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क्या है भगवान शिव के 32 रहस्य?SHIVRATRI SPECIAL...


भगवान शिव के रहस्य;-

1-आदिनाथ शिव;-

09 POINTS;-

1-सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम

'आदिश' भी है।इस ‘आदिश’ शब्द से ही ‘आदेश’ शब्द बना है। नाथ साधु जब एक–दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश।

2-आइंस्टीन से पूर्व भगवान शिव ने ही कहा था कि ‘कल्पना’ ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया। भगवान शिव दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं। शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है।

3-आज से 15 से 20 हजार वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे थे, तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी। इस दौरान भगवान शंकर ने धरती के केंद्र कैलाश को अपना निवास स्थान बनाया। भगवान विष्णु ने समुद्र को और ब्रह्मा ने नदी के किनारे को अपना स्थान बनाया था।

4-पुराण कहते हैं कि जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है, जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था। इन तीनों से सब कुछ हो गया।

5-वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ और

इस तरह धीरे-धीरे जीवन भी फैलता गया।सर्वप्रथम भगवान शिव ने ही धरती पर जीवन के

प्रचार-प्रसार का प्रयास किया ।भगवान शिव के अलावा ब्रह्मा और विष्णु ने संपूर्ण धरती पर जीवन की उत्पत्ति और पालन का कार्य किया। सभी ने मिलकर धरती को रहने लायक बनाया और यहां देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष और मनुष्य की आबादी को बढ़ाया।

ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल तक देवता धरती पर रहते थे। महाभारत के बाद सभी अपने-अपने धाम चले गए। कलयुग के प्रारंभ होने के बाद देवता बस विग्रह रूप में ही रह गए अत: उनके विग्रहों की पूजा की जाती है।

6-पहले भगवान शिव थे रुद्र ... वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं। वराह काल के पूर्व के कालों में भी शिव थे। उन कालों की शिव की गाथा अलग है।

7-देवों के देव महादेव : देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। भगवान शिव दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं।

8-सन् 2007 में नेशनल जिओग्राफी की टीम ने भारत और अन्य जगह पर 20 से 22 फिट मानव के कंकाल ढूंढ निकाले हैं। भारत में मिले कंकाल को कुछ लोग भीम पुत्र घटोत्कच और कुछ लोग बकासुर का कंकाल मानते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार सतयुग में इस तरह के विशालकाय मानव हुआ करते थे। बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। पुराणों के अनुसार भारत में दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करती थी। भारत में मिले इस कंकाल के साथ एक शिलालेख भी मिला है। यह उस काल की ब्राह्मी लिपि का शिलालेख है।

9-इसमें लिखा है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अंत में भगवान शंकर ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई।

2-आदियोगी/योग के जन्मदाता;-

05 POINTS;-

1-योगिक परंपरा में शिव की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं की जाती है। वह आदियोगी, यानि पहले योगी और आदिगुरु, यानि पहले गुरु हैं, जिनसे योगिक विज्ञान जन्मा। दक्षिणायन की पहली पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा होती है, जब आदियोगी ने इस विज्ञान को अपने पहले सात शिष्यों, सप्तऋषियों को सौंपना शुरू किया।

2-आज जिस भी चीज़ को हम योग के नाम से जानते हैं, उसकी शुरुआत कई सालों पहले भगवान शिव द्वारा की गयी थी। वैज्ञानिक तथ्य भी यह बताते हैं कि करीब पचास हज़ार साल पहले इंसानों में बुद्धि और चेतना का अचानक विस्फोट सा हुआ, जो सामान्य विकास के क्रम में नहीं है। योगिक परंपरा के मुताबिक यही वो समय था जब हिमालय क्षेत्र में योगिक प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी।

3-आदियोगी ने अपने सात शिष्यों यानी सप्तऋषियों के साथ दक्षिण का रुख किया। उन्होंने जीवन-तंत्र की खोज करनी शुरू कर दी, जिसे आज हम योग कहते हैं।शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।

4-शिव तो जगत के गुरु हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया था। सप्त ऋषियों ने शिव से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया।एक ऋषि दक्षिण अमेरिका तो एक दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में चले गए। एक शिष्य ने कभी अपना मुंह नहीं खोला और न ही कोई उपदेश दिया, लेकिन उनकी मौजूदगी ने बड़े-बड़े काम किए। इन सातों ऋषियों ने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म, परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया गया हो। आज सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जाएगी।

5-परशुराम और रावण भी शिव के शिष्य थे। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत ‍की थी जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है। आदि गुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा और आगे बढ़ाया।आदियोगी ने बताया कि आपका जो वर्तमान ढांचा है, यही आपकी सीमा नहीं है। आप इस ढांचे को पार कर सकते हैं और जीवन के एक पूरी तरह से अलग पहलू की ओर बढ़ सकते हैं।

3-शिव एक महायोगी ;-

04 POINTS;-

1-शिव एक महायोगी हैं – अगर वह ध्यान में बैठ जाते हैं, तो वह हिलते नहीं हैं। साथ ही, वह हमेशा नशे की हालत में होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वह रोज भांग खाते है या नशा करते है। योग के विज्ञान में यह संभावना होती है कि आप शांत रहते हुए भी हर समय आनंद की चरम अवस्था में रह सकते हैं।

2-योगी आनंद के विरुद्ध नहीं होते। हां, वे छोटे-मोटे आनंद या सुख से संतुष्ट नहीं होना चाहते। वे लालची होते हैं। वे जानते हैं कि अगर आप एक गिलास शराब पीते हैं तो उससे आपको थोड़ा सा सुरूर होगा जो अगली सुबह सिरदर्द में बदल जाएगा। आप नशे का आनंद तभी उठा सकते हैं, जब आप नशे में चूर होते हुए भी सौ फीसदी स्थिर और सचेत रहें। प्रकृति ने आपको यह संभावना दी है।

3-एक इस्रायली वैज्ञानिक ने मानव मस्तिष्क पर कई वर्षों के शोध के बाद यह पाया कि मस्तिष्क में लाखों ऐसे ग्राहिकाएं हैं जो नशे को ग्रहण और महसूस करती हैं, जिन्हें कैनाबिस रिसेप्टर कहते हैं। फिर न्यूरोलॉजिस्टों ने पाया कि शरीर इन ग्राहिकाओं को संतुष्ट करने के लिए खुद एक नशीला रसायन विकसित कर सकता है।

4-जब उस वैज्ञानिक ने इस रसायन को एक सटीक नाम देना चाहा, तो उसने दुनिया भर के बहुत से ग्रंथ पढ़े। फिर उसे यह जान कर हैरानी हुई कि सिर्फ भारतीय ग्रंथों में आनंद का जिक्र मिलता है। इसलिए उसने उस रसायन को ‘आनंदामाइड’ नाम दिया।इसलिए आपको बस थोड़ा सा

आनंदामाइड पैदा करना है क्योंकि आपके अंदर नशे की पूरी की पूरी फसल है। अगर आप उसे ठीक से उगाएं और उसका पोषण करें, तो आप हर समय नशे में चूर रह सकते हैं।

4-शिव ही सर्वस्व;-

03 POINTS;-

1-शिव और शक्ति – ये परम तत्व के दो रूप है। शिव और शक्ति एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अधूरा है, शिव पुराण में कहा गया है

''शक्ति और शिव को सदा एक दूसरे की अपेक्षा रहती है। न शिव के बिना शक्ति रह सकती हैं और न शक्ति के बिना शिव रह सकते हैं।''

2-जो सृष्टि में है वही पिण्ड में है – ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।’ समस्त शरीरों का अन्तिम आधार एक परम आध्यात्मिक शक्ति है जो अपने मूल रूप में अद्वैत परमात्मा शिव से अभिन्न एवं तद्रूप है। समस्त शरीर एक स्वतः विकासमान दिव्य शक्ति की आत्माभिव्यक्ति है। वह शक्ति अद्वैत शिव से अभिन्न है।

3-वही आत्म चैतन्य आत्मानंद, अद्वैत परमात्मा अपने आत्म रूप में स्थित होती है तब शिव कहलाती है और जब सक्रिय होकर अपने को ब्रहमाण्ड रूप में परिणत कर लेती है तथा दिक, काल सीमित असंख्य पिण्डों की रचना, विकास तथा संहार में प्रवृत्त होती है, तथा अपने को अनेक रूपों में व्यक्त करती है, तब शक्ति कहलाती है। यह शक्ति पिण्ड में कुण्डलिनी के रूप में स्थित है। यही शक्ति महाकुण्डलिनी के रूप में ब्रह्माण्ड में स्थित है।

5-शिव-शक्ति का संयोग(पंचतत्वों का रहस्य);-

08 POINTS;-

1-शिव पुराण के अनुसार शिव-शक्ति का संयोग ही परमात्मा है। शिव की जो पराशक्ति है उससे चित्‌ शक्ति प्रकट होती है। चित्‌ शक्ति से आनंद शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, आनंद शक्ति से इच्छाशक्ति का उद्भव हुआ है, इच्छाशक्ति से ज्ञानशक्ति और ज्ञानशक्ति से पांचवीं क्रियाशक्ति प्रकट हुई है। इन्हीं से निवृत्ति आदि कलाएं उत्पन्न हुई हैं।

2-चित्‌ शक्ति से नाद और आनंद शक्ति से बिंदु का प्राकट्य बताया गया है। इच्छाशक्ति से 'म' कार प्रकट हुआ है। ज्ञानशक्ति से पांचवां स्वर 'उ' कार उत्पन्न हुआ है और क्रियाशक्ति से 'अ' कार की उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार प्रणव (ॐ) की उत्पत्ति हुई है।

3-शिव से ईशान उत्पन्न हुए हैं, ईशान से तत्पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ है। तत्पुरुष से अघोर का, अघोर से वामदेव का और वामदेव से सद्योजात का प्राकट्य हुआ है। इस आदि अक्षर प्रणव से ही मूलभूत पांच स्वर और तैंतीस व्यजंन के रूप में अड़तीस अक्षरों का प्रादुर्भाव हुआ है। उत्पत्ति क्रम में ईशान से शांत्यतीताकला उत्पन्न हुई है। ईशान से चित्‌ शक्ति द्वारा मिथुन पंचक की उत्पत्ति होती है।

4-अनुग्रह, तिरोभाव, संहार, स्थिति और सृष्टि इन पांच कृत्यों का हेतु होने के कारण उसे पंचक कहते हैं।These five are ‘srishti’ (creation), ‘sthiti’ (maintenance), ‘samhara’ (dissolution/transformation), ‘tirobhava’ (veiling) and ‘anugraha’ (grace).आकाशादि के क्रम से इन पांचों तत्व/मिथुनों की उत्पत्ति हुई है। इनमें पहला तत्व/मिथुन है आकाश, दूसरा वायु, तीसरा अग्नि, चौथा जल और पांचवां मिथुन पृथ्वी है।

5-आकाश में एकमात्र ''शब्द'' ही गुण है, वायु में 'शब्द और स्पर्श' दो गुण हैं, अग्नि में 'शब्द, स्पर्श और रूप' इन तीन गुणों की प्रधानता है, जल में 'शब्द, स्पर्श, रूप और रस' ये चार गुण माने गए हैं तथा पृथ्वी 'शब्द, स्पर्श, रूप , रस और गंध' इन पांच गुणों से संपन्न है। यही भूतों का व्यापकत्व कहा गया है।पांच भूतों (महत तत्व) का यह विस्तार ही सृष्टि रचना रहस्य कहलाता है।

6-उसी एक के पांचों मुख पूर्वा ,पश्चिमा, उत्तरा, दक्षिणा एवं ऊर्ध्वा दिक्भेद से क्रमश: तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव, अघोर एवं ईशान नामों से जाने जाते हैं। इस पंचवक्त्र शिव के 'प्रतिवक्त्रं भुजदयम' सिद्धांत से 10 हाथ हैं। इनमें अभय, टंक, शूल, वज्र, पाश, खड्ग, अंकुश, घंटा, नाद और अग्नि- ये 10 आयुध हैं।जब शिव विभोर हो उठते हैं तब वह नृत्य करने लगते हैं क्योंकि नृत्य उनका स्वानन्द है, स्वयं वह नृत्यमय हैं, नृत्य हैं। नृत्य करते समय वह अपना प्रिय वाद्य डमरू भी बजाते हैं। डमरू की ध्वनि से जीवों में आत्मा प्रविष्टï होती है। इस तरह डमरू सृष्टि के कण-कण, अणु-अणु में क्रिया एवं गति संचरण तथा शक्ति का विकास करती है। उनके पांव के थाप से पृथ्वी अन्न, कन्द-मूल-फल उपजाती है। 7-प्रदीप स्तोत्रम् के अनुसार जगत की रक्षा एवम् कल्याण के लिए शिव नित्य संध्या समय लास्य-नृत्य करते हैं। वस्तुत: उनका नृत्य कभी नहीं रुकता क्योंकि इसी से ब्रह्मïण्ड चलता है। यदि उनका नृत्य रुक जाये तो संपूर्ण सृष्टि नष्ट हो जायेगी। उनका नर्तन जीवन की जीवंतता का नृत्य है। उनका नृत्य, ताल, वाद्य सभी जीवन प्रदाता हैं, जीवन के प्रतीक हैं। 8-शिव सृजन, विलय, मृत्यु एवं पुनर्जन्म के उस अनंत चक्र के प्रतीक हैं जिसमें संपूर्ण ब्रह्मïण्ड क्रियाशील है। इस तरह उनके नृत्य में सृष्टि के लय एवं प्रलय का रहस्य समाहित है। शिव का स्वरूप ही ब्रह्मïण्डिक नर्तन है जो सृजन एवं विलय जैसी पराकाष्ठïओं एवं विरोधाभासी अनास्थाओं का प्रदर्शक है।

6-नटराज शिव;-

09 POINTS;-

1-नृत्य के देवता नटेश या नटराज, शिव के सबसे महत्वपूर्ण रूपों में से एक है। नटराज, दो शब्दों 'नट' यानी कला और राज से मिलकर बना है। इस स्वरूप में शिव कलाओं के आधार हैं।नटराज शिव के लय एवं नृत्य की विभिन्न गतियां हैं। वह स्वयं नर्तक और स्वयं ही दर्शक भी हैं। उनका नृत्य संगीतमय ..आदि शक्ति का विलास है जिससे लोगों का जीवन चलता है।शिव तांडव के भी दो प्रकार हैं। पहला है 'तांडव', शिव का ये रूप 'रुद्र' कहलाता है। जबकि दूसरा है 'आनंद-तांडव', शिव का ये रूप 'नटराज' कहलाता है। रुद्र रूप में शिव समूचे ब्रह्माण्ड के संहारक बन जाते हैं वहीं सर्न के बाहर लगी नटराज प्रतिमा 'सृष्टि निर्माण' का प्रतीक है। उनका नृत्य सृष्टि के आरंभ से अनवरत चल रहा है।

2-यह ईश्वर की पांच क्रियाओं – सृष्टिï, स्थिति, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह का द्योतक है।आनंद तांडव के भी पांच रूप हैं -1. 'सृष्टि' : निर्माण, रचना 2. 'स्थिति' : संरक्षण, समर्थन 3. 'संहार' : विनाश 4. तिरोभाव : मोह-माया 5. अनुग्रह : मुक्ति

3-शिव के बाएं हाथ में डमरू है। तांडव नृत्य के समय वे उसे बजाते हैं। पुरुष और प्रकृति के मिलन का नाम ही तांडव नृत्य है।उस समय अणु-अणु में क्रियाशीलता जागृत होती है और सृष्टि का निर्माण होता है।डमरू की ध्वनि से सृष्टि, संचरण, अग्नि से दुष्ट का संहार, अभयहस्त से भक्तों की रक्षा, ऊध्र्व पद से उन्हें मुक्ति की प्राप्ति होती है।उपर्युक्त पांच क्रियाओं में से प्रथम तीन सृष्टि, स्थिति, संहार, क्रमानुसार ब्रह्मï , विष्णु तथा रूद्र के पास हैं जबकि अनुग्रह तथा तिरोभाव महाशिव के पास।अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश उनके पांच मुख हैं। चित्त, स्पन्दन, ज्ञान, इच्छा तथा कृति उनकी पांच कलाएं।

4-पंच भूतों के अंतर्गत पृथ्वी संपूर्ण सृष्टि का कारण है उसी से सारे

भूतों की उत्पत्ति होती है। जितने भूत हैं सभी के शरीर का निर्माण पृथ्वी से ही होता है और पालन जल से, संपूर्ण भूतों का अंत अग्नि से होता है जो सभी कुछ क्षार कर देती है। वायु तथा आकाश के अंदर तिरोभाव तथा अनुग्रह शक्ति है। वायु किसी को भी उड़ा कर तिरोहित कर देती है। इस प्रकार सदाशिव पांच क्रियाओं या शक्तियों द्वारा समस्त विश्व की रक्षा करते हैं। 5-ब्रह्मï की अनन्त रात्रि में जब तक महाशिव की इच्छा न हो, प्रकृति स्थिर रहती है। अपनी निद्रा से जागकर नृत्य के माध्यम से तत्व में लय की लहर एवं नाद के स्वर द्वारा शिव ही क्रियाशीलता संचरित करते हैं। इस ब्रह्मïण्डीय नृत्य के माध्यम से समस्त अवयव अनन्त संचरण से संयुक्त हो जाते हैं। जब किसी युग में इस नृत्य की पूर्णता आती है तब अग्नि-रुद्र का जन्म होता है और नृत्य प्रलय-विनाश का कारण बनता है। यद्यपि यह एक कविता के लय की भांति है तथापि वैज्ञानिक सच्चाई भी है।

6-नटराज रूप सृष्टि के उल्लास और नृत्य यानी कंपन को दर्शाता है, जिसने शाश्वत स्थिरता और नि:शब्दता से खुद को उत्पन्न किया है। चिदंबरम मंदिर में स्थापित नटराज की मूर्ति बहुत प्रतीकात्मक है। क्योंकि जिसे आप चिदंबरम कहते हैं, वह पूर्ण स्थिरता है। इस मंदिर के रूप में यही बात प्रतिष्ठित की गई है कि सारी गति पूर्ण स्थिरता से ही पैदा हुई है। शास्त्रीय कलाएं इंसान के अंदर यही पूर्ण स्थिरता लाती हैं। स्थिरता के बिना सच्ची कला नहीं आ सकती।

7-नटराज शिव की प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति की चार भुजाएं हैं। उनके चारो ओर अग्नि का घेरा है। अपने एक पांव से शिव ने एक बौने को दबा रखा है। दूसरा पांव नृत्य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। शिव अपने दाहिने हाथ में डमरू पकड़े हुए हैं। डमरू की ध्वनि यहां सृजन का प्रतीक है। ऊपर की ओर उठे उनके दूसरे हाथ में अग्नि है। यहां अग्नि विनाश का प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि शिव ही एक हाथ से सृजन और दूसरे से विनाश करते हैं।

8-शिव का तीसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है। उनका चौथा बांया हाथ उनके उठे हुए पांव की ओर इशारा करता है, इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही मोक्ष है। शिव के पैरे के नीचे दबा बौना दानव अज्ञान का प्रतीक है, जो कि शिव द्वारा नष्ट किया जाता है। चारो ओर उठ रही लपटें इस ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। शिव की संपूर्ण आकृति ओंकार स्वरूप दिखाई पड़ती है। यह इस बात की ओर इशारा करती है कि 'ॐ' दरअसल शिव में ही निहित है।

9-जटाएं... शिव अंतरिक्ष के देवता हैं। उनका नाम व्योमकेश है अत: आकाश उनकी जटास्वरूप है। जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं। वायु आकाश में व्याप्त रहती है। सूर्यमंडल से ऊपर परमेष्ठि मंडल है। इसके अर्थतत्व को गंगा की संज्ञा दी गई है अत: गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्रस्वरूप उग्र और संहारक रूप धारक भी माने गए हैं।

7-आनन्दमूर्ति शिव;-

03 POINTS;- 1-शिव को आनन्दमूर्ति, अशान्त मन को शांत करने वाला-शंकर-कल्याणकर्ता कहा जाता है और शास्त्रों में सृष्टि प्रवर्तन को शिव-शिवा का लास्य नृत्य, इसका निवर्तन-तांडव-कहा गया है।पार्वती के साथ विवाह के अनन्तर शिव ने अपने शरीर में इसके दो भाग कर दिये हैं।पहला ताण्डव है और दूसरा लास्य। ताण्डव शंकर का नृत्य है-उद्धत। लास्य पार्वती का नृत्य है-सुकुमार तथा मनोहर।नटराज की नृत्यशाला यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड है।शिव ताण्डव रस भाव से विवर्तित था और पार्वती का किया लास्य रस भाव से समन्वित। सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह इन पांच ईश्वरीय क्रियाओं का द्योतक नटराज का नृत्य ही है।

2-शिव के आनंद तांडव के साथ ही सृजन का आरंभ होता है और रोद्र ताण्डव के साथ ही संपूर्ण विश्व शिव में पुनः समाहित हो जाता है।इस प्रकार शिव का नृत्य मात्र सृजन-सृष्टि और संहार का परिचायक नहीं अपितु काल के प्रत्येक क्षण में सृष्टि एवं विनाश का प्रतीक है जिसमें समस्त जीवन एवं दृश्य, कारण स्वरूप विद्यमान रहता है जो प्रकृति की परिवर्तनशीलता एवं समरूपता को इंगित करता है।

3-खगोलशास्त्री के अनुसार यह परमाणविक कणों के नर्तन का प्रतीक है। पाश्चात्य चिन्तक हेनरिख जीमर की मान्यता है कि शिव नृत्य की मुद्रायें, अवस्थायें एवं भंगिमायें ब्रह्मïण्डीय अस्पष्टता की सूचक हैं। उनकी हस्त-भंगिमा, पद-स्थिति, कटि-अवस्था यथार्थत: उस सतत् सृजन एवं विनाश की स्थिति के सूचक हैं जिसके परिणामस्वरूप उद्भव एवं विकास की नियंत्रित समायोजनात्मक स्थिति का, सृजन का निर्माण होता है । निस्सन्देह विनाश में ही नव-निर्माण के बीज अवगुंठित होते हैं और यही उनकी आधारशिला भी होती है।यही शिव के नर्तन का, तांडव का रहस्य है क्योंकि उनका नृत्य सृष्टि का विधान है और उसकी निवृत्ति प्रलय।

8-संगीत-नाट्य के आदि प्रवर्तक शिव;-

02 POINTS;-

1-संगीत-नाट्य के आदि प्रवर्तक हैं भगवान शिव। कहते हैं, कभी अपनेे नृत्य के बाद उन्होंने डमरू बजाया। डमरू की ध्वनि से ही शब्द ब्रह्म नाद हुआ। यही ध्वनि चौदह बार प्रतिध्वनित होकर व्याकरण शास्त्र के वाक् शक्ति के चौदह सूत्र हुए।महर्षि व्याघ्रपाद ने जब शिव से व्याकरण तत्व को ग्रहण किया तो इस माहेश्वरसूत्र की परम्परा के संवाहक बने पाणिनि।

2-आदि देव हैं भगवान शिव, देवों के भी देव, सुर-ताल के महान ज्ञाता। नृत्य की चरम परिणति शिव का ताण्डव ही तो है। नटराज जब नृत्य करते हैं तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वेश्वर की लीला का उच्छास उनके अंग-प्रत्यंग में थिरक उठता है। शिव का नृत्य तांडव है और पार्वती का लास्य। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार लास्य का अर्थ लीला या क्रीडा करना है।

9-भोलेनाथ;-

02 POINTS;-

1-शिव को हमेशा से एक बहुत शक्तिशाली प्राणी के रूप में देखा जाता रहा है। साथ ही, यह समझा जाता है कि वह सांसारिक रूप से बहुत चतुर नहीं हैं। इसलिए, शिव के एक रूप को भोलेनाथ कहा जाता है, क्योंकि वह किसी बच्चे की तरह हैं। ‘भोलेनाथ’ का मतलब है, मासूम या अज्ञानी। आप पाएंगे कि सबसे बुद्धिमान लोग भी बहुत आसानी से मूर्ख बन जाते हैं, क्योंकि वे छोटी-मोटी चीजों में अपनी बुद्धि नहीं लगा सकते।

2-बहुत कम बुद्धिमत्ता वाले चालाक और धूर्त लोग दुनिया में आसानी से किसी बुद्धिमान व्यक्ति को पछाड़ सकते हैं। यह धन-दौलत के अर्थ में या सामाजिक तौर पर मायने रख सकता है, मगर जीवन के संबंध में इस तरह की जीत का कोई महत्व नहीं है।बुद्धिमान से हमारा मतलब

स्मार्ट होने से नहीं है।इसका मतलब उस आयाम को स्वीकार करने से है, जो जीवन को पूर्ण रूप से घटित होने देता है, विकसित होने देता है। शिव भी ऐसे ही हैं।वो इस ब्रह्मïण्ड के सबसे बुद्धिमान प्राणी है, मगर वह हर छोटी-मोटी चीज में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करते।इसलिए ‘भोलेनाथ’ हैं।

10-अर्धनारीश्वर

05 POINTS;-

1-आम तौर पर, शिव को परम या पूर्ण पुरुष माना जाता है। मगर अर्धनारीश्वर रूप में, उनका आधा हिस्सा एक पूर्ण विकसित स्त्री का होता है। कहा जाता है कि अगर आपके अंदर की पौरुष यानी पुरुष-गुण और स्त्रैण यानी स्त्री-गुण मिल जाएं, तो आप परमानंद की स्थायी अवस्था में रहते हैं। अगर आप बाहरी तौर पर इसे करने की कोशिश करते हैं, तो वह टिकाऊ नहीं होता और उसके साथ आने वाली मुसीबतें कभी खत्म नहीं होतीं।

2-पौरुष और स्त्रैण का मतलब पुरुष और स्त्री नहीं है। ये खास गुण या विशेषताएं हैं। मुख्य रूप से यह दो लोगों के मिलन की चाह नहीं है, यह जीवन के दो पहलुओं के मिलन की चाह है, जो बाहरी और भीतरी तौर पर एक होना चाहते हैं। अगर आप भीतरी तौर पर इसे हासिल कर लें, तो बाहरी तौर पर यह सौ फीसदी अपने आप हो जाएगा। वरना, बाहरी तौर पर यह एक भयानक विवशता बन जाएगा।

3-यह रूप इस बात को दर्शाता है कि अगर आप चरम रूप में विकसित होते हैं, तो आप आधे पुरुष और आधी स्त्री होंगे। इसका मतलब हैं,कि आप एक पूर्ण विकसित पुरुष और एक पूर्ण विकसित स्त्री होंगे। तभी आप एक पूर्ण विकसित इंसान बन पाते हैं।

4-नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है। तीन मूलभूत नाड़ियों से 72,000 नाड़ियां निकलती हैं। इन नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं होता। यानी अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें नहीं खोज सकते। लेकिन जैसे-जैसे आप अधिक सजग होते हैं, आप देख सकते हैं कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह तय रास्तों से गुजर रही है।

5-प्राण या ऊर्जा 72,000 विभिन्न रास्तों से होकर गुजरती है। इड़ा और पिंगला जीवन के बुनियादी द्वैत के प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का/ अर्धनारीश्वर का नाम देते हैं। या आप इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित कह सकते हैं, या यह आपके दो पहलू ...तर्क-बुद्धि और सहज-ज्ञान हो सकते हैं।

11-कालभैरव शिव;-

02 POINTS;-

1-कालभैरव शिव का एक मारक या जानलेवा रूप है – जब उन्होंने समय के विनाश की मुद्रा अपना ली थी। सभी भौतिक हकीकतें समय के भीतर मौजूद होती हैं। अगर समय को नष्ट कर दिया जाए, तो सब कुछ नष्ट हो

जाएगा।शिव भैरवी-यातना को पैदा करने के लिए उपयुक्त वस्त्र धारण करके कालभैरव बन गए।

2-‘यातना’ का मतलब है, घोर पीड़ा। जब मृत्यु का पल आता है, तो बहुत से जीवनकाल पूरी तीव्रता में सामने आ जाते हैं, आपके साथ जो भी पीड़ा और कष्ट होना है, वह एक माइक्रोसेकेंड में ‍घटित हो जाएगा। उसके बाद, अतीत का कुछ भी आपके अंदर नहीं रह जाएगा। अपने ‘सॉफ्टवेयर’ को नष्ट करना कष्टदायक है। मगर मृत्यु के समय ऐसा होता है, इसलिए आपके पास कोई चारा नहीं होता। लेकिन वह इसे जितना हो सके, छोटा बना देते हैं। कष्ट को जल्दी से खत्म होना होता है। ऐसा तभी होगा, जब हम इसे अत्यंत तीव्र बना देंगे। अगर वह हल्का होगा, तो हमेशा चलता ही रहेगा।