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चैतन्य के सूर्य में स्थित होना ही एक मात्र दीपक है।’’


सूर्य हमेशा बहुत दूर है। प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में दस मिनट लगतेहै, और प्रकाश बहुत तेज़गति से चलता है-1, 86, 000 मील प्रति सेकंड की गति से। सूर्य को पृथ्वी तक पहुँचने में दस मिनट लगते है, वह बहुत दूर है। परन्तु सुबह सूर्य उगता है और वह तुम्हारे बाग में खिले फूल तक भी पहुँच जाता है। पहुँचने का यहाँ भिन्न ही अर्थ है। केवल किरणें पहुँचती हैं, न कि सूर्य। इसलिए यदि तुम्हारी ऊर्जा तुम्हारे भीतर गहरे में केन्द्र पर सूर्य ही जाये-यदितुम्हारा केन्द्र सूर्य हो जाये, यदि तुम चैतन्य हो जाओ, केन्द्र पर सजग हो जाओ, यदि तुम्हारी जागरूकता बढ़ जाये, तो तुम्हारी चेतना की किरणें तुम्हारे शरीर केप्रत्येक अंग तक, प्रत्येक कोष तक पहुँच जाती हैं। त्तब तुम्हारी सजगता शरीरके हर एक कोष में प्रवेश कर जाती है। यह ऐसा ही है जैसे कि सुबह सुरज उगता है और पृथ्वी पर सब चीजोंमें जीवन दौड़ पड़ता है। अचानक प्रकाश फैल जाता है, और नींद उड़ जातीहै, रात्रि का भारीपन खो जाता है। अचानक ऐसा लगता है कि जैसै हर चीज़ पुनर्जीवित हो गई। चिडियाँ गीत गाने लगती है और अपने परों को फैला आकाश में उड़ने लगती हैं, फूल खिल उठते हैं, और प्रत्येक चीज़फिर से जिन्दा होजाती है, सूर्य की गर्मी से, उसके स्पर्श मात्र से ही। इसलिए यदि जब तुम्हारेपास केन्दित चेतना होती है, तुम्हारे भीतर सजगता होती है, तो वह हर छिद्र मेंपहुँचने लगती है, शरीर के प्रत्येक रोयें-रोयें में, हर कोष में वह प्रवेश कर जातीहै। और तुम्हारे पास बहुत सारे कोष हैं-सात करोड़ कोष है तुम्हारे शरीर मेंतुम एक बहुत बड़ा शहर हो, सात करोड़ कोष और वे सारे मूच्छित हैं। तुम्हारीचेतना उन तक कभी भी नहीं पहुँची। चेतना को बढाओ, और तब उसका हरएक कोष में प्रवेश हो जाता है। और जैसे ही चेतना कोष को स्पर्श करती है, वह भिन्न हो जाता है। उसका गुण ही बदल जाता है। एक आदमी सो रहा है, सुरज उगता है और वह आदमी जागजाता हैं। वया वह वही आदमी है जो कि सोते समय था? क्या उसका सोना और जागना एक ही है? एक कली बन्द है और मुझाई हुईं है, और फिर सूरजउग जाता है और कली खिल जाती है और फूल बन जाती है। क्या यह फूल वही है? कुछ नया उसमें प्रवेश कर गया है। एक जीवन्तता, एक बढ़ने व खिलनेकी क्षमता प्रकट हुई है। एक चिडियाँ सो रही थी, जैसै कि मृत हो, मृत पदार्थहो। परन्तु सुरज निकल आया है और चिडियों अपने परों पर उड़ निकली हैं। क्या वह वही चिडियाँ हैं? यह अब एक नई ही घटना है। कुछ छू गया है, और चिडिया जीवित हो गई है। हर चीज़चुप थी और अब हर चीज़गीत गारही है। सुबह स्वयं एक गीत है। वही घटना एक बुद्ध के शरीर के कोषों में घटित होती है। उसे हम ‘‘बुद्ध-काया’’ के नाम से जानते हैं-एक जागृत आदमी का शरीर। एक बुद्ध का शरीर। वह वही शरीर नहीं है, जैसा कि तुम्हारा है। न ही वह शरीर है जो कि बुद्धहोने के पहले गौतम काथा। बुद्ध मरने के करीब हैं, तब कोई उनसे पूछता है-‘‘वया आप मर रहे हैं मरने के बाद आप कहाँ होंगे?’’ बुद्ध ने कहा-जोशरीर पैदा हुआ था वह तो मरेगा। परन्तु एक और भी शरीर है-बुद्ध-कायर, बुद्ध का शरीर जो कि नतो कभी जन्मा था और न कभी मर सकता है। परन्तु मैंने वह शरीर छोड़ दिया है जो कि मुझें मिला था, जो कि मेरे माता-पित्ता ने मुझे दिया था। जैसे कि हरवर्ष सांप अपनी पुरानी केंचुली छोड़ देता है, मैंने भी उसे छोड़ दिया है। अबबुद्ध-कायाहै बुद्ध का शरीर है। इसका वया अर्थ होता है? तुम्हारा शरीर भी बुद्ध का शरीर हो सकता हैजब तुम्हारी चेतना हर कोष तक पहुँचती है, तो तुम्हारे अस्तित्व का गुणघर्म-हीबदल जाता है, रूपान्तरित हो जाता है क्योंकि तब प्रत्येक कोष जीवन्त हो गया, जाग गया, बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया, पराधीनता समाप्त हुईं। तुम अपने मालिकहुए। मात्र केन्द्र के चैतन्य होने से तुम अपने मालिक हो जाते हो। यह सूत्र कहता है-चैतन्य के सूर्य में स्थिर होना ही एकमात्र दीपक हैइसलिए तुम मन्दिर में मिट्टी का दीपक लेकर क्यों जा रहे हो? अंतर का दीपकलेकर जाओ। तुम वेदी पर मोमबत्तियाँ क्यों जला रहे हो? उनसे कुछ भी न होगाअन्तर की ज्योति जला लो। बुद्ध-काया को प्राप्त कर लो! अपनेशरीर के हरकोष को जागने दो, अपने शरीर के एक भी कोष को मूच्छित न रहने दो। बौद्धों ने बुद्ध को कुछ अस्थियाँ बचा कर रखी हैं। लोग सोचते हैं कि यह अन्ध-विश्वास है। यह अन्ध-विश्वास नहीं है, क्योंकि वे अस्थियाँसाधारण हडि्ंडयाँनहीं हैं। ये साघारण नहीं हैं। इन कोषों ने, इन टुकडों ने अस्थियों के इन-इलेक्ट्रॉन्सने कुछ ऐसा जाना है जो कि कभी-कभी ही होता है। कश्मीर में मुहम्मद काएक बाल संभाल कर रखा गया है। वह कोई साधारण बाल नहीं है। वह कोईअन्ध-विश्वास की बात नहीं है। उस बाल ने भी कुछ जाना है। इसे इस भाँति समझने की कोशिश करें, एक फूल जिसने कि कभी सुरजका उगना नहीं जाना, और एक वह फूल जिसने जाना है, सूर्यं कासाक्षात्कारकिया है, वे दोनों एक नहीं हो सकते। दोनों एक नहीं है। एक फूल जिसने किकमी सूर्य का उगना न जाना होउसने अपने भीतर कभी प्रकाश को बढ़ते नहींजाना, क्योंकि वह तभी बढ़ता है, जबकि सुरज उगता है। वह फूल मरा हुआहै। उसने अपनी आत्मा कभी नहीं जानी। एक फूल जिसने सुरज के उगने केसाथ ही, अपने भीतर भी कुछ बढ़ते हुए अनुभव किया। उसने अपनी आत्मा कोजाना। अब फूल मात्र एक फूल नहीं है। उसने अपने भीतर एक गहरी क्रांतिको जाना है। भीतर कुछ सुगबुगाया है, कुछ उसके भीतर-जीवन्त हुआ है। इसलिए मुहम्मद का बाल एक दूसरी ही बात है, उसका गुण-धर्म ही अलगहै। उसने एक आदमी को जाना। वह एक ऐसे आदमी के साथ रहा है जो किआंतरिक सूर्य ही हो गया, एक अंतर्प्रकाश ही बन गया। उस जाल ने एक गहरीडुबकी लगाई है किसी गहरे रहस्य में जो कि बडी मुश्किल से कभी घटता है। इस अन्तर्ज्योति में स्थापित होना ही एकमात्र दीया है जो कि परमात्मा की वेदीपर ले जाने योग्य है। उसके अलावा किसी और चीज़से कुछ भी न होगा। इस चैतन्य के केन्द्र को कैसे निर्मित किया जाये? मैं बहुत-सी विधियों कीबात करूँगा, किन्तु चूंकि मैं बुद्ध कीतथा बुद्ध-काया की बात कर रहा था, अच्छाहोगा कि बुद्ध से ही प्रारंभ क