Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

चित्‍त ही मंत्र है। प्रयत्‍न ही साधक है। गुरु उपाय है। शरीर हवि है। ज्ञान ही अन्‍न है। विद्या के संह


सूत्र:

चित्‍त ही मंत्र है। प्रयत्‍न ही साधक है। गुरु उपाय है। शरीर हवि है। ज्ञान ही अन्‍न है। विद्या के संहार से स्‍वप्‍न पैदा होते है।

चित्त ही मंत्र है।

मंत्र ही अर्थ है: जो बार—बार पुनरूक्ति करने से शक्‍ति को अर्जित करे; जिसकी पुनरुक्ति शक्ति बन जाये। जिस विचार को भी बार—बार पुनरुक्त करेंगे, वह धीरे—धीरे आचरण बन जायेगा। जिस विचार को बार—बार दोहराएंगे, जीवन में वह प्रगट होना शुरू हो जायेगा। जो भी आप हैं, वह अनंत बार कुछ विचारों के दोहराए जाने का परिणाम है। सम्मोहन पर बड़ी खोजें हुईं। आधुनिक मनोविज्ञान ने सम्मोहन के बड़े गहरे तलों को खोजा है।

सम्मोहन की प्रक्रिया का गहरा सूत्र एक ही है कि जिस विचार को भी वस्तु में रूपांतरित करना हो, उसे जितनी बार हो सके, दोहराओ। दोहराने से उसकी लीक बन जाती है; लीक बनने से मन का वही मार्ग बन जाता है। जैसे नदी बह जाती है, अगर एक गढ़ा खोदकर राह बना दी जाये, नहर बन जाती है—वैसे ही अगर मन में एक लीक बन जाये—किसी भी विचार की तो वह विचार परिणाम में आना शुरू हो जाता है।

फ्रांस में एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक हुआ—इमाइल कुए। उसने लाखों लोगों को केवल मंत्र के द्वारा ठीक किया। लाखों मरीज सारी दुनिया से कुए के पास पहुंचते थे। और उसका इलाज बड़ा छोटा था। वह सिर्फ मरीज को कहता था कि तुम यही दोहराए चले जाओ कि तुम बीमार नहीं हो, स्वस्थ हो, स्वस्थ हो रहे हो। रात सोते समय दोहराओ, सुबह उठते समय दोहराओ, दिन में जब स्मृति आ जाये तब दोहराओ। बस, एक विचार को दोहराते रहो कि मैं स्वस्थ हूं मैं निरंतर स्वस्थ हो रहा हूं। चमत्कार मालूम होता है कि कठिन—से—कठिन रोग के मरीज सिर्फ इस पुनरुक्ति से ठीक हुए। कुए के पास सारी दुनिया से लोग पहुंचने लगे। लेकिन बात तो बहुत छोटी है।

साधारणत: भी जब आप ठीक होते हैं बीमारी से, तो मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उसमें दवा का काम तो दस प्रतिशत होता है, नब्बे प्रतिशत तो पुनरुक्ति का काम होता है। दवा को दिन में चार बार लेते हैं, आठ बार लेते हैं। जब भी दवा को लेते हैं, तभी मन में यह भाव आता है कि अब मैं ठीक हो जाऊंगा; ठीक दवा मिल गयी है।

होम्योपैथी की गोलियों में कुछ भी नहीं है; लेकिन उससे उतने ही लोग ठीक होते हैं जितने ऐलोपैथी से। अच्छा डाक्टर अगर पानी भी दे दे तो आप ठीक हो जायेंगे; क्योंकि सवाल दवा का नहीं है, अच्छे डाक्टर पर भरोसा होता है। भरोसा पुनरुक्ति बन जाता है। आप जानते हैं कि अच्छे डाक्टर ने इलाज किया है। इसलिए जो डाक्टर आप से कम फीस लेता है, वह शायद आपको ठीक न कर पाये। इसलिए, जो डाक्टर आप से ज्यादा फीस लेता है, वही आपको ठीक कर पायेगा; क्योंकि जब ज्यादा जेब आपकी खाली होती है, तो भरोसा बढ़ता है—लगता है कि बड़ा डाक्टर है। और आप जैसे बड़े मरीज को बड़ा डाक्टर चाहिए। पुनरुक्ति…।

मनोवैज्ञानिक एक प्रयोग किये हैं, जिसे वे पलेसिबो (Placebo ) कहते हैं—झूठी दवा। और बड़ी हैरानी मालूम हुई। एक बीमारी के मरीज हैं पचास; पच्चीस को वास्तविक दवा दी गयी और पच्चीस को सिर्फ पानी दिया गया। लेकिन पता किसी को भी नहीं है कि किसको पानी दिया गया, किसको दवा दी गयी। मरीजों को पता नहीं। वे सभी दवा मानकर चल रहे हैं। हैरानी हुई कि जितने दवा से ठीक हुए, उतने ही पानी से भी ठीक हुए। प्रतिशत बराबर वही रहा। इसलिए, जब कभी पहली बार कोई दवा खोजी जाती है तो उससे बहुत मरीज ठीक होते हैं। फिर धीरे—धीरे यह संख्या कम हो जाती है। इसलिए, हर दवा दो—तीन साल से ज्यादा नहीं चलती। क्योंकि जब पहली दफा दवा खोजी जाती है तो बड़ा भरोसा पैदा होता है कि अब खोज ली गई असली दवा। सारी दुनिया में मरीज उससे प्रभावित होते हैं। फिर धीरे— धीरे भरोसा कम होने लगता हैं; क्योंकि कभी कोई मरीज उससे ठीक भी नहीं होता। कभी कोई जिद्दी मरीज मिल जाता है, तो सुनता ही नहीं दवा की, न डाक्टर की। उसके कारण दूसरे मरीजों का भरोसा भी क्षीण होने लगता है। धीरे—धीरे दवा का प्रभाव खो जाता है। इसलिए हर दो साल में नयी दवाएं खोजनी पड़ती है।

दवाओं का प्रभाव, विज्ञापन ठीक से किया जाये, तो ही होता है। तो हर अखबार, पत्रिका, रेडियो, टेलीविजन—सब तरफ से प्रचार होना चाहिए। प्रचार ज्यादा कारगर है, जितनी दवा के तत्व, उससे ज्यादा। क्योंकि, वही प्रचार आपको सम्मोहित करेगा। वही प्रचार मंत्र बन जाता है। अखबार खोला और ‘ऐस्‍प्रो’, रेडियो खोला और ‘ऐस्प्रो’, टेलीविजन पर गये और ‘ऐस्‍प्रो’, बाजार में निकले और बोर्ड, ‘ऐस्‍प्रो’ —जो कुछ भी करें, ऐस्‍प्रो पीछा करती है। वह सिरदर्द से भी बड़ा सिरदर्द बन जाती है; फिर वह सिरदर्द को हरा देती है।

पुनरुक्ति शक्ति पैदा करती है। मंत्र का अर्थ है: किसी चीज को बार—बार दोहराना। यह सूत्र कह रहा है: चित्त ही मंत्र है—चित्त मंत्र:। यह कहता है, और किसी मंत्र की जरूरत नहीं; अगर तुम चित्त को समझ लो तो चित्त की प्रक्रिया ही पुनरुक्ति है। तुम्हारा मन कर क्या रहा है जन्मों—जन्मों से—सिर्फ दोहरा रहा है। सुबह से सांझ तक तुम करते क्या हो—रोज वही दोहराते हो, जो तुमने कल किया था, जो परसों किया था, वही तुम आज कर रहे हो; वही तुम कल भी करोगे, अगर न बदले। और तुम जितना वही करते जाओगे उतनी ही पुनरुक्ति प्रगाढ होती जायेगी और तुम झंझट में इस तरह फंस जाओगे कि बाहर आना मुश्किल हो जायेगा।

लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि सिगरेट नहीं छूटती। सिगरेट मंत्र बन गयी है। उन्होंने इतनी बार दोहराया है—दिन में दो पैकेट पी रहे है। इसका मतलब हुआ कि चौबीस बार दोहरा रहे है; बीस बार दोहरा रहे हैं, बार—बार दोहराया है और सालों से दोहरा रहे है; आज अचानक छोड़ देना चाहते हैं। लेकिन जो चीज मंत्र बन गयी, उसको अचानक नहीं छोड़ा जा सकता। तुम छोड़ दोगे इससे क्या फर्क पड़ता है; पूरा मन मांग करेगा। पूरा शरीर उसको दोहरायेगा। वह कहेगा—चाहिए। उसी को तुम तलफ कहते हो। तलफ का मतलब हुआ कि जिस चीज को तुमने मंत्र बना लिया, उसे अचानक छोड़ना चाहते हो—यह नहीं हो सकता। तलफ का मतलब है कि जो चीज मंत्र बन गयी है, उसके विपरीत मंत्र से तोड़ना होगा।

रूस में पावलव ने इस पर बहुत काम किया। और पावलव अकेला आदमी है, जिसने तलफ वाले मरीजों को ठीक करने में सफलता पायी। अगर आप सिगरेट पीने के रोगी हो गये हैं छोड़ना चाहते हैं और नहीं छूटती तो पावलव मंत्र का प्रयोग करता था। उसके मंत्र जरा तेज थे। वह आपको सिगरेट देगा और जैसे ही आप सिगरेट हाथ में लेंगे, आपको बिजली का शाक लगेगा; झनझना जायेगी पूरी तबीयत, सिगरेट हाथ से छूट जायेगी। ऐसा सात दिन आपको पावलव भरती रखेगा अपने अस्पताल में और जब भी आप सिगरेट पियेंगे, तब बिजली का शाक लगेगा। सात दिन में मंत्र सिगरेट से ज्यादा गहरा हो जायेगा। सिगरेट का नाम ही सुनकर आपको कंपकंपी आने लगेगी। पीने का रस तो दूर, एक वैराग्य का उदय हो जायेगा। पावलव ने हजारों मरीज विपरीत मंत्र से ठीक किये। और पावलव कहता है कि जो लोग भी आदतों से ग्रस्त हो गये हैं, जब तक उनको विपरीत आदतें न दी जायें, जो पहली आदत से ज्यादा मजबूत हों तब तक कोई छुटकारा नहीं।

तुम्हारा जीवन जैसा भी है, तुम्हारे मन का ही परिणाम है। और तुम दोहराये चले जाते हो। तुम क्रोध से बाहर भी होना चाहते हो, लेकिन तुम रोज क्रोध को दोहराये चले जाते हो। जितना दोहराते हो उतना मजबूत हो रहा है। कितनी बार तुम कसमें खाते हो कि अब नहीं करूंगा और कसमें टूट जाती हैं और क्रोध फिर करते हो। उपद्रव और भी बढ़ गया। इससे तो बेहतर था कि कसम तुमने न खायी होती; क्योंकि अब यह दोहरा मंत्र हो गया। अब तुम जानते हो कि क्रोध कसम से ज्यादा बड़ा है, ज्यादा ताकतवर है। कसमों का कोई मूल्य नहीं है। तुम कितना ही व्रत लो, तुम्हारे व्रत दो कौड़ी’ के है, क्रोध ज्यादा सबल है। यह भी सम्मोहन बैठ गया। अब तुम जब कसम भी लोगे, व्रत भी लोगे तब भी तुम जानते हो भीतर कि यह सधने वाली नहीं है। तुम भीतर दोहरा रहे हो, उसी समय भी कि यह होगा नहीं; मैं ले तो रहा हूं लेकिन यह होगा नहीं।

भूलकर भी व्रत मत लेना, अगर उसे पूरा न कर सको। उससे तो बेहतर है कि तुम अपनी एक ही आदत से भरे रहना। व्रत लेकर और तोड़ना बहुत महंगा धंधा है; क्योंकि तोड़ने की भी आदत बन रही है। फिर तुम जीवन में कभी भी व्रत न ले पाओगे। तथाकथित धार्मिक गुरुओं ने तुम्हें बहुत अधार्मिक बनाया है; क्योंकि वे सस्ते में व्रत दे देते हैं। तुम मंदिर गये, तुम साधु के पास गये, मुनि के पास गये और वह कहता है कि कोई व्रत लो। उसके प्रभाव में, मंदिर की शांति में और फिर अहंकार में कि जब साधु कह रहा है तो यह कहना कि मैं कोई भी व्रत नहीं ले सकूंगा, बड़ी दीनता मालूम पड़ती है। तो तुम कहते हो कि आज से सिगरेट छोड देंगे।

मेरे एक मित्र हैं। उनका दिमाग जरा खराब है; लेकिन आपसे बेहतर हैं। वे एक मुनि के पास गये—जैन है—तो मुनि ने कहा कि कोई व्रत लो तो उन्होंने कहा कि अच्छी बात है, ले लिया। मुनि ने कहा कि क्या लिया। उन्होंने कहा कि आज से बीडी पीया करेंगे। दिमाग उनका खराब है; लेकिन व्रत का उन्होंने पालन किया है। वे तब तक बीड़ी पीते नहीं थे। और मैं आपको कहता हूं कि वे ज्यादा फायदे में रहे बजाय उस आदमी के, जिसने नियम लिया कि मैं बीड़ी नहीं पीऊंगा और फिर बीड़ी पीनी शुरू कर दी। उसका व्रत भी टूट गया। उसकी आत्मग्लानि बढ़ गयी। कम—से—कम वे सफल तो हुए। दिमाग उनका खराब हो; पर आपसे बेहतर हैं। कम—से—कम इतना तो है कि व्रत पूरा किया है।

इससे, जब भी व्रत टूटता है तो आत्मग्लानि पैदा होती है, अपराध पैदा होता है। और जितनी आत्मग्लानि पैदा होती है, अपराध पैदा होता है, उतना तुम दीन होते जाते हो। और आत्‍मा तो उसको मिलेगी जो सम्राट है, जो दीन नहीं है। तुम आत्मा से दूर हटते जाते हो। मन का स्वरूप समझो, तो यह सूत्र समझ में आ जायेगा—मन की सारी कला पुनरुक्ति है। मन मंत्र है। जो—जो तुमने दोहराया है, वही तुम्हारी आदत बन गयी है। जो—जो तुम दोहराते रहोगे, वही तुम्हारे जीवन में आता रहेगा। जन्मों—जन्मों से तुमने एक ही बात दोहरायी है, वही बात तुम्हें बार—बार उपलब्ध हो जाती है। और, तुम गलत को दोहराने से बंधे हो।

क्या करना है? पहली बात—गलत को तोड़ने को जल्दी मत करना। बेहतर यह होगा कि गलत को तोड़ने की बजाय, तुम सही को करने की कोशिश करना। नया मंत्र सीखना। तुम सिगरेट पीते हो, कोई हर्जा नहीं; तुम ध्यान सीखना। सिगरेट ध्यान में जरा भी बाधा नहीं है। तुम ध्यान सीखना। तुम ध्यान के मंत्र को सघन करना। जिस दिन ध्यान के मंत्र में तुम सफल हो जाओगे, उस दिन तुम्हें आत्म—गौरव उपलब्ध होगा। उस आत्म—गौरव और ध्यान की सफलता में सिगरेट को छोड़ना आसान हो जायेगा; क्योंकि तुमने एक विधायक मंत्र पूरा कर लिया।

नकारात्मक मत बनना, अन्यथा तुम मुश्किल में पड़ोगे। पश्राताप, पाप, पीड़ा और उदासी पकड़ लेगी।तुम्हारे साधु, जो मंदिरों में बैठे हैं, सब उदास हैं। उनके जीवन में कोई हंसी नहीं है, कोई खुशी नहीं है, कोई प्रसन्नता, कोई उछल्लता नहीं है; क्योंकि उन्होंने नकारात्मक मंत्रों का उपयोग किया है। निगेटिव उनकी खोज है। क्या—क्या गलत है, वह उन्होंने छोड़ा है।

मैं तुमसे कहता हूं कि गलत को छोड़ने की जल्दी मत करना; तुम ठीक को पकड़ने की जल्दी करना।जिस दिन ठीक तुम्हें पकड़ जायेगा, गलत को छोड़ना बहुत आसान हो जायेगा। तुम बीमारी से मत लड़ना; तुम स्वास्थ्य को पाने की कोशिश करना। वही कुए अपने मरीजों को कह रहा है। वह कह रहा है कि ‘मैं स्वस्थ हो रहा हूं, —तुम यही भाव दोहराओ।

उलटा, विपरीत भी तुम कर सकते हो। तुम्हारे सिर में दर्द है, तुम यह कह सकते हो कि नहीं, मुझे सिरदर्द नहीं है। लेकिन जितनी बार तुम यह कहोगे, उतनी ही बार तुम ‘सिरदर्द’ शब्द को भी दोहरा रहे हो। और जितनी बौर तुम कहोगे किए ‘सिरदर्द नहीं है ‘, अगर सिरदर्द है तो तुम्हारे कहने से क्या होगा! भीतर तो तुम जानते हो कि तुम्हारा कहना झूठ है। ऊपर तुम कितना ही कहो कि सिरदर्द नहीं है; लेकिन सिरदर्द हो रहा है। भीतर तो तुम यही कहोगे कि हो रहा है। यह कुए कहता है तो दोहरा रहे हैं; लेकिन सिरदर्द हो रहा है। कुए के कहने से तुम्हारा सिरदर्द नहीं मिटेगा; तुम्हारा सिरदर्द तो तुम्हारी भीतरी प्रक्रिया से ही मिटेगा। न, नकारात्मक शब्द पकड़ना ही मत।

इसलिए, मैं कहता हूं कि संसार को छोड़ने की कोशिश मत करना; परमात्मा को पाने की कोशिश करना। इसलिए, मैं कहता हूं त्याग की दिशा में मत जाना; परम भोग की खोज करना। क्या गलत है, उस पर आंख मत गड़ाना क्योंकि गलत को छोड़ने के लिए भी तो गलत को देखना पड़ता है, बार—बार; और जितना तुम देखते हो, उतना ही मंत्र दोहराया जा रहा है। और, जिस चीज को भी तुम देखते रहते हो, उससे तुम सम्मोहित हो जाते हो।

दुनियाभर में बहुत खोजबीन चली है—कार के ऐक्सीडेंटों के बाबत; क्योंकि अब कार के ऐक्सीडेंट से उतने आदमी मर रहे हैं, जितने युद्धों में भी नहीं मर रहे हैं। तो दूसरे महायुद्ध में एक साल में जितने आदमी मरे, उससे दुगने आदमी सिर्फ कार के ऐक्सीडेंट से मर रहे है सारी दुनिया में। बहुत बड़ी संख्या है। कुछ करना जरूरी है। और बहुत—सी बातें प्रकाश में आयी हैं। उसमें एक बात तो यह प्रकाश में आयी है कि कार के ऐक्सीडेंट अक्सर रात बारह बजे और तीन बजे के बीच में होते हैं। पचास प्रतिशत ऐक्सीडेंट, दुर्घटनाएं रात बारह बजे और तीन बजे के बीच में होती है; क्योंकि वह समय निद्रा का समय है और मन तंद्रा में हो जाता है, होश खो जाता है। उस होश के खोये क्षण में सम्मोहन बिलकुल आसान है। और ड्राईवर सम्मोहित हो जाता है; क्योंकि कार की पुनरुक्त होती आवाज, वही आवाज बार—बार दोहर रही है। रास्ते पर आंख गड़ी है, वही रास्ता सैकड़ों मील तक दिखायी पड़ रहा है। और, मनोवैज्ञानिक कहते है कि रास्तों पर जो बीच में सफेद लकीर डाली जाती है, उसके कारण हजारों लोग मर रहे हैं। क्योंकि उस लकीर को देखते, देखते—ड्राईवर उसको देखता रहता है और सम्मोहित हो जाता है। फिर वह होश में नहीं है; वह नशे में है।

बारह और तीन के बीच वैसे ही नींद का वक्त, कार की एक—ही—सी गूंजती आवाज ऊब पैदा करती है निद्रा लाती है, मंत्र बन जाती है। फिर एक ही रास्ता और रात में बेरौनक क्योंकि न आसपास के वृक्ष दिखायी पड़ते है, न पहाड़ दिखायी पड़ते हैं, सिर्फ रास्ता दिखायी पड़ता है। और फिर बीच में पड़ी सीधी लकीर…।

एक छोटा—सा प्रयोग करके देखना। एक मुर्गी को टेबल पर रखना। एक सीधी लकीर खींच देना। मुर्गी को गर्दन झुकाकर लकीर पर लगा देना, ताकि लकीर उसको दिखायी पड़ने लगे। फिर तुम उसे छोड़ देना। मुर्गी वहीं रुकी रहेगी। फिर वह हटेगी नहीं; वह सम्मोहित हो गयी। वह घंटों वैसी बैठी रहेगी। वह लकीर से पकड़ गयी; लकीर ने उसे पकड़ लिया।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ड्राईवर को लकीर पकड़ लेती है बीच में। इसलिए वे कहते है, रास्ते सीधे मत बनाओ; रास्ते में भेद होना चाहिए, ताकि तंद्रा टूटे और एक—सी पुनरुक्ति नहीं होनी चाहिए। वे यह भी सुझाव देते है कि कार की आवाज भी बीच—बीच में थोड़ी बदले तो ठीक होगा। बदलाहट से तंद्रा टूटेगी और सैकंडो दुर्घटनाएं कम हो जायेंगी।

तुम्हारी जिंदगी की भी दुर्घटनाएं सैकडो कम हो सकती है। एक तो गलत पर तुम नजर मत बांधो; क्योंकि जिसको तुम देखोगे, वह तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होता जाता है। तुम गलत पर नजर बांधने के आदी हो। तुम्हारे भीतर जो—जो बुरा है, उसी पर तुम ध्यान देते हो। क्रोधी अक्सर क्रोध पर ध्यान देता है कि कैसे छुटकारा पाऊं हालांकि वह सोचता है कि मैं छुटकारा पाने के लिए ध्यान दे रहा हूं। लेकिन उसे पता नहीं कि जितना तुम क्रोध पर ध्यान दे रहे हो, उतना ही तुम क्रोध को लकीर से सम्मोहित हो जाओगे। कामी कामवासना पर ध्यान लगाये रखता है।

मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन का हो गया—सौ साल की उम्र का हो गया। पत्रकार उसके घर आये, उसकी भेंट लेने; क्योंकि वह अकेला आदमी था, जो उस इलाके में सौ साल का हो गया था। उन्होंने कई प्रश्‍न पूछे। उनमें एक प्रश्‍न यह भी था कि तुम्हारा स्त्रियों के संबंध में क्या खयाल है। नसरुद्दीन ने कहा कि यह बात ही मत पूछो मुझसे। तीन दिन पहले ही मैंने उनके संबंध में सोचना बंद कर दिया।

सौ साल का आदमी, वह भी अभी तीन दिन पहले तक उनके संबंध में ही सोच रहा था। स्‍त्री पकडे रहेगी; क्योंकि तुम उससे छूटना चाहते हो। वह तुम्हारा नकारात्मक मंत्र बन गया। तुम जिससे छूटना चाहते हो, उससे तुम छूट न पाओगे। गलत को देखने अगर तुम लग गये तो तुम गलत पर ध्यान कर रहे हो।

महावीर ने ध्यान के चार रूप कहे हैं—दों गलत, दो सही। दुनिया में किसी भी आदमी ने गलत को ध्यान नहीं कहा है; महावीर ने कहा है। मनोवैज्ञानिक उनसे राजी होंगे। उन्होंने कहा है कि गलत ध्यान भी ध्यान तो है ही; जैसे क्रोधी ध्यानमग्न हो जाता है, क्योंकि क्रोध में सारी दुनिया मिट जाती है। क्रोध में चित्त एकाग्र हो जाता है। इसलिए, क्रोध मे बड़ी शक्ति आ जाती है।

तुमने कभी खयाल किया—क्रोधी आदमी अपने से दुगने ताकतवर आदमी को उठाकर फेंक देगा क्रोध में। होश में न होता, क्रोध में न होता तो पच्चीस दफा सोचता कि इस आदमी से झंझट लेनी कि नहीं, दुगना ताकतवर है। क्रोध में आदमी बड़ी—से बड़ी चट्टान सरका देता है; होश में सोच भी नहीं सकता। क्रोध में आदमी कुछ भी कर लेता है; क्रोध में सारी शक्ति जग जाती है। क्या होता है? बंटती हुई शक्ति जो सब तरफ जा रही थी, वह एकाग्र हो जाती है। जैसे सूरज की किरणें इकट्ठी हो जायें तो आग पैदा हो जाती है, ऐसा क्रोध में चित्त इकट्ठा हो जाता है, आग पैदा हो जाती है। महावीर ने उसको भी ध्यान कहा है।

महावीर ने कहा है: आर्द्र और रौद्र, दो गलत ध्यान हैं। दुख में भी आदमी ध्यानमग्न हो जाता है। कोई मर गया—तब तुम रोते हो, चीखते हो, चिल्लाते हो—बस एक पर ही ध्यान अटक जाता है।

गलत ध्यान से बचना। और, तुम सभी गलत ध्यान में लगे हो। तुम्हारे जीवन की तकलीफ ही यही हैं, मूल पीड़ा और बीमारी यही है कि तुमने अपनी आंखें गलत पर जमा ली है। क्या—क्या गलत है, उसे छोड़ना है; और तुम सोच रहे हो कि छोड़ने के लिए ही तुम यह कर रहे हो। इस ध्यान के कारण ही तुम नहीं छोड़ पा रहे हो।

मैं तुमसे कहता हूं कि संसार की फिक्र ही छोड़ दो; तुम परमात्मा पर ध्यान लगाओ। तुम क्रोधी हो—सारी दुनिया क्रोधी है—क्रोध पर आंखें मत गड़ाओ करुणा पर आंखें गड़ाओ। तुम, जो सही है, उसको ध्यान में लाओ और जैसे—जैसे सही में शक्ति बढ़ेगी, गलत से शक्ति विसर्जित हो जायेगी। क्योंकि, शक्ति तो एक ही है, उसे तुम दोनों तरफ नहीं लगा सकते। अगर तुमने शांत होने की चेष्टा पर ध्यान लगा दिया तो जब तुम अशांत होना चाहोगे, तब तुम पाओगे कि वह शक्ति तुम्हारे पास है; वह शांति की तरफ बह गयी। और, जिसने शांति का स्वाद ले लिया, वह अशांत होना क्यों चाहेगा। अशांत तो वही होता है, जिसने शांति का स्वाद नहीं लिया। जिसने परमात्‍मा का रस नहीं लिया, वही संसार में डूबता है, लिप्त होता है।

इसे बहुत ठीक से खयाल में ले लो।

नकार से बचना। नहीं से बचना। बुरे को छोड़ने की फिक्र ही मत करना; क्योंकि छोड़ने में ही तुम सम्मोहित हो जाओगे और बुरे को तुम कभी भी न छोड़ पाओगे। जिसको भी हम छोड़ना चाहते हैं, उसमें एक पकड़ आ जाती

मैंने सुना है कि एक आदमी एक होटल में मेहमान हुआ। मैनेजर ने कहा: ‘हम दे न सकेंगे कमरा । कमरा तो खाली है; लेकिन उसके नीचे एक आदमी ठहरे हुए हैं, वे बहुत उपद्रवी हैं। जरा—सी भी आवाज ऊपर हो गयी, तो वे बखेड़ा खड़ा कर देंगे। उनकी वजह से ऊपर का कमरा हमने खाली ही छोड़ दिया है।

उस आदमी ने कहा कि चिंता आप न करें, मैं तो बाजार में दिनभर उलझा रहूंगा। रात कोई ग्यारह—बारह बजे लौटकर सो जाऊंगा। तीन बजे की मुझे गाड़ी पकड़नी है। तीन घंटे मुश्किल से मैं इस कमरे में रहूंगा। कोई कारण नहीं है मेरे द्वारा उपद्रव होने का। फिर मैं ध्यान भी रखूंगा। आपने बता दिया तो ठीक किया।

वह आदमी रात बारह बजे थका—मादा बाजार में काम करके लौटा। बिस्तर पर बैठा। एक जूता छोड्कर उसने पटका, फर्श पर गिरा तो उसे खयाल आया कि कहीं उस आदमी की नींद न टूट जाये। उसने दूसरा चुपचाप रखा और सो गया। कोई पंद्रह मिनट बाद नीचे के आदमी ने आकर दस्तक दी। दरवाजा खोला तो वह आदमी क्रोध से कैप रहा था। यह घबड़ा गया कि रात, अंधेरा, अब क्या किया जाये! उसने कहा कि क्या भूल हो गयी; मैं तो सो गया था। उस आदमी ने कहा. ‘भूल! दूसरे जूते का क्या हुआ? पहला गिरा, मैंने कहा कि आ गये। फिर दूसरे का क्या हुआ? मैं सो ही नहीं पा रहा हूं। वह दूसरा जूता सिर पर लटका हुआ है। तो पूछ लूं पता चल जाये, निश्‍चितता हो।’

सबने दूसरा का लटका लिया है—वह नकार का है। यह छोडना है, यह छोड़ना है, यह बुरा है—इतनी बुराइयां है कि जीवन छोटा मालूम पड़ता है, तुम छोड़ न पाओगे। जगह—जगह बुराई है, कोने—कोने में बुराई है, सारा जीवन बुराई से भरा है। और तुम्हारे साधु—संत तुम्हें सिर्फ अपराध से भरते हैं; क्योंकि वे तुमसे कहते हैं कि यह गलत, यह गलत, यह गलत। उनसे सही की तो तुम खबर ही न पाओगे; क्योंकि वे कहते हैं कि जब तक गलत न छूटेगा, तब तक सही तुम्हें मिलेगा भी कैसे? और उनकी बात तर्कयुक्त मालूम पड़ती है। वे यह कह रहे हैं कि जब तक अंधेरा न जायेगा, तब तक प्रकाश जलेगा कैसे!

और, मैं तुमसे कहता हूं कि अगर तुमने उनकी बात सुन ली, वह कितनी ही तर्कयुक्त मालूम पड़ती हो, तो तुम भटक जाओगे जन्मों—जन्मों तक। उन्हीं की बात से तुम भटके हुए हो। तुम्हें शैतानों ने नहीं भटकाया है; तुम्हारे तथाकथित संतों ने भटकाया है। क्योंकि, बात तर्कयुक्त लगती है कि जब तक गलत न छूटेगा; ठीक कैसे मिलेगा!

लेकिन कभी तुमने कोशिश की है अंधेरे को हटाने की? पहले अंधेरा हट जाये, फिर तुम दीया जलाओगे तो फिर तुम कभी न जला पाओगे। मैं तुमसे कहता हूं तुम दीया जलाना। अंधेरे की तुम बात ही मत करो; क्योंकि दीया जलते ही अंधेरा हट जाता है। तुम प्रकाश लाओ; अंधेरे पर ध्यान मत करो। दुनिया में कोई अंधेरे को कभी नहीं हटा पाया। बुराई कभी नहीं हटायी जा सकती; भलाई लायी जा सकती है।संसार कभी नहीं छोडा जा सकता; आत्मा पायी जा सकती है। और आत्मा के पाते ही संसार छूट जाता है। हम उसे पक्के ही इसलिए हैं ?? उससे बेहतर हमें दिखाई नहीं पड़ता। और जब तक बेहतर न दिखाई पड़ जाये, तब तक तुम उसे छोडोगे भी कैसे? तुम छोडना भी चाहोगे, तो भी तुम छोड़ न पाओगे। तुम लड़ोगे, परेशान होओगे तुम अपने को थका लोगे, मिटा लोगे; लेकिन कहीं पहुंचोगे नहीं। तुम्हारी जिंदगी एक व्यर्थ की दौडूधूप हो जायेगी। फिर तुम उतर आओगे शरीर में, फिर वही चक्र शुरू हो जायेगा। इससे जो बच गया—बुराई पर ध्यान देने से—वह भलाई को उपलब्ध हो जाता है। चित्त मंत्र है—चाहे बुराई के लिए उपयोग कर लो, चाहे भलाई के लिए। पुनरुक्ति शक्ति बन जाती है। तुमसे क्रोध होता है, स्वीकार कर लो। कितनी बार क्रोध होता है? तुम क्रोध का पश्रात्ताप भी मत करो। तुम क्रोध से लड़ो भी मत। जितनी बार क्रोध हो, उतनी बार करुणा के कृत्य भी करो। जितनी बार लोगों को तुमसे हानि पहुंचती हो, उतनी बार लोगों को तुम लाभ भी पहुंचाओ। तुम जरा लोगों को लाभ पहुंचाने का रस भी लो। बुराई के लिए अपने को दंड मत दो; भलाई का पुरस्कार भोगो। बुराई के लिए अपने को कष्ट मत दो; थोड़ा भला करो—उसका स्वाद लो। अगर तुमसे किसी के प्रति गाली निकल गयी है, तो जाकर किसी की प्रशंसा करो; किसी के गुण भी गाओ। गाली का रस तुमने काफी लिया है, अब किसी की गुणग्राहकता का रस भी लो।

कांटों से मत उलझो, वे हैं; ध्यान फूलों पर दो। एक दफा कांटों से तुम उलझ गये, तो फूलों तक तुम पहुंच ही न पाओगे। कांटे बहुत हैं। और जब तक तुम पहुंचोगे, तब तक तुम इतने लहूलुहान हो जाओगे कि फूल भी तुम्हें सुख न दे सकेंगे। और फूलों का भी जो स्पर्श है, वह तुम्हें पुलकित न करेगा। तुम घावों से भर गये होओगे।’’ फूल भी कष्ट देंगे; क्योंकि घाव अगर पहले से ही लगा हो तो फूल भी पीड़ा देगा। कांटों पर ध्यान मत दो; ध्यान फूल पर दो। और अगर तुम फूल के रस में डूब गये तो तुम एक दिन पाओगे कि कांटे है ही नहीं क्योंकि फूल के रस में जो डूब जाये, उसे कांटा भी चुभ नहीं सकता। असली सवाल फूल के रस में डूबने का है; विस्मय—विमुग्ध हो जाने का है। असली बात परमात्‍मा की शराब पी लेने की है, तब तुम्हें इस संसार की शराबें आकर्षित न करेंगी। अन्यथा तुम लड़ोगे उन्हीं से और उन्हीं से पराजित होओगे।

बुराई से जो लड़ता है, वह बुराई से पराजित होता है। बुराई से लड़नेवाला मन बुराई को मंत्र बना लेता है; क्योंकि चित्त मंत्र है। चित्त की इस प्रक्रिया को समझो कि चित्त दोहराता है।

तुमने कभी खयाल किया? एक सात दिन अपने चित्त का निरीक्षण करो, लिखो—चित्त जो—जो दोहरात है। और तुम पाओगे एक वर्तुलाकार चित्त का भ्रमण है। अगर तुम ठीक से निरीक्षण करोगे तो तुम पाओगे—जैसे रात आती है, दिन आता है, सुबह होती है, सांझ होती है, ऐसे ही चित्त में क्रोध का बंधा हुआ समय है; प्रेम का बंधा हुआ समय है; कामवासना का बंधा हुआ समय है; लोभ का बंधा हुआ समय है। ठीक उसी समय पर लोभ तुम्हें पकड़ता है, जैसे भूख पकड़ती है; लेकिन तुमने कभी निरीक्षण नहीं किया। अन्यथा तुम अपना अट्ठाइस दिन का कलेंडर बना सकते हो और तुम लिख सकते हो कि सोमवार की सुबह असे सावधान! पली—बच्चे घर में जान सकते हैं; सोमवार की सुबह पिताजी से जरा दूर रहना। और, इसका उपयोग हो सकता है; क्योंकि सोमवार की सुबह अगर ठीक से निरीक्षण तुमने किया कुछ दिन तक, तो तुम पकड़ लोगे वह बिंदु, जहां वर्तुल की तरह तुम्हारा मन घूमता है। शरीर ही वर्तुलाकार नहीं है, मन भी वर्तुलाकार है।

इस जगत में सभी गतियां वर्तुलाकार हैं सभी सर्कुलर हैं। चांद—तारे गोल घूमते हैं। जमीन गोल घूमती है। सब चीजें गोल घूमती हैं। मौसम गोल घूमते हैं। तुम्हारे मन की ऋतुएं भी गोल घूमती हैं। जैसे स्त्रियों को मासिक— धर्म होता है, ठीक अट्ठाइस दिन में वर्तुल पूरा होता है। अभी मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि पुरुषों के भीतर भी वैसी ही रासायनिक प्रक्रिया होती है अट्ठाइस दिन में जैसी स्रियों की; क्योंकि शरीर कुछ बहुत भिन्न नहीं है। तुमने खयाल किया कि जब स्रियों को मासिक— धर्म होता है, तो वे ज्यादा चिड़चिड़ी, ज्यादा झगड़ैल, क्रोधूाई, उदास, परेशान, बेचैन हो जाती हैं। हिंदू बहुत होशियार थे। वे तीन—चार दिन उन्हें अलग ही कमरों में बंद कर देते थे। क्योंकि उस समय उनसे कुछ आशा करनी ठीक नहीं; उनके शरीर में इतनी रासायनिक प्रक्रिया हो रही है कि उस रासायनिक प्रक्रिया में होश रखना उन्हें मुश्किल होगा। वे बेहोश हो जायेंगी।

लेकिन, ठीक अट्ठाईस दिन पर हर पुरुष को भी ऐसा ही होता है। पुरुष का भी मासिक धर्म है। बाहर रक्त—स्राव नहीं होता; लेकिन भीतर रस—ग्रंथियों में रक्त—स्राव होता है। इसलिए दिखाई नहीं पड़ता; लेकिन हर अट्ठाईसवें दिन पर तुम भी उदास, बेचैन, परेशान हो जाते हो।

तुम थोड़ा निरीक्षण करो। तब तुम पाओगे कि तुम्हारे मन का एक वर्तुल है, जो अट्ठाईस दिन में पूरा होता है, चार सप्ताह में पूरा होता है। और, उस वर्तुल में तुम धीरे—धीरे निरीक्षण की प्रक्रिया को प्रगाढ़ करोगे तो ठीक—ठीक बिंदु खोज लोगे कि कब क्या होता है। तब तुम बड़े हैरान होओगे। तब तुम पाओगे कि तुम क्रोधित किसी और के कारण नहीं होते; तुम क्रोधित तुम्हारे भीतरी कारणों से होते हो, दूसरा तो सिर्फ बहाना है। तब तुम दूसरे पर जिम्मेवारी भी न डालोगे। तब तुम क्रोधित होओगे तो तुम दूसरे से क्षमा मांगोगे कि मुझे माफ करना, अब मेरी दशा, मौसम ठीक नहीं। और यह संयोग की बात है कि तुम सामने पड़ गये, कोई दूसरा पड़ता तो उस पर यह उपद्रव होता।

आत्म—निरीक्षण से तुम इस बात को सहज ही समझ लोगे कि मन एक वर्तुल में घूम रहा है। वह एक मंत्र है। और अगर तुम इसे न समझे तो तुम उस वर्तुल में भटकते ही रहोगे। इसलिए हिंदुओं ने संसार को चक्र कहा है—वह घूमता है। और तुम वही—वही कर रहे हो बार—बार। तुम यह भी मत सोचना कि तुम कुछ नया कर रहे हो, सभी लोग वही कर रहे हैं। जब पहली दफा तुम प्रेम में पड़ते हो तो तुम सोचते हो कि संसार में शायद ऐसी अनूठी घटना कभी घटी नहीं। रोज घट रही है। वही सारे लोग करते रहे हैं। वही पशु—पक्षी कर रहे हैं, पौधे कर रहे हैं, आदमी कर रहा है। कुछ प्रेम तुम्हें ही घट गया है, ऐसा नहीं है; सभी को वैसा ही घटा है। क्रोध भी सभी को वैसा ही घटा है।

इस वर्तुल के बाहर सिर्फ एक चीज है—वह ध्यान है, जो अपने—आप नहीं घटती। बाकी सब अपने—आप घटेगा, तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं। तुम चक्‍के पर बैठे भर रहो, चक्का अपने—आप घूम रहा है, तुम उसमें बंधे हुए घूमते रहोगे। सिर्फ एक घटना है जो इस वर्तुल के बाहर है कि तुम छलांग लगाकर इस चक्र के बाहर निकल जाओ—वह ध्यान है। वह अपने—आप नहीं घटता है। वह कभी किसी बुद्ध को घटता है।

पश्‍चिम के बहुत बड़े इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी ने हिसाब लगाया कि अब तक केवल छह आदमी इस चक्र के बाहर हुए हैं—पूरे मनुष्य—जाति के इतिहास में। छह न हुए हों, साठ हुए हों, संख्या कुछ बहुत बड़ी नहीं है। वह एक अनहोनी घटना है। न तो प्रेम, न क्रोध, न लोभ—ये सामान्य घटनाएं हैं; सभी को घट रही हैं; जानवरों को घट रही हैं। इससे तुम आदमी नहीं हों। तुम्हारे जीवन में आदमी होने का सूत्र तो उसी दिन घटेगा, जिस दिन तुम इस चित्त के मंत्र के बाहर हो जाओ; चित्त के वर्तुलाकार भ्रमण के बाहर हो जाओ। यह चित्त का चक्र टूट जाये और तुम इसके बाहर हो जाओ—वह ध्यान है।

ध्यान वर्तुलाकार नहीं है। ध्यान एक स्थिति है; मन एक गति है। ध्यान ठहराव का नाम है; मन भटकाव का नाम है। और, भटकाव भी कुछ नयी जगहों पर नहीं, वही जगह फिर—फिर, वही जगह फिर—फिर। कोलू के बैल की तरह तुम घूम रहे हो। सचेत होकर देखोगे तो समझ में आ जायेगा कि यह कोई सिद्धांत नहीं है, यह तथ्य है। यह कोई दर्शन—शाख का सिद्धांत नहीं है; तुम्हारे मन का वर्तुलाकार भ्रमण, तुम्हारे मन का मंत्र की भांति होना—यह तुम्हारे जीवन का तथ्य है।

जिन्होंने जीवन को समझने की कोशिश की है, उन्होंने इसका आविष्कार किया है। यह कोई विचार से निर्णीत सिद्धांत नहीं है; अनुभव से पाया गया त