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उन्मनी दशा...शून्य हो जाना ही ध्यान है


जहां कोई विचार और विमर्श नहीं उठता, जहां सब शून्य और शात हुआ है, जहां झील पर एक भी तरंग नहीं रही—झील बिलकुल विश्रांत हो गयी, शात हो गयी—अपने में लीन बैठा हूं, ऐसी इस शून्य की दशा में—जिसको झेन फकीर नो —माइड़ कहते हैं, चित्तमुक्ति की दशा, जिसको कबीर ने अ—मनी दशा कहा है, नानक ने उन्मनी दशा कहा है, मन से मुक्त हो गयी जो दशा। जब तक मन है तब तक तरंग है। मन एक तरह की तरंगायित अवस्था है। मन का अर्थ है, झील पर बहुत लहरें उठ रही हैं। न—मन का अर्थ है, सब लहरें शांत हो गया, झील बिलकुल दर्पण की तरह मौन हो गयी, जरा भी तरंग नहीं होती। सतह कंपती ही नहीं। अकंप हो गई। ऐसी जो मेरी निर्विचार रूप दशा है, इसमें कहां व्यवहार और कहां परमार्थ?

समझना।

व्यवहार और परमार्थ शब्द दार्शनिकों के शब्द हैं, पारिभाषिक शब्द हैं। दार्शनिक कहते हैं, जगत व्यवहार रूप से सत्य है और परमार्थ रूप से असत्य है। परमात्मा परमार्थ रूप से सत्य है और व्यवहार रूप से असत्य है। यह दार्शनिक तरकीब है, जिससे दो विपरीत को मिलाने की चेष्टा की जाती है। जैसे पश्चिम में एक विचारक हुआ, बर्कले। उसने घोषणा की—ठीक शंकर जैसी घोषणा की—कि जगत माया है। वस्तुओं का कोई अस्तित्व नहीं है। विचार ही का अस्तित्व है, वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं है। वह डाक्टर जानसन के साथ घूमने गया था, रास्ते पर उसने उनसे कहा कि मैं एक किताब प्रकाशित कर रहा हूं उसमें मैंने सिद्ध किया है कि वस्तुओं का कोई अस्तित्व नहीं है, केवल विचार का अस्तित्व है। डाक्टर जानसन जिद्दी किस्म का आदमी था, उसने एक पत्थर उठाकर और बर्कले के पैर पर दे मारा। लहूलुहान हो गया पैर, खून बहने लगा और बर्कले उसे पकड़कर बैठ गया। जानसन हंसने लगा, उसने कहा, वस्तुओं का कोई अस्तित्व नहीं है, तो इस पत्थर के कारण चोट कैसे लगी? खून कैसे बहा? बर्कले कोई उत्तर न दे सका।

बर्कले ने पश्चिम में नयी—नयी यह बात कही थी, उसे पूरब का कुछ पता नहीं था, पूरब में यह बहुत पुरानी बात है, इसके उत्तर बहुत खोज लिए गये हैं। बौद्ध भी ऐसा ही कहते हैं कि जगत सत्य नहीं है जैसा शंकर कहते हैं। वस्तुत: शंकर जो कहते हैं, वह प्रच्छन्न रूप से बौद्धों की ही बात है उसमें कुछ नया नहीं है।

ऐसा कहा जाता है कि एक बौद्ध भिक्षु को एक सम्राट ने पकड़ लिया और उसने कहा कि मैंने सुना है कि तुम कहते हो जगत असत्य है, सिद्ध करना होगा। उसने कहा कि सिद्ध कर देता हूं। उसने बड़े तर्क दिये। और जगत को असत्य सिद्ध किया जा सकता है। समझो कि तुम यहां मेरे सामने बैठे हो, कैसे सिद्ध करें कि तुम असत्य हो! उस दार्शनिक ने कहा कि रात सपने में भी मैं देखता हूं कि लोग सामने बैठे हैं। सुबह जागकर पाता हूं कि नहीं हैं। तो अभी भी क्या पक्का है कि लोग बैठे ही हों? अभी भी क्या पक्का है कि सुबह जागकर मैं नहीं पाऊंगा कि असत्य नहीं है!

च्चांग्त्सु ने कहा है, रात मैंने सपना देखा कि मैं तितली हो गया। फिर सुबह उठकर मैं बड़ा चिंतन करने लगा, विचार करने लगा कि यह तो बड़ी उलझन हो गयी! अगर च्चांग्त्सु रात में तितली हो सकता है तो तितली सो गयी हो और सपना देखती हो कि च्चांग्त्सु हो गयी है! यह भी हो सकता है। फिर कोई कभी अपने से बाहर तो गया नहीं—मैं अपने भीतर बैठा हूं, तुम अपने भीतर बैठे हो। तुम्हें तो मैंने कभी देखा नहीं, मेरे भीतर मस्तिष्क में कुछ प्रतिबिंब बनते हैं उन्हीं को देखता हूं। वे

प्रतिबिंब सच भी हो सकते हैं, झूठ भी हो सकते हैं। सपने में भी बन जाते हैं। ध्री—डायमेंशनल फिल्म देखते हो? जब पहली दफा थी डायमेंशनल फिल्म लंदन में चली, तो एक घुड़सवार आता है दौड़ता हुआ और एक भाला फेंकता है। वह पहली थी डायमेंशनल फिल्म थी, लोग एकदम झुक गये—वह जो हाल में बैठे हुए लोग थे, भाले को निकलने के लिए उन्होंने जगह दे दी, एकदम दोनों तरफ झुक गये। क्योंकि भाला कहीं छिद जाए! तब उनको खयाल आया कि अरे, हम फिल्म देख रहे हैं, झुकने की क्या जरूरत थी? लेकिन चूक हो गयी। वह भाला जो नहीं था, बिलकुल लग गया कि जैसे है।

उस दार्शनिक ने बड़े तर्क दिये और सम्राट ने कहा, सब ठीक है, लेकिन सम्राट भी डाक्टर जानसन जैसा रहा होगा, उसने कहा, अपना पागल हाथी ले आओ। उसके पास एक पागल हाथी था, वह पागल हाथी ले आया गया। उसने पागल हाथी छुड़वा दिया इस दार्शनिक के पीछे, भिक्षु के पीछे। भिक्षु भागा, चिल्लाए और वह पागल हाथी उसके पीछे चिंघाड़े और भागे। और बड़ा शोरगुल मच गया। और राजा के महल के आयन में हजारों की भीड़ इकट्ठी हो गयी और राजा छत पर खड़े होकर देख रहा है और हंस रहा है। और वह उससे कहने लगा, अब बोलो, अगर सब असत्य है, तो यह हाथी भी असत्य है, इतने रो —चिल्ला क्यों रहे हो? वह कहने लगा, मुझे बचाओ, फिर पीछे बात करेंगे, पहले तो इस हाथी से बचाओ। हाथी ने उसे अपनी सूंड़ में लपेट लिया, बमुश्किल उसे छुड़ाया गया। वह कैप रहा है, रो रहा है।

छुड़ाकर जब उसे लाया गया और सम्राट ने कहा, अब बोलो! उसने कहा, महाराज! मेरा रोना, मेरा चिल्लाना, सब असत्य है। माया मात्र। आपका मुझ पर दया करना, मुझे बचा लेना, हाथी का मुझे पकड़ना, फिर महावत का मुझे छुड़ा देना, सब असत्य है।

बर्कले को यह पता नहीं था, क्योंकि वहा नयी—नयी बात वह कह रहा था, भारत में तो बहुत पुराने दिन से लोग कह रहे हैं।

लेकिन जो असत्य कहा जाता है, माया कही जाती है, वह भी है तो। किसी तरह है, सपने ही सही, सपने जैसे ही सही, मगर सपना भी तो है। तो इस सपने को कहते हैं—व्यावहारिक सत्य। आभास होता है, वस्तुत: नहीं है। और परमात्मा को कहते हैं, आभास भी नहीं होता उसका और वस्तुत: है।

जब कोई समाधि में जागेगा तब परमात्मा को जानेगा और संसार खो जाएगा। जैसे रोज तो होता है—रोज रात तुम सोते हो, ये पहाड़—पत्थर, वृक्ष, पशु —पक्षी, पति, पत्नी, बेटे, सब खो जाते हैं। इनका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। और सपने में नये बेटे और नयी पत्नियां और नये मकान और नये काम शुरू हो जाते हैं। उनका अस्तित्व हो जाता है। सुबह जागकर फिर उनका अस्तित्व खो जाता है। फिर पुरानी पत्नी, मकान, द्वार—दरवाजा, —सब आ जाता है।

ध्यानी कहते हैं कि ऐसा ही एक जागरण समाधि में घटित होता है जब सब विचार शांत हो जाते हैं—परम जागरण। उस जागरण में यह जगत जो अभी दिखायी पड़ रहा है, असत्य मालूम होने लगता है—आभास मात्र, प्रतीति मात्र, स्वप्नवत। और परमात्मा सत्य मालूम होने लगता है, जिसका कि पहले आभास भी नहीं होता था।

लेकिन जनक की बात इससे भी ऊपर जाती है। वह कहते हैं, क्या व्यवहार और क्या परमार्थ! न संसार बचा है, न मोक्ष बचा है। असत्य तो गया ही गया, उसके साथ—साथ सत्य भी जा चुका है।

सत्य और असत्य एक ही तराजू के दो पलड़े थे। वे भिन्न—भिन्न नहीं थे। जब झूठ ही गया तो सच कैसे बचेगा? इसे कभी तुमने सोचा? रावण को हटा दो, तो रामायण खराब हो जाएगी, बच नहीं सकती। अकेले राम से नहीं चलेगी। कि तुम चला लोगे? रावण को काट दो बिलकुल रामायण से, फिर बनाओ रामायण! या कभी रामलीला करो, रावण को हटा दो, बस बिना ही रावण के चलने दो रामलीला, तुम पाओगे, चलती ही नहीं। थोड़े राम उछलेंगे —कूदेंगे, करेंगे क्या? इधर—उधर जाएंगे, करेंगे क्या? रावण के बिना नहीं चलती है। और राम को हटा लो तो रावण भी व्यर्थ हो जाता है। साथ—साथ उनकी सार्थकता है। शुभ और अशुभ साथ—साथ जुड़े हैं। सच और झूठ साथ —साथ जुड़े हैं। सुंदर— असुंदर साथ—साथ जुडे हैं। एक ही साथ उनकी सार्थकता है।

लाओत्सु ने कहा है, जब तक दुनिया में साधु हैं तब तक असाधु भी रहेंगे। बात ठीक कही है। जिस दिन असाधु मिटेंगे, उस दिन साधुओं को भी मिट जाना होगा। होनी चाहिए एक ऐसी दुनिया जहां न साधु हों न असाधु हों। वहां जीवन सरल होगा। वहा जीवन परम निसर्ग को उपलब्ध होगा। वहां जीवन में तथाता होगी, ऋत होगा। न कोई साधु न कोई असाधु। न कोई राम, न कोई रावण। इसको खयाल करो। तुम्हारे साधु असाधुओं को मिटाने में लगे रहते हैं कि जो भी असाधु आए उसको साधु बनाओ। पर उनको पता नहीं कि असाधु अगर मिट जाएं तो साधु भी न बचेंगे। वह आत्महत्या में लगे हैं। बुरे आदमी के सहारे ही भला आदमी जी रहा है। दुर्जन के सहारे ही सज्जन की इज्जत है। वे जो लोग कारागृह में बंद हैं उनके कारण तुम कारागृह के बाहर हो। नहीं तो तुम बाहर कहां? वे जो लोग पागल हैं, उनके कारण तुम स्वस्थ हो। जो के हैं, उनके कारण तुम जवान हो। अन्यथा तुम न रहोगे। द्वैत जब जाता है तो पूरा चला जाता है।

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न का कोई अनुभव नहीं होता। ध्यान अनुभव है भी नहीं, जब सब अनुभव समाप्त हो जाते हैं, तब जो शेष रह जाता है उसका नाम ध्यान है। ध्यान के न तो उथले अनुभव होते हैं न गहरे अनुभव होते हैं। ध्यान अनुभव का नाम ही नहीं है। जहां तक अनुभव है, वहां तक ध्यान नहीं है और जहां से ध्यान शुरू होता है वहां कहां अनुभव!!! अनुभव तो हमेशा बाहर-बाहर रह जाता है।

अनुभव का तो अर्थ है कि चेतना में कोई विषय-वस्तु है। और ध्यान का अर्थ है: विषय-वस्तु रहित चैतन्य। अगर लगे कि खूब सुख का अनुभव हो रहा है तो इसका अर्थ हुआ कि चेतना है और सुख का अनुभव है। सुख का अनुभव चेतना में खड़ा है या चेतना को घेरे है। चेतना तो भिन्ना है। चेतना तो वह है जिसे सुख का अनुभव हो रहा है। सुख का अनुभव चेतना नहीं है।

फिर ध्यान का कैसे अनुभव होगा? ध्यान का अनुभव होता ही नहीं। दर्पण है, दर्पण पर कोई प्रतिबिंब बनता है, तो अनुभव। और जब दर्पण पर कोई प्रतिबिंब नहीं बनता, दर्पण निराकार है, शून्य है - तब ध्यान। ज्ञान के अनुभव होते हैं, ध्यान के अनुभव नहीं होते। जहां तक अनुभव है, वहां तक मन है।

मन अनुभवों का जोड़ है। सुख के अनुभव, दुख के अनुभव, गहराइयों के अनुभव, ऊंचाइयों के अनुभव-सब अनुभव मन के भीतर हैं। और ध्यान अमन की दशा है, उन्मनी दशा है--जहां मन न रहा, जहां सब अनुभव गये, जहां एक शब्द भी उठता नहीं है, जहां एक विषय भी छाया नहीं डालता। उस निर्दोष, उस निर्मल चैतन्य का नाम ध्यान है।

स्वानुभव किसी भी विधि का अभ्यास किए बिना ही हुआ इसलिए कृष्णमूर्ति जब यह कह रहे हैं कि किसी विधि का अभ्यास मत करो, वह सहज ही घटित होता है-तब यह बात मुझे स्वाभाविक मालूम होती है।

अब समझना, किसी विधि का अभ्यास मत करो, यह एक विधि है। यह नकारात्मक विधि है। विधियां दो तरह की होती हैं-विधायक और नकारात्मक। विधायक विधि में कहा जाता है-इस विधि का अभ्यास करो, उस विधि का अभ्यास करो। नकारात्मक में कहा जाता है-किसी विधि का अभ्यास न करो।

इसका अर्थ क्या हुआ? अविधि का अभ्यास करो। अगर इसका ठीक-ठीक अर्थ समझो तो इसका अर्थ हुआ-अविधि का अभ्यास करो। विधि से बचो। विधि आये तो पकड़ो मत। विधि मिल भी जाए तो उपयोग मत करो। मगर यह नकारात्मक विधि हुई। यह कोई नई बात तो नहीं।

उपनिषद कहते हैं क्क नेति-नेति - न यह, न वह...। छोड़ते चलो, किसी विधि का अभ्यास न करो। बुद्ध ने तो नकार पर बड़ा जोर दिया है, कोई विधि नहीं! ईसाई फकीरों में एक वर्ग हुआ है, इकहार्ट और उन जैसे फकीरों का, जो कहते हैं--वॉया निगेटिव, नकार से मार्ग है, नहीं से द्वार है। यह भी एक विधि है। यह नकारात्मक विधि है।

मैं तुमसे यह कह रहा हूं कि अगर विधि ही पकड़नी हो तो विधायक पकड़ना। क्योंकि विधायक विधि को छोड़ना आसान होगा, नकारात्मक विधि को छोड़ना बहुत मुश्किल होगा। क्योंकि पहले तो तुम यह समझोगे कि यह विधि ही नहीं है तो छोड़ने का सवाल ही न उठेगा।

एक झेन फकीर के पास उसका शिष्य आया। बीस वर्षों से श्रम कर रहा है। और फकीर ने कहा है - एक हाथ की ताली की आवाज कैसी होती है, इस पर ध्यान करो। अब एक हाथ की ताली की आवाज कुछ होती ही नहीं! ताली तो बजती दो हाथों से है। आवाज ही जब होगी तो दो हाथों से होगी।

दो टकराएंगे तो आवाज होगी, आवाज का अर्थ है टकराहट। एक हाथ की ताली कैसे बजेगी? बहुत तरह के उत्तर युवक खोज कर लाता रहा। लेकिन कोई उत्तर सही नहीं हो सकता। गुरु उतर सुनता ही नहीं था, वह पहले ही कह देता था - गलत! अभी उसने उत्तर बताया भी नहीं है। उसने एक दिन पूछा भी कि आप भी हैरान करते हैं मुझे! मैं खोजकर लाता हूं, महीनों की मेहनत के बाद...ध्यान करते-करते खोजता हूं कि यह उत्तर ठीक होगा, और मैं बोल भी नहीं पाता और आप...दरवाजे के भीतर आता हूं, कह देते हैं--गलत, यह भी गलत!

गुरु ने कहा कि सभी उत्तर गलत हैं। इसलिए पूछने और सुनने की जरूरत क्या है? उत्तर तुम जब तक लाते रहोगे तब तक गलत! जिस दिन तुम शून्य आओगे, निरुत्तर आओगे, यह जानकर आओगे कि कोई उत्तर नहीं है, शून्य का अनुभव करके आओगे, उस दिन कुछ बात बनेगी।

बीस साल लंबे श्रम के बाद शून्य का अनुभव हुआ। बीस वर्ष...लंबी साधना थी। आधी उमर निकल गई। लेकिन घटना आधी घटी। आधी रात थी जब यह घटना घटी; मगर सुबह तक वह प्रतीक्षा न कर सका। यह समाचार तो गुरु को अभी देना है। बीस वर्ष से वे भी प्रतीक्षा करते हैं। और आज वह शुभ घड़ी आ गई कि मैं जा कर निवेदन कर दूं।

वह भागा...आधी रात में जाकर द्वार खटखटाए। गुरु के चरणों पर गिर पड़ा। गुरु ने एक नजर उसकी तरफ देखा और कहा - जा बाहर, इसको भी फेंक कर आ! उस युवक ने कहा। किसको फेंक कर आऊं? अब तो कुछ बचा नहीं है। शून्य का अनुभव हुआ है।

गुरु ने कहा - बस...बाहर जा। शून्य का कहीं अनुभव होता है! और जिसका अनुभव हो जाए वह शून्य न रहा। शून्य भी अगर अनुभव हो जाए, तो शून्य नहीं रहा। अब तुझे शून्य को छोड़ना पड़ेगा। अब तू शून्य को भी छोड़ दे, तब तू सच में शून्य हो जाएगा।

नकारात्मक विधि का यही खतरा है कि वह पहले से ही नकार है अब वह युवक सिर धुनने लगा और कहने लगा कि यह तो बड़ी मुश्किल हो गयी! कुछ हो तो छोड़ना आसान है, अब शून्य को कैसे छोडूं? शून्य कुछ है तो नहीं जिसे छोडूं!

नकारात्मक विधि से जो चलेगा, वह अड़चन में पड़ेगा एक दिन। अड़चन यह आयेगी कि जब नकारात्मक विधि छोड़नी पड़ेगी तो क्या छोड़ोगे?

पहले तो यह समझ लेना कि नकारात्मक विधि भी विधि है। कृष्णमूर्ति कहते हैं, किसी विधि का अभ्यास मत करो। यह तो विधान हो गया। यह तो आज्ञा हो गई। यह तो आदेश हो गया। अनुशासन दे दिया गया--किसी विधि का अभ्यास मत करो! यह विधि है। अविधि का अभ्यास, या विधि का अनभ्यास--जो भी नाम देना चाहो दे लो।