Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

क्या अर्थ है आत्म जागृति का ?


जाग्रत स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है ज्ञान का बना रहना ही जाग्रत अवस्था है।

विकल्प ही स्‍वप्‍न हैं।’’

अविवेक अर्थात स्व—बोध का अभाव मायामय सुषुप्‍ति है।

तीनों का भोक्ता वीरेश कहलाता है।

जाग्रत, स्‍वप्‍न और सुषुप्ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है। तुर्या है— चौथी अवस्था। तुर्यावस्था का अर्थ है— परम ज्ञान।

तुर्यावस्था का अर्थ है कि किसी प्रकार का अंधकार भीतर न रह जाये, सभी ज्योतिर्मय हो उठे; जरा—सा कोना भी अंतस का अंधकारपूर्ण न हो; कुछ भी न बचे भीतर, जिसके प्रति हम जाग्रत नहीं हो गये; बाहर और भीतर, सब ओर जागृति का प्रकाश फैल जाये।

अभी जहां हम हैं, वहां या तो हम जाग्रत होते हैं या हम स्‍वप्‍न में होते हैं या हम सुषुप्‍ति में होते हैं। चौथे का हमें कुछ भी पता नहीं है। जब हम जाग्रत होते हैं तो बाहर का जगत तो दिखाई पड़ता है, हम खुद अंधेरे में होते हैं; वस्तुएं तो दिखाई पड़ती हैं, लेकिन स्वयं का कोई बोध नहीं होता; संसार तो दिखाई पड़ता है, लेकिन आत्मा की कोई प्रतीति नहीं होती। यह आधी जाग्रत अवस्था है।

जिसको हम जागरण कहते हैं— सुबह नींद से उठकर— वह अधूरा जागरण है। और अधूरा भी कीमती नहीं है; क्योंकि व्यर्थ तो दिखाई पड़ता है और सार्थक दिखाई नहीं पड़ता। कुड़ा—करकट तो दिखाई पड़ता है, हीरे अंधेरे में खो जाते हैं। खुद तो हम दिखाई नहीं पड़ते कि कौन हैं और सारा संसार दिखाई पड़ता है।

दूसरी अवस्था है स्‍वप्‍न की। हम तो दिखाई पड़ते ही नहीं स्‍वप्‍न में, बाहर का संसार भी खो जाता है। सिर्फ, संसार से बने हुए प्रतिबिंब मन में तैरते हैं। उन्हीं प्रतिबिंबों को हम जानते और देखते है— जैसे कोई दर्पण में देखता हो चांद को या झील पर कोई देखता हो आकाश के तारों को। सुबह जागकर हम वस्तुओं को सीधा देखते हैं; स्‍वप्‍न में हम वस्तुओं का प्रतिबिंब देखते हैं, वस्तुएं भी नहीं दिखाई पड़ती।

और तीसरी अवस्था है— जिससे हम परिचित है— बाहर का जगत भी खो जाता है; वस्तुओं का जगत भी अंधेरे में हो जाता है; और प्रतिबिंब भी नहीं दिखाई पड़ते; स्‍वप्‍न भी तिरोहित हो जाता है; तब हम गहन अंधकार में पड़ जाते हैं— उसी को हम सुषुप्ति कहते हैं। सुषुप्ति में न तो बाहर का ज्ञान रहता है,न भीतर का। जाग्रत में बाहर का ज्ञान रहता है। और जाग्रत और सुषुप्ति के बीच की एक मध्य—कड़ी है: स्‍वप्‍न, जहां बाहर का ज्ञान तो नहीं होता, लेकिन बाहर की वस्तुओं से बने हुए प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क में तैरते है और उन्हीं का ज्ञान होता है। चौथी अवस्था है: तुर्या वही सिद्धावस्था है। सारी चेष्टा उसी को पाने के लिए है। सब ध्यान, सब योग

तुर्यावस्था को पाने के उपाय हैं। तुर्यावस्था का अर्थ है: भीतर और बाहर दोनों का ज्ञान; अंधेरा कहीं भी नहीं— न तो बाहर और न भीतर, पूर्ण जागृति;जिसको हमने बुद्धत्व कहा है, महावीर ने जिनत्व कहा है; जिसमें न तो बाहर अंधकार है, न भीतर, सब तरफ प्रकाश हो गया है; जिसमें वस्तुओं को भी हम जानते हैं, स्वयं को भी हम जानते है। ऐसी जो चौथी अवस्था है, वह कैसे पाई जाए— इसके ही ये सूत्र हैं।

पहला सूत्र है. जाग्रत, स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जान लेने से तुर्यावस्था का ज्ञान हो जाता है। अभी हम जानते तो हैं,लेकिन पृथक रूप से नहीं जानते। जब हम स्‍वप्‍न में होते हैं, तब हमें पता नहीं चलता कि मैं स्‍वप्‍न देख रहा हूं; तब तो हम स्‍वप्‍न के साथ एक हो जाते है। सुबह जागकर पता चलता है कि रात सपना देखा। लेकिन अब तो वह अवस्था खो चुकी है। जब वह अवस्था होती है, तब हम पृथक रूप से नहीं जान पाते;तादात्‍म्‍य हो जाता है। स्‍वप्‍न में लगता है कि हम स्‍वप्‍न हो गये। सुबह जागकर लगता है कि अब हम स्‍वप्‍न नहीं रहे। लेकिन अब हमारा तादात्‍म्‍य जाग्रत से हो जाता है। हम कहते है: अब मैं जाग गया। लेकिन तुमने कभी सोचा है कि रात तुम फिर सो जाओगे और यह तादात्‍म्‍य भी भूल जायेगा; फिर सपना आयेगा और फिर तुम सपने के साथ एक हो जाओगे। जो भी तुम्हारी आख पर आ जाता है, तुम उसी के साथ एक हो जाते हो, जबकि तुम सभी से पृथक हो।

यह ऐसा ही है कि जैसे वर्षा आये और तुम समझने लगो कि मैं वर्षा हो गया, गरमी आये और तुम समझने लगो कि मै गरमी हो गया और फिर शीत आये और तुम समझो कि मैं शीत हो गया। लेकिन ये तीनों मौसम तुम्हारे आसपास है; तुम तीनों से अलग हो। बचपन था तो तुमने समझा कि मै बच्चा हूं। जवान हुए तो तुमने समझा कि मै जवान हूं। बूढ़े हुए तो तुम समझ लोगे कि मै बूढ़ा हूं। लेकिन तुम तीनों के पार हो। अगर तुम पार न होते तो बच्चा जवान होता कैसे? तुम्हारे भीतर कुछ है जो बचपन को छोड़ सका और जवान हो सका। वह कुछ बचपन और जवानी दोनों से अलग है।