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तादात्म तोड़ना या नान -आइडेंटिफिकेशन का क्या अर्थ है ?क्या हैं 'उन्मनी गति'?


क्या है नान -आइडेंटिफिकेशन ?

15 FACTS;-

1-दुख आता है, जाता है। सुख भी आता है और जाता है। जो न कभी आता है और जो न कभी जाता है, उसका नाम ही आनंद है। आनंद हमारा स्वभाव है, स्वरूप है और हमारे ही भीतर है। जो भी आता है और जाता है, वह पर भाव है ...स्वभाव नहीं है, वह हम नहीं हैं।हम भिन्न हैं। हम तो आनंद स्वरूप वह स्वभाव हैं, जिस पर जिस पर सुख -दुख आते हैं।आनंद सदैव न हो तो आनंद नहीं है।पर हमें उस स्वभाव का पता ही नहीं चलता।

हम उसमें ही उलझे रहते हैं, जो आता है और जाता है।

2-झेन फकीर के अनुसार घर का जो मालिक है, आतिथेय है, वह अतिथियों की सेवा करते -करते यह ही भूल गया है कि मैं भी हूं ..अतिथियों से अलग, भिन्न, पृथक..''द होस्ट इज लॉस्ट इन द गेस्ट्स''।वास्तव में,

हम अतिथियों की सेवा करते -करते भूल ही गए हैं कि हम कौन हैं। दुख जिसमें निवास कर लेता है, सुख जिसमें निवास कर लेता है, वह कौन है? वह कौन है जो अनुभव करता है कि मैं दुखी हो रहा हूं ... कि मैं सुखी हो रहा हूं?

3-निश्चित ही, वह सुख और दुख से अलग है, क्योंकि अनुभव करने वाला अलग ही होगा।अगर द्रष्टा दृश्य से अलग न हो, तो देखेगा कैसे.. देखने के लिए फासला/ डिस्टेंस/ दूरी चाहिए। तो जिसे भी हम देख पाते हैं, उससे हम भिन्न हो जाते हैं। इसीलिए हम परमात्मा को देख नहीं पाते। क्योंकि उससे हम अभिन्न हैं,एक हैं तो देखेगा कौन ... देखेगा किसको?वास्तव में, जिसे

हम छू पाते हैं, उससे अलग हो जाते हैं; जिसे सुन पाते हैं, उससे अलग हो जाते हैं। इंद्रियां जो भी जानती हैं, उससे हम अलग हो जाते हैं।

3-मन जो भी पहचानता है, उससे हम अलग हो जाते हैं।जब सुख आता है, तब आप भलीभांति जानते हैं कि सुख आया। दुख आता है, भलीभांति जानते हैं, दुख आया। जाता है, तब भी जानते हैं कि दुख जा रहा है। यह जो जानने वाला है, यह अलग है, यह भिन्न है। यही स्वरूप है।इस स्वरूप में

वे योग के द्वारा स्थिर हो जाते और सदैव आनंद का अनुभव करते हैं।आनंद की स्थिति में मानसिक शांति को विशेष महत्व दिया जाता है। आनंद के बारे में बताया नहीं जा सकता, बल्कि इसकी अनुभूति की जा सकती है। इस संदर्भ में यह जानना महत्वपूर्ण है कि आनंद अहंकार-शून्य अवस्था है।

4-और जो व्यक्ति भी इस भीतर के स्वरूप में स्थिर हो जाता है, रमण को उपलब्ध हो जाता है, स्वयं में स्वस्थ हो जाता है, स्वयं में स्थित हो जाता है। उपनिषद के अनुसार ऐसा व्यक्ति सदैव आनंद में डूबा रहता है।तो क्या फिर उसके ऊपर दुख, बीमारी, मृत्यु आदि नहीं आते?नहीं, मृत्यु तो

फिर भी आती है, लेकिन अब उस पर नहीं आती ।दुख तो अब भी आते हैं, बीमारियां अब भी आती हैं, पैरों में अब भी काटे गड़ते हैं, बुढ़ापा अब भी आता है, लेकिन अब उस पर नहीं आता। वह दूर, पार,अछूता /अनटच्‍ड खड़ा रह जाता है, अस्पर्शित, कमल के पत्ते जैसा। पानी की बूंद उस पर पड़ी है, लेकिन फिर भी छूती नहीं। पानी में डूबा है पत्ता, फिर भी दूर ..पानी और पत्ते के बीच एक बारीक फासला है।

5-जीसस को सूली लगती है, तो शरीर तो मर जाता है, पर जीसस दूर खड़े रह जाते हैं।फकीर मंसूर काटा जाता है, तो शरीर तो टुकड़े -टुकड़े हो जाता है, लेकिन वह हंसता रहता है। और जब कोई भीड़ में से पूछता है कि ''फकीर,इसमें हंसने जैसा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। हाथ -पैर काटे जा रहे हैं''। तो मैसूर कहता है, ''तुम जिसे काटते हो, अगर वह मैं होता, तो निश्चित न हंसता, न हंस पाता। हंस रहा हूं इसलिए कि तुम जिसे समझ रहे हो कि 'मैं हूं' वह मैं नहीं हूं। और जो 'मैं हूं' उसे तुम काट न पाओगे''।

6-स्वरूप को, आनंद को अनुभव करने वाला व्यक्ति दुख से घिर सकता है, लेकिन दुख के तादात्म में नहीं पड़ता। अंधेरा उसे घेर ले सकता है, लेकिन वह स्वयं कभी अंधकार नहीं होता। हमारे और उसके बीच एक ही फर्क है। जो हमें घेरता है, हम उसके साथ अपने को एक ही मान लेते हैं।हम ऐसा नहीं कहते कि मुझ पर दुख आया, कहते हैं, मैं दुखी हो गया।

..एक आइडेंटिटी बना लेते हैं।संत गुरजिएफ कहता था, तादात्म तोड़ना अथार्त नान आइडेंटिफिकेशन, बस यही साधना है। हम चीजों से जुड़ जाते हैं। और इतने जुड़ जाते हैं कि लगने लगता है, यही मैं हूं। जैसे दर्पण में कोई तस्वीर बने और दर्पण समझ ले कि यह तस्वीर ही मैं हूं। जैसे झील में चांद दिखाई पड़े और झील कहने लगे, चांद मैं हूं ऐसे हम हो जाते हैं।

7-भीतर दुख छलकता है ,दुख की छाया बनती है , मैं दुख हो जाता हूं। सुख आता है, मैं सुख हो जाता। अशांति आती है, मैं अशांति हो जाता।शांति आती है, मैं शांति हो जाता। अपने को पार नहीं रख पाता, दूर नहीं रख पाता कि जो आ रहा है, वह मैं नहीं हो सकता, क्योंकि मैं तो उसके आने के पहले से ही मौजूद हूं। जब नहीं दुख आया था, तब भी मैं था; और जब दुख चला जाएगा, तब भी मैं होऊंगा, तो मेरा होना दुख के साथ एक नहीं हो सकता। कितना ही दुख घेर ले, तब भी मैं किसी तल पर दूर

ही खड़ा रह जाता हूं।इस दूरी की प्रतीति, इस तादाम्‍य का टूट जाना ही नान आइडेंटिफिकेशन योग है और योग के द्वारा वे सदैव आनंद स्वरूप में स्थित रहते हैं।क्षणभर को भी आनंद से संबंध नहीं टूटता। अभी भी टूटा नहीं है। सिर्फ स्मरण नहीं है।

8-तादाम्‍य/आइडेंटिफिकेशन स्मृति को नष्ट करता है, स्‍थिति को नहीं।

उदाहरण के लिए स्वामी विवेकानंद निरंतर एक कहानी कहा करते थे। एक गर्भिणी सिंहनी ने एक पर्वत से छलांग लगाई । छलांग के बीच ही उसको बच्चा हो गया।नीचे भेड़ों की एक भीड़ गुजरती थी, वह बच्चा उसमें गिर गया। भेड़ों ने उसे बड़ा किया। भेड़ों के बीच ही वह रहा।उस सिंह को कभी पता ही नहीं चला कि वह सिंह है।पता चलने का कोई उपाय भी न था।

9-एक दिन ,एक सिंह ने उस भेड़ों की भीड़ पर हमला किया। तो वह सिंह देखकर चकित हुआ कि उस भेड़ों की भीड़ में भेड़ों से बहुत ऊपर उठा हुआ एक सिंह भी चल रहा है। उससे न भेड़ें भागती हैं , न वह सिंह। इस सिंह को देखकर भेड़ें भागी, वह सिंह भी भागा। सिंह तो बहुत चकित हुआ

कि इस सिंह को क्या हो गया।वास्तव में, तादात्म /आइडेंटिफिकेशन हो गया। भेड़ों के बीच रहते -रहते, भेड़ों की आकृति मन में बनते -बनते दर्पण ने समझा कि मैं भेड़ हूं।

10-इस दूसरे सिंह ने भेड़ों की तो फिक्र छोड़ दी और उस सिंह को पकड़ने की चेष्टा की।बामुश्किल पकड़ पाया, क्योंकि था तो वह सिंह ही।उसकी गति सिंह की थी, और उसकी मान्यता भेड़ की थी।पकड़ते ही वह सिंह तो मिमियाने लगा, जैसा भेड़ें मिमियाती हैं।उसको तो गर्जना का कोई पता

ही न था।गर्जना अब भी उसके हृदय के किसी कोने में पड़ी थी,बीज थी,परन्तु अभी अंकुरित नहीं हुई थी। उसे सिंह गर्जन का कोई अनुभव ही नहीं था।क्षमता /कैपेसिटी थी, लेकिन योग्यता /एबिलिटी न थी। कैपेबिलिटी और एबिलिटी में फर्क हैं।योग्यता को तादात्म्य ने नष्ट कर दिया था ।

11-दूसरे सिंह ने पकड़ा, तो उसके पैरों पर सिर रखने लगा, मिमियाने लगा। आंखों से आंसू बहने लगे। कहने लगा, क्षमा करो ,छोड़ दो। उस दूसरे सिंह ने कहा, तुझे हो क्या गया है;तुम भूल में पड़े हो ,भेड़ नहीं हो।उसने कहा, ''नहीं, मैं भेड़ ही हूं।'' सिंह ने बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन जितना वह समझाने लगा, उतना वह और घबराने लगा। वह कहने लगा, तुम मुझे सिर्फ छोड़ दो। मुझे ज्ञान की कोई जरूरत नहीं है। मुझे मेरे मित्रों के पास जाने दो। उनके बिना मैं बहुत घबरा रहा हूं।

12-भेड़ तो भीड़ में ही जी सकती है। क्योंकि उसे सुरक्षा मालूम पड़ती है कि सब तरफ अपने हैं।अपने पर जिसे भरोसा नहीं है, उसे सदा भीड़ पर भरोसा होता है। भीड़ ही उसका सहारा है।सिंह को भीड़ में नहीं रखा जा सकता ;वह अकेला जी सकता है, लेकिन सिंह होने का पता हो.. तब न।

कोई उपाय न देखकर उस सिंह ने उसको घसीटा। नदी के किनारे ले गया और कहा कि देख पानी में... क्या मेरी शकल और तेरी शकल में कोई फर्क है?उसने झांककर देखा, दोनों शकलें एक सी थीं। रोमांच हो गया होगा, रोएं खड़े हो गए। भूल गया कि भेड़ हूं और भीतर से गर्जना फूट पड़ी ...वह बीज की तरह जो पड़ी थी, अंकुरित हो गई।

13-योग का अर्थ है वे प्रक्रियाएं, जिनके द्वारा आप अपनी असली शकल को पहचान लेंगे। अपनी मौलिक दशा /ओरिजनल स्टेट को समझ लेंगे।बड़े आइडेंटिफिकेशन हैं।गुरु का काम समझाना कम, दिखाना ज्यादा है कि जो मेरी शकल है, वही तुम्हारी भी शकल है। जो मेरे भीतर छिपा है, वही तुम्हारे भीतर भी छिपा है। किसी भी क्षण गर्जना निकल सकती है, क्योंकि वह भीतर का स्वभाव है।उस सिंह पर तो ज्यादा मुसीबत न थी,उसका तो एक ही तादात्म्य था कि मैं भेड़ हूं।लेकिन हमारे तादात्म्य का कोई अंत नहीं है...हजार -हजार तादाम्‍य हैं।

14- ''मैं हिंदू हूं; मैं मुसलमान हूं; मैं स्त्री हूं मैं पुरुष हूं; मैं शरीर हूं; मैं मन हूं; मैं यह हूं; मैं वह हूं। मैं धनी हूं; मैं निर्धन हूं; मैं सुंदर हूं; मैं कुरूप हूं; मैं दुर्बल हूं; मैं सबल हूं।'' न जाने कितने तादात्म्य हैं।उस सिंह की तो ज्यादा कठिनाई न थी, इसलिए गुरु को बहुत आसानी पड़ी। सिर्फ नदी में चेहरा

दिखा दिया।हमारे तो इतने चेहरे हैं कि हमें पक्का पता ही नहीं कि हमारा असली चेहरा क्या है। अगर नदी में भी आपको झुकाया जाए, तो आप उस वक्त कोई दूसरी ही मास्क अपने चेहरे पर ओढ़े होंगे, वही दिखाई पड़ेगी ..पानी में भी।हमारे पास इतने चेहरे हैं कि... हम चेहरों का एक संग्रह हैं।

15-सब तादात्म्य तोड़ने पड़े,सब मुखौटे उतारने पड़े, तो स्वरूप का पता चलता है।योग प्रक्रिया है, हमारे चेहरों को तोड़ डालने की, जो चेहरे भी हटाए जा सकते हैं, उन्हें हटा डालने की।सब उपाय करने के बाद भी जो पीछे सदा शेष रह जाता है, जो नहीं हटाया जा सकता, जो नहीं काटा जा सकता ;वही हमारा ओरिजनल फेस, वही हमारा मौलिक चेहरा है।जिसे न कोई योग काट सकता हैं, न कोई तलवार और न ही कोई विधि मिटा सकती हैं।

क्या है आनंद का साधन ?-

18 FACTS;-

1-भीतर वहाँ प्रवेश करना है, जहा कोई आवरण नहीं रह जाता। जहां सिर्फ वही रह जाता है, जो जानने की क्षमता है।'जानना' मात्र एक ऐसी चीज है जिससे हम अपने को अलग नहीं कर सकते, जिससे हमारा तादात्म्य नहीं है, जो हमारा स्वरूप ही है। और जिस दिन कोई जानने की शुद्ध क्षमता को उपलब्ध होता है, उसी दिन अमृत से..आनंद से भर जाता है।

2-इसलिए ऋषियों ने उस स्थिति के लिए, उस स्वभाव को कहा है, ''सच्चिदानंद''। सत, चित, आनंद। सत का अर्थ है, ''वह जो सदा रहेगा ,शाश्वत रूप से जो सत्य होगा -'द इटरनल, द इटरनली ट्रू,''।चित का अर्थ है चैतन्य, ज्ञान, बोध। जो सदा बोध से भरा रहेगा, जिसका बोध कभी नहीं खोएगा। और आनंद का अर्थ है ब्लिस, जो सदा सुख -दुख के पार, एक परम रहस्य में, आनंद में, मस्ती में डूबा रहेगा। एक ऐसी मस्ती में, जो बाहर से नहीं आती, जिसके स्रोत भीतर हैं।

3-उपनिषद के अनुसार '' वे ऋषि आनंद -रूप भिक्षा का ही भोजन करते हैं..''आनंद भिक्षाशी''।वे एक ही चीज मांगते हैं.. भिक्षा में, 'आनंद ' और कुछ भी नहीं । एक ही मांग है, एक ही अभीप्सा है और एक ही भोजन/आहार है ...'आनंद'। इसे दो तरह से खयाल में ले लेना जरूरी है। हम भी मांगते हैं, लेकिन हम आनंद कभी नहीं मांगते।हम मांगते हैं वे वस्तुएं, जिनसे आनंद मिल सके, जिनसे हमें खयाल है, कि आनंद मिलेगा। सीधा आनंद हम कभी नहीं मांगते।

4-इसलिए कुछ विचारक हुए हैं, जिनका कहना है कि यह बात ही गलत है कि आदमी आनंद चाहता है। कोई आदमी कार चाहता है, कोई आदमी बंगला चाहता है, कोई आदमी पत्नी चाहता है, कोई आदमी बेटा चाहता है, कोई आदमी स्वास्थ्य चाहता है।कोई कहता है, जमीन चाहिए; कोई कहता है, धन चाहिए; कोई कहता है, पद चाहिए...कोई मिलता ही नहीं जो कहता है कि आनंद चाहिए।कोई मुसलमान है तो मुसलमान ढंग से सोच रहा है।कोई ईसाई है तो ईसाई ढंग से सोच रहा है। लेकिन अगर सब निर्विचार होकर बैठ जाएं , शांत अवस्था में हो जाएं तो फिर क्या भेद होगा? क्या हिंदू का शून्य, मुसलमान के शून्य से अलग होगा? शून्य तो बस एक ही प्रकार का होगा।

5-वास्तव में,चेहरे के बदलने में जहाँ सुविधा हो, वह ओरिजनल फेस नहीं हो सकता। जो भी बदला जा सकता है, वह हमारा स्वभाव नहीं है,वह मुखौटा है।आप जिसको भी हटा सकते हैं, वह चेहरा है। आप कहते हैं, मैं हिंदू हूं, मैं मुसलमान हूं ,मैं ईसाई हूं। इसे हटाने में कोई दिक्कत नहीं है .. अभी हिंदू का मुखौटा लगाए थे, अभी मुसलमान का मुखौटा लगा लिया।कुछ बातें हम सोचते हैं, नहीं बदली जा सकतीं, जैसे ''मैं पुरुष हूं'' लेकिन यह भी गलत हैं।

6-गरीब का अमीर होना मुश्किल है, हिंदू का मुसलमान होना मुश्किल, लेकिन आपका स्त्री /पुरुष हो जाना बहुत ही सुगम है।अब तो उपाय खोज लिए गए हैं जरा सा ही हार्मोन्स का फर्क है।उनको डाल देने से पुरुष स्त्री हो सकता है और स्त्री पुरुष हो सकती है। यह चेहरा फिर मौलिक नहीं रह गया। गरीब को अमीर होने में कोई बड़ी अड़चन नहीं है तो अमीर के गरीब होने में भी कोई दिक्कत नहीं है।

7-उदाहरण के लिए,एक भिखारी खड़ा हुआ भीख मांग रहा था।एक ने उससे कहा,ऐसे तो स्वस्थ दिखाई पड़ता है .. तेरी यह हालत कैसे हो गई? उस भिखारी के आंसू गिरने लगे।उसने जल्दी से सौ रुपए का एक नोट निकाला और उसको दिया। उसने आंसू पोंछकर नोट रख लिया और कहा, ''यही कर -करके मैं भी गरीब हो गया हूं। सावधान रहना! ऐसे ही बांट बांटकर फंस गया''। 8-सभी का खयाल है कि इस साधन को चाहने से आनंद मिलेगा लेकिन कार तो मिल जाती है, आनंद नहीं मिलता। धन,मकान मिल जाता है, आनंद नहीं मिलता। साधन तो मिल जाते हैं, जो हमने सोचा था लेकिन साध्य नहीं मिलता।वास्तव में आनंद का कोई भी साधन नहीं है क्योंकि

साधन उसके लिए होते हैं, जो हमसे दूर हो। अगर किसी को पहाड़ की चोटी पर जाना है, तो साधन की जरूरत पड़ेगी ही। चढ़ने के लिए, जाने के लिए, पहुंचने के लिए मार्ग चाहिए, विधि चाहिए, कोई बताने वाला चाहिए। 9-लेकिन जब मुझे अपने ही भीतर जाना है, तो कोई साधन नहीं चाहिए । अगर पराए के पास पहुंचना है, तो बीच में सेतु चाहिए; परन्तु जब अपने ही पास पहुंचना है, तो किसी सेतु की कोई जरूरत नहीं है। अगर दूर जाना है, तो चलना पड़ेगा, और अगर अपने ही पास आना है, तो चलने की कोई भी जरूरत नहीं। चले कि भटक जाएंगे , दूर निकल जाएंगे। जो अपने को खोजने के लिए चलेगा, वह दूर निकल जाएगा, पास नहीं आएगा।

आनंद सीधा ही चाहा जा सकता है, उसका कोई साधन नहीं है। क्योंकि वह हमारा स्वभाव है ,हमें मिला ही हुआ है -''आलरेडी गिवेन''। जो मिला ही हुआ है उसे सिर्फ पहचानना पड़ता है, उसे पाना नहीं पड़ता।

10-लेकिन मकान तो मिला हुआ नहीं है, जमीन धन आदि तो मिली हुई नहीं है ;उसे मिलाना पड़ेगा, लाना पड़ेगा, खोजना पड़ेगा, बनाना पड़ेगा, निर्मित करना पडेगा, अर्जित करना पड़ेगा। और जो भी कमाया जा सकता है, वह आनंद नहीं हो सकता-''आल दैट कैन बी अर्न्द, कैन नेवर बी ब्लिस''।आनंद तो अर्जित नहीं करना होता, वह है ही.. ''ब्लिस इज अनअर्न्‍ड, आलरेडी गिवेन।'' सिर्फ उस तल पर जाकर देखना भर काफी है। आंख भीतर मुड़ जाए तो काफी है।

11-खजाना घर में ही गड़ा है और हम बाहर खोज रहे हैं। मकान के चारों तरफ दौड़ रहे हैं, पूरी जमीन का चक्कर लगा रहे हैं... वह नहीं मिल रहा है और मिलेगा भी नहीं। जितना चक्कर में हम पड़ते जाएंगे, उतना ही मिलने की संभावना क्षीण होने लगेगी।तीन तर्क हैं दौड़ने के। जब आदमी उसे खोजने दौड़ता है जो उसके भीतर है, तो दौड़कर नहीं पा सकता क्योंकि दौड़कर नहीं ,ठहरकर पाया जा सकता है। जब दौड़ता है और नहीं पाता है, तो दौड़ का पहला तर्क यह कहता है कि तुम जरा धीरे दौड़ रहे हो, इसलिए नहीं मिल रहा है।तब वह तेजी से दौड़ता है, और पूरी ताकत लगा देता है।

12- जब वह पूरी ताकत लगा देता है और तब भी नहीं मिलता, तो दौड़ने का दूसरा तर्क कहता है कि तुम गलत रास्ते पर दौड़ रहे हो.. रास्ता

बदलो।रास्ता बदल दे और तेजी से दौड़ता रहे, अनेक रास्तों की पहचान कर ले, तब भी आनंद न मिले (मिलेगा ही नहीं, मिलने का कोई कारण ही नहीं है )।और तब दौड़ने काआखिरी तर्क कहता है, आनंद है ही नहीं, इसलिए नहीं मिलता है।तो पहले वह कहता है, जोर से दौड़ो तो मिलेगा, ऐसे धीरे-धीरे चलने से कहीं मिलता है? देखो, पड़ोस के लोग कितने तेजी से दौड़ रहे हैं ; फलां आदमी को मिल गया, वह दिल्ली पहुंच गया।तुम भी तेजी से दौड़ो, तो तुमको भी मिल जाएगा। 13- फिर अगर तेजी से दौड़कर दिल्ली भी पहुंच जाओ और वहां न मिले, तो उसका मतलब है, रास्ता बदलों। तुम गलत रास्ते पर दौड़ रहे हो। फिर रास्ते जन्म -जन्म बदलोगे, क्योंकि अनंत रास्ते हैं जो कहीं नहीं ले जाते। कम से कम आनंद तक तो नहीं ले जाते। क्योंकि आनंद तक किसी रास्ते की जरूरत नहीं है। वह है ..भीतर, वहां आप खड़े हैं। सिर्फ आपकी नजर बहुत दूर के रास्तों पर भटक गई है, अपने से बहुत दूर चली गई है।

अंत में थका हुआ तर्क कहता है कि आनंद होगा ही नहीं, इसलिए नहीं मिलता है। क्योंकि अगर होता, तो हमने तो सब रास्ते खोज डाले, सब साधन प्रयोग कर लिए..।

14- जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्से बहुत विचारशील व्यक्ति था, अति विचारशील। उसने कहा ''आनंद है ही नहीं,सिर्फ आशा है, सिर्फ कल्पना है। जिसे तुम खोजते हो, वह है ही नहीं, इसलिए मिलेगा कैसे! लेकिन वह एक जरूरी कल्पना,आवश्यक झूठ /ए नेसेसरी अनट्रुथ है क्योंकि उसके बिना आदमी को जीना बहुत मुश्किल पड़ेगा। अगर ऐसा पता चल जाए कि आनंद कहीं है ही नहीं, तो आदमी यहीं गिरकर मिट्टी का ढेर हो जाएगा। वह चलेगा, उठेगा, दौड़ेगा कैसे...क्योंकि आदमी सत्य से नहीं ,असत्य से जीता है और असत्य जरूरी है; नहीं तो जी नहीं सकता।''

15- परन्तु नीत्से पागल होकर मरा क्योंकि यह तीसरा आखिरी तर्क है.. दौड़ का। इन सौ वर्षों में इतनी पेनिट्रेटिंग, इतनी गहरे प्रवेश कर जाने वाली बातें किसी दूसरे आदमी ने नहीं कहीं। लेकिन प्रतिभा थी, तो तर्क को उसने बिलकुल साफ सुथरा कर लिया। उसने कहा, जो इतना खोजने से नहीं मिलता है, तो वह है ही नहीं।परन्तु उपनिषद के अनुसार आनंद

मिलता है,लेकिन खोजने से नहीं..।नहीं मिलता है, क्योंकि तुम खोजते हो, दौड़ते हो। मिल सकता है, यदि रुक जाओ, ठहर जाओ,मत दौड़ो, मत भागो, दृष्टि को मत भटकाओ।दृष्टि को भीतर डूब जाने दो क्योंकि वह पहले से ही मिला हुआ है। स्वरूप का यही अर्थ होता है, ''जो है ही''।

16-इसलिए आनंद ही मांगना चाहिए, साधन नहीं। जो साधन मांगेगा, वह दौड़ता रहेगा, दौड के तर्कों में उलझा रहेगा। और अनंत जन्मों तक यह दौड़ चल सकती है। इस दौड़ का कोई अंत नहीं आता। और बुद्धि हो, विवेक हो, तो क्षण में यह दौड़ छूट सकती है और आदमी उसी क्षण में भीतर प्रवेश कर सकता है। एक क्षण में भी यह घटना घट सकती है और अनंत काल में भी न घटे। अगर आप गलत दिशा में निकल पड़े हैं, तो अनंत काल चलने पर भी नहीं पहुंचेंगे और ठीक दिशा में एक कदम उठा लेने से भी पहुंचना हो जाता है। मंजिल दूर नहीं ,बिलकुल भीतर है।

17-परन्तु यही समस्या है।अगर मंजिल दूर होती, तो हम पहाड़ चढ़ लेते, चांद पर पहुंच जाते।लेकिन मंजिल हमारे भीतर है ,खोजी के भीतर गंतव्य

है और यही तकलीफ है।उपनिषद का ऋषि साधन नहीं मांगता। वह यह नहीं कहता कि ''हे प्रभु, मुझे धन दो, ताकि मैं आनंद पा सकूं; कि मुझे बड़ा भवन दो कि मैं आनंदित हो सकूं। वह कहता है, न भवन, न धन, तुम मुझे आनंद ही दो। मुझे सीधा आनंद ही दो। और जब साधन से कोई आनंद मिलता है, तो वह आनंद नहीं होता है, सुख होता है''।

18- बिना साधन के/असाधन से,जो मिलता है, वह आनंद है। साधन से जब भी कुछ मिलता है, वह सुख होता है और सुख स्थिर नहीं हो सकता।या उससे दुख पैदा होता है, क्योंकि सुख आएगा और जब जाएगा तो दुख छोड़ जाएगा।इसलिए ध्यान साधन नहीं है /नाट ए मेथड...।

क्या ध्यान साधन नहीं है?-

07 FACTS;-

1-जब हम कहते हैं,कि साधना कर रहे हैं तो मतलब है कि हम साधन का उपयोग कर रहे हैं।कहते हैं कि ध्यान एक साधन है ,लेकिन ध्यान असाधन है- 'नो मेथड'।वस्तुत: ध्यान कोई साधन या विधि नहीं है बल्कि सब विधियों को छोड्कर अपने भीतर डूब जाने का नाम है। इसलिए जब तक विधि चलती है, तब तक ध्यान नहीं होता। विधि सिर्फ जंपिंग बोर्ड है। एक आदमी नदी में कूदता है लेकिन अभी नदी नहीं आ गई, अभी जंपिंग बोर्ड पर है। फिर जंपिंग बोर्ड ने उसे फेंक दिया, छलांग मारी, वह नदी में चला गया। तो जंपिंग बोर्ड नदी में छलांग लगाने के लिए सहयोगी बनता है।

2-लेकिन अगर जंपिंग बोर्ड पर ही कूदते रहें, तो जिंदगी नहीं, अनंत जिंदगी कूदते रहेंगे,लेकिन नदी में न पहुंचेंगे।विधि का उपयोग करना पड़ता है, अ-विधि में कूदने के लिए'' मेथड कैन बी यूज्‍ड ओनली टु जंप

इनटु द नो मेथड''।इसलिए ध्यान के तीन चरण सिर्फ जंपिंग बोर्ड हैं और चौथा चरण ध्यान है। तीन तो सिर्फ तैयारी है उछलने की, कूदने की, इतने जोश से भर जाने की कि कूद ही जाएं हिम्मत जुटाकर, तो पानी में पहुंच जाएं।

3-जहां ध्यान है, वहा कोई साधन नहीं, और जब तक साधन है, तब तक ध्यान नहीं। लेकिन ध्यान के लिए भी साधन का उपयोग करना पड़ता है। पर ध्यान स्वयं साधन नहीं है, ध्यान अवस्था /स्टेट आफ माइंड है।

जिसने साधन मांगा, वह गृहस्थ है। जिसने साध्य मांगा, वह संन्यासी है और वे आनंद की ही भिक्षा मांगते हैं। वही उनका भोजन है, आहार है, उनका जीवन है।जिसने रास्ते मांगे, उसे मंजिल कभी न मिलेगी।जिसने मंजिल मांगी,तो मंजिल तो यहीं है।

4-अगर आपसे कोई कहे कि आनंद सीधा ही मिल जाता है.. 'मत मांगो मकान, मत मांगो कार'। तो जरा आंख बंद करके भीतर सोचिये क्योंकि मन कहेगा, छोड़ो ऐसे आनंद को, ऐसे आनंद में क्या रस होगा? ऐसे आनंद में क्या हो सकता है जो बिना ही किसी चीज के मिल जाता है.. चीज तो चाहिए ही।डब्बा/ कंटेनर तो चाहिए ही , चाहे वह खाली ही हो। कंटेंट

से किसी को प्रयोजन नहीं है।संन्यासी साधन नहीं, साध्य ही मांगता है।काया नहीं ,वस्तु नहीं... आत्मा ही मांगता है,अस्तित्व ही मांगता है।

5- मरघट और महल में कोई फासला नहीं हैबल्कि हमारी आकांक्षा में फासला है।हम महल चाहते हैं, मरघट नहीं ;लेकिन वास्तव में, जहां महल खड़े हैं, वहां बहुत दफे मरघट भी बन चुके हैं।और जहां मरघट बने हैं, वहां बहुत दफे महल बनकर गिर चुके हैं। और सब महल अंततः मरघट बन जाते हैं और सब मरघटों पर महल खड़े हो जाते हैं।महल तो

हम बस्ती के बीच में बनाते हैं और मरघट गांव/शहर के बाहर, ताकि दिखाई भी न पड़े, उधर से गुजरना भी न पड़े। ऐसी जगह बनाते हैं, जहां से कोई रास्ता भी न गुजरता हो, न आगे जाता हो, मरघट पर ही खतम हो जाता हो।

6-और मरघट हम सदा.. दूसरों को ही पहुंचाने जाते हैं अपने को पहुंचाने का तो मौका नहीं आता। वह काम तो दूसरे करते हैं। जब हमने उनकी इतनी सेवा की, वे भी हमारी कुछ सेवा तो करेंगे ही।दूसरों को पहुंचाने में

तो बड़ा रस भी आता है।हम जिंदा हैं... न मालूम कितनों को मरते हुए देखा, लेकिन हम नहीं मरते। एक भीतरी रस मिलता है कि फिर कोई दूसरा मरा। अपने मरने का तो पता भी नहीं चलता, क्योंकि तब तोआप मर ही गए! कोई अपने को मरघट नहीं पहुंचाता।पर संन्यासी वही है, जो अपने को मरघट पहुंचा देता है। जो कहता है, मरघट भी अब हमारा आवास है। महल और मरघट में उसे फर्क नहीं रह जाता। मरघट भी उसके लिए आनंद विहार हो जाता है।

7-मृत्यु और जीवन में फर्क गिरे, तभी महल और मरघट का फर्क गिर सकता है। जिसे हम जीवन कहते हैं, वह मृत्यु ही मालूम होने लगे, तभी जिसे हम मरघट कहते हैं, वह आवास बन सकता है। जिसे हम दुख- सुख कहते हैं, जब उनके बीच का फासला गिर जाए और दुख सुख मालूम होने लगे, और सुख दुख मालूम होने लगे, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू मालूम होने लगें, उस दिन मरघट आनंद वन हो सकता है -उसके पहले नहीं। तो यह केवल सूचना है कि संन्यासी को महाश्मशान भी आवास ही मालूम पड़ता है, आनंद विहार ही मालूम पड़ता है...कोई फर्क नहीं रह जाता।

एकांत का क्या अर्थ हैं?-

02 FACTS;-

1-एकांत के दो अर्थ हैं। एक तो अकेलापन/टु बी लोनली, और दूसरा एकाकी, टु बी अलोन। दोनों में बड़ा फर्क है।उपनिषद के अनुसार 'एकांत ही ऋषि का मठ है', तो अर्थ हैं '' टु बी अलोन..नॉट लोनलीनेस''।वास्तव में, जब हमें अकेलापन /लोनलीनेस लगती है, तो उसका मतलब है कि दूसरे की अभीप्सा मौजूद है ;इसीलिए तो अकेलापन लगता है।हम दूसरे में अपने को उलझाए रखते हैं,और अपने को घृणा करते हैं। इसलिए कोई अकेला नहीं होना चाहता,क्योंकि अकेले में अपने से ही साथ रह जाता है।

आप खुद ही अपने को इतना पसंद नहीं करते कि अपने साथ आनंदित हो।यह तो तभी हो सकता है,जब हम अपने को चाहे ,प्रेम करे,पसंद करे ।

2-भाषाकोश में तो लोनलीनेस और अलोननेस एक ही हैं। लेकिन जीवन के कोश में बड़ी उलटी बातें हैं। अगर कोई आदमी कहता है कि अकेलापन लगता है, तो अर्थ हैं कि उसे एकांत का पता ही नहीं चला है।और कोई आदमी कहता है कि एकांत में हूं दूसरे की याद ही नहीं आती, अपना ही होना पर्याप्त है, तो ऐसा 'एकांत' ..संन्यासी का मठ है । वही उसका मंदिर

,उसका आवास है।और संन्यासी वही है, जो अपने साथ मजा लेने में समर्थ हो गया है ;दूसरे की जरूरत ही न रही।अकेला ही काफी है / टु बी अलोन इज इनफ। इसका नाम है एकांत। और अकेलेपन/लोनलीनेस को तो कोई पता ही नहीं है कि मैं अकेला हूं। यह तो तभी पता चलता है, जब दूसरे की आकांक्षा मन में सरकती है कि दूसरा होना चाहिए था और नहीं है। दूसरे का अभाव ही अकेलापन पैदा करता है।

कैसे करे उस प्रकाश की खोज?-

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...SHIVOHAM...