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क्या महत्व हैं चुनावरहित सजगता का ?क्या चुनावरहित सजगता में मन का निर्माण नहीं होता?


"समाधि की भावना वाला तपस्वी इंद्रियों के अनुकूल विषयों में कभी राग-भाव न करे और प्रतिकूल विषयों में भी मन में द्वेष न लाए।'

मनुष्य के मन के आधार ही चुनाव में हैं। मनुष्य के मन की बुनियाद चुनने में है। चुना, कि मन आया। न चुनो, मन नहीं है। इसलिए कृष्णमूर्ति बहुत जोर देकर कहते हैं, च्वाइसलेस अवेयरनेस--चुनावरहित सजगता।

चुनावरहित सजगता में मन का निर्माण नहीं होता। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।

मन को तो बहुत लोग मिटाना चाहते हैं। ऐसा आदमी खोजना कठिन है, जो मन से परेशान न हो। मन से बहुत पीड़ा मिलती है, बेचैनी मिलती है। मन का कोई मार्ग शांति तक, आनंद तक जाता नहीं; कांटे ही चुभते हैं। मन आशा देता है फूलों की, भरोसा बंधाता है फूलों का; हाथ आते-आते तक सभी फूल कांटे हो जाते हैं। ऊपर लिखा होता है--सुख। भीतर खोजने पर दुख मिलता है। जहां-जहां स्वर्ग की धारणा बनती है, वहीं-वहीं नर्क की उपलब्धि होती है।

तो स्वाभाविक है कि मनुष्य मन से छूटना चाहे; लेकिन चाह काफी नहीं है। यह भी हो सकता है कि मन से छूटने की चाह भी मन को ही बनाए। क्योंकि सभी चाह मन को बनाती हैं। चाह मात्र मन की निर्मात्री है।

तो बुनियाद को खोजना जरूरी है, मन बनता कैसे है? यह पूछना ठीक नहीं कि मन मिटे कैसे? इतना ही जानना काफी है कि मन बनता कैसे है! और हम न बनाएं तो मन नहीं बनता। हमारे बनाए बनता है। हम मालिक हैं।

लेकिन ऐसा हो गया है कि बुनियाद में हम झांकते नहीं, जड़ों को हम देखते नहीं, पत्ते काटते रहते हैं। पत्ते काटने से कुछ हल नहीं होता।

महावीर का यह पहला सूत्र, निर्विकल्प भावदशा के लिए पहला कदम है। महावीर कहते हैं, न तो राग में, न द्वेष में। ये दो ही तो मन के विकल्प हैं। इन्हीं में तो मन डोलता है, घड़ी के पेंडुलम की तरह। कभी मित्रता बनाता, कभी शत्रुता बनाता। कभी कहता अपना, कभी कहता पराया।

जैसे ही तुमने राग बनाया, तुमने द्वेष के भी आधार रख दिए। खयाल किया? किसी को भी मित्र बनाए बिना शत्रु बनाना संभव नहीं। शत्रु बनाना हो तो पहले मित्र बनाना ही पड़े। तो मित्र बनाया कि शत्रुता की शुरुआत हो गई। तुमने कहा किसी से "मेरा है', संयोग-मिलन को पकड़ा--बिछोह के बीज बो दिए। जिसे तुमने जोर से पकड़ा, वही तुमसे छीन लिया जाएगा।

तो यह भी संभव हो जाता है कि आदमी देखता है, जिसे भी मैं पकड़ता हूं, वही मुझसे छूट जाता है। तो छोड़ने को पकड़ने लगता है, कि सिर्फ छोड़ने को पकड़ लूं। यही तो तुम्हारे त्यागी और विरागियों की पूरी कथा है।

धन को पकड़ते थे; पाया कि दुख मिला, तो अब धन को नहीं पकड़ते। लेकिन "नहीं पकड़ने' पर उतना ही आग्रह है। पहले धन के लिए दीवाने थे, अब धन पास आ जाए तो घबड़ा जाते हैं, जैसे सांप-बिच्छू आया हो; जैसे जहर आया हो।

मन तो फिर कंप गया। पहले धन के लिए कंपता था, अब धन के विरोध में कंप गया। पहले खोजते थे सुंदर देह, सुंदर स्त्री, सुंदर पुरुष; अब अपने को समझा लिया कि दुख ही दुख पाया।

तो तुम जाओ त्यागी-वैरागियों के पास, तुम उन्हें वहां शरीर की निंदा करते हुए पाओगे। और तुम यह भी देख पाओगे कि निंदा में बड़ा रस है। शरीर के भीतर मांस-मज्जा है, कफ-पित्त है, दुर्गंध है, मल-मूत्र है, इसकी चर्चा करते हुए तुम त्यागियों को पाओगे। जैसे भोगी चर्चा करता है सुंदर आंखों की, स्वर्ण जैसी काया की, स्वर्गीय सुगंध की, वैसे ही त्यागी भी चर्चा करता है। त्यागी चर्चा करता है शरीर में भरे मल-मूत्र की! यह तो गंदगी का टोकरा है। यह तो चमड़ी ही ऊपर ठीक है, बाकी सब भीतर गंदा भरा है। चमड़ी के धोखे में मत आओ।

लेकिन दोनों का राग शरीर से है। जिसको हम विराग कहते हैं, वह भी सिर के बल खड़ा हो गया राग है; शीर्षासन करता हुआ राग है। शरीर से छुटकारा नहीं हुआ। बंधे शरीर से ही हैं। जो अभी कह रहा है कि शरीर मल-मूत्र की टोकरी है, अभी शरीर से उसका लगाव बना है। वह इसी लगाव को तोड़ने के लिए तो अपने को समझा रहा है कि शरीर मल-मूत्र की टोकरी है। कहां जाता है पागल! शरीर में कुछ भी नहीं है। वह तुम्हें नहीं समझा रहा है, वह अपने को ही समझा रहा है तुम्हारे बहाने। वह शरीर की निंदा करके अपने भीतर जो छिपी वासना है, उस पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा है।

निंदा हम उसी की करते हैं, जिससे हम डरते हैं। दमन भी हम उसी का करते हैं, जिससे हम भयभीत हैं । लेकिन भयभीत हम उसी से होते हैं, जिसमें हमारा राग है।

इस सारी व्यवस्था को समझना जरूरी है। इसलिए महावीर कहते हैं, "न तो अनुकूल विषयों में राग-भाव करे, न प्रतिकूल विषयों में द्वेष-भाव करे।'

न तो कहो कि शरीर स्वर्ण की काया है, न कहो कि मल-मूत्र की टोकरी है। चुनो ही मत--इधर या उधर। डोलो ही मत। शरीर जो है, है। तुम इसके संबंध में कोई धारणा मत बनाओ और कोई व्याख्या मत करो। तथ्य को तथ्य की भांति देखो। न तो इसके प्रशंसा के गीत गाओ, न तो स्तुति में ऋचाएं रचो, और न निंदा में गालियां निकालो। न तो शरीर गाली के योग्य है, और न स्तुति के योग्य है। शरीर बस, शरीर है। जैसा है, उतने पर ठहर जाओ।

यह तो उदाहरण हुआ। ऐसा ही जीवन की हर चीज में है। धन तो धन है। न तो कहो कि यही मेरा सर्वस्व है; और न कहो, यह क्या है! यह तो मिट्टी ही है। कहो ही मत कुछ। कहा, कि मन बना। तुमने इधर निर्णय लिया कि मन की ईंट रखी। तुम सिर्फ देखते रहो; द्रष्टा बनो। चुनाव मत करो। बीच में खड़े रहो; न इधर जाओ, न उधर।

देखा! पेंडुलम घड़ी का रुक जाए तो घड़ी रुक जाती है। बायें जाए, दायें जाए, तो घड़ी चलती रहती है। पेंडुलम के चलने से घड़ी चलती है। मन के गतिमान होने से मन निर्मित होता है। मन डोलता नहीं, अडोल हो जाता है। वहीं ध्यान का जन्म होता है।

"जो संसार के स्वरूप से सुपरिचित हैं; निस्संग, निर्भय और आशारहित हैं, तथा जिनका मन वैराग्य से युक्त है, वही ध्यान में सुनिश्चल भलीभांति स्थित होता है'।

इसलिए एक बात खयाल में ले लेना--"जो संसार के स्वरूप से सुपरिचित है...।'

महावीर कहते हैं, संसार से वही मुक्त हो सकता है, जिसने जल्दबाजी नहीं की; जो संसार के स्वभाव से सुपरिचित है। कच्चे-कच्चे भागे, बिना पके वृक्ष से छूट गए--पीड़ा रह जाएगी। किसी की सुनकर संसार छोड़ दिया; अपने जानने, अपने अनुभव से नहीं छोड़ा, किसी के प्रभाव में छोड़ दिया, तो ऊपर-ऊपर छूटेगा, भीतर-भीतर संसार खींचता रहेगा।

इसलिए महावीर का यह सूत्र अति मूल्यवान है, "जो संसार के स्वरूप से सुपरिचित हैं, वे ही केवल वीतरागता को उपलब्ध हो सकते हैं।'

वस्तुतः जो संसार से परिचित हो गया, वह वीतराग न होगा तो और करेगा क्या? फिर कोई उपाय नहीं। वीतराग-भाव तुम्हारा निर्णय नहीं है, तुम्हारे जीवन-अनुभव का निचोड़ है। वीतराग-भाव राग के विपरीत तुम्हारा संकल्प नहीं है; राग, द्वेष सब के अनुभव से तुमने पाया, कुछ सार नहीं है; इस अनुभव का नाम ही वीतरागता है।

इस पर मेरा भी बहुत जोर है। जहां रस हो वहां से भागना मत। रस का पूरा अनुभव कर लेना। दूसरे क्या कहते हैं, इसकी चिंता मत करना क्योंकि दूसरों का अनुभव तुम्हारा अनुभव नहीं बनेगा। अगर तुम्हें अभी भोजन में रस हो तो रस ले लेना। रस इतना ले लेना कि भीतर कोई भी आकांक्षा शेष न रह जाए। कहीं कोने-कातर में मन के, किसी रस को दबा मत रहने देना, उभाड़ लेना; पूरा उभाड़ लेना। हां, इतना ही खयाल रखना कि रस बोधपूर्वक लेना, जागे लेना।

रस तो बहुत लोग लेते हैं। जो सोए-सोए लेते हैं, वे रस से कोई निष्पत्ति नहीं निकाल पाते। उनके जीवन में अनुभवों का ढेर तो लग जाता है, निचोड़ नहीं होता। अनुभव में दब जाते हैं, अनुभव में खो जाते हैं, लेकिन अनुभव से कुछ जीवन-सत्य के मणि-माणिक्य नहीं खोजकर ला पाते।

अनुभव अगर सोए-सोए किया गया तो किया ही नहीं गया। उससे कुछ सार न होगा। अगर जागकर किया गया तो अनुभव तुम्हारे लिए शिक्षण दे जाएगा, कुछ पाठ सिखा जाएगा। वही पाठ जीवन की संपदा है। वही पाठ वेद है, वही कुरान है, वही धम्मपद है। जिन्होंने जीवन के अनुभव को जाग-जागकर देखा, जाग-जागकर भोगा, उनके हाथ में कोई ज्योति आ गई। जो व्यर्थ था, वह व्यर्थ दिखाई पड़ गया, जो सार्थक था, वह सार्थक दिखाई पड़ गया।

जैसे प्रकाश पैदा हो जाए तो कमरे में क्या है, सब साफ हो जाता है। कहां कचरा पड़ा है कोने में, वह भी पता चल जाता है। कहां तिजोड़ी है, हीरे-जवाहरात रखे हैं, वह भी पता चल जाता है। अगर तुम कमरे में सोए हो अंधेरे, तो भी तिजोड़ी है, कचरा भी पड़ा है, लेकिन तुम्हें कुछ पता नहीं चलता।

और जब तक तुम्हें तिजोड़ी न दिखाई पड़े, तब तक कचरा कचरा है, यह भी पता नहीं चल सकता। जीवन में सार्थकता की थोड़ी प्रतीति हो तो क्या-क्या निस्सार है, वह अपने आप साफ हो जाता है। कांटों का बोध हो जाए तो फूलों का बोध हो जाता है। फूलों का बोध हो जाए तो कांटों का बोध हो जाता है।

जागकर जीवन के सारे अनुभव जिसने लिए, अधैर्य न किया, जल्दबाजी न की, लोभ न किया, यह न कहा कि चलो, ऋषि-महर्षि तो कहते हैं, कि छोड़ो संसार! ऋषि-महर्षि ठीक ही कहते हैं लेकिन वे अपने अनुभव से कहते हैं। उन्होंने संसार का दुख भोगा, उन्होंने संसार की पीड़ा झेली। उनकी पीड़ा को जब तक तुम न झेलोगे, तब तक उनकी निष्पत्तियां तुम्हारी निष्पत्तियां नहीं हो सकतीं।

हम तो लोभ से भर जाते हैं। जब बुद्ध या महावीर जैसा कोई व्यक्ति हमारे पास से गुजरता है, तो उसकी दमक, उसकी प्रभा, उसकी शांति का वायुमंडल हमें लोभ से भर देता है। हम कहते हैं, काश, ऐसा आनंद हमारा होता! ऐसा आनंद कैसे हमारा हो जाए? कैसे डुबकी लगे इसी सागर में, जिसमें तुम डूबे?

तो हम महावीर और बुद्ध के वचनों को पकड़ने लगते हैं। हमने उनका गीत तो सुना, लेकिन किस पीड़ा से वे इस गीत को उपलब्ध हुए, उसकी हमें कोई खबर नहीं है।

अश्कों में जो पाया है वो गीतों में दिया है

इस पर भी सुना है कि जमाने को गिला है

जो तार से निकली वो धुन सबने सुनी है

जो साज पे गुजरी है वो किसको पता है

जो साज पे गुजरी है वो किसको पता है

जो तार से निकली है वो धुन सबने सुनी है

जब तुम महावीर या बुद्ध या कृष्ण या क्राइस्ट के पास होते हो तो जो धुन निकल रही है वह तो सुनाई पड़ती है, जो गीत पैदा हो रहा है वह तो सुनाई पड़ता है, लेकिन किन पीड़ाओं से इस गीत का निखार हुआ है, किन पर्वत-खंडों को तोड़कर यह झरना बहा है; किन आंसुओं ने इन गीतों में धुन भरी है; किस कंटकाकीर्ण मार्ग पर गुजरकर मंदिर के ये स्वर्ण-कलश दिखाई पड़े हैं, उसका तो हमें कुछ भी पता नहीं चलता। गीत से हम लोभित हो जाते हैं। धुन हमें बांध लेती है। हम पूछने लगते हैं, हम क्या करें? कैसे तुम्हें हुआ, कैसे हमें भी हो जाए?

तो अगर हम महावीर का अनुकरण करने लगे, बड़े धोखे में पड़ जाएंगे। हम महावीर जैसा वेष रख सकते हैं। अगर वे निर्ग्रंथ हैं, नग्न हैं, तो हम नग्न हो सकते हैं, दिगंबर हैं, दिगंबर हो सकते हैं। कैसे उठते हैं, कैसे बैठते हैं, कैसे चलते हैं, हम भी ठीक वैसा ही अभ्यास कर सकते हैं।

लेकिन तुम पाओगे कि जो धुन उनके भीतर पैदा हुई थी वह तुम्हारे भीतर पैदा न हुई। क्योंकि मौलिक चीज खो रही है; जड़ नहीं है। तुम्हारे जीवन के अनुभव का निचोड़ नहीं है। महावीर को तुमने ऊपर से ओढ़ लिया। वे तुम्हारे प्राण में विकसित हुए फूल नहीं हैं।

यही तो दुर्भाग्य है जैन मुनियों का। यही दुर्भाग्य है बौद्ध भिक्षुओं का। यही दुर्भाग्य है ईसाई साधु-संतों का। जिससे वे प्रभावित हुए थे, ठीक ही प्रभावित हुए थे। आश्चर्य नहीं है कि जीसस की हवा तुम्हें पुकार बन जाए, आह्वान बन जाए! कि महावीर की आंख तुम्हारी आंख से मिले और तुम्हारी अतल गहराइयां कंपित हो उठें, तुम्हारे प्राणों में कोई नाद बजने लगे--स्वाभाविक है।

लेकिन तुम यह भी तो पूछो कि किन पीड़ाओं से, किस तपश्चर्या से? महावीर का शब्द सुनकर तुम्हारे भीतर मधुर वातास फैल जाए; महावीर का शब्द-शब्द तुम्हारे भीतर मधु घोलने लगे--ठीक! लेकिन यह भी तो पूछो कि ये शब्द किस मौन से आए हैं? किस ध्यान में इनका जन्म हुआ है? किस साधना में गर्भित हुए हैं? कहां से पैदा हुए हैं।

शब्द को ही पकड़कर तुम याद कर लो तो मुर्दा शब्द तुम्हारे मस्तिष्क में अटका रह जाएगा, शोरगुल भी करेगा; लेकिन तुम्हारे भीतर वैसी शांति पैदा न हो सकेगी, जो महावीर के भीतर है। क्योंकि शब्द के कारण शांति पैदा नहीं हुई, शांति के कारण शब्द पैदा हुआ है।

महावीर की वीतरागता ऐसे ही आकश से नहीं टपक पड़ी है, छप्पर नहीं टूट गया है। महावीर की वीतरागता इंच-इंच सम्हाली गई है, साधी गई है। और जीवन के अनुभव में उसकी जड़ें हैं। अनुभव पृथ्वी है।

तुम किसी पौधे से प्रभावित हो गए, काट लाए पौधा ऊपर से और जड़ें वहीं छोड़ आए, तो थोड़ी-बहुत देर पौधा हरा रह जाए, लेकिन कुम्हलाने लगेगा; ज्यादा देर जीवंत नहीं रह सकता। और अगर तुम जड़ें ले आओ, पौधा छोड़ भी आओ तो भी चलेगा। क्योंकि जड़ें आरोपित करते ही तुम्हारे घर में भी पौधा अंकुरित होने लगेगा।

"जो संसार के स्वरूप से सुपरिचित हैं...।'

परिचित भी नहीं कहते; महावीर कहते हैं--"सुपरिचित।' परिचित तो हम सभी हैं थोड़े-बहुत, लेकिन नींद-नींद में हैं। कुछ हो भी रहा है, कुछ पता भी चल रहा है, लेकिन सब धुंधला-धुंधला है। न तो आंखें प्रगाढ़ हैं, न ज्योति जली है, न एक-एक अनुभव को पकड़कर निचोड़ लेने की कला सीखी है। तो रोज हम वही किए जाते हैं।

तुमने कभी खयाल किया? नया क्या करते हो? जो कल किया था, वही फिर दोहरा लेते हो। कैसे आदमी हो तुम? यह तो यंत्र जैसा हुआ। कल क्रोध किया था, आज भी कर लिया। और कल पछताए थे क्रोध करके, आज भी पछता लिए। कल भूल हो गई थी, रो लिए थे, क्षमा मांग ली थी। आज फिर भूल हो गई, फिर रो लिए, फिर क्षमा मांग ली। ऐसे वर्तुलाकार तुम कब तक भटकते रहोगे?

इसको ही पूरब में हमने संसार कहा है--संसार-चक्र। गोल-गोल घूमता रहता है, कोल्हू की बैल की तरह घूमता रहता है। बैल को शायद लगता हो कि गति हो रही है, विकास हो रहा है। कहीं जा रहा हूं, कहीं पहुंच रहा हूं। लेकिन जरा देखो, कहां पहुंच रहा है! चलता जरूर है, मगर बंधा है एक ही केंद्र से। उसी के आसपास चक्कर काटता रहता है।

तुम जरा गौर से देखो, तुम्हारे जीवन में विकास है? उत्क्रांति है? तुम कहीं जा रहे? कुछ हो रहा? कि सिर्फ उसी-उसी को पुनरुक्त कर रहे हो? वही राहें, वही लीक! जैसे कल सुबह उठे थे, वैसे आज सुबह उठ आए। जैसे कल रात सो गए थे, आज रात भी सो जाओगे। कितनी बार सूरज ऊगा है; और तुम्हें वहीं का वहीं पाता है!

तो सुपरिचित नहीं हो; परिचित तो हो। सुपरिचित का अर्थ है कि जो अनुभव तुम्हारे जीवन में गुजरा उसके गुजरने के कारण ही अब तुम और हो गए। तुमने उससे कुछ सीखा, कुछ संपत्ति जुटाई। अगर तुमने आज क्रोध किया तो तुमने उस क्रोध से कुछ सीखा। कल अगर क्रोध करना भी पड़ा तो ठीक आज जैसा नहीं करोगे। उसमें कुछ फर्क होगा, भेद होगा, सुधार होगा, तरमीम होगी, संशोधन होगा, कुछ छोड़ोगे, कुछ जोड़ोगे।

तो ठीक है, विकास हो रहा है। अगर ऐसे ही क्रोध से सीखते गए...सीखते गए...सीखते गए तो एक दिन तुम पाओगे कि क्रोध अपने आप, जैसे-जैसे तुम सुपरिचित हुए, विदा हो गया है। जीवन का ज्ञान क्रांति है।

"जो संसार के स्वरूप से सुपरिचित है...।'

इसलिए खयाल रखना, किसी के प्रभाव में कुछ कसम मत ले लेना। किसी के प्रभाव में कुछ छोड़ मत देना।

अकसर ऐसा होता है, जाते हो तुम सुनने, सत्संग में बैठते हो, बातें प्रभावित कर देती हैं! कोई कसम खा लेता है ब्रह्मचर्य की, लेकिन ब्रह्मचर्य की कसम मंदिर में थोड़े ही खानी होती है! अगर तुम मुझसे पूछो तो ब्रह्मचर्य की कसम वेश्यालय में किसी ने खायी हो तो शायद टिक भी जाए, मंदिर में खायी नहीं टिक सकेगी। अगर कामभोग के अनुभव से ही आयी हो तो टिक जाएगी। मंदिर में प्रवचन सुनकर, शास्त्र पढ़कर, एक भावाविष्ट अवस्था में तुमने ले ली हो, टिकेगी नहीं, टूटेगी।

तुमने तो हुक्मेत्तर्केत्तमन्ना सुना दिया

किस दिल से आह तर्केत्तमन्ना करे कोई!

संत तो कहे चले जाते हैं, छोड़ो यह इश्क का जाल! छोड़ो यह प्रेम की झंझट! छोड़ो यह भोग!

तुमने तो हुक्मेत्तर्केत्तमन्ना सुना दिया

तुमने तो कह दिया, दे दिया आदेश कि छोड़ दो प्रेम!

किस दिल से आह तर्केत्तमन्ना करे कोई!

लेकिन जिसे जीवन का अभी कोई अनुभव नहीं है, वह कैसे प्रेम को छोड़ दे?

जिसे जाना ही नहीं, उसे छोड़ोगे कैसे? जिसे पाया ही नहीं, उसे छोड़ोगे कैसे? एक बात को खयाल रखना, जो पाया हो वही छोड़ा जा सकता है। जो तुम्हारी मुट्ठी में हो उसी को गिराया जा सकता है। जो तुम्हारे पास हो उसे ही फेंका जा सकता है।

लेकिन अकसर ऐसा होता है कि बूढ़े बच्चों को सिखाते हैं। इससे बड़ी झंझट पैदा होती है। बूढ़े बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। और बूढ़े भी कुछ जानकर दे रहे हैं, ऐसा नहीं है। जैसे जवानी में नशा होता है राग का, वैसे बुढ़ापे में नशा होता है वैराग्य का। न तो जवानी के राग में कोई समझ है, न बुढ़ापे के वैराग्य में कोई समझ है। जैसे जवानी में आदमी अंधा होता है, वैसे बुढ़ापे में भी अंधा होता है। बुढ़ापे का अंधापन बुढ़ापे का है, जवानी का अंधापन जवानी का है।

बूढ़े जवानों की निंदा किए चले जाते हैं। कभी उन्होंने मन में सोचा, कि जब तुम जवान थे, तुम्हारे बूढ़ों ने भी ऐसा ही किया था; तुमने सुना था? अगर तुम इतना भी न समझ पाए कि तुम्हारे बूढ़ों की तुमने नहीं सुनी, तुम्हारे जवान बेटे तुम्हारी कैसे सुन लेंगे, तो तुम कुछ भी नहीं समझ पाए। तो तुम बूढ़े...धूप में बाल पक गए होंगे तुम्हारे, सुपरिचित नहीं हो।

जो बूढ़ा सुपरिचित है, वह युवकों से कहेगा, ठीक से भोगना; जागकर भोगना; होश से भोगना। वह यह नहीं कहेगा कि भोग छोड़ना। वह कहेगा, जब भोगने के दिन हैं तो खूब होश से भोग लेना। कहीं ऐसा न हो कि भोगने के दिन निकल जाएं और भोग की आकांक्षा भीतर शेष रह जाए तो बड़ी झंझट पैदा होती है। पैरों में चलने की सामर्थ्य नहीं रह जाती और मन में दूर पहाड़ चढ़ने की कल्पना और सपने रह जाते हैं। तब बड़ी दुविधा पैदा होती है। इसी दुविधा के कारण बूढ़े निंदा करते हैं। उनकी निंदा में अगर गौर करो, तोर् ईष्या पाओगे। बूढ़ा जब निंदा करता है जवान की, तो वह सिर्फर् ईष्या कर रहा है।

डी. एच. लारेन्स ने कहीं लिखा है कि जब मैं छोटे बच्चों को वृक्षों पर चढ़ा देखता हूं तो तत्क्षण मेरे मन में होता है, उतरो! गिर पड़ोगे! लेकिन तब मैंने बार-बार यह कहकर सोचा कि मामला क्या है? मैं अपने भीतर खोजूं तो! तो मुझे पता चला कि छोटे बच्चों को वृक्ष पर चढ़ते देखकर मुझेर् ईष्या होती है। मैं नहीं चढ़ पाता अब। उम्र न रही। अब हाथ-पैर में वैसी लोच न रही, न वैसा साहस रहा; न खतरा मोले लेने का वैसा निर्बोध चित्त रहा। तो कहता तो हूं कि "उतरो, गिर पड़ोगे,' लेकिन भीतर कहीं कोईर् ईष्या पंख फड़फड़ाती है, कि मैं नहीं चढ़ पाता अब। जब मैं नहीं चढ़ पाता तो कोई भी न चढ़े।

बूढ़ों की निंदा में तुम अकसर पाओगे, जो वे नहीं कर पाते हैं, कोई भी न करे। इन्हीं से बच्चे शिक्षित होते हैं। और बच्चे उन चीजों को छोड़ने का विचार करने लगते हैं, जिनका अभी अनुभव ही नहीं हुआ है। गैर-अनुभव से छोड़ी गई कोई भी ब