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परमात्मा की खोज ,वन वे ट्रैफिक नहीं ...


10 FACTS;-

1-कहीं जाने की जरूरत से परे जाना ही साधना है, क्योंकि जाने के लिए कोई जगह नहीं है।आप कहीं नहीं पहुंच सकते क्योंकि ऐसी कोई जगह है ही नहीं। जिन चीजों का ज्ञान होना चाहिए, वे सब यहीं और अभी हैं।लोग कहते हैं, भगवान को जानना है ,भगवान कहा है,भगवान दिखला दो, दर्शन करा दो। लेकिन भगवान अगर तुम्हारे सामने भी खड़ा हो तो तुम दर्शन न कर पाओगे, तुम्हारी आंखें बंद हैं। भगवान तुम्हारे कानों के पास चिल्लाए ..चीखे, तो तुम सुन न पाओगे, तुम्हारे कान बंद हैं। तुम्हारे भीतर इतना शोरगुल है! तुम अपने शोरगुल को सुनोगे कि भगवान की आवाज सुनोगे! उसकी आवाज बड़ी धीमी है। 2-भगवान चिल्लाता नहीं, फुसफुसाता है। उसकी आवाज में आक्रमण नहीं है। उसकी आवाज एक धीमे स्वर की भांति है, शून्य स्वर की भांति है; संगीत की एक तरंग की भांति है। तुम जब तक शांत न हो जाओ तब तक तुम उस तरंग को न पकड़ पाओगे। जब तुम शांत हो जाओगे तभी तुम पकड पाओगे। और शांत होते ही तुम हैरान होओगे कि हम कहां खोजते फिरते थे, उसने तो हमें चारों तरफ से घेरा हुआ है, उसके अतिरिक्त कोई और है ही नहीं। 3-अगर आप नहीं जानते कि यहां कैसे मौजूद रहना है, तो आप यह नहीं जान पाएंगे कि कहीं और कैसे रहना है। अगर आप जीवित हैं, तो आप यहां और अभी हैं, अगर आप मरते हैं, तो भी आप यहीं और अभी हैं। साधना आपको समझदारी के एक खास स्तर पर पहुंचाने का एक तरीका है, जहां कहीं पहुंचने की जरूरत खत्म हो जाती है। इसीलिए जो लोग साधना में डूबे होते हैं, वे किसी दिशा में नहीं जाते। वे बस बैठे रहते हैं और जिन चीजों को भी जानने की जरूरत है, उन्हें यहीं बैठे हुए जाना जा सकता है। उसे जानने के लिए आपको दुनिया भर में दौड़ने-भागने की जरूरत नहीं है।

4-परमात्मा की खोज ,वन वे ट्रैफिक नहीं -निश्चित ही, मिलन तो दो का ही होता है। यात्रा दो तरफ से होगी। एक यात्रा के संबंध में हमने सुना है कि आदमी परमात्मा की तरफ जाता है। एक और भी यात्रा है, जिसमें परमात्मा आदमी की तरफ आता है। सच तो यह है कि हम एक कदम चलते हैं परमात्मा की तरफ, तो तत्काल परमात्मा का एक कदम हमारी तरफ उठ जाता है। यह संतुलन कभी नहीं खोता। जितना आप बढ़ते हैं, उतना परमात्मा आपकी तरफ बढ़ आता है। 5-परमात्मा की खोज ,वन वे ट्रैफिक नहीं -निश्चित ही, मिलन तो दो का ही होता है। यात्रा दो तरफ से होगी। एक यात्रा के संबंध में हमने सुना है कि आदमी परमात्मा की तरफ जाता है। एक और भी यात्रा है, जिसमें परमात्मा आदमी की तरफ आता है। सच तो यह है कि हम एक कदम चलते हैं परमात्मा की तरफ, तो तत्काल परमात्मा का एक कदम हमारी तरफ उठ जाता है। यह संतुलन कभी नहीं खोता। जितना आप बढ़ते हैं, उतना परमात्मा आपकी तरफ बढ़ आता है। 6 -आप यह मत सोचना कि जब परमात्मा से मिलना होता है, तो परमात्मा के घर में होता है। बिलकुल नहीं। यह बीच यात्रा में होता है। आप चलकर पहुंचते हैं कुछ, परमात्मा चलकर आता है कुछ, और ठीक बीच में यह मिलन होता है।आप ही परम से मिलने को आतुर हैं, ऐसा अगर होता, तो जीवन बड़ा साधारण होता। परम भी आतुर है आपसे मिलने को। वही जीवन का रस और आनंद है। अगर आदमी ही परमात्मा की तरफ दौड़ रहा है और यह वन वे ट्रैफिक है, एक ही तरफ से यात्रा होती हो, और परमात्मा जरा भी उत्सुक नहीं है आदमी के भीतर आने को, तो आप परमात्मा से मिल भी जाते, तो भी तृप्ति न होती, क्योंकि यह प्रेम एकतरफा होता। 7-नहीं, जितने आतुर आप हैं, उतना ही आतुर परमात्मा भी है। सागर भी उतना ही आतुर है सरिता से मिलने को, जितनी सरिता आतुर है सागर से मिलने को। ये प्रेम की धाराएं दोनों तरफ से प्रवाहित हैं।वह जो परमात्मा के मिलने की शक्ति है, उस शक्ति का नाम यहां योगशक्ति है।जिससे पूरा एक जीवन-दर्शन विकसित होता है... तब आप परमात्मा की तरफ चलते हैं.। सूफी फकीरों में कहावत है कि उसे खोजने तब तक कोई नहीं निकलता, जब तक वह खुद ही उसे खोजने न निकल आया हो।परमात्मा की तरफ तब तक कोई नहीं चलता, जब तक कि परमात्मा ने ही साधक की तरफ चलना शुरू न कर दिया हो ..प्यास ही नहीं जगती, जब तक उसकी पुकार न आ गई हो। 8-सूफी फकीर झुन्नून, (इजिप्त) ने अपने संस्मरणों में कहा है कि जब मेरी मुलाकात उस परम शक्ति से हुई , तो मैंने प्रभु से कहा कि ''कितना तुझे मैंने खोजा! तो प्रभु मुस्कुराए और उन्होंने कहा कि ''क्या तू सोचता है, तूने ही मुझे खोजा? काश, तुझे पता हो कि कितना मैंने तुझे खोजा! और परमात्म शक्ति ने झुन्नून को कहा कि तूने मुझे खोजना ही तब शुरू किया, जब मैं तुझे खोजना शुरू कर चुका था। क्योंकि अगर मैं ही तुझे खोजने न निकलूं, तो तू मुझे खोजने में कभी समर्थ न हो सकेगा! 9-अज्ञानी कैसे खोज पाएगा? नासमझ कैसे खोज पाएंगे? जिन्हें कुछ भी पता नहीं है, जिन्हें यह भी पता नहीं है कि वे खुद कौन हैं, वे कैसे खोज पाएंगे? अगर यह परम विराट ऊर्जा भी साथ न दे रही हो इस खोज में, अगर उसका भी हाथ न हो इसमें, अगर उसका भी सहारा न हो, अगर उसका भी इशारा न हो, तो यह खोज न हो पाएगी। 10-इसलिए धर्म व्यक्ति से परमात्मा की तरफ संबंध का नाम ही नहीं है। धर्म व्यक्ति से परमात्मा की तरफ और परमात्मा से व्यक्ति की तरफ संवाद, मिलन, आलिंगन का संबंध है। यह खोज इकतरफा नहीं है।लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं,इसे तत्व से जान लो कि ''परमात्मा भी खोज रहा है''.. वह भी खोज रहा है;विराट भी आपको पुकार रहा है ;सागर ने भी आह्वान दिया है, ''आओ!''.. 'तब बूंद की शक्ति हजार गुना हो जाती है। सामर्थ्य बढ़ जाता है, साहस बढ़ जाता है, यात्रा बड़ी सुगम हो जाती है।' यात्रा फिर यात्रा ही नहीं रह जाती है, बहुत हलकी हो जाती है, निर्भार हो जाती है। ....SHIVOHAM...