Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

ध्यान के कितने प्रकार है?PART-02


ध्यान की अनेक क्रियाएँ;-

ध्यान की अनेक क्रियाएँ हैं, जैसे हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, पाँच कर्मेंद्रियाँ हैं। पाँच तत्त्वों से हमारा शरीर बना हुआ है और योग की भी पाँच धाराएँ प्रख्यात हैं। पाँच ध्यान मुख्य हैं।

1-नादयोग(आकाश की तन्मात्रा 'शब्द');-

दूसरा ध्यान है नाद का। ''नादयोग'' किसे कहते हैं? नादयोग के दो हिस्से हैं। एक हिस्सा वह है, जो गाने के माध्यम से, संगीत के माध्यम से करते हैं। जब हम गाना सुनकर कानों को बंद कर लेते हैं तो बाद में कई तरह की आवाजें सुनाई पड़ती हैं। कभी घंटे की आवाज, घड़ियाल की आवाज, कभी अमुक की आवाज, बादल गरजने की आवाज, पानी बरसने की आवाज, शंख बजने की आवाज सुनाई देती है। यह सब नादयोग का हिस्सा है। नादयोग का दूसरा हिस्सा वह है, जिसमें शब्द के साथ-साथ में हम लय हो जाते हैं। इसमें अखण्ड कीर्तन भी शामिल है, संगीत भी शामिल है, ओंकार की ध्वनि भी शामिल है ।नादयोग कानों के माध्यम से शब्दों को सुनने की एक प्रक्रिया है, जो कबीर पंथ में सिखाई जाती है और कई मतावलम्बियों में सिखाई जाती है। नाथ संप्रदाय में सिखाई जाती हैं। शब्द के माध्यम से अपने आप को लय कर देना, मन को, ध्यान को एकाग्र कर देना, यह भी एक तरीका हैं। इसके लिए ओंकार की ध्वनि सबसे श्रेष्ठ माध्यम है।ओंकार की ध्वनि के साथ आदमी के मन को लय करना चाहिए। मन को लय करते करते साधक वहाँ पहुँच जाते हे, जहाँ पर हम अपने मन को ले जाना चाहते हैं। इसमें भगवान तक पहुँचने की वह समाधि अवस्था भी आ सकती है, जो हर साधक का लक्ष्य है।

2-बिंदुयोग (वायु की तन्मात्रा 'स्पर्श');-

1-बिंदु विसर्ग को संक्षेप में ‘बिंदु’ कहा जाता है। बिन्दु का अर्थ ‘बूँद’ है। विर्ग माने ‘गिरना’। इस प्रकार बिंदु विसर्ग का तात्पर्य ‘बूँद का गिरना’ हुआ। यहाँ बिंदु का मतलब वीर्य नहीं, अमृत है। उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं, असाधारण कहना चाहिए।

2-बिंदु की स्थिति सिर के ऊपरी हिस्से में उस स्थान पर है, जहाँ हिंदू परंपरा में शिखा रखी जाती है। शिखा को कसकर बाँधने और गाँठ लगाने का विधान हैं ऐसा करने से उक्त स्थान में तनाव और खिंचवा आता है, जिससे बिंदु के प्रति सजगता बनी रहती है।तांत्रिक मतानुसार मस्तिष्क के ऊपरी कार्टेक्स में एक छोटा सा गड्ढा है, जहाँ अत्यल्प मात्रा में स्राव भरा रहता है। इस स्राव मध्य द्वीप के सदृश की एक बिंदु संरचना हैं इसे ही बिन्दु विसर्ग कहा गया है।

3-बिंदु विसर्ग सातवें लोक ‘सत्यम्’ तथा आनंदमय कोश से संबंधित है। ऐसा समझा जाता है कि जब बिंदु विसर्ग का जागरण होता है, तो वहाँ से अनेक प्रकार के नाद की उत्पत्ति होती है, जिसका चरमोत्कर्ष ॐ नाद के विकास के रूप में होता है। इस स्थिति में साधक को ॐ वर्ण के ऊपर स्थित बिंदु तथा अर्द्धचन्द्र से सृष्टि के सभी स्रोत निकलते हुए दिखलाई देने लगते हैं।

4-बिंदु अनंत संभावनाओं को संजोए हुए है। वह चाहे पदार्थ कण के रूप में हो, रज-4 वीर्य या मस्तिष्कीय स्राव के रूप में, उसमें ऐसी क्षमता और सामर्थ्य है कि उसे गागर में सागर भरने जैसी उपमा दी जा सकती है। इसलिए बिंदु विसर्ग की साधना प्रकारांतर से उस शक्ति के एक अंश का अनावरण और उद्घाटन ही है, जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि उद्भूत है। हमें इस भली-भाँति समझ लेना चाहिए।

5-बिंदु में ब्रह्माण्ड की अनंत क्षमताओं का विकास निहित है। यहीं सृष्टि की समग्र रूपरेखा छिपी रहती है। वहाँ पर विकास का तात्पर्य है-वह अनुभवातीत प्रक्रिया, जिसका संबंध अस्तित्व की संपूर्ण प्रणाली से है।मस्तिष्क के जिस बिंदु का ललना चक्र से संबंध है, उस चक्र में नासा छिद्रों से होकर कुछ नाड़ियाँ गुजरती हैं, लेकिन न तो ललना, न बिंदु जागरण के केन्द्र हैं। जब विशुद्धि का जागरण होता है, तब साथ-साथ ललना तथा बिन्दु का भी स्वयमेव जागरण हो जाता है, इसलिए साधना-विज्ञान में ललना तथा बिन्दु को पृथक् से जगाने का कोई विधान या उपचार नहीं है।

6-बिंदु विसर्ग सातवें लोक ‘सत्यम्’ तथा आनंदमय कोश से संबंधित है। ऐसा समझा जाता है कि जब बिंदु विसर्ग का जागरण होता है, तो वहाँ से अनेक प्रकार के नाद की उत्पत्ति होती है, जिसका चरमोत्कर्ष ॐ नाद के विकास के रूप में होता है। इस स्थिति में साधक को ॐ वर्ण के ऊपर स्थित बिंदु तथा अर्द्धचन्द्र से सृष्टि के सभी स्रोत निकलते हुए दिखलाई देने लगते हैं।

7-दिव्यदृष्टि बढ़ाने वाली साधनाओं में 'त्राटक' प्रमुख है. इसे बिंदुयोग भी कहते हैं. अस्त-व्यस्त, इधर-उधर भटकने वाली बाह्य और अंत:दृष्टि को किसी बिंदु विशेष पर, लक्ष्य विशेष पर एकाग्र करने को बिंदु साधना कह सकते हैं.त्राटक का उद्देश्य यही है.त्राटक में बाह्य नेत्रों एवं दीपक जैसे साधनों का उपयोग किया जाता है, इसलिए उसकी गणना स्थूल उपचारों में होती है. बिंदुयोग में ध्यान धारणा के सहारे किसी इष्ट आकृति पर अथवा प्रकाश ज्योति पर एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है.दोनों का उद्देश्य एवं अंतर केवल भौतिक साधनों के प्रयोग करने की आवश्यकता रहने न रहने का है.आरंभिक अभ्यास की दृष्टि से त्राटक को आवश्यक एवं प्रमुख माना गया है.बिंदुयोग साधना की स्थिति आ जाने पर बाह्य त्राटक की आवश्यकता नहीं रहती. त्राटक साधना में एकाग्र चित्त होकर निश्चल दृष्टि से सूक्ष्म लक्ष्य को तब तक देखा जाता है, जब तक आंखों में से आंसू न आ जाएं. त्राटक साधना से नेत्र रोग और आलस्य प्रमाद दूर हो जाते हैं.प्राचीन काल में योग साधकों की नेत्रदृष्टि बहुत प्रबल होती थी.इसलिए उन पर अश्रुपात र्पयत (आंखों में से आंसू टपकने तक) देखते रहने का कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता था.इसलिए वैसा करने का निर्देश दिया गया था.आज की स्थिति में नेत्र शक्ति दुर्बल रहने से वैसा न करने की बात कही गई है.फिर भी, एकाग्र दृष्टि के उद्देश्य की पूर्ति प्राचीन और अर्वाचीन दोनों ही मान्यताओं के अनुसार आवश्यक है.

3-अग्नितत्त्व का ध्यान(अग्नि तत्व की तन्मात्रा 'रूप');-

इनमें से एक ध्यान तो वह है, जो हमारे शरीर में अग्नितत्त्व के रूप में स्थापित है।अग्नितत्त्व का प्रतीक हमारी ये आँखें हैं। उसमें जब हम प्रवेश करते हैं तो हमको शक्ल का ध्यान करना पड़ता है।

ध्यानयोग का एक तरीका यह है कि हम किसी शक्ल की सहायता से अपने भीतर काम करने वाला जो 'अग्नितत्त्व है अर्थात हमारी जो नेत्र इंद्रिय (रूप तन्मात्रा) है अर्थात उसका जो है, उसका हम ध्यान करते हैं तो कोई शक्ल का ध्यान आता है।पहला ध्यान अग्नितत्त्व का है, जिसका माध्यम नेत्र हैं। इसी तरह रस तन्मात्रा के बारे में है।

निराकार में जब आप जाएँगे तो प्रकाश का और साकार में जाएँगे तो किसी आकार का, देवी-देवता, मूर्ति, फल-फूल किसी भी शक्ल का ध्यान करना पड़ेगा। शक्ल का ध्यान करना हमारी तन्मात्रा से संबंधित है। इनमें से रूप तन्मात्रा का उद्देश्य है -हमारे नेत्र। इसी तरह अन्यान्य तन्मात्राओं का भी अपना अपना स्वरूप और उद्देश्य है, जिनमें मन को एकाग्र किया जाता है ।

4-जपयोग(जल तत्व की तन्मात्रा 'रस');-

अब अगला योग आता है, जो हमारी जीभ का है। जीभ का क्या है? जीभ का जो ध्यान है, वह जप है। जप किससे होता है? शब्द से। और शब्द कहाँ से निकलता है? हमारी वाणी से निकलता है। इसे जपयोग कहते हैं। जप के भी दो भाग हैं-जिह्वा का एक भाग उच्चारण करता है तो दूसरा भाग स्वाद चखता है। जिह्वा का जो भाग स्वाद चखता है, उसके लिए दूसरा अभ्यास कराते हैं और उसका नाम है-'खेचरी मुद्रा'। इस तरह जीभ का उच्चारण वाला अभ्यास है-जपयोग एवं स्वाद वाला अभ्यास है-खेचरी मुद्रा।

खेचरी मुद्रा वाले अभ्यास से रसानुभूति होती है। रस के माध्यम से हम ध्यान को एकाग्र करते हैं। मन के एकाग्र होने के पश्चात हमारे पास इतना बड़ा हथियार आ जाता है कि उसकी तुलना में और कोई हथियार नहीं है।

5-प्राणयोग(पृथ्वी तत्व की तन्मात्रा 'गन्ध');-

अगला योग हमारी नासिका से संबंधित है। तीसरी इंद्रिय है-नाक। नाक से हमें क्या करना पड़ता है? नाक से जब हम साँस अंदर खींचते हैं तो सामान्य प्राणायाम करना पड़ता है और प्राणायाम में ध्यान करना पड़ता है। प्राणायाम एक ध्यान है। प्राणायाम में पाँच तत्त्वों में ध्यान ही ध्यान करते रहिए। जब हम साँस भीतर खींचते हैं तो ध्यान करते हैं कि साँस भीतर जा रही है, अब यह यहाँ तक पहुँच गई, इतनी देर तक रुकी रही, इतनी देर तक बाहर निकली, यह सब ध्यान का हिस्सा है। बाहर कितनी देर तक रुकी हुई है, यह सब ध्यान का हिस्सा है।

जब हम प्राणायाम के माध्यम से ध्यान करते हैं तो साँस माध्यम बनती है। इससे मन का निग्रह करते हैं, मन को भागने से रोकते हैं, काबू में लाते हैं, मन को एक काम में लगा देते हैं। तब क्या हो जाता है, प्राणयोग होता है ।

NOTE;-

ये सारे के सारे पाँच ध्यान हैं, पाँच योग हैं, जो पाँचों इंद्रियों के माध्यम से किये जाते हैं हैं। इनमें पाँचों का समन्वय हो सकता है और पाँचों में से एक को लेकर भी आगे बढ़ सकते हैं।ध्यान के लिए गीता में जो उपाय बताए गए हैं, यदि उन्हें आप अपनाएँ तो आपका ध्यान सार्थक हो जाएगा। गीता में अर्जुन पूछता है कि भगवान! यह मन तो हवा की तरह है, भाग जाता है, काबू में नहीं आता, रोकने से भी नहीं रुकता। इसको कैसे रोकें? तो उन्होंने जो उपाय बताए उनके नाम हैं-वैराग्य और अभ्यास । यह ध्यानयोग की बात हैं।

-ध्यान के प्रकार :-

ध्यान करने के लिए व्यक्ति की रुचि के अनुसार अनेक प्रकार की पद्धति है.

ध्यान को उनके करने की विधि और उनके ध्यान लगाने वाले केंद्र के अनुसार कई भागो में बांटा गया है.जिसमें से कुछ पद्धतियाँ निम्न प्रकार की है.

- भृकुटी ध्यान ( Third Eye Meditation ) : इसे तीसरी आँख पर ध्यान केन्द्रित करने वाला ध्यान माना जाता है. इसके लिए व्यक्ति को अपनी आपको को बंद करके, अपना सारा ध्यान अपने माथे की भौहो के बीच में लगाना होता है. इस ध्यान को करते वक़्त व्यक्ति को बाहर और अंदर पुर्णतः शांति का अनुभव होने लगता है. इन्हें अपने माथे के बीच में ध्यान केन्द्रित कर अंधकार के बीच में स्थित रोशनी की उस ज्वाला की खोज करनी होती है जो व्यक्ति की आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने का मार्ग दिखाती है. जब आप इस ध्यान को नियमित रूप से करते हो तो ये ज्योति आपके सामने प्रकट होने लगती है, शुरुआत में ये रोशनी अँधेरे में से निकलती है, फिर पीली हो जाती है, फिर सफ़ेद होते हुए नीली हो जाती है और आपको परमात्मा के पास ले आती है.

- श्रवण ध्यान ( Listening / Nada Meditation ) :-

इस ध्यान को सुन कर किया जाता है, ऐसे बहुत ही कम लोग है जो इस ध्यान को करके सिद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलते है. सुनना बहुत ही कठिन होता है क्योकि इसमें व्यक्ति के मन के भटकने की संभावनाएं बहुत ही अधिक होती है. इसमें आपको बाहरी नही बल्कि अपनी आतंरिक आवाजो को सुनना होता है, इस ध्यान की शुरुआत में आपको ये आवाजे बहुत धीमी सुनाई देती है और धीरे धीरे ये नाद में प्रवर्तित हो जाती है. एक दिन आपको ॐ स्वर सुनाई देने लगता है. जिसका आप जाप भी करते हो.

ध्यान के विभिन्न प्रकार;-

1-प्राणायाम ध्यान ( Breath Focus Meditation ) : इस ध्यान को व्यक्ति अपनी श्वास के माध्यम से करता है, जिसमे इन्हें लम्बी और गहरी साँसों को लेना और छोड़ना होता है. साथ ही इन्हें अपने शरीर में आती हुई और जाती हुई साँसों के प्रति सजग और होशपूर्ण भी रहना होता है. प्राणायाम ध्यान बहुत ही सरल ध्यान माना जाता है किन्तु इसके परिणाम बाकी ध्यान के जितने ही महत्व रखते है

- मंत्र ध्यान ( Mantra Meditation ) : इस ध्यान में व्यक्ति को अपनी आँखों को बंद करके ॐ मंत्र का जाप करना होता है और उसी पर ध्यान लगाना होता है. क्योकि हमारे शरीर का एक तत्व आकाश होता है तो व्यक्ति के अंदर ये मंत्र आकाश की भांति प्रसारित होता है और हमारे मन को शुद्ध करता है. जब तक हमारा मन हमे बांधे रखता है तब तक हम इस ध्वनि को बोल तो पाते है किन्तु सुन नही पाते लेकिन जब आपके अंदर से इस ध्वनि की साफ़ प्रतिध्वनि सुनाई देने लगती है तो समझ जाना चाहियें कि आपका मन साफ़ हो चूका है. आप ॐ मंत्र के अलावा सो-ॐ, ॐ नमः शिवाय, राम, यम आदि मंत्र का भी इस्तेमाल कर सकते हो.

- तंत्र ध्यान ( Tantra Meditation ) : इसमें व्यक्ति को अपने मस्तिष्क को सिमित रख कर, अपने अंदर के आध्यात्म पर ध्यान केन्द्रित करना होता है. इसमें व्यक्ति की एकाग्रता सबसे अहम होती है. इसमें व्यक्ति अपनी आँखों को बंद करके अपने हृदय चक्र से निकलने वाली ध्वनि पर ध्यान लगता है. व्यक्ति इसमें दर्द और सुख दोनों बातो का विश्लेषण करता है.

योग ध्यान ( Yoga Meditation ) :-

क्योकि योग का मतलब ही जोड़ होता है तो इसे करने का कोई एक तरीका नही होता बल्कि इस ध्यान को इनके करने की विधि के अनुसार कुछ अन्य ध्यानो में बांटा गया है. जो निम्नलिखित है -

चक्र ध्यान ( Chakra Meditation ) :-

व्यक्ति के शरीर में 7 चक्र होते है, इस ध्यान को करने का तात्पर्य उन्ही चक्रों पर ध्यान लगाने से है. इन चक्रों को शरीर की उर्जा का केंद्र भी माना जाता है. इसको करने के लिए भी आँखों को बंद करके मंत्रो ( लम, रम, यम, हम आदि ) का जाप करना होता है. इस ध्यान में ज्यादातर हृदय चक्र पर ध्यान केन्द्रित करना होता है.

दृष्टा ध्यान ( Gazing meditation ) :-

इस ध्यान को ठहराव भाव के साथ आँखों को खोल कर किया जाता है. इससे अर्थ ये है कि आप लगातार किसी वास्तु पर दृष्टी रख कर ध्यान करते हो. इस स्थिति में आपकी आँखों के सामने ढेर सारे विचार, तनाव और कल्पनायें आती है. इस ध्यान की मदद से आप बौधिक रूप से अपने वर्तमान को देख और समझ पाते हो.

कुंडलिनी ध्यान ( Kundalini Meditation ) :-

इस ध्यान को सबसे मुश्किल ध्यान में से एक माना जाता है. इसमें व्यक्ति को अपनी कुंडलिनी उर्जा को जगाना होता है, जो मनुष्य की रीढ़ की हड्डी में स्थित होती है. इसको करते वक़्त मनुष्य धीरे धीरे अपने शरीर के सभी आध्यात्मिक केन्द्रों को या दरवाजो को खोलता जाता है और एक दिन मोक्ष को प्राप्त हो जाता है. इस ध्यान को करने के कुछ खतरे भी होते है तो इसे करने के लिए आपको एक उचित गुरु की आवश्यकता होती है.

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

चक्र मेडिटेशन ;-

शरीर में मौजूद चक्र का सम्बंध शक्ति पुंज अर्थात दिव्य ज्योति से है। देवी-देवताओं के पीछे दिखाई देने वाला तेज प्रकाश ही शक्ति पुंज है। इसकी पुष्टि प्राचीन काल में बनी देवी-देवताओं की मूर्ति व चित्र आदि करते हैं। इन चित्रों के पीछे एक तेज रोशनी दिखाई जाती है। सभी देवी-देवताओं के पीछे एक दिव्य ज्योति को दिखाया जाता है। यह ज्योति प्रकाश पुंज या आभामंडल कहलाता है।

यह प्रकाश उनके तेज का प्रतीक होता है। योग शास्त्रों के अनुसार जिस तरह शरीर में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म तंत्र या सूक्ष्म कोश होते हैं, उसी तरह मानव शरीर में चक्र होते हैं। शरीर का यह चक्र ही भौतिक शरीर को अभौतिक शरीर से जोड़ता है। अभौतिक शरीर वह है, जिसे सीधे महसूस नहीं किया जा सकता। देवताओं के पीछे दिखाये गए इन आभामंडल का सम्बंध इन चक्रों से है तथा इन्हीं चक्रों के कारण एक साधारण मनुष्य योग क्रिया करके ईश्वर के सूक्ष्म रूप का दर्शन कर पाता हैं। योगाभ्यास के द्वारा इन चक्रों को देखा जा सकता है। इन चक्रों से निकलने वाली तेज रोशनी गोलाकार रूप में ध्यान करने वाले के चारो ओर घूमती रहती है।

आमतौर पर सभी लोगों में चक्र 3 अवस्था में जागृत रहते हैं। चक्र की पहली अवस्था संतुलन की होती है, परन्तु यह आदर्श स्थिति कम लोगों में पायी जाती है। व्यक्ति यदि अपने जीवन में लगातार किसी एक कार्य को ही करता रहता है, तो उस व्यक्ति में उससे सम्बंधित चक्र का जागरण हो जाता है। परन्तु जिस चक्र से सम्बंधित कोई कार्य नहीं होता वह सोई हुई स्थिति में चला जाता है।

योग शास्त्रों में चक्र ध्यान का वर्णन-

योग शास्त्रों में अनेक प्रकार की ध्यान साधना का वर्णन किया गया है, शरीर में स्थित सात चक्रों का ध्यान करना सबसे आसान व सरल है। चक्र ध्यान साधना का अभ्यास सभी व्यक्ति कर सकते हैं। बच्चे, बूढ़े, रोगी, स्वस्थ, युवा आदि सभी इसका अभ्यास कर सकते हैं। योग शास्त्रों के अनुसार सप्तचक्र ध्यान का अभ्यास करने से ही शरीर में मौजूद पंचतत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश का संतुलन बना रह सकता है। मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता के सही विकास के लिए सप्तचक्र ध्यान का अभ्यास करना आवश्यक है। इन शक्तियों के विकास की इच्छा मन में रखकर सप्तचक्र ध्यान साधना का अभ्यास करें। इसके अभ्यास में नियमों, सिद्धान्तों एवं विधियों का पालन करना चाहिए तथा इसकी शक्ति का महत्व और जन-जीवन कल्याण की उपयोगिता को समझाना चाहिए।

ध्यान का मुख्य काम मनुष्य के अन्दर की सोई हुई चेतना को जगाना है। सप्तचक्र ध्यान साधना एक ऐसी साधना है, जिसमें व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को बाहरी वस्तुओं से हटाकर अपनी आंतरिक आत्मा में लगाता है। इस साधना में मन को नियंत्रित कर उसे किसी एक केन्द्र पर स्थिर किया जाता है। इसमें बाहरी मानसिक विचारों का नाश होकर आंतरिक व आध्यात्मिक मानसिक विचारों का विकास होता है। इस ध्यान साधना में दिव्य दृष्टि से शरीर के अलग-अलग स्थानों पर स्थित चक्र पर ध्यान केन्द्रित कर भिन्न-भिन्न रंगों के कमल के फूलों को देखने एवं उससे उत्पन्न सुख का अनुभव किया जाता है। इस ध्यान क्रिया में अपने ध्यान को मूलाधार चक्र से शुरू करके सहस्र चक्र पर केन्द्रित किया जाता है।

इस योग साधना का अभ्यास किसी भी रूप, रंग, वर्ग, आयु, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रियता वाले कर सकते हैं। यह शारीरिक संरचना आदि किसी भी उलझनों में नहीं पड़ती, क्योंकि इसका अभ्यास कोई भी कर सकता है। सप्तचक्र ध्यान पद्धति एक वैज्ञानिक अभ्यास है। अत: इसमें सफलता केवल नियमित अभ्यास से ही प्राप्त की जा सकती है। सप्तचक्र ध्यान का अभ्यास किये बिना इसकी शक्ति का अनुमान लगाना असम्भव है। चक्र ध्यान अभ्यास के द्वारा चेतना शक्ति की पूर्ण शुद्धि करके जीवन के अस्तित्व को समझा जा सकता है तथा इसके द्वारा आध्यात्मिक उन्नति एवं परमात्मा का दर्शन किया जा सकता है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए पैसे या अन्य वस्तुओं की जरूरत नहीं होती, बल्कि इसके लिए नियंमित अभ्यास, पूर्ण आत्मविश्वास तथा इच्छा शक्ति की जरूरत होती है।

एक शांत मन(फ्री माइँड) के साथ मेडिटेशन

कई विशेषज्ञों या रेग्युलर चिकित्सकों के लिए मेडिटेशन, मन से सभी विचारों को खाली करने का एक स्रोत है। हालांकि, ऐसा करने के लिए, सपाट सतह पर धैर्य रखते हुए आपकी पीठ सीधा और आंखों को बंद करने के साथ बैठना होता है। फिर दिमाग को शांत करें। यह प्रारंभ करने वालो के लिए मेडिटेशऩ विशेष रूप से कठिन हो सकता है क्योंकि मन पर किसी भी तरह का एक प्रयास, तकनीक के गलत अभ्यास के कारण हो सकता है। बस धैर्य रखे और अपना आराम से अभ्यास करें।

वॉकिंग मेडिटेशन

वाकिंग मेडिटेशन अभ्यासकर्ता को उसके या उसके शरीर का पूरी तरह से उपयोग करने की आवश्यकता है। यह बाहर या एक कमरे के अंदर किया जा सकता है। जब आप चलना शुरू करें, जिस और आपका शरीर चलता है, ध्यान दे और आपके पैर केसे संकुचित होते है जब यह जमीन के संपर्क में आते है। चलते समय, अपनी सांस पर भी ध्यान दे। यदि आप अपने घर के बाहर वाकिंग मेडिटेशन तकनीक का प्रयोग करने की योजना बना रहे हैं, एक जगह को सुनिश्चित करें जो शहरी जीवन की हलचल से दूर हो। मेडिटेशन के स्वास्थ्य लाभ अपरिमित हैं।

माइंडफुलनेस मेडिटेशन (अंतर्दृष्टि मेडिटेशन) ;-

माइंडफुलनेस व्यायाम को अंतर्दृष्टि मेडिटेशन भी कहा जाता है।माइंडफुलनेस व्यायाम में,आप सभी जागरूकता बढ़ाने के लिए, जो आप के चारों ओर हो रहा है, मेडिटेशन करते है, आप अपनी सांस लेने के पैटर्न पर ध्यान केंद्रित कर सकते है।धीरे धीरे, विचार से बाहर आए जो अपने मन परेशान कर सकते है और क्या आपके शरीर और मन का क्षेत्र दायरे से बाहर जा रहा है, पर ध्यान केंद्रित करें।यह मेडिटेशन तकनीक की कुंजी से देखे और बिना पहचानने या विश्लेषण करें सुने कि क्या देखा या सुना जा रहा है।

माइंडफुलनेस व्यायाम को अंतर्दृष्टि मेडिटेशन भी कहा जाता है।

अनुभवी शिक्षक के साथ किया जा सकता है मंत्र जाप मेडिटेशन।

फ्री माइंड मेडिटेशन देता है दिल और दिमाग को सुकून।

वॉकिंग मेडिटेशन मा‍नसिक हलचल को दूर आपको बनाता है शांतचित्त।

ध्‍यान आपके तन और मन दोनों को स्‍वस्‍थ और सुंदर बनाने में मदद करता है। मेडिटेशन को चिकित्सकों के जीवन में महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करने के लिए सिद्ध किया गया है।

यहां नीचे सूचीबद्ध मे मेडिटेशन के पांच विभिन्न तकनीके दी गई है जो आप के शरीर के साथ साथ एक स्वस्थ मन के खजाने के रूप में पूरी पहचान दे सकती है।

सांस का अवलोकन(देखरेख)

मेडिटेशन के किसी भी तकनीक में सबसे महत्वपूर्ण साँस लेना है या व्यक्ति की सांस की निगरानी करना है। सांस अवलोकन के रूप में सरल कुछ मिनटों से कुछ सेकंड के बहुत कम अवधि के लिए आपकी सास पर ध्यान दे। सांस अवलोकन मेडिटेशन तकनीक के साथ शुरू करने के लिए, सपाट सतह पर बैठें। याद रखें आसपास का माहौल शांत और निर्मल हो। सीधे बैठो और अपने हाथो को अपने घुटनों पर रखें।

गहरी सांस लें और धीरे धीरे सांस को छोड़ें। अपनी नाक से सांस लें चूंकि यह ऑक्सीजन फेफड़ों के नीचे तक सभी जगल ले जाती है। यदि आपके मन अपने मेडिटेशन सत्र के दौरान पहले कुछ समय के लिए भटक रहा है, अपने सांस लेने के तरीके पर अपना ध्यान फिर से करें और जब तक आप इस करने में सहज हो तब तक यह मेडिटेशन करें।

ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन ( मंत्र मेडिटेशन)

मंत्र मेडिटेशन, मेडिटेशन का सबसे आसान तरीकों में से एक माना जाता है चूंकि यह आप को सिर्फ एक वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने के द्वारा आपको सभी विचारों से दूर ले जाता है। मंत्र जाप लोगों की बहुत मदद करते है, जो इस तकनीक का अभ्यास करना चाहते हैं। एक अनुभवी मास्टर जो एक नियमित मेडिटेशऩ दिनचर्या से अपनी अपेक्षाओं को समझता है, आमतौर पर मंत्रों का चयन करता है। हालांकि इस मेडिटेशन को करते हुए, या तो आप मंत्र जोर से या अपने मन में उच्चारण करने के लिए चुन सकते हैं।

कई अन्य प्रकार के मेडिटेशन तकनीक भी अच्छी तरह से उपलब्ध हैं, लेकिन उनका नियमित रूप से अभ्यास किया जाना चाहिए। हालांकि, यह समझना चाहिए कि इन तकनीकों को आम तौर पर कुछ स्थितियों के अनुरूप करने में उपयोग किया जाता है।

कुंडलिनी योग मेडिटेशन;-

हमारी प्राण शक्ति के केंद्र कुंडलिनी को अंग्रेजी भाषा में 'serpent power' कहते हैं। विज्ञान अभी इसको नहीं मानता, लेकिन कुंडलिनी शक्ति सुषुम्ना नाड़ी में नाभि के निचले हिस्से में सोई हुई अवस्था में रहती है।

अगर आप कुंडलिनी को जाग्रत करना चाहते हैं तो आपको अपने शरीर, मन और भावना के स्तर पर जरूरी तैयारी करनी होगी, क्योंकि अगर आप बहुत ज्यादा वोल्ट की सप्लाई एक ऐसे सिस्टम में कर दें जो उसके लिए तैयार नहीं है तो सब कुछ जल जाएगा।अगर कुंडलिनी योग के लिए उपयुक्त माहौल नहीं है, तो कुंडलिनी जाग्रत करने की कोशिश बेहद खतरनाक और गैरजिम्मेदाराना हो सकती है।

अगर आप इस ऊर्जा को हासिल करना चाहते हैं, जो कि एक जबर्दस्त शक्ति है, तो आपको स्थिर होना होगा। यह नाभिकीय ऊर्जा (न्यूक्लियर एनर्जी) के इस्तेमाल की तकनीक सीखने जैसा है।

आज ज्यादातर लोग जिस तरह की जिंदगी जी रहे हैं, उसमें बहुत सारी चीजें, जैसे- भोजन, रिश्ते और तरह-तरह की गतिविधियां पूरी तरह से उनके नियंत्रण में नहीं हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि कुंडलिनी योग के साथ कुछ गड़बड़ है। यह एक शानदार प्रक्रिया है लेकिन इसे सही ढंग से किया जाना चाहिए, क्योंकि ऊर्जा में अपना कोई विवेक नहीं होता। आप इससे अपना जीवन बना भी सकते हैं और मिटा भी सकते हैं।

बिजली हमारे जीवन के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन अगर आप उसे छूने की कोशिश करेंगे, तो आपको पता है कि क्या होगा।

कुंडलिनी भी ऐसे ही है। आप इसका उपयोग अभी भी कर रहे हैं, लेकिन बहुत ही कम। अगर आप इसे बढ़ा दें तो आप अस्तित्व की सीमाओं से भी परे जा सकते हैं। सभी योग एक तरह से