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ज्ञानी अपने प्रति जागा हुआ है और अज्ञानी अपने प्रति सोया हुआ है,


अज्ञानी की बेहोशी और निद्रा का कारण क्या है? ज्ञानी के होश और जागरण का भी कारण क्या है?

तीन बातें हैं। एक, अज्ञान अकारण है। पहली बात, कठिन पड़ेगी समझनी, अज्ञान अकारण है। अकारण क्यों? क्योंकि अज्ञान स्वाभाविक है, नेचुरल है। स्वाभाविक क्यों? जागने के पहले निद्रा स्वाभाविक है। होश के पहले बेहोशी स्वाभाविक है। जन्म के पहले गर्भ स्वाभाविक है। युवा होने के पहले बचपन स्वाभाविक है। बूढ़े होने के पहले जवानी स्वाभाविक है। अज्ञान, ज्ञान का विरोध ही नहीं है, ज्ञान की पूर्व अवस्था भी है।

जब हम अज्ञान को ज्ञान के विरोधी की तरह लेते हैं, तब कठिनाई शुरू होती है। अज्ञान ज्ञान का विरोध नहीं है। ज्ञान का विरोध, मिथ्या ज्ञान है। यह जरा कठिन पड़ेगा। फाल्स नालेज, मिथ्या ज्ञान, ज्ञान का विरोध है। अज्ञान ज्ञान का अभाव मात्र है।

एक आदमी सोया है। सोना जागने के विपरीत नहीं है; सिर्फ जागने की पूर्व अवस्था है। जो भी सोया है, वह जाग सकता है। सोने में से जागना निकलता है। सोना बीज है; जागना अंकुर है। बीज दुश्मन नहीं है अंकुर का; बीज अंकुर की भूमि है, वहीं से तो पैदा होगा।

लेकिन हम आमतौर से अज्ञान को ज्ञान के विपरीत मान लेते हैं। इसलिए कठिनाई में पड़ते हैं। हम मान लेते हैं, अज्ञान विरोध है। अगर अज्ञान बुरा है, उसे मिटाना है, तो फिर है ही क्यों? उसका कारण क्या है?

नहीं; अज्ञान विपरीत नहीं है ज्ञान के; अज्ञान ज्ञान का पहला चरण है। अज्ञान ज्ञान का बीज है। और परमात्मा भी सीधा ज्ञान नहीं ला सकता, अज्ञान से ही ला सकता है। वह भी सीधा वृक्ष नहीं ला सकता, बीज से ही ला सकता है। असल में बीज वृक्ष का बिल्ट-इन-प्रोग्रैम है। बीज जो है, वह होने वाले वृक्ष का ब्लूप्रिंट है।

अब वैज्ञानिक कहते हैं कि बीज को अगर हम पूरा जान सकें, तो हम चित्र बनाकर बता सकते हैं कि वृक्ष की शाखा कितनी बाएं घूमेगी, कितनी शाखाएं होंगी, कितने पत्ते होंगे, कितने फल लगेंगे, कितने फूल, कितने बीज। अगर हम बीज का पूरा रहस्य जान सकें, तो हम वृक्ष की पूरी तस्वीर बनाकर रख देंगे कि ऐसा होगा। और वैसा ही होगा।

लेकिन बीज को तोड़ना पड़ता है वृक्ष होने के पहले। अगर बीज बीज ही रहने की जिद करे, तब खतरा है। बीज के होने में खतरा नहीं है। बीज तो सहयोगी है वृक्ष के लिए। अगर ठीक से समझें तो बीज छिपा हुआ वृक्ष है। अज्ञान छिपा हुआ ज्ञान है; दुश्मन नहीं, मित्र। लेकिन बीज अगर जिद करे कि मैं बीज ही रहूंगा, तब दुश्मन हुआ। बीज कह दे कि मैं अपनी खोल को तोडूंगा नहीं, मैं मिट्टी में मिलूंगा नहीं, मैं मिटूंगा नहीं, मैं तो रहूंगा, तब फिर बिल्ट-इन-प्रोग्रैम की दुश्मनी शुरू हो गई।

अज्ञान अपने में विरोध नहीं है। अज्ञान तो तब विरोध बनता है, जब अज्ञान कहता है कि मैं रहूंगा। और कब कहता है अज्ञान? जब मिथ्या ज्ञान से भरता है तब कहता है कि मैं रहूंगा। अज्ञान तब कहता है कि मैं मिटूंगा नहीं, क्योंकि मैं तो खुद ही ज्ञान हूं।

गीता पढ़ ली किसी ने। कृष्ण ने जो कहा, कंठस्थ कर लिया। पता नहीं कुछ। मालूम नहीं कुछ। जाना नहीं कुछ। कहने लगे, आत्मा अमर है। अब खतरा है। बीज कह रहा है कि मैं वृक्ष हूं। मैं हूं ही। अब होने की कोई जरूरत न रही। अब बीज जिद करेगा कि मैं हूं ही।

उधार ज्ञान मिथ्या ज्ञान है। अपना ज्ञान सम्यक ज्ञान है, राइट नालेज है। स्वयं जाना, तो वृक्ष हो जाएंगे। दूसरे के जाने को पकड़ा और कहा कि मेरा ही जानना है, तो फिर बीज ही रह जाएंगे।

तो यह मत पूछिए, अज्ञान का कारण क्या है? अज्ञान का कारण तो यही है कि ज्ञान होने के लिए अज्ञान से ही गुजरना अनिवार्य है। जागने के पहले नींद से गुजरना अनिवार्य है। सुबह के पहले रात से गुजरना अनिवार्य है।

सुबह होगी ही नहीं, अगर रात न हो। कैसे होगी सुबह? रात न हो, तो सुबह न होगी। इसलिए जो गहरा देखते हैं, वे मानते हैं, रात सुबह के आने की तैयारी है, जस्ट प्रिपरेशन; सुबह हो सके, इसकी पूर्व भूमिका है। सुबह के लिए ही रात है गर्भ, सुबह है जन्म। रात प्रेगनेंट है सुबह से; उसके गर्भ में छिपी है सुबह। रात मां है, सुबह बेटा है। अज्ञान मां है, ज्ञान बेटा है। उससे ही होगा।

नहीं कोई विरोध है। कारण की कोई बात नहीं। ऐसा नियम है, अगर विज्ञान की भाषा में कहें तो।

अगर वैज्ञानिक से पूछें कि हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलकर पानी क्यों बनता है, क्या कारण है? तो वह कहेगा, बनता है; कारण नहीं है। इट इज़ सो, ऐसा है, ऐसी प्रकृति है। विज्ञान कहेगा, ऐसा है। ऐसा जीवन का नियमन है, दिस इज़ दि ला, अल्टिमेट ला, आखिरी नियम है। अंडे से मुर्गी पैदा होती है, ऐसा है।

एक वैज्ञानिक से कोई पूछ रहा था कि अंडे और मुर्गी में फर्क क्या है? तो उसने कहा कि अंडा मुर्गी के पैदा होने की राह है, मार्ग है, दि वे; मुर्गी के पैदा होने का ढंग।

ज्ञान अज्ञान से जगता है, अज्ञान से पैदा होता है। रुकावट पड़ती है मिथ्या ज्ञान से। इसलिए मैं बताना चाहूंगा कि मिथ्या ज्ञान का कारण क्या है? उसका कारण है, आलस्य, लिथार्जी।

दूसरे का ज्ञान मुफ्त में मिल जाए, तो अपने ज्ञान को खोजने की मेहनत कौन करे, क्यों करे! प्रमाद। मुफ्त मिल जाए, तो खरीदने कौन जाए! सड़क पर पड़ा हुआ मिल जाए!

लेकिन ज्ञान के साथ यह खराबी है कि सड़क पर पड़ा हुआ कभी नहीं मिलता। और मिलता हो, तो झूठा सिक्का होगा। ज्ञान मिलता ही स्वयं की चेष्टा से है, श्रम से है, तपश्चर्या से है। अन्यथा नहीं मिलता है।

आलस्य मिथ्या ज्ञान को पकड़ा देता है। कहता है, क्या जरूरत! जब कृष्ण को पता है, तो हम और नाहक क्यों खोजें? कृष्ण का ही वाक्य रट लें, न हन्यमाने–रट लें कृष्ण को ही, न हन्यते हन्यमाने शरीरे–नहीं मरता शरीर के मरने से कोई। कंठस्थ कर लें। नाहक ध्यान, तप, योग, इस उपद्रव में हम क्यों पड़ें? जब तुम्हें पता ही है, तुमने हमें बता दिया; हमने याद कर लिया। लेकिन यह होगी मेमोरी, ज्ञान नहीं। यह होगी स्मृति, याददाश्त, ज्ञान नहीं।

आलस्य कारण है मिथ्या ज्ञान का। और अहंकार कारण है मिथ्या ज्ञान का। और आलस्य और अहंकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहां-जहां अहंकार, वहां-वहां आलस्य। जहां-जहां आलस्य, वहां-वहां अहंकार। सघन हो गया आलस्य ही तो अहंकार है। फैल गया अहंकार ही तो आलस्य है।

अहंकार क्यों? क्योंकि मैं अज्ञानी हूं, ऐसा मानना अहंकार के लिए कठिन पड़ता है। और जो यह नहीं मान पाता कि मैं अज्ञानी हूं, वह तो ज्ञान के अंडे को ही, बीज को ही इनकार कर रहा है। मुर्गी तो कभी फिर पैदा नहीं होगी।

इसलिए ज्ञान की पहली शर्त है, अज्ञान की स्वीकृति। और अज्ञान को बचाना हो, तो पहली शर्त है, अज्ञान का अस्वीकार। अज्ञान है ही नहीं; मैं जानता ही हूं; फिर बात ही समाप्त हो गई।

इसलिए उपनिषद कहते हैं, अज्ञानी तो भटकते ही हैं, ज्ञानी और भी बुरी तरह भटक जाते हैं। अज्ञानी तो अंधकार में पड़ते ही हैं, ज्ञानी महाअंधकार में पड़ जाते हैं। बड़ा अदभुत वचन है।

किन ज्ञानियों की बात हो रही है? उन ज्ञानियों की बात हो रही है, जो मिथ्या ज्ञानी हैं। मिथ्या ज्ञान का कारण है, आलस्य। मुफ्त मिले, हम क्यों श्रम करें! पचा-पचाया मिले, तो हम क्यों चबाएं! हम ऐसे ही लील जाएं। यह नहीं हो सकता।

कारण है अहंकार। मन मानने को राजी नहीं होता कि मैं अज्ञानी हूं। कहता है, मैं जानता ही हूं। जो हम नहीं जानते, उसको भी हम कहते हैं कि हम जानते हैं। हम स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होते कि हम अज्ञानी हैं। हम अपने अज्ञान को भी सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि यही ज्ञान है।

सारी दुनिया में जितने विवाद हैं, वे अज्ञान को सिद्ध करने के विवाद हैं। इस दुनिया में जितने झगड़े हैं, वे सत्य के झगड़े नहीं हैं; वे अज्ञानियों के अपने अज्ञान को सिद्ध करने के झगड़े हैं। और अज्ञानी अपने अज्ञान को सिद्ध करने के लिए ज्ञानियों के कंधों तक पर बंदूक रख लेते हैं! उनके पीछे खड़े हो जाते हैं और उपद्रव मचाते हैं।

अज्ञान अज्ञान है, ऐसा जिसने जाना, उसके ज्ञान की पहली किरण फूट गई। अज्ञान अज्ञान है, ऐसा जिसने पहचाना–यह बहुत बड़ा ज्ञान है, यह छोटा ज्ञान नहीं है। अज्ञान को जानना कि अज्ञानी हूं मैं, बहुत बड़ी घटना है, शायद सबसे बड़ी घटना है। फिर जो भी घटेगा, इससे छोटा है।

जिस व्यक्ति को पता चल गया कि मैं सोया हूं, उसका जागरण शुरू हो गया। क्योंकि नींद में कभी पता नहीं चलता कि मैं सोया हूं। अगर आपको पता चल गया कि नींद में हूं, तो पता चल गया है कि जागा हूं। क्योंकि पता किसको चलेगा? आपने जाना कि अज्ञानी हूं, तो वह जानने वाला भीतर खड़ा हो गया, जो अज्ञान को जानता है। और जो अज्ञान को जानता है, वह ज्ञान है। टु बी अवेयर आफ वन्स इग्नोरेंस, अपने अज्ञान के प्रति होश से भर जाना पहला कदम है। पहला भी, शायद अंतिम भी। क्योंकि फिर सब इसी से निकलता है। अंकुर फूट गया। क्रांति घटित हो गई। बीज टूट गया, अंकुर फूट गया; अब वृक्ष बड़ा हो जाएगा। वह अंकुर का ही विस्तार है, कोई नई घटना नहीं है।

असली क्रांति तो उस वक्त है, जब बीज टूटता है और अंकुर मिट्टी की पर्तों को, अंधेरे को निकालकर, तोड़कर, बाहर फूटता है रोशनी में; सूरज को झांकता है और देखता है। असली क्रांति घट गई। अब तो फिर ठीक है। अब यही वृक्ष बड़ा हो जाएगा। इसमें फूल लगेंगे, फल लगेंगे; सब होगा। लेकिन अब रेवोल्यूशन नहीं है कोई। रेवोल्यूशन तो हो गई, क्रांति तो हो गई; जब बीज टूटा, उसी वक्त हो गई।

पहली क्रांति और आखिरी क्रांति अज्ञान का बोध है।

आलस्य और अहंकार के कारण यह बोध नहीं हो पाता।

आप पूछ सकते हैं कि आलस्य और अहंकार क्यों हैं? मैं कहूंगा, हैं। और जो भी क्यों का उत्तर दे, वह नासमझ है। नासमझ इसलिए कि जो भी उत्तर होगा, उसके लिए भी पूछा जा सकता है, क्यों? उसका जो उत्तर दे, वह और भी ज्यादा नासमझ है। क्योंकि फिर भी पूछा जा सकता है कि वह क्यों? इनफिनिट रिग्रेस! फिलासफी इसी मूढ़ता में पड़ी है। सारी दुनिया की फिलासफी, सारी दुनिया का दर्शनशास्त्र इसी उपद्रव में उलझा हुआ है। हर चीज पर हम पूछते चले जाते हैं, क्यों? क्यों? क्यों? और इसका कोई अंत नहीं हो सकता।

धर्म इस मूढ़ता में नहीं पड़ता। वह कहता है, ऐसा है। अब इसका हम क्या उपयोग कर सकते हैं, उसे करने में लगें। और आगे क्यों में न जाएं। क्योंकि क्यों का कोई अंत नहीं है, हमारा अंत है। हम क्यों पूछते-पूछते समाप्त हो जाएंगे।

इसलिए बुद्ध के पास जब भी कोई आता, तो वे कहते कि तुम क्रांति के लिए आए, अपने को बदलने के लिए आए, या कि सिर्फ जवाब चाहिए? अगर सिर्फ जवाब चाहिए, तो किताबों में काफी हैं, पंडितों के पास बहुत हैं; फिर मुझे परेशान मत करो। अगर जीवन में क्रांति चाहिए, तो फिर वही पूछो, जिससे क्रांति घटित हो सकती है। वह मत पूछो, जिसका कोई प्रयोजन नहीं, असंगत है, इररेलेवेंट है।

इसलिए बुद्ध तो जिस गांव में जाते, उस गांव में डुंडी पिटवा देते, ग्यारह प्रश्न कोई न पूछे। ये प्रश्न कोई पूछे ही न। क्योंकि इन प्रश्नों को पूछने वाला पूछता ही चला जाता है।

नहीं, असली सवाल यह नहीं है कि आलस्य और अहंकार क्यों हैं। असली सवाल यह है कि कैसे मिटेंगे? व्हाई दे आर, यह असली सवाल नहीं है। क्यों हैं? हैं।

लेकिन जिंदगी में हम कभी ऐसे सवाल नहीं पूछते। एक आदमी को मकान बनाना है, तो वह यह नहीं पूछता कि नींव में पत्थर क्यों हैं? निकालकर बाहर कर दें। एक आदमी को आग को बुझाना है, तो वह यह नहीं पूछता कि आग पानी डालने से क्यों बुझती है? पानी डालता है और बुझा देता है। एक आदमी को टी.बी. हो गया है, तो वह डाक्टर से यह नहीं पूछता कि इस इंजेक्शन के देने से टी.बी. क्यों मिटता है? वह इंजेक्शन लेता है और मिटा देता है।

लेकिन जहां हम परमात्मा की तरफ आते हैं, वहां हम क्यों पूछते हैं। कुछ कारण होना चाहिए। असल में क्यों हमारी पोस्टपोन करने की तरकीब है। क्यों हम पूछ सकते हैं अंतहीन। और अंतहीन हम स्थगन कर सकते हैं। क्योंकि जब तक पूरा पता न चल जाए, तब तक हम बदलें भी कैसे! जब तक पूरा पता न चल जाए, तब तक हम बदलें भी कैसे!

धर्म दर्शन नहीं है। धर्म बहुत प्रेक्टिकल है। धर्म बहुत ही व्यावहारिक है। धर्म इसीलिए साइंटिफिक है, वैज्ञानिक है। धर्म एक प्रयोगशाला है। मैं जो भी कह रहा हूं, वह स्पेकुलेटिव नहीं है; वह सिद्धांतवादी नहीं है। उसमें नजर इतनी ही है कि आपको वे मूल सूत्र खयाल में आ जाएं, जिनसे जिंदगी बदली जा सकती है।

आलस्य और अहंकार, मिथ्या ज्ञान का सहारा है। मिथ्या ज्ञान अज्ञान को बचाने का आधार है। अहंकार और आलस्य छोड़ें, मिथ्या ज्ञान गिर जाएगा। मिथ्या ज्ञान गिरा, अज्ञान का बोध होगा। अज्ञान का बोध हुआ, ज्ञान की यात्रा शुरू हो जाती है। और वे पुरुष, जो ज्ञान के अमृत को उपलब्ध हो जाते हैं, वे परलोक में आनंद को उपलब्ध होते ही हैं, इस लोक में भी आनंद से भर जाते हैं।

एक आखिरी श्लोक और।

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।। ३२।।

ऐसे बहुत प्रकार के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार किए गए हैं। उन सबको शरीर, मन और इंद्रियों की क्रिया द्वारा ही उत्पन्न होने वाले जान। इस प्रकार तत्व से जानकर निष्काम कर्मयोग द्वारा संसार-बंधन से मुक्त हो जाएगा।

इन सारे यज्ञों के द्वारा, इन सारे यज्ञों को करते हुए, निष्काम कर्म के भाव से दृष्टारूप हुआ व्यक्ति मुक्त हो जाता है।

यह सूत्र कनक्लूसिव है। वह जो भी कहा है इसके पहले, उसकी निष्पत्ति है। निष्पत्ति में, जीवन के समस्त कर्मों को कामना के कारण नहीं, निष्कामना के आधार पर करते हुए, यह आधार है निष्पत्ति का। दो बातें आपसे कहूं, तो खयाल में आ जाए।

एक, हम एक ही तरह के कर्म को जानते हैं अब तक। वह कर्म है, सकाम। बिना कामना के हमने कोई कर्म कभी जाना नहीं। इसीलिए तो हमने आनंद कभी जाना नहीं। सिवाय दुख के हमारा कोई परिचय नहीं है।

सकाम कर्म की एक खूबी है, जब तक नहीं पूरा होता, तब तक सुख की आशा रहती है। जब पूरा होता है, दुख के फल हाथ में आते हैं। निष्काम कर्म की एक खूबी है, जब तक करते हैं, तब तक कामना और आशा से शून्य होना पड़ता है; और जब कर्म पूरा हो जाता है, तो आनंद से भर जाते हैं, आपूरित हो जाते हैं।

सकाम कर्म को हम भलीभांति जानते हैं। हम सब ने सकाम कर्म किए हैं। हमने प्रेम किया, तो सकाम। हमने मित्रता की, तो सकाम। हमने दुकान चलाई, तो सकाम। हमने प्रार्थना भी की, तो सकाम। हम प्रभु के मंदिर में भी खड़े हुए, तो कामना को लेकर। हमने यज्ञ भी किया, तो कामना को लेकर। हमने भजन भी किया, तो भी कामना को लेकर। हमारा अनुभव कामना का अनुभव है। निष्पत्ति भी हमारी दुख की निष्पत्ति है। इतना हम भी जानते हैं।

कृष्ण जो कहते हैं, वह इससे उलटी बात कहते हैं।

हमारा अनुभव यह है कि हमने जहां-जहां कामना के फूल को तोड़ना चाहा, वहीं-वहीं दुख का कांटा हाथ में लगा। जहां-जहां कामना के फूल के लिए हाथ बढ़ाया, फूल दिखाई पड़ा जब तक, हाथ में न आया; जब हाथ में आया, तो सिर्फ लहू, खून; कांटा चुभा; फूल तिरोहित हो गया।

लेकिन मनुष्य अदभुत है। उसका सबसे अदभुत होना इस बात में है कि वह अनुभव से सीखता नहीं। शायद ऐसा कहना भी ठीक नहीं। कहना चाहिए, अनुभव से सदा गलत सीखता है। सीखता नहीं है, ऐसा कहना ठीक नहीं। सीखता है; गलत सीखता है।

अगर हाथ बढ़ाया और फूल हाथ में न आया और कांटा हाथ में आया, तो वह यही सीखता है कि मैंने गलत फूल की तरफ हाथ बढ़ा दिया; अब मैं ठीक फूल की तरफ हाथ बढ़ाऊं। यह नहीं सीखता कि फूल की तरफ हाथ बढ़ाना ही गलत है। यह नहीं सीखता।

और साधारण आदमियों का तो हम छोड़ दें। राम अपनी कुटिया के बाहर बैठे हैं। स्वर्णमृग दिखाई पड़ जाता है। स्वर्णमृग! सोने का हिरण! होता नहीं। पर जो नहीं होता, वह दिखाई पड़ सकता है। जिंदगी में बहुत कुछ दिखाई पड़ता है, जो है ही नहीं। और जो है, वह दिखाई नहीं पड़ता है।

स्वर्णमृग दिखाई पड़ता है राम को। उठा लेते हैं धनुष-बाण। सीता कहती है, जाओ, ले आओ। निकल पड़ते हैं स्वर्णमृग को मारने। यह कथा बड़ी मीठी है! राम स्वर्णमृग को मारने निकल पड़ते हैं! सोने का मृग कहीं होता है?

लेकिन आपको भी दिखाई पड़ जाए, तो रुकना मुश्किल हो जाए। असली मृग हो, तो रुक भी जाएं; सोने का मृग दिखाई पड़ जाए, तो रुकना मुश्किल हो जाएगा।

हम सभी तो सोने के मृग के पीछे भटकते हैं। एक अर्थ में हम सबके भीतर का राम सोने के मृग के लिए ही तो भटकता है। और हम सबके भीतर की सीता उकसाती है, जाओ, सोने के मृग को ले आओ।

हम सबके भीतर की कामना, हम सबके भीतर की वासना, हम सबके भीतर की डिजायरिंग कहती है भीतर की शक्ति को, ऊर्जा को, राम को–कि जाओ। इच्छा है सीता; शक्ति है राम। कहती है, जाओ, स्वर्णमृग को ले आओ। दौड़ते फिरते हैं। स्वर्णमृग हाथ में न आए, तो लगता है कि अपनी कोशिश में कुछ कमी रह गई। और दौड़ो। स्वर्णमृग को तीर मारो; गिर जाए, न लगे, तो लगता है और विषधर तीर बनाओ। लेकिन यह खयाल में नहीं आता कि स्वर्ण का मृग होता ही नहीं है।

कामना के फूल आकाश-कुसुम हैं; होते नहीं हैं; आकाश के फूल हैं। जैसे धरती पर तारे नहीं होते, वैसे आकाश में फूल नहीं होते हैं। कामना के कुसुम या तो धरती के तारे हैं या आकाश के फूल।

सकाम हमारी दौड़ है। बार-बार थककर, गिर-गिरकर भी, बार-बार कांटे से उलझकर भी फूल की आकांक्षा नहीं जाती है। दुख हाथ लगता है। लेकिन कभी हम दूसरा प्रयोग करने का नहीं सोचते।

कृष्ण कहते हैं, निष्काम भाव से…।

बड़ा मजा है। निष्काम भाव से कांटा भी पकड़ा जाए, तो पकड़ने पर पता चलता है कि फूल हो गया! ऐसा ही पैराडाक्स है। ऐसा जिंदगी का नियम है। ऐसा होता है।

आपने एक अनुभव तो करके देख लिया। फूल को पकड़ा और कांटा हाथ में आया, यह आप देख चुके। और अगर ऐसा हो सकता है कि फूल पकड़ें और कांटा हाथ में आए, तो उलटा क्यों नहीं हो सकता है कि कांटा पकड़ें और फूल हाथ में आ जाए? क्यों नहीं हो सकता? अगर यह हो सकता है, तो इससे उलटा होने में कौन-सी कठिनाई है!

हां, जो जानते हैं, वे तो कहते हैं, होता है।

तो एक प्रयोग करके देखें। चौबीस घंटे में एकाध काम निष्काम करके देखें। पूरा तो करना मुश्किल है, एकाध काम। चौबीस घंटे में एक काम सिर्फ, निष्काम करके देखें। छोटा-सा ही काम; ऐसा कि जिसका कोई बहुत अर्थ नहीं होता। रास्ते पर किसी को बिलकुल निष्काम नमस्कार करके देखें। इसमें तो कुछ खर्च नहीं होता! लेकिन लोग निष्काम नमस्कार तक नहीं कर सकते हैं!

नमस्कार तक में कामना होती है। मिनिस्टर है, तो नमस्कार हो जाती है! पता नहीं, कब काम पड़ जाए। मिनिस्टर नहीं रहा अब, एक्स हो गया, तो कोई उसकी तरफ देखता ही नहीं। वही नमस्कार करता है। वह इसलिए नमस्कार करता है कि अब फिर कभी न कभी काम पड़ सकता है।कामना के बिना नमस्कार तक नहीं रही! कम से कम नमस्कार तो बिना कामना के करके देखें। और हैरान हो जाएंगे। अगर साधारण से जन को भी, राहगीर को भी, अपरिचित को भी, भिखारी को भी हाथ जोड़कर नमस्कार कर ली, बिना कामना के, तो भीतर तत्काल पाएंगे कि आनंद की एक झलक आ गई। सिर्फ नमस्कार भी–कोई बड़ा कृत्य नहीं, कोई बड़ी डीड नहीं, कुछ नहीं–सिर्फ हाथ जोड़े निष्काम, और भीतर पाएंगे कि एक लहर शांति की दौड़ गई। एक अनुग्रह, एक ईश्वर की कृपा भीतर दौड़ गई।और अगर अनुभव आने लगे, तो फिर बड़े काम में भी निष्काम होने की भावना जगने लगेगी। जब इतने छोटे काम में इतनी आनंद की पुलक पैदा होती है, तो जितना बड़ा काम होगा, उतनी बड़ी आनंद की पुलक पैदा होगी। फिर तो धीरे-धीरे पूरा जीवन निष्काम होता चला जाता है।इन सब यज्ञों को करते हुए जो व्यक्ति निष्काम भाव में जीता है…।जीवन ही यज्ञ है। अगर कोई निष्काम भाव में जी सके, तो वह मुक्त हो जाता है। मुक्त–समस्त बंधनों से, दुखों से, पीड़ाओं से, संतापों से, चिंताओं से।अगर तुमने एक बार भी पूरी तरह 'हाँ ' कहने का आनंद जान लिया, तो तुम आस्तिक हो जाओगे । क्योंकि जब एक बार पूरा 'हाँ ' कहने से इतना आनंद मिलता है, तो पूरा जीवन-प्रतिपल 'हाँ ' कहने के महा- आनंद को तुम न चूकोगे फिर, तुम न छोड़ोगे । आस्तिक का अर्थ है --जिसने पूरे अस्तित्व को कहा-- 'हाँ ' । जिसने 'ना' कहना बन्द कर दिया । मौत आये तो भी आस्तिक कहेगा-- ' हाँ ' ।सुख आये तो भी कहेगा -- ' हाँ ' ।दुख आये तो भी कहेगा --- ' हाँ ' ।'ना' कहना ही उसने छोड़ दिया । वह मार्ग पर आ गया है।'हाँ ' मार्ग है।वैज्ञानिक की शर्त यह है कि वह observe कर सके, निरीक्षण कर सकेObservation विज्ञान का मूल आधार है। जिसे विज्ञान observation कहता है,निरीक्षण कहता है, उसे ही योग, धर्म, ध्यान कहता है। वह धर्म की पारिभाषिक शब्दावली ध्यान है । ध्यान का मतलब है, जो भी देख रहे हैं, उससे दूर खड़े हो कर देख सकें, TO be witness.एक गवाह की तरह देख सकें; सम्मिलित न हो जायें। जिस इन्द्रिय के साथ आपका एकात्म हो जाता है,उसे आप कभी न जान पायेंगे जिस इन्द्रिय के रस के साथ आप इतने डूब जाते हैं कि भूल जाते हैं कि मैं देखने वाला हूँ, बस, फिर ध्यान नहीं हो पाता 1फिर कभी इन्द्रियों के रस का ज्ञान नहीं हो पाता। क्रोध उठे, तो क्रोध से जरा दूर खड़े हो कर देखें, क्या है ? लेकिन हम भगवान पर तो ध्यान करते हैं, जिसका हमें कोई पता नहीं । जिसका हमें पता नहीं, उस पर तो ध्यान होगा कैसे ?ध्यान तो उस पर हो सकता है, जिसका हमें पता है। भगवान पर ध्यान करते हैं, जिसका हमें कोई पता नहीं हैक्रोध पर, काम पर कभी ध्यान नहीं करते, जिसका हमें पता है। और मजा यह है कि जो काम, क्रोध और बाकी इन्द्रियों के समस्त उपद्रव के प्रति, ऊर्जा के प्रति, विस्फोट के प्रति ध्यान करने में समर्थ हो जाता है; जैसे - जैसे उसका ध्यान बढ़ता है इन्द्रियों पर, वैसे - वैसे इन्द्रियाँ विजित होती चली जाती हैं, हारती चली जाती हैं। वह जीतता चला जाता है;उतना recover करता चला जाता है; उतनी जमीन वापस लेता चला जाता है। उतनी - उतनी इन्द्रिय अपनी ताकत छोड़ती चली जाती है, जहाँ - जहां ध्यान की किरण प्रवेश कर जाती है। क्रोध को जिसने जान लिया, वह क्रोध नहीं कर सकता। काम को जिसने जान लिया, वह कामातुर नहीं हो सकता। लोभ को जिसने जान लिया, वह लोभ में नहीं पड़ सकता। अहङ्कार को जिसने पहचाना, वह अहङ्कार के बाहर है।

.... SHIVOHAM...