, और इसलिए हमें पता नहीं चलता कि हम सोए हुए आदमी हैं। और जागे हुए आदमी की हम जल्दी से हत्या कर देते हैं, क्योंकि वह आदमी हमें बहुत कष्टपूर्ण मालूम होने लगता है, बहुत डिस्टर्बिंग, बहुत विम्नकारक मालूम होने लगता है।

एक अंग्रेज विद्वान कैनेथ वाकर ने एक किताब लिखी है और उस किताब को एक फकीर गुरजिएफ को समर्पित किया है। समर्पण में, डेडीकेशन में उसने जो शब्द लिखे हैं, वे बड़े अदभुत हैं। उसने डेडीकेशन में, समर्पण में लिखा है 'टु जार्ज गुरजिएफ, दि डिस्टर्बर आफ माई स्लीप', मेरी नींद तोड्ने वाले जार्ज गुरजिएफ को समर्पित।

थोड़े —से लोग हुए हैं जमीन पर, जो लोगों की नींद तोड्ने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर आप किसी की नींद तोड्ने की कोशिश करेंगे, तो निश्चित ही वह आपसे बदला लेगा। किसी सोते हुए आदमी को जगाने की कोशिश करिए, वह आपकी गरदन पकड़ लेगा। आज तक मनुष्य को आध्यात्मिक नींद से जिन्होंने जगाने की कोशिश की है, हमने उनकी भी गरदनें पकड़ ली हैं। हमारे बीच हमें पता नहीं चलता इसीलिए कि हम सब एक जैसे नींद में सोए हुए लोग हैं।

एक गांव के संबंध में मैंने सुना है कि वहां एक दिन एक जादूगर आ गया था और उस गांव के कुएं में उसने एक पुड़िया डाल दी थी और कहा था कि इस कुएं का पानी जो भी पीएगा, वह पागल हो जाएगा। एक ही कुआं था उस गांव में। एक कुआं और था, लेकिन वह गांव का कुआं न था, वह राजा के महल में था। सांझ होते —होते तक गांव के हर आदमी को पानी पीना पड़ा। चाहे पागलपन की कीमत पर भी पीना पड़े, लेकिन मजबूरी थी। प्यास तो बुझानी पड़ेगी,चाहे पागल ही क्यों न हो जाना पड़े। गांव के लोग अपने को कब तक रोकते, उन्होंने पानी पीया। सांझ होते —होते पूरा गांव पागल हो गया।

सम्राट बहुत खुश था, उसकी रानियां बहुत खुश थीं, महल में गीत और संगीत का आयोजन हो रहा था। उसके वजीर खुश थे कि हम बन गए, लेकिन सांझ होते —होते उन्हें पता चला कि गलती में हैं वे, क्योंकि सारा महल सांझ होते —होते गांव के पागलों ने घेर लिया। पूरा गांव हो गया था पागल। राजा के पहरेदार और सैनिक भी हो गए थे पागल। सारे गांव ने राजा के महल को घेर कर आवाज लगाई कि मालूम होता है कि राजा का दिमाग खराब हो गया है। हम ऐसे पागल राजा को सिंहासन पर बर्दाश्त नहीं कर सकते। महल के ऊपर खड़े होकर राजा ने देखा कि बचाव का अब कोई उपाय नहीं है। राजा अपने वजीर से पूछने लगा कि अब क्या होगा? हम तो सोचते थे कि भाग्यवान हैं हम कि हमारे पास अपना कुआं है। आज यह महंगा पड़ गया है। सभी राजाओं को एक न एक दिन अलग कुआं महंगा पड़ता है। सारी दुनिया में पड़ रहा है। जो अभी भी राजा हैं, कल उनको भी कुआं महंगा पड़ेगा। अलग कुआं खतरनाक है।

लेकिन तब तक खयाल नहीं था। वजीर से राजा कहने लगा, क्या होगा अब? वजीर ने कहा, अब कुछ पूछने की जरूरत नहीं है। आप भागे पीछे के द्वार से, और गांव के उस कुएं का पानी पीकर जल्दी लौट आएं। अन्यथा यह महल खतरे में है। सम्राट ने कहा, उसे कुएं का पानी! क्या तुम मुझे पागल बनाना चाहते हो? वजीर ने कहा, अब पागल बने बिना बचने का कोई उपाय नहीं है।

राजा भागा, उसकी रानियां भागी। उन्होंने जाकर उस कुएं का पानी पी लिया। उस रात उस गांव में एक बड़ा जलसा मनाया गया। सारे गांव के लोगों ने खुशी मनाई, बाजे बजाए, गीत गाए और भगवान को धन्यवाद दिया कि हमारे राजा का दिमाग ठीक हो गया है। क्योंकि राजा भी भीड़ में नाच रहा था और गालियां बक रहा था। अब राजा का दिमाग ठीक हो गया।

चूंकि हमारी नींद सार्वजनिक है, सार्वभौमिक है, क्योंकि हम जन्म से ही सोए हुए हैं, इसलिए हमें पता नहीं चलता है। इस नींद में हम क्या समझ पाते हैं जीवन को? इतना ही कि यह शरीर जीवन है। इस शरीर के भीतर जरा भी प्रवेश नहीं हो पाता। यह समझ वैसी ही है, जैसे किसी राजमहल के बाहर दीवाल के आसपास कोई घूमता हो और समझता हो कि यह राजमहल है। दीवाल पर, बाहर की दीवाल पर, चारदीवारी पर, परकोटे पर, परकोटे के बाहर कोई घूमता हो और सोचता हो कि राजमहल है। और परकोटे की दीवाल से टिक कर सो जाता हो और सोचता हो कि महलों में विश्राम कर रहा हूं। शरीर के आसपास जिनके जीवन का बोध है, वह उसी नासमझ आदमी की तरह हैं जो महल की दीवाल के बाहर खड़े होकर समझता है कि महल का मेहमान हो गया हूं।

शरीर के भीतर हमारा कोई प्रवेश नहीं है, हम शरीर के बाहर जीते हैं। बस शरीर की पर्त, बाहर की पर्त……। शरीर की, भीतर की पर्त तक का कोई पता हमें नहीं चलता। बस दीवाल के बाहर का हिस्सा... दीवाल के भीतर का हिस्सा ही पता नहीं चलता, महल तो बहुत दूर है। दीवाल के बाहर के हिस्से को ही महल समझते हैं, दीवाल के भीतर के हिस्से तक से परिचय नहीं हो पाता।

हम अपने शरीर को अपने से बाहर से जानते हैं, हमने कभी भीतर खड़े होकर भी शरीर को नहीं देखा है — भीतर से, फ्राम विदिन। जैसे मैं इस कमरे के भीतर बैठा हूं, आप इस कमरे के भीतर बैठे हैं। हम इस कमरे को भीतर से देख रहे हैं। एक आदमी बाहर घूम रहा है। वह इस मकान को बाहर से देख रहा है। आदमी अपने शरीर के घर में अपने को भीतर से भी देखने में समर्थ नहीं हो पाता है, बाहर से ही जानता है। और तब मौत पैदा हो जाती है। क्योंकि जिसे हम बाहर से जानते हैं, वह केवल खोल है। वह केवल बाहरी वस्त्र है। वह केवल मकान के बाहर की दीवाल है, घर का मालिक नहीं। घर का मालिक भीतर है। उस भीतर के मालिक से तो पहचान ही हमारी नहीं हो पाती। भीतर की दीवाल तक से पहचान नहीं हो पाती तो भीतर के मालिक से कैसे पहचान होगी?

यह जो जीवन का अनुभव है फ्राम विदाउट, बाहर से, यह जीवन का अनुभव ही मृत्यु का अनुभव बनता है। यह जीवन का अनुभव जिस दिन हाथ से खिसक जाता है. क्योंकि जिस दिन इस घर को छोड़ कर भीतर के प्राण सिकुड़ते हैं और बाहर की दीवाल से चेतना भीतर चली जाती है, उसी दिन बाहर के लोगों को पता चलता है कि मर गया यह आदमी। और उस आदमी को भी लगता है कि मरा, मरा, मरा। क्योंकि जिसे वह जीवन समझता था, वहां से चेतना भीतर सरकने लगती है। जिस तल पर उसे शात था कि यह जीवन है, उस तल से चेतना भीतर सरकने लगती है नई यात्रा की तैयारी में। और उसके प्राण चिल्लाने लगते हैं कि मरा! गया! सब डूबता है! क्योंकि जिसे वह समझता था कि मैं जीवन हूं वह डूब रहा है, वह छूट रहा है। बाहर के लोग समझते हैं कि यह आदमी मर गया और वह आदमी भी मरते क्षण में, इस मरने के क्षण में, इस बदलाहट के क्षण में समझता है कि मैं मरा, मैं मरा, मैं मरा, मैं गया।

यह जो देह है हमारी, यह जो शरीर है, यह शरीर हमारा वास्तविक होना नहीं है। यह हमारी आथेंटिक बीइंग नहीं है। गहराई में इससे बहुत भिन्न और बिलकुल दूसरे प्रकार का हमारा व्यक्तित्व है। इस शरीर से बिलकुल विपरीत और उलटा हमारा जीवन है।

एक बीज को हम देखते हैं। बीज— के ऊपर की खोल होती है बहुत सख्त ताकि भीतर जो छिपा हुआ जीवन का अंकुर है कोमल, डेलीकेट, वह उसकी रक्षा कर सके। भीतर का अंकुर तो होता है बहुत कोमल और उसकी रक्षा के लिए बहुत कठोर दीवाल, एक घेरा, एक खोल बीज के ऊपर चढ़ी होती है। वह जो खोल है, वह बीज नहीं है। और जो उस खोल को ही बीज समझ लेगा, वह कभी भी उस जीवन के अंकुर से परिचित नहीं हो पाएगा जो भीतर छिपा है। वह खोल को ही लिये रह जाएगा और अंकुर कभी पैदा नहीं होगा।

नहीं, खोल बीज नहीं है। बल्कि सच तो यह है कि बीज जब पैदा होता है तो खोल को मिट जाना पड़ता है, टूट जाना पड़ता है, बिखर जाना पड़ता है,मिट्टी में गल जाना पड़ता है। जब खोल गल जाती है, तब बीज भीतर से प्रकट होता है।

यह शरीर एक बीज है। और जीवन, चेतना और आत्मा का एक अंकुर भीतर है। लेकिन हम इस खोल को ही बीज समझकर नष्ट हो जाते हैं और वह अंकुर पैदा भी नहीं हो पाता है, वह अंकुर फूट भी नहीं पाता है। जब वह अंकुर फूटता है, तो जीवन का अनुभव होता है। जब वह अंकुर फूटता है, तो मनुष्य का बीज होना समाप्त होता है और मनुष्य वृक्ष बनता है। जब तक मनुष्य बीज है, तब तक वह सिर्फ एक पोटेंशियलिटी है, एक संभावना है। और जब उसके भीतर वृक्ष पैदा होता है जीवन का, तब वह वास्तविक बनता है। उस वास्तविकता को कोई आत्मा कहता है, उस वास्तविकता को कोई परमात्मा कहता है।

मनुष्य है बीज परमात्मा का। मनुष्य सिर्फ बीज है। जीवन का पूर्ण अनुभव तो वृक्ष को होगा, बीज को क्या हो सकता है? बीज क्या जान सकता है वृक्ष के आनंद को? बीज क्या जान सकता है कि आएंगे पत्ते हरे, जिन पर सूरज की किरणें नाचेगी? बीज क्या जान सकता है कि हवाएं बहेंगी पत्तियों और शाखाओं से और प्राण संगीत में गूंजेंगे? बीज कैसे जान सकता है कि खिलेंगे फूल और आकाश के तारों को मात कर देंगे? बीज कैसे जान सकता है कि पक्षी गीत गाएंगे और यात्री छाया में विश्राम करेंगे? बीज कैसे जान सकता है? वृक्ष के अनुभव को बीज कैसे जान सकता है? बीज को तो कुछ भी पता नहीं। वह तो सपना भी नहीं देख सकता उसका, जो वृक्ष होने पर संभव होगा। वह तो वृक्ष होकर ही जाना जा सकता है।

आदमी जीवन को नहीं जानता है, क्योंकि उसने बीज को ही अपनी परिपूर्णता समझ ली है। वह तो जीवन को तभी जानेगा, जब भीतर के जीवन का पूरा वृक्ष प्रकट हो। लेकिन भीतर के जीवन का वृक्ष प्रकट होना तो दूर, भीतर कुछ है शरीर से भिन्न और अलग, इसका हमें कोई बोध ही नहीं हो पाता। इसकी हमें कोई स्मृति, इसका कोई स्मरण, इसकी कोई रिमेंबरिंग ही पैदा नहीं हो पाती कि अलग भी कुछ है शरीर से भिन्न। जीवन की समस्या, जो भीतर है, उसके अनुभव की समस्या है। जो भीतर है, उसके अनुभव की समस्या है जीवन की समस्या। और हम जीवन को मान लेते हैं वह, जो कि बाहर विस्तीर्ण है।

एक वृक्ष से मैंने पूछा, तेरा जीवन कहां है? वह वृक्ष कहने लगा, उन जड़ों में जो दिखाई नहीं पड़ती। जड़ें दिखाई नहीं पड़ती, वहां जीवन है। वृक्ष जो दिखाई पड़ता है, वह वहां से जीवन लेता है जो अदृश्य है।

माओत्से तुंग ने अपने बचपन की एक घटना लिखी है कि मेरी मां की झोपड़ी के पास एक बगिया थी। उसने जीवन भर उस बगिया को संभाला था। उसके फूल इतने बड़े और प्यारे होते थे कि दूर—दूर के गांव के लोग देखने आते थे। और बगिया के पास से गुजरता हुआ ऐसा कठोर आदमी कभी नहीं देखा गया जो दो क्षण ठहर न गया हो उन फूलों को देख कर! मां की हो गई और बीमार पड़ गई। माओ छोटा था, पर उसने अपनी मां को कहा कि फिक्र मत करो —घर में और बडा तो कोई था नहीं—उसने कहा, फिक्र मत करो, तुम चिंता मत करो पौधों की, मैं उनकी फिक्र कर लूंगा।

पंद्रह दिन बाद मां उठी। माओ दिन भर बगीचे में मेहनत करता रहता, दिन—रात, सुबह से लेकर आधी रात तक। मां निश्चित थी। लेकिन जिस दिन पंद्रह दिन बाद उठकर वह बगीचे में आई तो देखा बगिया पूरी कुम्हला गई है। फूल तो जा चुके कभी के, पत्ते भी मुर्दा हो गए हैं, सारे वृक्ष उदास खड़े हैं। ऐसा ही लगा होगा उस बुढ़िया को जैसा कि आज अगर किसी के पास आंखें हो, तो सारी मनुष्य की बगिया को देखकर लगेगा—सब फूल गिर गए, सब पत्ते कुम्हला गए, सब वृक्ष उदास खड़े हैं।

वह तो छाती पीटकर रोने लगी कि यह तूने क्या किया! और तू सुबह से सांझ तक करता क्या था?

माओ भी रोने लगा। उसने कहा कि मैंने बहुत कुछ किया जो मैं कर सकता था। एक—एक फूल की धूल झाड़ता था, एक —एक पते की धूल झाड़ता था। एक—एक फूल को अता था, एक—एक फूल पर पानी छिड़कता था। पता नहीं लेकिन क्या हुआ! इतना श्रम! और सारे वृक्ष कुम्हला गए हैं।

उसकी मां रोने में भी हंसने लगी। उसने कहा, पागल! शायद तुझे पता नहीं कि वृक्षों के प्राण पत्तों और फूलों में नहीं होते। वृक्षों के प्राण जड़ों में होते हैं, जो दिखाई नहीं पड़ती। तू फूल और पत्तों को पानी देगा, तू फूल और पत्तों को चूमेगा और प्रेम करेगा, तो सब निरर्थक है। फूल—पत्ते की फिक्र

ही मत कर। अगर अदृश्य जड़ें शक्तिशाली होती चली जाती हैं, तो फूल—पत्ते अपने से निकल आते हैं, उनकी चिंता नहीं करनी पडती है।

लेकिन आदमियों ने जीवन को समझा है बाहर का सारा का सारा फूल—पत्ते का जो फैलाव है वह, और भीतर की जड़ें बिलकुल उपेक्षित हैं, निग्लेक्टेड हैं। आदमी के भीतर की जड़ें बिलकुल ही उपेक्षित पड़ी हैं। स्मरण भी नहीं कि भीतर भी मैं कुछ हूं। और जो भी है वह भीतर है। सत्य भीतर है, शक्ति भीतर है, जीवन की सारी क्षमता भीतर है। वहा से वह प्रकट हो सकती है बाहर। बाहर प्रकटीकरण होता है, होना भीतर है। बीइंग भीतर है, बिकमिंग बाहर होती है। वह जो वास्तविक है, वह भीतर है। जो फैलता है और अभिव्यक्त होता है, मैनीफेस्टेशन जो है वह बाहर है। बाहर है अभिव्यक्ति, आत्मा तो भीतर है।

और बाहर की अभिव्यक्ति को ही जो जीवन समझ लेते हैं, उनका सारा जीवन मृत्यु के भय से आक्रांत होता है। वे जीते हैं तो भी मरे —मरे और डरे हुए कि कभी भी मर जाएंगे, किसी भी क्षण मर जाएंगे। और यही मरने से डरे हुए लोग किसी की मौत पर रोते और परेशान होते हैं। ये किसी और की मौत पर रोते और परेशान नहीं हो रहे हैं, हर मौत इन्हें इनकी मौत की खबर ले आती है। हर मौत इन्हें खबर लाती है इनकी मौत की। और जो अपने हैं, बहुत निकट हैं, उनकी मौत तो बहुत जोर से खबर लाती है अपनी मौत की। और तब प्राण भीतर कैप जाते हैं, तब भय पकड़ लेता है, तब कंपन पकड़ लेता है। और उस कंपन मैं, उस भय में आदमी अच्छी— अच्छी बातें सोचता है—आत्मा अमर है, हम तो भगवान के अंश हैं, हम तो ब्रह्म के स्वरूप हैं। ये सब बकवास की बातें हैं। और यह अपने को धोखा देने से ज्यादा नहीं है, सेल्फ डिसेपान है।

एक वृक्ष की जडों में जीवन है जो दिखाई नहीं पड़ती। जड़ें दिखाई नहीं

पड़ती,वहां जीवन है।वृक्ष जो दिखाई पड़ता है, वह वहां से जीवन लेता है।

जीवन अदृश्य है।

यह मौत से डरा हुआ आदमी अपने को मजबूत करने के लिए दोहराता है कि आत्मा अमर है। वह यह कह रहा है कि नहीं, नहीं, मुझे नहीं मरना पड़ेगा, आत्मा अमर है। लेकिन भीतर प्राण कैप रहे हैं और वह ऊपर से कह रहा है कि आत्मा अमर है। जो आदमी जानता है कि आत्मा अमर है, उसे एक बार भी यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि आत्मा अमर है। क्योंकि वह जानता है, बात खतम हो गई।

लेकिन यह मौत से डरने वाले लोग मौत से डरते हैं, जीवन को जान नहीं पाते हैं, और फिर बीच में एक नई तरकीब और एक नया धोखा पैदा करते हैं कि आत्मा अमर है।

इसीलिए तो आत्मा को अमर मानने वाले लोगों से ज्यादा मौत से डरनेवाली कौम खोजनी कठिन है। इस देश में ही यह दुर्भाग्य घटित हुआ है। इस देश में आत्मा की अमरता माननेवाले सर्वाधिक लोग हैं पृथ्वी पर, और इस देश में मौत से डरने वाले कायरों की संख्या भी सर्वाधिक है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो गईं?

जो जानते हैं कि आत्मा अमर है, उनके लिए तो मृत्यु हो गई समाप्त, उनके लिए तो भय हो गया विसर्जित, उन्हें तो अब कोई मार नहीं सकता। उन्हें तो अब कोई नहीं मार सकता। और दूसरी बात भी ध्यान में ले लेना न उन्हें कोई मार सकता है और न अब वे इस भ्रम में हो सकते हैं कि मैं किसी को मार सकता हूं। क्योंकि मारने की घटना ही खतम हो गई। और इस राज को थोडा समझ लेना जरूरी है। जो लोग कहेंगे आत्मा अमर है, वे मौत से डरे हुए हैं और दोहरा रहे हैं कि आत्मा अमर है। और साथ ही ऐसे मौत से डरने वाले लोग अहिंसा की भी बहुत बात करेंगे। इसलिए नहीं कि वे किसी को न मारे, बल्कि इसलिए कि बहुत गहरे में कोई उन्हें मारने को तैयार न हो जाए। दुनिया अहिंसक होनी चाहिए! क्यों? कहेंगे तो वे यही कि किसी को भी मारना बुरा है,लेकिन बहुत गहरे में वे यह कह रहे हैं कि कोई मुझे मार न डाले। किसी को भी मारना बुरा है! लेकिन अगर उन्हें पता चल गया है कि मृत्यु होती ही नहीं,तो न मरने का डर है, न मारने का डर है और न ये बातें अर्थपूर्ण रह गईं।

कृष्ण ने कहा अर्जुन से कि तू भयभीत मत हो, क्योंकि तू जिन्हें सामने खडा देख रहा है, वे बहुत बार रहे हैं पहले भी। तू भी था, मैं भी था, हम सब बहुत बार थे और हम सब बहुत बार होंगे। जगत में कुछ भी नष्ट नहीं होता। इसलिए न मरने का डर नहीं है, न मारने का डर है। सवाल है जीवन को जीने का। और जो मरने और मारने दोनों से डरते हैं, वे जीवन की दृष्टि में एकदम नपुंसक और इंपोटेंट हो जाते हैं। जो न मर सकता है, न मार सकता है, वह जानता ही नहीं कि जो है वह न मारा जा सकता है, न मर सकता है

कैसी होगी वह दुनिया जिस दिन सारा जगत जानेगा भीतर से कि आत्मा अमर है! उस दिन मृत्यु का सारा भय विलीन हो जाएगा! उस दिन मरने का भय भी विलीन हो जाएगा, मारने की धमकी भी विलीन हो जाएगी। उसी दिन युद्ध विलीन होंगे, उसके पहले नहीं।

जब तक आदमी को लगता है कि मारा जा सकता है, मर सकता हूं र तब तक दुनिया से युद्ध विलीन नहीं हो सकते। चाहे गांधी समझाएं अहिंसा, और चाहे बुद्ध और चाहे महावीर। चाहे सारी दुनिया में अहिंसा के कितने ही पाठ पढ़ाए जाएं। जब तक मनुष्य को भीतर से यह अनुभव पैदा नहीं हो जाता कि जो है, वह अमृत है, तब तक दुनि