क्या 'सार' हैं''योगसूत्रो '' का ?- PART-03


योगसूत्र/'योगसार';-

1-''जीवन ऊर्जा है ''।

2-''शक्ति /ऊर्जा, के दो आयाम हैं --अनस्तित्व, अस्तित्व।''शक्ति अस्तित्व और अनस्तित्व में डोलती रहती है।

3-''द्वंद्व के बीच शक्ति का विस्तार है''।

4-''ऊर्जा संयुक्त है, ऊर्जा एक परिवार है; सारा जगत एक प्रवाह है।''जगत में कुछ भी असंबंधित नहीं है।

योग का पहला सूत्रः-

07 FACTS;-

1-योग का पहला सूत्र है कि ''जीवन ऊर्जा है,शक्ति है,'' 'लाइफ इज एनर्जी'।बहुत समय तक विज्ञान सोचता था कि जगत पदार्थ है, मैटर है। लेकिन योग ने विज्ञान की खोजों से हजारों वर्ष पूर्व से यह घोषणा कर रखी थी कि 'पदार्थ 'असत्य है, एक झूठ है, एक इल्यूजन है, एक भ्रम है। भ्रम का मतलब यह नहीं ..'कि नहीं है'। भ्रम का मतलबहै..जैसा दिखाई पड़ता है वैसा नहीं है और जैसा है वैसा दिखाई नहीं पड़ता है। 2-अठारहवीं सदी में वैज्ञानिकों की घोषणा थी कि आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, पदार्थ ही सब कुछ है। लेकिन विगत वर्षों में ठीक उलटी स्थिति हो गई है। विज्ञान को कहना पड़ा ...कि पदार्थ है ही नहीं, सिर्फ दिखाई पड़ता है। ऊर्जा ही सत्य है, शक्ति ही सत्य है। लेकिन शक्ति की तीव्र गति के कारण पदार्थ का भास होता है। 3-परन्तु दीवालें दिखाई पड़ रही हैं एक, अगर निकलना चाहेंगे तो सिर टूट जाएगा। कैसे कहें कि दीवालें भ्रम हैं? स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं, उनका होना है। पैरों के नीचे अगर जमीन न हो तो आप खड़े कहां रहेंगे? वास्तव में ,विज्ञान इस अर्थों में नहीं कहता है कि पदार्थ नहीं है। अर्थ यह है कि जो हमें दिखाई पड़ रहा है, वैसा नहीं है। 4-अगर हम एक बिजली के पंखे को बहुत तीव्र गति से चलाएं तो उसकी तीन पंखुड़ियां दिखाई पड़नी बंद हो जाएंगी। क्योंकि पंखुड़ियां इतनी तेजी से घूमेंगी कि उनके बीच की खाली जगह आंख की पकड़ में आए, इसके पहले कि आप देख पाएं, भर जाएगी।आप गिनती करके नहीं बता सकेंगे कि कितनी पंखुड़ियां हैं। अगर और तेजी से घुमाया जा सके तो आप पत्थर फेंक कर पार नहीं निकाल सकेंगे, पत्थर इसी पार गिर जाएगा।

5- अगर उतनी तेजी से बिजली के पंखे को घुमाया जा सके, जितनी तेजी से परमाणु घूम रहे हैं,तो आप मजे से उसके ऊपर बैठ सकते हैं, और आप गिरेंगे नहीं। आपको पता भी नहीं चलेगा कि पंखुड़ियां नीचे घूम रही हैं। क्योंकि पता चलने में जितना वक्त लगता है, उसके पहले नई पंखुड़ी आपके नीचे आ जाएगी। बीच के गैप /अंतराल का पता न चले तो आप मजे से खड़े रह सकेंगे।ऐसे ही हम खड़े हैं ..अभी भी। अणु तीव्रता से घूम रहे हैं, उनके घूमने की गति तीव्र है इसलिए चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती हैं। जगत में कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। और जो चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती हैं, वे सब चल रही हैं। 6-अगर वे चीजें ही चलती हुई होती तो भी कठिनाई न थी। जितना ही विज्ञान परमाणु को तोड़ कर नीचे गया तो उसे पता चला कि परमाणु के बाद तो फिर पदार्थ नहीं रह जाता, सिर्फ ऊर्जा कण, इलेक्ट्रांस रह जाते हैं, विद्युत कण रह जाते हैं। उनको कण कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि कण से पदार्थ का ख्याल आता है। इसलिए अंग्रेजी में एक नया शब्द उन्हें गढ़ना पड़ा, उस शब्द का नाम क्वांटा है। क्वांटा का मतलब हैः कण भी, कण नहीं भी; कण भी और लहर भी, एक साथ।

7- विद्युत की तो लहरें हो सकती हैं, कण नहीं हो सकते। शक्ति की लहरें हो सकती हैं, कण नहीं हो सकते। लेकिन हमारी भाषा पुरानी है, इसलिए हम कण कहे चले जाते हैं। ऐसे कण जैसी कोई भी चीज नहीं है। अब विज्ञान की नजरों में यह सारा जगत ऊर्जा का, विद्युत की ऊर्जा का विस्तार है।यही है योग का पहला सूत्र 'जीवन ऊर्जा है, शक्ति है'। योग का दूसरा सूत्र ;-

19 FACTS;-

1- ''शक्ति के दो आयाम हैं--एक अस्तित्व और एक अनस्तित्व''; एक्झिस्टेंस और नॉन-एक्झिस्टेंस।शक्ति अस्तित्व में भी हो सकती है और अनस्तित्व में भी हो सकती है।जब शक्ति, अनस्तित्व में होती है तो जगत शून्य हो जाता है और जब अस्तित्व में होती है तो सृष्टि का विस्तार हो जाता है।योग मानता है कि, जो भी चीज है, वह नहीं है और हो भी सकती है। जो भी है, वह न होने में भी समा सकती है। जिसका जन्म है, उसकी मृत्यु है। जिसका होना है, उसका न होना है। जो दिखाई पड़ती है, वह न दिखाई पड़ सकती है। 2-योग के अनुसार , इस जगत में प्रत्येक चीज दोहरे आयाम /डबल डायमेंशन की है। इस जगत में कोई भी चीज एक-आयामी नहीं है। हम ऐसा नहीं कह सकते कि एक आदमी पैदा हुआ और फिर नहीं मरा। कितना ही लंबा हो उसका जीवन , फिर भी हमें पूछना ही पड़ेगा कि 'कभी तो मरा होगा, कभी तो मरेगा'। ऐसा कंसीव करना, ऐसी धारणा भी बनानी असंभव है कि एक छोर हो जन्म का और दूसरा छोर मृत्यु का न हो। दूर हो, कितना ही दूर हो, अंतहीन मालूम पड़े दूरी, लेकिन दूसरा छोर अनिवार्य है।

3-एक छोर के साथ दूसरा छोर वैसे ही अनिवार्य है, जैसे एक सिक्के के दो पहलू अनिवार्य हैं। अगर एक ही पहलू का कोई सिक्का हो सके... तो असंभव मालूम होता है, यह नहीं हो सकता है। दूसरा पहलू होगा ही! क्योंकि एक पहलू होने के लिए ही दूसरे पहलू को होना पड़ेगा। जगत है, जगत नहीं भी हो सकता है। हम हैं, हम नहीं भी हो सकते हैं। जो भी है, वह नहीं हो सकता है। नहीं होने का यह मतलब नहीं है कि कोई दूसरे रूप में हो जाएगा। बिल्कुल नहीं भी हो सकता है। अस्तित्व एक पहलू है, अनस्तित्व दूसरा पहलू है। 4-सोचना कठिन मालूम पड़ता है कि नहीं होने से होना कैसे निकलेगा? होना, नहीं होने में कैसे प्रवेश कर जाएगा? लेकिन अगर हम जीवन को चारों ओर देखें तो हमें पता चलेगा कि प्रतिपल, जो नहीं है, वह हो रहा है; जो है, वह नहीं होने में खो रहा है।उदाहरण के लिए है ..हमारा सूर्य। यह रोज ठंडा होता जा रहा है। इसकी किरणें शून्य में खोती जा रही हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि चार हजार वर्ष तक और गरम रह सकेगा। चार हजार वर्षों में इसकी सारी किरणें शून्य में खो जाएंगी, तब यह भी शून्य हो जाएगा। 5-अगर शून्य में किरणें खो सकती हैं तो फिर शून्य से किरणें आती भी होंगी, अन्यथा सूर्यों का जन्म कैसे होगा? विज्ञान कहता है कि हमारा सूर्य मर रहा है, लेकिन दूसरे सूर्य दूसरे छोरों पर पैदा हो रहे हैं। वे कहां से पैदा हो रहे हैं..वास्तव में, वे शून्य से पैदा हो रहे हैं।वेद ,उपनिषद,बाइबिल आदि सभी बात करते हैं उस क्षण की.. जब कुछ नहीं था। जब कुछ नहीं था,तो नथिंगनेस ही थी। उस ना-कुछ से ...होना पैदा होता है और होना प्रतिपल ना-कुछ में लीन होता चला जाता है। अगर हम पूरे अस्तित्व को एक समझें तो इस अस्तित्व के निकट ही हमें अनस्तित्व को भी स्वीकार करना पड़ेगा। 6- प्रत्येक अस्तित्व के पीछे अनस्तित्व जुड़ा है।तो शक्ति के दो आयाम हैं..अस्तित्व और अनस्तित्व। ये शक्ति हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है और न में भी खो सकती है। इसलिए योग मानता है, सृष्टि सिर्फ एक पहलू है और प्रलय दूसरा पहलू है। ऐसा नहीं है कि सब कुछ सदा रहेगा; ये खोएगा भी, और शून्य भी हो जाएगा। फिर-फिर होता रहेगा, और खोता रहेगा। जैसे एक बीज को तोड़ कर देखें, तो कहीं किसी वृक्ष का कोई पता नहीं चलता। कितना ही खोजें, वृक्ष की कहीं कोई खबर नहीं मिलती। लेकिन फिर भी इस छोटे से बीज से वृक्ष आता जरूर है।

7-हमने कभी नहीं सोचा कि बीज में जो कभी भी नहीं मिलता है, वह कहां से आता है? और इतने छोटे से बीज में इतने बड़े वृक्ष का छिपा होना? फिर वह वृक्ष बीजों को जन्म देकर फिर खो जाता है। ठीक ऐसे ही पूरा अस्तित्व बनता है, खोता है। शक्ति अस्तित्व में आती है और अनस्तित्व में चली जाती है।अनस्तित्व को पकड़ना बहुत कठिन है। अस्तित्व तो हमें दिखाई पड़ता है। इसलिए योग की दृष्टि से, जो सिर्फ अस्तित्व को मानता है, जो समझता है कि अस्तित्व ही सब कुछ है, वह अधूरे को देख रहा है। और अधूरे को जानना ही अज्ञान है।

8-अज्ञान का अर्थ न जानना नहीं है, अज्ञान का अर्थ अधूरे को जानना है। जानते तो हम हैं ही, अगर हम इतना भी जानते हैं कि मैं नहीं जानता, तो भी मैं जानता तो हूं ही। जानना तो हममें है ही। इसलिए अज्ञान का अर्थ न जानना नहीं है। अज्ञानी से अज्ञानी भी कुछ जानता ही है।योग की दृष्टि में अज्ञान का अर्थ ..'आधे को जानना है'। वास्तव में, आधा सत्य असत्य से बदतर होता है। क्योंकि असत्य से छुटकारा संभव है, आधे सत्य से छुटकारा बहुत मुश्किल होता है। क्योंकि वह सत्य मालूम पड़ता है , प्रतीत भी होता है और सत्य होता भी नहीं।अगर पूरा का पूरा असत्य हो,तो उससे

छूटने में देर नहीं लगेगी। लेकिन अधूरा, आधा सत्य हो, तो उससे छूटना बहुत मुश्किल हो जाएगा। 9-एक कारण और भी है कि सत्य जैसी चीज आधी नहीं की जा सकती, आधी करने से मर जाती है। क्या आप अपने प्रेम को आधा कर सकते हैं? क्या आप किसी से ऐसा कह सकते हैं कि मैं तुम्हें आधा प्रेम करता हूं? या तो प्रेम करेंगे या नहीं करेंगे। आधा प्रेम संभव नहीं है।क्या आप ऐसा कह सकते हैं कि मैं आधी चोरी करता हूं? हो सकता है, आधे रुपये की चोरी करते हों। लेकिन आधे रुपये की चोरी पूरी ही चोरी है। लाख रुपये की चोरी भी पूरी चोरी है।चोरी आधी नहीं की जा सकती।वस्तुये आधी की जा सकती है ;लेकिन चोरी आधी नहीं हो सकती। 10-आधे का अर्थ ही यह है कि आप किसी भ्रम में हैं।तो योग कहता है, जो लोग सिर्फ अस्तित्व को देखते हैं, वे आधे को पकड़े हैं। और आधे को जो पकड़ता है, वह भ्रम में ,अज्ञान में जीता है। उसका दूसरा पहलू भी है। जो आदमी कहता है कि मैं जन्म तो लिया हूं, लेकिन मरना नहीं चाहता। वह आदमी आधे को पकड़ रहा है। दुख पाएगा, अज्ञान में जीएगा और कुछ भी करे, मौत आएगी ही, क्योंकि आधे को काटा नहीं जा सकता है। जन्म को स्वीकार किया है तो मौत उसका आधा हिस्सा है, वह साथ ही जुड़ा है। 11-जो आदमी कहता है, मैं सुख को ही चुनूंगा, दुख को नहीं। वह फिर भूल में पड़ रहा है। योग कहता है, तुम आधे को चुन कर ही गलती में पड़ते हो। दुख 'सुख' का ही दूसरा हिस्सा है। वह आधा हिस्सा है। इसलिए जो आदमी सुखी होना चाहता है, उस आदमी को दुखी होना ही पड़ेगा। जो आदमी शांत होना चाहता है, उसे अशांत होना ही पड़ेगा... कोई उपाय नहीं है।योग कहता है,आधे को छोड़ देना ही अज्ञान है। वह उसका ही हिस्सा है। 12-लेकिन हम कभी पूरे को नहीं देखते ।जो पहलू हमें दिखाई पड़ता है उसे हम पकड़ लेते हैं और दूसरे पहलू को इनकार किए चले जाते हैं। बिना यह समझे कि जब हमने आधे को पकड़ लिया है तो आधा पीछे प्रतीक्षा कर रहा है, मौजूद है, अवसर की खोज कर रहा है, जल्दी ही प्रकट हो जाएगा। योग कहता है कि ऊर्जा के दो रूप हैं। और जो दोनों ही रूप को समझ लेता है, वह योग में गति कर पाता है। जो एक रूप को, आधे को पकड़ लेता है, वह अयोगी हो जाता है। जिसको हम भोगी कहते हैं, वह आधे को पकड़े हुए आदमी का नाम है। जिसे हम योगी कहते हैं, वह पूरे को पकड़े हुए का नाम है। 13-योग का मतलब ही होता है--दि टोटल /जोड़। गणित की भाषा में भी योग का मतलब जोड़ होता है। अध्यात्म की भाषा में भी योग का मतलब होता है--इंटीग्रेटेड, दि टोटल, पूरा, समग्र। भोगी हम उसे कहते हैं जो आधे को पकड़ता और आधे को पूरा मान कर जीता है। योगी पूरे को जान लेता है, इसलिए फिर पकड़ता ही नहीं।वास्तव में, पकड़ने वाले सदा आधे को ही पकड़ने वाले होते हैं, पूरे को जानने वाला पकड़ता ही नहीं। जिसको यह दिखाई पड़ गया कि जन्म के साथ मृत्यु है, अब वह किसलिए जन्म को पकड़े? और वह मृत्यु को भी क्यों पकड़े? क्योंकि वह जानता है मृत्यु के साथ जन्म है।

14-जो जानता है कि सुख के साथ दुख है, वह सुख को क्यों पकड़े? और वह दुख को भी क्यों पकड़े, क्योंकि वह जानता है दुख के साथ सुख है। असल में वह जानता है, सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दो चीजें नहीं, एक ही चीज के दो आयाम हैं, दो डायमेंशन हैं। इसलिए योगी, पकड़ने के बाहर हो जाता है,Clinging के बाहर हो जाता है।ऊर्जा/ शक्ति के दो रूप हैं। और हम सब एक रूप को ही पकड़ने की कोशिश में लगे होते हैं।कोई जवानी को पकड़ता है, तो फिर बुढ़ापे का दुख पाता है। वह जानता ही नहीं कि जवानी का दूसरा हिस्सा बुढ़ापा है।वास्तव में, जवानी का मतलब है, बुढ़ापे की यात्रा।

15-बूढ़ा आदमी उतने जोर से बूढ़ा नहीं होता, जितने जोर से जवान बूढ़ा होता है। बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे बूढ़ा होने लगता है, जवान तेजी से बूढ़ा होता है। जवानी का मतलब ही बूढ़े होने की ऊर्जा है। बूढ़े का मतलब बीत गई ,चुक गई जवानी की ऊर्जा है। एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक घर के बाहर का दरवाजा है, एक घर के पीछे का दरवाजा है।जन्म और मृत्यु, सुख और दुख; जीवन के सभी द्वंद्व--अस्तित्व-अनस्तित्व, आस्तिक-नास्तिक... वे भी आधे-आधे को पकड़ते हैं। इसलिए योग की दृष्टि में दोनों ही अज्ञानी हैं।

16-आस्तिक कहता है कि बस 'भगवान है'। आस्तिक सोच भी नहीं सकता कि 'भगवान का न होना' भी हो सकता है। लेकिन यह बड़ा कमजोर आस्तिक है, क्योंकि यह भगवान को नियम के बाहर कर रहा है। नियम तो सभी चीजों पर एक सा लागू है। भगवान अगर है तो उसका न होना भी होगा।नास्तिक उसके दूसरे हिस्से को पकड़े है। वह कहता है, भगवान नहीं है।लेकिन जो चीज नहीं है, वह हो सकती है। और इतने जोर से कहना कि नहीं है, इस डर की सूचना देता है कि उसके होने का भय है। अन्यथा,' नहीं है' कहने की कोई जरूरत नहीं है।

17-जब एक आस्तिक कहता है कि ''नहीं, भगवान है ही,'' और लड़ने को तैयार हो जाता है, तब वह भी खबर दे रहा है कि उसे भी भगवान के न होने का डर है। अन्यथा क्या बिगड़ता है.. कोई कहता है 'नहीं है 'तो कहे। आस्तिक लड़ने को तैयार है, क्योंकि वह भगवान का एक हिस्सा पकड़ रहा है। वह वही की वही बात है, चाहे अपना जन्म पकड़ो और चाहे भगवान का होना पकड़ो, लेकिन दूसरे हिस्से को इनकार किया जा रहा है।योग कहता है...दोनों हैं, होना और न होना साथ ही साथ हैं।

18-इसलिए योगी नास्तिक को भी कहता है कि तुम भी आ जाओ, क्योंकि आधा सत्य तुम्हारे पास है; आस्तिक को भी कहता है, तुम भी आ जाओ, क्योंकि आधा सत्य ही है तुम्हारे पास और आधे सत्य असत्य से भी

ज्यादा खतरनाक हैं।शक्ति/ऊर्जा अस्तित्व और अनस्तित्व में डोलती रहती है। और जहां शक्ति के पहाड़ उठते हैं, वहां शक्ति की खाइयां भी बन जाती हैं। और जहां अस्तित्व निर्मित होता है, वहां अनस्तित्व भी मौजूद होता है। 19-जहां सृष्टि होती है, वहां प्रलय भी होती है।सृष्टि के साथ प्रलय, होने के साथ न होना। सब चीजें जो होती हैं, न होने की यात्रा पर हैं। और जो नहीं हो गई हैं, वे होने की यात्रा पर वापस लौट रही हैं।सागर में आपने लहर देखी है... जो लहर ऊपर उठी है, वह गिरने की यात्रा पर है। और जो खाई उसके नीचे बन गई है, वह उठने की यात्रा पर है। सब चीजें प्रतिपल अपने से विपरीत में प्रवेश कर रही हैं। जिसे यह दिखाई पड़ जाता है, उसकी आकांक्षा, उसकी कामना, उसकी वासना तिरोहित हो जाती है।वह वासना छोड़ता नहीं है , वासना तिरोहित हो जाती है क्योंकि वासना चुनाव/च्वाइस का नाम है।

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इसका क्या अर्थ है कि- ''चेतन और अचेतन,एक ही अस्तित्व के--दो छोर हैं?''-

18 FACTS;-

1-''अस्तित्व के दो रूप हैं--एक जिसे हम 'चेतन 'कहते हैं और एक जिसे हम अचेतन कहते हैं।'' ये सूत्र समझ लेने जरूरी हैं, क्योंकि फिर इन्हीं सूत्रों के ऊपर योग की सारी साधना का भवन खड़ा होता है।हम समझ लेते हैं कि चेतना अलग और अचेतना अलग; शरीर अलग और आत्मा अलग।परन्तु ऐसी अलगता नहीं है। ठीक से समझें, तो आत्मा का जो हिस्सा इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है उसका नाम 'शरीर' है और शरीर का जो हिस्सा इंद्रियों की पकड़ में नहीं आता ..उसका नाम 'आत्मा' है।दो रूप ही हैं, दो चीजें नहीं हैं। 2-चेतन और अचेतन, अस्तित्व के दो रूप हैं। एक पत्थर पड़ा है। वह है, लेकिन अचेतन है। आप उसके पड़ोस में खड़े हैं। आप भी हैं। होने में कोई फर्क नहीं है, दोनों का अस्तित्व है, लेकिन एक चेतन है और एक अचेतन है।लेकिन पत्थर चेतन बन सकता है और आप पत्थर बन सकते हैं ...कनवर्टिबल हैं। इसलिए तो आप गेहूं खा लेते हैं और खून बन जाता है। इसलिए तो आपके शरीर में लोहा जाता है और जीवंत हो जाता है।

3-अगर हम आदमी के शरीर का सब सामान निकाल कर बाहर टेबल पर रखें, तो कुछ रुपये से ज्यादा का सामान नहीं निकल सकता। थोड़ा सा लोहा है, अल्युमिनियम है, फास्फोरस है, तांबा है, ये सब चीजें निकलेंगी। और बड़ा हिस्सा तो पानी का है।लेकिन आदमी के भीतर होकर वे चेतन और जीवित हैं। हाथ को चोट लगती है तो पीड़ा उठती है। और यही हाथ का हिस्सा कल बाहर था और पीड़ा नहीं उठती थी। कल फिर बाहर हो जाएगा। 4-जिस जगह आप बैठे हैं, उस जगह कम से कम दस आदमियों की कब्र बन चुकी है। पूरी पृथ्वी पर जितने लोग अब तक हुए हैं, उन सबका अनुपात इतना है कि जहां भी हम खड़े हैं, उस जमीन की मिट्टी में, उस छोटे से एक वर्गफीट के हिस्से में.. कम से कम दस आदमियों का शरीर मिट्टी हो चुका है। वे दसों आदमी कभी जीवित थे, आज आपके पैर में धूल की तरह पड़े हैं। आज आप जीवित हैं और कल आप भी धूल की तरह पड़े होंगे। 5-चेतन और अचेतन, अस्तित्व के दो रूप हैं..परन्तु दो अस्तित्व नहीं हैं। एक अस्तित्व के ही दो रूप हैं;इसलिए कनवर्टिबल हैं, रूपांतरित हो सकते हैं। इसलिए चेतन से अचेतन आ सकता है और अचेतन चेतन में जा सकता है।प्रत्येक दिन हम यही कर रहे हैं।हम 'जड़ अचेतन' को भोजन बना रहे हैं और हमारे भीतर वह चेतन बनता जाता है। और प्रत्येक दिन हमारे भीतर से बहुत रूपों में मल निष्कासित हो रहा है और जड़ होता जा रहा है। आदमी इधर से अचेतन को लेता है, और वह भीतर चेतन होता जाता है।इस प्रकार चेतन और अचेतन भी दो चीजें नहीं हैं। 6- लेकिन नास्तिक कहते हैं, सिर्फ अचेतन ही है।उनको भी बड़ी मुश्किल पड़ती है समझाने में कि अगर सिर्फ अचेतन ही है तो फिर चेतन कहां से आता है..। मार्क्स जैसे नास्तिक कहते है कि चेतना कोई असली चीज नहीं है..यह तो एपि-फिनामिनन / बाइ-प्रोडक्ट है ;पदार्थ के मिलने-जुलने से पैदा हो गई घटना है। यह कोई वस्तु नहीं है, ईवेंट है।चार्वाक को कहना पड़ता है कि यह आदमी की चेतना वैसे ही है, जैसे पानवाला पान बनाता है, कत्था और चूना को लगाता है, और फिर जब आप पान खाते हैं तो लाल रंग पैदा हो जाता है। वह लाल रंग न तो अकेले चूने में है, न अकेले कत्थे में है, न अकेले पान में है। उन सबके मिलने से पैदा हो जाता है। वह संघट परिणाम है, वह बाइ-प्रोडक्ट है, वह एपि-फिनामिनन है। 7-तो नास्तिक को, चाहे चार्वाक हो या चाहे मार्क्स हो, उनकी भाषा में थोड़ा फर्क पड़ता है, बाकी उनकी कठिनाई यही है कि चेतना दिखाई तो पड़ती है, इसे समझाएं कैसे? तो एक ही रास्ता है उनके पास कि वे यह कहें कि अचेतन चीजों से मिल कर चेतना पैदा हो जाती है। लेकिन यह बड़ी अवैज्ञानिक बात है। और मार्क्स जैसे वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले आदमी के मुंह में बिल्कुल शोभा नहीं देती। क्योंकि जिससे जो चीज पैदा होती है, वह उसमें कहीं न कहीं छिपी होनी चाहिए, अन्यथा पैदा नहीं हो सकती। 8-अगर पान में लाल रंग आ जाता है, तो माना कि एक-एक चीज में अलग वह नहीं था, लेकिन वह लाल रंग इन सबमें छिपा था, जुड़ कर प्रकट हुआ, अलग-अलग में दिखाई नहीं पड़ता था। आक्सीजन और हाइड्रोजन को अलग-अलग अगर हम पी लें तो प्यास नहीं बुझेगी। न हाइड्रोजन में पानी है और न आक्सीजन में पानी है। लेकिन दोनों को मिला कर पानी बन जाएगा और फिर प्यास बुझ जाएगी। यह पानी कहां से आया? यह पानी आक्सीजन और हाइड्रोजन में था, लेकिन दोनों मिलें तो ही प्रकट हो सकता था। 9-आप अकेले कमरे में बैठे हुए थे। कोई आपके कमरे में आ गया और दोनों ने बातचीत शुरू कर दी। यह बातचीत आसमान से नहीं आ गई, दोनों के भीतर थी ।लेकिन अगर आप अकेले कमरे में बोलते तो पागल समझे जाते।दूसरा आ गया तो अब आप पागल नहीं समझे जायेंगे, अब प्रकट होने की सुविधा हो गई।तो जो भी चीज प्रकट होती है, वह जिनसे प्रकट होती है, उनमें गुप्त होती है, छिपी होती है। इसलिए नास्तिकों के ये दावे--कि चेतना पदार्थ से ऐसे ही प्रकट हो गई,परन्तु थी नहीं--अत्यंत अवैज्ञानिक हैं। योग यह मानने को तैयार नहीं है। 10-आस्तिक की भी तकलीफ यही है। वे इससे उलटी बातें करते हैं।वे कहते हैं, पदार्थ है ही नहीं, जड़ कुछ है ही नहीं, सब परमात्मा ही परमात्मा है।तो फिर सवाल उठता है कि यह सब जो चारों तरफ दिखाई पड़ रहा है, कहां से पैदा होता है? वे कहते हैं कि माया है, इल्यूजन है; है नहीं .. यह भी एपि-फिनामिनन है। यह भी शैडो एक्झिस्टेंस है परन्तु है नहीं। वही तकलीफ जो नास्तिक की है, वही तकलीफ आस्तिक की भी है.. यह कि 'दूसरे को कैसे समझाओगे' .. वह भी है! तो उसके लिए फिर चक्करदार तर्क खोजने पड़ते हैं। और वे तर्क कभी भी कुछ सिद्ध नहीं कर पाते। 11-योग कहता है, दोनों हैं; इसलिए किसी चक्करदार तर्क में नहीं पड़ता। और वह यह भी कहता है, दोनों दो नहीं हैं। अन्यथा फिर दोनों को जोड़ने का उपद्रव होगा कि दोनों को जोड़ें कैसे? दोनों एक ही के दो रूप हैं। जैसे मेरे दोनों हाथ हैं--बाएं और दाएं। ये दो दिखाई पड़ते हैं, परन्तु ये मेरे लिए दो नहीं हैं।मेरे लिए तो एक ही शक्ति दोनों पर फैली है। हालांकि मजे की बात है, मैं चाहूं तो दोनों हाथों को लड़ा सकता हूं और दोनों एक ही ऊर्जा हैं 12-पहले बीमारियां दो तरह की समझी जाती थीं--फिजिकल और मेंटल--कि एक मानसिक बीमारी है और एक शारीरिक बीमारी है, क्योंकि मन अलग है और शरीर अलग है। अब चिकित्साशास्त्र एक नये शब्द का प्रयोग करता है--साइकोसोमेटिक या सोमेटोसाइकिक। अब कोई बीमारी न तो अकेली मानसिक है और न अकेली शारीरिक है। बीमारी मनोशारीरिक, साइकोसोमेटिक है.. दोनों ही छोर उसके हैं।अगर आपका मन बीमार हो जाए तो आपका शरीर भी बीमार हो जाता है। और अगर आपका शरीर बीमार हो जाए तो आपका मन भी बीमार हो जाता है। जब मन रुग्ण होता है, चिंतित होता है, दुखी होता है, तो शरीर तत्काल उदास, बीमार और रुग्ण हो जाता है। अगर मन में बीमारी डाल दी जाए तो शरीर बीमार हो जाता है।और ठीक होने की दिशा में, सब तरह की बीमारियों को प्रभावित भी किया जा सकता है..केवल मन में विचार डाल कर। 13- उदाहरण के लिए एक आदमी के घर में आग लग गई थी। वह दो साल से लकवे से बीमार पड़ा था। उठ नहीं सकता था। सब इलाज हो गए थे। घर में आधी रात आग लगी तो सारे घर के लोग बाहर निकल गए। जब बाहर निकले तब उन्हें ख्याल आया कि घर के बूढ़े का क्या हुआ? उनको तो लकवा है, वे तो आ नहीं सकते। लेकिन तभी उन्होंने देखा कि बूढ़ा अकेला नहीं आ रहा, अपनी पैसों की पेटी लिए बाहर चला आ रहा है! तब तो वे बड़े चकित हुए, क्योंकि वह आदमी तो उठ भी नहीं सकता था। जब वह बीच में आकर खड़ा हो गया तब उन सबने कहा कि आप और चले! उस आदमी ने कहा, मैं और कैसे चल सकता हूं! वह वापस वहीं गिर पड़ा। लकवा वापस लौट आया। 14-यह क्या हुआ? इस आदमी को लकवा नहीं है, इस आदमी को मानसिक लकवा है। इसके मन के छोर पर लकवा पकड़ गया है, शरीर उसका अनुगमन कर रहा है।इससे उलटा भी हो सकता है कि किसी आदमी के शरीर को लकवा पकड़ा हो और उसका मन अगर इनकार कर दे तो शरीर को लकवा चलाना मुश्किल हो जाए। इसलिए जो लोग संकल्पवान हैं, वे कैसी भी बीमारी से जूझ सकते हैं। और जो लोग संकल्पहीन हैं, वे कैसी भी झूठी बीमारी से परेशान हो सकते हैं। 15-योग का कहना है कि हमारे भीतर शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर चेतन और अचेतन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं; केवल एक ही अस्तित्व है, जिसके ये दो छोर हैं। और इसलिए किसी भी छोर से प्रभावित किया जा सकता है।उदाहरण के लिए,तिब्बत में एक प्रयोग है,जिसका नाम है..हीट-योग /उष्णता का योग। वह तिब्बत में सैकड़ों ऐसे फकीर हैं जो नंगे बर्फ पर बैठे रह सकते हैं और उनके शरीर से पसीना गिरता रहता है। इस सबकी वैज्ञानिक जांच-परख हो चुकी है।और चिकित्सक बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं कि यह क्या हो रहा है? 16-यह आदमी योग के सूत्र का प्रयोग कर रहा है। इसने मन से मानने से इनकार कर दिया कि बर्फ पड़ रही है। यह आंख बंद करके यह कह रहा है, ''बर्फ नहीं पड़ रही है ,कि सूरज तपा है , धूप बरस रही है और मैं गरमी से तड़पा जा रहा हूं।'' शरीर उसका अनुसरण कर रहा है,और वह पसीना छोड़ रहा है।सैकड़ों योगियों ने खून की गति पर नियंत्रण घोषित किया है। कहीं से भी कोई भी वेन काट दी जाए, खून उनकी आज्ञा से बहेगा या बंद होगा। 17-यदि आप अपनी नाड़ी को गिन लें और गिनने के बाद पांच मिनट बैठ जाएं और मन में सिर्फ इतना सोचते रहें कि मेरी नाड़ी की रफ्तार तेज हो रही है, तेज हो रही है, तेज हो रही है। और पांच मिनट बाद फिर नाड़ी को गिनें। तो आप पाएंगे, रफ्तार तेज हो गई है।यह कम भी हो सकती है। शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं; एक ही चीज का विस्तार हैं, एक ही चीज के अलग-अलग वेवलेंथ हैं। चेतन और अचेतन एक का ही विस्तार हैं। 18-योग के सारे के सारे प्रयोग इस सूत्र पर खड़े हैं। इसलिए योग मानता है, कहीं से भी शुरू किया जा सकता है।यात्रा, शरीर से भी शुरू की जा सकती है और मन से भी शुरू की जा सकती है। बीमारी , स्वास्थ्य , सौंदर्य, शक्ति, और उम्र --शरीर से भी प्रभावित होती है,और मन से भी प्रभावित होती है।सारी बात इस पर निर्भर करती है कि हमारे व्यक्तित्व के दो हिस्से हैं--चेतन और अचेतन। और जगत के भी दो हिस्से हैं--चेतन और अचेतन। जिसे हम पदार्थ कह रहे हैं वह जगत का अचेतन हिस्सा है, जिसे हम जीवन कह रहे हैं वह जगत का चेतन हिस्सा है। इस सारे चेतन और इस सारे अचेतन में कोई विरोध नहीं है। ये दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं।

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योग का तीसरा सूत्र ;-

24 FACTS;-

1-''द्वंद्व के बीच शक्ति का विस्तार है''।वास्तव में,अंधेरे और प्रकाश के बीच एक ही चीज का विस्तार है ; लेकिन हमें लगता है दो चीजें हैं। एक वैज्ञानिक कहेगा कि जिसे हम अंधेरा कहते हैं, वह सिर्फ कम प्रकाश का नाम है। और जिसे हम प्रकाश कहते हैं, वह कम अंधेरे का नाम है;केवल डिग्रीज का फर्क है।इसलिए कुछ पक्षी हैं जिनको रात में दिखाई पड़ता है।आपके लिए अंधेरा है ,लेकिन उनके लिए अंधेरा नहीं है। क्योंकि उनकी आंखें उतने धीमे प्रकाश को भी पकड़ने में समर्थ हैं। 2-ऐसा नहीं है कि धीमा प्रकाश ही पकड़ में नहीं आता, बहुत तेज प्रकाश भी आंख की पकड़ में नहीं आता। अगर बहुत तेज प्रकाश आपकी आंख पर डाला जाए, आंख तत्काल अंधी हो जाएगी, देख नहीं पाएगी। देखने की एक सीमा है। उसके नीचे भी अंधकार है, उसके ऊपर भी अंधकार है। बस एक छोटी सी सीमा है, जहां हमें प्रकाश दिखाई पड़ता है। लेकिन जिसे हम अंधकार कहते हैं, वह भी प्रकाश की तारतम्यताएं हैं, वे भी डिग्रीज हैं। उनमें जो अंतर है, क्वालिटेटिव नहीं है, क्वांटिटेटिव है। गुण का कोई अंतर नहीं है, सिर्फ परिमाण का अंतर है। 3-हम समझते हैं कि गरमी और सर्दी दो चीजें हैं। लेकिन ये दो चीजें नहीं हैं।जिसे हम शीतल छाया कहते हैं, वह गरमी की ही कम मात्रा है। और जिसे हम सख्त धूप कहते हैं, वह शीतलता की ही कम हो गई मात्रा है। उदाहरण के लिए, कभी ऐसा करें कि एक हाथ को स्टोव के पास रख कर गरम कर लें और एक को बर्फ पर रख कर ठंडा कर लें और फिर दोनों हाथों को एक बाल्टी भरे पानी में डाल दें। तब आप बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे कि बाल्टी का पानी गरम है या ठंडा; क्योकि एक हाथ कहेगा, ठंडा है और एक हाथ कहेगा, गरम है। 4-अब एक ही बाल्टी का पानी दोनों नहीं हो सकता। और आपके दोनों हाथों में से दो खबरें आ रही हैं! जो हाथ ठंडा है उसे पानी गरम मालूम होगा, जो हाथ गरम है उसे पानी ठंडा मालूम होगा। ठंडक और गरमी रिलेटिव हैं, सापेक्ष हैं। जीवन और मृत्यु, अस्तित्व-अनस्तित्व, अंधकार-प्रकाश, बचपन-बुढ़ापा, सुख-दुख, सर्दी-गरमी, सब रिलेटिविटीज हैं, सब सापेक्षताएं हैं। ये सब एक ही चीज के नाम हैं। 5-बुराई-भलाई... भी एक ही चीज के नाम हैं।लेकिन यहां जरा कठिनाई हो सकती है। क्योंकि ठंडक और गरमी को मान लेना बहुत आसान है, एक सी होंगी, कुछ हर्ज भी नहीं होता। लेकिन राम और रावण.. तो जरा अड़चन हो सकती है। मन कहेगा, ऐसा कैसा हो सकता है? लेकिन राम और रावण भी तारतम्यताएं हैं, वे भी दो विरोधी चीजें नहीं हैं, एक ही चीज का कम-ज्यादा होना है। राम में रावण जरा कम है, रावण में राम जरा कम है, बस इतना ही।

6-इसलिए जो रावण को प्रेम करे, उसमें उसे राम दिखाई पड़ सकता है। और जो राम की दुश्मनी करे, उनमें भी रावण दिखाई पड़ सकता है। वे तारतम्यताएं हैं। तो जिसे हम प्रेम करते हैं उसमें राम दिखाई पड़ने लगता है, जिसे हम प्रेम नहीं करते उसमें रावण दिखाई पड़ने लगता है। राम में भी बुरा देखने वाले लोग मिल जाएंगे, रावण में भी भला देखने वालों की कोई कमी नहीं है। तारतम्यताएं हैं.. आपके हाथ पर निर्भर करेगा।अच्छाई और बुराई भी योग की दृष्टि में एक ही चीज के भेद हैं। 7-लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आप बुरे हो जाएं और अच्छाई छोड़ दें।योग का केवल कहना इतना है कि अगर अच्छाई को जोर से पकड़ा, तो ध्यान रखना, दूसरे पहलू पर बुराई भी पकड़ में आ जाएगी। अच्छा आदमी बुरा होने से नहीं बच सकता। और बुरा आदमी अच्छे होने से नहीं बच सकता। इसलिए अच्छे से अच्छे आदमी को अगर थोड़ा उधेड़ कर देखेंगे तो बुरा आदमी भीतर बैठा मिल जाएगा। और बुरे से बुरे आदमी को जरा तलाश करेंगे तो अच्छा आदमी भीतर बैठा मिल जाएगा।

8-यह बड़े मजे की बात है कि अगर हम अच्छे आदमियों के सपनों की जांच-पड़ताल करें तो वे बुरे सिद्ध होंगे। सब अच्छे आदमी आमतौर से बुरे सपने देखते हैं। जिसने दिन में चोरी से अपने को बचाया, वह रात में चोरी कर लेता है। कंपनसेशन करना पड़ता है न! वह जो दूसरा हिस्सा है वह कहां जाएगा? जिसने दिन में उपवास किया, वह रात राजमहल में निमंत्रित हो जाता है, भोजन कर लेता है। 9-इसलिए अगर भले आदमी को शराब पिला दें, तब आपको पता चलेगा कि भीतर कौन बैठा है! शराब किसी को बुरा नहीं बना सकती है। शराब में वैसा कोई गुण नहीं है बुरा बनाने का। शराब में सिर्फ एक गुण है कि वह जो दूसरा पहलू है ..उसे उघाड़ देती है। इसलिए अक्सर शराब पीने वाले लोग शराब पीने के बाद अच्छे मालूम पड़ेंगे।आमतौर से जिन्हें हम बुरे आदमी कहते हैं, उनके भीतर अच्छे आदमी छिपे रहते हैं। और जिनको हम अच्छे आदमी कहते हैं, उनके भीतर बुरे आदमी छिपे रहते हैं।

10-हालांकि जब अच्छे आदमी के भीतर का बुरा आदमी काम करता है , तो भी अच्छे का बहाना लेकर करता है। अगर अच्छा पिता अपने बेटे की गर्दन दबाता है, तो सीधी नहीं दबा देता; सिद्धांत, नीति, शिष्टाचार, अनुशासन, इन सबका बहाना लेकर दबाता है। अगर अच्छा शिक्षक दंड देता है, तो जिसको दंड देता है उसी के हित में देता है। अच्छा आदमी अगर बुरा भी करता है, तो बुराई को अच्छी खूंटी पर ही टांगता है ।और बुरा आदमी अगर अच्छे काम भी करता है, तो स्वभावतः उसके पास बुराई की खूंटी ही होती है, वह उसी पर टांगता है। लेकिन जो भी एक पहलू को पकड़ेगा, उसके भीतर दूसरा पहलू सदा मौजूद रहेगा।योग कहता है कि दोनों को समझ लो और पकड़ो मत। 11-इसलिए जब पहली बार योग की खबर पश्चिम में पहुंची तो वहां के विचारक बहुत हैरान हुए। क्योंकि उन विचारकों ने कहा, इस योग में नीति की/मॉरेलिटी की तो कोई जगह ही नहीं है!इसमें कहीं भी नहीं लिखा हुआ है--जैसा कि टेन कमांडमेंट्स हैं ईसाइयों के--यह मत करो, यह बुरा है... डोंट्स की कोई बात ही नहीं है इसमें। यह कैसा योग है!लेकिन विज्ञान तो निष्पक्ष है...दोनों बातों को खोल कर रख देता है।योग कहता है कि यह बुराई है, यह अच्छाई है और दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं। अगर तुम एक को भी पकड़ोगे तो दूसरा तुम्हारे भीतर छिपा हुआ मौजूद रहेगा। तुम दोनों को समझ लो और पकड़ो मत।इसलिए योग अच्छे और बुरे का.. दोनों के पार हो जाना है ...ट्रांसेनडेंस है। 12-योग सुख और दुख का ,जन्म और मृत्यु का अतिक्रमण है। योग अस्तित्व-अनस्तित्व का अतिक्रमण है, दोनों के पार है, बियांड है। यह सूत्र ठीक से समझ लें तो आगे बहुत सी बातें समझनी आसान हो जाएंगी। प्रत्येक चीज का दूसरा पहलू सदा मौजूद है। इसलिए जब भी आप एक चीज पकड़ते हों, ध्यान में ले लेना, उससे उलटा भी आपने पकड़ लिया है। 13-जब आपने किसी को प्रेम से कहा है कि अब मैं तुमसे मिल गया, अब मैं कभी बिछुड़ना न चाहूंगा, तब आप ठीक से समझ लेना कि आपके मिलन में विरह मौजूद है, वह घटित होकर रहेगा। असल में, मिलते वक्त भी प्रेमी यही कहता है कि मुझे बहुत डर लग रहा है कि कहीं हम बिछुड़ न जाएं! क्योकि वह दूसरा पहलू उसको भी पता चल रहा है। नहीं तो मिलते क्षण में विरह की क्या बात है? जब मिले हैं तो मिले हैं। लेकिन मिलते क्षण में विरह पीछे छाया की तरह खड़ा है। 14-जब किसी को मित्र बनाएं, तब समझ लेना कि एक और आदमी शत्रु/पोटेंशियल एनिमी.. पैदा कर लिया। यह तो पक्का है कि बिना मित्र बनाए शत्रु नहीं बनाया जा सकता। सीधा शत्रु बनाने का अब तक कोई उपाय नहीं खोजा गया। शत्रु को भी मित्र होने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अगर शत्रु भी बनना हो तो मित्र होने के रास्ते से ही जाना पड़ता है। तो जब मित्र बनाएं, तब योग कहता है, जानना कि शत्रु छाया की तरह पीछे खड़ा है। 15-जीवन के प्रत्येक भाग में विपरीत को सदा स्मरण रखना, तो क्लिंगिंग, पकड़ छूट जाएगी। तब सुख आपके द्वार पर दस्तक देगा, तो आप उसके पीछे झांक कर देख लेंगे कि दुख को जरूर साथ लाया होगा। क्योकि वह उसकी छाया है। वह उसके बिना कभी आता नहीं। और जब दुख आए... तो योग में प्रविष्ट व्यक्ति के लिए, सुख आता है तो आ जाने देता है, बहुत स्वागत नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि पीछे तुम किसको लिए हो; और जब दुख आता है, तब उसे भी स्वागत से बिठा देता है, क्योंकि वह जानता है कि तुम किसे पीछे लिए हो। सुख और दुख में वह सम हो जाता है।

16-सम का सिर्फ एक ही आधार है कि प्रत्येक चीज अपने विरोधी से अनिवार्य रूप से जुड़ी है। विरोध के बिना अस्तित्व नहीं है। जिसे हमने प्रेम किया है, उससे हमने घृणा के बीज बो दिए। जिससे हम मिले हैं, उससे हमने विरह का मार्ग तय किया। जिसे हमने अपना बनाया, उसे हमने पराया बनाने के सूत्र सिखा दिए। जो यशस्वी हुआ, उसने अपने अपमान के लिए बीज बोए। जो जीता, उसने हार को निमंत्रण दिया। 17-संत लाओत्से ने एक दिन अपने मित्रों को कहा था कि मुझे जिंदगी में कोई हरा नहीं सका। स्वभावतः उनके मित्र चुप हो गए। उन्होंने पूछा,'' हमें भी बताओ वह राज, वह सीक्रेट कि तुम्हें कोई हरा क्यों नहीं सका? हम भी किसी से हारना नहीं चाहते हैं''। तब संत लाओत्से खिलखिला कर हंसने लगा और उसने कहा, गलत लोगों को मैं सूत्र न बताऊंगा। उन्होंने कहा, ''कैसे गलत लोग? हमें जरूर बताओ वह मार्ग जिससे हम भी न हार सकें''। लाओत्से ने कहा, ''तुम तो हारोगे ही, क्योंकि जो हारना नहीं चाहता, उसने हार को निमंत्रण दे दिया। हमारा सूत्र यही है कि हमें कोई कभी हरा न सका, क्योंकि हमने कभी जीतना ही न चाहा। क्योंकि जो जीतना चाहेगा वह हारेगा''। 18-संत लाओत्से अपने शिष्यों को लेकर एक जंगल से गुजर रहा था । उसने देखा कि सारा जंगल कट रहा है लेकिन सिर्फ एक वृक्ष है जो कि खड़ा है, उसे कोई छूता भी नहीं। लाओत्से ने कहा कि '' जाओ, इस वृक्ष से पूछो कि इसके बेचने का राज क्या है? क्या इसे योग के सूत्र पता चल गए?जब सारा जंगल कटता है, तो यह वृक्ष क्यों नहीं कटता''?लाओत्से ने कहा था तो उसके शिष्य गए। मुश्किल में तो पड़े कि वृक्ष से क्या पूछेंगे? वृक्ष के चारों तरफ घूमे, लेकिन वृक्ष से क्या पूछें?

19-बात सच थी,किसी ने एक पत्ता भी नहीं तोड़ा था, एक शाखा भी नहीं कटी थी। एक हजार बैलगाड़ियां ठहर सकें, इतने दूर तक उसकी शाखाओं का फैलाव था, बड़ी घनी छाया थी! फिर उन्होंने सोचा कि चल कर हम इन कारीगरों से ही पूछ लें जो पड़ोसी वृक्षों को काट रहे हैं। उन कारीगरों से उन्होंने पूछा कि ''इस वृक्ष के बचने का राज क्या है? इसे क्यों नहीं काटा''? उन कारीगरों ने कहा कि यह वृक्ष बहुत अजीब है। इसकी लकड़ियां इतनी तिरछी हैं कि वे फर्नीचर के काम में न आ सकेंगी। 20-तो उन्होंने कहा, 'काट कर कम से कम ईंधन तो बना सकते हो'! उन्होंने उत्तर दिया , ''यह वृक्ष बड़ा अजीब है, इससे इतना धुआं फिंकता है कि इसका कोई ईंधन नहीं बना सकता। यह वृक्ष बिल्कुल बेकार है। इसको काटना बेकार मेहनत खराब करनी है''।शिष्यों ने लौट कर लाओत्से से कहा कि'' राज यह है कि यह वृक्ष बिल्कुल बेकार है। लकड़ियां सीधी नहीं, धुआं छोड़ती हैं। पत्ते किसी दवा के काम नहीं आते। कोई जानवर पत्ते खाने को राजी नहीं है। यह वृक्ष बड़ा बेकार है''। 21-लाओत्से ने कहा कि धन्य है यह वृक्ष! इसकी शाखाओं ने सीधे होने की कोशिश नहीं की, इसलिए वे कटने से बच गईं। जो वृक्ष सीधे होने की कोशिश में हैं, देखते हो, कटे जा रहे हैं। इस वृक्ष के पत्तों ने कुछ होने की कोशिश नहीं की, स्वादिष्ट होने की कोशिश नहीं की, इसलिए कोई तोड़ने नहीं आया। इसलिए है--और अपने पूरे आनंद में मग्न है।लाओत्से ने बताया कि ''यही तरकीब मेरी है। मुझे कभी कोई हरा नहीं सका, क्योंकि हम जीतने ही नहीं गए। मैं सदा से हारा ही हुआ हूं, इसलिए मुझे हराना मुश्किल है''। 22-एक बार किसी गांव में लाओत्से रुका था।उसने किसी से कहा कि मुझे कभी कोई हरा नहीं सका। गांव में खबर पहुंच गई।एक पहलवान ने यह सुन कर कि लाओत्से को कोई हरा नहीं सका, चुनौती कर दी थी। उसने समझा कि यह चुनौती है और लाओत्से के दरवाजे पर झंडा गाड़ दिया कि 'मैं तुम्हें हराऊंगा'! लाओत्से ने कहा, 'नहीं हरा सकोगे'। उसने कहा कि 'मैं अभी हरा कर दिखाऊंगा'।वहां भीड़ इकट्ठी हो गई। वह पहलवान अपनी लंगोटी बांध कर कूद पड़ा ताकत लगा कर, भगवान का नाम लेकर। लेकिन लाओत्से उसके सामने चित्त लेट गया और उससे कहा कि 'आ, मेरे ऊपर बैठ'! 23-पहलवान ने कहा कि 'तुम आदमी कैसे हो? तुम्हें तो हराने का मजा ही चला गया'।लाओत्से ने कहा, मैंने पहले ही कहा कि मुझे अब तक कोई हरा नहीं सका, क्योंकि हम पहले से ही हारे हुए हैं। हम जीतना नहीं चाहते। आओ, हमारी छाती पर बैठ जाओ और गांव में डुंडी पीट कर कह दो कि हरा आए, चित्त कर दिया।उस पहलवान ने कहा कि ऐसे आदमी के ऊपर बैठना बेकार है। वह पहलवान उसके पैर छूकर अपने घर चला गया। उसने कहा कि झगड़ा व्यर्थ है। 24-योग कहता है, द्वंद्व में चुनाव व्यर्थ है। योग कहता है, वे जो दो दिखाई पड़ते हैं जीवन में सदा, उनमें चुनना ही मत। वे दोनों एक दूसरे के ही रूप हैं। सिर्फ धोखा है। चेहरा और है, पीछे कुछ और है। अस्तित्व-अनस्तित्व, जीवन-मृत्यु, सुख-दुख, अच्छा-बुरा, नीति-अनीति, धर्म-अधर्म, सब एक ही चीज के विस्तार हैं। इनको चुनना ही मत, इनको समझ लेना। इनको समझ लेने से अतिक्रमण, ट्रांसेनडेंस उपलब्ध हो जाता है।

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19 FACTS;-

1-योग का चौथा सूत्र है..'' ऊर्जा संयुक्त है, ऊर्जा एक परिवार है।''जगत में कुछ भी असंबंधित नहीं है'', एवरीथिंग इज रिलेटेड... दि वर्ल्ड इज ए फेमिली। यह जो जगत है, एक परिवार है। यहां असंबंधित कुछ भी नहीं है, यहां सब जुड़ा है, यहां टूटा कुछ भी नहीं है। यहां पत्थर से आदमी जुड़ा है, जमीन से चांद-तारे जुड़े हैं, चांद-तारों से हमारे हृदय की धड़कनें जुड़ी हैं, हमारे विचार सागरों की लहरों से जुड़े हैं, पहाड़ों के ऊपर चमकने वाली बर्फ हमारे मन के भीतर चलने वाले सपनों से जुड़ी है। यहां टूटा हुआ कुछ भी नहीं है, यहां सब संयुक्त है, यहां सब इकट्ठा है। यहां अलग-अलग होने का उपाय नहीं है, क्योंकि यहां बीच में गैप नहीं है, जहां से चीजें टूट जाएं।टूटा होना सिर्फ हमारा भ्रम है। 2-यहां सब जुड़ा है।इसलिए न चेतन अचेतन से टूटा है, न अस्तित्व अनस्तित्व से टूटा है, न पदार्थ मन से टूटा है, न शरीर आत्मा से टूटा है, न परमात्मा पृथ्वी से/प्रकृति से टूटा है। टूटा होना शब्द ही झूठा है। सब जुड़ा है / इकट्ठा है, संयुक्त है। संयुक्त और इकट्ठा शब्दों से गलती मालूम पड़ती है, क्योंकि ये शब्द हम उनके लिए लाते हैं जो टूटे हुए हैं। यह एक ही है। जैसे एक ही सागर में अनंत लहरें हैं। हर लहर दूसरी लहर से जुड़ी है। आप जिस किनारे पर बैठे हैं, वहां जो लहर आकर टकराती है, वह लहर अंतहीन किनारों से जुड़ी है जो आपको दिखाई भी नहीं पड़ते। 3-यहां से, पृथ्वी से दस करोड़ मील दूर पर सूरज है। सूरज ठंडा हो जाए, हम सब ठंडे हो जाएं। हम यह न कह सकेंगे कि ''दस करोड़ मील दूर जो सूरज है, उससे हमारा क्या लेना-देना... हो जाओ ठंडे! हम अपने घर का दीया जला रखेंगे, क्या फिकर है'' !क्योंकि सारी जीवन-ऊर्जा उस सूरज से आपको मिल रही है।लेकिन वह सूरज भी दूसरे सूरजों से जुड़ा है, महासूर्यों से जुड़ा है। वैज्ञानिक कहते हैं कि अब तक उन्होंने जो गणना की है, वह करीब दस करोड़ सूर्यों की है..और वे सब संयुक्त हैं।यह गणना पूरी नहीं है,और न कभी पूरी होगी, क्योंकि इससे आगे, और आगे, और आगे विस्तार है ...वह अंतहीन है। 4-इस अनंत विस्तार में सब संयुक्त है। यहां एक फूल भी खिला है, तो वह भी हमसे जुड़ा है; और सड़क के किनारे एक कंकड़ पड़ा है, तो वह भी हमसे जुड़ा है। जब इस संयुक्तता को समझेंगे, तो हमारी नाड़ी तो प्रभावित होगी ही, जो चीजें आपके बिल्कुल ख्याल में नहीं आतीं, वे भी प्रभावित हो सकती हैं।उदाहरण के लिए,एक छोटी सी सुई पर एक प्रयोग करें। एक गिलास में पानी भर लें और उस पानी पर कोई भी चिकनी चीज फैला दें।थोड़ा सा घी,ग्रीस या थोड़ा सा तेल फैला दें और एक पतली आलपिन को उस तेल पर तैरा दें।

5-फिर उस गिलास के ऊपर दोनों आंखें गड़ा कर बैठ जाएं, दो मिनट तक आंखें न झपकें। और फिर उस पिन को कहें कि बाएं घूम जाओ! और आप हैरान होंगे कि सुई बाएं घूमती है। और उससे कहें, दाएं घूम जाओ.. तो दाएं घूमती है।और आप कहें कि रुक जाओ तो वह रुकती है और आपके इशारे पर चलती है।सुई इसलिए कि आपके पास संकल्प बहुत छोटा है, अन्यथा पहाड़ भी घुमाए जा सकते हैं।क्योंकि सुई और पहाड़ में क्या फर्क है? क्वांटिटी का फर्क होगा, लेकिन सिद्धांत का कोई फर्क नहीं पड़ता है। 6-योग कहता है, हम सब जुड़े हैं इसलिए जब एक आदमी बुरा विचार करता है तो आस-पास के लोग तत्काल बुरे होने शुरू हो जाते हैं। उस विचार को प्रकट करने की जरूरत नहीं है। जब एक आदमी अच्छा विचार करता है तो आस-पास एक अच्छे विचार की तरंगें फैलनी शुरू हो जाती हैं। अच्छे विचार को प्रकट करने की जरूरत नहीं है। अचानक किसी आदमी के सामने जाकर आपको लगता है कि शांति आ गई। अचानक किसी आदमी के सामने जाकर लगता है कि अशांति फैल गई।

7-किसी रास्ते से गुजरते हैं, लगता है कि जैसे मन हलका हो गया। किसी रास्ते से गुजरते हैं, लगता है कि जैसे मन भारी हो गया। किसी घर में बैठते हैं और लगता है कि भय पकड़ लेता है। किसी घर में बैठते हैं और लगता है कि हृदय प्रफुल्लित हो जाता है। ये सब चारों तरफ से आ रही तरंगों के परिणाम हैं। ये चारों तरफ से घेर रही तरंगें आपको छू रही हैं। ऐसा नहीं है कि यही आपको छू रही हैं, आप भी इन तरंगों को छू रहे हैं। यह पूरे वक्त चल रहा है। इस समस्त के विस्तार के बीच, हम भी ऊर्जा के एक पुंज हैं। और चारों तरफ ऊर्जा के डायनामिक सेंटर्स हैं , वे सब काम में लगे हैं। ये सारे जगत की नियति हम सबकी इकट्ठी नियति है। 8-योग के इस चौथे सूत्र का अर्थ है कि अपने को अलग देखना पागलपन है, अपने को अलग मानना नासमझी है, अपने को अलग समझ कर जीना अपने हाथ से अपने सिर पर बोझ ढोना है।उदाहरण के लिए,एक योगी फकीर एक ट्रेन में सवार हुआ और थर्ड क्लास के डिब्बे में जाकर बैठा। अपनी पेटी सिर पर रख ली, पेटी के ऊपर अपना बिस्तर रख लिया, बिस्तर के ऊपर अपना छाता रख रहा था।इस पर पास-पड़ोस के लोगों ने कहा, ''यह क्या कर रहे हो? नीचे रख दो सामान, आराम से बैठो''।

9-उस योगी ने कहा कि मैं सोचता हूं, टिकिट तो सिर्फ मैंने अपने लिए ली है। इसलिए ट्रेन पर ज्यादा वजन डालना अनैतिक होगा। इसलिए वजन अपने सिर पर रख रहा हूं।उन लोगों ने कहा, ''पागल हो गए हैं...अपने सिर पर रखिए तो भी ट्रेन पर तो वजन पड़ेगा ही। इसलिए नाहक अपने सिर को और वजन क्यों दे रहे हैं? नीचे रखिए और आप आराम से बैठिए। ट्रेन तो वजन ढोएगी ही--चाहे सिर पर रखिए और चाहे नीचे रखिए''।

10-उस फकीर ने कहा कि मैं तो समझता था अज्ञानी होंगे इस कमरे में, यहां ज्ञानी हैं। नीचे वजन रखा। उन लोगों ने कहा, 'हम समझे नहीं'। तो उस फकीर ने कहा कि जिंदगी में मैंने सभी लोगों को अपने सिर पर वजन रखे देखा, जो वजन परमात्मा पर छोड़ा जा सकता था। मैंने हर आदमी को सारी चिंताओं का बोझ अपने सिर पर लिए हुए चलते देखा, पहाड़ के पहाड़, जो कि चांद-तारों पर छोड़े जा सकते हैं, जिन्हें कि हवाएं उठा लेतीं। लेकिन हर आदमी को मैंने इतनी उदासी और परेशानी से भरा देखा, जो कि फूल उठा लेते, हवा के झोंके उठा लेते, चांद-तारे उठा लेते, सारा जगत उठा लेता। लेकिन हर आदमी अपना बोझ लिए चल रहा है। तो मैंने सोचा कि इस डिब्बे में कहीं आप लोग नाराज न हों, तो मैंने सामान ऊपर रखा था। लेकिन आप तो ज्ञानी हैं।

11-इस पर उन्होंने कहा कि ''केवल इस डिब्बे में ही हम ज्ञानी हैं, जहां तक जिंदगी की गाड़ी का सवाल है, वहां तो हम अपना बोझ अपने सिर पर ही रखते हैं ; क्योंकि हमारे अतिरिक्त और हम किसके सिर पर रखेंगे''? योग कहता है, किसी के सिर पर बोझ नहीं रखना है। बोझ किसी के सिर पर है ही नहीं। सिर्फ उन्हीं के सिर बोझिल हो जाते हैं जो इस सत्य को नहीं जान पाते कि जीवन संयुक्त है, जीवन इकट्ठा है। श्वास हवाओं पर निर्भर है। प्राण की गरमी तारों पर, सूर्यों पर निर्भर है। जीवन का होना सृष्टि के क्रम पर निर्भर है। मृत्यु का होना जन्म का दूसरा पहलू है। यह सब हो रहा है। हम इस सबको सिर पर उठा कर रख लेते हैं।योग कहता है, अगर हम इसे देख पाएं कि हम एक बड़े जाल के बीच एक छोटे से तंतु से ज्यादा नहीं हैं... । 12-एक तेज धार नदी में दो तिनके बहे जाते थे। एक तिनका नदी की धार से लड़ने की कोशिश कर रहा था कि रोक दूंगा नदी को।और दूसरा तिनका है, उसने नदी में अपने को सीधा छोड़ रखा है।वह सोच रहा है कि नदी को सहयोग दूं और सोचता था कि नदी मेरे सहारे कितनी तेजी से बही जा रही है।नदी भागी जा रही थी सागर की तरफ।नदी को उन दोनों तिनकों से कोई फर्क न पड़ता था--जो नदी को रोकता था /लड़ता था उससे; जो नदी को सहयोग देता था, नदी को बहाता था ..उससे। लेकिन तिनकों को फर्क

पड़ता था। जो लड़ रहा था वह व्यर्थ ही मरा जा रहा था, जो बह रहा था। वह आनंद से धारों पर नाच रहा था। 13-लेकिन योग कहता है कि दोनों तिनके ही मत बनो, क्योंकि दोनों का भ्रम एक-दूसरे से जुड़ा है। तुम तो समझो कि नदी बह रही है, न तुम्हें बहाना है; न तुम्हें रोकना है। और तुम नदी के एक हिस्से हो जाओ। तिनके भी मत रहो, एक लहर बन जाओ। और तब निर्भार / वेटलेस हो जाओगे। तब कोई भार नहीं रह जाएगा। 14-अब वर्तमान में एक नया शब्द ‘एलिअनेशन’ जोर पकड़ रहा है--अकेलापन, अजनबीपन। हर आदमी को लग रहा है कि मैं अकेला हूं, कोई साथी नहीं।कभी पतियों को भ्रम होता था कि पत्नी साथी है। कभी पत्नियां भ्रम पालती थीं कि पति साथी है। अब सब भ्रम टूटे जा रहे हैं। पत्नी को पक्का नहीं है कि पति साथी है, पति को पक्का नहीं है कि पत्नी साथी है। पिता को पक्का नहीं है बेटे का.. कि बेटे बहुत दिन साथ देंगे।बेटे को पक्का नहीं है पिता का.. कुछ पक्का नहीं है ;सब अनिश्चित है। और एक-एक आदमी अकेला हो गया है, एलिअन हो गया है सबसे। इसलिए वर्तमान में इतनी चिंता और इतना बोझ है और एक-एक आदमी दबा जा रहा है पहाड़ों से /पागल हुआ जा रहा है। 15-योग कहता है, तुम अकेले हो, यह तुम्हारी नासमझी है। यह जगत इकट्ठा है। जिस दिन कोई आदमी ऐसा समझ लेता है कि मैं सबके साथ इकट्ठा हूं, उसी दिन उसके ऊपर चिंता के सारे बोझ तिरोहित हो जाते हैं। उसी दिन वह मुक्त हो जाता है.. भीतर सब बंधन गिर जाते हैं। बाहर के जगत में जो अचेतन पदार्थ हमें दिखाई पड़ता है, वह भी हमारे चित्त से इतना ही जुड़ा हुआ है। जो माली अपने बगीचे के फूलों को प्रेम करता है, क्या आप सोच सकते हैं कि उसके फूल बड़े हो जाते होंगे?

16-उदाहरण के लिए,आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक छोटी सी डेलाबार लेबोरेट्री में फूलों पर बहुत से प्रयोग हुए हैं और घबड़ाने वाले हैं प्रयोग..।एक ईसाई फकीर ने यह कहा कि मैं जिस बीज को आशीर्वाद दे दूं, उसमें बड़े फूल आएंगे। उस प्रयोगशाला में इस पर बहुत से प्रयोग हुए। एक ही पैकेट के बीज एक गमले में डाले गए और दूसरे गमले में डाले गए। एक गमले को उस फकीर से आशीर्वाद दिलाया गया। उस फकीर ने उस गमले के सामने खड़े होकर परमात्मा से प्रार्थना की और कहा कि इसके बीज बड़े हों, इसके फूल बड़े हों, इसके अंकुर जल्दी आएं! और दूसरे गमले को आशीर्वाद नहीं दिया गया।

17-और वैज्ञानिकों ने पूरी कोशिश की कि दोनों गमलों को एक सी सुविधा, एक सा पानी, एक सी धूप, एक सा खाद, सब एक सा मिले। लेकिन बड़ी मुश्किल हुई। आशीर्वाद दिए गए गमले पर बड़े फूल आए और बीज जल्दी अंकुर बने।और तो और गमले पर ज्यादा फूल आए और ज्यादा देर टिके! यदि एकाध गमले पर ऐसा होता तो समझते कि कोई चालबाजी होगी। फिर यह अनेक गमलों पर प्रयोग किया गया और हर बार यही हुआ।क्या कारण हो सकता है ..क्या मनुष्य का चित्त उन बीजों को भी प्रभावित करता है?

18- वास्तव में , चेतना और अचेतना के बीच कहीं भी दीवाल नहीं है। और जो इस हृदय में प्रतिध्वनित होता है, वह जगत के सब कोनों तक पहुंच जाता है। और जो जगत के किसी भी कोने में प्रतिध्वनित होता है, वह इस हृदय के कोने तक आ जाता है। हम सब इकट्ठे हैं, संयुक्त हैं।सारा जगत

एक प्रवाह है ऊर्जा का। उसमें हम एक लहर से ज्यादा नहीं हैं। सब जुड़ा है। इसलिए जो यहां होता है वह सब जगह फैल जाता है और जो सब जगह होता है वह यहां सिकुड़ आता है।

19-इस जगत में जो-जो हो रहा है,हम साझीदार हैं, संयुक्त हैं,पार्टनरशिप है, उसमें कोई अलग-अलग नहीं है। अगर कहीं कोई चोर है तो हम जिम्मेवार है क्योकि मेरी बुराइयों ने भी उसे चोर बनाने में सहयोग दिया होगा। और कहीं अगर कोई हत्यारा है तो हम जिम्मेवार है। अगर कहीं कोई साधु है तो भी हम जिम्मेवार है। इसका मतलब यह हुआ कि जिम्मेवारी की कोई जरूरत ही नहीं है, कहीं भी जो हो रहा है, उसमें हम भागीदार है। और तब कोई दोष नहीं है क्योकि तब हम अकेले नहीं हैं।

.....SHIVOHAM...