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''क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ' का क्या संबंध है''।आपके जीवन की जो ऊर्जा नीचे गिरती है


हे अर्जुन, इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया, इसको तत्व से जानकर मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

और हे अर्जुन, कृति अर्थात त्रिगुणमयी मेरी माया और पुरुष अर्थात क्षेत्रज्ञ, इन दोनों को ही तू अनादि जान और रागद्वेषदि विकारों को तथा त्रिगुणास्थ्य संपूर्ण यदार्थो को भी प्रकृति से ही उत्पन्न हुए जान।

क्योंकि कार्य और करण के उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और पुरुष सुख— दुखों के भोक्तापन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।

पहले कुछ प्रश्न। एक मित्र ने पूछा है कि व्यक्ति का ढांचा, उसका व्यक्तित्व जानने के लिए गुरु का उपयोग होता रहा है। पर क्या हम किसी के सम्मोहन में, हिप्नोसिस में अपना टाइप, अपना ढांचा नहीं जान सकते? क्या सम्मोहन का प्रयोग साधना के लिए खतरनाक भी हो सकता है?

सम्मोहन एक बहुत पुरानी प्रक्रिया है। लाभप्रद भी है, खतरनाक भी। असल में जिस चीज से भी लाभ पहुंच सकता हो, उससे खतरा भी हो सकता है। खतरा होता ही उससे है, जिससे लाभ हो सकता हो। जिसमें लाभ की शक्ति है, उसमें नुकसान की शक्ति भी होती है।

तो सम्मोहन कोई होमियोपैथिक दवा नहीं है कि जिससे सिर्फ लाभ ही पहुंचता हो और नुकसान न होता हो।

सम्मोहन के संबंध में बड़ी भ्रांतिया हैं। लेकिन पश्चिम में तो भ्रांतियां टूटती जा रही हैं। पूरब में भ्रातियों का बहुत जोर है। और आश्चर्य की बात तो यह है कि पूरब ही सम्मोहन का पहला खोजी है। लेकिन हम उसे दूसरा नाम देते थे। हमने उसे योग—तंद्रा कहा है। नाम हमारा बढ़िया है। नाम सुनते ही अंतर पड़ जाता है।

हिप्‍नोसिस का मतलब भी तंद्रा है। वह भी ग्रीक शब्द हिप्‍नोस से बना है, जिसका अर्थ नींद होता है।

दो तरह की नींद संभव है। एक तो नींद, जब आपका शरीर थक जाता है, रात आप सो जाते हैं। वह प्राकृतिक है। दूसरी नींद है, जो चेष्टा करके आप में लाई जा सकती है, इनडघूस्त स्लीप। योग—तंद्रा या सम्मोहन या हिप्‍नोसिस वही दूसरी तरह की नींद है। रात जब आप सोते हैं, तब आपका चेतन मन धीरे—धीरे, धीरे— धीरे शात हो जाता है। और अचेतन मन सक्रिय हो जाता है। आपके मन की गहरी परतों में आप उतर जाते हैं। सम्मोहन में भी चेष्टापूर्वक यही प्रयोग किया जाता है कि आपके मन की ऊपर की पर्त, जो रोज सक्रिय रहती है, उसे सुला दिया जाता है। और आपके भीतर का मन सक्रिय हो जाता है।

भीतर का मन ज्यादा सत्य है। क्योंकि भीतर के मन को समाज विकृत नहीं कर पाया है। भीतर का मन ज्यादा प्रामाणिक है। क्योंकि भीतर का मन अभी भी प्रकृति के अनुसार चलता है। भीतर के मन में कोई पाखंड, कोई धोखा, भीतर के मन में कोई संदेह, कोई शक—सुबहा कुछ भी नहीं है। भीतर का मन एकदम निर्दोष है। जैसे पहले दिन पैदा हुए बच्चे का जैसा निर्दोष मन होता है, वैसा निर्दोष मन भीतर है। धूल तो ऊपर—ऊपर जम गई है। मन के बाहर की परतों पर कचरा इकट्ठा हो गया है। भीतर जैसे हम प्रवेश करते हैं, वैसा शुद्ध मन उपलब्ध होता है।

इस शुद्ध मन को हिप्‍नोसिस के द्वारा संबंधित, हिप्‍नोसिस के द्वारा इस शुद्ध मन से संपर्क स्थापित किया जा सकता है। स्वभावत:, लाभ भी हो सकता है, खतरा भी।

अगर कोई खतरा पहुंचाना चाहे, तो भी पहुंचा सकता है। क्‍योंकि वह भीतर का मन संदेह नहीं करता है। उससे जो भी कहा जाता है, वह मान लेता है। वह परम श्रद्धावान है।

अगर एक पुरुष को सम्मोहित करके कहा जाए कि तुम पुरुष नहीं, स्त्री हो, तो वह स्वीकार कर लेता है कि मैं स्त्री हूं। उससे कहा जाए कि अब तुम उठकर चलो, तुम स्त्री की भांति चलोगे। तो वह पुरुष, जो कभी स्त्री की भांति नहीं चला, स्त्री की भांति चलने लगेगा। उस पुरुष को कहा जाए कि तुम्हारे सामने यह गाय खड़ी है—और वहा कोई भी नहीं खडा है—अब तुम दूध लगाना शुरू करो, तो वह बैठकर दूध लगाना शुरू कर देगा।

वह जो अचेतन मन है, वह परम श्रद्धावान है। उससे जो कहा जाए, वह उस पर प्रश्न नहीं उठाता। वह उसे स्वीकार कर लेता है। यही श्रद्धा का अर्थ है। वह यह नहीं कहता कि कहां है गाय? वह यह नहीं कहता कि मैं पुरुष हूं स्त्री नहीं हूं। वह संदेह करना जानता ही नहीं। संदेह तो मन की ऊपर की पर्त, जो तर्क सीख गई है, वही करती है।

इसका लाभ भी हो सकता है, इसका खतरा भी है। क्योंकि उस परम श्रद्धालु मन को कुछ ऐसी बात भी समझाई जा सकती है, जो व्यक्ति के अहित में हो, जो उसको नुकसान पहुंचाए। मृत्यु तक घटित हो सकती है। सम्मोहित व्यक्ति को अगर भरोसा दिला दिया जाए कि तुम मर रहे हो, तो वह भरोसा कर लेता है कि मैं मर रहा हूं।

उन्नीस सौ बावन में अमेरिका में एटी—हिप्‍नोटिक एक्ट बनाया गया। यह पहला कानून है हिप्‍नोसिस के खिलाफ दुनिया में कहीं भी बना। क्योंकि चार लड़के विश्वविद्यालय के एक छात्रावास में सम्मोहन की किताब पढ़कर प्रयोग कर रहे थे। और उन्होंने एक लड़के को, जिसको बेहोश किया था, भरोसा दिला दिया कि तू मर गया है। वे सिर्फ मजाक कर रहे थे। लेकिन वह लड़का सच में ही मर गया। वह हृदय में इतने गहरी बात पहुंच गई—वहा कोई संदेह नहीं है—मृत्यु हो गई, तो मृत्यु को स्वीकार कर लिया। शरीर और आत्मा का संबंध तत्‍क्षण छूट गया। तो हिप्नोसिस के खिलाफ एक कानून बनाना पड़ा।

अगर मृत्यु तक पर भरोसा हो सकता है, तो फिर किसी भी चीज पर भरोसा हो सकता है।

तो सम्मोहन का लाभ भी उठाया जा सकता है। पश्चिम में बहुत बड़ा सम्मोहक था, कूए। कूए ने लाखों मरीजों को ठीक किया सिर्फ सम्मोहन के द्वारा। अब तक दुनिया का कोई चिकित्सक किसी भी चिकित्सा पद्धति से इतने मरीज ठीक नहीं कर सका है, जितना कूए ने सिर्फ सम्मोहन से किया। असाध्य बीमारियां दूर कीं। क्योंकि भरोसा दिला दिया भीतर कि यह बीमारी है ही नहीं। इस भरोसे के आते ही शरीर बदलना शुरू हो जाता है।

कूए ने हजारों लोगों की शराब, सिगरेट, और तरह के दुर्व्यसन क्षणभर में छुड़ा दिए क्योंकि भरोसा दिला दिया। मन को गहरे में भरोसा आ जाए तो शरीर तक परिणाम होने शुरू हो जाते हैं।

तो लाभ भी हो सकता है। अगर आपको ध्यान नहीं लगता है, सम्मोहन में अगर आपको सुझाव दे दिया जाए, दूसरे दिन से ही आपका ध्यान लगना गहरा हो जाएगा। आप प्रार्थना करते हैं, लेकिन व्यर्थ के विचार आते हैं। सम्मोहन में कह दिया जाए कि प्रार्थना के क्षण में कोई भी विचार न आएंगे, तो प्रार्थना आपकी परम शात और आनंदपूर्ण हो जाएगी, कोई विचार का विष्य न रह जाएगा। आपकी साधना में सहयोग पहुंचाया जा सकता है।

योग के गुरु सम्मोहन का प्रयोग करते ही रहे हैं सदियों से। लेकिन कभी उसका प्रयोग जाहिर और सार्वजनिक नहीं किया गया। वह निजी गुरु के और शिष्य के बीच की बात थी। और जब गुरु किसी शिष्य को इस योग्य मान लेता था कि अब उसके अचेतन में प्रवेश करके काम शुरू करे, तो ही प्रयोग करता था। और जब कोई शिष्य किसी गुरु को इस योग्य मान लेता था कि उसके चरणों में सब कुछ समर्पित कर दे, तभी कोई गुरु उसके भीतर प्रवेश करके सम्मोहन का प्रयोग करता था।

रास्ते पर काम करने वाले सम्मोहक भी हैं। स्टेज पर प्रयोग करने वाले सम्मोहक भी हैं। उनके साथ आपका कोई श्रद्धा का नाता नहीं है। उनके साथ आपका नाता भी है, तो व्यावसायिक हो सकता है कि आप पांच रुपया फीस दें और वह आपको सम्मोहित कर दे। लेकिन जो आदमी पांच रुपए में उत्सुक है सम्मोहित करने को, वह आपको नुकसान पहुंचा सकता है।

इस तरह की घटनाएं दुनियाभर के पुलिस थानों में रिपोर्ट की गई हैं कि किसी ने किसी को सम्मोहित किया और उससे कहा कि रात तू अपनी तिजोरी में चाबी लगाना भूल जाना; या रात तू अपने घर का दरवाजा खुला छोड़ देना। पोस्ट हिप्‍नोटिक सजेशन! आपको अभी बेहोश किया जाए, आपको बाद के लिए भी सुझाव दिया जा सकता है कि आप अड़तालीस घंटे बाद ऐसा काम करना। तो आप अड़तालीस घंटे बाद वैसा काम करेंगे और आपको कुछ समझ में नहीं आएगा कि आप क्यों कर रहे हैं। या आप कोई तरकीब खोज लेंगे, कोई रेशनलाइजेशन, कि मैं इसलिए कर रहा हूं।

मैं एक युवक पर प्रयोग कर रहा था पोस्ट हिप्‍नोटिक सजेशन के। उसे मैंने बेहोश किया और उसे मैंने कहा कि छ: घंटे बाद तू मेरी फला नाम की किताब को उठाएगा और उसके पंद्रहवें पेज पर दस्तखत कर देगा। फिर वह होश में आ गया। छ: घंटे बाद की बात है। वह अपने काम में लग गया। मैंने वह किताब अलमारी में बंद करके ताला लगा दिया।

ठीक छ: घंटे बाद उसने आकर मुझे कहा कि मुझे आपकी फलां नाम की किताब पढ़नी है। मैंने पूछा कि तुझे अचानक क्या जरूरत पड गई? उसने कहा कि नहीं, मुझे कई दिन से खयाल है पढ़ने का। अभी मेरे पास सुविधा है, तो मैं पढ़ना चाहता हूं। मैंने उसे चाबी दी और उसने खोला, और जब मैं भीतर पहुंचा कमरे में, तो वह किताब पढ़ नहीं रहा था, वह पंद्रह नंबर के पृष्ठ कर दस्तखत कर रहा था।

जब वह पकड़ गया दस्तखत करते, तो बहुत घबडाया; और उसने कहा कि मेरी समझ के बाहर है, लेकिन मुझे बड़ी बेचैनी हो रही थी कि कुछ करना है। और कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है। और दस्तखत करते ही मेरा मन एकदम हलका हो गया, जैसे कोई बोझ मेरे ऊपर से उतर गया है। पर मैंने क्यों दस्तखत किए हैं, मुझे कुछ पता नहीं है।

तो ऐसी रिपोर्ट की गई हैं पुलिस में कि किसी सम्मोहक ने किसी को सम्मोहित कर दिया और उससे कहा कि तू जाते वक्त अपने पैसे की थैली यहीं छोड़ जाना, अपना मनीबैग यहीं छोड़ जाना; या अपनी चेक बुक यहीं छोड़ जाना। वह आदमी चेक बुक वहीं छोड़ गया जाते वक्त। तब तो खतरे हो सकते हैं।

अचेतन मन बड़ा शक्तिशाली है। आपके चेतन मन की कोई भी शक्ति नहीं है। आपका चेतन मन तो बहुत ही कमजोर है। इसीलिए तो आप संकल्प करते हैं कि सिगरेट नहीं पीऊंगा, छोड़ दूंगा; और घंटेभर भी संकल्प नहीं चलता है। क्योंकि जिस मन से आपने किया है, वह बहुत कमजोर मन है। उसकी ताकत ही नहीं है कुछ। अगर यही संकल्प भीतर के मन तक पहुंच जाए, तो यह महाशक्तिशाली हो जाता है। फिर उसे तोड़ना असंभव है।

सम्मोहन के द्वारा व्यक्ति का ढांचा खोजा जा सकता है। लेकिन सम्मोहित ऐसे व्यक्ति से ही होना, जिस पर परम श्रद्धा हो। व्यावसायिक सम्मोहन करने वाले व्यक्ति से सम्मोहित मत होना। क्योंकि उसकी आपमें उत्सुकता ही व्यावसायिक है। आपसे कोई आत्मिक और आंतरिक संबंध नहीं है। और जब तक आत्मिक और आंतरिक संबंध न हो, तब तक किसी व्यक्ति को अपने इतने भीतर प्रवेश करने देना खतरनाक है।

इसलिए गुरु तो प्रयोग करते रहे हैं। लेकिन इस प्रयोग को सदा ही निजी समझा गया है। यह सार्वजनिक नहीं है। दो व्यक्तियों के बीच की निजी बात है। कभी—कभी तो… यह प्रयोग पूरा भी तभी हो सकता है, जब कि बहुत निकट और प्रगाढ़ संबंध हों।

जैसे कि स्टेज पर कोई सम्मोहित कर रहा है आपको, तो आप कितने ही सम्मोहित हो जाएं, आपके भीतर एक हिस्सा असम्मोहित बना रहता है। क्योंकि आपको डर तो रहता ही है कि पता नहीं, यह आदमी क्या करवाए! तो अगर वह कहे कि गाय का दूध लगाओ, तो आप लगा लेंगे। वह कहे कि आप स्त्री की तरह चलो, तो चल लेंगे। लेकिन अगर वह कोई ऐसी बात कहे, जो आपके अंतःकरण के विपरीत पड़ती है, अनुकूल नहीं पड़ती है, या आपकी नैतिक दृष्टि के एकदम खिलाफ है, तो आप तत्‍क्षण जाग जाएंगे और इनकार कर देंगे।

जैसे किसी जैन को जो बचपन से ही गैर—मांसाहारी रहा है, सम्मोहित करके अगर कहा जाए कि मांस खा लो, वह फौरन जग जाएगा; वह सम्मोहन टूट जाएगा उसी वक्त।

किसी सती स्त्री को, जिसका अपने पति के अलावा कभी किसी के प्रति कोई भाव पैदा नहीं हुआ है, अगर उसे कहा जाए सम्मोहन में कि इस व्यक्ति को चूम लो, उसकी फौरन नींद खुल जाएगी, सम्मोहन टूट जाएगा। लेकिन अगर स्त्री का मन दूसरे पुरुषों के प्रति जाता रहा हो, तो सम्मोहन नहीं टूटेगा, क्योंकि इसमें कुछ खास विरोध नहीं हो रहा है। शायद उसकी दबी हुई इच्छा ही पूरी हो रही है।

तो जब कोई व्यावसायिक रूप से किसी को सम्मोहित करता है, तो आपके भीतर एक हिस्सा तो सजग रहता ही है। बहुत गहरे प्रवेश नहीं हो सकता। लेकिन जब कोई गुरु और शिष्य के संबंध में सम्मोहन घटित होता है, तो प्रवेश बहुत आंतरिक हो जाता है। व्यक्ति अपने को पूरा छोड़ देता है। इसलिए समर्पण का इतना मूल्य है, श्रद्धा का इतना मूल्य है।

सम्मोहन के माध्यम से निश्चित ही व्यक्ति के टाइप का पता लगाया जा सकता है। सम्मोहन के द्वारा व्यक्ति के पिछले जन्मों में प्रवेश किया जा सकता है। सम्मोहन के द्वारा व्यक्ति के भीतर कौन—से कारण हैं, जिनके कारण वह परेशान और उलझा हुआ है, वे खोजे जा सकते हैं। और सम्मोहन के माध्यम से बहुत—सी बातों का निरसन किया जा सकता है, रेचन किया जा सकता है; बहुत—सी बातें मन से उखाड़कर बाहर फेंकी जा सकती हैं।

हम जो भी करते हैं ऊपर—ऊपर से, वह ऐसा है, जैसे कोई किसी वृक्ष की शाखाओं को काट दे। शाखाएं कटने से वृक्ष नहीं कटता, नए पीके निकल आते हैं। वृक्ष समझता है कि आप कलम कर रहे हैं। जब तक जड़ें न उखाड़ फेंकी जाएं, तब तक कोई परिवर्तन नहीं होता। वृक्ष फिर से सजीव हो जाता है।

आप मन के ऊपर—ऊपर जो भी कलम करते हैं, वह खतरनाक है। वह फायदा नहीं करती, नए अंकुर निकल आते हैं। वही बीमारियां और घनी होकर पैदा हो जाती हैं। जड़ उखाड़कर फेंकना हो, तो गहरे अचेतन में जाना जरूरी है।

लेकिन सम्मोहन अकेला मार्ग नहीं है। अगर आप ध्यान करें, तो खुद भी अपने भीतर इतने ही गहरे जा सकते हैं। सम्मोहन के द्वारा दूसरा व्यक्ति आपके भीतर गहरे जाता है और आपको सहायता पहुंचा सकता है। ध्यान के द्वारा आप स्वयं ही अपने भीतर गहरे जाते हैं और अपने को बदल सकते हैं।

जिन लोगों को ध्यान में बहुत कठिनाई होती हो, उनके लिए सम्मोहन का सहारा लेना चाहिए। लेकिन अत्यंत निकट संबंध हो किसी गुरु से, तभी। और जो व्यक्ति ध्यान में सीधे जा सकते हों, उनको सम्मोहन के विचार में नहीं पड़ना चाहिए। उसकी कोई भी जरूरत नहीं है।

और सम्मोहन का भी सहारा इसीलिए लेना चाहिए कि ध्यान में गहरे जाया जा सके, बस। और किसी काम के लिए सहारा नहीं लेना चाहिए। क्योंकि बाकी सब काम तो ध्यान में गहरे जाकर किए जा सकते हैं। सिर्फ ध्यान न होता हो, तो ध्यान में कैसे मैं गहरे जाऊं, सम्मोहन का इसके लिए सहारा लिया जा सकता है।

सम्मोहन गहरी प्रक्रिया है और बड़ी वैज्ञानिक है। और मनुष्य के बहुत हित में सिद्ध हो सकती है। लेकिन स्वभावत:, जो भी हितकर हो सकता है, वह खतरनाक भी है।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि हमें नीचे बह रही प्राकृतिक ऊर्जा के ऊपर ऊर्ध्वगमन की चेष्टा क्यों करनी चाहिए?

कोई नहीं कहता है कि आप चेष्टा करें। आपकी ऊर्जा नीचे बह रही है, उससे दुख हो रहा है, उससे पीड़ा हो रही है, उससे जीवन व्यर्थ रिक्त हो रहा है। तो आपको ही लगता हो कि पीड़ा हो रही है, दुख हो रहा है, जीवन व्यर्थ जा रहा है, तो ऊपर ले जानी चाहिए। कोई आपसे कह नहीं रहा है कि आप ऊपर ले जाएं। और किसी के कहने से आप कभी ऊपर ले भी न जाएंगे।

लेकिन नीचे का अनुभव ही पीड़ादायी है। ऊर्जा का नीचे जाने का अर्थ है दुख, ऊर्जा का ऊपर जाने का अर्थ है आनंद। लेकिन नीचे जाती ऊर्जा अगर सिर्फ दुख ही देती हो, तब तो सभी लोग रुक जाएंगे। लेकिन नीचे जाती ऊर्जा सुख का प्रलोभन देती है और अंत में दुख देती है। इसीलिए तो इतने लोग उसमें बहे चले जाते हैं। नीचे बहती हुई ऊर्जा आशा बंधाती है कि सुख मिलेगा। आशा ही रहती है, दुख मिलता है। लेकिन हम इतने बुद्धिहीन हैं कि प्रथम और अंतिम को कभी जोड़ नहीं पाते। हजार बार दुख पाकर भी फिर जब नया प्रलोभन आता है, तो हम उसी मछली की तरह व्यवहार करते हैं, जो अनेक बार आटे को पकडने में कांटे से पकड़ गई है, लेकिन फिर जब आटा लटकाता है मछुआ, तो फिर मछली आटे को पकड़ लेती है।

आटे और काटे में मछली संबंध नहीं जोड़ पाती। हम भी नहीं जोड़ पाते कि हम जहां—जहं। सुख की आशा रखते हैं, वहां—वहां दुख मिलता है, सुख मिलता नहीं। लेकिन इसका हम संबंध नहीं जोड़ पाते।

जहां भी आपको दुख मिलता हो, आप थोड़ा सोचें कि वहां आपने सुख चाहा था। सुख न चाहा होता, तो दुख मिल ही नहीं सकता। दुख मिलता ही तब है, जब हमने सुख चाहा हो। आटे को कोई मछली पकड़ेगी, तो ही काटे से जकड़ सकती है। लेकिन जब काटे से मछली जकड़ जाती है, तब वह भी नहीं सोच पाती कि इस आटे के कारण मैं काटे में फंस गई हूं। आप भी नहीं सोच पाते कि जब दुख में आप उलझते हैं, तो किसी सुख की आशा में फंस गए हैं। नीचे बहती ऊर्जा पहले सुख का आश्वासन देती है, फिर दुख में गिरा देती है। ऊपर उठती ऊर्जा पहले कष्ट, तप, साधना, जो कि कठिन है; द्वार पर ही मिलता है दुख ऊपर जाती साधना में, लेकिन अंत में सुख हाथ आता है।

तो आप एक बात ठीक से समझ लें, दुख अगर पहले मिल रहा हो और पीछे सुख मिलता हो, तो आप समझना कि ऊर्जा ऊपर की तरफ जा रही है। और अगर सुख पहले मिलता हुआ लगता हो और पीछे दुख हाथ में आता हो, तो ऊर्जा नीचे की तरफ जा रही है। यह लक्षण है कि आपकी शक्ति कब निम्न हो रही है और कब ऊर्ध्व हो रही है।

कोई भी आपसे नहीं कहता कि आप अपनी जीवन शक्ति को ऊपर ले जाएं। लेकिन आप आनंद चाहते हैं, तो जीवन शक्ति को ऊपर ले जाना पड़ेगा।

समस्त धर्म जीवन शक्ति को ऊपर ले जाने की विधियां है। सारा योग, सारा तंत्र, सब एक ही बात की चेष्टा है कि आपके जीवन की जो ऊर्जा नीचे गिरती है, वह ऊपर कैसे जाए। और एक बार ऊपर जाने लगे, तो दूसरे जगत का प्रारंभ हो जाता है।

देखा आपने, पानी नीचे की तरफ बहता है। लेकिन पानी को गरम करें और पानी भाप बन जाए, तो ऊपर की तरफ उड़ना शुरू हो जाता है। पानी ही है। लेकिन सौ डिग्री पर भाप बन गया, और क्रांतिकारी अंतर हो गया। आयाम बदल गया। दिशा बदल गई। पहले नीचे की तरफ बहता था; पहले कहीं भी पानी होता, तो वह गड्डे की तलाश करता, अब आकाश की तलाश करता है।

आपके भीतर जो जीवन है, जो एनर्जी है, जो ऊर्जा है, वह भी एक विशेष प्रक्रिया से गुजरकर ऊपर की तरफ उठनी शुरू हो जाती है। उस ऊपर उठती हुई ऊर्जा को हमने कुंडलिनी कहा है।

साधारणत: जैसा आदमी पैदा होता है प्रकृति से, वह ऊर्जा नीचे की तरफ जाती है। जमीन का ग्रेविटेशन उसे नीचे की तरफ खींचता है। जमीन की कशिश नीचे की तरफ खींचती है। और आप नीचे की तरफ चौबीस घंटे खिंच रहे हैं। और जिंदगी उतार है। बच्चा जितना पवित्र होता है, का उतना पवित्र नहीं रह जाता। बड़ी अदभुत बात है!

बच्चा जैसा निर्दोष होता है, बूढ़ा वैसा निर्दोष नहीं रह जाता। होना तो उलटा चाहिए। क्योंकि जीवन होना चाहिए एक विकास। यह तो हुआ पतन।

अगर हम के आदमी के मन को खोल सकें, तो हम पाएंगे कि बूढ़ा आदमी डर्टी, एकदम गंदा हो जाता है। जीवन की सारी की सारी वासना तो बनी रहती है और शक्ति सब खो जाती है। और वासना मन में घूमती है। जैसे—जैसे आदमी बूढ़ा होने लगता है, शरीर की शक्ति तो खोती जाती है और वासना चित्त को घेरती है। क्योंकि चित्त कभी भी का नहीं होता, वह जवान ही बना रहता है। तो बड़ी गंदगी घिर जाती है।

बच्चे और बूढ़े में विकास न दिखाई देकर, पतन दिखाई पड़ता है। कारण सिर्फ एक है, कि बच्चे की ऊर्जा अभी बहनी शुरू नहीं हुई है। जैसे—जैसे वह बड़ा होगा, ऊर्जा नीचे की तरफ बहनी शुरू होगी। और अगर कोई प्रयोग न किए जाएं, तो ऊर्जा ऊपर की तरफ न बहेगी।

इन मित्र ने यह भी पूछा है कि अगर साक्षी— भाव या साधना लानी पड़ती है, तब तो फिर वह अप्राकृतिक हो गई। तो क्या प्रकृति का विरोध करना ठीक है?

प्रकृति नीचे भी है और ऊपर भी है। जब भाप आकाश की तरफ उड़ती है, तब भी प्राकृतिक नियमों का ही अनुगमन कर रही है। और जब पानी नीचे की तरफ बहता है, तब भी प्राकृतिक नियमों का ही अनुगमन कर रहा है।

ऊपर की तरफ ले जाने वाले नियम भी प्राकृतिक हैं। और नीचे की तरफ ले जाने वाले नियम भी प्राकृतिक हैं। चुनाव आपको कर लेना है। और मनुष्य स्वतंत्र है चुनाव के लिए, यही मनुष्य की गरिमा है। मनुष्य की खूबी यही है। पशुओं से उसमें विशेषता है, तो सिर्फ एक, कि पशु चुनाव करने को स्वतंत्र नहीं है। उसको कोई च्वाइस नहीं है। उसकी ऊर्जा नीचे की तरफ ही बहेगी। वह चुनाव नहीं कर सकता ऊपर की तरफ बहने का। वह चाहे तो भी नहीं कर सकता। वह चाह भी नहीं सकता।

पशु बंधा हुआ है, नीचे की तरफ ही बहेगा। मनुष्य को संभावना है। अगर वह कुछ न करे, तो नीचे की तरफ बहेगा। अगर कुछ करे, तो ऊपर की तरफ भी बह सकता है। मनुष्य के पास उपाय है। और जौ मनुष्य चुनाव नहीं करता, वह पशु ही बना रह जाता है। वह कभी मनुष्य नहीं बन पाता। क्योंकि फिर पशु में और उसमें कोई फर्क नहीं है। एक ही शुरुआत है फर्क की और वह यह है कि हम चुन सकते हैं। हम चाहें तो ऊपर की तरफ भी बह सकते हैं।

एक बड़े मजे की बात है। चूंकि हम ऊपर की तरफ भी बह सकते हैं, इसलिए हम पशु से भी ज्यादा नीचे गिर सकते हैं। अगर आदमी पशु होना चाहे, तो सभी पशुओं को मात कर देता है। दुनियाभर के सारे जंगली जानवरों को भी इकट्ठा कर लें, तो भी हिटलर का मुकाबला नहीं कर सकते, चंगेजखा का मुकाबला नहीं कर सकते। दुनिया का कोई पशु आदमी जैसा पशु नहीं हो सकता, अगर आदमी पशु होना चाहे। क्योंकि जितने आप ऊपर उठ सकते हैं, उतने ही अनुपात में नीचे गिर सकते हैं। जितने बड़े शिखर पर चढ़ने की संभावना है, उतनी ही बड़ी खाई में गिर जाने की भी संभावना साथ ही जुड़ी हुई है। शिखर और खाई साथ—साथ चलते हैं। पतन और विकास साथ—साथ चलते हैं।

लेकिन कोई भी पशु बहुत नीचे नहीं गिर सकता। आप जंगल में चले जाएं, तो आप पता भी नहीं लगा सकते कि कौन—सा सिंह ज्यादा पशु है। सभी सिंह एक जैसे पशु हैं। भूख लगती है, चीर—फाड़कर खा जाते हैं। लेकिन दो सिंहों में कोई फर्क नहीं किया जा सकता। एक सिंह नीचा गिर गया है और एक सिंह ऊंचा है, ऐसा आप फर्क नहीं कर सकते।

आदमी ऊपर उठना चाहे, तो बुद्ध और कृष्ण भी और क्राइस्ट भी उसमें पैदा हो जाते हैं। और नीचे गिरना चाहे, तो चंगेज और नादिर और हिटलर और स्टैलिन भी पैदा हो जाते हैं। कोई अड़चन नहीं है। और आदमी कुछ न करे, तो साधारण किस्म का पशु रह जाता है।

ऊपर की तरफ जाने के लिए श्रम करना होगा। लेकिन श्रम के कारण आप यह मत समझ लेना कि वह अप्राकृतिक है। आदमी जमीन पर चलता है। नाव में पानी में चलता है। हवाई जहाज में हवा में चलता है। अब अंतरिक्ष यान हमने बनाए हैं, वे आकाश में हवा के पार भी चले जाते हैं। अप्राकृतिक कुछ भी नहीं है। क्योंकि अप्राकृतिक तो घटित ही नहीं हो सकता।

हवा में जब आदमी उड़ रहा है हवाई जहाज में, तब भी प्रकृति के नियमों का ही उपयोग कर रहा है। और जब आदमी नहीं उड़ता था, तो उसका मतलब यह नहीं है कि तब नियम नहीं थे। नियम थे, हमें उनका पता नहीं था।

तो जब आप ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होते हैं, तब भी आप प्रकृति के ही नियमों का काम कर रहे हैं। और जब आप कामवासना में गिरते हैं, तब भी प्रकृति के ही नियमों का काम हो रहा है।

एक हवाई जहाज जब हवा में उड़ता है, तब भी प्रकृति के नियम काम रहे हैं। और जब हवाई जहाज में कुछ गड़बड हो जाती है और हवाई जहाज ऊपर से नीचे गिरकर जमीन पर टकराता है, तब भी प्रकृति के ही नियम काम कर रहे हैं।

आप कितने ढंग से प्रकृति के नियमों का अपने अनुकूल उपयोग करते हैं, उस मात्रा में आपके जीवन में आनंद फलित होता है। और आप किस मात्रा में प्रकृति के नियमों का उपयोग नहीं कर पाते अपने अनुकूल या अपने को नियमों के अनुकूल नहीं बना पाते, उस मात्रा में दुख होता है।

ऊपर की यात्रा भी प्राकृतिक ही है, अप्राकृतिक नहीं; लेकिन उच्चतर प्रकृति की तरफ है। नीचे की यात्रा भी प्राकृतिक है, लेकिन निम्न है। और जो निम्न है, वह दुख लाता है। और जो निम्न है, वह नरक बन जाता है। और जो श्रेष्ठ है, उच्च है, वह स्वर्ग बन जाता है और आनंद की संभावना के द्वार खुल जाते हैं।

लेकिन कोई आपसे कह नहीं रहा है कि आप ऐसा करें। और किसी के कहने से आप करेंगे भी नहीं।

तो मैं तो आपसे इतना ही कह रहा हूं कि आप पहचानें कि अगर आप दुख में हैं, तो आप पहचान लें कि आप नीचे की तरफ जा रहे हैं। और आपको अगर दुख में ही रहना हो, तो फिर कुशलता से नीचे की तरफ जाएं। लेकिन नीचे की तरफ जाकर सुख की आशा न करें। वह आशा गलत है। और आपको लगता हो कि दुख को बदलना है जीवन से और आनंद की यात्रा करनी है, तो ऊपर की तरफ उठना शुरू हों। और ऊपर की तरफ उठने में पहले कष्ट होगा; उसको ही हमने तप कहा है।

जब भी कोई पहाड़ की तरफ चढ़ेगा, तो परेशानी होगी। पहाड़ से उतरते वक्त कोई परेशानी नहीं होती। सभी चढ़ाव कष्टपूर्ण हैं। लेकिन सभी चढ़ावों के अंत पर विश्राम है। और कष्ट के बाद जो विश्राम है, उसका स्वाद, उसका मूल्य ही कुछ और है।

और बहुत मजे की बात है। अगर एक हवाई जहाज से आपको एवरेस्ट पर उतार दिया जाए, तो आपको वह आनंद कभी उपलब्ध न होगा, जो हिलेरी और तेनसिह को चढकर एवरेस्ट पर पहुंचकर हुआ है। आप भी उसी जगह खड़े हो जाएंगे हवाई जहाज से उतरकर, जिस जगह हिलेरी और तेनसिह जाकर खड़े हुए थे। लेकिन जो आनंद उनको मिला था, वह आपको न मिलेगा। क्योंकि आनंद सिर्फ मंजिल में ही नहीं है, यात्रा में भी है। और यात्रा से मंजिल अगर अलग कर ली जाए, तो कोरी, निस्सार, रसहीन हो जाती है।

इसलिए शार्टकट खोजने की फिक्र नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जितना शार्टकट आप खोज लेंगे, उतना ही मंजिल का रस चला जाएगा। यात्रा का अपना सुख है। और यात्रा का सुख ही इकट्ठा होकर मंजिल पर उपलब्ध होता है। जो यात्रा से बचने की कोशिश करता है, वह एक दफे पहुंच भी सकता है। लेकिन उस पहुंचने में कोई भी रस न होगा, कोई भी रस न होगा।

जो लोग बद्री और केदार की यात्रा पैदल करते रहे थे, उनका मजा और था। अब बस से जा सकते हैं, अब वह बात न रही। कल हवाई जहाज से सीधा उतरेंगे; कोई रस न रह जाएगा। क्योंकि यात्रा और मंजिल दो चीजें नहीं हैं। यात्रा का ही अंतिम पडाव है मंजिल। और जिसने यात्रा ही काट दी, एक अर्थ में उसकी मंजिल ही कट गई।

यात्रा के कष्ट से भयभीत न हों, क्योंकि मंजिल के सुख में उसका भी अनुदान है।

इसी संदर्भ में एक मित्र ने और पूछा है कि स्लेटर ने चूहे के मस्तिष्क में इलेक्ट्रोड्स डालकर उसके मस्तिष्क के विशेष तंतु कंपित करके संभोग का आनंद दिलाया। समाधि भी अस्तित्व से एक तरह का संभोग है। क्या यह संभव नहीं है कि मस्तिष्क के कोई तंतु समाधिस्थ अवस्था में कंपित होते हों? और इनकी वैज्ञानिक व्यवस्था की जा सके, तो फिर साधारण आदमी को भी उसके समाधि वाले तंतुओं को कंपित करके समाधि का अनुभव दिया जा सकता है। फिर साधना की, योग की कोई जरूरत न रहेगी। योग तो कहता है कि समाधि को उपलव्य करने वाला सहस्रार चक्र तक मस्तिष्क में छिपा हुआ