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किसकी इच्छा पर और किसके द्वारा उत्पे्ररित होकर मन अपने विषयों पर नीचे उतरता है?


केनोपनिषद प्रथम अध्‍याय

किसकी इच्छा पर और किसके द्वारा उत्पे्ररित होकर मन अपने विषयों पर नीचे उतरता है? किसके द्वारा उत्‍प्रेरित होकर मुख्य प्राण संचारित होता है? किसके द्वारा उत्‍प्रेरित होकर मनुष्य यह वाणी बोलते हैं? कौन—सा देव आंखों तथा कानों को निर्दोंषित करता है?

वह आत्मा कान का भी कान है मन का भी मन? है वाणी की भी वाणी है, प्राण का भी प्राण है, और आंख की भी आंख है। और ज्ञानीजन अपनी आत्मा को इन ज्ञानेंद्रियों से अलग कर ज्ञानेंद्रियों से ऊपर उठ जाते हैं और अमरता को उपलब्ध होते हैं।

जब तुम पैदा होते हो तब जीवन अपनी पराकाष्‍ठा पर नहीं होता है। वह अपने न्‍यूनतम पर होता है। और यदि तुम वहीं पर रूक जाते हो तो वह करीब—करीब मृत्‍यु के निकट ही होता—करीब, करीब जीवन की सीमा पर होता है। जन्‍म से सिर्फ एक अवसर मिलता है, केवल प्रवेश प्राप्‍त हाता है।

जीवन तो उपलब्‍ध करना होता है। जन्‍म तो उसकी सिर्फ शुरूआत है, न कि अंत। लेकिन सामान्‍यतया हम जन्‍म के बिंदू पर ही रूक जाते है। इसीलिए मृत्‍यु घटित होती हे। यदि तुम जन्‍म के बिंदु पर ही ठहर गए तो फिर तुम मरोगे। यदि तुम जन्‍म के पार जा सके तो ही तुम मृत्‍यु के भी पार जा सकोगे। इसे बड़ी गहराई से ख्‍याल में ले लो। मृत्‍यु जीवन के विरूद्ध नहीं है। मृत्‍यु तो जन्‍म के विरोध में है। जीवन तो कुछ और ही है। मृत्‍यु में केवल जन्‍म समाप्‍त होता है। और जन्‍म में केवल मृत्‍यु की शुरूआत होती है। जीवन तो एक बिलकुल ही अलग बात है; उसे तो तुम्हें पाना होगा,उपलब्ध करना होगा, वास्तविक बनाना होगा। बह तो तुम्हें एक बीज की भांति,एक प्रसुप्त संभावना की भांति दिया जाता है—कुछ जो कि हो सकता है। किंतु जो अभी है नहीं। तुम उसे खो भी सकते हो। इस बात की पूरी संभावना है। तुम जीवित हो क्‍योंकि तुम जन्‍मे हो,लेकिन वह जीवनमय होने का पर्यायवाची नहीं है।

जीवन तो एक प्रयास है उस संभावना को वास्‍तविक बनाने का, यथार्थ में बदलनें का; इसीलिए धर्म का इतना अर्थ है, अन्‍यथा धर्म का कुछ अर्थ नहीं। जीवन यदि जन्‍म के साथ शुरू होता हो और मृत्‍यु के साथ समाप्‍त होता हो तो धर्म का कोई मतलब नहीं। तब तो धर्म व्‍यर्थ है, बकवास है। यदि जन्‍म के साथ जीवन का प्रारंभ नहीं हो तो धर्म का कुछ अर्थ है। तब वह विज्ञान हो जाता है कि कैसे जन्‍म से जीवन को विकसित करें! और जितना जीवन में तुम जन्म से दूर चले जाते हो, उतने ही तुम मृत्यु से भी दूर चले जाते हो। क्योंकि जन्म और मृत्यु समानांतर हैं, एक ही हैं, एक ही समान हैं, एक ही प्रक्रिया के दो छोर हैं। यदि तुम एक से दूर चले जाते हो, तो साथ ही साथ तुम दूसरे से भी दूर चले जाते हो।

धर्म जीवन को उपलब्ध करने का विज्ञान है। जीवन मृत्यु के पार है। केवल जन्म की ही मृत्यु होती है, जीवन की तो कभी कोई मृत्यु नहीं होती।

इस जीवन को पाने के लिए तुम्हें कुछ करना होगा। जन्म तो तुम्हें मिला है। तुम्हारे माता—पिता ने कुछ किया, उन्होंने एक—दूसरे को प्रेम किया, वे एक—दूसरे में पिघले। और उनकी जीवन—ऊर्जा से, उनके एक—दूसरे में पिघलने से, एक नई घटना, एक नया बीज—तुम पैदा हुए। परंतु तुमने इसके लिए कुछ भी नहीं किया; यह तो एक भेंट है। स्मरण रहे कि जन्म एक भेंट है। इसीलिए सारी संस्कृतियां माता—पिता को इतना आदर देती हैं। जन्म एक भेंट है और तुम उसका ऋण चुका नहीं सकते। कर्ज चुकता नहीं किया जा सकता। क्या कर सकते हो तुम उसे चुकाने के लिए? जीवन तुम्हें प्रदान किया गया है, किंतु तुमने उसके लिए कुछ भी—नहीं किया।