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क्या हैं वीतरागता ? क्या संन्यास राग के विपरीत वैराग्य नहीं है बल्कि, दोनों के पार वीतरागता है?


परमहंस रामकृष्ण के जीवन के दो उल्लेखनीय प्रसंग ?। एक कि वे एक हाथ में बालू और दूसरे में चांदी के सिक्के रख कर दोनों को एक साथ गंगा नदी में गिरा देते थे। और दूसरा कि जब स्वामी विवेकानंद ने उनके बिस्तर के नीचे चांदी का सिक्का छिपा दिया तो परमहंस देव बिस्तर पर लेटते ही पीड़ा से चीख उठे थे। महागीता के वीतरागता के सूत्र के संदर्भ में इन दो प्रसंगों पर हमें कुछ समझाने की अनकंपा करें।

रामकृष्ण के जीवन के ये दोनों प्रसंग अब तक ठीक से समझे भी नहीं गये हैं; क्योंकि जिन्होंने इनकी व्याख्या की है, उन्हें परमहंस दशा का कुछ भी पता नहीं है। इनकी व्याख्या साधारण रूप में की गई है। रामकृष्ण एक हाथ में चांदी और एक हाथ में रेत को रख कर गंगा में गिरा देते हैं, तो हम समझते हैं कि रामकृष्ण के लिए चांदी और मिट्टी बराबर है। स्वभावत:, यह सीधा अर्थ हो जाता है। लेकिन अगर यही सच है कि रामकृष्ण के लिए सोना और मिट्टी, चांदी और मिट्टी बराबर है, तो दोनों हाथों में मिट्टी रख कर क्यों नहीं गिरा देते? एक हाथ में चांदी रख कर क्यों गिराते हैं? कुछ फर्क होगा। कुछ थोड़ा भेद होगा। नहीं, यह व्याख्या ठीक नहीं है।

रामकृष्ण के लिए तो कुछ भी भेद नहीं है। और यह गिराना भी रामकृष्ण के लिए अर्थहीन है। रामकृष्ण विरागी नहीं हैं, वीतरागी हैं। यह विरागी के लिए तो ठीक है कि विरागी कहता है मिट्टी—चांदी सब बराबर, सब मेरे लिए बराबर है, यह सोना भी मिट्टी है। यह विरागी की भाषा है। रामकृष्ण वीतरागी हैं। यह परमहंस की भाषा हो नहीं सकती। फिर रामकृष्ण ऐसा क्यों कर रहे हैं? यह उनके लिए कर रहे होंगे जो उनके आसपास थे। यह उनके लिए संदेश है। जो राग में पड़ा है, उसे पहले विराग सिखाना पड़ता है। जो विराग में आ गया, उसे फिर वीतरागता सिखानी पड़ती है। कदम—कदम चलना होता है। और रामकृष्ण कहते थे, हर अनुभव से गुजर जाना जरूरी है।

तुम बहुत चकित होओगे, मैं तुम्हें उनके जीवन का एक उल्लेख बताऊं। शायद तुमने कभी सुना भी न हो, क्योंकि उनके भक्त उसकी बहुत चर्चा नहीं करते। जरा उलझन भरा है।

रामकृष्ण ने एक दिन मथुरानाथ को—उनके एक भक्त को—कहा कि सुन मथुरा, किसी को बताना मत, मेरे मन में रात एक सपना उठा कि सुंदर बहुमूल्य सिल्क के कपड़े पहने हुए हूं गद्दा—तकिया लगा कर बैठा हूं और हुक्का गुड़गुड़ा रहा हूं। और हुक्का गुड़गुड़ाते मैंने देखा कि मेरे हाथ पर जो अंगूठी सोने की बड़ी शानदार है, उसमें हीरा जड़ा है। अब तुझे इंतजाम करना पड़ेगा, क्योंकि जरूर यह सपना उठा तो जरूर यह वासना मेरे भीतर होगी। इसको पूरा करना पड़ेगा, नहीं तो यह वासना मुझे भटकायेगी। अगली जिंदगी में आना पड़ेगा, हुक्का गुड़गुडाना पड़ेगा। तो तू इंतजाम कर दे, किसी को बताना मत। लोग तो समझेंगे नहीं।

तो मथुरा तो उनका बिलकुल पागल भक्त था। उसने कहा कि ठीक। वह गया। वह चोरी—छिपे सब इंतजाम कर लाया। बहुमूल्य हीरे की अंगूठी खरीद लाया। शानदार हुक्का लखनवी! बहुमूल्य से बहुमूल्य रेशमी वस्त्र। और आश्रम के पीछे गंगा के तट पर उसने गद्दा—तकिया लगा दिया और रामकृष्ण बैठे शान से गद्दा—तकिया लगा कर अंगुली में अंगूठी डाल कर हुक्का बगल में ले कर गुड़गुड़ाना शुरू किया।

वह पीछे छिपा झाडू के देख रहा है कि मामला अब क्या होता है! वे अंगूठी देखते जाते हैं और कहते हैं कि 'ठीक, बिलकुल वही है। देख ले रामकृष्ण, ठीक से देख ले। और खूब मजा ले ले प्यारे, नहीं तो फिर आना पड़ेगा।’कपड़ा भी छू कर देखते हैं कि ठीक बड़ा गुदगुदा है। कहते हैं, 'रामकृष्ण, ठीक से देख ले, नहीं तो फिर इसी कपड़े के पीछे आना पड़ेगा। भोग ले!' हुक्का गुड़गुड़ाते हैं और कहते हैं, 'रामकृष्ण, ठीक से गुड़गुड़ा ले!' बस स्व—दों—तीन—चार मिनट यह चला, पांच मिनट चला होगा। फिर खिलखिला कर खड़े हो गये, अंगूठी गंगा में फेंक दी, हुक्का तोड़ कर उस पर यूका और उसके ऊपर कूदे और कपड़े फाड़ कर.।

तो मथुरा घबड़ाया कि अब ये कग पागल हो रहे हैं। एक तो पहले ही यह पागलपन था—यह हुक्का गुडुगुड़ाना। किसी को पता चल जाये तो कोई माने भी न! अगर मैं हुक्का गुड़गुडाऊं तो लोग मान भी लें कि चलो गुड़गुड़ा रहे होंगे, इनका कुछ भरोसा नहीं। लेकिन रामकृष्ण हुक्का गुड़गुड़ायें, मथुरा भी किसी को कहेगा तो कोई मानने वाला नहीं है। और अब यह क्या हो रहा है! और उन्होंने गद्दे —तकिए भी उठा कर गंगा में फेंक दिए। नंग— धड़ंग हो गये, सब कपड़े फाड़ डाले और मथुरा को बुलाये कि खतम! अब आगे आने की कोई जरूरत न रही। देख लिया, कुछ सार नहीं है।

रामकृष्ण का कहना यह था कि जो भी भाव उठे, उसे पूरा कर ही लेना। रामकृष्ण भगोड़ापन नहीं सिखाते थे। विराग उनकी शिक्षा न थी। वे कहते थे, राग में हो तो राग को ठीक से भोग लो, लेकिन जानते रहना : राग से कभी कोई तृप्त नहीं हुआ।

तो यह जो संस्मरण है कि चांदी और मिट्टी को एक साथ में ले कर और गंगा में डाल देते थे, यह जिसके सामने डाली होगी, उस आदमी के लिए इसमें कुछ इशारा होगा। इससे रामकृष्ण की चित्त की दशा का पता नहीं चलता। यह उपदेश है। और जब भी तुम महापुरुषों के,परमज्ञानियो के उपदेश सुनो, तो इस बात का ध्यान रखना कि किसको दिए गये! क्योंकि देने वाले से कम संबंध है, जिसको दिए गये उससे ज्यादा संबंध है। यह किसी धनलोलुप के लिए कही गई बात होगी। कोई धनलोलुप पास में खड़ा होगा। उसको यह बोध देने के लिए किया होगा। रामकृष्ण की चित्त दशा में तो क्या मिट्टी, क्या सोना! इतना भी भेद नहीं है कि अब एक हाथ में सोना और एक हाथ में रेत ले कर याद दिलायें। और अगर विवेकानंद ने उनके तकिए के नीचे चांदी के सिक्के रख दिए और वे पीड़ा से कराह उठे तो विवेकानंद के लिए कुछ शिक्षा होगी। कुछ शिक्षा होगी कि सावधान रहना। कुछ शिक्षा होगी कि तू जा रहा है पश्चिम, वहा धन ही धन की दौड़ है, कहीं खो मत जाना, भटक मत जाना! यह जो पीड़ा से कराह उठे हैं, यह तो सिर्फ विवेकानंद पर एक गहन संस्कार छोड़ देने का उपाय है, ताकि उसे याद बनी रहे, यह बात भूले न, यह एक चांटे की तरह उस पर पड़ गई बात कि रामकृष्ण को चादी छू कर ऐसी पीड़ा हो गई थी। तो चांदी जहर है। कहने से यह बात शायद इतनी गहरे न जाती। कहते तो वे रोज थे। सुनने से शायद यह बात न मन में प्रविष्ट होती, न प्रवेश करती; लेकिन यह घटना तो जलते अंगारे की तरह छाती पर बैठ गई होगी विवेकानंद के। यह विवेकानंद के लिए संदेश था इसमें। सदगुरुओं के संदेश बड़े अनूठे होते हैं।

ऐसा उल्लेख है कि विवेकानंद—रामकृष्ण तो चले गये देह को छोड़ कर—विवेकानद पश्चिम जाने की तैयारी कर रहे हैं। तो वे एक दिन शारदा, रामकृष्ण की पत्नी को मिलने गये। आशा लेने, आशीर्वाद मांगने। तो वह चौके में खाना बना रही थी। रामकृष्ण के चले जाने के बाद भी शारदा सदा उनके लिए खाना बनाती रही, क्योंकि रामकृष्ण ने मरते वक्त कहा आंख खोल कर कि मैं जाऊंगा कहां, यहीं रहूंगा। जिनके पास प्रेम की आंख है, वे मुझे देख लेंगे। तू रोना मत शारदा, क्योंकि तू विधवा नहीं हो रही है, क्योंकि मैं मर नहीं रहा हूं; मैं तो हूं जैसा हूं वैसे ही रहूंगा। देह जाती है, देह से थोड़े ही तू ब्याही गई थी!

तो सिर्फ भारत में एक ही विधवा हुई है शारदा, जिसने चूड़ियां नहीं तोड़ी, क्योंकि तोड्ने का कोई कारण न रहा। और शारदा रोई भी नहीं। वह वैसे ही सब चलाती रही। अदभुत स्त्री थी। आ कर ठीक समय पर जैसा रामकृष्ण का समय होता भोजन का, वह आ कर कहती कि'परमहंस देव, भोजन तैयार है, थाली लग गई है, आप चलें।’ फिर थाली पर बैठ कर पंखा झलती। फिर बिस्तर लगा देती, मसहरी डाल देती और कहती, 'अब आप सो जायें। फिर दोपहर में सत्संगी आते होंगे।’ ऐसा जारी रहा कम।

तो वह परमहंस के लिए—परमहंस तो जा चुके—भोजन बना रही थी। विवेकानंद गये और उन्होंने कहा कि 'मां, मैं पश्चिम जाना चाहता हूं परमहंस देव का संदेश फैलाने। आज्ञा है? आशीर्वाद है गु: ' तो शारदा ने कहा कि 'विवेकानंद, वह जो छुरी पड़ी है, उठा कर मुझे दे दे।’ सब्जी काटने की छुरी! साधारणत: कोई भी छुरी उठा कर देता है तो मूठ अपने हाथ में रखता है, लेकिन विवेकानंद ने फल तो अपने हाथ में पकड़ा और मूठ शारदा की तरफ करके दी।

शारदा ने कहा. 'कोई जरूरत नहीं, रख दे वहीं। यह तो सिर्फ एक इशारा था जानने के लिए। तू जा सकता है।’ विवेकानंद ने कहा. 'मैं कुछ समझा नहीं।’ शारदा ने कहा. ' आशीर्वाद है मेरा, तू जा सकता है। यह तो मैं जानने के लिए देखती थी कि तेरे मन में महाकरुणा है या नहीं। साधारणत: तो आदमी मूठ अपने हाथ में रखता है कि हाथ न कट जाये और छुरे की धार दूसरे की तरफ करता है कि पकड़ लो, तुम कटो तो कटो, हमें क्या

लेना—देना! लेकिन तूने धार तो खुद पकड़ी और मूठ मेरी तरफ की, बस बात हो गई। तू जा। तुझ आशीर्वाद है। तुझसे किसी की कभी कोई हानि न होगी, लाभ होगा।’

याद रखना, जब गुरु बोले तो शिष्य पर ध्यान रखना, क्योंकि गुरु शिष्य के लिए बोलता है। ये दोनों घटनाएं शिष्यों के लिए हैं। रामकृष्ण के तल पर तो क्या अंतर पड़ता है! न मिट्टी मिट्टी है, न सोना सोना है। मिट्टी भी मिट्टी है, सोना भी मिट्टी है, मिट्टी भी सोना है। सब बराबर है। जहां एक रस का उदय हुआ, जहां सब भेद खो गये, जहां एक ही परमात्मा दिखाई पड़ने लगा—फिर सभी उसके ही बनाये गये आभूषण हैं।

रामकृष्ण परम वीतराग दशा में हैं। विरागी नहीं हैं, न रागी हैं—दोनों के पार हैं। अष्टावक्र जिस सूत्र की बात कर रहे है—सरक्त—विरक्त के पार—वहीं हैं रामकृष्ण।साक्षी बने बिना कोयले की खान में रहने से कालिख तो लगेगी ही।

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शंकराचार्य स्त्री पुरुष के शरीर में वैराग्य की भावना करने पर जोर देते हैं , परन्तु

तोड़ना और मुक्त होना , बडी़ अलग बातें हैं । तोड़ना ऐसा है , जैसे कच्चे फल को तोडो़ । और मुक्त होना ऐसा है , जैसे पका फल गिर जाय । दोनों घटनाएँ ऊपर से एक सी लगती हैं ---- कि दोनों में ही फल वृक्ष से अलग होता है । लेकिन दोनों में बडा़ मौलिक अंतर है । कच्चे फल को तोड़ते हो ---- फल में टीस रह जाती है , और वृक्ष में भी घाव छूट जाता है । पका फल तोड़ने की जरूरत ही नहीं होती ---- पका फल अपने से गिरता है , सहजता से गिरता है । न तो टीस रहती कोई , न पीछे वृक्ष की याद आती कि थोडी़ देर और रह जाते वृक्ष के साथ । पक ही गया , बात ही समाप्त हो गयी ---- वृक्ष का काम पूरा हो गया । और न वृक्ष में कोई पीडा़ रह जाती । पका फल वृक्ष को पूरी तरह भूल जाता है , पीछे लौटकर नहीं देखता । और वृक्ष भी पके फल के गिरने पर निर्भार हो जाता है , घाव नहीं छूटता ।

संसार से तोड़ने की मेरी तुम्हें आकांक्षा नहीं है । क्योंकि जिन-जिन को संसार से तोडा़ गया , वे बडे़ गहरे में संसार से जुडे़ रहे ।

संसार से मुक्त होना है , टूटना नहीं है । टूटकर जाओगे भी कहाँ ? पत्नी है , बच्चे हैं , परिवार है , दुकान है ----- उसको छोड़कर तुम जाओगे कहाँ ? और तुम कहीं भी जाओ , अगर दुकानदार मन में रह गया तो तुम वहीं दुकान बना लोगे । उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला । अगर स्त्री का रस मन में रह गया ---- पत्नी को छोड़कर भाग जाओगे , इससे कोई अंतर न आयेगा ; कोई और स्त्री तुम्हारे मन को लुभा लेगी ।

अगर धन में रस है , और धन छोड़ दिया तो क्या अंतर पडे़गा ! तुम किन्हीं और अर्थों में सिक्के जुटाने लगोगे । हो सकते हैं सिक्के त्याग के हों तपश्चर्या के हों ----- लेकिन सिक्के सिक्के ही हैं । तुम दूसरा धन जोड़ने लगोगे । पहले तुम घोषणा करते फिरते थे ---- इतने रुपये हैं मेरे पास ! अब तुम घोषणा करोगे इतना त्याग है मेरे पास ! मगर अकड़ वही रहेगी । रस्सी जल भी जाती है तो भी अकड़ नहीं जाती ।

मैं तुम्हें संसार से मुक्त करना चाहता हूँ , तोड़ना नहीं चाहता ।

इस आश्रम में मैं तुम्हें जीवन से मुक्त करने की चेष्टा में - संलग्न हूँ जीवन में रहते हुए जो मुक्त हो सकता है , वही मुक्ति है । पानी में तुम चलो और तुम्हारे पैर जल में न भीगें । कमल के पत्ते की भांति तुम हो जाओ , छुओ पानी को ,लेकिन पानी तुम्हें न छू पाये । पानी में ही रहो , फिर भी पानी से मुक्त । संन्यास की यह परम धारणा है : संन्यास राग के विपरीत वैराग्य नहीं है , संन्यास राग और विराग दोनों के पार वीतरागता है ।

शंकर तुमसे जिस संन्यास की बात कर रहे हैं , वह वैराग्य है । मैं तुमसे जिस संन्यास की बात कर रहा हूँ , वह वीतरागता है । शंकर का संन्यास तुम्हें बहुत दूर न ले जायेगा । शंकर के संन्यास के बाद भी , जिस संन्यास की बात मैं कर रहा हूँ , वह तुम्हें खोजना ही पडे़गा । शंकर का संन्यास यात्रा का प्रारंभ हो सकता है , अंत नहीं । मैं तुमसे जो कह रहा हूँ , वह अंत है ।

मैं नहीं कहता कि तुम भागो स्त्री से --- जागो स्त्री से । मैं नहीं कहता , धन छोडो़ ---- धन को समझो । उस समझ में ही मुक्ति है ।

धन ने तुम्हें पकडा़ कब है --- तुमने ही पकडा़ है । तुमने ही पकडा़ है , वह तुम्हारी भाव दशा है , वह तुम्हारा रस है । उस रस से मुक्त होने का एक ही उपाय है कि - जीवन का अनुभव तुम्हें बता दे कि वह रस संभव नहीं है , व्यर्थ है । अगर जीवन के अनुभव से यह पता न चला , तो तुम सोचते रहोगे मन में कि सब व्यर्थ है , संसार में क्या रखा है । लेकिन तुम जानते रहोगे मन के किसी कोने में कि कौन जाने कुछ रखा ही हो ---- मैं तो छोड़कर भाग आया , पता नहीं , मैंने भूल तो नहीं की ।

मेरे पास संन्यासी आते हैं , जो जीवन भर से संन्यासी है , सत्तर-अस्सी साल की उम्र के । वे कहते हैं , पीछे , कभी-कभी शक भी आता है कि हमने जिन्दगी ऐसे तो नहीं गँवा दी ? क्योंकि परमात्मा तो मिला नहीं , और संसार भी हमने छोड़ दिया । एक संदेह मन को डिगाता है , डगमगाता है ।

यह संदेह इसलिए उठता है कि संसार का रस कायम था और छोड़ भागे । प्रभाव में आ गये , अनुभव से नहीं छूटा संसार , किसी के प्रभाव से छूट गया ।

बुद्ध और शंकर जैसे लोग जब संसार में खडे़ होते हैं , तो उनके प्रभाव की महिमा अनंत है । उनका आकर्षण व्यापक है , चुम्बक की तरह वे हजारों लोगों को खींच लेते हैं । उनके जीवन में तो वीतरागता है । वे जब तुमसे कहते हैं , कुछ सार नहीं है ---- स्त्री में या पुरुष में , या बच्चों में , या संसार में , तो वे ठीक ही कहते हैं । वे तो पके फल हैं । लेकिन कच्चे फलों में उमंग आ जाती है । कच्चे फल सोचने लगते हैं , कोई सार नहीं है ---- छोडो़ ! टूटकर गिर जाते है , तब शक पैदा होता है । क्योंकि पके फल की जो सुगंध है , वह भी उनसे नहीं उठती । पके फल की एक सुगंध है , एक सुवास है --- वह भी दूर , और वृक्ष से भी टूट गये । संबंध भी टूट गया पृथ्वी से , और आकाश से जुडे़ भी नहीं । त्रिशंकु की अवस्था हो गयी । न घर के न घाट के --- ऐसा बीच में अटक गये । बीच में अटकने की दशा बडी़ दुखदायी है ।

इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ , यह बात ही छोडो़ । कहीं भागने की जरूरत नहीं , जहाँ हो , वहीं जागो । संसार की फिक्र छोडो़ ---- परमात्मा को बुलाओ , परमात्मा को उतरने दो तुम्हारे अंतरतम में । जैसे ही उसकी किरणें तुममें उतरने लगेंगी , वैसे ही तुम पाओगे , पकना शुरू हो गये तुम । सूरज पकाता है फलों को , परमात्मा पकायेगा तुम्हें ।

और जीवन से भागो मत , क्योंकि उसने जीवन दिया है तो जरूर इसके पीछे कुछ कारण होंगे । यह सिर्फ संयोग नहीं है , इसके पीछे पूरा संयोजन है । क्योंकि जीवन के अनुभव से गुजरे बिना , कभी कोई व्यक्ति मुक्त नहीं होता ।

उपनिषदों का महावचन है : " तेन त्यक्तेन भुंजीथाः ---- इससे ज्यादा क्रांतिकारी वचन मुझे दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं मिला । यह वचन बडा़ अनूठा है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं : तेन त्यक्तेन भुंजीथाः ---- जिन्होंने त्यागा , उन्होंने ही केवल भोगा , एक अर्थ । दूसरा अर्थ : तेन त्यक्तेन भुंजीथाः --- जिन्होंने भोगा , उन्होंने ही त्यागा । और दोनों ही अर्थ बडे़ बहुमूल्य और कीमती हैं । और दोनों अर्थ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । जिन्होंने भोगा , उन्होंने ही त्यागा --- क्योंकि जब तक तुमने भोगा ही नहीं , तुम त्यागोगे कैसे ; त्याग की समझ कहाँ से आयेगी ? भोग की कीचड़ से ही उठेगा त्याग का कमल , कोई और उपाय नहीं है । इसलिए भोग की निंदा मत करना , क्योंकि कमल उसी से आयेगा । भोग की निंदा मत करना ; कीचड़ को छोड़ कर मत भागना , अन्यथा कमल से भी वंचित रह जाओगे ।

कीचड़ से ही कमल जागेगा , उठेगा । और कितना भिन्न है कमल कीचड़ से !

तुम्हारे बीच ही परमात्मा उठेगा , उसका कमल खिलेगा । कितना भिन्न है परमात्मा तुमसे !

पत्नी , बच्चे , दुकान , बाजार ---- इसी के बीच में किसी दिन उसकी अमृत धारा उतर आती है । तुम अपने को बस उसकी अमृत धारा के लिए शून्य करो । छोड़ने की फिक्र छोडो़ , पाने की चेष्टा करो ।

छोड़ने पर जोर मत दो , पाने पर जोर दो

जब तुम्हारे हाथ में हीरे-जवाहरात उतरने लगेंगे , कंकड़-पत्थर तुम खुद ही फेंक दोगे । कंकड़-पत्थर फेंक देने से हीरे-जवाहरात उतर आयेंगे , यह पक्का नहीं है । लेकिन हीरे-जवाहरात उतरने पर कौन पागल कंकड़-पत्थर लिए फिरता है ? अपने आप छूट जाते है ।

और उस छूटने का सौन्दर्य भी अलग है , उसका संगीत ही अलग है । क्यों ? क्योंकि जब तुम ऐसे छोड़ देते हो कि तुम्हें पता ही नहीं चलता , तो छूटने की कोई रेखा भी तुम्हारे भीतर नहीं रह जाती , त्याग का कोई दावा भी पैदा नहीं होता ।

तुम रोज सुबह कचडा़ झाड़ते हो घर का और बाहर फेंक देते हो । क्या तुम जाते हो , कि जाकर अखबार वालों को खबर करें कि आज इतने कचरे का त्याग कर दिया ? कचरे का कोई त्याग करता है ? तुम जाओगे तो लोग हंसेंगे । वे कहेंगे पागल हो गये , अगर कचरा ही था तो त्याग का क्या सवाल है ! और कचरा न था तो तुम पागल हो ------ त्यागा ही क्यों ?

जब तुम त्याग की घोषणा करते हो , तब तुम यह कह रहे हो कि था तो धन , किसी के प्रभाव में आकर त्याग दिया । अभी तुम राजी न हुए थे ; पके नहीं थे , अभी तुम कच्चे थे ; जल्दबाजी कर ली । इस जल्दबाजी से कभी कोई व्यक्ति रूपांतरित नहीं होता ।

मैं तुम्हें किसी जल्दबाजी में लगाना नहीं चाहता । अगर स्त्री में रस है , तो अनुभव से गुजर ही जाओ । तेन त्यक्तेन भुंजीथाः --- तुम भोग लोगे , उसी भोग से त्याग का जन्म होगा । जब तुम भोग-भोग कर देखोगे कि कुछ भी नहीं मिलता ; जब तुम भोग-भोग कर देखोगे , दुख ही हाथ आता है ; जब तुम भोग-भोग कर देखोगे कि सिर्फ राख से भर - जाता है जीवन , कहीं कोई फूल नहीं खिलते , तब तुम्हारे भोग ने तुम्हें कुंजी दे दी त्याग की ।

भोग दुश्मन नहीं है , भोग तुम्हारा मित्र है , जागकर भोगो , बस इतनी मेरी शर्त है । होशपूर्वक भोगो , इतनी मेरी शर्त है । ऐसा न हो कि अनुभव भी गुजरता जाय और सीख भी पैदा न हो । बस , सीख दे जाय अनुभव , अनुभव करने योग्य है । नर्क से भी गुजरना उपयोगी है , अगर तुम जागे हुए गुजर जाओ । क्योंकि उसी जागने में स्वर्ग का रास्ता मिलेगा ।

इसलिए मैं तुम्हें जीवन के किसी तल से तोड़ना नहीं चाहता ; तुम जहाँ हो , वहीं रहो ; वहीं तुम्हारे हृदय में नये होश का - बीजारोपण करो । इसलिए मेरा त्याग पर जोर नहीं है , ध्यान पर जोर है । संसार के विरोध में मैं कुछ भी नहीं कहता , परमात्मा के पक्ष में बहुत कुछ कहता हूँ । शंकराचार्य का जोर संसार के विरोध में ज्यादा है । पुराने संन्यास की वही धारणा थी कि लोगों को संसार से छुडा़ओ , ताकि वे परमात्मा को पा सकें

लोगों को परमात्मा के निकट लाओ , ताकि संसार उनसे छूट सके ।