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क्या है ध्यान का विज्ञान ?क्या है दिव्य -दृष्टि के जागरण का केंद्र?


ध्यान क्या है क्या तुम ध्यान करना चाहते हो ? तो ध्यान रखना ! ध्यान में न तो सामने कुछ हो और न तुम्हारे पीछे ही कुछ हो। अतीत को मिट जाने दो और भविष्य को भी। स्मृति और कल्पना दोनों को शून्य हो जाने दो। फिर न तो समय होगा और न आकाश ही होगा। और जिस क्षण कुछ भी नहीं होता है, तभी जानना कि तुम ध्यान में हो। महामृत्यु का यह क्षण ही नित्य-जीवन का क्षण भी है।’लेकिन, अपने को अतीत और भविष्य से, स्मृति और कल्पना से शून्य कैसे करना ? समय और आकाश का लीन होना तो ध्यान की चरम अवस्था है। वही तो निर्विचार और मौन है, समाधि और मोक्ष और निर्वाण है। ध्यान का आरंभ तो वह हो सकता है, जो ओशो द्वारा बताई गई अनेक ध्यान-विधियों का पहला या दूसरा चरण कहाता है। मिसाल के लिए ‘सक्रिय-ध्यान’ में तीव्रतम सांस लेना, हाथ-पाँव उछालकर, चीख-चिल्लाकर शरीर और मन का रेचन करना आरंभ हो सकता है। जहाँ हम हैं, वहीं से तो हमें आरंभ करना है।ध्यान चेतना की अंतर्यात्रा है, जिसमें चेतना बोधपूर्वक, बाहर से भीतर की ओर, परिधि से केंद्र की ओर, पर से स्वयं की ओर, अथवा दृश्य से द्रष्टा की ओर प्रतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में, अस्तित्व का जो एक ही जीवंत क्षण है, जो अभी और यहीं है और जिसमें समस्त जीवन समाया है, उससे संबद्ध और संपृक्त होना, उसमें ही होना ध्यान है।इस ध्यान को साधने से चेतना निर्बंध और निर्ग्रंथि, अखंड और अडोल, असंग और असीम अवस्था को उपलब्ध होती है। थोड़े शब्दों में-ध्यान, समाधि और अंततः आत्मबोध का, परमात्मा का द्वार बनता है।

हम उस बड़े पागलखाने के हिस्से हैं, उसमें ही पैदा होते हैं, उसमें ही बड़े होते हैं, उसमें ही जीते हैं-और इसलिए कभी पता भी नहीं चल पाता कि जीवन में जो भी पाने योग्य है, वह सभी हमारे हाथ से चूक गया है। और जिसे हम सुख कहते हैं और जिसे हम शांति कहते हैं, उसका न तो सुख में कोई संबंध है और न शांति से कोई संबंध है। और जिसे हम जीवन कहते हैं, शायद वह मौत से किसी भी हालत में बेहतर नहीं है। लेकिन परिचय कठिन है। चारों ओर शोरगुल की दुनिया है। चारों ओर शब्दों का, शोरगुल का उपद्रवग्रस्त वातावरण है। उस सारे वातावरण में हम वे रास्ते भूल जाते हैं, जो भीतर मौन और शांति में ले जा सकते हैं। इस देश में-और इस देश के बाहर भी-कुछ लोगों ने अपने भीतर भी एकांत द्वीप की खोज कर ली है। न तो यह संभव है कि सभी की नावें डूब जाएँ, न यह संभव है कि इतने तूफान उठें, और न यह संभव है कि इतने निर्जन द्वीप मिल जाएँ, जहाँ सारे लोग शांति और मौन का अनुभव कर सकें। लेकिन, फिर भी यह संभव है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर ही उस निर्जन द्वीप को खोज ले।

ध्यान अपने ही भीतर उस निर्जन द्वीप की खोज का मार्ग है। यह भी समझ लेने जैसा है कि दुनिया के सारे धर्मों में बहुत विवाद हैं-सिर्फ एक बात के संबंध में विवाद नहीं है-और वह बात ध्यान है। मुसलमान कुछ और सोचते; हिंदू कुछ और, ईसाई कुछ और, पारसी कुछ और, जैन, बौद्ध और। उनके सिद्धांत सबके बहुत भिन्न हैं। लेकिन एक बात के संबंध में इस पृथ्वी पर कोई भी भेद नहीं है, और वह यह कि जीवन के आनंद का मार्ग ध्यान से होकर जाता है। और परमात्मा तक अगर कोई भी कभी पहुँचा है, तो ध्यान की सीढ़ी के अतिरिक्त और किसी सीढ़ी से नहीं। वह चाहे, जीसस, और फिर चाहे बुद्ध, और चाहे मुहम्मद, और चाहे महावीर-कोई भी, जिसने जीवन की परम धन्यता को अनुभव किया है, उसने अपने ही भीतर में डूब के उस निर्जन द्वीप की खोज कर ली। इस ध्यान के विज्ञान के संबंध में दो-तीन बातें आपसे कहना चाहूँगा। पहली बात तो यह कि साधारणतः जब हम बोलते हैं, तभी हमें पता चलता है कि हमारे भीतर कौन-कौन विचार चलते हैं। ध्यान का विज्ञान इस स्थिति को अत्यंत ऊपरी अवस्था मानता है। अगर एक आदमी न बोले, तो हम पहचान भी न पाएँ कि वह कौन है, क्या है ? शब्द हमारे बाहर प्रकट होता है, तभी हमें पता चलता है-‘हमारे भीतर क्या था’। ध्यान का विज्ञान कहता है, यह अवस्था, सबसे ऊपरी अवस्था है चित की; सरफेस है, ऊपर की पर्त है। हम नहीं बोले होते हैं तब भी पहले उसके विचार भीतर चलता है, अन्यथा हम बोलेंगे कैसे ? अगर मैं कहता हूँ ओम् तो इसके पहले कि मैंने कहा-मेरे भीतर, ओठों के पार, मेरे हृदय के किसी कोने में ‘ओम्’, का निर्माण हो जाता है। ध्यान कहता है, यह दूसरी पर्त है, व्यक्ति की गहराई की। साधारणतः आदमी ऊपर की पर्त पर ही जीता है, उसे दूसरी पर्त का भी पता नहीं होता। उसके बोलने की दुनिया के नीचे भी एक सोचने का जगत् है, उसका भी उसे कुछ पता नहीं होता। काश, हमें हमारे सोचने के जगत् का पता चल जाए, तो हम बहुत हैरान हो जाएँ। जितना हम सोचते हैं, उसका बहुत थोड़ा-सा हिस्सा वाणी में प्रकट होता है। ठीक ऐसे ही जैसे एक बर्फ के टुकड़े को हम पानी में डाल दें, तो एक हिस्सा ऊपर हो और नौ हिस्सा नीचे डूब जाए। हमारा भी नौ हिस्सा जीवन का, विचार का तल नीचे डूबा रहता है, एक हिस्सा ऊपर दिखाई पड़ता है। इसलिए अक्सर ऐसा होता है कि आप क्रोध कर चुकते हैं, तब आप कहते हैं कि यह कैसे संभव हुआ कि मैंने क्रोध किया। एक आदमी एक आदमी की हत्या कर देता है, फिर पछताता है कि यह कैसे संभव हुआ कि मैंने हत्या की। ‘इनस्पाइट ऑफ मी’...वह कहता है, ‘मेरे बावजूद यह हो गया, मैंने तो कभी ऐसा करना ही नहीं चाहा था।’ उसे पता नहीं कि हत्या आकस्मिक नहीं है, पहले भीतर निर्मित होती है। लेकिन वह तल गहरा है, और उस तल से हमारा कोई संबंध नहीं रहा गया। ध्यान कहता है, पहले तल का नाम ‘बैखरी’ है, दूसरे तल का नाम ‘मध्यमा’ है। और उसके नीचे भी एक तल है, जिसे ध्यान का विज्ञान ‘पश्यंति कहता है। इसके पहले कि भीतर, ओठों के पार, हृदय के कोने में शब्द निर्मित हो, उससे भी पहले, शब्द का निर्माण होता है। लेकिन उस तीसरे तल का तो हमें साधारणतः कोई भी पता नहीं होता, उससे हमारा कोई संबंध नहीं होता। दूसरे तक हम कभी-कभी झाँक पाते हैं, तीसरे तक हम कभी नहीं झाँक पाते। ध्यान का विज्ञान कहता है कि पहला तल ‘बोलने’ का है, दूसरा तल ‘सोचने’ का है, तीसरा तल ‘दर्शन’ का है। पश्चयंति का अर्थ है ‘देखना’, जहाँ शब्द देखे जाते हैं। मुहम्मद कहते हैं-मैंने कुरान देखी-सुनी नहीं। वेद के ऋषि कहते हैं-हमनें ज्ञान देखा-सुना नहीं। मूसा कहते हैं-मेरे सामने टेन कमांडमेंट्स प्रकट हुए, दिखाई पड़े, मैंने सुने नहीं। यह तीसरे तल की बात है, जहाँ विचार दिखाई पड़ते हैं-सुनाई नहीं पड़ते हैं। तीसरा तल भी ध्यान के हिसाब से मन का आखिरी तल नहीं है। चौथा एक तल है, जिसे ध्यान का विज्ञान ‘परा’ कहता है। वहाँ विचार दिखाई भी नहीं पड़ते, सुनाई भी नहीं पड़ते। और जब कोई व्यक्ति देखने और सुनने से नीचे उतर जाता है, तब उसे चौथे तल का पता चलता है। और उस चौथे तल के पार जो जगत् है, वह ध्यान का जगत् है। ये चार हमारी पर्तें हैं। इन चार दीवारों के भीतर हमारी आत्मा है। हम बाहर के परकोटे की दीवार के बाहर ही जीते हैं। पूरे जीवन शब्दों की पर्त के साथ जीते हैं-और स्मरण नहीं आता कि खजाने बाहर नहीं हैं, बाहर सिर्फ रास्तों की धूल है। आनंद बाहर नहीं है, बाहर आनंद की धुन भी सुनाई पड़ जाए तो बहुत। जीवन का सब-कुछ भीतर है-जड़ों में-गहरे अँधेरे में दबा हुआ। ध्यान वहाँ तक पहुँचने का मार्ग है। पृथ्वी पर बहुत से रास्तों से उस पाँचवीं स्थिति में पहुँचने की कोशिश की जाती रही है। और जो व्यक्ति इन चार स्थितियों को पार करके पाँचवीं गहराई में नहीं डूब पाता, उस व्यक्ति को जीवन तो मिला, लेकिन जीवन को जानने की उसने कोई कोशिश नहीं की, उस व्यक्ति को खजाने तो मिले, लेकिन खजानों से वह अपरिचित रहा और रास्तों पर भीख माँगने में उसने समय बिताया। उस व्यक्ति के पास वीणा तो थी-जिससे संगीत पैदा हो सकता था, लेकिन उसने उसे कभी छुआ नहीं, उसकी अँगुलियों का कभी कोई स्पर्श उसकी वीणा तक नहीं पहुँचा। हम जिसे सुख कहते हैं, धर्म उसे सुख नहीं कहता। है भी नहीं, हम भली-भाँति जानते हैं। हमारा सुख करीब-करीब ऐसा है....मुझे एक छोटी-सी कहानी याद आती है- एक आदमी अपने मित्रों के पास बैठा है-बहुत बेचैन, बहुत परेशान। और ऐसा मालूम पड़ता है उसके भीतर कोई बहुत कष्ट है; किसी पीड़ा को वह दबाए हुए है। अंततः एक मित्र उससे पूछता है-इतने परेशान हैं, बात क्या है ? सिर में दर्द है ? पेट में दर्द है ?’ उस आदमी ने कहा, ‘नहीं, न सिर में दर्द है, न पेट में दर्द है; मेरे जूते बहुत काट रहे हैं, बहुत तंग हैं जूते।’ उसके मित्र ने कहा-‘तो जूतों को निकाल दें। और अगर इतने तंग जूते हैं कि इतना परेशान कर रहे हैं, तो थोड़े ठीक जूते खरीद लें।’ उस आदमी ने कहा, ‘नहीं, यह न हो सकेगा, मैं वैसे ही बहुत मुसीबत में हूँ।’ पत्नी मेरी बीमार है, लड़की ने, नहीं चाहता था कि जिस व्यक्ति को, उससे शादी कर ली, लड़का शराबी है, जुआरी है, और मेरी हालत दीवाले के करीब है।...नहीं, मैं वैसे ही बहुत दुःख में हूँ। ‘उन मित्रों ने कहा-‘आप पागल हैं ? वैसे ही बहुत दुःख में हैं तो इस जूते को तो बदल ही लें।’ उस आदमी ने कहा, ‘इस जूते के साथ ही मेरा एकमात्र सुख रह गया है।’ तब तो वे बहुत चकित हुए। उन्होंने कहा, ‘यह सुख किस प्रकार का है ? उस आदमी ने कहा, ‘मैं इतनी मुसीबतों में हूँ, दिनभर यह जूता मुझे काटता है, शाम जब मैं जूते को उतारता हूँ, तो मुझे बड़ी राहत मिलती है। बस एक ही सुख मेरे पास बचा है, वह यह कि साँझ जब मैं इस जूते को घर जा के उतारता हूँ, तो बड़ी रिलीफ, बड़ी राहत मिलती है। बस एक ही सुख मेरे पास है और तो दुःख ही दुःख हैं। इस जूते को मैं नहीं बदल सकता हूँ।’ जिसे हम सुख कहते हैं, वह तंग जूते से ज्यादा सुख नहीं है, रिलीफ से ज्यादा सुख नहीं है। जिसे हम सुख कहते हैं, वह थोड़ी-सी देर के लिए किसी तनाव से मुक्ति है।...नकारात्मक है, निगेटिव है। एक आदमी थोड़ी देर के लिए शराब पी लेता है और सोचता है सुख में है। एक आदमी थोड़ी देर के लिए सैक्स में उतर जाता है और सोचता है सुख में है। एक आदमी थोड़ी देर के लिए संगीत सुन लेता है और सोचता है कि सुख में है। एक आदमी बैठ के गपशप कर लेता है, हँसी-मजाक कर लेता है, हँस लेता है, और सोचता है कि सुख में है। ये सारे सुख तंग जूते को साँझ उतारने से भिन्न नहीं हैं, उनका सुख से कोई संबंध नहीं है। सुख एक पॉजिटिव, एक विधायक स्थिति है-नकारात्मक नहीं। सुख छींक-जैसी चीज नहीं है-कि आपको छींक आ जाती है और पीछे थोड़ी राहत मिलती है। क्योंकि छींक परेशान कर रही थी। वह एक नकारात्मक चीज नहीं है कि एक बोझ मन से उतर जाता है और पीछे अच्छा लगता है। सुख एक विधायक अनुभव है। लेकिन बिना ध्यान के वैसा विधायक सुख किसी को अनुभव नहीं होता। और जैसे-जैसे आदमी सभ्य और शिक्षित हुआ है, वैसे-वैसे ध्यान से दूर हुआ है। सारी शिक्षा, सारी सभ्यता-आदमी को दूसरों से कैसे संबंधित हों, यह तो सिखा देती है, लेकिन अपने से कैसे संबंधित हो, यह नहीं सिखाती। समाज को कोई प्रयोजन भी नहीं है कि आप अपने से संबंधित हों, समाज चाहता है आप दूसरों से संबंधित हों-ठीक से, कुशलता से-बात पूरी हो जाती; आप कुशलता से काम करें, बात पूरी हो जाती है। समाज आपको एक फंक्शन से ज्यादा नहीं मानता। अच्छे दुकानदार हों, अच्छे नौकर हों, अच्छे पति हों, अच्छी माँ हों, अच्छी पत्नी हों,-बात समाप्त हो गई, आपसे समाज को कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए समाज की सारी शिक्षा उपयोगिता है, यूटिलिटि है। समाज सारी शिक्षा ऐसी देता है, जिससे कुछ पैदा होता हो। आनंद से कुछ भी पैदा होता दिखाई नहीं पड़ता। आनंद कोई कमोडिटी नहीं है जो बाजार में बिक सके। आनंद कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे रुपये में भँजाया जा सके। आनंद कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे बैंक-बैलेंस में जमा किया जा सके। आनंद कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसकी बाजार में कोई कीमत हो सके। इसलिए समाज को आनंद से कोई प्रयोजन नहीं है। और कठिनाई यही है कि आनंद-भर एक ऐसी चीज है, जो व्यक्ति के लिए मूल्यवान है, बाकी कुछ भी मूल्यवान नहीं है। लेकिन जैसे-जैसे आदमी सभ्य होता जाता है-यूटिलिटेरियन होता है-‘सब चीजों की उपयोगिता होनी चाहिए।’ मेरे पास लोग आते हैं वे कहते हैं ‘ध्यान से क्या मिलेगा ?’ शायद वे सोचते होंगे-रुपए मिलें, मकान मिले, कोई पद मिले।’ ध्यान से न पद मिलेगा, न रुपए मिलेंगे, न मकान मिलेगा, ध्यान की कोई उपयोगिता नहीं है। लेकिन जो आदमी सिर्फ उपयोगी चीजों की तलाश में घूम रहा है, वह आदमी सिर्फ मौत की तलाश में घूम रहा है। जीवन की भी कोई उपयोगिता नहीं है। जीवन में जो भी महत्त्वपूर्ण है, उसकी बाजार में कोई कीमत नहीं है। प्रेम की कोई कीमत है बाजार में ? कोई कीमत नहीं है। ध्यान की, परमात्मा की ? इनकी कोई भी कीमत नहीं है। लेकिन जिस जिंदगी में अनुपयोगी, नॉन-यूटिलिटेरियन मार्ग नहीं होता, उस जिंदगी में सितारों की चमक भी खो जाती है, उस जिंदगी में फूलों की सुगंध भी खो जाती है, उस जिंदगी में पक्षियों के गीत भी खो जाते हैं, उस जिंदगी में नदियों की दौड़ती हुई गति भी खो जाती है, उस जिंदगी में कुछ भी नहीं बचता, सिर्फ बाजार बचता है। उस जिंदगी में काम के सिवाय कुछ भी नहीं बचता। उस जिंदगी में तनाव और परेशानी और चिंताओं के सिवाय कुछ भी नहीं बचता। और जिंदगी चिंताओं का एक जोड़ नहीं है। लेकिन हमारी जिंदगी चिंताओं का एक जोड़ है। ध्यान हमारी जिंदगी में उस डायमेंशन, उस आयाम की खोज है, जहाँ हम बिना प्रयोजन के-सिर्फ होने मात्र में जस्ट टू बी-होने-मात्र से आनंदित होते हैं। और जब भी हमारे जीवन में कहीं से भी सुख की कोई किरण उतरती है, तो वे वे ही क्षण होते हैं, जब हम खाली, बिना काम के-समुद्र के तट पर या किसी पर्वत की ओट में, या रात आकाश के तारों के नीचे, या सुबह उगते सूरज के साथ, या आकाश में उड़ते हुए पक्षियों के पीछे, या खिले हुए फूलों के पास-कभी जब हम बिना काम-बिल्कुल बेकाम, बिल्कुल व्यर्थ, बाजार में जिसकी कोई कीमत न होगी-ऐसे किसी क्षण में होते हैं, तभी हमारे जीवन में सुख की थोड़ी-सी ध्वनि उतरती है। लेकिन यह आकस्मिक, एक्सिडेंटल होती है। ध्यान, व्यवस्थित रूप से इस किरण की खोज है। कभी होती है यह टयूनिंग। कभी विश्व के और हमारे बीच संगीत का सुर बँध जाता है, कभी, ठीक वैसे ही, जैसे कोई बच्चा सितार को छेड़ दे और कोई राग पैदा हो जाए-आकस्मिक। ध्यान व्यवस्थित रूप से जीवन में उस द्वार को बड़ा करने का नाम है, जहाँ से आनंद की किरण उतरनी शुरू होती है। जहाँ से हम पदार्थ से छूटते हैं और परमात्मा से जुड़ते हैं। मेरे देखे ध्यान से ज्यादा बिना कीमत की कोई चीज नहीं है। और ध्यान से ज्यादा बहुमूल्य भी कोई चीज नहीं है। और आश्चर्य की बात यह है कि यह जो ध्यान, प्रार्थना-या हम और कोई नाम दें, यह इतनी कठिन बात नहीं है, जितना लोग सोचते हैं। जैसे हमारे घर के किनारे पर ही कोई फूल खिला हो, और हमने खिड़की न खोली हो; जैसे बाहर सूरज खड़ा हो और हमारे द्वार बंद हों, जैसे खजाना सामने पड़ा हो और हम आँख बंद किए बैठे हों, ऐसी कठिनाई है। अपने ही हाथ से अपरिचय के कारण कुछ हम खोए हुए बैठे हैं, जो हमारा किसी भी क्षण हो सकता है। ध्यान प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता है। क्षमता ही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार भी। परमात्मा जिस दिन व्यक्ति को पैदा करता है, ध्यान के साथ ही पैदा करता है। ध्यान हमारा स्वभाव है। उसे हम जन्म के साथ लेकर पैदा होते हैं। इसलिए ध्यान से परिचित होना कठिन नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति ध्यान में प्रविष्ट हो सकता है।

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ध्यान का विज्ञान;-

इस स्थिति को --- जब हम बोलते हैं तभी हमे पता चलता है कि हमारे भीतर कौन से विचार चलते हैं - अत्यन्त ऊपरी अवस्था मानता है । अगर एक आदमी न बोले तो हम पहचान भी न पायेंगे कि वह कौन है , क्या है ।

सुकरात ने किसी से मिलते वक्त कहा था कि तुम बोलो कुछ , तो पहचान लूं कि तुम कौन हो । तुम न बोलो कुछ तो पहचान मुश्किल है , इसलिए तो हम जानवरों को अलग-अलग नहीं पहचान पाते । क्योंकि वे बोलते नहीं है । और मौन में सारी शक्लें एक जैसी हो जाती हैं । शब्द हमारे बाहर प्रगट होता है , तभी हमें पता चल पाता है कि हमारे भीतर क्या था ।

ध्यान का विज्ञान कहता है यह अवस्था सबसे ऊपरी अवस्था है चित्त की । यह ऊपर की पर्त है । हम नहीं बोले होते हैं , तब भी उसके पहले भीतर विचार चलता है , अन्यथा हम बोलेंगे कैसे ।

अगर मैं कहता हूं 'ओम ' तो उसके पहले मेरे भी ओठों के पार और मेरे हृदय के किसी कोने में ''ओम ' का निर्माण हो जाता है ।

ध्यान कहता है , वह दूसरी पर्त है व्यक्तित्व के गहराई की । साधारणतः आदमी ऊपर की पर्त पर ही जीता है । उसे दूसरी पर्त का भी पता नहीं होता । उसके बोलने की दुनिया के नीचे भी एक सोचने का जगत है , उसका भी उसे कुछ पता नहीं होता । काश ! अगर हमें हमारे सोचने के जगत का पता चल जाये तो हम बहुत हैरान हो जायें ।

जितना हम सोचते हैं , उसका थोड़ा-सा हिस्सा वाणी में प्रकट होता है । ठीक ऐसे ही जैसे एक बर्फ के टुकड़े को हम पानी में डाल दें तो एक हिस्सा ऊपर हो जायेगा और नौ हिस्सा नीचे डूब जायेगा । हमारा भी नौ हिस्सा जीवन , विचार का नीचे डूबा रहता है।एक हिस्सा ऊपर दिखाई पड़ता

है।इसलिए अक्सर ऐसा हो जाता है कि आप क्रोध कर चुकते हैं ,तब आप कहते हैं कि

यह कैसे संभव हुआ। एक आदमी हत्या कर देता है , फिर पश्चाताप करता है । कहता है मैंने कैसे हत्या की । वह कहता है , इनस्पाइट आफ मी , मेरे बावजूद भी यह हो गया ! मैंने तो कभी ऐसा करना ही नहीं चाहा था । उसे पता नहीं कि हत्या आकस्मिक नहीं है । वह पहले भीतर निर्मित होती है । लेकिन वह गहरा तल है उस तल से हमारा कोई संबंध नहीं रह गया है ।

ध्यान कहता है पहले तल का नाम बैखरी है । दूसरे तल का नाम मध्यमा है । और उसके नीचे भी एक तल है जिसे ध्यान का विज्ञान पश्यन्ति कहता है । इसके पहले कि भीतर ओठों के पार हृदय के कोने में शब्द निर्मित हों उससे भी पहले शब्द का निर्माण होता है । लेकिन उस तीसरे तल का तो हमें साधारणतः कोई पता नहीं होता । उससे हमारा कोई संबंध नहीं होता । दूसरे तक हम कभी-कभी झांक पाते हैं , तीसरे तक हम कभी नहीं झांक पाते ।

ध्यान का विज्ञान कहता है कि पहला तल बोलने का है -- दूसरा तल सोचने का है -- तीसरा तल दर्शन का है । पश्यन्ति का अर्थ है देखना । जहां शब्द देखे जाते हैं । मुहम्मद कहते हैं कि मैंने कुरान देखी , सुनी नहीं । वेद के ऋषि कहते हैं कि हमने ज्ञान देखा , सुना नहीं । मूसा कहते हैं कि मेरे सामने 'टेन कमांडमेंट्स ' प्रगट हुए , दिखाई पडे़ , मैने सुने नहीं । यह तीसरे तल की बात है , जहां विचार दिखाई पड़ते हैं , सुनाई नहीं । तीसरा तल भी ध्यान के हिसाब से मन का आखिरी तल नहीं ।

चौथा एक तल है , जिसे ध्यान का विज्ञान परा कहता है । वहां विचार दिखाई भी नहीं पड़ते , सुनाई भी नहीं पड़ते और जब कोई व्यक्ति देखने और सुनने से नीचे उतर जाता है , तब उस चौथे तल का पता चलता है । और उसे चौथे तल के पार जो जगत है , वह ध्यान का जगत है ।

चार हमारी पर्तें हैं , इन चारों दीवारों के भीतर हमारी आत्मा है । हम बाहर की पर्तों के भी , दीवार के बाहर ही जीते हैं । पूरे जीवन शब्दों की पर्त के साथ जीते हैं और स्मरण नहीं आता कि खजाने बाहर नहीं हैं --- बाहर सिर्फ रास्तों की धूल है ।

आनंद बाहर नहीं है । बाहर आनंद की धुन भी सुनाई पड़ जाये तो बहुत है । जीवन का सब कुछ भीतर है -- भीतर , गहरे अंधेरे में दबा हुआ । ध्यान वहां तक पहुंचने का मार्ग है । पृथ्वी पर बहुत से रास्तों से उस पांचवी स्थिति में पहुंचने की कोशिश की जाती रही है ।

और जो व्यक्ति इन चार स्थितियों को पार करके पांचवी गहराई में नहीं डूब पाता , उस व्यक्ति को जीवन तो मिला , लेकिन जीवन को जानने की उसने कोई कोशिश नहीं की । उस व्यक्ति को खजाने तो मिले , लेकिन खजानों से वह अपरिचित ही रहा और रास्तों पर भीख मांगने में समय बिताया । उस व्यक्ति के पास वीणा तो थी जिससे संगीत पैदा हो सकता था , लेकिन उसने उसे कभी छुआ नहीं । उसकी उंगलियों का कभी कोई स्पर्श उसकी वीणा तक नहीं पहुंचा।

हम जिसे सुख कहते हैं , धर्म उसे सुख नहीं कहता है । वह सुख है भी नहीं । हम भी भली-भांति जानते हैं कि हमारा सुख करीब - करीब - ऐसा है

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मौन के तारों से भर उठेगा हृदयाकाश

जब पहले-पहले चेतना पर मौन का अवतरण होता है, तो संध्या की भांति सब फीका-फीका और उदास हो जाता है--जैसे सूर्य ढल गया हो, रात्रि का अंधेरा धीरे-धीरे उतरता हो और आकाश थका-थका हो, दिनभर के श्रम से। लेकिन, फिर आहिस्ता-आहिस्ता तारे उगने लगते हैं और रात्रि के सौंदर्य का जन्म होता है। ऐसा ही होता है मौन में भी। विचार जाते हैं, तो उनके साथ ही एक दुनिया अस्त हो जाती है। फिर मौन आता है, तो उसके पीछे ही एक नयी दुनिया का उदय भी होता है। इसलिए, जल्दी न करना। घबड़ाना भी मत। धैर्य न खोना। जल्दी ही मौन के तारों से हृदयाकाश भर उठेगा। प्रतीक्षा करो और प्रार्थना करो।

ऊर्जा-जागरण से देह-शून्यता

ध्यान शरीर की विद्युत-ऊर्जा (बॉडी इलेक्ट्रिसिटी) को जगाता है--सक्रिय करता है--प्रवाहमान करता है। तू भय न करना। न ही ऊर्जा-गतियों को रोकने की चेष्टा करना। वरन, गति के साथ गतिमान होना--गति के साथ सहयोग करना। धीरे-धीरे तेरा शरीर-भान, भौतिक-भाव (मैटेरियल-सेन्स) कम होता जाएगा और अभौतिक, ऊर्जा-भाव (नॉन मैटिरियल इनर्जी-सेन्स) बढ़ेगा। शरीर नहीं--ऊर्जा-शक्ति ही अनुभव में आएगी। शरीर की सीमा है--शक्ति की नहीं। शक्ति के पूर्णानुभव में अस्तित्व (एग्झिस्टेंस) में तादात्म्य होता है। सम्यक है तेरी स्थिति--अब सहजता से लेकिन दृढ़ता से आगे बढ़। जल्दी ही सफलता मिलेगी। सफलता सुनिश्चित है।

ध्यान--अशरीरी-भाव और ब्रह्म-भाव

ध्यान में शरीर-भाव खोएगा। अशरीरी दशा निर्मित होगी। शून्य का अवतरण होगा। इससे भय न लें--वरन प्रसन्न हों, आनंदित हों। क्योंकि यह बड़ी उपलब्धि है। धीरे-धीरे ध्यान के बाहर भी अशरीरी भाव फैलेगा और प्रतिष्ठित होगा। यह आधा काम है। श्ल्लाष आधे में ब्रह्म-भाव का जन्म होता है। पूर्वार्ध है--अशरीरी-भाव। उत्तरार्ध है--ब्रह्म-भाव। और श्रम में लगें। स्रोत बहुत निकट है। और संकल्प करें। विस्फोट शीघ्र ही होगा। और समर्पण करें। और, स्मरण रखें कि मैं सदा साथ हूं; क्योंकि अब बड़ा निर्जन पथ सामने है। मंजिल के निकट ही मार्ग सर्वाधिक कठिन होता है। सुबह के करीब ही रात और गहरी हो जाती है।

कुंडलिनी-ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन

शरीर में विद्युत-ऊर्जा जैसा संचार शुभ है। धीरे-धीरे शरीर-भाव मिट जाएगा--और ऊर्जा का बोध ही बचेगा। भौतिक (मैटेरियल) शरीर एक भ्रांति है। वस्तुतः जो है, वह ऊर्जा (एनर्जी) ही है। ऊर्जा (लाइफ एनर्जी) ही अज्ञान में शरीर और ज्ञान में आत्मा प्रतीत होती है। मस्तिष्क में धक्के लगेंगे। लगेगा कि जैसे अब फटा... अब फटा। लेकिन भय न लाना। जीवन-ऊर्जा के हाथों में स्वयं को छोड़ दो। वही भगवत-समर्पण है। ऐसे ही ब्रह्मरंध्र को छोड़ दो। ऐसे ही सहस्र पंखुड़ियों वाले कमल की कली टूटेगी और फूल बनेगी। नाभि-केंद्र पर अपूर्व शांति का जो अनुभव हो रहा है, उसमें रमण करो। उसमें डूबो--उससे एक हो जाओ। जीवन-ऊर्जा का मूल-स्रोत ध्यान में आ रहा है--उसे पहचानो। और, अब किसी भी अनुभव के संबंध में सोच-विचार मत करो! अनुभव करो और अनुगृहीत होओ।

अलौकिक अनुभवों की वर्षा--कुंडलिनी-जागरण पर

कुंडलिनी जागती है, तो ऐसा ही होता है। विद्युत दौड़ती है शरीर में। मूलाधार पर आघात लगते हैं। शरीर गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटेशन) खोता मालूम पड़ता है। और अलौकिक अनुभवों की वर्षा शुरू हो जाती है। प्राण अनसुने नाद से आपूरित हो उठते हैं। रोआं-रोआं आनंद की पुलक में कांपने लगता है। जगत प्रकाश-पुंज मात्र प्रतीत होता है। इंद्रियों के लिए बिल्कुल अबूझ अनुभूतियों के द्वार खुल जाते हैं। प्रकाश में सुगंध आती है। सुगंध में संगीत सुनाई पड़ता है। संगीत में स्वाद आता है। स्वाद में स्पर्श मालूम होता है। तर्क की सभी कोटियां (कैटेगोरीस) टूट जाती हैं। और बेचारे अरस्तू के सभी नियम उलट-पुलट हो जाते हैं। कुछ भी समझ में नहीं आता है और फिर भी सब सदा से जाना हुआ मालूम होता है। कुछ भी कहा नहीं जाता है और फिर भी सब जीभ पर रखा प्रतीत होता है। गूंगे के गुड़ का अर्थ पहली बार समझ में आता है। आनंदित होओ कि ऐसा हुआ है। अनुगृहीत होओ कि प्रभु की अनुकंपा है।

तैयारी--विस्फोट को झेलने की

कुछ करो नहीं, बस देखो। नाटक के एक दर्शक की भांति। नाट्यगृह में--पर नाटक में नहीं। शरीर नाट्यगृह है और तुम दर्शक हो। ऊर्जा उठती है--ऊर्ध्वगामी होती है तो ऐसे ही आघातों से तन-तंतु कांप-कांप उठते हैं। ऊर्जा अपना नया यात्रा-पथ निर्माण करती है तो आंधी में सूखे पत्तों की भांति शरीर आंदोलित होता है। फिर जैसे-जैसे नए प्रवाह-पथ निर्मित हो जाएंगे वैसे-वैसे ही शरीर की पीड़ा खो जाएगी। फिर आज जो आघात-जैसा प्रतीत होता है, वही आनंद की पुलक बन जाता है। ऐसे आनंद की जो कि शरीर में घटित होता है, पर शरीर का नहीं है। और निकट है वह क्षण। पर उसके पूर्व बहुत बार तूफान आएगा ऊर्जा का और चला जाएगा। तूफान उठेगा और शांत हो जाएगा। इससे चिंतित मत होना। क्योंकि, ऐसे ही विस्फोट (एक्सप्लोज़न) की तैयारी होती है। गौरीशंकर के शिखर-अनुभव (पीक-एक्सपीरियेंसेज) के पूर्व अनेक छोटे-छोटे शिखरों के अनुभव से गुजरना पड़ता है। उससे ही विराट को बूंद में झेलने की क्षमता निर्मित होती है।

अहिंसा--अनिवार्य छाया ध्यान की

ध्यान से मांसाहार तो कठिनाई में पड़ेगा ही। अपने तथाकथित सुख के लिए अब दुख किसी को भी न दे सकोगे। अहिंसा ध्यान की अनिवार्य छाया है। और, उस ध्यान में कुछ चूक है, जिससे कि अहिंसा सहज ही फलित नहीं होती है। अहिंसा को प्रयास से लाना पड़े, तो भी ध्यान में भूल है। अहिंसा को भी जो साधते हैं, उन्हें वास्तविक अहिंसा का कोई पता ही नहीं है। अहिंसा तो आती है सहज ध्यान के साथ-साथ, बस, ऐसे ही जैसे सूर्य के साथ प्रकाश। आनंद मनाओ और प्रभु को धन्यवाद दो कि ऐसी ही अहिंसा का पदार्पण तुम्हारे जीवन में हो रहा है।

गहरे ध्यान के बाद जाति-स्मरण का प्रयोग

विगत जन्म की स्मृति में उतर सकते हो। लेकिन, उसके पूर्व गहरे ध्यान (डीप मेडिटेशन) का प्रयोग अति आवश्यक है। उसके बिना चेतना को पीछे लौटाना अत्यंत कठिन है। और यदि किसी भांति संभव भी हो तो खतरनाक भी। इसलिए, गहरे ध्यान के पूर्व मैं कोई सुझाव नहीं दे सकता हूं, उसे कठोरता मत समझ लेना। ऐसा मैं करुणावश ही लिख रहा हूं। साधारण चित्त अतीत-जन्म की स्मृतियों की बाढ़ को झेलने में समर्थ नहीं है। इसलिए, प्रकृति उस द्वार को बंद कर देती है। और पूर्ण तैयारी के बिना प्रकृति के नियमों से खेल खेलना महंगा सिद्ध होता है।

सिद्धियों में रस न लेना

योग से बहुत कुछ संभव है--अतीन्द्रिय, अलौकिक। लेकिन, नियमातीत कुछ भी घटित नहीं होता है। अतीन्द्रिय--अनुभवों और सिद्धियों के भी अपने नियम हैं। चमत्कार भी, जो नहीं जानते उन्हीं के लिए चमत्कार हैं। या फिर, अस्तित्व ही चमत्कार है। पर, जहां तक बने, सिद्धियों में रस न लेना। साधक के लिए उससे अकारण ही व्यवधान निर्मित होता है।

विचारों का विसर्जन

ध्यान में प्रकाश के साथ-साथ बीच-बीच में विचार आते हैं, तो उन्हें देखना--तीव्रता से, पूरी चेतना से--समग्र एकाग्रता से। और, कुछ भी न करना--बस, द्रष्टा बनना। पर, दृष्टि प्रगाढ़ हो और पैनी। और, विचार खो जाएंगे! बड़े कमजोर हैं बेचारे। लेकिन, हमारी दृष्टि उनसे भी ज्यादा बेजान है--इसलिए कठिनाई है। अन्यथा, विचार से ज्यादा हवाई चीज और क्या हो सकती है?

चक्रों के खुलते समय पीड़ा स्वाभाविक

पीड़ा थोड़ी बढ़े, तो चिंतित मत होना। चक्र सक्रिय होते हैं, तो पीड़ा होती है। पीड़ा के कारण ध्यान को शिथिल न करना। वस्तुतः तो, चक्रों पर पीड़ा शुभ-लक्षण है। और, जैसे ही अनादि-काल से सुप्त चक्र पूर्णरूपेण सक्रिय हो उठेंगे, वैसे ही पीड़ा समाप्त हो जाएगी। चक्रों की पीड़ा--प्रसव पीड़ा है। तेरा ही नया जन्म होने को है। सौभाग्य मान और अनुगृहीत हो--क्योंकि स्वयं के जन्म को देखने से बड़ा और सदभाग्य नहीं है।

कुछ भी हो, ध्यान को नहीं रोकना

ध्यान में और भी शक्ति लगाओ। ध्यान के अतिरिक्त शेष समय में ध्यान की स्मृति (रिमेंबरिंग) बनाए रखो। जब भी स्मरण आए--क्षणभर को तत्काल भीतर डुबकी ले लो। मस्तिष्क में शीतलता और भी बढ़ेगी। उससे घबराना मत--बिल्कुल बर्फ जमी हुई मालूम होने लगे तो भी नहीं! रीढ़ में संवेदना गहरी होगी और कभी-कभी अनायास कहीं-कहीं दर्द भी उभरेगा। उसे साक्षी-भाव से देखते रहना है। वह आएगा और अपना काम करके विदा हो जाएगा। नए चक्र सक्रिय होते हैं तो दर्द होता ही है। और कुछ भी हो तो ध्यान को नहीं रोकना है। जो भी ध्यान से पैदा होता है, वह ध्यान से ही विदा हो जाता है।

मन का रेचन ध्यान में

भय न करो। ध्यान में जो भी हो होने दो। मन रेचन (केथार्सिस) में है तो उसे रोको मत। चित्त-शुद्धि का यही मार्ग है। अचेतन (अनकांशस) में जो भी दबा है, वह उभरेगा। उसे मार्ग दो ताकि उससे मुक्ति हो सके। उसे दबाया कि ध्यान व्यर्थ हुआ और उससे मुक्ति हुई नहीं कि ध्यान सार्थक हुआ। इसलिए, समस्त उभार का स्वागत करो। और उसे सहयोग भी दो। क्योंकि, अपने आप जो कार्य बहुत समय लेगा, वह सहयोग से अल्पकाल में ही हो जाता है।

छलांग--बाहर--शरीर के, संसार के, समय के

ध्यान में शरीर झूमता है तो भय न करना। वरन उसे आनंद से सहयोग देना। शरीर के साथ झूमो। मन को भी झूमने दो। और आत्मा को भी। झूमना नृ