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चैतन्य के सूर्य में स्थित होना ही एक मात्र दीपक है।’’


सूर्य हमेशा बहुत दूर है। प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में दस मिनट लगतेहै, और प्रकाश बहुत तेज़गति से चलता है-1, 86, 000 मील प्रति सेकंड की गति से। सूर्य को पृथ्वी तक पहुँचने में दस मिनट लगते है, वह बहुत दूर है। परन्तु सुबह सूर्य उगता है और वह तुम्हारे बाग में खिले फूल तक भी पहुँच जाता है। पहुँचने का यहाँ भिन्न ही अर्थ है। केवल किरणें पहुँचती हैं, न कि सूर्य। इसलिए यदि तुम्हारी ऊर्जा तुम्हारे भीतर गहरे में केन्द्र पर सूर्य ही जाये-यदितुम्हारा केन्द्र सूर्य हो जाये, यदि तुम चैतन्य हो जाओ, केन्द्र पर सजग हो जाओ, यदि तुम्हारी जागरूकता बढ़ जाये, तो तुम्हारी चेतना की किरणें तुम्हारे शरीर केप्रत्येक अंग तक, प्रत्येक कोष तक पहुँच जाती हैं। त्तब तुम्हारी सजगता शरीरके हर एक कोष में प्रवेश कर जाती है। यह ऐसा ही है जैसे कि सुबह सुरज उगता है और पृथ्वी पर सब चीजोंमें जीवन दौड़ पड़ता है। अचानक प्रकाश फैल जाता है, और नींद उड़ जातीहै, रात्रि का भारीपन खो जाता है। अचानक ऐसा लगता है कि जैसै हर चीज़ पुनर्जीवित हो गई। चिडियाँ गीत गाने लगती है और अपने परों को फैला आकाश में उड़ने लगती हैं, फूल खिल उठते हैं, और प्रत्येक चीज़फिर से जिन्दा होजाती है, सूर्य की गर्मी से, उसके स्पर्श मात्र से ही। इसलिए यदि जब तुम्हारेपास केन्दित चेतना होती है, तुम्हारे भीतर सजगता होती है, तो वह हर छिद्र मेंपहुँचने लगती है, शरीर के प्रत्येक रोयें-रोयें में, हर कोष में वह प्रवेश कर जातीहै। और तुम्हारे पास बहुत सारे कोष हैं-सात करोड़ कोष है तुम्हारे शरीर मेंतुम एक बहुत बड़ा शहर हो, सात करोड़ कोष और वे सारे मूच्छित हैं। तुम्हारीचेतना उन तक कभी भी नहीं पहुँची। चेतना को बढाओ, और तब उसका हरएक कोष में प्रवेश हो जाता है। और जैसे ही चेतना कोष को स्पर्श करती है, वह भिन्न हो जाता है। उसका गुण ही बदल जाता है। एक आदमी सो रहा है, सुरज उगता है और वह आदमी जागजाता हैं। वया वह वही आदमी है जो कि सोते समय था? क्या उसका सोना और जागना एक ही है? एक कली बन्द है और मुझाई हुईं है, और फिर सूरजउग जाता है और कली खिल जाती है और फूल बन जाती है। क्या यह फूल वही है? कुछ नया उसमें प्रवेश कर गया है। एक जीवन्तता, एक बढ़ने व खिलनेकी क्षमता प्रकट हुई है। एक चिडियाँ सो रही थी, जैसै कि मृत हो, मृत पदार्थहो। परन्तु सुरज निकल आया है और चिडियों अपने परों पर उड़ निकली हैं। क्या वह वही चिडियाँ हैं? यह अब एक नई ही घटना है। कुछ छू गया है, और चिडिया जीवित हो गई है। हर चीज़चुप थी और अब हर चीज़गीत गारही है। सुबह स्वयं एक गीत है। वही घटना एक बुद्ध के शरीर के कोषों में घटित होती है। उसे हम ‘‘बुद्ध-काया’’ के नाम से जानते हैं-एक जागृत आदमी का शरीर। एक बुद्ध का शरीर। वह वही शरीर नहीं है, जैसा कि तुम्हारा है। न ही वह शरीर है जो कि बुद्धहोने के पहले गौतम काथा। बुद्ध मरने के करीब हैं, तब कोई उनसे पूछता है-‘‘वया आप मर रहे हैं मरने के बाद आप कहाँ होंगे?’’ बुद्ध ने कहा-जोशरीर पैदा हुआ था वह तो मरेगा। परन्तु एक और भी शरीर है-बुद्ध-कायर, बुद्ध का शरीर जो कि नतो कभी जन्मा था और न कभी मर सकता है। परन्तु मैंने वह शरीर छोड़ दिया है जो कि मुझें मिला था, जो कि मेरे माता-पित्ता ने मुझे दिया था। जैसे कि हरवर्ष सांप अपनी पुरानी केंचुली छोड़ देता है, मैंने भी उसे छोड़ दिया है। अबबुद्ध-कायाहै बुद्ध का शरीर है। इसका वया अर्थ होता है? तुम्हारा शरीर भी बुद्ध का शरीर हो सकता हैजब तुम्हारी चेतना हर कोष तक पहुँचती है, तो तुम्हारे अस्तित्व का गुणघर्म-हीबदल जाता है, रूपान्तरित हो जाता है क्योंकि तब प्रत्येक कोष जीवन्त हो गया, जाग गया, बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया, पराधीनता समाप्त हुईं। तुम अपने मालिकहुए। मात्र केन्द्र के चैतन्य होने से तुम अपने मालिक हो जाते हो। यह सूत्र कहता है-चैतन्य के सूर्य में स्थिर होना ही एकमात्र दीपक हैइसलिए तुम मन्दिर में मिट्टी का दीपक लेकर क्यों जा रहे हो? अंतर का दीपकलेकर जाओ। तुम वेदी पर मोमबत्तियाँ क्यों जला रहे हो? उनसे कुछ भी न होगाअन्तर की ज्योति जला लो। बुद्ध-काया को प्राप्त कर लो! अपनेशरीर के हरकोष को जागने दो, अपने शरीर के एक भी कोष को मूच्छित न रहने दो। बौद्धों ने बुद्ध को कुछ अस्थियाँ बचा कर रखी हैं। लोग सोचते हैं कि यह अन्ध-विश्वास है। यह अन्ध-विश्वास नहीं है, क्योंकि वे अस्थियाँसाधारण हडि्ंडयाँनहीं हैं। ये साघारण नहीं हैं। इन कोषों ने, इन टुकडों ने अस्थियों के इन-इलेक्ट्रॉन्सने कुछ ऐसा जाना है जो कि कभी-कभी ही होता है। कश्मीर में मुहम्मद काएक बाल संभाल कर रखा गया है। वह कोई साधारण बाल नहीं है। वह कोईअन्ध-विश्वास की बात नहीं है। उस बाल ने भी कुछ जाना है। इसे इस भाँति समझने की कोशिश करें, एक फूल जिसने कि कभी सुरजका उगना नहीं जाना, और एक वह फूल जिसने जाना है, सूर्यं कासाक्षात्कारकिया है, वे दोनों एक नहीं हो सकते। दोनों एक नहीं है। एक फूल जिसने किकमी सूर्य का उगना न जाना होउसने अपने भीतर कभी प्रकाश को बढ़ते नहींजाना, क्योंकि वह तभी बढ़ता है, जबकि सुरज उगता है। वह फूल मरा हुआहै। उसने अपनी आत्मा कभी नहीं जानी। एक फूल जिसने सुरज के उगने केसाथ ही, अपने भीतर भी कुछ बढ़ते हुए अनुभव किया। उसने अपनी आत्मा कोजाना। अब फूल मात्र एक फूल नहीं है। उसने अपने भीतर एक गहरी क्रांतिको जाना है। भीतर कुछ सुगबुगाया है, कुछ उसके भीतर-जीवन्त हुआ है। इसलिए मुहम्मद का बाल एक दूसरी ही बात है, उसका गुण-धर्म ही अलगहै। उसने एक आदमी को जाना। वह एक ऐसे आदमी के साथ रहा है जो किआंतरिक सूर्य ही हो गया, एक अंतर्प्रकाश ही बन गया। उस जाल ने एक गहरीडुबकी लगाई है किसी गहरे रहस्य में जो कि बडी मुश्किल से कभी घटता है। इस अन्तर्ज्योति में स्थापित होना ही एकमात्र दीया है जो कि परमात्मा की वेदीपर ले जाने योग्य है। उसके अलावा किसी और चीज़से कुछ भी न होगा। इस चैतन्य के केन्द्र को कैसे निर्मित किया जाये? मैं बहुत-सी विधियों कीबात करूँगा, किन्तु चूंकि मैं बुद्ध कीतथा बुद्ध-काया की बात कर रहा था, अच्छाहोगा कि बुद्ध से ही प्रारंभ करूँ। बुद्ध ने एक विधि खोजी, एक बहुत ही आश्चर्यजनकविधि-एक बहुत ही शक्तिशाली पद्धति आँतरिक अग्नि क्रो जलाने के लिए चैतन्यके सूर्य का निर्मित करने के लिए। और न केवल उसे निर्मित करने के लिए बल्कि साथ-ही-साथ वह अन्तर्ज्योति शरीर के प्रत्येक कोष में भी प्रवेश करने लगतीहै। तुम्हारे सारे अस्तित्व में भी दौड़ने लगती है। बुद्ध ने श्वास का विधि की तरह उपयोग किया-होशपूर्वक श्वास लेना। इस विधि को‘‘अनापान-सतीयोग’’ के नाम से आता जाता है-भीतर आती वबाहर जाती श्वास के प्रति सजगता। तुम श्वास लेते हो परन्तु यह अचेतन बातहै। और श्वास ही प्राण है, श्वास ही ‘एलीन-वाइडल’ है, मुख्य शक्ति है, प्राणऊर्जा है, आलोक है-और वही अचेतन है। तुम्हें उसका कोई भी होश नहींयदि तुम्हें श्वास लेना पड़े तो तुम किसी भी क्षण मर जाओगे क्योंकि तब बडामुश्किल होगीश्वास लेना। मैंने कुछ मछलियों के बारे में सुना है जो कि छः मिनट से ज्यादा नहींसोती क्योंकि यदि वे इससे ज्यादा सोयें तो मर जायेंगी, क्योंकि वे नींद में श्वासलेना भूल जाती हैं। यदि उनको नींद गहरी हो जाये तो वे ‘श्वास लेना भूल जातीहैं, इसलिए वे मर जाती हैं। ये विशेष मछलियाँ छः मिनट से ज्यादा नहीं सोसकतीं। उन्हें समूह में रहना पड़ता है-सदैव समूह में। कुछ मछलियाँ सो रहीहैं, दूसरी मछलियों को ध्यान रखना पड़ता है कि वे ज्यादा देर तक न सोती रहेंजब उनका समय हो जाता है, वे उनकी नींद को तोड़ देती है, वरना सोती हुईमछलियाँ मर जायेंगी। वे फिर से नहीं जागेंगी। यह वैज्ञानिक निरीक्षण है। यह तुम्हारे लिए भी एक समस्या हो जाये यदितुम्हें याद रखना पड़े कि तुम्हें श्वास लेना है। तुम्हें सतत याद रखना पडे़ कितुम्हें सॉस लेना है, और तुम एक क्षण के लिए भी कुछ याद नहीं रख सकतेयदि एक क्षण भी भूल हो जाये तो तुम गये। इसलिए साँस अचैच्छिक क्रियाहै, वह तुम पर निर्भर नहीं है। यहॉ तक कि यदि तुम महीनों तक बेहोशी कीहालत में पड़े रहो, तो भी तुम श्वास लेते रहोगे। मैं कहता हूँ कि सचमुच ये मछलियों बहुत दुर्लभ है। और किसी दिन होसकता है कि आदमी को पता चले कि उनमें एक गहरी सजगता है जो कि आदमीके पास भी नहीं है क्योंकि सतत होशपूर्वक श्वास लेना एक बहुत ही कठिनबात है। हो सकता है उन मछलियों ने कोई विशेष सजगता उपलब्ध कर ली हो, जो कि हमारे पास नहीं है। बुद्ध ने श्वास को दो कार्य एक साथ करने के लिए वाहन की भाँति काममें लिया-एक : चेतना पैंदा करने के लिए, और दूसरा : उस चेतना कोशरीरके हर एक कोष में प्रवेश करा देने के लिए। उन्होंने कहा-होशपूर्वक श्वासलो। यह कोई प्राणायाम नहीं है। यह सिर्फ श्वास को बिना बदले सजगता काविषय बनाने का प्रयास है। तुम्हें अपनी श्वास कीगति में कोई परिवर्तन नहींकरना है। उसे वैसा ही रहने देना-नैसर्गिक जैसी वह है-वैसी ही रहने देनाहैं। उसे परिवर्तित न करें। कुछ और करें। जब तुम श्वासको भीतर ले जाओंतो होशपूर्वक लेजाओ। भीतर जातीश्वास के साथ तुम्हारी चेतना भी भीतर चलीजाए। जब श्वास बाहर आती हो तो तुम भी उसके साथ बाहर चले जाओ। भीतर जाओ, बाहर आओ। श्वास के साथ होशपूर्वक चलो। तुम्हारा ध्यान श्वास पर होउसके साथ वही, एक श्वास भी विस्मृत न हो जाये। बुद्ध ने कहा-बताते हैं कि यदि तुम एक घंटे भी श्वास के प्रति सजगरह सको तो तुम बुद्धत्व को उपलब्ध हो गये समझो। लेकिन एक श्वास भी नहींचूकनी चाहिए। एक घंटा काफी है। यह बहुत छोटा मालूम पड़ता हैं-केवल समय का एकटुकड़ा, किन्तु वह है नहीं। जब तुम प्रयास करोगे तो सजगता का एक घंटा लाखों साल जैसा प्रतीत होगा क्योंकि साधारणतः तुम पाँच-छः सेकंड से ज्यादा सजग नहीं रह सकते, और वह भी जबकि कोई बहुत अधिक सावधान हो। अन्यथा तुम हर सेकंड पर चूक जाओगे। तुम शुरू करोगे कि श्वास भीतर जा रही हैं। श्वास भीतर चली गई है, और तुम कहीं और चले गये। अचानकतुम्हें याद आयेगा कि श्वास बाहर जा रही है। श्वास बाहर चली गई और तुम कहीं और जा चुके। श्वास के साथ चलने का अर्थ होता है कि एक भी विचार को न चलनेदिया जाये क्योंकि विचार तुम्हारा ध्यान खींच लेगा, विचार तुम्हारे ध्यान को कहींऔर ले जाएगा। इसलिए बुद्ध कभी नहीं कहते कि बिचारों को रोको परन्तु वे कहते है-‘‘हौशपूर्वक श्वास लो’’ विचार स्वतः ही रुक जायेंगे। तुम दोनों कामएक साथ नहीं कर सकते कि विचार भी करो और श्वास पर भी ध्यान रख सको। एक विचार तुम्हारे मस्तिष्क में आता है और तुम्हारा ध्यान कहीं और चलाजाता है। एक अकेला विचार, और तुम अपनी श्वास की प्रक्रिया के प्रति मूच्छित हो जाते हो। इसलिए बुद्ध ने बहुत ही सरल विधि का प्रयोग किया पर एक बहुतही जीवन्त प्रक्रिया का। उन्होंने अपने भिक्षुओ से कहा कि तुम चाहे जो भी करो, किन्तु अपनी भीतर आती और बाहर जाती श्वास के प्रति होश बना रहे। उसकेसाथ ही गति करो, उसके साथ ही बहो। जितना आवक तुम प्रयत्न करोगे, जितनाज्यादा प्रयास करोगे उतना ही तुम उसके प्रति जाग सकोगे। सजगता एक-एकसेकंड करके बढेगी। यह बहुत कठिन है। बहुत मुश्किल बात है। लेकिन एकबार भी तुम उसे अनुभव कर लो तो तुम दूसरे ही आदमी ही जाओगे-एक भिन्नही व्यक्ति, एक भिन्न ही जगत के। यह दो त्तरह से काम करती है : जब तुम होशपूर्वक भीतर श्वास लेते होओरबाहर छोड़ते हो, तो धीरे-धीरे तुम अपने केन्द्र पर आ जाते हो, क्योंकि तुम्हारीश्वास तुम्हारे होने के केन्द्र को स्पर्श करती है। हर बार जब श्वास भीतर जातीहै, तो वह तुम्हारे अस्तित्व के, बीइंग के केन्द्र को छूती है। शारीरिक-रूप सेतुम सोचते हो कि श्वास का काम तुम्हारे रक्त को साफ करने के लिए है, कि यह हृदय का एक कार्य है कि श्वास ले, कि वह शरीर की बात है। तुम सोचते हो कि श्वास लेना फेफडों का कार्य है, जो कि रक्त्त की सफाई के लिए एक पमि्ंपग स्टेशन है, जो कि रवत को, आँक्सीजन पहुँचाता है और कारबन-डाईं-ऑक्साइडबाहर फेंकता है, जो कि बेकार हो चुकी और उसकी जगह त्ताजा आक्सीज़न भरता हैं। परन्तु यह केवल शारीरिक बात है। यदि तुम अपनी श्वास के प्रति सजगक्या। शूरू करो, तो धीरे-धीरे तुम गहरे चले जाओगे-तुम्हारे हदय से भी गहरे, और एक दिन तुम्हें अपने केन्द्र की प्रतीति होगी तुम्हारी नाभि के पास। यह केन्द्रकी प्रतीति तभी होगी जबकि तुम लगातार अपने श्वास के साथ चलते जाओ-क्योंकिफिराने निकट तुम अपने केन्द्र के पहुँचते हो, उतनी ही तुम्हारी चेतना खोने की पाठशाला है। तुम शुरू कर सकते हो भीतर श्वास लेने से, जबकि वह तुम्हारी नाक को स्पर्श करे, वही से तुम सावधान हो जाओ। जितनी अधिक भीतर जाये, उतनी ही चेतना कठिन हो जायेगी और एक विचार भी आ गया, या कोईआवाज़ अथवा कुछ भी हो गया और तुम वापस आ जाओगे। यदि तुम अपने केन्द्र तक जा सको जहाँ कि एक क्षण के लिए श्वास रुक जाती है और एक अन्तराल आ जाता है तो छलांग लग सकती है। श्वास भीतर जाती है, श्वास बाहर आती है, इन दो के बीच में भी एक बहुत सूक्ष्म गैप है वह गैप ही तुम्हारा केन्द्र है। जब तुम श्वास के साथ चलते हो, तब कहीं बहुतश्रम के बाद तुम्हें उस गैप का पता चलता है-जबकि श्वास की कोई गति नहीं होती, जबकि श्वास न तो आ रही होती है और न ही जा रही होती है। दो श्वासोंके बीच एक बहुत ही बारीक-सा अन्तराल हैं-एक गैप है। उस अन्तराल मेंतुम अपनेंकेन्द्र पर होते हो। इसलिए बुद्ध वे श्वास का प्रयोग किया केन्द्र के निकट, और अधिक निकटआने के लिए। जब तुम बाहर जाओश्वास के साथ, श्वास के प्रति सजग रहोफिर एक गैप है। सब मिलाकर दो गैप हैं-एक गैप भीतर और एक गैप बाहरश्वास भीतर जाती है, और श्वास बाहर जाती है, दोनों के बीच एक गैप है। श्वासबाहर जाती है, और श्वास भीतर जाती है : फिर एक गैप है। दूसरे गैप के प्रति सजग होना और भी ज्यादा कठिन है। इस प्रक्रिया को देखो। तुम्हाराकेन्द्र भीतर आती श्वास और बाहरजातीश्वास के बीच में है। एक दूसरा भी केन्द्र है-काँस्मिक सेंटर-ब्रह्म-केन्द्र। तुमउसे परमात्मा कह सकते हो। जबकि श्वास बाहर जाती है और भीतर आती है, तब भी एक गैप है। उस गैप में ब्रह्य-केन्द्र है। ये दोनों केन्द्र दो भिन्न बातें नहीं हैं। परन्तु पहले तुम अपने आंतरिक केन्द्र के प्रति ही जागोगे और तब तुम अपने बाहर के केन्द्र के प्रति सजग हो जाओगे। और अन्ततः तुम जानोगे कि ये दोनोंकेन्द्र एक ही हैं। तब ‘भीतर’ और ‘बाहर’ का कोई अर्थ नहीं बचता। बुद्ध कहते हैं कि सजगतापूर्वक श्वास लो और तब तुम चैतन्य का एककेन्द्र निर्मित कर सकोगे। और एक बार यह केन्द्र निर्मित हो जाये तो चेतना तुम्हारेश्वास के साथ तुम्हारेरक्त में, कार्यों में प्रवाहित होने लगेगी, क्योंकि प्रत्येक कोष को हवा की, ऑक्सीजन की आवश्यकता है, और प्रत्येक कोष श्वास लेता है-हरकोष। और अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि लगता है कि यह पृथ्वी भी श्वासलेती है। और आइंस्टीन की संसार के फैलने की धारणा के अनुसार सैद्धान्तिकवैज्ञानिक ऐसा कहते है कि सारा जगत ही श्वास ले रहा है। जब तुम श्वास भीतर लेते हो तो तुम्हारी छाती फैल जाती है। जब तुम श्वासबाहर निकालते हो तब तुम्हारी छाती सिकुड़ जाती है अब सैद्धान्तिक वैज्ञानिककहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि सारा विश्व ही श्वास ले रहा है। जब जगत भीतर श्वास भीतर लेता है तो वह फैल जाता है। जब वह श्वास बाहर निकालता हैतो सिकुड़ जाता है। पुराने हिन्दू शारत्रों में ऐसा कहा गया है कि सृष्टि ब्रह्मा की भीतर आतीएक श्वास है-ओर प्रलय-बाहर जाती एक श्वास है। बहुत ही सूक्ष्म ढंग से, बहुत ही आणविक तरीके से, वही तुम्हारे भीतरहो रहा है। जब तुम्हारी सजगता तुम्हारे श्वास के साथ बिल्कुल एक हो जातीहै, तब तुम्हारी श्वास तुम्हारी चेतना को हर कोष तक ले जाती है। अब किरणें प्रवेश कर जाती है और सारा शरीर बुद्ध-काया हो जाता है। वस्तुतः तब तुम्हारेपास कोई पदार्थगत्त शरीर नहीं होता। तुम्हारे चैतन्य का शरीर होता है। यही इससूत्र का अर्थ है-चैतन्य के सूर्य में स्थापित हो जाना-यही दीपक है। जिस तरह हमने बुद्ध की विधि समझो, अच्छा होगा कि हम एक दूसरीभी विधि समझ लें-एक और विधि। तन्त्र ने यौन का उपयोग किया। वह भीबडी ही जीवन्त शक्ति है। यदि तुम्हारे भीतर तुम्हें गहरे जाता हो, तो तुम्हें बहुतजीवन्त शक्ति का उपयोग करना पडेगा-सर्वाधिक गहरी शक्ति का। तन्त्र यौनका उपयोग करता है। जब तुम यौन-कृत्य में लगे हो तब तुम सृजन के केन्द्र के बहुत ही निकट हो-जीवन के स्रोत के करीब। यदि तुम यौन-कृत्य में होशपूर्वकजा सको तो वह ध्यान हो जाता है। यह बहुत ही कठिन है-श्वास से भी अधिक कठिन। तुम थोडी मात्रा मेंहीशपूर्वक श्वास ले सकते हो। वह तुम कर सकते हो। परन्तु सेक्स की घटनाही ऐसी है कि उसे तुम्हारी मूर्च्छा की आवश्यकता है। यदि तुम होश में हो जाओ तो तुम्हारी काम वासना खो जायेगी। यदि तुम जाग जाओं तो भीतर कोई काम-वासना नहीं बचेगी। इसलिए तन्त्र ने सर्वाधिक कठिन बात जगत में की। चेतना को जगाने के प्रयोगों के इतिहास में तन्त्र सर्वाधिक गहरा गया। परन्तु सचमुच इसमें कोई अपने को धोखा भी दे सकता है, और तन्त्र केसाथ प्रवंचना बहुत सुगम है क्योंकि तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं जान सकताकि वास्तविकता क्या है। कोई भी नहीं जान सकता। किन्तु सौ में से एक व्यक्तितन्त्र को विधि में सफल हो सकता है क्योंकि सेक्स को मूर्च्छा की आवश्यकताहै। अतः एक तान्त्रिकको, तन्त्र के साधक को सेक्स पर काम करना पड़ता है, काम वासना के प्रति होश रखना पड़ता है जैसे कि श्वास पर रखते हैं। उसे उसकेप्रति सजग रहना पड़ता है। जब वस्तुतः ही वह यौन-कृत्य में जाये तो उसे होशको संभाले रखना पड़ता है। तुम्हारा शरीर, तुम्हारी काम-ऊर्जा अपने शिखर पर आ गई है और विस्फोटित होने को है। तन्त्र का साधक होशपूर्वक शिखर पर पहुँचता है, और उसकी एकविधि है जानने की। यदि काम-ऊर्जा का स्खलन अपने-आप हो जाये और तुमउसके मालिक न रह पाओ तो फिर तुम उसके प्रति सजग नहीं थे। तब अचेतनने अधिकार ले लिया। यौन अपने शिखर पर हो, और तुम कुछ भी न कर सकोसिवाय स्खलित होने के, तब वह स्खलन तुम्हारे द्वारा न हुआ। तुम काम कीप्रक्रिया शुरू कर सकते हो, तुम उसे समाप्त नहीं कर सकते। अंत सदैव अचेतनके अधिकार में रहता है। यदि तुम शिखर पर रुके रहो और वह तुम्हारा सचेतन कृत्य हो जाये कितुम चाहो तोस्खलन हो और तुम चाहो तो न हो, यदि तुम शिखर से वापसलौट सको बिना स्खलन के अथवायदि तुम शिखर पर घंटों ही रुक सको, यदिवह तुम्हारा जागृत कृत्य हो, त्तब ही तुम मालिक हो। और यदि कोई काम केशिखर पर पहुँच जाये-वीर्य-स्खलन के बिल्कुल किनारे ही-और उसे रोके रहसके और उसके प्रति जागरूक रह सके, तब अचानक वह अपने गहनतम केन्द्र के प्रति जागता हैं-अचानक। और ऐसा नहीं है कि वह अपने ही गहनतम केन्द्रको जान पाता है, बल्कि वह अपने साथी के भी गहरे से गहरे केन्द्र को अनुभवकर पाता है। इसीलिए यदि कोई तन्त्र का साधक है और यदि वह पुरुष है तो वह सदैवअपने साथी की पूजा करेगा। उसका साथी मात्र यौन संबंध का विषय नहीं हैवह दिव्य है। वह एक देवी है। और वह कृत्य शारीरिक कतई नहीं है। यदितुम उसमें होशपूर्वक जा सको, तो वह गहरे से गहरा आध्यात्मिक कृत्य है। परन्तुहर गहनतम बात सदा ही असंभव जैसी होती है। इसलिए या तोश्वास का यासेक्स का उपयोग करो। महावीर ने भूख का उपयोग किया। वह भी एक गहरी बात है। भूख भीतुम्हारे स्वाद की भूख नहीं है अथवा किसी और चीज़के लिए नहीं है। वहतुम्हारे जीवन के लिएज़रूरी है। महावीर ने भूख का-उपवास का-उपयोग किया जागरण के लिए। यह कोई तप नहीं है। महावीर कोई तपस्वी नहीं हैं। लोगोंने उन्हें बिल्कुल गलत समझा। वे कोई तपस्वी नहीं थे। कोई समझदार आदमीकभी तपस्वी नहीं होता। परन्तु वे भूख को, उपवास को जागरण के लिए एक वाहन की तरह उपयोग कर रहे थे। शायद तुमने इस तथ्य पर कभी ध्यान दिया हो कि जब तुम्हारा पेट पूरा भरा हो तो तुम्हें नींद आने लगती है, तुम बेहोश होने लगते हो। तुम सोना चाहतेहो। परन्तु जब तुम भूखे हो, उपवास कर रहे ही तो तुम सो नहीं सकते। रात्रिमें भी तुम इघर-से-उघर करवटे लेते रहोगे। तुम उपवास में सो नहीं सकते। क्योंनहीं सो सकते। क्योंकि यह सोना तब जीवन के लिए खतरनाक है। अब नींदद्वितीय आवश्यकता है। पहली जरूरत भोजन की हैं-भोजन प्राप्त करने की। वहप्रथम आवश्यकता है। नींद अब कोई समस्या नहीं है। परन्तु महावीर ने उसका बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया। क्योंकिजब तुम उपवास कर रहे हो तो सो नहीं सकते। तुम चीजों को ज्यादा आसानीसे स्मस्या रख सकते ही। सजगता भी सरलता से आती. है। और महावीर ने उपवासका उपयोग चेतना के जागरण के विषय की भाँति किया। वे लगातार खडे़ रहते। तुमने बुद्ध की मूर्ति बैठी हुईं देखी होगी किन्तु महावीर की ज्यादातर मूर्तियाँखड़ी अवस्था में हैं। वे सदैव खडे़ ही रहे थे। तुम्हें अपनी भूख का और भी अघिक अनुभव होगा यदि तुम खडे़ हुए हो। यदि तुम बैठे हो तो तुम्हें वह कम मालूमहोगी और यदि तुम लेटे हुए हो तो वह और भी कम महसूस होगी। जब तुम खड़े हो तो सारा शरीर भूख महसूस करने लगता है। तुम्हें सारे शरीर में भूखको प्रतीति होगी। सारा शरीर बहने लगता है, वह भूख की एक सरिता हो जाताहै। पैर से सिर तक तुम भूखे हो जाते हो। केवल पेट ही नहीं बल्कि पाँव भी, यहाँ तक सारा शरीर भूख को अनुभव करने लगता है। और महावीर चुपचाप निरीक्षणकरते हुए खडे़ रहेंगे, भूख के समय-साथ बहते हुए-जैसे कि कोईश्वास केसाथ करता है। ऐसा कहा जाता है कि उनके मौन के बारह साल के अर्से मेंउन्होंने करीब ग्यारह वर्षों तक उपवास किया। केवल तीन सौ साठ दिन ही उन्होंनेभोजन लिया। उपवास एक विधि था उनके लिए। श्वास की तरह ही भोजन और यौन, ये भी सबसे अधिक गहरी चीजें है। जब तुम अपनी भूख के प्रति सजग होते चले जाते हो, केवल सजग होते जातेहो और कुछ नहीं करते हो, तो अचानक तुम केन्द्र पर फेंक दिये जाते हो, तुम्हारे ‘होने’ तुम्हारे बीइंग पर सबसे पहले भूख ऊपरी परिधि पर होती है, यदि तुमपरिधि घर उसे न भरो, तो उससे गहरी पर्तें भूखी हो जाती हैं। और इस तरहचलता चला जाता है, और अन्ततः तुम्हारा सारा शरीर भूखा हो जाता है। जब सारा शरीर हो भूखा हो जाता है तुम केन्द्र पर फेंक दिये जाते हो। जब तुम्हें भूख की प्रतीति होती है, तो वहं झूठी होती है। वास्तव में, वहमात्र एक आदत होती है, न कि भूख। यदि तुम दिन के एक खास वक्त परभोजन करते हो, मान लो कि एक बजे, तोठीक एक बजे तुम्हें भूख की प्रतीतिहोती है। यह भूख झूठी है जिसका कि शरीर से कोई संबंध नहीं है। यदि तुमएक बजे भोजन न करो, तो दो बजे तुम्हें लगेगा कि भूख चली गई। यदि वहप्राकृतिक थी तो दो बजे उसे बढ़ जाना चाहिए था। वह चली क्यों गई? यदि वहवास्तविक थी तो दो बजे वह और भी अधिक गुनगनी चाहिए और तीन बजे उससेभी ज्यादा, और चार बजे उससे भी ज्यादा। परन्तु वह खो गई। वो एक आदतथी-एक बहुत ही ऊपरी आदत। यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति तीन सप्ताह तक उपवास करे, तभी केवल वहवास्तविक भूख तक आ सकता है। त्तब पहली बार वह जान सकेगा कि वास्तव में भूख वया होती है। अभी तुम यह कदापि नहीं जान सकते कि भूख भी इतनीशक्तिशाली जात है जितना कि यौन-परन्तु मैं वास्तविक भूख के लिए कह रहाहूँ। इसलिए ऐसा होता है कि जब तुम उपवास पर होते हो तो तुम्हारी काम-वासना मर जाती है, क्योंकि अब और भी अधिक आधारभूत। चीज़ दाँव पर है। भोजन तुम्हारे जीवित रहने के लिए है, यौन मनुष्य जाति के जीने के लिएहै। यह एक दूर की घटना है जो कि तुम्हारे से संबंधित नहीं है। यौन जातिके लिए भोजन है, न कि तुम्हारे लिए। यौन के द्वारा मनुष्यता जी सकती हैइसलिए वह कोई तुम्हारी समस्या नहीं है। वह मानव जाति की समस्या है। तुमउसे छोड़ भी सकते हो, परन्तु तुम भोजन नहीं छोड़ सकते क्योंकि वह तुम्हारीअपनी समस्या है। वह तुमसे संबंधित है। यदि तुम उपवास करते चले जाओ तोशनैः-शनैः यौन खोजायेगा, और वह अधिकाधिक दूर चला जायेगा इस कारण से बहुत से लोग अपने को ही धोखा दिये चले जाते हैं। वेसोचते हैं कि यदि वे कम भोजन करते हैं तो वे ब्रह्मचारी हो गये हैं। वे ब्रह्मचारीनहीं ही गये हैं। केवल समस्या कोज़रा आगे सरका दिया गया है। उन्हें ठीक-ठाक भोजन दो काम-वासना लौट आएगी-पहले से भी अधिक शक्ति से, ज्यादाताजा व युवा होकर। यदि तुम तीन सप्ताह से भी ज्यादा समय तक उपवास करो, तो तुम्हारा साराशरीर भूखा हो जाता है। शरीर का रोयां-रोयां भूख महसूस करने लगता है। तबपहली बार तुम सही अर्थों में भूखे हुए हो, तुम्हारा पेट भूखा है, तुम्हारा साराशरीर ही भूखा हैं। तुम चारों ओर से एक गहरी भूख की अग्नि से धिरे हो महावीर ने इसका जागरण के लिए उपयोग किया, अतः वे भूखे रहते। उपवासकरते और सजग रहते। एक स्वस्थ आदमी तीन महीनों तक बिना भोजन के रह सकता है। एकसाधारणतः स्वस्थ आदमी तीन माह तक बिना भोजन किये रह सकता है। यदितुम-तीन माह तक उपवास करो तो अचानक एक दिन तुम मृत्यु के किनारे हीखड़े होगे। यह जानते हुए मृत्यु का साक्षात्कार करना हैं, और यह साक्षात्कारतब होता है जबकि तुम अपने शरीर को छोड़ रहे होते हो और अपने केन्द्र परभीतर छलांग लगा रहे होते हो। अब पूरा शरीर कोथक गया है। अब वह नहीं चलसकता। तुम अपने मूल उद्गम पर फेंके जा रहे हो और तुम अब शरीर में नहींरह सकते। धीरे-धीरे तुम शरीर में भीतर, और भीतर और भीतर फेंक दिये जाते हो। भोजन तुम्हें बाहर ले जाता है, उपवास तुम्हें भीतर ले जाता है। एक क्षणऐसा आता है जबकि शरीर तुम्हें और आगे नहीं ले जा सकत्ता। तब तुम अपनेकेन्द्र पर फेंक दिये जाते हो। उस क्षण में, तुम्हारा अंतर सूर्य, युक्त होता है। इसलिए महावीर तीन माह तक उपवास करेंगे-चार माह उपवास पर रहेंगे। वे असाघारणरूप से स्वस्थ थे। और तब अचानक वे गाँव में भोजन मांगने जाते। यह भी एक रहस्य है कि क्यों वे अचानक तीन-चार माह बादगाँव में भोजनमांगने जाते थे। वास्तव में, जब भी वे बिल्कुल किनारे ही होते और ऐसी घडीआ जाती कि एक क्षण भी घातक सिद्ध हो सकता था, तभी वे भोजन मांगने चले जाते। वे पुनः शरीर में प्रवेश कर जाते और फिर उपवास पर चले जाते, और तब फिर केन्द्र पर पहुँच जाते, फिर शरीर में प्रवेश करते और फिर केन्द्रपर चले जाते। तब वे उस मार्ग को महसूस करते : भीतर आती श्वास, बाहर जाती श्वास,-जीवन को शरीर में आते, जीवन कोशरीर से जातें। और तब वे इस प्रक्रिया केप्रति- सजग रहते। वे भोजन करते और वे इस प्रक्रिया के प्रति जागे हुए रहतेवे भोजन करते और वे फिर से शरीर में लौट आते, और फिर से उपवास परउतर जाते। ये वे लगातार करते रहे बारह वर्षों तक। यह एक आंतरिक प्रक्रिया थी। तो मैंने तीन बातों पर चर्चा कोःश्वास, यौन व भूख-बहुत ही बुनियादीव आघाभूत बातें। किसी केप्रति भी सजग हो जाओ। श्वास सबसे अधिक सरलहै। तन्त्र की विधि का उपयोग करना कठिन है। मन इसका उपयोग करना चाहेगापरन्तु वह बहुत कठिन होगा। उपवास की विधि भी कठिन है। मन उसे पसन्दनहींकरेगा। ये दोनों बहुत कठिन है। केवल श्वास की प्रक्रिया सबसे ज्यादा सरलहै। आने वाले युग में मुझें लगता है, कि बुद्ध की विधि बड़ी सहायक होगीयह मध्यम, सरल और बहुत खतरनाक भी नहीं है। इसलिए बुद्ध को मध्य-मार्ग का सूत्र खोजने वाला कहते हैं-‘‘मज्झिम-निकाय’’-‘स्वर्ण मार्ग।’ यौन व भोजन, इन दोनों के यह मध्य में है। श्वास स्वर्णमार्ग है-बिल्कुल बीच में। और दूसरी भी वहुत-सी विधियाँ है। तुम किसी भी विधि से अन्तर्प्रकाशको उपलब्ध हो सकते हो। और एक बार भी तुम उसमें स्थिति हो जाओ तो तुम्हाराअन्तर्प्रकाश तुम्हारे शरीर के कोषों में प्रविष्ट होने लगता है। तब तुम्हारी सारीशारीरिक यांत्रिकता ताजा हो जाती है और तुम बुद्ध-काया को उपलब्ध कर सकतेहो-एक जागे हुए मनुष्य के शरीर को पा सकते हो। आज इतना ही 1