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क्या है त्रिनेत्र 'सहज योग' साधना?


साधना अगर एक सफर है तो इसकी मंजिल क्या है?-

1-साधना का मकसद कहीं पहुंचना नहीं है। साधना का मकसद तो उस अवस्था में आना है, जहां आप बस यहां मौजूद रह सकें। अगर आप कहीं पहुंचना चाहते हैं, तो ट्रेन पकड़िए, बस पर चढ़िए, दौड़ना शुरू कर दीजिए। साधना का मकसद कहीं पहुंचना नहीं है। साधना का मकसद तो कहीं पहुंचने की इस बेचैनी को बस समाप्त करना है। कहीं जाने की जरूरत से परे जाना ही साधना है, क्योंकि जाने के लिए कोई जगह नहीं है।

2- कन्नड़ संत बसावा ने कहा था, ‘जो लोग यहां नहीं रह सकते, वे कहीं और भी नहीं पहुंच सकते।’ आप कहीं नहीं पहुंच सकते क्योंकि ऐसी कोई जगह है ही नहीं। जिन चीजों का ज्ञान होना चाहिए, वे सब यहीं और अभी हैं। सिर्फ यही वह जगह है, जहां आप हो सकते हैं। अगर आप जीवित हैं, तो आप यहां और अभी हैं, अगर आप मरते हैं, तो भी आप यहीं और अभी हैं।

3-साधना आपको समझदारी के एक खास स्तर पर पहुंचाने का एक तरीका है, जहां कहीं पहुंचने की जरूरत खत्म हो जाती है। यहीं बैठे रहना काफी है। इसीलिए जो लोग साधना में डूबे होते हैं, वे किसी दिशा में नहीं जाते। वे बस बैठे रहते हैं और जिन चीजों को भी जानने की जरूरत है, उन्हें यहीं बैठे हुए जाना जा सकता है। उसे जानने के लिए आपको दुनिया भर में दौड़ने-भागने की जरूरत नहीं है।

सहज योग साधना;-

'सहज योग साधना' न तो कोई धर्म है, न कोई पंथ है, न कोई परम्परा है और न ही कोई शारीरिक योग है। यह अपने ही अन्दर निहित उर्जा को जागृत करने की सहज प्रक्रिया है जहाँ- 'अहं ब्रह्मास्मि' क्री अनुभूति होती है। त्रितापों से पीड़ित मानव जन्म-जन्मान्तर से मुक्ति के लिए छटपटा रहा है। कथित चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है। यहाँ संदेह उठ सकता है कि चौरासी लाख योनियों को बात कहाँ तक सत्य है ! यहाँ यह जानो कि जो ज्ञान अनुभव जन्म है- इन्द्रियातीत है उसे इन मात्र पांच ज्ञानेन्द्रियों से सहज ही कैसे जाना जा सकता है। इसलिए किसी तथ्य को जानो। मानने से कुछ नहीं होगा। जानने के लिए इस मार्ग से गुजरना ही होगा। यही मार्ग है 'सहजयोग साधना'- जिस पर निरन्तर चलते रहने से दैविक, आधिदैविक और अधिभौतिक त्रितापों से सहज मुक्ति मिलेगी।

यह साधना सरल, वैज्ञानिक और मानसिक प्रक्रिया है। इसमें न तो कोई अधिक शारीरिक परिश्रम करना पड़ता है, न किसी विशेष शिक्षा या डिग्री की आवश्यकता पड़ती है, न ही गृहस्थ जीवन का त्याग करना पड़ता है। इसे वृद्ध, बच्चे और अस्वस्थ व्यक्ति भी कर सकता है इस वैज्ञानिक युग में यथार्थता का परीक्षण अनिवार्य है। इस अत्याघुनिक युग में भी जितने यंत्र उपकरण बने हैं वे सभी के सभी स्थूल हैं- स्थूल का ज्ञान देते हैं। मनुष्य के सीमित क्षमता के परिणाम हैं ये यंत्र। ये उपकरण वास्तुपरक हैं जिससे वाह्य ज्ञान संभव हैं। आत्मपरक ज्ञान का कोई उपकरण नहीं बना। आत्मपरक उपकरण एक मात्र 'साधना' है। जिस तरह तुम्हारी क्षुधा तभी मिटती है जब तुम भोजन करते हो उसी प्रकार इसे प्राप्त करने के लिए तुम्हें स्वयं चलना होगा। यही चलना 'सहयोग साधना' है। इस मार्ग पर चलकर आन्तरिक शक्तियों को विकसित कर सम्पूर्ण प्रकृति और ब्रह्माण्ड पर विजय प्राप्त किया जा सकता है।

इस सरल स्वाभाविक और विशेष प्रयासहीन साधना द्धारा चेतना की उच्चतर अवस्था विकसित होती है। आज की अकूल-अनन्त समस्याओं निराकरण यही सहजयोग ध्यान साधना में है। यह वैज्ञानिक और क्रमबद्ध प्रक्रिया है।

सहजयोग क्यों कहते हैं ? सहजयोग में ब्रहा का तात्पर्य वेदों के उस आदि सत्य से है- बौद्धों के शून्य से है- जैनों के चैतन्य से है- सांख्य के प्रकृति-पुरुष से है और शंकराचार्य के समष्टिगत आत्मा से है। अपने ड़न्दियों को नियंत्रित कर लेने से अपनी उस आत्मा का बोध होता है जो ब्रह्म है। ब्रह्मस्वरूप है। उस ब्रहा के बोध की स्थिति का अभिप्राय सहजयोग से है। चिंतन के लिए किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ चिन्तन एक स्थूल प्रक्रिया है जिसे सोचना कह सकते हैं। सहजयोग साधना से इस 'सोचना' को शिथिल करते हुए शून्य कर दिया जाता है। तब मानव मस्तिष्क में 'स्व' की अनुभूति होती है। वही 'स्व' जो ब्रहा है - अर्थात्, 'ब्रह्मास्मि' की अनुभूति होती है।

साधना द्वारा मन को शान्त करते हुए शान्ति की जड़ तक पहुँचाया जाता है अर्थात् जहाँ से विचार उठते हैं। जमीन बंजर हो जाये तो सोच का पौध कहाँ से विकसित होगा ? विचारों की प्रक्रिया में लाखों की संख्या में न्यूरॉन्स क्रियाशील होते हैं। साधना द्वारा जब मन शान्त होता है तब न्यूरॉन्स की उत्तेजना कम होती है और मन-मस्तिष्क को विश्राम प्राप्त होता है। इसी विश्राम से आभ्यंतर शक्ति में वृद्धि होती है।

जागृत अवस्था, स्वप्नावस्था और सुषुप्ति की चेतना साधना की तीन अवस्थायें हैं। ब्रह्मयोग की अवस्था चतुर्थ अवस्था है जब शरीर निष्क्रिय हो और मन पूर्ण चैतन्य हो। माया-मोह-इच्छा से परे शुद्ध-शुद्ध सतत् चैतन्य। इस अवस्था को ब्राह्नी अवस्था अथवा अद्वैतावस्था कहा जाता है। इस अवस्था में आने पर जीव और ब्रह्म एक हो जाते हैं। इस अद्वैतावस्था तक पहुँचने की यह सहज प्रक्रिया है इसलिए मैंने इसे 'सहज योग' कहा है।

मैंने ध्यान की एक किरण भर दिखलाई है। इसके बाद तुम्हें स्वाद लग जायगा और तुम सराबोर हो उठोगे। ज्ञान की गंगा धारा शिव की जटा से निकले गंग की धारा कि तरह तुम सराबोर हो उठोगे। ज्ञान की यह गंगा जगत के लिए भी कल्याणकारी होगा और तुम्हारे लिए भी। शिव की जटा से निकली गंगा यही तो है।

यहाँ यह संदेह हो सकता है कि विधि इतनी छोटी, इतनी सरल और उपलब्धि इतनी बड़ी? यह कैसे संभव है ? लेकिन अणु जितना छोटा होता है उतना ही शक्तिशाली होता है। ये छोटी-छोटी विधियाँ भी आणविक हैं। इस पर चल कर देखो। मेरी बातों को मान कर नहीं इन्हें जान कर देखो। इन्हीं विधियों के कारण भारत विश्व में आध्यात्मिक गुरू रूप में प्रतिष्ठित था। हमें पुन: उन्हें जीवित करना है। ध्यान-विधियाँ।

जीवन अपने आपमें एक यात्रा है और इस यात्रा की दो ही दिशाएं हैं - एक तो बाहर की ओर और दूसरी भीतर की ओर। भौतिक उपलब्धियों के लिए चल रही सारी भागदौड बाहर की यात्रा है तो ध्यान की यात्रा है... भीतर की यात्रा। यह भीतर की यात्रा भारत के स्वभाव में है।

एक पुरानी कहानी है- सच है कि झूठ कहना मुश्किल है- लेकिन उसका अपना गहरा महत्व है। कहानी झूठ भी हो तो अर्थपूर्ण है। सिकंदर जब अपने विश्व-विजय अभियान के अंतर्गत भारत आ रहा था, तो आने के पहले अपने गुरु की शुभकामनाएं लेने के लिए उनसे मिलने गया। उसने पूछा, 'गुरु जी, मैं भारत जा रहा हूँ , वहां से आपके लिए क्या लेकर आऊं, आपकी क्या फरमाइश है।'

सिकंदर का गुरु भी अद्भुत विचारक था, दार्शनिक था। उसने बहुत सोचा-विचारा और कहा, हमारे देश में और सब कुछ है, लेकिन एक चीज की कमी है। हमारे देश में कोई संन्यासी नहीं है। और मैंने सुना है कि भारत में संन्यासी ही संन्यासी हैं। आप अगर ला सकें तो अपने साथ एक संन्यासी ले आएं। मैं देखना चाहता हूँ कि संन्यासी किस तरह के लोग होते हैं, वे कैसा जीवन जीते हैं। मैंने उनकी बहुत महिमा सुनी है। मैं इस महिमा का रहस्य जानना चाहता हूँ ।

सिकंदर ने कहा, यह कोई बडी बात नहीं, आपकी फरमाइश जरूर पूरी करूंगा। वह भारत आया। किसी एक गांव में उसे याद आई अपने गुरु की फरमाइश और अपने सैनिकों को उसने आदेश दिया कि जाओ, किसी संन्यासी को ढूंढ लाओ। गांव में नदी-तट पर ध्यान में बैठा एक संन्यासी दिख गया और सैनिकों ने उसे उनके साथ चलने को कहा। संन्यासी ने उनसे पूछा, आप कौन हैं और मैं किसलिए आपके साथ चलूं?

सैनिकों ने कहा, हम महान सिकंदर के सैनिक हैं। उनकी आज्ञा है कि हम आपको उनके पास ले जाएं।

संन्यासी ने कहा, अपने शासक को जाकर कह दो कि मैं अपना स्वामी स्वयं हूँ , मैं किसी और की आज्ञा नहीं मानता। मैं संन्यासी हूँ और संन्यास मेरी स्वतंत्रता है।

सैनिक निराश होकर सिकंदर के पास लौट आए और संन्यासी के साथ हुई अपनी चर्चा का वर्णन किया। सिकंदर ने कहा, लगता है मुझे स्वयं ही जाना पडेगा। गुरु की आज्ञा का पालन तो करना ही है।

वह संन्यासी के पास स्वयं गया और अपना परिचय देते हुए कहा, 'मैं महान सिकंदर हंू। लगता है, आपने मेरे संबंध में कुछ सुना नहीं है। मैं विश्व-विजय करता हुआ भारत आया हूँ । मुझे भारत से एक संन्यासी को यूनान ले जाना है। मेरे गुरु संन्यासी की जीवनचर्या देखना चाहते हैं। मैं आदेश देता हूँ कि आप मेरे साथ चलें। आज्ञा का अगर उल्लंघन किया तो आपका सिर काट दिया जाएगा।

सिकंदर की यह धमकी भरी घोषणा संन्यासी ने सुनी, और फिर भी अकंप बना रहा। संन्यासी को कैसा भय! मुस्कराते हुए संन्यासी बोला, 'मुझे तो हंसी आ रही है कि आप अपने आपको महान कहते हैं। केवल हीनता की ग्रंथि वाले ही अपने को महान घोषित करते हैं। और आपने अपने को जीता नहीं, अपनी महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं पर कोई नियंत्रण नहीं किया, आपकी विश्व-विजय यात्रा बिलकुल व्यर्थ है। आप सम्राट दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में हैं एक भिखारी, एक लुटेरे हैं। मुझे आपकी महानता नहीं, दीनता दिखाई देती है। और आप कहते हैं कि आप मेरा सिर काट देंगे। काटिए। मैं तो स्वयं अपने सिर से मुक्त हो चुका हूँ । अहंकार मिटा कि सिर गया। अब मैं आत्मस्थ हूँ , स्वस्थ हूँ - स्वयं मैं स्थित हूँ। सिर से मुक्त हूँ चिंता से मुक्त हूँ । आप मुझे अपने साथ चलने को कह रहे हैं। मेरी कहीं जाने की, कुछ पाने की इच्छा नहीं है- आप्तकाम हूँ , मैं आवागमन से मुक्त हूँ । आप यह बता देना अपने गुरु को।

संन्यासी की इस उद्घोषणा को सुनकर सिकंदर चमत्कृत हुआ। वह खाली हाथ लौट गया। इतना ही नहीं, वह कभी अपने देश भी नहीं लौट सका, बीच रास्ते में ही उसके प्राण छूट गए। उसकी विश्व-विजय, लूट खसोट की सारी संपदा बीच में ही छूट गई। ऐसी निराशा की घडिय़ों में संन्यासी की उद्घोषणा का उसे अवश्य स्मरण आया होगा, क्योंकि मरता हुआ आदमी अंतिम क्षणों में अपने पूरे जीवन की एक झलक पूरी त्वरा और तीव्रता से देख लेता है। सब यादें सघन होकर मानस-पटल पर सामने आ जाती हैं।

कहानी से कहीं अधिक प्रीतिकर इसका भावार्थ है। गौर करें, हमारे जीवन में बस यही दो आयाम हैं - बहिर्यात्रा और अंतर्यात्रा। बहिर्यात्रा है महत्वाकांक्षा की, दुनिया को जीतने की। अंतर्यात्रा है निर्वासन की, स्वयं को जीतने की। इस जगत में आदिकाल से तरह-तरह के सिकंदर हुए और वे दुनिया को जीतने में लगे रहे, अंतत: उनके हाथ में राख आई। इतिहास उनकी कहानियों से भरा पडा है। सच तो यह है कि विश्व का संपूर्ण इतिहास ऐसे सम्राटों और शासकों की गौरव-गाथाओं से भरा पडा है। इस इतिहास को भारत ने इतना महत्व नहीं दिया, जितना दुनिया के दूसरे देश देते हैं। और यह भी सच है कि भारत का इतिहास भी विदेशी इतिहासज्ञों द्वारा ज्यादा लिखा गया है। हमने स्वयं अपना इतिहास लिखने में इतनी अधिक रुचि नहीं ली।

भारत की रुचि ही मूलत: किसी और आयाम में रही, जिसमें गीता, रामायण, वेद, शास्त्र, श्रुतियां उपनिषद, धम्मपद और पुराण कथाएं आती हैं। इतिहास से अधिक इस आयाम पर हमने अपने प्राणों और अपनी चेतना को नियोजित किया। विश्व-विजय की अपेक्षा भारत ने जगतगुरु होने की दिशा पकडी। भारत ने कभी किसी मुल्क पर आक्रमण की योजना नहीं बनाई, बल्कि अगर कहीं युद्धों या हिंसा के कारण कोई विस्थापित हुआ तो उसे शरण दी। पिछली सदी में दलाई लामा और उनके लोगों को मिली शरण इसकी ताजा मिसाल है। इसकी वजह से चीन हमें माफ नहीं कर सका है, लेकिन भारत ने कभी इसकी चिंता नहीं की।

भारत की यह दृष्टि, आदिकाल से चली आ रही अंतर्यात्रा और उससे मिली आबोहवा का ही परिणाम है। सनातन काल से यही इसकी सनातन धार्मिकता है। सनातन में - पुरातन, नूतन और भविष्य, सब समाहित हो जाता है।

अगर हम भारत का संधि-विच्छेद करके देखें तो एक गरिमापूर्ण अर्थ सामने आता है। भा यानी प्रकाश, रत यानी संलग्न। जहां कहीं भी लोग अंत: प्रकाश की अंतर्यात्रा में संलग्न हैं, वे भारतवासी हैं। भौगोलिक हिसाब से वे कहीं भी रहें, प्रवासी हों अप्रवासी हों, अगर वे अंतर्यात्रा, ध्यान की यात्रा में अपने भीतर प्रकाश की खोज में हैं तो वे सच्चे अर्थों में भारतीय हैं। उनके ऊपर हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई होने का कुछ भी लेबल हो, कोई फर्क नहीं पडता है, वे भारतीय हैं।

इसलिए आदिकाल से जिस व्यक्ति को भी कभी आत्म-उपलब्धि, आत्मज्ञान का स्मरण आया, वह व्यक्ति दुनिया के कोने-कोने से भारत चला आया। आक्रमणकारी भी आए, लेकिन उनमें जो संवेदनशील थे, वे भारत द्वारा आत्मसात कर लिए गए। उनका रूपांतर हो गया। रूपांतरण की यह अल्केमी भारत के पास है। कोई अतिथि की भांति आता है तो वह यहां देवतुल्य हो जाता है। कोई आक्रमण करता हुआ आता है तो वह भी इस अल्केमी से अछूता नहीं रहता।

भारत की अल्केमी का मूल बिंदु है ध्यान। योग इसका ऊपरी आवरण है। ध्यान इसकी अंत:सलिला है। योग की सतह के नीचे जमीन के भीतर ही भीतर बह रही धारा। अपने पूर्ण रूप में यह ध्यान योग है। ध्यानयोग से व्यक्ति पूर्णत: स्वस्थ होता है। स्वस्थ अर्थात् स्व में स्थित। आत्मस्थ।

जो स्वस्थ है वह संन्यासी है। चाहे वह हिमालय में रहे अथवा मुंबई शहर में। वह कहीं भी रहे, अगर वह ध्यान को समर्पित जीवन जीता है, प्रतिपल होश के साथ, तो वह संन्यासी है। उसकी गरिमा और महिमा के सामने सिकंदरों की शान-शौकत फीकी है। भारत की यह गरिमा, यह महिमा कहीं विस्मृत न हो जाए, इसका हमें स्मरण रखना होगा।

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मनुष्य के भृकुटि के मध्य एक त्रिनेत्र होता है। वह बन्द रहता है। यह तृतीय नेत्र ही शिव नेत्र है। जो न केवल भारतीय परम्परा के शिव के पास है बल्कि सभी मनुष्य के पास है। जरूरत है उसे खोलने की। इसके खुल जाने से बिना देखे हुए तुम देख सकते हो। बिना सुने हुए सुन सकते हो। बिना कहे हुए कुछ कह सकते हो। अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों की जो सीमित शक्ति है उसमें वृद्धि हो जाती है। यह विधि भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही आज के युग में ध्यान ही एक मात्र ऎसी जादुई छड़ी है जो सम्पूर्ण विश्व की हिंसात्मक वृति को रोक सकता है। हिंसा ! यह हिंसा क्यों है ? हिंसा ! मात्र 'चाहना' और अधिक 'चाहना' का प्रतिफल है। फ्रशटेशन की भूमि में उपजी फसल है हिंसा। 'चाहना' जितनी बढ़ेगी - स्पर्धा उतनी बढ़ेगी - भौतिक आविष्कार जितने होंगे उतना ही होगा असन्तोष। जितना होगा असन्तोष उतनी बढ़ेगी हिंसा। " अपराध " का आरंभ विवशता से होता है और फिर अपराधी बने रहने की विवशता हो जाती है। " यदि एक आविष्कार हृदय की भूमि से हो तो अन्य सभी वैज्ञानिक आविष्कार फीके पड़ जायेंगे।

यदि इस हिंसात्मक उर्जा की धारा को ध्यान साधना की दिशा में मोड़ दिया जाये तब निश्चय की एक अध्यात्मिक क्रांति आएगी। सर्वत्र भाई-चारा होगा। वैसे यह कल्पना करना कि असन्तोष तो सृष्टि की प्रक्रिया में है; असन्तोष अज्ञान से है और अज्ञान माया से। माया के बिना तो ब्रह्मा की पहचान ही न होगी। बिना मृत्यु के जीवन नहीं और बिना रात के दिन नहीं हो सकता है। बिना अंधकार के प्रकाश का अस्तित्व कैसे ठहर पायेगा ? मेरा तात्पर्य यह है कि तामसिक वृतियाँ कम होनी चाहिए। ऎसी वृतियों पर ध्यान-साधना से अंकुश लगाया जा सकता है। यदि इस दिशा में शीघ्र ही समुचित कदम नहीं उठे तब संसार में हथियारों की होड़ और हिंसात्मक वृतियों में बेतहाशा वृद्धि होती जायगी। मानवीय संवेदना आज हासिये पर है कल समाप्त हो जायगी। ऐसी परिस्थिति में हमारा आपका दायित्व बनता है कि ध्यान साधना का प्रचार प्रसार बढ़े, अधिक से अधिक लोगों का झुकाव इस ओर हो। यदि एक साधक किसी एक का भी झुकाव इस ओर कर पाये- किसी एक हदय की भावना को शुद्ध कर पाए एक धड़कन भी संवेदना से स्पन्दित करा पाये तो इसकी श्रृंखला बनती चली जायगी।

एक बात ध्यान रखने की है। अनुकरण से साधना पूर्ण नहीं होगी। अनुकरण पर वर्ष दो वर्ष तक कोई टीक सकता है। इससे अधिक नहीं। अध्यात्म का उदय हदय से होगा तब साधना समग्र रूप से होगी। दुख से घबरा कर दो चार दिन की साधना से कोई साधक नहीं बन सकता है- वह तो याचक होगा। कर्त्तव्यों से विमुख होकर गुफा कन्दरा में जा कर ध्यान साधना करना भी सच्ची साधना नहीं होगी। वह भ्रामक होगा यदि भ्रामक न भी हो तो भी वह किसी काम की नहीं होगी। वह संसार का नहीं अपना भला करेगा। अकेले का उत्थान करेगा इस संसार की हलचल में रहकर अपने आस-पास के दायित्वों को निर्वाहते हुए प्रेम और सहज भाव से जो साधना करे वही कल्याणकारक है।

ध्यान में तर्क का कोई स्थान नहीं - बुद्धि और डिग्री की कोई आवश्यकता नहीं। बुद्धि से मतवाद खड़ा होगा श्रद्धा और विशवास नहीं पनपेगा। साधना के लिए दो ही शर्तें आवश्यक है प्रेम और समर्पण। जहाँ प्रेम होगा वहाँ समर्पण स्वमेव हो जायगा। कोई विधि कैसे बनी ? किसने बनाई ? किस परम्परा की है - से हमारा कोई लेना देना नहीं है। एक रोगी को दवा के इतिहास से कोई लेना-देना नहीं होता है। रोगी के लिए उचित दवा की उपलब्धता और दवा खाने का महत्व होता है। इसलिए तंत्र विज्ञान की विधि हो या बौद्धों की या हिन्दु परम्परा की, विधि तो विधि है। मैंने इन अनेकों विधियों से गुजर कर उनके सार रूप को लेकर ध्यान की एक पद्धति का खोज किया है जिसके सहारे गृहस्थ जीवन में रह कर ब्रह्म साक्षात्कार किया जा सकता है। यह विधि अत्यन्त सरल है अत: हमने इसे 'सहज-योग साधना' कहा है। उस परमतत्व से जुड़ने की सहज प्रक्रिया का नाम "सहज-योग साधना' है।ष्टि से कल्याणकारक है।

'सहज योग' साधना में तुम्हें अपनी आती-जाती श्वांस के प्रति हर क्षण सजग रहना है। श्वांस कब अन्दर आ रही है और कब बाहर जा रही है। ऐसी सजगता बनाये रखने से तुम दृढ़ता प्राप्त कर लोगे और अपने सहस्रसार चक्र से अपने ध्यान को प्रवेश करा कर शरीर के एक अंग को अलग-अलग एक-एक इंच पर अपनी दृष्टि डालते जाओ- देखते जाओ। एक दिन वह महाघटना घटित हो जायगी - तुम सत्य को उपलब्ध हो जाओगे। इस सहजयोग साधना को नियमपूर्वक लगातार करने से शीघ्र उच्चतर अवस्था जिसे ब्राह्मी अवस्था कहते है प्राप्त कर लोगे। लेकिन सांसारिक लाभ हेतु कभी भी, कहीं भी और किसी भी स्थिति में की जा सकती हैं। तात्कालिक लाभ के रूप में मानसिक शक्ति बढ़ जायेगी- शरीर के छोटे-मोटे किसी भी प्रकार के रोग में कभी आते हुए एक दिन समाप्त हो जायगा। स्मरण शक्ति में गुणात्मक वृद्धि होगी। इड़ा और पिंगला सांसें ही तो रस्सी है मूलाधार ही महासागर है जिसका मंथन इड़ा और पिंगला से करने पर सभी रत्नादि प्राप्त होंगे। लक्ष्मी, सरस्वती सभी की प्राप्ति होगी। समुद्र मंथन का यही रहस्य तो है।

अन्तश्वेतना ही जीव का प्रमुख आधार है। मंत्र, जप, तप, पूजा, हवन, ध्यान, नमाज़, नमन का एक ही लक्ष्य है अन्तश्चेतना में वृद्धि और अनुभूति। घर-गृहस्थी और परिवार के दायित्वों का निर्वाह करते हुए दिन-रात ध्यान योग पूजन-सत्संग करना कदापि संभव नहीं है। न ही कर्त्तव्यों से विमुख हो गृहत्याग कर जंगलों में भटकना ठीक है। इस दृष्टि से यह निम्न ध्यान-साधना अति सरल और साधु संन्यासियों के साथ-साथ गृहस्थ स्त्री-पुरुषों के लिए उपयोगी और सरल साध्य है।

क्या दिव्य-दृष्टि घबराने वाली होती है?

“क्या दिव्य-दृष्टि घबराने वाली होती है, जैसी अर्जुन को हुई है?’

पूछा जाता है कि क्या दिव्य-दृष्टि घबड़ाने वाली होती है? जैसा अर्जुन घबड़ा गया था। घबड़ाने वाली हो सकती है। अगर पूर्व तैयारी न हो, तो अचानक पड़ा हुआ सुख भी घबड़ा जाता है। लाटरी मिल जाए तो पता चलता है। गरीबी बहुत कम लोगों की जान ले पाती है, अमीरी एकदम से टूट पड़े तो आदमी मर ही जाए।

मैं एक कहानी निरंतर कहता रहता हूं कि एक आदमी को लाटरी मिल गई। उसकी पत्नी बहुत घबड़ाई, क्योंकि एकदम पांच लाख रुपये मिल गए थे। वह बहुत डरी और उसने सोचा कि पति तो अभी दफ्तर गया है–वह किसी दफ्तर में क्लर्क है–वह लौटेगा, पांच रुपये भी मुश्किल से मिलते हैं, पांच लाख! पता नहीं झेल पाएगा कि नहीं झेल पाएगा। तो पास में चर्च था, वहां गई और पादरी से कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गई हूं, पति लौटते होंगे और आते से ही एक बड़ी खतरनाक खबर देनी है कि पांच लाख की लाटरी मिल गई है। कहीं ऐसा न हो कि उनके हृदय पर आघात ज्यादा पड़ जाए। उस पादरी ने कहा, घबड़ाओ मत, मैं आ जाता हूं।

पादरी आकर बैठ गया। उसकी पत्नी ने कहा कि करेंगे क्या? उसने कहा कि इस सुख को “इंस्टालमेंट’ में देना पड़ेगा, टुकड़ों में देना पड़ेगा। आने दो पति को। मैंने योजना बना रखी है। पति आया तो उसने कहा कि तुम्हें पता है, पचास हजार रुपये तुम्हें लाटरी में मिले हैं? सोचा कि पहले पचास हजार। जब पचास हजार सह लेगा तो कहेंगे, नहीं, लाख। जब लाख भी सह जाएगा, देखेंगे नहीं मरता है, तो डेढ़ लाख, ऐसा बढ़ेंगे। लेकिन उस क्लर्क ने कहा कि पचास हजार मिल गए हैं! सच कहते हैं? अगर पचास हजार मिल गए हैं तो पच्चीस हजार तुम्हें चर्च को देता हूं। हार्ट फेल हो गया पादरी का। पच्चीस हजार, उसने कहा! क्या कह रहे हो? पच्चीस हजार इकट्ठे पड़ गए उस पर।

अर्जुन पर जो घटना घटी, वह बहुत आकस्मिक थी। सारिपुत्त या मौगल्लान पर जो घटना घटी, वह आकस्मिक नहीं थी। उसकी बड़ी पूर्व तैयारियां थीं। जो लोग ध्यान की दिशा में यात्रा कर रहे हैं, उनके लिए दिव्यता का अनुभव कभी भी घबड़ाने वाला नहीं होगा। लेकिन जिन लोगों ने ध्यान की दिशा में कोई यात्रा नहीं की है, उनके लिए दिव्यता का प्राथमिक अनुभव बहुत घबड़ाने वाला, बहुत “शैटरिंग’। क्योंकि इतना आकस्मिक है और इतना आनंदपूर्ण है कि दोनों बातों को ही सहना मुश्किल हो जाता है।

इतना आकस्मिक है, इतना आनंदपूर्ण है कि हृदय की धड़कन रुक सकती है, ठहर सकती है, प्राण अकुला जा सकते हैं। दुख कभी इतना नहीं घबड़ाता, क्योंकि दुख की हमारी आदत होती है, सदा तैयारी होती है। दुख तो रोज ही हम भोगते हैं। सुबह से सांझ तक दुख में ही जीते हैं। दुख ही दुख में पलते हैं और बड़े होते हैं। दुख हमारा ढंग है जीने का। इसलिए बड़े-से-बड़े दुख आ जाएं तो भी हम दो-चार दिन में निपट जाते हैं, फिर अपनी जगह लौट आते हैं। लेकिन सुख हमारे जीवन का ढंग नहीं है।

अगर छोटा-सा भी सुख आ जाए, तो रात की नींद हराम हो जाती है। चैन खो जाती है। और अर्जुन पर जो सुख उतरा, वह साधारण सुख न था, वह आनंद था। और एक क्षण में उतर आया था, उसकी “इंटेंसिटी’ बहुत थी। वह घबड़ा गया और चिल्लाने लगा कि बंद करो, वापिस लो। मेरी सामर्थ्य के बाहर है यह देखना। स्वाभाविक था यह, यह बिलकुल स्वाभाविक है। बहुत मजे की बात है, लेकिन ऐसा ही है।

दुनिया में इतने शक्तिशाली लोग तो बहुत हैं जो बड़े-से-बड़े दुख को झेल लें, इतने शक्तिशाली लोग बहुत कम हैं जो बड़े सुख को झेल लें। प्रार्थनाएं हम सुख के लिए करते हैं, लेकिन अगर एकदम से मिल जाए तो पता चले, कि हम चिल्लाएं कि बस बंद करो, यह नहीं सहा जा सकेगा, इसे वापिस लौटा लो।

इसलिए भगवान भी “इंस्टालमेंट’ में सुख देता है। क्षण-क्षण, धीरे-धीरे, मुश्किल-मुश्किल से; बहुत रोओ, बहुत चिल्लाओ, बहुत मांगो, धीरे-धीरे। और जब कभी आकस्मिक घट जाती है घटना, बड़ी तीव्रता के किसी क्षण में, तो घबराने वाली होती है।

ध्यान की विधियाँ

विधि नं० 1 :

मध्यम प्रकाश वाले कमरे में आराम से लेट जायें। स्वयं को आत्मकेंद्रित करें। अपना सम्पूर्ण ध्यान आज्ञा चक्र पर ले जायें। थोड़ी देर अपना ध्यान आज्ञा चक्र पर ठहरने दें। त्रिनेत्र में सम्मोहन शक्ति होती है। जैसे ही आपका अवधान त्रिनेत्र पर जायगा वह वहीँ ठहर जायगा। आपको सुखानुभूति होगी। अब अपने ध्यान को आज्ञा चक्र से धीरे-धीरे नीचे उतारते हुए दायें हाथ की कनिष्ठा तक लायें। ध्यान रहे जब आप सांस ले रहे हों तब ध्यान आज्ञा चक्र से कनिष्ठा तक लायें और जब श्वांस छोड़ रहे हों अपने ध्यान को पुन: कनिष्ठा से धीरे-धीरे अपने आज्ञा चक्र पर ले जायें यह क्रिया दोनों हाथ और दोनों पैरों की अंगुलियों के बाद शरीर के चक्रों पर करें। यह प्रक्रिया कम से कम तीन बार करने के पश्चात अपने ध्यान को आज्ञा चक्र से मूलाधार चक्र तक प्रवाहित करते रहें। जब ध्यान तोड़ना हो स्वयं को वातावरण से जोड़ें और धीरे-धीरे आँखें खोलें।

विधि नं० 2 :

हलके प्रकाश वाले कमरे में सुखासन में बैठ जायें। बेहतर होगा यदि कमरे में मधुर वाद्य चल रहा हो। 15 मिनट तक अपने अंतर को रीता करने का प्रयास करें। आँखें बंद होनी चाहिए। 15 मिनट के बाद जलते बुझते नीले प्रकाश वाले बल्ब को एकटक निहारत रहें। बल्ब का जलना बुझना आपके ह्रदय गति से सात गुना ज्यादा होना चाहिए। पुनः 15 मिनट के पश्चात आँखें बंद कर लेट जायें और निष्क्रिय रहें। विचारों से तादात्म्य स्थापित न करें।

विधि नं० 3 :

अपने आज्ञा चक्र पर ध्यान लगायें। जब ध्यान एकाग्र हो जाये सहस्रसार के ब्रह्मरन्ध्र पर ब्रह्माण्डीय ज्योतिर्मय ऊर्जा की धारा को बरसते हुए महसूस करें और फिर अगले कुछ दिनों के अभ्यास के बाद इस ऊर्जा को ब्रह्मरन्ध्र से अपने अन्दर प्रवेश करायें। वास्तव में यही ब्रह्माण्डीय शिवजी की गंगा है जो शरीररूपी पर्वत की चोटी कैलाश पर गिरती है। कैलाश की चोटी सहस्रसार चक्र है। यह साधना एक बैठक मैं तभी तय करें जब तक कि कोई तनाव पैदा न हो या भय महसूस न हो।

विधि नं० 4 :

कमर से गर्दन सीधी रखो। आँखें बन्द कर लो। अपने ध्यान को अपने भृकुटी के मध्य धीरे-धीरे चारों ओर सरकने दो। किसी एक बिन्दु पर तुम्हारा अवधान टिक जायगा और तुम्हें सहज सुख की प्राप्ति होगी। वहाँ से ध्यान हटाने की इच्छा नहीं होगी। बस उसी बिन्दु पर तुम्हारा तीसरा नेत्र है। यह आवश्यक नहीं कि सभी का त्रिनेत्र बिल्कुल मध्य में हो। इसलिए अपने त्रिनेत्र को दूंढ़ना पड़ता है। जब मिल जाय तब अपना ध्यान उस पर टिका दो और साक्षी भाव से निहारते रहो घटने दो जो घटता है। विचारों के साथ तालमेल नहीं होनी चाहिए। तुम अनन्त में पहुँच जाओगे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड - समस्त लोक तुम्हारे ही अन्दर है उस पर विजय पालोगे।

विधि नं० 5 :

'सहज साधना' है। यह साधना सहज श्वास और योग