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क्या सात्विक कर्म का फल सुख, ज्ञान एवं रजस एवं तमस कर्म का फल दुख और अज्ञान है?


हे अर्जुन, जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात गुण ही गुणों में बर्तते है, ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानंदधनस्वरूप मुझ परमात्‍मा को तत्‍व से जानता है, उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।तथा यह पुरूष इन स्थूल शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्‍था और सब प्रकार के दुखों से मुक्‍त हुआ परमानंद को प्राप्त होता है।

जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है…।

एक—एक शब्द को ठीक से समझ लें।

जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात गुण ही गुणों में बर्तते हैं, ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानंदघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्व से जानता है, उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। तथा यह पुरुष इन स्थूल शरीर की उत्पत्ति के कारण रूप तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुखों से मुक्त हुआ परमानंद को प्राप्त होता है।

जिस काल में, समय की जिस अवधि में, जिस क्षण में…। और यह क्षण अभी भी हो सकता है। इसके लिए कोई जन्मों तक रुकने की जरूरत नहीं है। क्योंकि यह आपके भीतर का जो स्वभाव है, यह कुछ निर्मित नहीं करना है। यह है ही। ऐसा है ही, अभी भी, इस क्षण भी। आप साक्षीरूप हैं और सारा कर्तृत्व आपके शरीर की प्रकृति में हो रहा है, गुणों में हो रहा है, तीन गुणों में हो रहा है, जो प्रकृति के तीन नियंता हैं, और आप अभी भी अलग खड़े हैं। यह सिर्फ भ्रांति है कि आप सोचते हैं, आप कर रहे हैं।

जिस काल में, जिस क्षण में, द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है।

जिस क्षण आपको यह समझ में आ जाता है कि मेरे तीन गुण ही समस्त कर्म कर रहे हैं, मैं करने वाला नहीं हूं; गुण ही कर रहे हैं, करवा रहे हैं……।

कठिन है। क्योंकि अहंकार को कोई जगह न रह जाएगी। इसलिए अहंकार बाधा बनेगा। अहंकार कहेगा, कौन कहता है कि धन मैं नहीं कमा रहा हूं? धन मैं कमा रहा हूं। हालांकि आपको पता नहीं है, आपके भीतर जो लोभ का गुण है, वे जो लोभ के परमाणु हैं, वे आपको धक्का दे रहे हैं। लेकिन आप सोचते हैं, मैं धन कमा रहा हूं। धन के लिए तो आपके भीतर लोभ के परमाणु दौड़ा रहे हैं। लेकिन यह आप जो मैं— भाव निर्मित करते हैं, यह बिलकुल थोथा है, यह झूठा है।

आप कहते हैं, मैं प्रेम में पड़ रहा हूं। मैं इस स्त्री के प्रेम में पड़ गया हूं। जब कि सिर्फ आपके वासना—क्या प्रेम में पड़ गए हैं। इसलिए जिन लोगों ने सांख्य की इस दृष्टि को ठीक से समझा था, उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं, जो इस युग में समझना मुश्किल हो गई हैं। कठिन भी है समझना। मगर अगर यह सूत्र खयाल में आ जाए, तो समझ में आ सकता है।

महावीर ने अपने साधकों को कहा है कि वृद्धा और रुग्ण, मरणशय्या पर पड़ी स्त्री से भी दूर रहना।

इस बात को थोड़ा समझें।

बुद्ध से आनंद पूछता है कि अगर कोई स्त्री मार्ग पर मिल जाए, तो मैं क्या करूं? तो बुद्ध कहते हैं, देखना मत, आंख नीची कर लेना।

आनंद जिद्दी है, वह पूछता है, समझ लो कि ऐसी अवस्था आ जाए कि आंख नीचे करना न हो पाए। कोई ऐसा कारण हो जाए। समझो कि स्त्री बीमार पड़ी हो, प्यासी पड़ी हो, रास्ते के किनारे गिर पड़ी हो, गड्डे में गिर पडी हो। मैं अकेला भिक्षु उस मार्ग पर हूं। और मुझे उस स्त्री को उठाना पड़े या पानी पिलाना पड़े, तो देखना तो पड़ेगा! समझ लो कि कोई ऐसी घटना में मुझे देखना पड़े, तो मैं क्या करूं? तो बुद्ध ने कहा, तू छूना मत।

आनंद ने कहा, ऐसी कोई स्थिति भी हो सकती है भंते, कि मुझे छूना भी पड़े, तो उस स्थिति में मैं क्या करूं? तो बुद्ध ने कहा, अब तू मानता ही नहीं, तो मैं आखिरी बात कहता हूं, साक्षी— भाव रखना। अगर तुझे यह करना ही पड़े, तो फिर तू होश रखना कि करने वाला तू नहीं है। छूना भी पड़े, तो समझना कि शरीर छू रहा है। देखना पड़े, तो समझना कि आंख देख रही है। इस भांति में मत पड़ना कि मैं देख रहा हूं कि मैं छू रहा हूं। तो फिर तू आखिरी बात समझ ले कि तू साक्षी— भाव रखना।

महावीर कहते हैं, वृद्ध, रुग्ण, मरणस्‍य्या पर पड़ी कुरूप स्त्री के पास भी भिक्षु न जाए।

हमें लगेगा, बडे दमन की बात कर रहे हैं। लेकिन महावीर केवल गुणों की बात कर रहे हैं। महावीर यह कह रहे हैं कि जब तक साक्षी न जग गया हो, जब तक अवस्था साधक की हो, तब तक मरणस्‍य्या पर पड़ी स्त्री के हार्मोन, उसके गुणधर्म भी तुम्हारे भीतर छिपे पुरुष के हार्मोन को आकर्षित करेंगे। वे तुम्हें आकर्षित कर सकते हैं। और साधारण गृहस्थ को शायद न भी करें। लेकिन भिक्षु को कर ही सकते हैं। क्योंकि साधारण गृहस्थ वैसा ही है, जैसे भरा पेट आदमी, भोजन किया हुआ आदमी। उसको रास्ते के किनारे पड़ी हुई जूठन आकर्षित नहीं करेगी। लेकिन उपवासी आदमी को कर सकती है। भूखे आदमी को कर सकती है।

मनु ने कहा है कि अपनी बहन, अपनी बेटी, अपनी मां के साथ भी एकांत में मत रहना बिलकुल अकेले।

लगते हैं, बड़े दमनकारी लोग हैं। लेकिन उनके सूत्र त्रिगुणों के ऊपर आधारित हैं। वे यह कह रहे हैं, सवाल यह नहीं है कि वह लड़की है तुम्हारी। गहरे में तो वह स्त्री है और तुम पुरुष हो। और हार्मोन न लड़की को जानते हैं, न मां को जानते हैं, न पिता को जानते हैं, न बहन को जानते है। हार्मोन की कोई नैतिकता नहीं है। अगर पिता भी पुत्री के साथ एकांत में बहुत दिन हो, तो धीरे— धीरे लड़की स्त्री रह जाएगी, पिता पुरुष रह जाएगा। और उन दोनों की प्रकृति के जो खिंचाव हैं, वे शुरू हो जाएंगे। यह तभी रुक सकता है, जब साक्षी जग गया हो। लेकिन साक्षी कितने लोगों का जगा है?

तो मनु की बात भी बड़ी गहरी है, पर सांख्य के सूत्रों पर खड़ी है। सांख्य बड़ा अनूठा खोजी है। सांख्य की खोज गहरी है। खोज का सार यह है कि आपके भीतर दो तत्व हैं, एक प्रकृति और पुरुष। पुरुष तो आपकी चेतना है और प्रकृति आपकी देह और मन की संघटना है। और जो भी क्रियाएं हैं, वे सब प्रकृति से हो रही हैं। कोई क्रिया चेतना से नहीं निकल रही है।

लेकिन चेतना को यह शक्ति है कि वह क्रियाओं के साथ अपने को जोड़ ले और कहे कि मैं कर रहा हूं। यह संभावना चेतना की है कि वह कहे कि मैं कर रहा हूं। इतना कहते ही संसार निर्मित हो जाता है।

इसलिए सांख्य—सूत्र कहते हैं कि संसार का जन्म अहंकार के साथ है। मैं आया, संसार निर्मित हुआ। मैं गया, संसार विलीन हो गया। जैसे ही मैं गया, उसका अर्थ है कि मैं सिर्फ देखने वाला रह गया।

और ध्यान रहे, देखना कोई क्रिया नहीं है, द्रष्टा होना कोई क्रिया नहीं है। द्रष्टा होना आपका स्वभाव है। आपको कुछ करना नहीं पड़ता द्रष्टा होने के लिए, द्रष्टा आप हैं।

रात सोते हैं, सपना देखते हैं, तब भी आप द्रष्टा हैं। सुबह उठते हैं एक गहरी नींद के बाद, तो भी आप कहते हैं, बड़ा आनंद आया, नींद बड़ी गहरी थी। इसका मतलब है कि कोई आपके भीतर देखता रहा कि नींद बड़ी गहरी थी। सुबह आप कहते हैं, नींद बड़ी गहरी थी, बड़ा सुख रहा।

जागे, सोए, सपना देखें, द्रष्टा कायम है। यह द्रष्टा कोई किया नहीं है। यह द्रष्टा आपका सतत स्वभाव है। यह एक क्षण को भी खोता नहीं है। लेकिन इस द्रष्टा को आप कर्ता बना सकते हैं, यह सुविधा है। चाहे इसे सुविधा कहें, चाहे असुविधा। यह स्वतंत्रता है। चाहे इसे स्वतंत्रता कहें, और चाहे समस्त परतंत्रता का मूल। क्योंकि इसी स्वतंत्रता के गलत उपयोग से संसार निर्मित होता है। और इसी स्वतंत्रता के सही उपयोग से मोक्ष निर्मित हो जाता है।

मोक्ष है आपकी स्वतंत्रता का ठीक उपयोग। संसार है आपकी स्वतंत्रता का गलत उपयोग। आपकी चेतना प्रतिपल मात्र साक्षी है।

जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है …..।

बस, ये तीन ही गुण कर रहे हैं। कोई और चौथा मेरे भीतर कर्ता नहीं है। अर्थात गुण ही गुणों में बर्तते हैं…….।

गुण ही गुणों के साथ वर्तन कर रहे हैं; एक्‍शन—रिएक्‍शन कर रहे हैं। मेरे भीतर का पुरुष—गुण किसी के स्त्री—गुण का पीछा कर रहा है। मेरे भीतर का क्रोध का गुण किसी के ऊपर क्रोध बरसा रहा है। मेरे भीतर हिंसा का गुण किसी के प्रति हिंसा से भर रहा है।

कृष्ण यह कह रहे हैं अर्जुन से कि यह जो भी युद्ध हो रहा है, यह भी तीन गुणों का वर्तन है। इसमें उस तरफ खड़े लोग भी उन्हीं गुणों से सक्रिय हो रहे हैं। इस तरफ खड़े लोग भी उन्हीं गुणों से सक्रिय हो रहे हैं। और अगर तू भागेगा, तो तू यह मत सोचना कि तूने संन्यास लिया। अगर तेरे भीतर भागने के परमाणु हों, तो तू भाग सकता है। लेकिन तब भी यह तू जानना कि ये गुण ही बर्त रहे हैं। तू इस भ्रांति में मत पड़ना…..। जो भी हो, तू एक बात खयाल रखना कि तू देखने वाला है।

गुण ही गुणों में बर्तते हैं, ऐसा जो देखता है और तीनों गुणों से अतीत—तीनों गुणों के पार, बियांड—तीनों गुणों से ऊपर, दूर, अतीत, सच्चिदानदघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्व से जानता है…।

प्रत्येक के भीतर इन तीन तत्वों के पीछे छिपा हुआ कृष्ण है। ब्रह्म कहें, क्राइस्ट कहें, बुद्ध कहें, जो भी कहना हो। इन तीनों तत्वों के भीतर छिपा हुआ आपका परम स्वभाव है, परम ब्रह्म है।

जो भी इन तीन गुणों को कर्ता की तरह जानता है, और इन तीनों के परे मुझ सच्चिदानदघनरूप परमात्मा को पहचानता है, उस काल में वह पुरुष मुझे प्राप्त हो जाता है।

वह प्राप्त है ही। सिर्फ यह प्रत्यभिज्ञा, यह रिकग्नीशन, यह पहचान प्राप्ति बन जाती है। इस क्षण भी आप आंख मोड़ लें गुणों से और गुणों के पीछे सरककर एक झलक ले लें, तो जो मोक्ष बहुत दूर दिख रहा है, वह जरा भी दूर नहीं है। सिर्फ मुड़कर देखने की बात है।

जो परमात्मा बडा जटिल मालूम पड़ता है, जिस पर भरोसा नहीं आता, तर्क जिसे सिद्ध नहीं कर पाता, जिस पर बड़ा अविश्वास और संदेह पैदा होता है, हजार चिंताएं मन में पकड़ती हैं कि परमात्मा कैसे हो सकता है! वह परमात्मा इतना निकट है कि जितनी देर परमात्मा शब्द कहने में लगती है, उतनी देर भी उसे पाने में लगने का कोई कारण नहीं है। मगर एक अबाउट टर्न, एक पूरा घूम जाना; जहां पीठ है, वहां चेहरा हो जाए; और जहां चेहरा है, वहां पीठ हो जाए।

अभी हमारा चेहरा गुणों की तरफ है। कभी इस गुण में, कभी उस गुण में, कभी तीसरे गुण में हम उलझे हैं। और गुण का जो खेल है, जाल है, वह जाल हम अपना समझ रहे हैं।

रामकृष्ण के पास एक भक्त आता था। और वह भक्त जब काली के दिन आते, तो कई बकरे कटवाता था। बड़ा समारोह मचाता था। उसकी बड़ी गणना थी भक्तों में, बड़े भक्तों में। फिर अचानक उसने पूजा— भक्ति सब छोड़ दी, बकरे कटने बंद हो गए।

तो एक दिन रामकृष्ण ने उससे पूछा कि क्या हुआ? क्या भक्ति— भाव जाता रहा? क्या अब काली में श्रद्धा न रही? उसने कहा, नहीं, यह बात नहीं। आप देखते नहीं, दांत ही सब गिर गए।

वह आदमी बड़ा ईमानदार रहा होगा। वह बकरे वगैरह काली ? के लिए कोई काटता है! काली तो बहाना है, तरकीब है। बकरे तो अपने ही दांतों के लिए काटे जाते हैं। लेकिन उसने कहा कि दांत ही न रहे, दांत ही गिर गए, अब क्या काटना और क्या नहीं काटना! किसके लिए काटना?

लेकिन वह आदमी ईमानदार रहा होगा। उसने एक बात तो कम से कम समझी कि यह सब दांतों के लिए चल रहा था।

बुढ़ापे में लोग शीलवान हो जाते हैं। बुढ़ापे में लोग सच्चरित्रता की बात करने लगते हैं। बुढ़ापे में दूसरे लोगों को समझाने लगते हैं कि जवानी सब रोग है। जब वे जवान थे, तो उनके घर के बड़े—बूढ़े भी उन्हें यही समझा रहे थे कि जवानी सब रोग है। उन्होंने उनकी नहीं सुनी। उनके बेटे भी उनकी नहीं सुनेंगे।

और बड़ा मजा यह है कि जब आपने अपने बाप की नहीं सुनी, तो आप किस भ्रांति में हैं कि अपने बेटे को सोच रहे हैं, सुन ले। किसी बेटे ने कभी नहीं सुनी। क्योंकि जवानी सुनती ही नहीं। और बुढ़ापा बोले चला जाता है। बुढापा समझाए चला जाता है। क्योंकि बुढ़ापा अब कुछ और कर नहीं सकता। करने के दिन गए। वह जिन तत्वों से करना निकलता था, वे क्षीण हो गए।

और बड़े मजे की बात है, जब आप नहीं कर सकते, तब भी आपको यह खयाल नहीं आता कि शरीर के गुणधर्म क्षीण हो गए हैं, जिससे आप नहीं कर सकते हैं। जब आप कर सकते थे, तब आप सोचते थे, मैं कर रहा हूं। और जब आप नहीं कर सकते, तब आप सोचते हैं कि मैंने त्याग कर दिया! जब आप नहीं कर सकते, तब आप सोचते हैं, मैंने त्याग कर दिया !’

के अक्सर सोचते हैं कि वे ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो गए हैं। अन्यथा उपाय क्या था? मजबूरी को ब्रह्मचर्य समझ लें, तो भ्रांति जारी रहती है। उचित यही होगा कि समझें कि जिन गुणधर्मों से, जिस प्रकृति के तत्व से वासना उठती थी, वे तत्व क्षीण हो गए, जल गए। जब वे जग रहे थे तत्व, सजग थे, तेज थे, दौड़ते थे, तब आप उनका पीछा कर रहे थे। तब भी आप कर्ता नहीं थे। और अब भी आप कर्ता नहीं हैं। लेकिन वासना के दिन में समझा था कि मैं कर्ता हूं। मैं हूं जवान। और बुढ़ापे के दिन में समझ रहे हैं कि मैं हूं त्यागी, मैं हूं ब्रह्मचारी। दोनों भ्रांतियां हैं।

अगर आप देख पाएं कि सारा खेल प्रकृति का है और आप उसके बीच में सिर्फ खड़े हैं देखने वाले की तरह, एक क्षण को भी कर्तृत्व आपका नहीं है, आप मुक्त हो गए। यह जानते ही कि मैं कर्ता नहीं हूं बंधन गिर गए। यह पहचानते ही कि मैंने कभी कुछ नहीं किया है, सारे कर्मों का जाल टूट गया।

कर्म आपको नहीं बांधे हुए हैं। लोग मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं कि जन्मों—जन्मों के कर्म पकड़े हुए हैं। कोई कर्म आपको नहीं पकड़े हुए है, कर्ता पकड़े हुए है। कर्ता के छूटते ही सारे कर्म छूट जाएंगे। क्योंकि जिसने किए थे, जब वह ही न रहा, तो कर्म कैसे पकड़ेंगे? कर्म नहीं पकड़ता, कर्ता पकड़ता है। और कर्ता के कारण जन्मों—जन्मों के कर्म इकट्ठे रहते हैं, उनका बोझ आप ढोते हैं।

कई लोग मुझसे यह भी पूछने आते हैं कि पिछले किए हुए कर्मों को कैसे काटें?

एक तो उनको किया नहीं कभी। अब उनको काटने का कर्म करने की कोशिश चल रही है! उनको कैसे काटें? जिनको किया ही नहीं, उनको अनकिया कैसे करिएगा? वह भांति थी कि आपने किया। अब आप एक नई भ्रांति चाहते हैं कि उनको हम काटने का कर्म कैसे करें! पहले संसारी थे, अब संन्यासी कैसे हों?

संन्यास का कुल मतलब इतना है कि करने को कुछ भी नहीं है, सिर्फ देखने को है। अब करने वाला मैं नहीं हूं, सिर्फ देखने वाला हूं। फिर जो भी हो रहा हो, उसे देखते रहना है सहज भाव से, उसमें कोई बाधा नहीं डालनी है।

शास्त्र कहते हैं कि इतनी अगर ब्राह्मण की भी हत्या कर दे, तो उस पर कोई पाप नहीं है। अंबेदकर ने बड़ा एतराज उठाया। क्योंकि यह बात बड़ी अजीब है, और भी कोई सोचेगा, तो एतराज उठाएगा। इस तरह की छूट तानी को देनी कैसे संभव है? कानून सबके लिए है; नियम सबके लिए है।

और इसमें कहा है कि ज्ञानी अगर ब्राह्मण की भी हत्या कर दे, उसे कोई पाप नहीं है! और अज्ञानी? किसी शास्त्र में लिखा नहीं है, लेकिन कहीं न कहीं लिखना जरूर चाहिए। अज्ञानी अगर पुतला भी बनाकर मिट्टी का काट दे, मैं मानता हूं, पाप है। फर्क समझ लेना जरूरी है।

तानी हम कहते उसे हैं, जो कहता है, मैं कर्ता नहीं हूं। अगर वह काट भी रहा हो, तो सिर्फ उसके गुण ही काट रहे हैं, वह नहीं काट रहा है। और उस हत्या के कृत्य में भी वह सिर्फ साक्षी है। जरूरी नहीं कि ज्ञानी ऐसा करे, आवश्यकता भी नहीं है। ज्ञानी होते—होते वस्तुत: भीतर के सारे तत्व धीरे— धीरे समस्वरता को उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसी घटना शायद ही कभी घटती है। लेकिन घट सकती है।

उस संभावना को मानकर यह शास्त्रों में सूत्र है कि अगर ब्राह्मण को भी काट दे! और ब्राह्मण को काटने का मतलब है, क्योंकि ब्राह्मण का मतलब है, जिसने इस जीवन में श्रेष्ठतम, सुंदरतम जीवन—दशा पा ली हो, उसको भी काट दे, अच्छे से अच्छे फूल को भी मिटा दे, तो भी उसे कोई पाप नहीं है।

पाप इसलिए नहीं है कि वह जानता है कि मैं कर्ता नहीं हूं। और आप किसी की तस्वीर भी फाड़ दें क्रोध से, मिट्टी का पुतला बनाकर काट दें……। ऐसा अज्ञानी करते भी हैं। किसी का पुतला बनाकर निकालेंगे जुलूस, उसको जला देंगे। उनका भाव बड़ी गहरी हिंसा का है। और जलाते वक्त उनके मन में पूरा भाव है कर्ता का कि हम मारे डाल रहे हैं।

मैं कर्ता हूं, तो मैं पापी हो जाता हूं। मैं कर्ता नहीं हूं तो पाप का कोई कारण नहीं है। इसलिए हमने ज्ञानी को समस्त नियमों के पार रखा है। कोई नियम उस पर लगते नहीं। वह नियमातीत है। इसीलिए नियमातीत है कि जब कर्तृत्व उसका कोई न रहा, तो सब नियम कर्म पर लगते हैं और कर्ता पर लगते हैं। साक्षी पर कोई नियम कैसे लग सकता है?

जैसे ही कोई तीन गुणों के सारे कर्म हैं, ऐसा जानता है, और स्वयं को साक्षी, वह मुझ सच्चिदानंदनघनरूप परमात्मा को तत्व से पहचान लेता है, उस काल में वह पुरुष मुझे प्राप्त हो जाता है। तथा यह पुरुष इन स्थूल शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों को उल्लंघन करके..।

इस शरीर के जन्म के कारण वे तीनों गुण ही हैं। और उन तीनों गुणों के साथ मेरा तादात्म्य है, वही मुझे नए शरीरों को ग्रहण करने में ले जाता है।

जो उनका उल्लंघन कर जाता है, वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था, सब प्रकार के दुखों से मुक्त हुआ परमानंद को प्राप्त होता है।

इसमें हमें समझ में आ जाएगा कि हो सकता है, उसका नया जन्म न हो। यह भी समझ में आ सकता है कि उसे दुख न हो। लेकिन मृत्यु न होगी, यह कैसे समझ में आएगा!

महावीर भी मरते हैं, बुद्ध भी मरते हैं, कृष्ण खुद भी मरते हैं। मृत्यु तो होगी, लेकिन जिसने भी जान लिया कि मैं साक्षी हूं वह मृत्यु का भी साक्षी रहेगा। तो वह देखेगा कि गुण ही मर रहे हैं; गुणों का जाल शरीर ही मर रहा है, मैं नहीं मर रहा हूं। उसकी वृद्धावस्था संभव नहीं है। असल में उसकी कोई अवस्था संभव नहीं है।

जवान होकर वह जवान नहीं रहेगा। का होकर का नहीं रहेगा।

बच्चा होकर बच्चा नहीं रहेगा। क्योंकि अब सब अवस्थाएं गुणों की हैं। बचपन गुणों का एक रूप है। जवानी गुणों का दूसरा रूप है। बुढ़ापा गुणों का तीसरा रूप है। और वह तीनों के पार है। इसलिए न वह बच्चा है, न जवान है, न बूढ़ा है। किसी अवस्था में नहीं है। सभी अवस्थाओं के पार है।

इस ट्रांसेंडेंस को, इस भावातीत अवस्था को अनुभव कर लेना मुक्ति है।

इसलिए कृष्ण ने कहा कि अर्जुन जिस ज्ञान से परम सिद्धि उपलब्ध होती है, वह मैं तुझे फिर से कहूंगा। वे फिर—फिरकर, कैसे व्यक्ति अपनी परम मुक्ति को इसी क्षण अनुभव कर ले सकता है, उसके सूत्र दे रहे हैं।

सात्विक कर्म का फल सुख, ज्ञान एवं कहा है। रजस एवं तमस कर्म का फल दुख और अज्ञान कहा है। यदि रजस और तमस गुणों को साधना का आधार बनाया जाए, तो उनके फलों में क्या भिन्नता आ जाएगी?

फलों में तो कोई भिन्नता न आएगी। फल— भोक्ता में भिन्नता आएगी। फल तो वही होंगे। अगर सात्विक कर्म का फल सुख है, तो सुख ही होगा, चाहे आप जागरूक हों और न हों। अगर जागरूक होंगे, तो आप जानेंगे कि सुख मुझ से दूर और अलग है, मेरे आस—पास है। मैं सुख नहीं हूं मैं सुख को देखने वाला हूं।

चाहे रजस का फल हो दुख, फल तो वही होगा। संत को भी वही फल होगा, असंत को भी वही फल होगा। लेकिन असंत समझेगा कि मैं दुख हूं और संत समझेगा कि मैं दुख का द्रष्टा हूं। वहां भेद होगा।

इसलिए बड़े मजे की बात है। दुख का फल तो बराबर होगा, लेकिन संत दुखी नहीं हो पाएगा और असंत दुखी होगा। और दुख दोनों को होगा। जो दुख के साथ जुड़ जाएगा, तादात्म्य कर लेगा, आइडेंटिटी बना लेगा, वह दुखी होगा।

जैसे आपका कपड़ा कोई छीन ले। और आप अगर सोचते हों कि कपड़ा ही मैं हूं तो कपड़े के साथ आपकी आत्मा जा रही है। और आप सोचते हों कि कपड़ा सिर्फ मेरे ऊपर है, कोई ले भी गया, तो कपड़ा ही ले गया है, मैं नहीं चला गया हूं। कपड़ा दोनों हालत में चला जाएगा। लेकिन एक हालत में आपको गहन पीड़ा से भर जाएगा, दूसरी हालत में आप हंसते रह जाएंगे।

शरीर तो दोनों का छूटेगा। लेकिन जिसने अपने को शरीर ही समझा हो, वह रोएगा, छाती पीटेगा। और जिसने जाना हो कि मैं शरीर का देखने वाला हूं शरीर से भिन्न और अलग हूं, वह शरीर को जाते हुए देखेगा, जैसे एक और वस्त्र छिन गया, जराजीर्ण हो गया था, नए वस्त्र की खोज में पुराने को छोड़ दिया।

तीनों के फल होंगे। लेकिन साधक के लिए, जो उन तीनों के प्रति जागरूकता साध रहा है….।

और जागरूकता तो सभी को साधनी पड़ेगी, चाहे आप किसी गुण में हों। चाहे आपके हाथ पर जंजीरें लोहे की हों, चाहे आपके हाथ पर जंजीरें सोने की हों, चाहे आपके हाथ पर जंजीरें हीरे से मढ़ी हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जंजीर खोलने की कला तो एक ही होगी। वह सोने की है कि लोहे की, इससे कोई भेद नहीं पड़ता। आपके चारों तरफ दुख बंधा है कि सुख, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। खोलने की कुंजी तो एक ही है, और वह कुंजी है, साक्षी— भाव। चाहे दुख हो तो, चाहे सुख हो तो, आपको अपने को दूर खड़े होकर देखने की कला में निष्णात करना है। अभ्यास एक है, कि मैं अलग हूं। कुछ भी घट रहा हो, वह घटना अ ब स कुछ भी हो, उस घटना से मैं दूर खड़ा देख रहा हूं। मैं दर्शक हूं।

सात्विक कर्मों का परिणाम है, सहज वैराग्य। जो व्यक्ति रजस या तमस के माध्यम से साधना कर रहा है, क्या उसका भी वैराग्य सहज ही होगा? क्या वैराग्य के प्रकटीकरण में भी भिन्नता आ जाएगी?

नहीं, वैराग्‍य हमेशा सहज होगा। सहज का मतलब समझ लें।

वैराग्य को ओढ़ा नहीं जा सकता, जबरदस्ती थोपा नहीं जा सकता। वैराग्य जब भी होगा, सहज होगा। और अगर सहज न हो, तो वह वैराग्य सिर्फ ऊपर—ऊपर होगा, भीतर उसके राग होगा। नाम वैराग्‍य होगा, लेकिन नए ढंग का राग होगा।

आप एक चीज को छोड़ सकते हैं दूसरी चीज को पकड़ने के लिए। लेकिन यह वैराग्‍य नहीं है। वैराग्य का मतलब है, छोड़ना, बिना किसी को पकड़ने के लिए। सिर्फ मुट्ठी को खुला छोड़ देना है।

साधु—संत लोगों को समझाते हैं—तथाकथित साधु—संत—कि तुम यहां छोड़ो, तो परलोक में पाओगे। उनकी बातें सुनकर अगर कोई यहां छोड़ दे, तो वह छोड नहीं रहा है। वह सिर्फ परलोक में पकड रहा है। उसका वैराग्य झूठा है, ओढ़ा हुआ है। राग ही काम कर रहा है। और वह मन ही मन में बड़ा प्रसन्न हो रहा है कि मैंने यहां धन दिया, तो हजार गुना परलोक में मुझे मिलेगा। वह सौदा कर रहा है, त्याग नहीं कर रहा। वह इनवेस्टमेंट कर रहा है। वह आगे की तैयारी कर रहा है। वह यहीं से आगे के लिए भी धन जोड़ रहा है।

और साधु समझाते हैं कि धन को इकट्ठा करके क्या करोगे? पुण्य इकट्ठा करो। क्योंकि धन तो छिन जाएगा; पुण्य कभी नहीं छिनेगा। लोभी उनकी बातों में आ जाएंगे। क्योंकि लोभी ऐसा ही धन खोज रहा है, जो छिन न सके। यह भाषा लोभ की है, त्याग की भाषा नहीं है।

सहज वैराग्य का अर्थ है, आपको दिखाई पड़ेगा, धन व्यर्थ है। आप इसलिए नहीं छोड़ रहे हैं कि इससे कोई बडा धन मिल जाएगा। आप धन की पकड़ ही छोड़ रहे हैं। आप बड़े को भी नहीं चाहते हैं। आप इस संसार को इसलिए नहीं छोड़ रहे हैं कि परलोक मिल जाएगा। आप कुछ पाना ही नहीं चाहते। पाने की बात ही मूढ़तापूर्ण समझ में आ गई। यह बोध हो गया कि पाने की आकांक्षा में ही दुख है, फिर वह पाना यहां हो कि परलोक में हो। अब आप कुछ पाना नहीं चाह रहे। आप अब जो हैं, वही होने में प्रसन्न हैं, तो वैराग्य।

वैराग्य का मतलब है, मैं जहां हूं, जैसा हूं? जो हूं उसकी स्वीकृति। उससे कोई असंतोष नहीं। राग का अर्थ है, जो भी मैं हूं उससे असंतुष्ट हूं। और कुछ और हो जाऊं, तो मेरा संतोष हो सकता है।

राग का संतोष है भविष्य में, वैराग्य का संतोष है अभी और यहीं। इसलिए वैराग्य सदा सहज होगा, एक।

साधना कोई भी हो, वैराग्य सदा फल होगा। साधना चाहे तमस की हो, चाहे रजस की, चाहे सत्य की, फल सदा वैराग्य होगा। साधना का फल वैराग्य है। ध्यान का फल वैराग्य है। ज्ञान का फल वैराग्य है।

अगर आप दौड़ रहे हैं, कर्म कर रहे हैं. जैसा कि कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं कि तू कर्म कर, डर मत। लेकिन कर्म करने में भोक्ता मत रह, कर्ता मत रह, साक्षी हो जा।

अर्जुन को कृष्ण कह रहे हैं, तू रजस की साधना कर। क्योंकि कृष्ण जानते हैं भलीभांति कि अर्जुन का गुण है क्षत्रिय का। वह रजस उसका स्वभाव है, वह उसकी प्रमुखता है। और जीवनभर उसने रजस को साधा है, आलस्य को दबाया है। सत्य को दबाया है, रजस को उभारा है। क्योंकि क्षत्रिय अगर सत्व को उभारे, तो क्षत्रिय न हो सकेगा, ब्राह्मण हो जाएगा। अगर ब्राह्मण रजस को उभारे, तो नाम का ही ब्राह्मण रह जाएगा, क्षत्रिय हो जाएगा।

परशुराम नाम के ब्राह्मण हैं। हाथ में उनके फरसा है। और क्षत्रियों से, कथा है कि उन्होंने अनेक बार पृथ्वी को खाली कर दिया। वह महाक्षत्रिय हैं। इसलिए परशुराम में सत्व प्रमुख नहीं हो सकता, रजस ही प्रमुख होगा। परशुराम की दोस्ती बुद्ध से नहीं बैठ सकती, मोहम्मद से बैठ सकती है। जहां सक्रियता प्रमुख हो, वहां रजस ऊपर होगा।

कृष्ण भलीभांति जानते हैं अर्जुन का सारा व्यक्तित्व, सारा ढांचा रजस का है। इसलिए वे कह रहे हैं, तू भागने की बातें मत कर। यह तेरा स्वभाव नहीं है, यह तेरा स्वधर्म नहीं है। तू भाग न सकेगा। अगर तू भाग भी गया जंगल में, तो झाडू के नीचे तू बैठ न सकेगा। तू वहीं जंगल में शिकार करना शुरू कर देगा। वहीं कोई झगड़े खड़े कर लेगा। तेरे क्षत्रिय होने से तेरा छुटकारा इतना आसान नहीं है। जो तेरा व्यक्तित्व है, उसी गुण की साधना में तू उतर, यही कृष्ण का पूरा संदेश है।

इसलिए वे कह रहे हैं, तू लड़। लेकिन एक शर्त, कि तू लड़ जरूर, युद्ध जरूर कर, लेकिन योद्धा अपने को मत समझ, कर्ता अपने को मत समझ। समझ कि तू परमात्मा के हाथ एक निमित्त, एक उपकरण, एक साधन है।

चाहे साधना सत्व की हो, चाहे कोई सदगुणों को जीवन में उतारने में लगा हो, सत्य को, करुणा को, अहिंसा को साध रहा हो, सब भांति अपने आचरण को पवित्र कर रहा हो, शुचि कर रहा हो, शुद्ध कर रहा हो, वहा भी कर्ता— भाव पकड सकता है। वहां भी यह हो सकता है कि देखो, मेरे जैसा साधु कोई भी नहीं है! कि मेरी जैसी पवित्रता कहां है!

तो भूल हो गई। तो यह सत्वगुण जंजीर बन जाएगा। वहा भी जानना है कि यह जो भलापन हो रहा है, यह भी मेरे भीतर जो प्रकृति ने सत्व का गुण रखा है, उसका परिणमन है, उसका परिणाम है। मैं तो सिर्फ देखने वाला हूं। मैं देख रहा हूं कि मेरा सत्व सक्रिय हो रहा है, मेरे भीतर से करुणा बह रही है, अहिंसा बह रही है। मैं अहिंसक नहीं हूं।

मैं तो वैसे ही देख रहा हूं, जैसे हिमालय देखता होगा कि गंगा बह रही है। आकाश से पानी गिरता है, गंगोत्री भर जाती है, गंगोत्री से गंगा बहती है। हिमालय यह नहीं कह रहा है कि मैं गंगा को बहा रहा हूं। हिमालय सिर्फ देख रहा है कि गंगा मुझसे बह रही है। ऐसे ही सत्व की क्रियाएं मुझसे हो रही हैं। आकाश से वर्षा हो रही है, प्रकृति उनको दे रही है, मैं सिर्फ देखने वाला हूं।

अगर आप हिमालय की तरह खड़े हुए साक्षी हो गए, तो सत्व बंधन नहीं बनेगा, अन्यथा सत्व भी बंधन बन जाएगा। और अगर आप साक्षी हो सकें, तो फिर तमस भी बंधन नहीं बनेगा। आप तब देख सकते हैं कि आलस्य मेरा नहीं है, आलसी मैं नहीं हूं; यह भी मेरे भीतर प्रक्रिया है गुणों की।

विज्ञान इस संबंध में बड़ी महत्वपूर्ण सूचनाएं देता है। वे सूचनाएं ये हैं कि आपके भीतर जो भी हो रहा है, वह आपके शरीर के हार्मोन्स पर निर्भर है, आप पर निर्भर नहीं है। हार्मोन नया शब्द हो सकता है, लेकिन मतलब उसका भी वही है, जो गुणों का होगा।

एक स्त्री है, एक पुरुष है। आप सोचते हैं, मैं स्त्री हूं? मैं पुरुष हूं। आप गलती में हैं। स्त्री को पुरुष हार्मोन के इंजेक्शन दे दिए

जाएं, उसके शरीर का रूपांतरण हो जाएगा, वह पुरुष जैसी हो जाएगी। पुरुष को स्त्री हार्मोन के इंजेक्शन दे दिए जाएं, उसका रूपांतरण हो जाएगा। उसकी कामेंद्रिय बदलकर स्त्रैण हो जाएगी। तब आप बड़े चौकेंगे कि मैं कौन हूं फिर? क्योंकि अगर इंजेक्‍शन आपको स्त्री से पुरुष बना सके, पुरुष से स्त्री बना सके, तो आप कौन हैं? स्त्री हैं या पुरुष?

यही हमारी निरंतर की खोज है। और मैं मानता हूं कि विज्ञान बड़े नए आधार दे रहा है पुराने सत्यों के लिए। इसका मतलब हुआ कि आपका स्त्री होना या पुरुष होना प्रकृति के द्वारा है, आप दोनों के पार हैं। तो अगर आपकी प्रकृति बदल दी जाए, शरीर बदल दिया जाए, तो आप स्त्री हो जाएं या पुरुष हो जाएं।

आप हैरान होंगे! एक आदमी क्रोधित हो रहा है। हार्मोन देकर उसके क्रोध को सुलाया जा सकता है। वह फिर कभी क्रोधित नहीं होगा। आपके भीतर ग्रंथियां हैं, जिनका आपरेशन कर दिया जाए, तो आप लाख उपाय करें, तो क्रोध नहीं कर सकेंगे। चाहे कोई आपको पीट रहा हो, गाली दे रहा हो, अपमान कर रहा हो, आप कितना ही उठाने की कोशिश करें, भीतर क्रोध नहीं उठेगा। क्योंकि वह ग्रंथि ही नहीं है, जिससे क्रोध उठ सकता है।

पावलव ने बहुत प्रयोग किए कुत्तों के ऊपर। खूंख्वार कुत्ते, जो कि चीरकर दो कर दें अगर आप उनको जरा—सी चोट पहुंचा दें। उनकी ग्रंथियां अलग कर दीं। आपरेशन किया, ग्रंथि अलग कर दी। खूंख्वार कुत्ते बिलकुल ही निर्जीव हो गए। आप उनको मार रहे हैं, और वे पूंछ हिला रहे हैं। भौंकते भी नहीं। हमले की तो बात दूसरी, भौंकते भी नहीं। क्योंकि भौंकना भी कुछ हार्मोन पर निर्भर है। अगर वह भीतर तत्व नहीं है, तो आप भौंक भी नहीं सकते। कृष्ण और सांख्य की बड़ी गहरी खोज है कि आपके भीतर जो भी हो रहा है, वह प्रकृति से हो रहा है, गुणों से हो रहा है। आप सिर्फ साक्षी से ज्यादा नहीं हैं।

मगर जो कुत्ता भौंक रहा है, हमला कर रहा है, आप उसको समझा सकते हैं कि ये तेरे शरीर में किसी ग्रंथि के कारण हो रहा है! वह कहेगा, मैं भौंक रहा हूं, कौन कह रहा है ग्रंथि है?

आप जब क्रोध से भर गए हैं, तो आप सोच सकते हैं कि आपके शरीर के भीतर कुछ रासायनिक तत्वों का यह खेल है! आप कहेंगे, मैं क्रोधित हूं मुझे गाली दी गई है।

आपको गाली नहीं दी गई। क्योंकि अगर ग्रंथि न हो, तो भी गाली दी जाएगी, क्रोध नहीं उठेगा। ग्रंथि ने गाली पकड़ी, और ग्रंथि उत्तर दे रही है, और आप केवल शिकार हैं। आप सिर्फ विक्टिम हैं। आपको सिर्फ भ्रांति है।