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आत्म जागृति


मनुष्य चेतना के दो आया है: एक मूर्च्छा, एक अमूर्च्छा। मूर्च्छा का अर्थ है सोये-सोये जीना; बिना होश के जीना। अमूर्च्छा का अर्थ है, होशपूर्वक जीना; जाग्रत, विवेकपूर्ण। मूर्च्छा का अर्थ है, भीतर का दीया बुझा है। अमूर्च्छा का अर्थ है, भीतर का दीया जला है।

मूर्च्छा में रोशनी बाहर होती है। बाहर की रोशनी से ही आदमी चलता है। जहां इंद्रियां ले जाती हैं, वहीं जाता है। इंद्रियों की कामना ही खुद की कामना बन जाती है। क्योंकि खुद का कोई पता ही नहीं। मन जो सुझा देता है, वही जीवन की शैली हो जाती है। क्योंकि अपने स्वरूप का तो कोई बोध नहीं। लोग जो समझा देते हैं, समाज जो बता देता है, वहीं आदमी चल पड़ता है क्योंकि न तो अपनी कोई जड़ें होती हैं अस्तित्व में, न अपना भान होता है। मैं कौन हूं, इसका कोई पता ही नहीं।

तो जीवन ऐसे होता है, जैसे नदी में लकड़ी का टुकड़ा बहता है। जहां लहरें ले जाती हैं, चला जाता है। जहां धक्के हवा के पहुंचा देते हैं, वहीं पहुंच जाता है। अपना कोई व्यक्तित्व नहीं, निजता नहीं। जीवन एक भटकन है।

निश्चित ही ऐसी भटकन में कभी जिल नहीं आ सकती। मंजिल तो सुविचारित कदमों से पूरी करनी पड़ती है। भटकाव बहुत हो सकता है यात्रा नहीं हो सकती। यात्रा का अर्थ है कि तुम्हें पता हो तुम कौन हो; कहां हो! कहां जा रहे हो! क्यों जा रहे हो! होशपूर्वक ही यात्रा हो सकती है। होशपूर्वक ही तीर्थयात्रा हो सकती है। इसलिए ज्ञानियों ने होश को ही तीर्थ कहा है।

अमूर्च्छित चित्त, जागा हुआ चित्त बिलकुल दूसरे ही ढंग से जीता है। उसके जीवन की व्यवस्था आमूल से भिन्न होती है। वह दूसरों के कारण नहीं चलता, वह अपने कारण चलता है। वह सुनता सबकी है। वह मानता भीतर की है। वह गुलाम नहीं होता। भीतर की मुक्ति को ही जीवन में उतारता है। कितनी ही अड़चन हो, लेकिन उस मार्ग पर ही यात्रा करता है जो पहुंचायेगा। और कितनी ही सुविधा हो, उस मार्ग पर नहीं जाता, जो कहीं नहीं पहुंचायेगा।

क्योंकि उस सुविधा का क्या अर्थ? मार्ग कितना ही सुंदर हो, कंटकाकीर्ण न हो, चोर-लुटेरे न हों, मार्ग पर, सब सुरक्षा हो, सुविधा हो लेकिन अगर मार्ग कहीं पहुंचाता ही न हो, तो उस मार्ग की सुविधा और सौंदर्य का क्या करिएगा? मार्ग कंटकाकीर्ण हो, राह लुटेरों से भरी हो, जंगली जानवरों का भय हो, लेकिन कहीं पहुंचाता हो, तो जाने योग्य है।

अमूर्च्छित व्यक्ति का जीवन भटकाव नहीं, एक सुनियोजित यात्रा है। लेकिन वह नियोजन कौन देगा? समाज उस नियोजन को नहीं दे सकता। समाज तो अंधों की भीड़ है। वह तो मूर्च्छित लोगों का समूह है। अगर तुमने समाज की सुनी, तो तुम अंधेरे में ही भटकते रहोगे। भीड़ तो बोधपूर्ण नहीं है। हो भी नहीं सकती। कभी-कभी कोई एकाध व्यक्ति अनेकों में बोध को उपलब्ध होता है। तो भीड़ तो बुद्धों की नहीं है।

अमूर्च्छित व्यक्ति अपने भीतर अपने जीवन की विधि खोजता है। अपने होश में अपने आचरण को खोजता है। अपने अंतःकरण के प्रकाश से चलता है। कितना ही थोड़ा हो अंतःकरण का प्रकाश, सदा पर्याप्त है। इतना थोड़ा हो कि एक ही कदम पड़ता हो, तो भी काफी है। क्योंकि दुनिया में कोई भी दो कदम तो एक साथ चलता नहीं।

छोटे से छोटा दीया भी इतना तो दिखा ही देता है, कि एक कदम साफ हो जाए। एक कदम चल लो, फिर और एक कदम दिखाई पड़ जाता है। कदम-कदम करके हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है।

अमूर्च्छित व्यक्ति विद्रोही होता है। अमूर्च्छित व्यक्ति एक-एक क्षण, पल-पल एक ही बात को साधता है; और वह बात यह है, कि कुछ भी मुझसे ऐसा न हो जाए, जो मूर्च्छा को बढ़ाए, मूर्च्छा कसे ग्रहण करे। ध्यान रखना, एक-एक बूंद पानी की गिरती है, चट्टानें टूट जाती हैं। एक-एक बूंद होश की गिरती है, और तुम्हारी जन्मों-जन्मों की चट्टान हो मूर्च्छा की, निद्रा की टूट जाती है। लेकिन एक-एक बूंद गिरनी चाहिए।

तो प्रतिपल अमूर्च्छित व्यक्ति की चेष्टा यही होती है, कि हर क्षण का उपयोग एक ही संपदा को पाने में कर लिया जाए। वह यह, कि मेरे भीतर का विवेक प्रगाढ़ हो, जागे।

मूर्च्छित चित्त की तीन अवस्थाएं हैं, जिन्हें हम जानते हैं।

एक, जिसे हम जाग्रत कहते हैं; जो कि शब्द उचित नहीं है। क्योंकि मूर्च्छित व्यक्ति जागेगा कैसे? उसका जागरण नाममात्र का जागरण है। कहने भर का जागरण है। सुबह सूरज उगता है, पशु-पक्षी जाग आते हैं, पौधे जाग आते हैं, तुम भी जाग जाते हो। क्या पशु पक्षी जाग्रत हैं; क्या पौधे जाग्रत हैं? तुम भी नहीं हो। सिर्फ शरीर का विश्राम पूरा हो गया, इसलिए तुम उठते हो, चलते हो, बैठते हो। ऐसा लगता है, जैसे जागे हो। लेकिन यह सिर्फ लगना मात्र है। इसका वास्तविक जागरण से कोई दूर का भी संबंध मुश्किल से बनता है।

मैंने सुना है, कि मुल्ला नसरुद्दीन को किसी ग्रामीण परिचित ने, किसान ने गांव से एक मुर्गी भेज दी भेंट में। जो आदमी मुर्गी लेकर आया था, स्वभावतः नसरुद्दीन ने उसका काफी स्वागत किया। मुर्गी का शोरबा बनवाया। उसे शोरबा पिलाया। वह आदमी बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने जाकर गांव में खबर कर दी, आदमी बहुत अच्छा है। और अतिथि को तो बिलकुल देवता मानता है।

फिर तो गांव से लोगों का आना शुरू हो गया। दूसरे ही दिन दूसरा आदमी मौजूद हो गया। नसरुद्दीन ने पूछा, आप कौन? उसने कहा, कि जिसने मुर्गी भेजी थी, उसका दूर का रिश्तेदार हूं। उसका भी नसरुद्दीन ने स्वागत किया। घर आया आदमी! फिर कितने ही दूर का रिश्तेदार हो, रिश्तेदार ही है उसी का, जिसने मुर्गी भेजी थी।

लेकिन फिर बात सीमा के बाहर होने लगी। रिश्तेदारों के रिश्तेदार आने लगे। रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के मित्र आने लगे। रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के मित्रों के मित्र आने लगे। पत्नी बेचैन हो गई। उसने कहा, यह मुर्गी तो एक अपशगुन सिद्ध हुई। हम इस इनकार ही कर देते। यह तो पूरा गांव चला आ रहा है। नसरुद्दीन ने बहुत सोचा। कुछ करना ही पड़ेगा। और दूसरे दिन सुबह फिर एक आदमी खड़ा है। आप कौन हैं? उसने कहा, कि जिसने मुर्गी भेजी थी, उसके रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के मित्रों का मित्र हूं। नसरुद्दीन ने कहा, आइए। स्वागत है।

लेकिन वह आदमी बड़ा हैरान हुआ, जब भोजन उसे कराया गया तो सिर्फ कुनकुना पानी था शोरबे के नाम पर। उस आदमी ने कहा, और सब तो ठीक है, लेकिन मैंने बड़ी चर्चा सुनी थी आपके आतिथ्य की। और यह तो कुनकुना पानी है। नसरुद्दीन ने कहा, माफ करिए। कुनकुना पानी नहीं है। मुरगी के शोरबे का शोरबे का शोरबे का शोरबा है।

आपकी जागृति बस मुर्गी के शोरबे का शोरबे का शोबरे का शोरबा है। अगर बुद्धि जागृति जागृति है तो आपकी जागृति रिश्तेदारों के रिश्तेदारों के मित्रों का मित्र है। बहुत लंबा फासला है। बुद्ध को हमने जागृत कहा है। बुद्ध शब्द का अर्थ है--जो जाग गया। जो होश से भर गया।

अगर बुद्ध मापदंड हों जागरण के, तो तुम्हारा जागरण क्या होगा? एक खोटा सिक्का, जो सिक्के जैसा लगता है, लेकिन सिक्का है नहीं। एक झूठ, जा सत्य का दावा करता है, लेकिन सत्य है नहीं। एक मुर्दा लाश, जो ठीक जीवित आदमी जैसी ही मालूम पड़ती है, नाक नक्शा बिलकुल जीवित आदमी जैसा, लेकिन भीतर कोई प्राण नहीं है। एक बुझा हुआ दीया, जिसमें सब हैं; दीया है, बाती है, तेल है लेकिन ज्योति नहीं।

मूर्च्छा के तीन रूप हैं। एक, जिसे हम जागृति कहते हैं; जो बिलकुल खोटी है। क्योंकि जागे हुए भी तुम जागे हुए नहीं होते। जागकर भी तुम जो करते हो, वह खबर देता है कि तुम सोचे हुए हो।

तुमने हजार दफे तय किया है, कि अब दोबारा क्रोध नहीं करेंगे। और फिर एक आदमी अपमान कर देता है, या तुम्हें लगता है अपमान कर दिया। या किसी आदमी का भीड़ में तुम्हारे पैर पर पैर पड़ जाता है--और एक क्षण भी नहीं लगता। एक क्षण की देरी भी नहीं होती, और आग उबल उठती है। और तुमने उनके बार तय किया है कि अब क्रोध न करेंगे। हजार बार कसमें ली हैं। हजार बार पछताए हो। वह सब कहां चला गया पछतावा? यह याददाश्त इतनी जल्दी कैसे खो जाती है? होश होता, तो साथ रहती। बेहोशी में याददाश्त साथ कैसे रह सकती है? क्षण में आग जल उठती है। फिर वही क्रोध खड़ा है। फिर तुम पछताओगे घड़ी भर के बाद; लेकिन न तुम्हारे पछतावे का कोई मूल्य है और न तुम्हारे क्रोध का कोई मूल्य है। तुम्हारा पछतावा भी झूठ है। क्योंकि तुम कितनी बार पछता चुके। अब रुकते नहीं। अब रुक जाओ।

एक आदमी मेरे पास आया। और उसने कहा, जिंदगी भर हो गई--उसकी उम्र कोई पैंसठ साल होगी--बस, एक ही चीज मुझे कष्ट दे रही है, मेरा क्रोध। इससे मेरा घर भर पीड़ित है। मेरे बच्चे, मेरी पत्नी, मेरी जीवन एक कलह की लंबी कहानी है। मगर यह क्रोध मुझसे नहीं जाता। और अभी भी है मौत करीब आई जा रही है। लेकिन यह क्रोध मुझे आग की तरह कंपाता रहता है।

और मैंने हजार बार पश्चात्ताप कर लिया। कसमें खा ली मंदिरों में जा कर, साधुओं के चरणों में सिर रख कर, कि शायद उनकी कृपा का साथ मिल जाए। भगवान को साक्षी रखकर मंदिरों में कसम खा ली। वह भी काम नहीं आती। जब क्रोध पकड़ता है। तो भगवान की सामर्थ्य भी काम में नहीं आती। उस वक्त मैं सब भूल ही जाता हूं। एक क्षण को मैं होता ही नहीं। कौन आ जाता है मेरे भीतर भूत-प्रेत जैसा, और मैं क्या कर गुजरता हूं, इसका मुझे खुद ही समझ नहीं आता। पीछे लौट कर देखता हूं, तो मानने का मन नहीं होता, कि मैंने ऐसा किया होगा। क्या करूं? आप साक्षी हो जाए। मुझे संकल्प करवाएं।

मैंने कहा, कि मैं वह भूल न करूंगा जो दूसरों ने तुम्हारे साथ की है। तुमसे मैं सिर्फ एक प्रार्थना करता हूं कि तुम पश्चात्ताप का त्याग कर दो। क्रोध तो चलने दो। इतना तो कर सकते हो कि अब क्रोध आएगा। तो पश्चात्ताप न करेंगे।

वह आदमी हंसने लगा। उसने कहा कि यह तो मैं कर ही सकता हूं। इसमें क्या अड़चन? उसे पता नहीं, कि जो क्रोध नहीं छोड़ सकता, वह पश्चात्ताप भी नहीं छोड़ सकता। छोड़ना तो होश की बात है। मैंने कहा, तो जिस दिन पश्चात्ताप छूट जाए, तुम आ जाना। उसी दिन क्रोध भी छुड़वा दूंगा।

महीने भर बाद वह आदमी वापिस आया और उसने कहा कि आपने धोखा दिया। पश्चात्ताप भी नहीं छूटता। इसमें तो कोई अड़चन नहीं है। यह तो किसी शास्त्र ने तुमसे कहा नहीं, यह तो छोड़ ही सकते हो। पश्चात्ताप के तो विरोध में कोई भी हनीं है। क्रोध के विरोध में तो सारी दुनिया है। तुम पश्चात्ताप छोड़ दो। उसने कहा, नहीं। बात मेरी समझ में आ गई। आप क्या समझाना चाहते थे, वह मुझे दिखा गया। मैं कुछ भी नहीं छोड़ सकता। मैं हूं ही नहीं।

जब तक तुम जागे नहीं हो, तुम हो ही नहीं। तुम्हारा होना सिर्फ एक भ्रांति है। सिर्फ एक खयाल है। जिसकी कोई जड़ें नहीं है। सिर्फ एक सपना है; जिसकी कोई सार्थकता नहीं और जिसमें कोई पौदगलिकता नहीं; जिसमें कोई पदार्थ नहीं; जिसमें कोई बल नहीं। न तुम पश्चात्ताप छोड़ सकते हो, न तुम क्रोध छोड़ सकते हो। करते जरूर हो। वह भी कहना ठीक नहीं है, कि तुम करते हो। उचित होगा कहना, कि वह भी होता है। तुम यंत्रवत हो। नहीं तो छोड़ देते।

जिस काम को तुम करते हो, उसे तुम छोड़ सकते हो; यह नियम है। जिस काम को तुम करते ही नहीं, उसको तुम छोड़ोगे कैसे? जैसे होता है, उसको तम कैसे छोड़ोगे? बटन दबाते हो, बिजली का बल्ब जल जाता है। क्या बिजली के बल्ब के हाथ में यह बात है, कि वह न जले; या जब चाहे तब जले? या जब उसका भाव न हो, तो कह देस अभी विश्राम कर रहा हूं? नहीं, बटन दबाती है तो बिजली का बल्ब जल जाता है। शायद बिजली का बल्ब भी अपने भीतर सोचता होगा कि मैं जलता हूं, मैं बूझता हूं। वह गलती में है। तुम भी बुझते नहीं, जलते नहीं।

एक आदमी ने गाली दी, बटन दबा दी। जल गए! एक आदमी आया, कहने लगा, कैसे देवपुरुष हो आप! प्रसन्न हो गए! एक आदमी ने कहा, कैसी सुंदर मूर्ति है। और भीतर फूल खिल गए। और एक आदमी ने कह दिया, कि जरा देखो भी तो अपना चेहरा दर्पण में। ऐसी बेहूदी शक्ल कहीं नहीं देखी--कि आग लग गई। बटने हैं। तुम नहीं हो।

बुद्ध के पास एक आदमी आया और उसने कहा, कि मुझे कुछ शिक्षा दें। मैं संसार की सेवा करना चाहता हूं। बुद्ध उदास हो गए। वह आदमी कहने लगा, आप उदास क्यों हो गए हैं? बुद्ध ने कहा कि उदास इसलिए हो गया हूं, क्योंकि तुम अभी हो ही नहीं। संसार की सेवा कौन करेगा? और तुम सेवा के नाम से दूसरों को सताने लगोगे। तुम कृपा करो। तुम पहले अपनी सेवा कर लो। पहले तुम हो तो जाओ।

गुरजिएफ--पश्चिम का एक बहुत बड़ा रहस्यवादी संत इस सदी का--कहता था, कि आत्मा सभी के भीतर नहीं है। उसकी बात में थोड़ी सच्चाई है। क्योंकि आत्मा तो उन्हीं के भीतर है, जो जागे हुए हैं। बाकी तो सिर्फ मिट्टी के पुतले हैं बाकी तो सब पदार्थ हैं। उनके भीतर अभी आत्मा का कोई आविर्भाव नहीं हुआ है।

उसकी बात में सचाई है। क्योंकि आत्मवान होने का एक ही अर्थ होता है, कि तुम अपने मालिक हुए। अब तुम जो चाहो, वही होगा। तुम हवा में कंपते हुए पत्ते नहीं हो, कि जब झोंका आएगा तब कंपोगे और जब झोंका नहीं आएगा तो लाख चाहो, तो कंप सकोगे। अब तुम यंत्रवत नहीं हो। तुम मनुष्य हो। मनुष्य का अर्थ है, कि अब तुम्हारे भीतर से निकलेंगे तुम्हारे कृत्य। बाहर की घटनाओं से पैदा न होंगे। परिस्थितियां नहीं, अब तम मूल्यवान हो। तभी तो तुम आत्मवान होओगे। अन्यथा आत्मा है, यह केवल सिद्धांत है।

कभी-कभी किसी व्यक्ति में आत्मा होती है। तुममें आत्मा ऐसे ही है, जैसे बीज में वृक्ष। हुआ न हुआ बराबर। हो सकता है, लेकिन है नहीं। और हो सकता और होने में बड़ा फर्क है। वह केवल संभावना है बीज की, कि अगर ठीक ठीक समुचित भूमि मिले, समुचित खाद मिले, समुचित सुरक्षा मिले, समुचित जल, समुचित सूर्य की किरणें मिलें, सुरक्षा मिले तो संभावना है, कि बीज वृक्ष हो सकेगा। लेकिन बहुत सी शर्ते पूरी हों, तब। अन्यथा बीज बीज की तरह ही मर जाएगा और वृक्ष न हो सकेगा।

अधिकतम लोग शरीर की तरह ही जीते हैं शरीर की तरह ही मर जाते हैं। बीज उनका ऐसे ही खो जाता है। अवसर आता है और जाता है। आत्मवान होने का अर्थ है--होश, विवेक, जागृति। तुम्हारे कृत्य तुम्हारे भीतर से निकलने लगें। अभी तुम्हारे कर्म, कर्म नहीं हैं, प्रतिकर्म हैं। प्रतिकर्म यानी रिएक्शन। कोई कुछ करता है, उसकी प्रतिक्रिया में तुम्हारे भीतर कुछ होता है। अगर कोई प्रेम करता है, तो तुम प्रेम करते हो। और कोई घृणा करता है, तो तुम घृणा करते हो।

जीसस का वचन है, शत्रु को भी प्रेम करो। इसका क्या मतलब हुआ? यह कोई नीति की शिक्षा नहीं है। जीसस जैसे व्यक्तियों को नीति में क्या उत्सुकता? यह धर्म का गहनतम सूत्र है। जीसस कहते हैं, शत्रु को प्रेम करो। वे यह कह रहे हैं, मित्र को तो प्रेम करना प्रतिक्रिया है, वह तो सभी मरते हैं। शत्रु को घृणा करना भी प्रतिक्रिया है। वह तो सभी करते हैं। जिसने शत्रु को प्रेम कर लिया, वह मालिक हो गया। उसने प्रतिक्रिया तोड़ दी। वह अपने कर्म का खुद मालिक हो गया।

शत्रु को पूरी चेष्टा कर रहा है, कि तुम उसे घृणा करो। लेकिन तुमने उसकी चेष्टा तोड़ दी। वह तो बटन दबा रहा था तुम्हारा क्रोध की लेकिन तुमने प्रेम का प्रवाह पैदा कर दिया। अगर तुम अपने शत्रु को प्रेम कर पाओ तो तत्क्षण तुम यंत्रवत्ता से मुक्त हो गए। तब तुम्हारे प्रतिकर्म खो गए। अब तुम कर्मवान हुए।

और यह बड़े मजे की बात है; प्रतिकर्म बांधते हैं, कर्म नहीं बांधता। असल में प्रतिकर्मों से ही कर्मों की शृंखला बनती है। जब कोई व्यक्ति होशपूर्वक कर्म करता है तो उससे कोई बंधन पैदा नहीं होता।

तुमने कभी जीवन में कोई कर्म होशपूर्वक किया है। होशपूर्वक करने का अर्थ है, तुम्हारे शरीर का यंत्र जो करना चाहता हो वह नहीं; तुम्हारे भीतर का होश जो करना चाहता हो वही तुमने कभी किया है? शरीर कहता था, करो क्रोध, मन कहता था, करो क्रोध। मन में तो गाली उठ आई थी, शरीर ने डंडा उठा लिया था। कभी ऐसा हुआ है, कि डंडा हाथ में रह गया हो, गाली मन में रह गई हो और तुम अछूते, अस्पर्शित भीतर खड़े रहे? तुम्हारी ज्योति पर छांव भी न पड़ी इस डंडे की। तुम्हारी ज्योति पर गाली का दंश भी न आया। तुम्हारी ज्योति निष्कलुष बनी रही--कमलवत। पानी छुआ ही नहीं।

अगर ऐसा तुमने कभी किया है, तो तुम्हें पहली दफा पता चलेगा कि अमूर्च्छा क्या है, जागृति क्या है, होश क्या है! उसी क्षण तुम परम-आनंद से भर जाओगे। तुम मुक्त हो गए। अब तुम्हें कोई चला नहीं सकता। अब तुम्हें कोई धका नहीं सकता। अब तुम अपने मालिक हो। यही तो मालकियत है,जिसकी तलाश चल रही है। अब तुम सम्राट हो गए।

जब तक तुम बंधे हो यंत्रवत्ता से तब तक तुम एक भिखारी हो। तुम्हारा जागरण, नाम-मात्र का जागरण है। खोटा सिक्का है। मूर्च्छा का पहला रूप है--जागरण--सुबह से सांझ तक जिसे तुम जानते हो, वह जागरण ऊपर-ऊपर है। भीतर तो निद्रा बहती रहती है। तुमने कभी खयाल किया? आंखें बंद करके थोड़ी देर बैठ जाओ। तत्क्षण तुम सपना देखने लगोगे। आंख खुली थी, वृक्ष, लोग, रास्ता, दुकान, बाजार दिखाई पड़ रहा था। आंख बंद की--सपना शुरू!

मैंने सुना है, कि मुल्ला नसरुद्दीन को फुटबाल का बहुत शौक था। शौक इतना ज्यादा हो गया था, जैसा कि अक्सर लोगों को हो जाता है। जब बाढ़ आती है तो कोई सीमाओं का खयाल रख कर थोड़ी आती है! क्रिकेट के पागल हैं, कि अगर उनकी टीम हार जाए तो रेडियो, जिसमें वे कामेंन्ट्री सुन रहे थे, उसको पटक देते हैं। हाकी के दीवाने हैं। मुल्ला नसरुद्दीन फुटबाल का दीवाना था।

पत्नी परेशान हो गई थी। क्योंकि वह दिन में बैठकर कुर्सी पर भी लातें फटकारता था। फुटबाल! रात सोता तो भी सपने में लाते फेंकता, और ऊधम मचाता। पत्नी डाक्टर के पास गई और उसने कहा, बहुत हो गया। अब यह फुटबाल का इलाज करना ही पड़ेगा। तो डाक्टर ने उसे दवा दी, कि यह ट्रेंक्विलाइजर है, शामक है। इसे ले जाओ। इसकी एक गोली दे दोगे, तो रात भर मुल्ला शांत रहेगा।

पत्नी घर आई। उसने मुल्ला से कहा कि यह गोली मैं ले आई हूं। तुम शांति से सो सकोगे। रात सोते वक्त इसे लेना है। मुल्ला ने कहा, अगर आज न लूं और कल लूं तो कोई हर्जा? उसकी पत्नी ने कहा, क्यों? आज क्या मामला है? उसने कहा, आज फायनल मैच है--सपने में।

अगर तुम आंख बंद करो तो तुम पाओगे कि कहां न मालूम कितने तरह के मैच चल रहे हैं सपनों के। जरा आंख बंद की, कि सपना दौड़ने लगता है। सपना दौड़ ही रहा था। सिर्फ आंख खुली थी, तुम बाहर उलझे थे, इसलिए खयाल नहीं था। सपना नींद का लक्षण है क्योंकि बिना नींद के सपना हो ही नहीं सकता। इसे तुम सूत्र की तरह याद रखना; सपना नींद का लक्षण है। और अगर जागते-जागते भी तुम्हारे भीतर सपना चलता है तो उसका अर्थ है, तुम्हारे भीतर नींद ही चलती है। ऊपर-ऊपर, सतह पर जरा से तुम जागे हुए लगते हो। भीतर सपना चल रहा है।

तुम रास्ते पर चलते लोगों को देखो। वे उस रास्ते पर चल रहे हैं--ऊपर-ऊपर। भीतर दूसरे ही रास्ते हैं, जिन पर उनका मन चल रहा है। लोगों को खाना खाते देखो। कौर बना रहे हैं, मुंह में खाना डाल रहे हैं। बिलकुल होश में लगते हैं। लेकिन जरा गौर से उनके चेहरे को देखो। भीतर कुछ और चल रहा है। शायद उन्हें पता भी न हो कि वे भोजन कर रहे हैं। वे किसी दूसरे लोक में किसी सपने में संलग्न है। उनके ओठ कंप रहे हैं। बात चल रही है किसी और से, जो वहां मौजूद नहीं है।

लोग रास्ते पर चले जा रहे हैं और होंठ हिलते हैं। हाथ में मुद्राएं होती रहती हैं। जैसे वे किसी से चर्चा कर रहे हैं, जो वहां मौजूद है, तुम्हें नहीं दिखाई पड़ता, उनके सपने में मौजूद है।

तुम अपना ही निरीक्षण करो। तुम पाओगे, तुम जो भी करते हो, वह ऊपर-ऊपर है। भीतर कुछ और भी चल रहा है। भीतर सपना चल रहा है। भीतर नींद भरी है। ऊपर जरा सी पतली सतह है जागरण की। वह काम-चलाऊ है। उससे कोई आत्मा की उपलब्धि न होगी और न परमात्मा मिलेगा। वह इतनी धीमी मंदी रोशनी है, कि उससे वह प्रगाढ़ अंधकार न टूटेगा, जो तुम्हारे जीवन के भीतरी तलों को घेरे हुए हैं।

वह ऐसे है, जैसे जुगनू हो। चमकती है जुगनू, लेकिन जुगनू की चमक मग बैठ कर तुम कोई गीता थोड़े ही पढ़ सकते हो! ऐसा ही जागरण है, जुगनू की चमक जैसा। उसमें तुम भीतर के परमात्मा को थोड़े ही देख पाओगे। उसमें कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। उसमें जुगनू तक दिखाई नहीं पड़ती; और तो क्या कुछ दिखाई पड़ेगा। बस, जरा सी चमक। उतना ही तुम्हारा जागरण है। वह भी चमक पल भर की है। जुगनू के पंख खुले--चमक। पंख बंद हुए--चमक बंद। ऐसे प्रतिपल तुम सोते, जागते हो। होश पकड़ते हो खोते हो।

दूसरी अवस्था है। तुम्हारे स्वप्न की। स्वप्न बड़ी अनूठी घटना है। क्योंकि जो है ही नहीं, वह स्वप्न में तुम्हें वास्तविक मालूम होता है। तुम्हारी तंद्रा कितनी गहरी न होगी! और तुमने कोई सपना नया नहीं देखा है। तम रोज रात देखते हो। अगर आदमी साठ साल जीएगा तो कम से कम बीस साल सोएगा। आठ घंटे रोज सोएगा। एक तिहाई दिन सोएगा। साठ साल आदमी जिंदा रहेगा, तो बीस साल से ज्यादा सोएगा। रोज तुम सोते हो। रोज रात तुम सपना देखते हो। और रोज रात तुम्हें सपने में सपना सच मालूम होता है। तुम्हारा होश बिलकुल भी नहीं है। हां, पहली दफा तुमने सपना देखा हो, सच मालूम हो जाए। क्योंकि परिचय न था। लेकिन सुबह हर दिन जागते हो और पाते हो कि सपना झूठ था। बीस वर्ष सोओगे, जाओगे। हर बार पाओगे कि सपना झूठ था। फिर से सोओगे फिर सपना सच मालूम होगा।

तुम्हारा होश कैसा होश है? तुम्हारा अनुभव कैसा अनुभव है? तुम्हारे जीवन में कोई भी संग्रहीत होता है, या नहीं होता? तुम्हारा ज्ञान निर्मित होता है, या नहीं होता?

एक बच्चा एक बार भूल करे तो हम कहते हैं चलो, माफ कर दो। फिर दोबारा वही भूल करता है, तो हम कहते हैं चलो बच्चा है। लेकिन तीसरी दफे हम सोचने लगते हैं, कि जब कुछ करना पड़ेगा। लेकिन तुम तो करोड़ों बार वही भूल कर चुके। रोज सांझ सोते हो, तब तुम जानते हो कि रात जो दिखाई पड़ता है, वह झूठा है। सुबह कर जानते हो, कि झूठा है। लेकिन रात के आठ घंटों में सच हो जाता है--तुम्हारे लिए ही। तो तुम्हारा जानना भीतर जाता ही नहीं। कांटा भी ज्यादा चुभ जाता है, इतना भी तुम्हारा जानना नहीं चुभेगा। जानने की कोई लकीर ही तुम्हारे ऊपर नहीं बनती।

महाभारत की कथा है, कि पांचों पांसठ वन में भटकते हैं। वे एक झील के किनारे आए हैं। वे प्यासे हैं। छोटे भाई को भेजा है पानी लेने, लेकिन जैसे ही वह झुक कर पानी भरने लगा, एक यक्ष ने, जो झील का मालिक था, उसने आवाज दी कि ठहरो। इस झील का नियम है, कि जो मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर देगा वही केवल जल ले सकता है। और शर्त है, कि अगर तुम उत्तर न दे पाए या गलत उत्तर दिए, तो तुम उस झील से जिंदा न लौट सकोगे।

प्यासा था, नकुल, भाई भी प्यासे थे। तो उसने कहा, मैं राजी हूं जवाब देने को। लेकिन जवाब दे न पाया। गिर पड़ा। दूसरा भाई आया, तीसरा भाई आया; चार भाई लौटे नहीं झील से, तो युधिष्ठिर खोजने आए। चारों की लाशें पड़ी हैं किनारे पर। हैरान हुए थक क्या हुआ?

आवाज आई। जैसे ही झुके पानी को, कि ठहरो। जो तुम्हारे भाइयों के साथ हुआ, वही तुम्हारे साथ हो जाएगा। चुनौती है। तीन सवाल है। जवाब दे दो। क्योंकि इन तीन सवालों के जब मुझे जवाब मिल जाएंगे तो मैं इस यक्ष की योनि सु मुक्त ह