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ज्ञान ही प्रत्यक्ष ज्ञान—


मनुष्य की इंद्रियां केवल बाहर की ओर उगख होती हैं और हो सकती हैं। भीतर की ओर उन्यूख होने का कोई प्रयोजन नहीं है।

जैसे कोई वैज्ञानिक दूर के तारों की खोज के लिए दूरबीन बनाता है। तो उस दूरबीन से दूर के तारे तो दिखाई पड़ जाते है, लेकिन दूरबीन के पीछे छिपा हुआ वैज्ञानिक उस दूरबीन से दिखाई नहीं पड़ता, जो बिलकुल पास ही खड़ा है। दूरबीन से जो आंखें सटाकर खड़ा है। दूरबीन उस वैज्ञानिक को नहीं पकड़ती;दूर, करोड़ो मील दूर के तारों को पकड़ लेती है। दूरबीन बनी ही है दूर को देखने के लिए। वह जो देखने वाला है, उसे देखने के लिए तो किसी भी दूरबीन की कोई जरूरत नहीं है।

इंद्रियां हैं पदार्थ को देखने के लिए। स्वयं को देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है। स्वयं को तो बिना इंद्रियों के ही देखा जा सकता है। इसलिए इंद्रियां भीतर की तरफ नहीं जातीं, बाहर की तरफ जाती हैं। पर इससे बड़ी उलझन खड़ी होती है। इससे उलझन यह खड़ी होती है कि दूर तारों को देखने वाला वैज्ञानिक धीरे— धीरे यह भूल भी जा सकता है कि वह भी है। तारे ही सब कुछ हो जा सकते हैं। दूरबीन को थामे — थामे वह जो पीछे देखने वाला है, वह विस्मरण हो जा सकता है, क्योंकि निरंतर वही दिखाई पड़ेगा जो बाहर है, सतत वही दिखाई पड़ेगा जो बाहर है। और जो भीतर छिपा है, वह दिखाई न पड़ने से स्मृति से खो सकता है।

यही हुआ है। हमारी सारी इंद्रियां बाहर की तरफ जाती हैं। मैं हाथ से आपको छू सकता हूं। मैं हाथ से अपनी देह को भी छू सकता हूं क्योंकि वह भी पराई है और बाहर है। हाथ से मैं अपने को नहीं छू सकता जो देह में छिपा है। हाथ से मैं छूने वाले को नहीं छू सकता।

जब मैं अपना हाथ आपकी तरफ बढ़ाता हूं तो सिर्फ हाथ ही नहीं बढ़ता, हाथ में छिपा हुआ मैं भी बढ़ता हूं। मैं बढ़ना चाहता हूं आपको छूना चाहता हूं इसीलिए हाथ बढ़ता है। हाथ तो छाया की तरह मेरे पीछे आता है। मैं चाहता हूं आपको छुऊं, तो मेरा हाथ अनुसरण करता है, मेरी आज्ञा का पालन करता है। लेकिन जब मैं आपको छूता हूं तब दो घटनाएं घट रही हैं—एक तो आप हैं जिसको मैंने छुआ, और एक मैं हूं जिसने छुआ; और एक हाथ है जिसके द्वारा छुआ, और एक आपका शरीर है जिसके द्वारा आपको छुआ गया।

आँख बहर की तरफ देखती है, उसे सब दिखाई पड़ जाता है। सिर्फ मैं जो भीतर छिपा हूं वह उसे दिखाई नहीं पड़ेगा। कान बाहर की तरफ सुनते हैं। स्वाद, रस,गंध, सब बाहर से संबंधित हैं।

इंद्रियों का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि हम जगत से परिचित हो सकें। दूसरे से, अन्य से परिचित हो ने की व्यवस्था है। लेकिन वह जो भीतर छुपा है, वह इस परिचय में अपरिचित हो जाता है। जो हमारा अपना, गाना होना है,वह आच्छादित होता चला जाता है। हम वस्तुओं को जानते—जानते उसे भूल ही जाते हैं जो जानने वाला है। यह बात इस सूत्र की पहली बात है।

स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं। इसलिए मनुष्य इंद्रियों के द्वारा प्राय: बाहर की वस्तुओं को ही देखता है अंतरात्मा को नहीं। किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरपद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अंतरात्मा को देखा है।

इसमें एक बात खयाल में ले लेने जैसी है, क्योंकि उससे बहुत भ्रांति साधकों के जगत में है। आंख को भीतर लौटाने का क्या अर्थ है? क्या आंख भीतर लौटाई जा सकती है? आंख भीतर लौटाई ही नहीं जा सकती। आंख बाहर ही देख सकती है। आंख के भीतर देखने का कोई उपाय नहीं। देखने वाले को आंख से देखने का कोई उपाय नहीं। लेकिन संतो ने कहा है, योगियों ने कहा है, लौटा लो आंख को, उलटी कर लो धारा।

लौटाने का कुल मतलब इतना है कि बाहर की तरफ मत जाओ। जो ऊर्जा आंख से बाहर जाती है, उसे बाहर मत जाने दो। बाहर की तरफ जाने वाला द्वार बंद हो जाए, तो जो देखने वाला बाहर की तरफ जाता है, बाहर न जाकर वह देखने वाला अपनी तरफ लौट आएगा। वहां कोई आंख न होगी, लेकिन स्वयं को देखने के लिए आंख की कोई जरूरत ही नहीं है। स्वयं का देखना बिना आंख के हो जाता है। वह चक्षुरहित दर्शन है।

स्वयं को सुनने के लिए कोई कानों को भीतर लौटाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ कान बाहर न सुनें। बाहर की ध्वनि—तरंगों का जाल कान से छूट जाए। कान बाहर के प्रति उपेक्षा से भर जाएं। तो जो ऊर्जा कान से बाहर की तरफ जाती है बाहर न जाए, तो वह ऊर्जा भीतर की ध्वनि को अपने आप सुन लेती है। उस ध्वनि को सुनने के लिए कान की कोई भी जरूरत नहीं है।

इंद्रियां भीतर लौट आएं, इसका केवल इतना ही अर्थ है कि बाहर न जाएं, बाहर की तरफ प्रवाह न हो। तो जैसे कोई झरना बहता है और अवरुद्ध हो जाए और कहीं जाने का माग न मिले, तो झरना अपनी तरफ लौट आएगा, झरने का बहना बंद हो जाएगा और एक झील बन जाएगी। ऐसे ही चेतना बाहर जा रही है पांचों इंद्रियों से। वह बाहर न जाए तो चैतन्य की झील भीतर निर्मित हो जाती है। वह झील स्वयं—बोध—संपन्न है। वह झील स्वयं को देखने, स्वयं को सुनने, स्पर्श करने में संपन्न है। लेकिन वे सारे अनुभव अतींद्रिय हैं। उनका इंद्रियों से कोई भी लेना—देना नहीं है।

एक सूफी फकीर हुआ बायजीद। वह निरंतर कहा करता था कि मेरे गुरु ने तीन युवकों को एक—एक कबूतर दे दिया और कहा कि ऐसी जगह जाकर कबूतर को मार डालना जहा कोई देखने वाला न हो। एक युवक तो पांच मिनट बाद कबूतर को मारकर वापस आ गया। वह बगल की गली में गया। वहा कोई भी नहीं था। उसने गरदन मरोड़ी। वापस आ गया। दूसरा युवक तीन दिन बाद कबूतर को मारकर लौटा। उसने बड़ी खोजबीन की; कहीं भी भूल—चूक से कोई देख न ले। तो वह एक गहरी गुफा में गया। उसने गुफा के द्वार पर पत्थर लगा दियां। किसी के आने का कोई उपाय न रहा। गहन अंधकार था। वहां कोई देख भी नहीं सकता था, आ भी जाए तो भी। उसने गरदन मरोड़ दी।

तीसरा युवक तीन महीने के बाद कबूतर को लिए वापस लौटा। गुरु ने कहा कि क्या तीन महीने में तुम ऐसी कोई जगह न खोज पाए, जहा कोई भी न हो? उसने कहा कि तीन जन्मों में भी खोजना संभव नहीं है। तीन महीने बहुत मेहनत कर ली। गहन गुफा में गया, अंधकार था, लेकिन मैं तो देख ही रहा था; कबूतर तो देख ही रहा था। दो तो मौजूद थे। कबूतर की भी आंखे बंद कर दू तो भी मैं मारने वाला तो देखता ही रहूंगा—कितना ही गहन अंधकार हो!

बायजीद के गुरु ने कहा कि तू ही कैवल स्वयं को खोजने में सफल हो पाएगा। बाकी दो की कोई आंतरिक खोज नहीं है। दो को विदा कर दिया, उस एक को रोक लिया। क्योंकि तुझे इतना स्मरण है कि इंद्रियां भी जहा नहीं देख पातीं, प्रकाश जहां मौजूद नहीं, वहां भी तू तो देख ही रहा है। तेरे देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है।

कितना ही गहन अंधकार हो कमरे में, आपको कुछ भी न दिखाई पड़ता हो, लेकिन आप हैं, इतना तो पता चलता ही रहता है। दीवाल न दिखती हो, सामान न दिखता हो, कक्ष में बैठे और लोग न दिखते हों, लेकिन आप हैं,यह तो कोई भी अंधकार मिटा न सकेगा। यह तो कोई भी स्थिति में आप रहेंगे ही और आपको पता चलता ही रहेगा कि मैं हूं। यह होना स्वयंसिद्ध है। यह किसी माध्यम से नहीं है। इसलिए आत्मज्ञानियों ने कहा है कि जगत के सारे अनुभव परोक्ष हैं, सिर्फ आत्म—अनुभव प्रत्यक्ष है।

यह बड़ी उलटी बात है। क्योंकि आमतौर से हम सोचते हैं कि सब चीजें प्रत्यक्ष हैं। वृक्ष दिखाई पड़ रहा है। आप दिखाई पड़ रहे हैं। सब चीजें प्रत्यक्ष हैं, आंख के सामने हैं। लेकिन आत्मज्ञानी कहते हैं कि जगत के सभी अनुभव परोक्ष हैं। क्योंकि बीच में आंख माध्यम का काम कर रही है। तुम पीछे छिपे हो। ज्ञेय वस्तु बाहर है, बीच में माध्यम,दलाल आंख है। आंख धोखा दे सकती है।

शान सीधा नहीं है, इमीजिएट नहीं है। शान के बीच में एक माध्यम है। तो पीलिया हो किसी को तो पीला रंग दिखाई पड़े। किसी की आंख खराब हो, कलर ब्लाइंड हो कोई, तो उसे कोई रंग दिखाई न पड़े। आंख का भरोसा क्या?आंख ठीक कह रही है—इसका सबूत क्या? आंख का भरोसा करना पड़ता है। अब यह बड़े मजे की बात है कि लोग दुनिया में सभी से प्रमाण पूछते हैं, लेकिन कभी अपनी इंद्रियों से कोई प्रमाण नहीं पूछते कि तुम्हारा भरोसा क्या?आपकी आंख ठीक देख रही है, इसका प्रमाण क्या है? चार्वाकों ने, नास्तिकों ने एक ही प्रमाण माना है—प्रत्यक्ष, कि जो आंख के सामने है, उसे ही मानेंगे।

लेकिन उन चार्वाक विचारकों ने यह कभी नहीं पूछा कि इस आंख के भरोसे का इतना क्या कारण है रा आंख सदा ठीक ही देखती है क्या? क्योंकि रात सपने भी देखती है आंख। वे प्रत्यक्ष होते हैं, लेकिन सत्य नहीं होते। कभी राह पर पड़ी रस्सी सांप दिखाई पड़ जाती है। और जब आंख सांप देखती है रस्सी में, तो सांप बिलकुल दिखाई पड़ता है। लेकिन बाद में रोशनी आने पर पता चलता है, वहा कोई सांप नहीं। मरुस्थल में मृग—मरीचिका दिखाई पड़ जाती है।

पहली दफा जब थी—डायमेंशनल फिल्म बनी, तीन—आयामी फिल्म बनी, तो जो लोग उन्हें देखने जाते थे, वे भयभीत हो जाते थे। जो पहली फिल्म लंदन में दिखाई गई, उसमें एक घुड़सवार भाला फेंकता है। पूरे हाल के लोग अपनी गरदन झुका लेते हैं। क्योंकि थी—डायमेंशनल फिल्म में वह असली भाले जैसा भाला मालूम पड़ता है। और एक क्षण को भाला पास से गुजर रहा है, ऐसा एहसास होता है। पूरा हाल दो।हस्सों में झुक जाता। परदे पर कुछ भी नहीं है। न कोई भाला है; न कुछ आने को, न कुछ जाने को। सिर्फ छाया और प्रकाश का खेल है। लेकिन आंख धोखा खा जाती है।

आंख का भरोसा क्या? इंद्रियों का इतना भरोसा क्या है? आत्मज्ञानी पुरुष कहते हैं कि सिर्फ आत्मज्ञान ही प्रत्यक्ष है, बाकी सब ज्ञान परोक्ष है। क्योंकि बीच में कोई मध्यस्थ है। मध्यस्थ का कोई भरोसा नहीं। सीधा देखा है,वही देखा है; जिसको बीच में लेकर देखा है, उसकी कोई बात नहीं। आप आकर मुझे कहते हैं कि बाहर रोशनी है। आप पर मुझे भरोसा करना पड़ेगा। आप सच बोल सकते हैं, आप झूठ बोल सकते हैं, आप खुद धोखे में हो सकते हैं। लेकिन आपका भरोसा क्या है, जब तक मैं ही बाहर जाकर न देख लू?

लेकिन पदार्थ का ज्ञान तो परोक्ष ही होगा, सिर्फ आत्मा का ज्ञान प्रत्यक्ष हो सकता है। क्योंकि वहां बीच में कोई भी नहीं है। मैं ही हूं अकेला मैं ही हूं। कोई धोखा देने वाला तत्व, कोई विकृत करने वाला तत्व बीच में नहीं है। इसलिए सामान्य अनुभव में जो प्रत्यक्ष है, आत्मज्ञानी के लिए परोक्ष है। और सामान्य अनुभव में जिसको हम बिलकुल नहीं देखते, वह आत्मज्ञानी के लिए प्रत्यक्ष है।

आत्मा स्वयं प्रकाशित है। उसे देखने के लिए इंद्रियों के प्रकाश की कोई भी जरूरत नहीं है। अंधा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना आंख वाला। बहरा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना कान वाला। लकवे से लगा हुआ, पड़ा हुआ मनुष्य भी उसे देखने में उतना ही समर्थ है, जितना कोई एवरेस्ट पर चढ़ जाए इतनी सामर्थ्य वाला। उससे कोई, शरीर की सामर्थ्य से कोई भेद नहीं पड़ता।

आत्मा को जानने में शरीर का उपयोग ही नहीं होता। शरीर हो दुर्बल कि सबल, स्वस्थ कि अस्वस्थ, सुंदर कि कुरूप, काला कि गोरा, कोई अंतर नहीं पड़ता। शरीर की कोई उपयोगिता आत्मज्ञान के लिए नहीं है। लेकिन शरीर की उपयोगिता पर—ज्ञान के लिए है। दूसरे को जानना हो तो शरीर की उपयोगिता है। आंखे स्वस्थ होनी चाहिए कान स्वस्थ होने चाहिए। शरीर शक्तिशाली होना चाहिए तो ही दूसरे से संबंध जुड़ेगा। अपने से संबंध तो बना ही हुआ है, उसे जोड़ने का कोई प्रयोजन नहीं है।

इसलिए यह सूत्र कहता है, परमेश्वर ने, स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने...। इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए तो इंद्रियों की जरूरत नहीं है, वह तो स्वयं ही प्रगट हो जाता है। वह प्रगट है ही। लेकिन संसार स्वयं प्रगट नहीं होता, संसार को जानने के लिए इंद्रियों की जरूरत है। इसलिए जितनी ज्यादा इंद्रियां हों, उतना ज्यादा संसार प्रगट होता है।

जगत में बहुत इंद्रियों वाले प्राणी हैं। मनुष्य के पास पांच इंद्रियां हैं। अमीबा है छोटा—सा जीवकोष्ठ, उसके पास एक ही इंद्रिय है, केवल शरीर है। स्पर्श का भर उसे अनुभव होता है, और कोई इंद्रिय नहीं है। तो अमीबा सबसे कम विकसित प्राणी है—आत्मा की दृष्टि से नहीं, जगत को जानने की दृष्टि से। उसकी जानकारी सिर्फ स्पर्श पर निर्भर है। बस उतना ही उसका ज्ञान है। फिर दो इंद्रियों वाले, तीन इंद्रियों वाले, चार इंद्रियों वाले प्राणी हैं। जितनी ज्यादा इंद्रिया होती जाती हैं, जगत की जानकारी उतनी बढ़ती चली जाती है।

कोई आश्चर्य न होगा कि किसी चांद—तारे पर पांच इंद्रियों से ज्यादा इंद्रियों वाले प्राणी हों,. तो मनुष्य का ज्ञान उनके सामने बिलकुल फीका हो जाए। दस इंद्रिया हो सकती हैं, कोई बाधा नहीं है, कोई कारण नहीं है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि छठवीं इंद्रिय क्या होगी? क्योंकि पांच का हमारा ज्ञान है, पांच की हमारी कल्पना है। जिन पशुओं के पास चार इंद्रिया हैं, वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि पाचवी इंद्रिय क्या होगी? उनके पास चार ही इंद्रियां हैं, चार का उन्हें ज्ञान है।

पशुओं को छोड़ दें, एक अंधा आदमी है, वह सोच भी नहीं सकता कि प्रकाश क्या होगा। वह यह भी कल्पना नहीं कर सकता कि आंख जैसी चीज किस ढंग की होती होगी, जिससे प्रकाश दिखाई पड़ता है। क्योंकि न प्रकाश का उसे कोई अनुभव है, न आंख का उसे कोई अनुभव है। उसके पास चार ही इंद्रियां हैं, तो उसका ज्ञान सीमित हो जाता है।

आप जानकर हैरान होंगे कि आपके ज्ञान का अस्सी प्रतिशत आंख से आता है, बाकी चार इंद्रियों से तो केवल बीस प्रतिशत आता है। इसलिए अंधे पर हमें बहुत दया आती है। लूले पर उतनी दया नहीं आती, बहरे पर उतनी दया नहीं आती, अंधे पर बहुत दया आती है। दया का कारण है कि उसका अस्सी प्रतिशत जीवन अंधेरे में है। अस्सी प्रतिशत ज्ञान की उसे कोई संभावना नहीं है। वह बहुत दयनीय है।

लेकिन ये पाचों इंद्रिया जो ज्ञान देती हैं, वह बाहर का है। भीतर के ज्ञान के लिए कोई इंद्रिय आवश्यक नहीं है। वहा तो सारी इंद्रियों को छोड्कर ही कोई प्रवेश करता है। वहां इंद्रियों का त्याग ही उपाय है।

स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर बनाए हैं इसलिए अधिक मनुष्य प्राय: बाहर की वस्तुओं को देखने में ही जीवन व्यतीत कर देते हैं अंतरात्मा को नहीं किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरत्व को पाने की आकांक्षा से चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य— विषयों की ओर से हटाकर अंतरात्मा को देखा है

सारे ध्यान के प्रयोग, अलग—अलग विधियों वाले प्रयोग, एक चीज को मौलिक रूप से स्वीकार करते हैं कि आपकी सारी इंद्रियां शांत हो जाएं। किस ढंग से शांत हो, इसमें भेद है, लेकिन शांत हो जाएं, इसमें कोई विवाद नहीं है। सब इंद्रिया शांत हो जाएं और आप भीतर रह जाएं। जगत बाहर रह जाए आप भीतर रह जाएं और बीच में कोई सेतु न रहे, कोई जोड़ न रहे। उस क्षण में अंतरात्मा आविर्भूत होती है, प्रगट हो जाती है।

यहां हम जो प्रयोग कर रहे हैं, तीन चरणों में आपकी पूरी इंद्रियों का उपयोग किया जाता है। जितनी ज्यादा तेजी से आप कर सकें, उपयोग कर लें; थका दें। ताकि दस मिनट के लिए इंद्रियां थककर भी शांत हो जाएं, तो भी भीतर की झलक आ जाए।

सूफी फकीर एक नृत्य करते हैं—दरवेश—नृत्य, बड़ा कीमती है। जरा आपकी हिम्मत थोड़ी बढ़ती जाएगी तो जल्दी हम दरवेश—नृत्य में प्रवेश करने लगेंगे। लेकिन दरवेश—नृत्य काफी लंबा चलता है, कोई पांच घंटे। धीरे—धीरे आप कर लेंगे। पांच घंटे फकीर नाचता ही रहता है। सब थक जाता है। जब तक अपने आप शरीर गिर नहीं जाता, तब तक नृत्य जारी रहता है। अपनी तरफ से नहीं रोकना है, अपनी तरफ से कुछ करना ही नहीं है। नाचते ही जाना है, नाचते ही जाना है। जब तक आखिरी बूंद भी शेष रह जाए शक्ति की, तब तक नाचते ही जाना है।

बेईमानी जरा भी नहीं चलेगी कि आदमी सोचे कि अब थक गए बैठ जाएं। नहीं, जब तक आपको लग रहा है कि आप बैठ सकते हैं, अभी कम से कम बैठने की ताकत बची है, इसको भी नाचने में लगा देना है। जब तक कि शरीर को आप देखें न कि गिर रहा है...।

बड़ा अनूठा अनुभव है। जब आपकी सारी शक्ति शरीर की चुक जाती है और आप देखते हैं कि शरीर गिर रहा है—आप कुछ भी नहीं कर सकते, न रोक सकते, न नाच सकते, न आप सम्हाल सकते—बस शरीर गिर रहा है। उस क्षण साक्षी का भाव अचानक जग जाता है। और जब शरीर बिलकुल थक जाता है, तो कोई भी इंद्रिय सक्रिय नहीं रह जाती,द्वार बंद हो जाते हैं, सेतु टूट जाते हैं। सूफी भीतर प्रवेश कर जाता है।

हम जो कीर्तन का प्रयोग कर रहे हैं, वह सूफी—नृत्य का ही हिस्सा है। बहुत लोग मुझसे आकर पूछते है कि भारत में ऐसा तो कीर्तन होता नहीं! इसका भारतीय कीर्तन से कोई सीधा संबंध है भी नहीं। यह कोई —पाठ नहीं है। इसका कोई संबंध कृष्ण, गोपाल से नहीं है। वह तो केवल बहाना है। वह तो केवल ग्दुंटी है। उस बहाने आपको थकाने की चेष्टा है। इसलिए जो अपने को बचाएगा, वह मूल मुद्दा ही चूक गया। थका डालना है। इतने जोर से शक्ति का उपयोग करना है कि आप बिलकुल थक जाएं, शरीर मुर्दा हो जाए। जैसे सारा प्राण सूख गया। उस क्षण में इंद्रियां बंद हो जाती हैं। अंतरात्मा की झलक..।

और एक बार झलक मिलने लगे, फिर कठिनाई नहीं है। एक दफे रास्ता साफ हो जाए, फिर जरूरत नहीं है कि आप थकाएं। फिर तो आंख भी बंद करें, आप भीतर जा सकते हैं। एक दफे वह रास्ता साफ हो जाए, पहचान में आ जाए, पगडंडी कौन—सी है। जैसे अंधेरी रात में बिजली चमक जाए और रास्ता दिख जाए एक क्षण को। फिर बिजली खो भी जाए तो भी फिर आप अंधेरे में आश्वस्त चल सकते हैं। आप जानते हैं, रास्ता है। एक दफे देखा है। अब आप खोज सकते हैं।

ये सारे ध्यान के प्रयोग मौलिक रूप से थकाने के प्रयोग हैं, ताकि इंद्रियां थककर बैठ जाएं। एक रास्ता है जबरदस्ती बिठाने का। मैं उसके पक्ष में नहीं हूं क्योंकि जबरदस्ती कोई भी इंद्रियों को बैठा नहीं सकता। हालत वैसी हो जाती है, जैसे छोटे बच्चे को कह दो कि बैठो शाति से। तो वह बैठ जाता है, लेकिन उसकी सारी ताकत शांति से बैठने में लग रही है। एक—एक चीज को खींचे हुए है। तना हुआ है। शिथिल भी नहीं हो पाता। विश्राम भी नहीं कर पाता। तनावग्रस्त है।

न, उस बच्चे को कहो कि दौड़ो, एक पच्चीस चक्कर लगाओ। फिर कहने की जरूरत नहीं कि शांत बैठ जाओ। पच्चीस चक्कर के बाद वह खुद ही शांत बैठ जाएगा। वह शांति बड़ी अलग होगी। उस शाति में कोई तनाव नहीं होगा,कोई बेचैनी नहीं होगी। बल्कि शांति में एक सुख होगा, एक राहत होगी, एक झलक होगी विश्राम की।

इंद्रियों को थका डालें, इतना स्फा डालें कि क्षणभर को भी अगर वे विश्राम में पहुंच जाएं, तो उतने क्षणभर को आपका प्रवेश भीतर हो जाए।

जो बाल— बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के बंधन में पड़ते हैं। किंतु बुद्धिमान मनुष्य नित्य अमरपद को विवेक द्वारा जानकर इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को भी नहीं चाहते

विवेक का अर्थ इतना ही है कि जो निरर्थक है, वह हमें निरर्थक दिखाई पड़ जाए; जो सार्थक है, वह सार्थक दिखाई पड़ जाए। जगत में हम कुछ भी चाहें, पहली तो बात, अगर न मिले तो दुख, और मिल जाए तो भी सुख नहीं। एक आदमी धन चाहता है। जब तक नहीं मिलता, तब तक दुखी है। और जब मिल जाता है, तब वह पाता है कि क्या मिला? धन के ढेर लग गए, अब क्या?

जो भी आपने चाहा है अपने अतीत में, अगर न मिला तो आपने दुख पाया है, अगर मिल गया तो कौन—सा सुख पाया है? बस जब तक नहीं मिलता, तभी तक सुख का आभास होता है। इस जगत में दुख वास्तविक है, सुख सिर्फ आभास है। जो चीज नहीं मिलती, बस उसमें सुख है। और जो मिल जाती है, उसमें सब सुख खो जाता है। इसलिए कोई भी आदमी कहीं भी सुखी नहीं है।

मेरे एक मित्र हैं। वे पहले एम. एल. ए. थे, तो वे मुझसे कहते थे, आशीर्वाद दें—बस और कुछ चाहिए नहीं—कि कम से कम डिप्टी—मिनिस्टर तो मुझे बनवा ही दें। मैं उनको कहता कि बन ही जाएंगे, क्योंकि जैसा पागलपन आपमें है, आप बिना बने बच नहीं सकते। लेकिन आप अगर सोचते हों कि बड़ा आनंद घटित हो जाएगा, तो आप गलती में हैं।

फिर वे डिप्टी—मिनिस्टर भी हो गए। तो वे आए मेरे पास और कहने लगे कि बस, अब एक आकांक्षा है कि मिनिस्टर हो जाऊं। मैंने उनको कहा कि आपको सुख डिप्टी—मिनिस्टर होने से मिल गया, जिसको आप वर्षों से सोचते थे? उन्होंने कहा, डिप्टी—मिनिस्टर में कुछ भी नहीं रखा है, मिनिस्टर होने से ही कुछ हो सकता है। फिर अब वे मिनिस्टर भी हो गए। तो अब वे कहते हैं कि चीफ—मिनिस्टर हो जाएं। मैंने उनको पूछा कि तुम कहां रुकोगे? पिछले अनुभव से कुछ सीखो।

आदमी जहां है, वहीं दुखी है। सुखी आदमी खोजना कठिन है। आपने कभी कोई सुखी आदमी देखा? सुखी आदमी वही हो सकता है, जो जहा है वहीं सुखी है। लेकिन जो आदमी भी कहीं और सोचता है कि सुख होगा, वह दुखी होगा। जो जहां है वहीं सुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही संन्यासी है।

और जो जहा है वहीं दुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही गृहस्थ है। वह हमेशा भविष्य में ही जी रहा है। कल उसका सुख है। स्वर्ग कल है, आज कुछ भी नहीं। आज को समर्पित करेगा कल के लिए। आज को लगाएगा कल के लिए। आज को जलाएगा कल के लिए, ताकि कल का स्वर्ग मिल जाए। कल कभी आता नहीं। कल जब आएगा, वह आज ही होगा। वह उस आज को फिर कल के लिए लगाएगा। ऐसे वह लगाता जाता है। और एक दिन सिवाय मृत्यु के हाथ में कुछ भी नहीं आता।

उपनिषद कह रहा है, बाल—बुद्धि वाले लोग, बचकानी बुद्धि वाले लोग, अप्रौढ़, केवल बाहर की वस्तुओं का अनुसरण करने में जीवन को गंवा देते हैं। बुद्धिमान, विवेकशील वह है जो इस सत्य को जानकर कि बाहर कभी किसी को न कोई आनंद मिला है और न मिल सकता है, अपने ही अनुभव से, अपने ही जीवन के प्रयोगों से इस रहस्य को समझकर, जो बाहर के अनित्य भोगों की आकांक्षा छोड़ देता है, वही विवेकशील है।

बाहर की वस्तुओं की आकांक्षा छोड़ देता है। कुछ नासमझ बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाते हैं। बाहर की वस्तुओं की आकांक्षा छोड़ना बिलकुल और बात है। बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाना बिलकुल और बात है। और ही नहीं, भिन्न ही नहीं, विपरीत है। बाहर की वस्तु को तो वही छोड़ने में लगता है, जो बाहर की वस्तु को पकड़ने में लगा था पहले। अब वह छोड़ने में लगता है। लेकिन उसकी नजर बाहर की वस्तु पर ही लगी रहती है। कुछ लोग हैं, जो धन के लिए पागल हैं। और कुछ पागल हैं, जो धन न छू जाए, इससे डरे हुए हैं।

एक संन्यासी को मैं जानता हूं। वे बड़े संन्यासी हैं। बहुत उनके अनुयायी हैं। वे पैसा नहीं छूते। अगर आप पैसा उन्हें छुला दें, तो वे बिलकुल पागल हो जाते हैं। इतने नाराज हो जाते हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं। वे स्नान करते हैं,अगर पैसा छूना हो जाए। लोग उनको मानते हैं इसीलिए—कि यह है त्याग!

यह है पागलपन, यह है विक्षिप्तता। यह रोग पुराना है, नया नहीं है। पहले पैसे को पकड़ने में बहुत रस आता रहा होगा। और इससे आप समझ सकते हैं, कि जब इतना दुख हो रहा है छूंने में, तो रस कितना आता रहा होगा! यह माप है। वह रस अब भी नहीं खो गया है, वह उलटा हो गया है। रस अब भी है, लेकिन अब विपरीत भाव पैदा हो गया है।

मुक्त नहीं हुए पैसे से, बंधे हैं अब भी। कल मित्र की तरह बंधे थे, अब शत्रु की तरह बंधे हैं। मित्र का भी ध्यान रखना पड़ता है, शत्रु का और भी ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है। वे अगर आकर बैठते हैं, तो वे सब तरफ देख लेते हैं। पैसा तो नहीं है! कोई धन तो नहीं है! चौबीस घंटे प्रभु—स्मरण नहीं चल रहा है। और ऐसे बहुत लोग हैं इस देश में,जिनकी वृत्ति सिर्फ शीर्षासन करने लगती है। होती वही पुरानी है, उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। वही का वही आदमी पहले पैर के बल खड़ा था, अब सिर के बल खड़ा है। आदमी में जरा भी फर्क नहीं है। रत्तीभर भेद नहीं हुआ है। कोई क्राति घटित नहीं हुई है। लेकिन क्राति दिखाई पड़ती है। वह झूठी है।

बाहर की वस्तु न तो पकड़ने योग्य है और न छोड़ने योग्य। बाहर की वस्तु बाहर है। न तुम उसे पकड़ सकते हो, न तुम उसे छोड़ सकते हो। तुम हो कौन? तुमने पकड़ा, वह तुम्हारी भांति थी। तुम छोड़ रहे हो, यह तुम्हारी भ्रांति है। बाहर की वस्तु को न तुम्हारे पकड़ने से कुछ फर्क पड़ता है, न तुम्हारे छोड़ने से कुछ फर्क पड़ता है।

तुम कल कहते थे, यह मकान मेरा है। मकान ने कभी नहीं कहा था कि तुम मेरे मालिक हो। और मकान को अगर थोड़ा भी बोध होगा, तो वह हंसा होगा कि खूब गजब के मालिक हो। क्योंकि तुमसे पहले कोई और यही कह रहा था। उससे पहले कोई और यही कह रहा था। और मैं जानता हूं कि तुम्हारे बाद भी लोग होंगे जो यही कहेंगे, कि वे मालिक हैं।

और फिर एक दिन तुम कहते हो कि मैंने त्याग कर दिया है इस मकान का। न मकान तुम्हारा था, न तुम त्याग कर सकते हो। त्याग करना उतना ही पागलपन की बात है, जितना मालकियत की घोषणा थी। त्याग तो मालिक कर सकता है। ज्ञानी इस सत्य को जान लेता है कि मैं मालिक ही नहीं हूं किसी चीज का—छोडंगूा कैसे? पकडूगा कैसे?

वासना का त्याग है—इस बोध का भीतर गहरा हो जाना कि न इस जगत में कुछ पकड़ा जा सकता है और न छोड़ा जा सकता है। पकड़ना, छोड़ना, दोनों ही नासमझी हैं। इस जगत में न पकड़ने योग्य कुछ है और न छोड़ने योग्य कुछ है। ऐसी तटस्थता में जो आदमी ठहर जाता है, वह विवेकशील है। उसकी वासना गिर जाती है। वह बाहर के जगत में दौड़ना बंद कर देता है।

जिसके अनुग्रह से मनुष्य शब्दों को स्पर्शों को रूप को रस को गंध को स्त्री— प्रसंग आदि के सुखों को अनुभव करता है उसी के अनुग्रह से यह भी जानता है कि यहां क्या शेष रह जाता है! अर्थात कुछ भी नहीं। यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।

यम नचिकेता को कह रहा है कि तूने जिस परमात्मा के संबंध में पूछा था, वह क्या है। पहली बात वह यह कह रहा है कि यहां इस जगत में जो हम भोग रहे हैं, जो रस, सौंदर्य, सुख, जिसके कारण भोग रहे हैं, जो इस सबके भीतर छिपा है, जिसके बिना यह कोई भी घटना न घट पाएगी,.। आप रस ले रहे हैं, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप भीतर से तिरोहित हो जाएंगे, शरीर कोई रस न ले सकेगा। आपको सुगंध मालूम पड़ रही है, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप मौजूद न होंगे, सुगंध मालूम न पड़ेगी। इस जगत के जो भी अनुभव हो रहे हैं, वे किसके आधार पर हो रहे हैं? उस चैतन्य के आधार पर, जो भीतर छिपा है।

हमारी दृष्टि लग जाती है, जब फूल में सुगंध आती है, तो हमारा ध्यान फूल पर जाता है। हमारा ध्यान उस पर नहीं जाता, जिसको सुगंध आ रही है। तीन चीजें हैं। फूल खिला, सुगंध फैली, आप पास में बैठे हैं या खड़े हैं—सुगंध आई। यहां तीन हैं। एक तो फूल है, एक आप हैं, और दोनों के बीच में तैरती हुई सुगंध है।

एक ज्ञेय है, एक ज्ञाता है, और एक ज्ञान है। हर जगह त्रिवेणी है। हर जगह ये तीन मौजूद हैं। लेकिन हमारा ध्यान हमेशा ज्ञेय पर जाता है, आब्जेक्ट पर, वह जो जाना गया। फूल पर नजर जाती है। हम कहते हैं, कैसा सुंदर फूल है! हम यह नहीं कहते कि कैसी सुंदर आत्मा है कि फूल की गंध ले सकी! कैसा सुंदर फूल! कभी खयाल नहीं आता कि कैसा सुंदर चैतन्य! वह भीतर जो छिपा है, उसका हमें स्मरण ही नहीं आता। न तो सुगंध उतनी कीमती है,न फूल उतना कीमती है, जितना वह कीमती है जिसके आधार पर ये सब घट रहा है। इस जीवन में जो भी हो रहा है,उस सबके पीछे छिपी हुई चेतना है।

यम कह रहा है, यह जो भीतर छिपी चेतना है, जो सभी सुखों का अनुभव करता है, यह जो अनुभोक्ता है, और जो यह भी अनुभव करता है कि यहां कुछ भी अनुभव करने योग्य नहीं, जो यह भी अनुभव कर लेता है कि सब व्यर्थ है, जो यह भी अनुभव कर लेता है कि यहां पाने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहा है, यहां कुछ पाया भी नहीं जा सकता है,यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।

तो परमात्मा की पहली व्याख्या यम कर रहा है। और वह यह कि तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जो चैतन्य है, वह जो कांशसनेस है, वह जो बोध की शक्ति है, वह जो तुम्हारे जीवन का मूल है, यही है वह परमात्मा जिसके लिए तूने पूछा था।

तो ईश्वर की पहली व्याख्या हुई—भीतर का द्रष्टा।

स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत—अवस्था के दृश्यों को इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को मनुष्य जिससे बार— बार देखता है उस सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान मनुष्य शोक नहीं करता। यह थोड़ा समझने जैसा कीमती सूत्र है। यम कह रहा है कि स्वप्न के अनुभवों को, जागृति के अनुभवों को जिसके द्वारा मनुष्य बार—बार देखता है?..।

यह एक बहुत मजे की बात है। शायद आपने कभी निरीक्षण न की हो, चूक गए हों। चूकने जैसी नहीं है, क्योंकि उसके आधार पर जीवन में बहुत कुछ नए आयाम खुल सकते हैं। रात आप स्वप्न देखते हैं। जब आप स्वप्न देखते हैं,तो स्वप्न बिलकुल सत्य मालूम होता है। स्वप्न में ही यह जानना कि यह असत्य है, बिलकुल असंभव है। स्वप्न जब त