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क्या है कैवल्य उपनिषद में वर्णित-अस्तित्व और अनस्तित्व से परे, निराकार, हृदय की गुहा ?


क्या है अस्तित्व और अनस्तित्व से परे, निराकार, हृदय की गुहा ?

18 FACTS;--

1-कैवल्य उपनिषद का अंतिम सूत्र है ''मेरे लिए भूमि, जल, अग्रि, वायु आकाश कुछ नहीं है। वही मनुष्य मेरे शुद्ध परमात्मस्वरूप का साक्षात्कार करता है, जो मायिक प्रपंचों से परे, सब के साक्षी,सत-असत अर्थात

अस्तित्व और अनस्तित्व से परे, निराकार, हृदय की गुहा में स्थित मुझ परमात्मा को जान जाता है।''

2-इस सूत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात समझने की है..''हृदय की गुहा में स्थित मुझ परमात्मा को''।सबसे पहले या तो कोई व्यक्ति उस परम साक्षी को जानने में समर्थ हो जाए, तो हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाता है।और या हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाए, तो उस परम साक्षी को जानने में समर्थ हो जाता है।उस परम सत्ता को जाननेवाला हृदय की गुहा में प्रवेश पाता है, या फिर हृदय की गुहा में प्रवेश करने वाला उस परम सत्ता को जान लेता है। ये दो ही उपाय है।इसलिए मनुष्य की साधना की दो ही निष्ठाएं हैं।

3-जीवन के सत्य को जानने की दो निष्ठाएं मानी गयी हैं। एक का नाम है सांख्य और दूसरे का नाम है योग। सांख्य का अर्थ है, जो उस परम सत्ता को जान लेता है वह हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाता है।और योग का अर्थ है, जो हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाता है वह उस परम सत्ता को जान लेता

है।सांख्य शुद्ध ज्ञान है और योग साधना है। सांख्य कहता है ..करना कुछ भी नहीं है, सिर्फ जानना है।योग कहता है ..करना बहुत कुछ है और तभी जानना फलित होगा।यह दोनों ही सही हैं और यह दोनों ही गलत भी हो सकते हैं क्योंकि ये साधक पर निर्भर करेगा।

4-अगर कोई साधक ज्ञान की इतनी अग्रि जलाने में समर्थ हो कि उस अग्रि में उसका अहंकार जल जाए, सिर्फ ज्ञान की अग्रि ही रह जाए , ज्ञाता न रहे; भीतर कोई अहंकार का केंद्र न रह जाए, सिर्फ जानना मात्र रह जाए, बोध /अवेयरनेस रह जाए, चैतन्य रह जाए, तो कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। जानने की इस अग्रि से ही सब कुछ हो जाएगा।जानने की स्थिति को बढ़ा लेना, रोज-रोज अग्रसर होते जाना ही काफी है।होश बढ़ जाए, जागृति आ जाए, तो पर्याप्त है।

5-लेकिन यह घटना कभी करोड़ में एकाध आदमी को घटती है।और जिस आदमी को करोड़ में भी यह घटना घटती है, वह भी न मालूम कितने जन्मों की चेष्टाओं का फल होता है। लेकिन जब भी सांख्य की घटना किसी को घटती है तो वैसे व्यक्ति को प्रतीत होता है कि सिर्फ जानना काफी है। जानने से ही सब कुछ हो गया। लेकिन उसके भी अनंत जन्म पीछे और अनंत जन्मों में करने की अनंत धाराएं बही हैं।

6-सांख्य योग के विपरीत बातें करता रहा है क्योंकि जिसको भी सांख्य की अवस्था उत्‍पन्‍न होगी, उसे लगेगा कि कुछ और तो करना ही नहीं पड़ता है। सिर्फ होश से भर जाना काफी है। लेकिन जो बेहोश पड़ा है, उसे होश से भर जाना तो सबसे बड़ी उलझन की बात है। जिसकी नींद खुल गयी, वह कह सकता है कि मुझे कुछ और नहीं करना पड़ा, नींद खुल गयी और मैंने प्रकाश का दर्शन कर लिया। लेकिन जो सोया पड़ा है, और सोया ही नहीं नशे में या जहर खाकर बेहोश पड़ा है, मुर्च्‍छित है, उससे हम चिल्ला-चिल्लाकर कहते रहें कि जागो, सिर्फ जागना काफी है, नींद का टूट जाना काफी है, कुछ करने की जरूरत नहीं और सत्य उपलब्ध हो जाएगा ...तो ये बातें भी उसे सुनायी नहीं पड़ती।

7- जो अभी मूर्छित है, पहले तो उसकी मूर्छा तोड़नी पड़ेगी, ताकि वह सुन सके।आंख खोलने की बात भी तो उसके भीतर पहुंचनी चाहिए।

इसलिए सांख्य की मान्यता बिलकुल सही होकर भी काम नहीं पड़ती है। कभी-कभी सांख्य का कोई एकाध व्यक्तित्