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क्या महत्व है सदगुरु का ?


परमात्मा अनंत सूर्यों से भी अधिक ज्योतिपूर्ण है, इसलिए उसकी ज्योति को झेलना असंभव है। मनुष्य परमात्मा का ही अंश है, फिर अंश अंशी को कैसे नहीं झेल पाता है?

जैसे कि बूंद पर सागर टूट पड़े, तो अगर बूंद मिटने को राजी हो, तभी झेल सकती है। अगर बचने की चेष्टा करे, तो फिर न झेल पाएगी। इस गणित को ठीक से समझना चाहिए ।

अगर तुम मिटने को राजी हो, तब तो तुम झेल लोगे परमात्मा को, फिर तो कोई डर ही न रहा। लेकिन अगर तुम बचना चाहते हो, तो फिर तुम परमात्मा को न झेल सकोगे। तब तुम मात्रा में झेलो।

गुरु मात्रा में है। धीरे—धीरे झेलो। गुरु तुम्हें धीरे— धीरे राजी करेगा। गुरु भी तुम्हें मिटाएगा, पर वह तुम्हारे पूरे भवन को एक साथ आया नहीं लगा देता। वह धीरे—धीरे एक—एक सहारा खींचता है। तुम्हारे बाकी सहारे बने रहते हैं। तुम कहते हो, कोई हर्जा नहीं, यह एक डंडा अलग कर रहा है, कर लेने दो, इतने में क्या बिगड़ेगा! पूरा मकान तो खड़ा है। पर एक—एक डंडा करके वह सब खींच लेता है। एक दिन तुम अचानक पाते हो, सारा भवन गिर गया। एक—एक ईंट खींचता है गुरु, इसलिए तुम सोचते हो, एक ईंट से क्या बिगड़ता है! ले जाने दो। तुम्हारी कृपणता में भी तुम सोचते हो, एक ईंट से क्या बिगड़ेगा। इतने कृपण तुम भी नहीं हो, एक ईंट तुम भी छोड़ देते हो। मगर तुम्हें पता नहीं कि सारा भवन एक—एक ईंट से बना है। एक ईंट खिंच गई कि गुरु आश्वस्त हो गया कि अब दूसरी भी खींच लेंगे। जब भी खींचेगा, एक ही खींचेगा। इसलिए अब पक्का है कि एक तो तुम खिंचने देते हो, इतने से काम चलेगा, थोड़ी देर लगेगी। और एक—एक ईंट खिंचते—खिंचते एक दिन तुम अचानक पाओगे, तुम्हारा भवन गिर गया।

परमात्मा मात्रा से नहीं खींचता। परमात्मा को आदमी होने का पता नहीं है, गुरु को पता है। परमात्मा अपने ढंग से चलता है; उसका ढंग बड़ा विराट है। उसे आदमी के छोटे—छोटे आंगनों का पता नहीं है, उसे तो बड़े आकाश का पता है। वह बाढ़ की तरह आता है। तुम अभी बूंद को झेलने को तैयार न थे, वह सागर की तरह आ जाता है; तुम घबड़ा उठते हो। वह भयंकर सागर की गर्जना और तुम भाग खड़े होते हो।

गुरु तुम्हें आहिस्ता—आहिस्ता थपकी दे—देकर मारता है। मारता वह भी है। क्योंकि तुम जब तक न मिटो, तब तक परमात्मा हो ही नहीं सकता। मिटना तो तुम्हें होगा। तुम्हारा होना ही बाधा है, इसलिए मिटना तो पड़ेगा। मिटने की तैयारी तो सीखनी ही पड़ेगी। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम परमात्मा हो। लेकिन जब तक तुम नहीं मिटे हो, इसका तुम्हें पता न चलेगा। जब तक तुम्हारी सीमा है, तब तक तुम परमात्मा हो, इसका तुम्हें पता न चलेगा। जब तुम्हारी सीमा खो जाएगी और तुम पाओगे कि तुम हो, पहले से भी ज्यादा, पहले से भी पूर्ण, तभी तुम पाओगे कि पहले तो तुम थे ही नहीं, अब पहली दफा हो। लेकिन वह तो मिटोगे तभी होगा।

वह तो बीज जब तक मिटेगा नहीं, तब तक अंकुर न हो पाएगा। और बीज कहता है, पहले भरोसा दिला दो। बीज कहता है, मैं बिना भरोसे के, जो हूं वह मिट जाऊं; फिर पता क्या कि मिटने के बाद जीवन की कोई नई श्रृंखला फूटेगी या नहीं!

अंडा टूटेगा, तब पक्षी बाहर आएगा। लेकिन पक्षी भीतर से ही कहता है, पहले मुझे भरोसा दिला दो। मेरी सुरक्षा है यह अंडा, इसके भीतर सुख—चैन है, यह टूट जाएगा, इसके टूटने पर मैं बचूंगा? मेरे घर के मिट जाने पर मैं बर्न?

तुम भी वही पूछते हो। यह अहंकार तुम्हारा खोल है, सुरक्षा है। इसके भीतर तुम बचे मालूम पड़ते हो। यह तुम्हारा अस्त्र—शस्त्र है, कवच है। और सारा धर्म कहता है, तोड़ो इस अहंकार को। तुम कहते हो, तोड़ तो दें, लेकिन फिर हम बचेंगे? इसके बिना तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम कैसे बचोगे।

और कठिनाई यह है कि जब तक न टूटो, तब तक पता कैसे चले। और जब तक पता न चले, तब तक तुम टूटने को राजी कैसे होओ!

इसलिए परमात्मा तुम्हें न फुसला सकेगा। वह वृक्ष है, तुम बीज हो। गुरु बीज भी था, अब वृक्ष हुआ है। तुमने उसे बीज की तरह भी जाना; अभी भी तुम बीज की खोल उसके चारों तरफ टूट