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बोध की यात्रा में रस, विरस एवं स्व—रस क्या मात्र पड़ाव हैं?


स पड़ाव नहीं है। रस तो गंतव्‍य है। इसके लिए उपनिषद कहते है। रसो वै सः! उस प्रभु का नाम रस है। रस—रूप! रस में तल्लीन हो जाना परम अवस्था है।

पूछने वाले ने पूछा है : रस, विरस और स्व—रस...। शायद जहां रस कहा है, पूछा है, वहा कहना चाहिए पर—रस। पर—रस पड़ाव है। फिर पर—रस से जब ऊब पैदा हो जाती है, तो विरस। विरस भी पड़ाव है। लेकिन विरस तो नकारात्मक स्थिति है; पर—रस की प्रतिक्रिया है। तो कोई विरस में रुक नहीं सकता, वैराग्य में कोई ठहर नहीं सकता। जब राग में ही न ठहर सके तो वैराग्य में कैसे ठहरेंगे! विधायक में न ठहर सके तो नकारात्मक में कैसे ठहरेंगे! भोग में न रुक सके तो योग कैसे रोकेगा! पर—रस से जब ऊब पैदा हो जाती है, अनुभव में आता है कि नहीं, दूसरे से सुख मिलता ही नहीं, अनुभव में आता है कि दूसरे से दुख ही मिलता है, तो जुगुप्सा पैदा होती है। विरक्ति पैदा होती है, विरस आ जाता है। मुंह में कडुवा स्वाद फैल जाता है। किसी चीज में रस नहीं मालूम होता। विरस पड़ाव है—अंधेरी रात जैसा, नकारात्मक, रिक्त।

जब कोई विरस में धीरे — धीरे धीरे— धीरे डूबता है तो स्व—रस पैदा होता है। स्व—रस पर—रस से बेहतर है। अपने में रस लेना ज्यादा मुक्तिदायी है। कम से कम दूसरे की परतंत्रता तो न रही। पर न रहा तो परतंत्रता न रही। स्व आया तो स्वतंत्रता आई। इतनी मुक्ति तो मिली। लेकिन अभी भी पड़ाव है। अब स्व भी खो जाये और रस ही बचे तो अंतिम उपलब्धि हो गई, मंजिल आ गई। क्योंकि जब तक स्व है तब तक कहीं पास किनारे पर 'पर' भी खड़ा होगा, क्योंकि 'मैं' 'तू के बिना नहीं रहता। स्व का बोध ही बता रहा है कि पर का बोध अभी कायम है। स्व की परिभाषा पर के बिना बनती नहीं। जब तक ऐसा लग रहा है मैं हूं तब तक स्वभावत: लग रहा है कि और भी है, अन्य भी है। तो यह तो पर की ही छाया है।

स्व और पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—साथ रहते, साथ जाते। तो पहले तो स्व—रस बड़ा आनंद देता है। पर—रस में तो सिर्फ सुख की आशा थी, मिला नहीं। विरस तो प्रतिक्रिया थी। पर—रस में मिला नहीं था, इसलिए क्रोध में विपरीत चल पड़े थे, नाराज हो गये थे। वह तो नाराजगी थी। वह

तो क्रोध था। वह कोई टिकने वाली भाव—दशा न थी, नकारात्मक दशा थी।

स्व—रस में रस की कुछ झलक मिलती है। परमात्मा के मंदिर के करीब आ गये; करीब—करीब सीढ़ियों पर खड़े हो गये। पर —रस ऐसा है,परमात्मा की तरफ पीठ किये खड़े हैं। विरस ऐसा है कि परमात्मा की तरफ पीठ करने में क्रोध आ गया; मुंह करने की चेष्टा कर रहे हैं परमात्मा की तरफ; सम्मुख होने की चेष्टा शुरू हुई। स्व—रस ऐसा है, सीढ़ियों पर आ गये। लेकिन स्व को सीढ़ियों पर ही छोड़ आना पड़ेगा, जहां जूते छोड़ आते हैं। बस वहीं। तो भीतर प्रवेश है। तो मंदिर में प्रवेश है। मंदिर का नाम है. रसों वै सः! मंदिर का नाम है. रस! वहा न स्व है न पर है; वह। एक ही है। वहा दो नहीं हैं।

इस अवस्था को ही अष्टावक्र ने स्वच्छंद कहा है। यह पर से भी मुक्त है, स्व से भी मुक्त है। यह छंद ही और है। यह अलौकिक बात है। भाषा में कहना पड़ता है तो कुछ शब्दों का उपयोग करना पड़ेगा। इसलिए बुद्ध ने इसे निर्वाण कहा है, कुछ भी न बचा। जो भी तुम जानते थे, कुछ न बचा। तुम्हारा जाना हुआ सब गया; अज्ञात के द्वार खुले। तुम्हारी भाषा काम नहीं आती। इसलिए बुद्ध निर्वाण के संबंध में चुप रह जाते हैं, कुछ कहते नहीं।

एक, ईसाई मिशनरी 'स्टेनली जोन्स' काफी प्रसिद्ध, विश्वप्रसिद्ध ईसाई मिशनरी थे। वे रमण महर्षि को मिलने गये थे। वर्षों बाद मेरा भी उनसे मिलना हुआ। रमण महर्षि से उन्होंने बात की। बुद्धिमान आदमी हैं स्टेनली जोन्स। बहुत किताबें लिखी हैं। और ईसाई जगत में बड़ा नाम है। लेकिन वह नाम बुद्धिमत्ता का ही है; वह किसी आत्म— अनुभव का नहीं है। रमण महर्षि से वे इस तरह के प्रश्न पूछने लगे जो कि नहीं पूछने चाहिए। और रमण महर्षि जो उत्तर देते वह उनकी पकड़ में न आता। जैसे उन्होने पूछा कि क्या आप पहुंच गये हैं? रमण महर्षि ने कहा : 'कहां पहुंचना, कहा आना, कहां जाना!' स्टेनली जोन्स ने फिर पूछा. 'मेरे प्रश्न का उत्तर दें! क्या आप पहुंच गये हैं? क्या आपने पा लिया?'रमण महर्षि ने फिर कहा : 'कौन पाये, किसको पाये! वही है। न पाने वाला है कोई, न पाये जाने वाला है कोई।’

स्टेनली जोन्स ने कहा कि देखिए आप मेरे प्रश्न से बच रहे हैं। मैं आपसे कहता हूं कि मैंने पा लिया है, जबसे मैंने जीसस को पाया। मैंने पा लिया। आप सीधी बात कहें।

तो रमण महर्षि ने कहा : 'अगर पा लिया तो खो जायेगा, क्योंकि जो भी पाया जाता है, खो जाता है। जिससे मिलन होता है, उससे बिछुड्न। जिससे शादी होती है उससे तलाक। जन्म के साथ मौत है। अगर पाया है तो कभी खो बैठोगे। उसको पाओ जो पाया नहीं जाता।

स्टेनली जोन्स ने समझा कि यह तो सब बकवास है। यह कोई बात हुई—उसको पाओ जिसको पाया नहीं जाता! तो फिर पाने का क्या अर्थ? फिर तो उसने रमण महर्षि को ही उपदेश देना शुरू कर दिया।

बहुत वर्षों बाद मेरा भी मिलन हो गया। एक परिवार, एक ईसाई परिवार मुझमें उत्सुक था, स्टेनली जोन्स उनके घर मेहमान हुए। तो उन्होंने आयोजन किया कि हम दोनों का मिलना हो जाये। बडे संयोग की बात कि स्टेनली जोन्स ने फिर वही पूछा : 'आपने पा लिया है?' मैंने कहा : 'यह झंझट हुई। मैं फिर वही उत्तर दूंगा।’उन्होंने कहा : 'कौन —सा उत्तर? 'क्योंकि वे तो भूल— भाल चुके थे। मैंने कहा : 'कैसा पाना,किसका पाना, कौन पाये!' तब उन्हें याद आया, हंसने लगे और कहा कि : 'तो क्या आप भी उसी तरह की बातचीत करते हैं जो रमण महर्षि करते थे। मैं गया था मिलने, लेकिन कुछ सार न हुआ। व्यर्थ समय खराब हुआ। इससे तो बेहतर था मिलना महात्मा गांधी से, बात साफ—सुथरी थी। इससे बेहतर था मिलना श्री अरविंद से, बात साफ—सुथरी थी।’

कुछ बात है जो साफ—सुथरी हो ही नहीं सकती। वही बात है जो साफ—सुथरी नहीं हो सकती। जो साफ—सुथरी है, वह कुछ करने जैसी नहीं है। जो बूद्धि की समझ में आ जाये वह समझने योग्य ही नहीं है। जो बुद्धि के पार रह जाता है, वही।

पर—रस भी समझ में आता है, विरस भी समझ में आता है, स्व—रस भी समझ में आता है, क्योंकि ये तीनों ही बुद्धि के नीचे हैं। स्व—रस सीमांत पर है, वहा से बुद्धि के पार उड़ान लगती है। विरस परिधि के पास है; पर—रस बहुत दूर है। लेकिन तीनों एक ही घेरे में हैं, बुद्धि के घेरे में हैं। रस अतिक्रमण है। रस में फिर कोई नहीं बचता।

ऐसी कभी—कभी घड़ी तुम्हारे जीवन में आती है —प्रेम के क्षणों में या प्रार्थना के क्षणों में या ध्यान के क्षणों में। किसी से अगर तुम्हारा गहरा प्रेम है तो कभी—कभी ऐसा उड़ा शिखर भीतर पैदा होता है जब न तो प्रेमी रह जाता न प्रेयसी रह जाती है। तब रस फलता है। तब रस झरता है। वह रस परमात्मा का रस है। इसलिए प्रेम में परमात्मा के अनुभव की पहली किरण उतरती है, या ध्यान की किसी गहरी तल्लीनता में जहां स्व—पर का भेद मिट जाता है, अभेद का आकाश खुलता है, वहा भी परमात्मा झरता है।

तो पूछने वाले ने प्रश्न तो ठीक पूछा है, लेकिन रस.. पूछा रस, विरस, स्व—रस क्या मात्र पड़ाव हैं? रस पड़ाव नहीं है। रस तो स्रोत है और अंतिम मंजिल भी। क्योंकि अंतिम मंजिल वही हो सकता है, जो स्रोत भी रहा हो। हम अंततः स्रोत पर ही वापिस पहुंच जाते हैं। जीवन का वर्तुल पूरा हो जाता है। जहां से चले थे, वहीं आ जाते हैं। या अगर तुम समझ सको तो जहां से कभी नहीं चले, वहीं आ जाते हैं। जहां से कभी नहीं हटे, वहीं पहुंच जाते हैं। जो हैं, वही हो जाते हैं।

मैं तमोमय, ज्योति की पर प्यास मुझको

है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको

स्नेह की दो बूंद भी तो तुम गिराओ

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूगा

कल प्रलय की आधियों से मैं लडूंगा

किंतु मुझको आज आंचल से बचाओ

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

दीपक बुझा नहीं, कभी बुझा नहीं और दीपक सुरक्षित है। परमात्मा का आंचल उसे बचाये ही हुए है। तुम्हारा स्नेह भी, तुम्हारा तेल भी कभी चुका नहीं। वही तो तुम्हारी जीवंतता है, वही तो तुम्हारा स्नेह है। तुम्हारा दीया भरा—पूरा है। न तो ज्योति जलानी है, न दीये में तेल भरना है, सिर्फ तुम अपनी ही ज्योति की तरफ पीठ किए खड़े हो। जो है वही दिखाई नहीं पड़ रहा है। या, तुम आंख बंद किए

बैठे हो और जो रोशनी सब तरफ झर रही है, उससे तुम्हारा संपर्क नहीं हो पा रहा है। पलक उठाने की बात है।

बुद्ध से किसी ने पूछा कि ज्ञानी और अज्ञानी में फर्क क्या है? तो बुद्ध ने कहा, पलक मात्र का। सुनते हो! पलक मात्र का! पलक झपक गई—अज्ञानी। पलक खुल गई—शानी। इतना ही फर्क है। अंतस्तल पर जाग गये—सब जैसा होना चाहिए वैसा ही है।

तुम तमोमय नहीं हो, ज्योतिर्मय हो! रस से तुम भरे ही हो। रस के सागर हो। गागर भी नहीं। गागर तो तुम शरीर के कारण अपने को मान बैठे हो। रस के सागर हौ। जिसकी कोई सीमा नहीं, जो दूर अनंत तक फैलता चला गया है—वही ब्रह्म हो तुम! तत्वमसि! रसो वै सः!