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क्या अर्थ हैं साक्षी भाव और सापेक्षता के सिद्धांत(Theory Of Relativity)का ?


1-महर्षि पतंजलि समाधि पाद के चौथे सूत्र में कहते हैं ''साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है। ये वृत्तियाँ साधक की अन्तर्चेतना को मनचाहा भटकाती हैं। सुख- दुख के सपने दिखाती हैं। कभी हँसाती हैं, कभी रुलाती हैं। इच्छाओं के कच्चे धागों से बाँधती हैं। कल्पनाओं और कामनाओं की मदिरा पिला कर बेहोश करती हैं।'' 2-पतंजलि बिलकुल साफ तौर पर कहते हैं कि यदि आपको, हमको, मनुष्य मात्र को यदि भटकन, उलझन, तनाव, चिन्ता, दुःख, पीड़ा, अवसाद से सम्पूर्ण रूप से मुक्ति पानी है, तो साक्षी भाव को उपलब्ध होने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है। क्योंकि अन्य अवस्थाओं में तो मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य बना ही रहेगा। मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है। यह बात किसी एक पर, किसी व्यक्ति विशेष पर लागू नहीं होती। बात तो सारे मनुष्यों के लिए कही गयी है।

मानव प्रकृति की बनावट की यही पहचान है। साक्षी के अतिरिक्त दूसरी सभी अवस्थाओं में मन के साथ तादात्म्य बना रहता है। विचारों के प्रवाह के साथ कब एकात्मता सध जाती है, पता ही नहीं चलता। ये विचार कैसे भी हो सकते हैं, किसी भी तरह के हो सकते हैं। विचारों के बादलों के साथ हम एक हो जाते हैं। कई बार सफेद बादलों के साथ, कई बार वर्षा से भरे बादलों के साथ, तो कई बार वर्षा रिक्त खाली बादलों के साथ। लेकिन कुछ भी हो, किसी न किसी विचार के बादल के साथ तादात्म्यता बनी रहती है। और ऐसे में हम आकाश की शुद्धता गँवा देते हैं। अपने आत्मस्वरूप के अन्तरिक्ष की शुद्धता खो देते हैं। और बादलों का यह घिराव घटित ही इस कारण होता है, क्योंकि हम तादात्म्य जोड़ लेते हैं। विचारों के साथ एक हो जाते हैं।

ख्याल आता है कि हम भूखे हैं और विचार मन में कौंध जाता है। विचार इतना भर है कि पेट को भूख लगती है। बस, उसी क्षण हम तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। उसकी आसक्ति से घिर जाते हैं। हम कहने लगते हैं, मैं भूखा हूँ। मुझे भूख लगी है। मन में तो भूख का विचार भर आया था, पर हमने उसके साथ तादात्म्य बना लिया है। हम कहने लगे, मुझे भूख लगी है। बस यही तादात्म्य है।

ऐसी बात नहीं है कि ज्ञानियों को, योगियों को, साधकों को, सिद्धों को भूख महसूस नहीं होती। भूख तो वे भी महसूस करते हैं। बुद्ध भी भूख महसूस करते थे, पतंजलि भी भूख महसूस करते हैं। लेकिन पतंजलि कभी यह नहीं कहेंगे कि मुझे भूख लगी है। वे तो बस इतना कहेंगे कि शरीर भूखा है, वे कहेंगे, मेरा पेट भूख महसूस कर रहा है। बुद्ध कहेंगे, भूख तो पेट में है। मैं तो केवल साक्षी भर हूँ। पेट भूखा है, लेकिन योगीजन उसके साक्षी मात्र बने रहेंगे। लेकिन हम सब तादात्म्य बना लेते हैं, विचार के साथ एक हो जाते हैं।

विचार और वृत्तियों के बदलते स्वरूप के साथ हमारा तादात्म्य भी बदलता है। कभी हम एक के साथ होते हैं, तो कभी दूसरी, तीसरी, चौथी, और पाँचवी वृत्ति के साथ। ये तादात्म्य ही संसार बनाते हैं। दरअसल यही संसार है। यदि हम तादात्म्यों में हैं, तो संसार में हैं, दुःख में हैं। और यदि इन तादात्म्यों के पार और परे चले गए, तो समझो मुक्त हो गए। योग की परम सिद्धि एवं सम्बोधि की परम अवस्था यही है। यही है निर्वाण और कैवल्य। वृत्तियों से तादात्म्य टूटते ही हम इस दुःख भरे संसार से पार होकर आनन्द के जगत् में प्रविष्ट हो जाते हैं।

कैसे हो साक्षी भाव की सिद्धि;-

विराट् ब्रह्म के संकल्प से, उसकी उपस्थिति मात्र से यह मायामय संसार उत्पन्न हुआ। मनुष्य यदि चाहे, तो इस माया से मुक्त हो सकता है और सत्य के दर्शन कर सकता है। किंतु इसके लिए हमें पहले से बनी बनाई घटनाओं को वस्तु जगत पर थोपना बंद करना पड़ेगा। तत्वदर्शियों ने इसी को साक्षीभाव की सिद्धि कहा है।

आइंस्टीन के ‘समय विरोधाभास’ सिद्धाँत से मायावाद की और पुष्टि हो जाती है, जिसमें व्यक्ति को असंग भाव से कर्म करने की प्रेरणा दी गई है। उस स्थिति को प्राप्त हुए बिना अंतिम सत्य का पता लगाया ही नहीं जा सकता, कारण कि समय का बोध (आब्जेक्टिव टाइम) निरंतर भ्रमित स्थिति बनाए रखता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, परंतु दिखाई यह देता है कि सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर जा रहा है। चलती हुई रेलगाड़ी में से दूर तक देखने पर पेड़, वृक्ष, टीले और पृथ्वी ही दौड़ती हुई दिखाई देती है, उसी प्रकार सीमाबद्ध आस्तित्व में यह सारी भ्राँतियाँ उत्पन्न होती है।

इन सब घटनाओं का साझी रहने वाला मायायुक्त अस्तित्व पहचाना जा सके, तो वस्तुस्थिति का ज्ञान सहज ही हो सकता है, तब जाना जा सकता है कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर समय का पैमाना भिन्न-भिन्न क्यों होता है और यह कि ‘समय’ भी उस माया से मुक्त नहीं है, जिससे संसार आबद्ध है।

जड़ जगत की तरह ‘समय’ भी मायायुक्त है। हम इस माया से मुक्त होकर जब तक संसार के आदि कारण को नहीं समझेंगे, तब तक समय संबंधी सत्य को भी नहीं जान सकेंगे और बराबर उसके सापेक्ष अस्तित्व में ही उलझे रहेंगे।

वस्तुतः सारी दुनिया ही एक भ्रम मात्र है। वेदाँत दर्शन के अनुसार संपूर्ण जगत् ही मायामय है। माया अर्थात् जो नहीं होने पर भी होता दिखाई दे। जिसका अस्तित्व नहीं है, लेकिन भासित होता है। आदि शंकराचार्य ने इस माया को परिभाषित करते हुए कहा है, '' वही माया है, जिससे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है।''

अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने एक परीक्षण के लिए किसी व्यक्ति को ऑपरेशन टेबुल पर लिटाया और उसे कुछ मिनटों के लिए सम्मोहित कर सुला दिया। जब वह सम्मोहन अवस्था में सो रहा था, तो उसके गले पर एक छुरी चुभाई गई। उससे खून की एक बूंद छलक पड़ी। इसके बाद ही वैज्ञानिकों ने उसकी सम्मोहन निद्रा तोड़ दी और जगा दिया। यह सारा प्रयोग कुछ ही मिनटों में हो गया था और जितने समय तक वह व्यक्ति सोया, वह तो कुछ ही सेकेंड थे। उन कुछ ही सेकेंडों में उस व्यक्ति ने एक लंबा सपना देख लिया था।

डॉ. अलेक्जेंडर लिंबार्ड ने उस स्वप्न का उल्लेख करते हुए लिखा है कि इन कुछ ही सेकेंडों में उस व्यक्ति ने एक आदमी की हत्या कर दी थी। वह महीनों तक लुकता छिपता रहा था। अंततः पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उस पर हत्या का मुकदमा चला। मुकदमें का फैसला होने में दो ढाई साल लगे। जज ने उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई। और उसे जब फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया जाना था, तो उसी क्षण उसकी नींद खुल गई।

वैज्ञानिकों का कहना था कि इस प्रयोग में वह व्यक्ति पाँच सात सेकेंड ही सोया था और इस अवधि में उसके लिए वर्षों का घटनाक्रम गुजर गया। यह प्रयोग आइंस्टीन के समय सिद्धाँत की सत्यता जानने के लिए किया जा रहा था, जिसके अनुसार समय का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। वह दो घटनाओं के बीच की दूरी मात्र है, जो कुछ भी हो सकता है, परंतु मनुष्य को अपने ज्ञान एवं अनुभूति के आधार पर ही लंबी अथवा छोटी लगती है।

क्या सचमुच समय कुछ भी नहीं है? सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक 24 घंटे होते हैं। इन चौबीस घंटों में हम कितने ही काम करते हैं। घड़ी अपनी चाल से चलती है। सूर्य अपनी गति से क्षितिज के इस पार से उस पार तक पहुँचता है। सब कुछ तो स्पष्टतः प्रतीत होता है, परंतु आइंस्टीन के अनुसार यह सब एक भ्रम मात्र है। फिर तो सारा संसार ही भ्रम हो जाएगा।

आइंस्टीन से पहले इंद्रिय बुद्धि द्वारा होने वाले अनुभवों और प्रत्यक्ष जगत् को ही सत्य समझा जाता था। इसके पूर्व के वैज्ञानिकों की मान्यता थी कि आप दौड़ रहे हों अथवा बैठे हों, जाग रहे हों या सोए हों, समय अपनी सीधी बँधी रफ्तार से सीधा आगे बढ़ता है, परंतु आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धाँत ने इस मान्यता को छिन्न-भिन्न कर दिया और यह सिद्ध हो गया कि समय कुछ घटनाओं का जोड़ भर है। यदि घटनाएँ न हों, तो समय का कोई अस्तित्व नहीं होता और घटनाएँ भी द्रष्टा की अनुपस्थिति में अस्तित्वहीन होती हैं।

इस बात को कतिपय उदाहरणों द्वारा आसानी से समझा जा सकता है समय को मापने का सबसे बड़ा मापदंड घड़ी है। घड़ी में सेकेंड की सुई 12 से चलकर 12 तक पहुँचने पर एक मिनट होता है। मिनट की सुई इतनी दूरी तय कर ले, तो मान लिया जाता है कि एक घंटा हो गया और घंटे की सुई इतनी दूरी तय कर लेने पर आधा दिन आधी रात बता देती है और 12 से 12 तक दूसरी बार पहुँचने पर 24 घंटे या दिन पूरा हुआ मान लिया जाता है। आइंस्टीन का कहना था कि घड़ी की सुई की गति बढ़ा दी जाए, तो यही 24 घंटे 36 घंटे में भी बदल सकते हैं और कम कर दी जाए तो 2 या उससे भी कम चाहे जितने हो सकते हैं अर्थात् यह बात अर्थहीन है कि दिन 24 घंटे का होता है अथवा उससे कम ज्यादा का।

इसी के अनुसार घड़ी का यह समय विभाजन पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेने वाली घटना को आँकने के लिए किया गया। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पृथ्वी एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है, तो 24 घंटे हो जाते हैं, लेकिन चंद्रमा सूर्य की परिक्रमा करने में इससे भी अधिक समय लगाता है। मंगल उससे भी अधिक और शुक्र का एक दिन नहीं होता है। वहाँ इससे अधिक समय में दिन रात होता है अर्थात् वहाँ के लिए दूसरे टाइम स्केल (समय मापदंड) निर्धारित करने पड़ेंगे।

आइंस्टीन के अनुसार समय इसी प्रकार घटनाओं पर निर्भर करता है। सोए हुए व्यक्ति के लिए बाहरी जगत् में भले ही पाँच मिनट का समय व्यतीत हुआ हो, किंतु वह जो स्वप्न देख रहा होता है, उसमें उन पाँच मिनटों के भीतर वर्षों की घटनाएँ घटित हो जाती हैं, तो उसके लिए पाँच मिनट बीम गए, यह कहना सही होगा अथवा यह कहना कि वर्षों बीत गए! यह विचारणीय है।

योगी क्षण भर में सामने वाले का भूत, भविष्य, वर्तमान जान जाते हैं जबकि सामान्य व्यक्ति उसका लेखा जोखा लें, तो उसे जन्म से बचपन, बचपन से यौवन और वर्तमान जानने में ही काफी लंबा समय लग जाएगा, जबकि भविष्य उसके लिए अविज्ञात स्तर का बना रहता है। किसी प्रकार उसे भी जानने की कोई विधा उसके पास हो, तो जन्म से मृत्युपर्यंत की घटनाओं की जानकारी एवं उनका आकलन, परीक्षण और विश्लेषण करने में शायद एक व्यक्ति का संपूर्ण जीवन लग जाए। ऐसा क्यों होता है?

इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि स्थूल जगत् और सूक्ष्म जगत् के ‘टाइम स्केल’ भिन्न भिन्न हैं। दोनों जगतों की घटनाओं को एक ही मापदंड द्वारा आँका और मापा नहीं

जा सकता।

एक बार सूर्य विज्ञान के प्रणेता स्वामी विशुद्धानंद के पास रामजीवन नामक उनका एक शिष्य आया और अपनी टूटी हुई रुद्राक्ष माला को उन्हें देते हुए योग विद्या द्वारा उसे शास्त्रीय ढंग से गूँथ देने का आग्रह किया। विशुद्धानंद ने रुद्राक्ष के मनकों को एक झोले में रखा और थैले का मुँह बंद कर उसे दो तीन बार ऊपर नीचे किया। इसके बाद तैयार माला को निकाल कर उसे सौंप दिया। शिष्य के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, कारण कि उसकी कल्पना में माला तैयार होने में कम से कम पाँच सात मिनट लगने चाहिए थे, पर वह तो क्षणमात्र में तैयार हो गई बाद में स्वामी जी ने बताया कि इसे ‘क्षण विज्ञान’ के प्रयोग से इतनी जल्दी बनाया जा सका।

प्रसंगवश यहाँ अध्यात्म जगत् की चर्चा हो गई। भौतिक जगत् में पुनः वापस लौटते हुए अब यह देखते हैं कि वहाँ घटनाओं के अतिरिक्त समय का अस्तित्व और किस पर निर्भर है। विचार मंथन से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य की बोध शक्ति पर भी समय की सत्ता आधारित है। उसका द्रुत या धीमी गति से गुजरना, यह पूर्णतः उसके बोध पर आश्रित है। कई बार ऐसा लगता है कि समय बिताए नहीं बीतता।

दूर स्थान से अपने किसी अति आत्मीय स्वजन का दुःखद समाचार आया हो और वहाँ पहुँचना हो, तो गाड़ी आने में दस मिनट की देरी भी घंटों सी लगती है, क्योंकि व्यक्ति उस समय तनावग्रस्त और उद्विग्न मनःस्थिति में होता है, लेकिन किसी सुखद समारोह में भाग लेते समय, विवाह शादी के अवसर पर यह पता भी नहीं चलता कि समय कब बीत गया। उस समय व्यक्ति की बोध शक्ति चेतना पूरी तरह तन्मय हो जाती और समय भागता सा प्रतीत होता हैं।

इसे मच्छर के भी उदाहरण से समझा जा सकता है। मच्छर की आयु कुछ घंटों की होती है। वह इतने में ही एक मनुष्य की संपूर्ण उम्र जी लेता है। इतनी अवधि में ही वह बच्चा, जवान, बूढ़ा सब कुछ हो जाता है। और हमारे अनुसार थोड़े से घंटों तथा उसके अपने अनुसार 70-80 वर्ष की आयु पूरी कर मर भी जाता है। इसका कारण प्रत्येक जीव जंतु की अलग अलग बोध सामर्थ्य है और उसी के अनुसार समय सिमटता और फैलता है।

घटनाओं और बोध शक्ति के अतिरिक्त सापेक्षतावाद के अनुसार समय की चाल गति पर भी निर्भर करती है। आइंस्टीन ने सन 1940-50 में सापेक्षता का यह सिद्धाँत प्रतिपादित किया कि गति का समय पर भी प्रभाव पड़ता है। उसके अनुसार गति जितनी बढ़ेगी, समय की चाल उतनी ही घटती जाएगी। उदाहरण के लिए एक अंतरिक्ष यान प्रकाश की गति अर्थात् एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड की गति से चलता हो, तो उसमें बैठे व्यक्ति के लिए समय की चाल एक बटा सत्तर हजार हो जाएगी अर्थात् प्रकाश की गति से चलने वाले यान में बैठकर कोई व्यक्ति नौ प्रकाश वर्ष (नौ वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करे) दूर स्थित किसी तारे पर जाए और वहाँ से तुरंत लौट पड़े तो इस यात्रा में अठारह वर्ष लगेंगे, लेकिन उस यान में बैठे व्यक्ति के लिए यह समय अठारह वर्ष का सत्तर हजारवाँ भाग अर्थात् सवा दो घंटे ही होगा।

ऐसा भी नहीं कि पृथ्वी पर सवा दो घंटे ही बीतेंगे। पृथ्वी पर तो वही अठारह वर्ष ही व्यतीत होंगे। उस व्यक्ति के सगे संबंधी भी अठारह वर्ष बूढ़े हो चुके होंगे। जिन बच्चों को वह 12-13 वर्ष का छोड़ गया होगा, वे 30-31 वर्ष के मिलेंगे। उसकी पत्नी जो उससे उम्र में मात्र दो वर्ष छोटी 35 वर्ष की रही होगी, वह बूढ़ी हो चुकेगी, किंतु वह व्यक्ति जिस आयु और जिस स्थिति में गया होगा, उसमें सिर्फ सवा दो घंटे का परिवर्तन हुआ होगा अर्थात् उसकी आयु सवा दो घंटे ही बीती होगी। यह भी कहा जा सकता है कि वह अपनी पत्नी से आयु में सोलह वर्ष छोटा हो जाएगा।

यह बात पढ़ने सुनने में अनहोनी और आश्चर्यजनक लगती है कि कोई व्यक्ति 18 वर्ष बाहर रहकर आए और जब लौटे, तो ऐसे मानो कुछ घंटे ही बाहर रहा हो। उसके चेहरे और शक्ल में भी कोई परिवर्तन न आए। उसे देखकर कोई यह भी न कह पाए कि इस बीच वह 18 वर्ष और बड़ा हो चुका है, लेकिन आइंस्टीन ने प्रमाणों और प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है। सापेक्षता के इस सिद्धांत को ‘क्लॉक पैराडॉक्स (समय का विरोधाभास) कहा गया है।

यद्यपि अभी कोई ऐसा यान बन नहीं सकता है, जिसके द्वारा की गई यात्रा से इस सिद्धाँत की सचाई को अनुभूत किया जा सके, परंतु समय विरोधाभास के जो समीकरण आइंस्टीन ने दिए, उनके अनुसार अमेरिका के भौतिकशास्त्री जोजफ हाफले और खगोल शास्त्री रिचर्ड किटिंग ने सन 1979 में दो बार प्रयोग किए।

उन्होंने अपने साथ चार परमाणु घड़ियाँ ली और उनके साथ सर्वाधिक तीव्र गति से उड़ने वाले यान द्वारा पृथ्वी के दो चक्कर लगाए। ज्ञातव्य है कि परमाणु घड़ियाँ सेकेंड के खरबवें हिस्से तक का समय सही सही बता देती है। हाफले और कीटिंग ने भूल चूक से बचने के लिए हर तरह की सावधानियाँ बरती। प्रयोग पूरा होने के बाद उनने पाया कि तीव्र गति के कारण परमाणु घड़ियों ने अंतर बता दिया। इसके बाद दोनों वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि आइंस्टीन का ‘क्लॉक पैराडॉक्स’ सिद्धाँत सही है।

समय की यह प्रतीति अनुभवकर्ता की गति पर आधारित थी। इसके अतिरिक्त घटनाएँ और बोध भी इस प्रतीति के माध्यम हैं। इस प्रकार सापेक्षता के यह समस्त सिद्धाँत वेदाँत की मूल मान्यताओं का समर्थन करते हैं। समय को जानने का सर्वसुलभ और सबसे सरल माध्यम घटनाएँ है। इसके अनुसार यही कहा जा सकता है कि यह विश्व और कुछ नहीं घटनाओं का समुच्चय है तथा घटनाएँ व्यक्ति की बोधशक्ति, संकल्प चेतना का ही प्रतिफल है।

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सामान्य सापेक्षता सिद्धांत,;-

सामान्य सापेक्षता सिद्धांत, जिसे अंग्रेजी में ''जॅनॅरल थिओरी ऑफ़ रॅलॅटिविटि'' कहते हैं, एक वैज्ञानिक सिद्धांत है जो कहता है कि ब्रह्माण्ड में किसी भी वस्तु की तरफ़ जो गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव देखा जाता है उसका असली कारण है कि हर वस्तु अपने मान और आकार के अनुसार अपने इर्द-गिर्द के दिक्-काल (स्पेस-टाइम) में मरोड़ पैदा कर देती है। बरसों के अध्ययन के बाद जब 1916 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने इस सिद्धांत की घोषणा की तो विज्ञान की दुनिया में तहलका मच गया और ढाई-सौ साल से क़ायम आइज़क न्यूटन द्वारा 1687में घोषित ब्रह्माण्ड का नज़रिया हमेशा के लिए उलट दिया गया। भौतिक शास्त्र पर इसका इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि लोग आधुनिक भौतिकी (माडर्न फ़िज़िक्स) को शास्त्रीय भौतिकी (क्लासिकल फ़िज़िक्स) से अलग विषय बताने लगे और अल्बर्ट आइंस्टीन को आधुनिक भौतिकी का पिता माना जाने लगा।

आइंस्टीन का "विशेष सापेक्षता का सिद्धांत" सब से पहले साल 1905 में प्रस्तावित किया गया....

दिक्-काल (स्पेस-टाइम) ;-

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का असली स्रोत दिक्-काल का मुड़ाव है, ठीक एक चादर के बीच में रखे एक भारी गोले की तरहआइनस्टाइन क्रॉस एक ऐसे क्वासर का नाम है जिसके आगे एक बड़ी आकाशगंगा एक गुरुत्वाकर्षक लेंस बन कर उसकी चार छवियाँ दिखाती है- ग़ौर से देखने पर पता लगता है कि यह चारों वस्तुएं वास्तव में एक ही हैं

दिक् संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है इर्द-गिर्द की जगह। इसे अंग्रेजी में "स्पेस" कहते हैं। मनुष्य दिक् के तीन पहलुओं (आयामों या डिमॅनशनों) को भाप सकने की क्षमता रखते हैं- ऊपर-नीचे, आगे-पीछे और दाएँ-बाएँ। आम जीवन में मनुष्य दिक् में कोई बदलाव नहीं देखते।

न्यूटन की भौतिकी कहती थी कि अगर अंतरिक्ष में दो वस्तुएँ एक-दूसरे से एक किलोमीटर दूर हैं और उन दोनों में से कोई भी न हिले, तो वे एक-दूसरे से एक किलोमीटर दूर ही रहेंगी। हमारा रोज़ का साधारण जीवन भी हमें यही दिखलाता है। लेकिन आइनस्टाइन ने कहा कि ऐसा नहीं है। दिक् खिच और सिकुड़ सकता है। ऐसा भी संभव है कि जो दो वस्तुएँ एक-दूसरे से एक किलोमीटर दूर हैं वे स्वयं न हिलें, लेकिन उनके बीच का दिक् कुछ परिस्थितियों के कारण फैल कर सवा किलोमीटर हो जाए या सिकुड़ के पौना किलोमीटर हो जाए।

न्यूटन की शास्त्रीय भौतिकी में यह कहा जाता था कि ब्रह्माण्ड में हर जगह समय (काल) की रफ़्तार एक ही है। अगर आप एक जगह टिक कर बैठे हैं और आपका कोई मित्र प्रकाश से आधी गति की रफ़्तार पर दस साल का सफ़र तय करे तो, उस सफ़र के बाद, आपके भी दस साल गुज़र चुके होंगे और आपके दोस्त के भी। लेकिन आइनस्टाइन ने इस पर भी कहा कि यह विश्वास ग़लत​ है। जब कोई चीज़ गति से चलती है, उसके लिए समय धीरे हो जाता है और वह जितना तेज़ चलती है, समय उतना ही धीरे हो जाता है। आपका मित्र अगर अपने हिसाब से दस वर्ष तक रोशनी से आधी गति पर यात्रा कर के लौट आए, तो उसके तो दस साल गुज़रेंगे लेकिन आपके साढ़े ग्यारह साल गुज़र चुके होंगे।

आइनस्टाइन ने सापेक्षता सिद्धांत में दिखाया कि वास्तव में दिक् के तीन और काल का एक मिलाकर ब्रह्माण्ड में चार पहलुओं वाला दिक्-काल है जिसमे सारी वस्तुएं और उर्जाएँ स्थित होतीं हैं। यह दिक्-काल स्थाई नहीं है- न दिक् बिना किसी बदलाव के होता है और न यह ज़रूरी है कि समय का बहाव हर वस्तु के लिए एक जैसा हो। दिक्-काल को प्रभावित कर के उसे मरोड़ा, खींचा और सिकोड़ा जा सकता है और ऐसा ही ब्रह्माण्ड में होता है। इस सिद्धान्त के माध्यम से ही समय यात्रा की अवधारणा निर्मित हुई है।

मनुष्यों को दिक्-काल में बदलाव क्यों नहीं प्रतीत होता ;-

दिक्-काल में बदलाव हर वस्तु और हर रफ़्तार पैदा करती है लेकिन बड़ी वस्तुएं और प्रकाश के समीप की रफ्तारें अधिक बदलाव पैदा करती हैं। मनुष्यों का आकार इतना छोटा और उसकी रफ़्तार इतनी धीमी है कि उन्हें सापेक्षता सिद्धांत के असर अपने जीवन में नज़र ही नहीं आते, लेकिन जब वह ब्रह्माण्ड में और चीज़ों का ग़ौर से अध्ययन करते हैं तो सापेक्षता के चिन्ह कई जगहों पर पाते हैं। जब वस्तु का वेग प्रकाश के वेग का 5% भी हो जाए, तो सापेक्षता के सिद्धान्त के चिन्ह हमे दिखाई देने लगते है।

सापेक्षता और गुरुत्वाकर्षण ;-

न्यूटन का मानना था कि हर वस्तु में अपनी ओर खींचने की एक शक्ति होती है जिसे उसने गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) का नाम दिया। पृथ्वी जैसी बड़ी चीज़ में यह गुरुत्वाकर्षण बहुत अधिक होता है, जिससे हम पृथ्वी से चिपके रहते हैं और अनायास ही उड़ कर अंतरिक्ष में नहीं चले जाते। लेकिन यह न्यूटन नहीं बता पाये कि गुरुत्वाकर्षण बल वास्तव में किस प्रकार कार्य करता है और क्यों कार्य करता है।

आइनस्टाइन ने कहा कि आपेक्षिकता के सिद्धान्त के अनुसार यह विचार कि भौतिक वस्तुएँ एक दूसर को आकर्षित करती हैं, एक भ्रम है, जो प्रकृति संबंधी गलत याँत्रिक धारणाओं के कारण पैदा हुआ है। उन्होंने कहा कि पृथ्वी बड़ी है और उसकी वजह से उसके इर्द-गिर्द का दिक्-काल मुड़ गया है और अपने ऊपर तह हो गया है। हम इस खिचे-मुड़े दिक्-काल में रहते हैं और इस मुड़न की वजह से पृथ्वी के क़रीब धकेले जाते हैं।

इसकी तुलना एक चादर से की जा सकती है जिसके चार कोनो को चार लोगों ने खींच के पकड़ा हो। अब इस चादर के बीच में एक भारी गोला रख दिया जाए, तो चादर बीच से बैठ जाएगी, यानि उसके सूत में बीच में मुड़न पैदा हो जाएगी। अब अगर एक हलकी गेंद हम चादर के कोने पर रखे तो वह लुड़क कर बड़े गोले की तरफ़ जाएगी। आइनस्टाइन ने कहा कि कोई अनाड़ी आदमी यह देख कर कह सकता है कि छोटी गेंद को बड़े गोले ने खींचा इसलिए गेंद उसके पास गई। लेकिन असली वजह थी कि गेंद ज़मीन की तरफ़ जाना चाहती थी और गोले ने चादर में कुछ ऐसी मुड़न पैदा की कि गेंद उसके पास चली गई।

इसी तरह से उन्होंने कहा कि यह एक मिथ्या है कि गुरुत्वाकर्षण किसी आकर्षण की वजह से होता है। गुरुत्वाकर्षण की असली वजह है कि हर वस्तु जो अंतरिक्ष में चल रही होती है, वह दिक् के ऐसी मुड़न के प्रभाव में आकर किसी बड़ी चीज़ की ओर चलने लगती है।

वस्तुत: गुरुत्वाकर्षण जड़ता का एक भाग मात्र है, तारे और ग्रहों की गतिविधियाँ, उनके स्वभावगत जड़त्व (इनर्शिया) से उत्पन्न होतीं हैं और उनका मार्ग दिक्-काल-सतति (स्पेस-टाइम-कॉन्टिनुअम) के वृत्तीय तत्वों पर निर्भर करता है। जिस प्रकार चुम्बक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र होता है उसी प्रकार खगोलीय वस्तु अपने चारों ओर के आकाश में एक क्षेत्र बिखेरती है। जिस तरह चुंबकीय क्षेत्र में एक लोहे के टुकड़े की गतिविधि क्षेत्र की बनावट से निर्देशित होती है उसी तरह गुरुत्वीय क्षेत्र में किसी वस्तु का मार्ग उस क्षेत्र की ज्यामितिक अवस्था से निर्धारित होता है।

गुरुत्वाकर्षण और प्रकाश;-

एक गैलेक्सी के आगे एक बड़ा ब्लैक होल (काला छिद्र) है - जैसे-जैसे गैलेक्सी उसके पीछे से निकलती है, उसका प्रकाश ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षक लेंस के प्रभाव से मुड़ता है।

आइनस्टाइन के इस सनसनी फैला देने वाले सिद्धांत का एक बहुत बड़ा प्रमाण रोशनी पर गुरुत्वाकर्षण का असर देखने से आया। न्यूटन की भौतिकी में सिद्धांत था कि दो वस्तुएं एक-दूसरे को दोनों के द्रव्यमान (अंग्रेजी में "मास") के अनुसार खींचती हैं। लेकिन प्रकाश का तो द्रव्यमान होता ही नहीं, यानि शून्य होता है। तो न्यूटन के मुताबिक़ जिस चीज़ का कोई द्रव्यमान या वज़न ही नहीं उसका किसी दूसरी वस्तु के गुरुत्वाकर्षण से खिचने का सवाल ही नहीं बनता चाहे दूसरी वस्तु कितनी भी बड़ी क्यों न हो।

प्रकाश हमेशा एक सीधी लकीर में चलता ही रहता है। लेकिन अगर आइनस्टाइन सही है और किसी बड़ी वस्तु (जैसे कि ग्रह या तारा) की वजह से दिक् ही मुड़ जाए, तो रोशनी भी दिक् के मुड़ने के साथ मुड़ जानी चाहिए। यानि ब्रह्माण्ड में स्थित बड़ी वस्तुओं को लेंस का काम करना चाहिए- जिस तरह चश्मे, दूरबीन या सूक्ष्मबीन का लेंस प्रकाश मोड़ता है उसी तरह तारों और ग्रहों को भी मोड़ना चाहिए।

1924 में एक ओरॅस्त ख़्वोलसन नाम के रूसी भौतिकविज्ञानी ने आइनस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत को समझकर भविष्यवाणी की कि ऐसे गुरुत्वाकर्षक लेंस ब्रह्माण्ड में ज़रूर होंगे। पचपन साल बाद, 1979 में पहली दफ़ा यह चीज़ देखी गई जब ट्विन क्वासर नाम की वस्तु की एक के बजाए दो-दो छवियाँ देखी गई। उसके बाद काफ़ी दूर-दराज़ वस्तुओं की ऐसी छवियाँ देखी जा चुकी हैं जिनमें उन वस्तुओं और पृथ्वी के बीच कोई बहुत बड़ी अन्य वस्तु रखी हो जो पहली वस्तु से आ रही प्रकाश की किरणों पर लेंसों का काम करे और उसकी छवि को या तो मरोड़ दे या आसमान में उसकी एक से ज़्यादा छवि दिखाए।

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Theory Of Relativity (सापेक्षता का सिद्धांत);-

टोलेमी , खगोलशास्त्री ने हमें बताया था कि धरती इस सूर्यमाला का

केंद्रबिंदु हैं और सूरज इसका चक्कर लगाता है ।ये सिद्धांत कई शताब्दी तक चलता रहा लेकिन उसके बाद निकोलस कोपरलिक्स नाम के इस वैज्ञानिक अपने प्रयोगो द्वारा ये पाया कि धरती सूर्यमाला का केंद्रबिंदु ना होकर सूरज इसका केंद्रबिंदु है और धरती सूरज का चक्कर लगाती है। जिसका आगे चल कर केप्लर इस वैज्ञानिक ने समर्थन दिया और साथ कि साथ ये सिद्धात प्रतिपादित किया कि बाकी ग्रह भी धरती कि तरह सूरज का चक्कर लगाती है।

फिर उसके बाद आया गलेलिओ. गलेलिओ ने भी इस बात को आगे बढ़ाकर इसमें और सुधार किये। उसके बाद न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति का शोध लगाया और साथ ही साथ उस ज़माने में प्रसिद्ध क्लासिकल थेअरी ऑफ रीलेटिविटी से ये बताया कि किसी भी स्थायी अथवा गतिशील माध्यम में भौतिकशास्त्र के नियम नही बदलेंगे मतलब स्थान और समय जैसेके तैसे ही रहेंगे। ये था भौतिकशास्त्र और खगोलशास्त्र

सापेक्षता के सिद्धांत ;-

आइंस्टीन के इस सापेक्षता के सिद्धांत में 2 भाग है एक विशेष सापेक्षतावाद और जनरल सापेक्षतावाद।इस विशेष सापेक्षतावाद में 3 कॉन्सेप्ट है ..

1.रीलेटिविटी ऑफ़ स्पेस

2.रीलेटिविटी ऑफ़ टाइम

3.रीलेटिविटी ऑफ़ मास

न्यूटन ने हमने बताया था कि किसे भी स्थायी और गतिशील अवस्था में भौतिकशास्त्र के नियम यानि स्पेस और टाइम नही बदलेंगे जो कि सोहलवीं सदी से लेकर उन्नीसवी सदी के अंतिम दशक तक कायम रहा। लेकिन तब तक जबतक मैक्सवेल ने हमें ये नही बताया कि एक ऐसे गति भी है जो कि स्थिर है और वो है - प्रकाश की गति । इसी बात के आधार पर आइंस्टीन ने अपना सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया.

रीलेटिविटी ऑफ़ टाइम के बारे में

हमे आइंस्टीन ने बताया है कि वक़्त भी धीमा हो सकता है । पर ये बात इतनी विचित्र और अजीबोगरीब है कि हम समझ ही नही पाते और अक्सर हमारा दिमाग इस बात को मानने के लिए इंकार कर देता है कि वक़्त कैसे स्लो यानि धीमा हो सकता है.... उदाहरण के लिए आपको एक स्थान से दूसरे स्थान जाना है. जो कि आप अपने बाईक से जाने वाले है। आपको 40 कि स्पीड से 10 मिनिट का वक़्त लगने वाला है ।तो सोचिये कि आप ने अपनी बाईक क़ी स्पीड 80 कर दी तो कितना वक़्त लगेगा। जाहिर सी बात है जब आपने स्पीड बड़ा दी है तो वक़्त कम लगेगा ।एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए मतलब आप ने बाइक कि स्पीड 80 क़ी तो वक़्त 5 मिनिट लगेगा क्योकि कि 40 कि स्पीड से 10 मिनिट का वक़्त लगता हैं ठीक है तो अब आप अपनी बाइक को 80 के डबल यानि 160 कि स्पीड से दौड़ाये तो वक़्त उससे भी आधा लगेगा यानि सिर्फ ढाई मिनिट लगेगा ।अब अपनी बाईक को 160 +160 यानि 320 की स्पीड से दौड़ाइये।यानि आपको 160 वाली स्पीड के मुताबिक ढाई मिनिट के हिसाब से सवा एक मिनिट लगेगा।अब आप ऐसा सोचो कि आपकी बाइक 3००००० कि स्पीड से चल रही है तो आपको एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए कितना वक़्त लगेगा।

हम जानते है कि एक बाइक इतने स्पीड चलना असम्भव हैं लेकिन एक इस दुनिया में एक ऐसे स्पीड यानि गति भी हैं जो कि 3००००० कि मी पर सेकंड हैं वो हैं ''प्रकाश की गति' ।और अगर आप किसे ऐसे अंतरिक्ष यान में बैठे जो कि प्रकाश की गति से चलता हो तो जब आप प्रकाश की गति से ,अंतरिक्ष से पूरा एक साल चक्कर लगा के धरती पर वापस आयेंगे ;तो आपको लगेगा कि धरती पर भी एक ही साल हो गया हैं।परन्तु धरती पर लाखो करोडो साल गुजर चुके होंगे ।और अल्बर्ट आइंस्टीन ने पहले ही बता दिया हैं कि टाइम के इस धीमेपन को हम तभी महसूस कर सकते हैं जब हम किसी ऐसी गति से चले जो कि प्रकाश की गति के करीब हो। जबकि हमारे आम जीवन में दुनिया की सबसे तेज चलने वाली रेलगाड़ी भी हमें ये अनुभव नहीं दिला सकती । क्योंकि उसकी गति 3 लाख कि.मी. /सेकेंड वाली प्रकाश की गति की तुलना में रत्ती मात्र भी नहीं। जो रेलगाड़ी सिर्फ 1 या डेड घंटा 500 कि मी के आसपास चलती हैं.. और प्रकाश की गति हैं 3००००० किमी पर सेकंड ।यही कारण है कि समय की सापेक्षता को हम आम जिंदगी में महसूस नहीं कर पाते। और शायद कभी कर भी नही पाएंगे क्यों कि हम इंसानो के लिए प्रकाश की गति से चलने वाले किसे चीज को बनाना लगभग नामुमकिन हैं.. और इस बात का महत्वपूर्ण प्रयोग तब हुआ जब १९७७ में नासा ने सेटेलाइट पर २ घड़िया छोड़ी जो पृथ्वी का चक्कर लगाकर जब वापस आये तो उन घड़ियों की पिंग पृथ्वी पर चलने वाली घडी कि तुलना में धीमी जाना चाहिए थी और ऐसा हुआ जो कि सापेक्षता के अनुसार सही ही था ..

रीलेटिविटी ऑफ़ स्पेस;-

रीलेटिविटी ऑफ़ स्पेस यानि अंतर के सापेक्षता कि अगर अंतरिक्ष में दो वस्तुएँ एक-दूसरे से एक किलोमीटर दूर हैं और उन दोनों में से कोई भी न हिले, तो वे एक-दूसरे से एक किलोमीटर दूर ही रहेंगी। हमारा रोज़ का साधारण जीवन भी हमें यही दिखलाता है। लेकिन आइनस्टाइन ने कहा कि ऐसा नहीं है। स्थान खिच और सिकुड़ सकता है। ऐसा भी संभव है कि जो दो वस्तुएँ एक-दूसरे से एक किलोमीटर दूर हैं वे स्वयं न हिलें, लेकिन उनके बीच का अंतर कुछ परिस्थितियों के कारण फैल कर सवा किलोमीटर हो जाए या सिकुड़ के पौना किलोमीटर हो जाए। लेकिन हम स्पेस कि इस सापेक्षता को भी तभी महसूस कर सकते हैं जब किसी दो चीजो के स्पेस में प्रकाश कि गति के आसपास कि गति का प्रभाव हो। रीलेटिविटी ऑफ़ मास;-

रीलेटिविटी ऑफ़ मास यानि E=mc2 ये रीलेटिविटी ऑफ़ मास का फार्मूला हैं जिसके आधार पर वैज्ञानिको ने अँटमबम बनाया E=mc2 इसका पूरा वाक्य E मतलब ENERGY और M यानि MASS और C यानि प्रकाश का वेग और इसका मतलब हैं energy (ऊर्जा) में। और Energy, mass में बदल सकती है। और आइंस्टाइन ने हमें बताया कि mass भी relative है और किसी वस्तु की गति बढ़ने से उसका mass भी बढ़ेगा। पर वो गति भी प्रकाश कि गति हो या उसके आसपास हो इसका मतलब ये नही होता कि किसी गति बढ़ने से उसका आकर भी बढ़ेगा बल्कि उस चीज कि ऊर्जा निर्माण करने कि वृद्धि बढ़ेगी ..

सामान्य सापेक्षतावाद;-

05 FACTS;-

1- हम सापेक्षता के दूसरे भाग यानि General Theory of Relativity को सामान्य सापेक्षतावाद और व्यापक सापेक्षतावाद के नाम से भी जानते

हैं। इस सापेक्षतावाद में आइंस्टीन ने हमे ये बताया कि गुरुत्वकर्षण कैसे और क्यों काम करता हैं। और ये उनकी दूसरे क्रन्तिकारी अवधारणा थी।

परन्तु प्रश्न ये हैं कि जिस तरह आइंस्टीन ने अपना विशेष सापेक्षतावाद का सिद्धांत प्रकाश के गति के स्थिर मान के आधार पर प्रस्थापित किया था ;उसी तरह किस बात के आधार पर आइंस्टीन ने अपना ये दूसरा सिद्धांत प्रस्थापित किया।

2-मान लीजिये कि सूर्य नष्ट हो गया है तो हमें इसका पता आठ मिनट बाद लगेगा क्योंकि सूर्य की रोशनी धरती तक पहुंचने में आठ मिनट लेती है। पर न्यूटन के अनुसार gravity का प्रभाव तात्कालिक होता है इसलिए सूर्य के गुरूत्वाकर्शण प्रभाव के नष्ट होने का पता तुरंत यानि प्रकाश के धरती पर पहुंचने से पहले ही लग जाना चाहिए जो कि विशेष सापेक्षतावाद के मूलभूत सिद्धांत से मेल नहीं खाती। इसके अनुसार कोई भी Physical Intaraction या परिणाम प्रकाश की गति से ज्यादा तेजी से सफर नहीं कर सकता। इसी विरोधाभास