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जड़ त्रिगुणों से चैतन्य साक्षी का तदात्‍मय कैसे संभव हो पाता है?


दर्पण में आप अपना चेहरा देखते हैं। दर्पण जड़ है, लेकिन आपके चेहरे का प्रतिबिंब बनाता है। चेहरा देखकर आप खुश होते हैं और आप कहते हैं, यह मैं हूं। वह जो दर्पण में आपको दिखाई पड़ रहा है, उसे देखकर आप कहते हैं, यह मैं हूं! कितना सुंदर हूं! कितना स्वस्थ हूं!

आपके शरीर में जो प्रकृति काम कर रही है, वह जड़ है, लेकिन दर्पण की तरह है। उसमें आप अपना प्रतिबिंब पकड़ते हैं। और दर्पण में तो आपको पता चलता है कि प्रतिबिंब है, लेकिन अगर दर्पण सदा ही आपके साथ जुड़ा रहे, उठें, बैठें, कुछ भी करें, दर्पण साथ ही हो; सोए, कहीं भी जाएं, दर्पण साथ ही हो, तो आपको यह भूल जाएगा कि दर्पण में जो दिखाई पड रहा है, वह मेरा प्रतिबिंब है। आपको लगने लगेगा, वह मैं हूं।

यही घटना घट रही है। आप अपने प्रकृति के गुणों में अपने प्रतिबिंब को पा रहे हैं। और प्रतिबिंब को सदा पा रहे हैं। एक क्षण को भी वह प्रतिबिंब हटता नहीं वहां से। निरंतर उस प्रतिबिंब को पाने के कारण एक भी क्षण उसका अभाव नहीं होता। इस सतत चोट के कारण यह भाव निर्मित होता है कि यह मैं हूं। यह भाव इसलिए हो पाता है कि चेतना समर्थ है सत्य को जानने में। चेतना चूंकि समर्थ है सत्य को जानने में, इसलिए चेतना समर्थ है भ्रांत होने में।

हमारे सभी सामर्थ्य दोहरे होते हैं। आप जिंदा हैं, क्योंकि आप मरने में समर्थ हैं। आप स्वस्थ हैं, क्योंकि आप बीमार होने में समर्थ हैं। आपसे ठीक हो सकता है, क्योंकि आप गलत करने में समर्थ हैं। इसे ठीक से समझ लें।

हमारी सारी सामर्थ्य दोहरी है। अगर विपरीत हम न कर सकते हों, तो सामर्थ्य है ही नहीं। जैसे किसी आदमी को हम कहें कि तुम ठीक करने के हकदार हो, लेकिन गलत करने की तुम्हें स्वतंत्रता नहीं है। तुम्हें सिर्फ ठीक करने की स्वतंत्रता है। तो स्वतंत्रता समाप्त हो गई। स्वतंत्रता का अर्थ ही यह है कि गलत करने की भी स्वतंत्रता है। तभी ठीक करने की स्वतंत्रता का कोई अर्थ है।

चेतना स्वतंत्र है। स्वतंत्रता चेतना का गुण है। वह उसका स्वभाव है। स्वतंत्रता का अर्थ है कि दोनों तरफ जाने का उपाय है। मैं भांति भी कर सकता हूं। मैं गलत भी कर सकता हूं। और गलत कर सकता हूं, इसीलिए ठीक को खोजने की सुविधा है।

ये दो उपाय हैं, या तो मैं अपने को जान लूं, जो मैं हूं; यह सत्य का जानना होगा। और या मैं अपने को उससे जोड़ लूं, जो मैं नहीं हूं; यह असत्य के साथ एक हो जाने का मार्ग होगा। ये दोनों मार्ग खुले हैं।

सभी का मन होता है कि यह स्वतंत्रता खतरनाक है। यह न होती, तो अच्छा था। लेकिन आपको पता नहीं कि आप क्या सोच रहे हैं। आपको पता नहीं है, आप क्या मांग रहे हैं।

हर आदमी सोचता है कि मैं सदा ही स्वस्थ होता और कभी बीमार न होता, तो बहुत अच्छा। लेकिन आपको पता नहीं। आप जो मांग रहे हैं, वह नासमझी से भरा हुआ है। अगर आप कभी भी बीमार न होते, तो आपको स्वास्थ्य का कोई पता ही नहीं चलता। और अगर आप दुखी न हो सकते होते, तो सुख की कोई प्रतीति नहीं हो सकती। कैसे होती सुख की प्रतीति? और सत्य अगर आपको मिला ही होता हाथ में और असत्य की तरफ जाने का कोई मार्ग न होता, तो वह सत्य दो कौड़ी का होता, उसका कोई मूल्य आपको कभी पता नहीं चलता। सत्य का मूल्य है, क्योंकि हम उसे खो सकते हैं।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जगत में प्रेम की संभावना है, क्योंकि प्रेम खो सकता है। और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जिस दिन हम आदमी को अमर कर लेंगे और आदमी की मृत्यु बंद हो जाएगी, उसी दिन जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, सब खो जाएगा। सब महत्वपूर्ण मृत्यु पर टिका है।

आप प्रेम कर पाते हैं, क्योंकि जिसे आप प्रेम करते हैं, वह कल मर सकता है। अगर आपको पता हो कि शाश्वत है सब, न कोई मर रहा है, न कोई मरने का सवाल है, प्रेम तिरोहित हो जाएगा। मृत्यु के बिना प्रेम का कोई उपाय नहीं। मृत्यु के बिना मित्रता व्यर्थ हो जाएगी। मृत्यु है, इसलिए मित्रता में इतनी सार्थकता है। मृत्यु न होगी, तो जीवन की सारी जिन चीजों को हम मूल्य दे रहे हैं, कोई मूल्य नहीं है। विपरीत से मूल्य पैदा होता है।

इसलिए सुबह जब फूल खिलता है, उसका सौंदर्य सिर्फ खिलने में ही नहीं है, इस बात में भी छिपा है कि सांझ वह मुरझा जाएगा। और अगर फूल कभी न मुर्झाए, तो वह प्लास्टिक का फूल हो जाए। और अगर बिलकुल ही—वह प्लास्टिक का फूल भी नष्ट होता है—अगर फूल सदा के लिए हो जाए, तो उसकी तरफ देखने का भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

जीवन की सारी रहस्यमयता विपरीत पर निर्भर है। सत्य का मूल्य है, क्योंकि असत्य में उतरने का उपाय है। और परमात्मा में जाने का रस है, क्योंकि संसार में आने का दुख है।

लोग मुझसे पूछते हैं, आखिर परमात्मा संसार बना ही क्यों रहा है? संसार है ही क्यों?

अगर संसार न हो, तो परमात्मा का कोई भी रस नहीं है। परमात्मा अपने से विपरीत को पैदा कर रहा है, ताकि आप उसे खो सकें और पा सकें। और जिसे हम खो सकते हैं, उसे पाने का आनंद है। जिसे हम खो ही नहीं सकते, वह हमारे सिर पर बोझ हो जाएगा।

अगर परमात्मा कुछ ऐसा हो कि जिसे आप खो ही न सकें, तो आप जितने परमात्मा से ऊब जाएंगे, उतने किसी चीज से नहीं। परमात्मा से ऊबने का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि क्षण में आप उसे खो सकते हैं। और जिस दिन आप संसार से ऊब जाएं, उसी क्षण परमात्मा में लीन वापस हो सकते हैं।

अगर इस बात को ठीक से समझ लें, तो जीवन की बहुत—सी समस्याएं साफ हो जाएंगी।

पहला बुनियादी सिद्धात है कि मनुष्य की आत्मा स्वतंत्रता है, परम स्‍वातंत्र्य है, टोटल फ्रीडम। यह जो परम स्‍वातंत्रय है चेतना का, इसको ही हमने मोक्ष कहा है। जो इसे जान लेता है, वह मुक्त है। जो इसे नहीं जानता, वह बंधा हुआ है।

लेकिन वह बंधा इसीलिए है कि वह बंधना चाहता है। और तब तक बंधा रहेगा, जब तक बंधन इतना दुख न देने लगे कि उसे तोड्ने का भाव न आ जाए, उससे छूटने का भाव न आ जाए, उससे उठने का भाव न आ जाए।

और इस जगत में कोई भी घटना असमय नहीं घटती; अपने समय पर घटेगी। समय का मतलब यह है कि जब आप पक जाएंगे, तब घटेगी। जब फल पक जाएगा, तो गिर जाएगा। जब तक कच्चा है, तब तक लटका रहेगा। जिस दिन आपका दुख भी पक जाएगा संसार के साथ, उस दिन आप तत्त्व। टूट जाएंगे और परमात्मा में गिर जाएंगे।

अगर आप अटके हैं, तो इसलिए नहीं कि आपकी साधना में कोई कमी है। आप अटके हैं इसलिए कि आप दुख को भी पूरा नहीं भोग रहे हैं। आप पकने के भी पूरे उपाय नहीं होने दे रहे हैं।

समझ लें कि एक फल जो धूप में पकता हो, वह फल अपने को छाया में छिपाए हुए है कि धूप न लग जाए। और फिर वह सोच रहा है, मैं कच्चा क्यों हूं! आप ऐसे ही फल हैं, जो सब तरफ से अपने को छिपा भी रहे हैं, बचा भी रहे हैं। उससे ही आप बचा रहे हैं, जिसकी पीडा के कारण ही आप मुक्त हो सकेंगे।

इसलिए मैं निरंतर कहता हूं संसार में पूरे जाओ, ताकि तुम संसार के बाहर आ सको। बाहर जाने का एक ही उपाय है कि तुम पूरे भीतर चले जाओ; वहां कुछ और जानने को शेष न रह जाए। दुख से छूटने की एक ही व्यवस्था है, एक ही विधि है। बाकी सब विधियां बहाने हैं। और वह विधि यह है कि तुम दुख को पूरा भोग लो। तुम उसमें पक जाओ। तुम अपने ही आप गिर जाओगे।

कृष्ण यही कह रहे हैं कि अर्जुन, तू व्यर्थ ही परेशान हो रहा है। गुण अपनी गति से चल रहे हैं। गुण अपनी गति से पक रहे हैं। और जहां से तू भागना चाहता है, वहां से भागकर तू कभी मुक्त न हो सकेगा। क्योंकि तू छाया खोज रहा है। इस युद्ध से भागकर तू बचा लेगा अपने को उस महापीड़ा से गुजरने से, जो कि मुक्ति का कारण बन जाएगी। तू इस युद्ध से गुजर जा। तू इस युद्ध को हो जाने दे। तू रोक मत। तू डर भी मत। तू संकोच भी मत ले। तू निर्भय भाव से इसमें प्रवेश कर जा। और जो घटना तेरे चारों तरफ इकट्ठी हो गई है, उसको उसकी पूर्णता में तेरे भीतर बिंध जाने दे। यह आग पूरी जल उठे। तू इसमें पूरी तरह राख हो जा। उस राख से ही तेरे नए जीवन का अंकुरण होगा। उस राख से ही तू अमृत को जानने में समर्थ हो पाएगा।

जो भी, जो भी जीवन में है, वह अकारण नहीं है। दुख है, संसार है, बंधन हैं, वे अकारण नहीं हैं। उसकी उपादेयता है। और बड़ी उपादेयता यह है कि वह अपने से विपरीत की तरफ इशारा करता है।

आपकी चेतना बंध सकती है, क्योंकि आपकी चेतना स्वतंत्र हो सकती है। और यह आपके हाथ में है। और जब मैं कहता हूं आपके हाथ में है, तब आपको ऐसा लगता है, तो फिर मैं इसी वक्त स्वतंत्र क्यों नहीं हो जाता? आप सोचते ही हैं कि आप इसी वक्त स्वतंत्र क्यों नहीं हो जाते! लेकिन उपाय आप सब कर रहे हैं कि आप बंधे रहें।

एक मित्र मेरे पास आए। कहते थे, मन बड़ा अशांत है; शांति का कोई उपाय बताएं। मैंने उनसे पूछा कि शांति की फिक्र ही न करें, पहले मुझे यह बताएं कि अशांत क्यों हैं? क्योंकि मैं शांति का उपाय बताऊं और आप अशांति का आयोजन किए चले जाएं, तो कुछ हल न होगा। और उससे और असुविधा होगी। वैसी हालत हो जाएगी कि एक आदमी कार में एक्सीलरेटर भी दबा रहा है और ब्रेक भी लगा रहा है।

इसीलिए कार में इंतजाम करना पड़ा—क्योंकि आदमी का स्वभाव परिचित है हमें—कि उसी पैर से एक्सीलरेटर दबाएं और उसी से ब्रेक। क्योंकि आपसे डर है कि आप दोनों काम एक साथ कर सकते हैं। आप एक साथ दोनों काम कर सकते हैं, एक्सीलरेटर भी दबा दें और ब्रेक भी दबा दें। तो कठिनाई खड़ी हो जाए। तो ब्रेक दबाने के लिए एक्सीलरेटर से पैर हट आए।

लेकिन मन के साथ हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। मन के साथ हमारी हालत ऐसी है कि हम दोनों काम एक साथ करना चाहते हैं।

उन मित्र से मैंने पूछा कि तकलीफ क्या है? किस वजह से अशांत हैं? तो उन्होंने कहा, अशांति का कारण यह है कि मेरा लड़का मेरी मानता नहीं।

किसका लड़का किसकी मानता है? इसमें लडका कारण नहीं है। इसमें आप मनाना क्यों चाहते हैं? लड़का अपना जीवन जीएगा। मैंने उनसे पूछा, आपने अपने बाप की मानी थी?

कौन अपने बाप की मानता है? लड़का और रास्तों पर चलेगा, जिन पर बाप कभी नहीं चला। लड़का और दूसरी दुनिया में जीएगा, जिसमें बाप कभी नहीं जीया। लड़के और बाप के समय में भेद है, उनके मार्गों में भेद होगा। उनकी परिस्थितियों में भेद है, उनके विचारों में भेद होगा। लड़का अगर जिंदा है, तो बाप से भिन्न चलेगा। लड़का अगर मुर्दा है, तो बाप की मानकर चलेगा।

अब बाप का दुख यह है कि लड़का अगर मुर्दा है, तो वह परेशान है। अगर लड़का जिंदा है, तो वह परेशान है। लड़का मुर्दा है, तो वह समझता है कि न होने के बराबर है।

आपको खयाल में नहीं है, अगर लड़का बिलकुल आप जैसा कहें, वैसा ही करे, तो भी आप दुखी हो जाएंगे। आप कहें बैठो, तो वह बैठ जाए। आप कहें उठो, तो उठ जाए। आप कहें बाएं घूमो, तो बाएं घूम जाए। आप जो कहें उसको रत्ती—रत्ती वैसा ही करे, तो आप सिर पीट लेंगे। आप कहेंगे, यह लड़का क्या हुआ, एक व्यर्थता है। इससे तो होता न होता बराबर है। इसके होने का कोई अर्थ ही नहीं है। होने का पता ही भिन्नता से चलता है।

तो आप इसलिए दुखी नहीं हैं, मैंने उनसे कहा कि लड़का मानता नहीं है। आप मनाना क्यों चाहते हैं कि माने? आपका दुख आपके कारण आ रहा है। आप अपने अहंकार को थोपना चाहते हैं। और मेरे पास आप शांति की तलाश करने आए हैं। लड़के को अपने मार्ग पर चलने दें, अशांति फिर कहां है?

तब उनका घाव छू गया। तब उन्होंने कहा, आप क्या कह रहे हैं! अगर उसको मार्ग पर चलने दें, तो सब बर्बाद कर देगा। सब धन मिटा डालेगा।

मैंने उनको पूछा, आप कब तक धन की सुरक्षा करिएगा? कल आप समाप्त हो जाएंगे और धन मिटेगा। आपका लड़का मिटाए, कोई और मिटाए; धन मिटेगा। धन मिटने को है। तो आपका दुख लड़के से नहीं आ रहा है। आपका दुख धन पर जो आपकी पकड है, उससे आ रहा है। आप मरेंगे दुखी। क्योंकि मरते वक्त आपको लगेगा, अब धन का क्या होगा! कोई न कोई मिटाएगा।

इसलिए धनी न सुख से जी पाता है, न सुख से मर पाता है। मरते वक्त यह भय लगता है कि मैंने जिंदगीभर कमाया, अब इसको कोई मिटा देगा। और कोई न कोई मिटाएगा आखिर।

इस जगत में जो भी बनाया जाता है, वह मिटता है। इस जगत में कोई भी ऐसी चीज नहीं, जो न मिटे। आपका धन अपवाद नहीं हो सकता। तो आप दुखी इसलिए हो रहे हैं कि आपका धन कोई न मिटा दे, अशांत इसलिए हो रहे हैं। और शांति की कोई तरकीब खोजते हैं।

मान लें कि धन तो मिटने वाली चीज है, मिटेगी। और लड़के अपने मार्गों पर जाएंगे। और पिता लड़कों को पैदा करता है, इसलिए उनके जीवन का मालिक नहीं है। फिर मुझे कहें कि दुख कहां है।

अशांति के कारण खो जाएं, तो आदमी शांत हो जाता है। शांति के कारण खोजने की जरूरत ही नहीं है। शांति मनुष्य का स्वभाव है। अशांति अर्जित करनी पड़ती है। हम अशांति अर्जित करते चले जाते हैं और शांति की पूछताछ शुरू कर देते हैं।

अशांति के साथ जो इनवेस्टमेंट है, वह भी हम छोड़ना नहीं चाहते। जो लाभ है, वह भी हम लेना चाहते हैं। और शांति के साथ जो लाभ मिल सकता है, वह भी हम लेना चाहते हैं। और दोनों हाथ लड्डूओं का कोई भी उपाय नहीं है।

यह संसार के साथ हमारा जोड़ है, गुणों के साथ, शरीर के साथ, हमारा तादात्म्य है, उसमें भी हमें लाभ दिखाई पड़ता है, इसलिए है। हमने जानकर वह बनाया हुआ है। हम अपने को समझाए हुए हैं कि ऐसा है। फिर संतों की बातें सुनते हैं, उससे भी लोभ जगता है कि हमको भी यह गुणातीत अवस्था कैसे पैदा हो जाए! तो हम पूछना शुरू करते हैं, क्या करें? कैसे इससे छूटें? मजा करीब—करीब ऐसा है कि जिसको आप पकड़े हुए हैं, आप पूछते हैं, इससे कैसे छूटें? आप पकड़े हुए हैं, यह खयाल में आ जाए, तो छूटने के लिए कुछ भी न करना होगा, सिर्फ पकड़ छोड़ देनी होगी।

इस शरीर के साथ आप अपने को एक मान लेते हैं। आप पकड़े हुए हैं। आप इस शरीर को सुंदर मानते हैं। इस शरीर के साथ भोग की आशा है। इस शरीर से आपको सुख मिलते हैं, चाहे वे कोई भी सुख हों—चाहे संभोग का सुख हो, चाहे स्वादिष्ट भोजन का सुख हो, चाहे संगीत का सुख हो—इस शरीर के माध्यम से आपको मिलते हैं। वे सब सुख हैं। अगर वे सुख आपको अभी भी सुख

दिखाई पड़ रहे हैं, तो शरीर के साथ आप पकड़ कैसे छोड़ सकत्ए। हैं! क्योंकि इसके द्वारा ही वे मिलते हैं। अंत तक पकड़े रहते हैं।

एक बड़ी महत्वपूर्ण कहानी है। अमेरिकी अभिनेत्री मर्लिन मनरो मरी, तो एक कहानी प्रचलित हो गई कि जब वह स्वर्ग के द्वार पर पहुंची, तो सेंट पीटर, जो स्वर्ग के द्वारपाल हैं, ईसाइयों के स्वर्ग के द्वारपाल हैं, उन्होंने मनरो को देखा। वह अति सुंदर उसकी काया। सेंट पीटर ने कहा, एक नियम है स्वर्ग में प्रवेश का। स्वर्ग के द्वार के बाहर एक छोटा—सा पुल है, उस पुल पर से गुजरना पडता है। उस पुल के नीचे अनंत खाई है। उस खाई की ही गहराई में नरक है। उस पुल पर से गुजरते समय अगर एक भी बुरा विचार आ जाए—बुरे विचार का मतलब, शरीर से बंधा हुआ विचार आ जाए—तों तत्‍क्षण व्यक्ति पुल से नीचे गिर जाता है और नरक में प्रवेश हो जाता है।

मनरो और सेंट पीटर दोनों उस पुल से चले। और घटना यह घटी कि दो—तीन कदम के बाद सेंट पीटर नीचे गिर गए। मनरो जैसी सुंदर स्त्री को चलते देखकर कुछ खयाल सेंट पीटर को आ गया होगा! स्वर्ग के द्वार पर खड़े होकर भी अगर शरीर से सुख लेने का जरा—सा भी खयाल आ जाए, तो तादात्म्य हो गया। जिस चीज से हमें सुख लेने का खयाल होता है, उसी से तादात्म्य हो जाता है। शरीर से सुख मिल सकता है, जब तक यह खयाल है, तब तक आप जुड़े रहेंगे। जिस दिन आपको यह समझ में आ जाएगा कि शरीर से मिलने वाला हर सुख केवल दुख का ही एक रूप है, जिस दिन आप यह खोज लेंगे कि शरीर से मिलने वाले हर सुख के पीछे दुख ही छिपा है, सुख केवल ऊपर की पर्त है, सिर्फ कड्वी जहर की गोली के ऊपर लगाई गई शक्कर से ज्यादा नहीं, उसी दिन तादात्म्य टूटना शुरू हो जाएगा।

यह पूछना कि कैसे जड़ त्रिगुणों से चैतन्य का तादात्म्य संभव हो पाता है?

इसीलिए संभव हो पाता है कि आप स्वतंत्र हैं। चाहें तो तादात्म्य बना सकते हैं, चाहें तो हटा सकते हैं। जब तक आप सोचते हैं कि सुख बाहर से मिल सकता है, तब तक यह तादात्म्य नहीं छूटेगा। जिस दिन आप जानेंगे, सुख मेरे भीतर है, मेरा स्वभाव है, उस दिन यह तादात्म्य छूट जाएगा।

अभी तो हम परमात्मा की भी खोज करें, तो भी शरीर से ही करनी पड़ती है। अभी तो हम पूछते हैं, परमात्मा को भी खोजें, तो कैसा आसन लगाएं? किस भांति खड़े हों? कैसे पूजा करें? कैसे

पाठ करें? कहां जाएं—हिमालय जाएं, कि मक्का, कि मदीना, कि काशी, कि जेरुसलम—कहां जाएं? कैसा भोजन करें? कैसे बैठें? कैसे उठें? ताकि परमात्मा को पा लें!

हमारी शरीर के साथ जोड़ की स्थिति इतनी गहन हो गई है कि हम परमात्मा को भी शरीर से ही खोजना चाहते हैं। हमें खयाल ही नहीं है कि शरीर के अतिरिक्त भी हमारा कोई होना है। और यह खयाल भी तभी आएगा, जब शरीर से हमें सब तरफ दुख दिखाई देने लगें।

बुद्ध ने निरंतर, सुबह से सांझ, एक ही बात कही है अपने भिक्षुओं को कि जीवन दुख है। और सिर्फ इसलिए कही है, ताकि तुम परम जीवन को जान सको। जब तुम्हें यहां दुख ही दुख दिखाई देने लगे, तो इस दुख से छूटने में जरा भी बाधा नहीं रह जाएगी। जहां दुख है, वहा से मन हटने लगता है। और जहां सुख है, वहां मन की सहज गति है।

तीसरा प्रश्न :