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क्या अहंकार का विसर्जन ही साक्षी की साधना है?क्या है ध्यान-प्रयोग ?


ध्यान के संबंध में दो-तीन बातें समझ लें और फिर हम ध्यान का प्रयोग करें। पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि ध्यान का श्वास से बहुत गहरा संबंध है। साधारणतः देखा होगा, क्रोध में श्वास एक प्रकार से चलती है, शांति में दूसरे प्रकार से चलती है। कामवासना मन को पकड़ ले, तो श्वास की गति तत्काल बदल जाती है। और कभी अगर श्वास बहुत शांत, धीमी, गहरी चलती हो, तो मन बहुत अदभुत प्रकार के आनंद को अनुभव करता है। मन की सारी दशाएं श्वास से गहरे में संबंधित हैं। इसलिए पहले दस मिनट के लिए श्वास पर थोड़ा सा प्रयोग करेंगे। श्वास इन दस मिनटों में गहरी लेनी है, जितनी आप ले सकें, बिना दबाव और जोर के, कोई परेशानी और तकलीफ न हो; और उतनी ही गहरी वापस छोड़नी है। हमारे फेफड़ों में अगर बहुत कार्बन डाइआक्साइड भरा हो, तो चित्त का शांत होना कठिन हो जाता है। अगर हमारे प्राणों में बहुत आक्सीजन चला जाए..खून में, श्वास में, सब तरफ प्राण-वायु भर जाए..तो ध्यान में जाना बहुत आसान हो जाता है। तो सबसे पहली बात तो दस मिनट गहरे श्वास का प्रयोग करना है। इस प्रयोग में सारा ध्यान श्वास पर ही रखना है। श्वास भीतर गई, तो हमें जानते हुए कि श्वास भीतर जा रही है, ध्यान को भीतर ले जाना है। श्वास बाहर गई, तो जानना है कि श्वास बाहर जा रही है, उसके साथ ही ध्यान को बाहर ले जाना है। ध्यान श्वास के झूले पर झूलने लगे। श्वास भीतर जाए तो हमारा ध्यान भीतर जाए; श्वास बाहर जाए तो हमारा ध्यान बाहर जाए। दस मिनट के लिए एक ही काम है कि हम श्वास को जानें कि श्वास कहां है..भीतर गई तो हम भीतर चले जाएं; बाहर गई तो हम बाहर चले जाएं। श्वास के साथ ही हमारे चित्त की डोर बंध जाए। बस श्वास ही रह जाए, और सब कुछ मिट जाए। दस मिनट गहरी श्वास लेनी है और श्वास के साथ ही बाहर-भीतर जाना है। आंख हम इन दस मिनटों में बंद रखेंगे, ताकि और कुछ दिखाई न पड़े। बैठने में दो-तीन बातें ख्याल ले लें। एक तो कोई किसी को छूता हुआ न बैठे, कोई भी किसी को जरा भी स्पर्श न करे। तो थोड़ा-थोड़ा हट जाएं। कोई भी किसी को स्पर्श करता हुआ न हो। और यहां तो जगह बहुत है, इसलिए बिल्कुल फैल कर बैठ सकते हैं। दूसरे का स्पर्श दूसरे को भूलने नहीं देता। दूसरे की मौजूदगी ख्याल में बनी रहती है। और ध्यान में जरूरी है कि सब भूल जाए, हम अकेले रह जाएं। दूसरी बात, शरीर को सीधा रख कर बैठें। अकड़ाने की जरूरत नहीं है, आराम से जितना सीधा हो सके। रीढ़ सीधी हो, जमीन से नब्बे का कोण बनाती हो, इतना भर ख्याल कर लें। वह भी पहले दस मिनट के प्रयोग के लिए। फिर आंख बंद कर लें। और आंख भी बंद करने का मतलब है आंख पर भी जोर न डालें, आहिस्ते से पलक बंद हो जाने दें। आंख बंद कर लें। शरीर को सीधा रखें। आंख बंद कर लें। फिर ले जाएं, फिर छोड़ दें। रोकना नहीं है; ले जाना है, छोड़ देना है। और पूरे दस मिनट के बाद मैं कहूंगा, तब आप आंख खोलेंगे, तब तक श्वास पर ही ध्यान रखना है। श्वास भीतर गई, तो हम जानते हुए भीतर जाएं; श्वास बाहर गई, तो हम जानते हुए बाहर जाएं। ध्यान का मतलब यह है कि श्वास की जो गति है भीतर और बाहर, वह हमसे चूक न पाए, हम उसके साथ ही बाहर-भीतर डोलते रहें। शुरू करें! आंख बंद कर लें। गहरी श्वास लें। बस श्वास ही रह जाएगी दस मिनट के लिए, और सब बंद हो जाएगा। गहरी श्वास भीतर ले जाएं, पूरे फेफड़े भर लें, फिर बाहर निकालें; भीतर ले जाएं, बाहर निकालें। दस मिनट में मन बहुत शुद्ध और शांत हो जाएगा। फिर हम दूसरा ध्यान का प्रयोग करेंगे। दस मिनट के लिए यह प्राथमिक काम करें। अब मैं चुप हो जाता हूं, दस मिनट बाद आपको सूचना करूंगा, तब तक आंख नहीं खोलनी है, श्वास गहरी लेनी है और ध्यान श्वास पर रखना है। (दस मिनट तक श्वास का ध्यान-प्रयोग जारी रहता है, दस मिनट के बाद ओशो दूसरे प्रयोग के लिए सुझाव देते हैं। ) दूसरा प्रयोग, हम...अलग-अलग समझा रहा हूं आपको ताकि ख्याल में आ जाए...दूसरा प्रयोग है: सर्व-स्वीकार का। अभी हम बैठे थे, श्वास ले रहे हैं, श्वास पर ध्यान कर रहे हैं..पक्षी आवाज कर रहे हैं, कोई बच्चा चिल्लाएगा, सड़क से कोई ट्रक निकलेगा..ये सारी आवाजें हमारे चारों तरफ हो रही हैं। साधारणतः ध्यान करने वाले लोग, प्रार्थना-पूजा करने वाले लोग अपने चारों तरफ के जगत से एक दुश्मनी ले लेते हैं। अगर घर में एक आदमी ध्यान करने लगे, तो वह ध्यान के पहले जितना अशांत था, उससे ज्यादा ध्यान के बाद दिखाई पड़ेगा। कहीं घर में बर्तन गिर जाएगा, कोई बच्चा रोने लगेगा, तो उसका क्रोध और बढ़ जाएगा। उसे लगेगा कि डिस्टर्बेंस हो रहा है, बाधा पड़ रही है। मेरी दृष्टि में, ध्यान ऐसी प्रक्रिया है जो समस्त बाधाओं को स्वीकार कर लेती है, किसी बाधा को बाधा नहीं मानती। और जब तक हम ऐसी ध्यान की प्रक्रिया न सीख सकें जिसमें हम बाधाओं को भी सीढ़ियों की तरह प्रयोग कर लें, तब तक ध्यान में जाना असंभव है। क्योंकि बाधाएं तो चारों तरफ हैं। रास्ते से ट्रक निकलेगा, पक्षी आवाज करेंगे, उन्हें कोई प्रयोजन नहीं कि आप ध्यान करने बैठे हैं, कि आपके ध्यान में बाधा न पड़ जाए। और अगर आपने ऐसा समझा कि बाधा पड़ रही है, तो बाधा पड़ जाएगी। बाधा बाधाओं के कारण नहीं, हमारी इस भाव-दशा के कारण होती है कि बाधा पड़ रही है। अगर यह भाव-दशा छोड़ दी जाए और हम स्वीकार कर लें कि जो भी हो रहा है, ठीक है, हम राजी हैं। पक्षी आवाज कर रहे हैं, हम राजी हैं। तो पक्षियों की आवाज आपकी शांति को गहरा देगी, कम नहीं करेगी। रास्ते से ट्रक निकल रहा है, हम राजी हैं। कोई बच्चा रो रहा है, हम राजी हैं। क्योंकि आज तो आप बगीचे में आकर बैठ गए हैं, अगर प्रयोग करना चाहेंगे तो घर में ही करेंगे, सड़क चलेगी, घर में आवाज होगी, बात होगी, शोर होगा, और अगर यह दृष्टि रही कि यह सब बाधा बन रही है, तो ध्यान असंभव हो जाएगा। तो दूसरा दस मिनट के लिए हम प्रयोग करेंगे सर्व-स्वीकार का। जो भी हो रहा है, मैं उससे राजी हूं, मेरा कोई विरोध नहीं है। पक्षी आवाज कर रहे हैं, मैं राजी हूं। और जब आप राजी होकर पक्षी की आवाज सुनेंगे..क्योंकि फिर सुनने के सिवाय कोई उपाय न रहा..जब शांति से, आनंद से, स्वीकार से पक्षी की आवाज सुनेंगे, तो आप पाएंगे कि पक्षी की आवाज आपके भीतर गूंजती है, चली जाती है, आप एक खाली घर की