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ध्यान और प्रेम करीब-करीब एक ही अनुभव के दो नाम हैं।


प्रेम बिलकुल अनूठी बात है, उसका बुद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं। प्रेम का विचार से कोई संबंध नहीं। जैसा ध्यान निर्विचार है, वैसा ही प्रेम निर्विचार है। और जैसे ध्यान बुद्धि से नहीं सम्हाला जा सकता, वैसे ही प्रेम भी बुद्धि से नहीं सम्हाला जा सकता। ध्यान और प्रेम करीब-करीब एक ही अनुभव के दो नाम हैं। जब किसी दूसरे व्यक्ति के संपर्क में ध्यान घटता है, तो हम उसे प्रेम कहते हैं। और जब बिना किसी दूसरे व्यक्ति के, अकेले ही प्रेम घट जाता है, तो उसे हम ध्यान कहते हैं। ध्यान और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ध्यान और प्रेम एक ही दरवाजे का नाम है, दो अलग-अलग स्थानों से देखा गया। अगर बाहर से देखोगे, तो दरवाजा प्रेम है। अगर भीतर से देखोगे, तो दरवाजा ध्यान है। जैसे एक ही दरवाजे पर बाहर से लिखा होता है एंट्रेन्स, प्रवेश; और भीतर से लिखा होता है एग्जिट, बहिर्गमन। वह दरवाजा दोनों काम करता है। अगर बाहर से उस दरवाजे पर आप पहुँचे, तो लिखा है प्रेम। अगर भीतर से उस दरवाजे को अनुभव किया तो लिखा ध्यान। ध्यान अकेले में ही प्रेम से भर जाने का नाम है और प्रेम दूसरों के साथ ध्यान में उतर जाने की कला है।

अलग-अलग धर्मों ने अलग-अलग महामंत्र पाए हैं, जैसे ऊँ नमो शिवाय, नमो अरिहंताणं, अल्लाहो अकबर, ऊँ मणि पद्मो हुम्। तो ऐसे महामंत्र कौन सी अवस्था में उतरे हैं और इनका भीतर के कौन-कौन से केंद्रों से कैसा संबंध है ? और साधक इनमें से अपने लिए योग्य महामंत्र कैसे चुने ? साधक दो प्रकार की यात्राएं कर सकता है। एक यात्रा है शक्ति की और दूसरी यात्रा है शांति की। शक्ति की यात्रा सत्य की यात्रा नहीं है, शक्ति की यात्रा तो अहंकार की ही यात्रा है। फिर शक्ति धन से मिलती हो, पद से मिलती हो या मंत्र से। तुम शक्ति चाहते हो, तो सत्य नहीं चाहते हो। तुम्हारे द्वारा अर्जित की गई शक्ति शरीर की हो, मन की हो, या तथाकथित अध्यात्म की हो, तुम्हें मजबूत करेगी। तुम जितने मजबूत हो, परमात्मा से उतने ही दूर हो। तुम्हारी शक्ति परमात्मा के समक्ष तुम्हारे अहंकार की घोषणा है। तुम्हारी शक्ति ही तुम्हारे लिए बाधा बनेगी। तुम्हारी शक्ति ही, वास्तविक अर्थों में, परमात्मा के समक्ष तुम्हारी निर्बलता है। तो जितने तुम शक्तिशाली बनोगे अपनी आंखों में, उतने ही परमात्मा के द्वार पर निर्बल होते जाओगे। इसलिए शक्ति की खोज वास्तविक साधक की खोज नहीं। लेकिन साधक उस दिशा में जाता है। क्योंकि हम जो संसार में खोजते हैं, वही हम परमात्मा में भी खोजते हैं। जो हमें यहां नहीं मिला, उसे ही हम वहां पा लेना चाहते हैं। तो हमारे संसार और हमारे मोक्ष में एक सातत्य है, एक कंटिन्युटी है। बाजार में खोजा जिसे, वह नहीं मिला, उसे हम मंदिर में खोजते हैं। लेकिन खोज वही है। खोज करने वाला जरा भी बदला नहीं है। एक जगह असफल हुए, तो दूसरी जगह सफलता की आकांक्षा जमा लेते हैं। लेकिन तुम शक्तिशाली होना क्यों चाहते हो ? तुम होना चाहते हो, यही तुम्हारा दुख है। तुम मिटोगे तो आनन्द घटेगा, तुम्हारी अनुपस्थिति में वर्षा होगी अमृत की, तुम्हारे रहते यह होने वाला नहीं है। मंत्र शक्तिदायी है। तो मंत्र से शक्ति मिलती है, निश्चित मिलती है। इसे समझ लें। मंत्र करता क्या है ? मंत्र मन को एकाग्र करता है। तुम्हारी सारी बिखरी हुई मन की किरणें इकट्ठी हो जाती हैं। फिर वह मंत्र कोई भी हो—राम का नाम हो, नमोकार हो, ऊँ मणि पद्मो हुम् हो, अल्लाहो अकबर हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम अपना खुद का मंत्र बना ले सकते हो। मंत्र में आये शब्दों का भी कोई अर्थ नहीं है। मंत्र का प्रयोजन न शब्दों से है, न अर्थ से। मंत्र का प्रयोजन मन को एकाग्र करने से है। इसलिए कुछ भी अनर्गल, अर्थहीन शब्द भी मंत्र का काम दे देंगे जब तुम मंत्र की रटन करते हो, तब तुम्हारे सारे विचारों की शक्ति विचारों से हटकर मंत्र में प्रवाहित होने लगती है। चित्त में मंत्र ही रह जाता है। और भीतर तुम्हारे जितने ऊर्जा के द्वार हैं, उनके बहाव की ओर कोई दिशा नहीं बचती। जब तुम विचार करते हो, तो तुम्हारी शक्ति अनंत-अनंत धाराओं में बह रही है। एक विचार पश्चिम जा रहा है, एक पूरब जा रहा है, एक दक्षिण जा रहा है, एक उत्तर जा रहा है। तुम बहुत तरफ बह रहे हो, जब तुम विचार कर रहे हो। इकट्ठे नहीं हो, बंटे हो, विभाजित हो। जब तुम मंत्र का जाप कर रहे हो, तब सारी ऊर्जा एक दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जैसे हम सूरज की किरणों को एक कांच के लेंस से इकट्ठा कर लें, तो आग पैदा हो जाती है। सूरज की किरणों में आग तो छिपी है, लेकिन पृथक-पृथक ज्यादा से ज्यादा गर्मी पैदा होगी। इकट्ठी हो जाएं, तो आग पैदा हो जाती है। ऐसे ही तुम्हारे मन में भी बड़ी आग छिपी है, अलग-अलग सिर्फ उष्णता रहती है। मंत्र उन्हें इकट्ठा करने का उपाय है। इकट्ठे होते से ही बड़ी गर्मी, बडी ऊर्जा पैदा होती है। और अगर तुम सतत मंत्र का प्रयोग करते रहो, तो तुम्हारे जीवन में अनेक शक्ति की घटनाएँ घटनी शुरू हो जाएंगी, जो तुम्हारे अहंकार को बड़ा रस देंगी। तुम जो कहोगे, वह सच होने लगेगा; तुम जो बोल दोगे, वैसा हो जाएगा; तुम अभिशाप दे दोगे, तो फलित हो जाएगा; तुम वरदान दे दोगे, तो पूरा हो जाएगा। क्योंकि तुम्हारी ऊर्जा इतनी इकट्ठी हो गई है कि तुम्हारे शब्द अब सार्थक होने लगेंगे। उनकी सार्थकता का कारण यही है कि जब कोई व्यक्ति इकट्ठी ऊर्जा से कुछ कहता है, तो वह दूसरे के अचेतक तक प्रवेश कर जाता है, उसका तीर सीधा दूसरे के हृदय में चला जाता है। और दूसरे के हृदय में कोई भी बात पहुंच जाए, तो उसके परिणाम शुरू हो जाते हैं। अगर तुमने किसी व्यक्ति को कह दिया कल सुबह तुम बीमार पड़ जाओगे, अगर इस कहते क्षण में, यह तुमने जो कहा है, मंत्र की तरह तुम्हारे भीतर रहा हो, और कुछ भी नहीं, कोई दूसरा विचार विघ्न-बाधा डालने को नहीं, बस यही तुम्हारा मनोकार मंत्र रहा हो कि कल सुबह तुम बीमार पड़ जाओगे और तुम्हारा पूरा चित्त इसमें प्रवाहित हुआ हो, तत्क्षण तुमने दूसरे के हृदय को घाव से भर दिया। अब यह आदमी रात भर सो न सकेगा। इसने तुम्हारी आंखें देखीं, तुम्हारा वक्तव्य सुना, तुम्हारा ढंग देखा और इसके मन पर यह गहरी छाप पड़ गई कि तुमने जो कहा है, उससे बचना मुश्किल है। इसका मन भी अब इसी मंत्र के आस-पास घूमेगा। यह रात सपने में भी तुम्हें देखेगा, रात सपने में भी इसे यही वचन सुनाई पड़ेगा। यह कई बार मन में कहेगा, इससे कुछ होने वाला नहीं, डरो मत, भय मत करो। लेकिन भीतर से कोई इसे फिर भी भयभीत किए जाएगा। चाहे व कहे कि डरो मत, चाहे यह डरे, दोनों हालात में यह मंत्र को दोहरा रहा है—तुम्हारे मंत्र को। सुबह होते-होते यह बीमार पड़ जाएगा। यह बीमारी तुमने पैदा की आधी, आधी इसने पैदा की। और ठीक ऐसा ही जीवन के बहुत अंगों में कर सकते हो। और एक बार तुम्हारा वचन सार्थक होने लगे, तो तुम्हारा आत्माविश्वास बढ़ेगा, तुम और बलशाली होने लगोगे। जितना तुम्हारा वचन सही होंगे, उतना ही तुम्हें लगेगा कि मैं कुछ दिव्य शक्ति, कोई सिद्धि से भरा हुआ हूं। यह भरोसा तुम्हारे मंत्र को मजबूत करेगा। हर मंत्र तुम्हारे भरोसे को मजबूत करेगा। तुम धीरे-धीरे अनेक शक्तियों का अनुभव करने लगोगे। यह जो शक्तियों का अनुभव है, इन्हें योग ने सिद्धियां कहा है। ये सिद्धियां परमात्मा के मार्ग पर सबसे बड़ी बाधाएं हैं। पतंजलि ने योग-सूत्रों में इनका उल्लेख किया है, ताकि तुम इनसे सावधान रहो। इनकी तरफ जाना नहीं। जा चुके हो, तो वापस लौट आना है। जितना जल्दी लौट आओ, उतना अच्छा है। क्योंकि जितना समय इसमें खोया, वह बिलकुल व्यर्थ ही जाता है। और हर बार जितने आगे तुम इन दिशाओं में जाते हो, उतना लौटना मुश्किल होने लगता है। अगर कोई मुझसे पूछे, तो मैं कहूंगा, संसार शक्ति की खोज है, सिद्धि की खोज है। परमात्मा की शांति, शून्यता की खोज है। वहां तुम मिटते हो, वहां तुम धीरे-धीरे लीन होते हो। सिद्धि की खोज में आखिर में तुम बचोगे, परमात्मा बिल्कुल नहीं। शांति की खोज में तुम न बचोगे, अंत में सिर्फ परमात्मा बचेगा। और इन दो में से एक का मिटना जरूरी है। ये दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते। परमात्मा और तुम साथ-साथ नहीं हो सकते, तुम्हारा को-एक्झिस्टेंस, तुम्हारा सह-अस्तित्व असंभव है। तब तक तुम हो, तब तक परमात्मा नहीं; जब परमात्मा है, तब तुम नहीं। तो सिद्धि और शक्ति तो तुम्हें मजबूत करेगी। इसलिए मंत्रों के साधक परम अहंकार से भरे हुए दिखाई पड़ते हैं। धनी का अहंकार उनके सामने कुछ भी नहीं, पद पर बैठे राजनीतिक का अहंकार उनके सामने कुछ भी नहीं। उनका अहंकार बड़ा सूक्ष्म और भीतरी है। और उसका कारण भी है। क्योंकि धन छीना जा सकता है, चोरी जा सकता है, धन का मूल्य ही क्या है ? पद आज है, कल न हो, राजनीति का भरोसा कितना ? लेकिन मंत्र का भरोसा ज्यादा प्रबल है। चोर छीन नहीं सकते, जनता का लोकमत बदल नहीं सकता। और मंत्र तुम्हारे मन पर ही निर्भर है, किसी और पर नहीं। इसलिए तुम ज्यादा सबल, आत्मनिर्भर, अपने पैरों पर खड़े मालूम पड़ते हो। साधक अगर सिद्धि की दिशा में चला जाए, तो भटक गया। रस बहुत आएगा, क्योंकि अहंकार को रस आता ही इस तरह की चीजों से है। अगर एक चींटी इस तरफ आ रही है और तुम सिर्फ अपने मनोबल से उसका रास्ता बदल दो, हालांकि इस कृत्य में कोई सार नहीं है, पर फिर भी तुम्हें रस आएगा। रूस में एक महिला है, जिस पर बड़े वैज्ञानिक प्रयोग किए जा रहे हैं। वह किसी भी वस्तु को अपने मन से चालित कर देती है। टेबिल रखी है, छह फीट दूर वह खड़ी हो जाए, पंद्रह मिनिट मन को एकाग्र करे, तो वह टेबिल को हिलाना शुरू कर देती है। टेबिल उसकी तरफ सरक सकती है, दूर जा सकती है। और सब तरह की जांच-पड़ताल से सब समझा गया है, कोई धोखाधड़ी नहीं है। उस महिला को मिलता क्या है ? दो पौंड वजन खो जाता है पंद्रह मिनिट के प्रयोग में। और एक सप्ताह के लिए वह निर्बल हो जाती है। एक सप्ताह बिस्तर से नहीं उठ सकती। दो पौंड वजन शरीर से तत्क्षण कम हो जाता है। क्योंकि जब तुम मन को एकाग्र करके अपनी शक्ति को बाहर फेंकते हो, ‘तब’ तुम्हारे शरीर की उर्जा भी उसमें क्षीण होती है। लेकिन फिर भी वह महिला बड़ी आनंद ले रही है। उसका सारा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है इस उपद्रव में। परिवार में डाँवा डोल हो गया, बच्चे की चिंता करनी मुश्किल, पति की फ़िक्र करनी मुश्किल। घर तो अस्तव्यस्त हो गया है। और यह एक खेल बन गया है, वैज्ञानिक अध्ययन करने आ रहे हैं, और कोई चमत्कार घटित हो रहा है। लेकिन चमत्कार का अर्थ क्या है ? इससे हल भी क्या है ? टेबिल तुम हाथ से हटा सकते थे, जिसमें कि रत्ती भर ताकत लगती है। उसे तुमने मन से हटाया और दो पौंड शरीर की ऊर्जा क्षीण की और सात दिन तक अस्वस्थ रहे ! रामकृष्ण के पास किसी ने आकर एक दिन कहा कि लोग कहते हैं, आप परमहंस हो, लेकिन कोई ऐसी सिद्धि तो दिखाई नहीं पड़ती। मेरे गुरु हैं, वे पानी पर चलते हैं। रामकृष्ण कहने लगे, मैं दो पैसा देकर नदी पार हो जाता हूं। तो जो काम दो पैसे से हो जाता हो, तुम्हारे गुरु ने कितने वर्षों में यह कला सीखी ? शिष्य ने कहा, कम से कम बीस वर्ष उनको मंत्र की साधना में लगे। तो रामकृष्ण ने कहा कि बड़ी मूढ़ता है कि जो काम दो पैसे में होता हो, उसे बीस वर्ष का जीवन नष्ट करके किया ! आखिर पानी ही पार होते हैं, तो पानी पार होने में ऐसी बात क्या है ? नाव हो, दो पैसे लेती है, न हो तो आदमी तैर कर पार हो जाए। पर नदी पर चलकर जो आदमी पार होता है, वह बीस वर्ष मेहनत कर सकता है। आप भी कर सकते हैं। नदी पार होना प्रयोजन ही नहीं है। वह पैर से पार होना, पानी पर खड़े होकर पार होना, उससे आपका अहंकार खड़ा हो रहा है। नाव में बैठकर अहंकार खड़ा नहीं हो सकता, तैरने से अहंकार खड़ा नहीं हो सकता। दो पैसे तो खर्च होते हैं। नदी ही पार होती है। यह जो आदमी चलकर नदी पार कर रहा है, पानी की सतह पर चलकर, इसका नदी पार करना तो प्रयोजन ही नहीं है, यह अहंकार को मजबूत कर रहा है। मंत्र शक्ति स्रोत हैं। और सभी धर्मों ने मंत्र खोज लिए हैं, क्योंकि सभी धर्म शांति की तलाश से शक्ति की तलाश में पतित हो जाते हैं। महावीर तो शांति खोजते हैं, लेकिन जैन को शांति से क्या लेना-देना ? बुद्ध तो शून्यता खोजते हैं, अपने को मिटाते हैं, लेकिन बौद्धों को अपने को मिटाना नहीं, बनाना है, बचाना है, सुरक्षित करना है। जिन व्यक्तियों के आसपास धर्म का जन्म होता है, वे तो शून्यता हो गए होते हैं। जो लोग आसपास इकट्ठे होते हैं, वे शून्य होने के कारण इकट्ठे नहीं होते। उनका रस कुछ और है, विपरीत है। इसलिए धर्म जिनसे जन्म पाता है और जिनके हाथों में पड़ता है, वे हमेशा शत्रु हैं। उन दोनों की आकांक्षाएं बिलकुल भिन्न हैं। इसलिए सभी धर्म पतित हो जाते हैं। शक्ति की खोज धर्म को संसार का हिस्सा बना देती है। जैन हो, हिंदू हो, बौद्ध हो, इस्लाम हो, कोई भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। तुम्हें बड़ा रस आता है चमत्कार में। और जब तक तुम्हें चमत्कार में रस आता है, तब तक तुम जानना कि अभी तुम्हारी धर्म की जिज्ञासा पैदा नहीं हुई। कोई साधु, कोई संन्यासी, कोई बाबा अगर हाथ से राख ही पैदा कर दे, तो भी तुम आंदोलित हो जाते हो। राख का करोगे भी क्या ? राख ऐसे ही सड़कों पर ढेर लगी पड़ी है। राख तो तुम घर से ही आग जलाकर पैदा कर लेते ? दो पैसे भी खर्च नहीं होते। लेकिन किसी आदमी ने हाथ से पैदा कर दी, तो तुम बहुत आंदोलित हो, तो तुम बड़े प्रसन्न हो, तो तुम इस आदमी के पीछे चल रहे हो, तो तुम पागल हो। क्या होगा रस, इसको समझना जरूरी है। यह तो तुम भी समझते हो कि राख से क्या होने वाला है ? लेकिन मनुष्य तुम कुछ और देख रहे हो इस राख में। तुम्हें यह आशा बंधी है कि जो आदमी हाथ से राख पैदा कर सकता है, वह हीरे क्यों नहीं पैदा कर सकता ? उसने राख पैदा करके तुम्हारी वासना को प्रज्वलित कर दिया है। और जो आदमी राख पैदा कर सकता है, वह तुम्हारी बीमारी दूर क्यों नहीं कर सकता ? जो आदमी राख पैदा कर सकता है, वह तुम्हें चुनाव में जिता क्यों नहीं सकता ? इसलिए दिल्ली में हर राजनीतिज्ञ का गुरु है। कोई महात्मा, कोई बाबा, जो राख पैदा कर रहा है, जो ताबीज दे रहा है। चाहे राष्ट्रपति हों, चाहे प्रधानमंत्री हो, बाबा पर निर्भर रहना पड़ता है। जिनकी भी वासना है, वे चमत्कार पर निर्भर रहेंगे। मुल्क में करोड़पति है, लेकिन हर करोड़पति किसी न कसी बाबा के चरणों में सिर रखता है। करोड़ भला हों उसके पास, लेकिन अभी अरबों की आकांक्षा है। तुम चमत्कार को नमस्कार करते हो, क्योंकि तुम्हारी वासना है, कुछ तुम पाना चाहते हो। चमत्कारी से भरोसा मिलता है, कि कुछ आशा बंधती है, इससे कुछ होगा। बीमारी है, नौकरी नहीं, व्यवसाय ठीक नहीं चलता है, अदालत में मुकदमा है, हजार उपद्रव हैं आदमी के पास, मुश्किलें हैं, कठिनाइयां हैं, आदमी दुखी है। राख हाथ से गिरती देखकर उसे आशा बंधती है कि अगर बाबा प्रसन्न हों, तो मेरे दुख भी विसर्जित हो सकते हैं। और जैसे राख पैदा हो रही है, ऐसे ही सुख की वर्षा हो सकती है। आज तक किसी दूसरे की कृपा से सुख की कोई वर्षा नहीं हुई। आज तक कभी किसी दूसरे के द्वारा आनंद का कोई जन्म नहीं हुआ। सदियों का इतिहास इस बात का सबूत है कि तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हें कोई भी आनंद न दे सकेगा। लेकिन मन की भ्रांतियां हैं मन सस्ते और सरल रास्ते खोजता है। यह चमत्कार है कि तुम मेरे पास सुनने आये हो मैं इसे चमत्कार कहता हूं। क्योंकि न यहां राख गिरेगी, न ताबीज बाटे जाएंगे, न तुम्हारी बीमारी को दूर करने करा कोई भरोसा है, न तुम पद जीतोगे न धन, तुम्हारी कोई महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होगी। फिर भी तुम आए हो मैं इसे चमत्कार कहता हूं। कोई भी करण नहीं है तुम्हारे आने का मेरे पास। क्योंकि तुम जो भी चाहते हो, उसमें से कुछ भी मैं तुम्हें देने वाला नहीं। विपरीत, तुम्हारे पास जो है, शायद वह भी मेरे पास आने से छिन जाए और अंततः तुम भी मिट जाओ। फिर भी तुम आए हो, तो मैं मानता हूं कि तुम्हारी कोई धार्मिक जिज्ञासा है। तुम राख की तलाश में नहीं हो, न नदियों पर पैदल चलने की तुम्हें कोई विक्षिप्तता है। तुम वस्तुतः ही ऊब गए हो संसार से। तुम्हारी ऊब वास्तविक है। तुम्हारे संताप ने उस सीमा को छू लिया है, जहां तुम एक दूसरे ही अध्यात्म लोक में प्रवेश करना चाहते हो। तुम इस सातत्य को तोड़ना चाहते हो, जो अब तक चलता रहा है। तुम इससे छलांग लगा लेना चाहते हो। तुम इसी का सिलसिला आगे जारी रखने को उत्सुक नहीं हो। इसलिए मैं तुम्हें कोई मंत्र नहीं देता। कोई मंत्र मेरे पास तुम्हें देने को है भी नहीं। क्योंकि मंत्र दिया जाता है वहां, जहां तुम्हारी खोज किसी ऋद्धि की, किसी सिद्धि की है। मैं तुम्हारे मन को मजबूत न करूंगा। मैं तुम्हारे मन को मिटाऊंगा, काटूंगा। और उस घड़ी की प्रतीक्षा करूंगा कि तुम मन को, जैसे कोई प्याज को छीलता हो, छीलते जाओगे एक-एक पर्त प्याज की, तुम्हारे विचार की एक-एक पर्त गिरती जाएगी। और एक दिन आएगा कि प्याज की सारी पर्तें अलग

हो जाएंगी और कुछ भी हाथ में न बचेगा, शून्य बचेगा। बुद्ध ने कहा है, मन प्याज की गांठ की भांति है। बस, पर्त विचारों की उघाड़ते जाओ, आखिर में मन भी नहीं बचता, जैसे प्याज नहीं बचती । और जब मन बिलकुल नहीं बचता, तब तुम अपने परिपूर्ण रूप में प्रगट होते हो। तुम कैसे मिटो, यही महामंत्र है। एकाग्रता से तुम सघन होओगे, ध्यान से तुम मिटोगे। एकाग्रता तुम्हारी शक्तियों को एक गजह लगाती है, ध्यान तुम्हारी शक्तियों को परमात्मा में समर्पित करवाता है। तो परमात्मा को एकाग्रता का बिंदु नहीं बनाना है, परमात्मा में समर्पित होना है। मन को एकाग्र नहीं करना है, परमात्मा में मन को खोना है। ये बड़ी भिन्न बाते हैं। विलीन होना, तल्लीन होना है, खो जाना है। ऐसी घड़ी आ जाए, जब तुम्हें तुम्हारा पता न चले। ऐसी घड़ी आ जाए, जब तुम खोजो भी तो अपने को न पा सको। तुम भीतर जाओ तो पाओ कि घर खाली है। तुम दर्पण के सामने खड़े होओ, अपनी आंखों में झांको, तो पता चले की भीतर कोई भी नहीं है। जहां तुम वसर्जित हो गए, वहीं निर्वाण है। इसलिए वस्तुतः धर्म ने कोई मंत्र नहीं दिए हैं, पुरोहित ने मंत्र दिए हैं। तीर्थंकर कोई मंत्र नहीं देते, न अवतार मंत्र देते हैं, पुरोहित मंत्र देते हैं। और पुरोहित से धर्म का कोई संबंध नहीं। पुरोहित ही धर्म को नष्ट करता है, क्योंकि पुरोहित धर्म को व्यवसाय के जगत का हिस्सा बना देता है। वह तुम्हारी आकांक्षाओं का सेवक है। तुम जो चाहते हो, वह कहता है हो सकता है। वह तुम्हें आश्वासन देता है। तुम्हारी आशा को जगाए रखता है। और धर्म तो तभी शुरू होगा, जब तुम्हारी सारी आशा गिर जाएगी। जब तुम्हरी निराशा परम होगी। जब एक किरण भी न बचेगी आशा की। क्योंकि एक भी किरण बची, तो तुम संसार में चलते ही रहोगे। अगर जरा सा भी तुम्हें लगा कि कल कुछ हो सकता है, तो तुम कल की प्रतीक्षा करोगे। तुम्हारा विषाद कितना सघन हो जाए कि कल पर से तुम्हारा भरोसा हट जाए। तुम्हारा संताप इतना गहरा हो कि कोई आशा पैदा न हो। जहां आशा नहीं, कल नहीं, वहां वासना के खड़े होने की जगह नहीं। क्योंकि वासना खड़ी होती है आशा से, और वासना खड़ी होती है कल में, आज तो जगह भी नहीं है। कल, और आने वाला कल, आने वाला जन्म, वहां आशा, वासना खड़ी होती है कल में, आज तो जगह भी नहीं है। समय का विस्तार वासना को खड़ा करने के लिए जगह बनाता है। इसलिए तुम कल में जीते हो, आज नहीं। फिर तुम चाहो मंत्रों का पाठ करो, चाहे मन्दिरों-मस्जिदों में पूजा करो, प्रार्थना करो। लेकिन तुम्हारी सारी प्रार्थनाएँ तुम्हारी वासनाओं की संततियां हैं। इसलिए सब झूठी हैं। जो प्रार्थना वासना का अनुषंग है, वह झूठी है। तुम कुछ मांगते हो, इसलिए प्रार्थना करते हो। यह प्रार्थना शब्द ही मांगने से बना है। तुम जाते हो मंदिर में, लेकिन मांगते संसार हो। तुम्हारी मांग जब तक बनी है, तुम कैसे प्रार्थना करोगे ? जब तक तुम परमात्मा से कुछ मांग रहे हो, तब तक एक बात पक्की है कि तुम परमात्मा को नहीं मांग रहे हो तब तक परमात्मा से बड़ी कोई चीज है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि परमात्मा के सामने भी खड़े होकर तुम क्षुद्र चीजें मांग पाते हो। इसका अर्थ है कि परमात्मा से बड़ी हैं वे क्षुद्र चीजें। ऐसा हुआ कि रामकृष्ण के पास जब विवेकानंद आए, तो उनका घर बड़ी दीन अवस्था में था। पिता चल बसे थे। और पिता संसारी मनमौजी आदमी थे, तो बड़ा कर्ज छोड़ गए थे। घर में रोटी का भी इन्तजाम न था। किसी तरह रोटी जुटती थी, तो मां और बेटे दोनों के लिए काफी नहीं होती थी। तो विवेकानन्द मां को कहते कि मुझे किसी मित्र ने निमंत्रण दिया है आज, ताकि मां रोटी खा ले, अन्यथा विवेकानंद को खिला देती और खुद भूखी रह जाती। तो ऐसा कहकर आस-पास की गलियों में चक्कर लगाकर वहां से बड़े प्रसन्न और डकार लेते लौटते थे। न किसी मित्र ने निमंत्रण दिया है, लेकिन मां को दिखाने को कि भोजन कर आया हूं, बड़ा प्रसन्न हूं, बड़ा अच्छा भोजन था, ताकि मां भी निश्चिंतता से भोजन कर ले। रामकृष्ण को पता लगा तो रामकृष्ण ने कहा, तू भी बड़ा मूर्ख है। यहां रोज काली के दरबार में उपस्थित होता है तो मांग क्यों नहीं लेता ? इतनी छोटी-सी बात, इसके लिए व्यर्थ कष्ट क्यों उठा रहा है ? जब रामकृष्ण ने कहा तो विवेकानंद ने कहा, ‘आप कहते हैं तो मांग लूंगा। रामकृष्ण बाहर बैठे हैं मंदिर के, विवेकानंद भीतर गए। बड़ी देर बाद वापस लौटे तो रामकृष्ण ने पूछा ? मां को कहा ? तकलीफ बताई ? विवेकानंद ने कहा, मैं भूल गया। रामकृष्ण ने कहा, यह भी कोई भूलने की बात है ? भूखा है तू, मां तेरी भूखी, घर मुसीबत में, पैसा चुकता नहीं। जरा कह दे, इशारे की बात है, सब हो जाएगा। तू जा वापस। फिर घड़ी भर बाद विवेकानंद आए, आंख से आंसू बह रहे हैं आनंद के। रामकृष्ण ने कहा निश्चित तूने मांग लिया होगा, इसलिए प्रसन्न है। विवेकानन्द ने कहा, मैं फिर भूल गया। ऐसा तीन बार हुआ। फिर विवेकानन्द ने कहा कि नहीं, यह हो ही नहीं सकेगा। क्योंकि जब मैं मां के सामने जाता हूं, तो मां ही दिखाई पड़ती है और सब भूल जाता हूं। मैं खुद को ही भूल जाता हूं तो मेरी तकलीफें, मेरी मुसीबतें कहां टिकें ? उनकी स्मृति कैसे रहे ? और यह असंभव मालूम पड़ता है। रामकृष्ण ने कहा कि इसीलिए तुझे बार-बार भेजा, यह तेरी परीक्षा थी। क्योंकि मां के सामने अगर तू कुछ मांगने को राजी हो जाए, तो उसका अर्थ है कि अभी प्रार्थना का कोई उपाय नहीं। फिर प्रार्थना ही नहीं हो सकती। मांगने वाला चित्त भिखारी का चित्त है, वह प्रार्थना क्या करेगा ? और परमात्मा से बड़ी चीजें उसके सामने हैं, जिनको वह मांग रहा है। जिसको परमात्मा ही चाहिए, वह उसके सामने कुछ भी नहीं मांग सकता। वह परमात्मा को भी नहीं मांग सकता। इसे थोड़ा समझें। क्योंकि अक्सर इसका दूसरा दृष्टिकोण खयाल में आ जाता है कि हम कुछ चीजें न मांगेंगे, हम परमात्मा को ही मांगेंगे।