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क्या महत्व है सदगुरु का ?


परमात्मा अनंत सूर्यों से भी अधिक ज्योतिपूर्ण है, इसलिए उसकी ज्योति को झेलना असंभव है। मनुष्य परमात्मा का ही अंश है, फिर अंश अंशी को कैसे नहीं झेल पाता है?

जैसे कि बूंद पर सागर टूट पड़े, तो अगर बूंद मिटने को राजी हो, तभी झेल सकती है। अगर बचने की चेष्टा करे, तो फिर न झेल पाएगी। इस गणित को ठीक से समझना चाहिए ।

अगर तुम मिटने को राजी हो, तब तो तुम झेल लोगे परमात्मा को, फिर तो कोई डर ही न रहा। लेकिन अगर तुम बचना चाहते हो, तो फिर तुम परमात्मा को न झेल सकोगे। तब तुम मात्रा में झेलो।

गुरु मात्रा में है। धीरे—धीरे झेलो। गुरु तुम्हें धीरे— धीरे राजी करेगा। गुरु भी तुम्हें मिटाएगा, पर वह तुम्हारे पूरे भवन को एक साथ आया नहीं लगा देता। वह धीरे—धीरे एक—एक सहारा खींचता है। तुम्हारे बाकी सहारे बने रहते हैं। तुम कहते हो, कोई हर्जा नहीं, यह एक डंडा अलग कर रहा है, कर लेने दो, इतने में क्या बिगड़ेगा! पूरा मकान तो खड़ा है। पर एक—एक डंडा करके वह सब खींच लेता है। एक दिन तुम अचानक पाते हो, सारा भवन गिर गया। एक—एक ईंट खींचता है गुरु, इसलिए तुम सोचते हो, एक ईंट से क्या बिगड़ता है! ले जाने दो। तुम्हारी कृपणता में भी तुम सोचते हो, एक ईंट से क्या बिगड़ेगा। इतने कृपण तुम भी नहीं हो, एक ईंट तुम भी छोड़ देते हो। मगर तुम्हें पता नहीं कि सारा भवन एक—एक ईंट से बना है। एक ईंट खिंच गई कि गुरु आश्वस्त हो गया कि अब दूसरी भी खींच लेंगे। जब भी खींचेगा, एक ही खींचेगा। इसलिए अब पक्का है कि एक तो तुम खिंचने देते हो, इतने से काम चलेगा, थोड़ी देर लगेगी। और एक—एक ईंट खिंचते—खिंचते एक दिन तुम अचानक पाओगे, तुम्हारा भवन गिर गया।

परमात्मा मात्रा से नहीं खींचता। परमात्मा को आदमी होने का पता नहीं है, गुरु को पता है। परमात्मा अपने ढंग से चलता है; उसका ढंग बड़ा विराट है। उसे आदमी के छोटे—छोटे आंगनों का पता नहीं है, उसे तो बड़े आकाश का पता है। वह बाढ़ की तरह आता है। तुम अभी बूंद को झेलने को तैयार न थे, वह सागर की तरह आ जाता है; तुम घबड़ा उठते हो। वह भयंकर सागर की गर्जना और तुम भाग खड़े होते हो।

गुरु तुम्हें आहिस्ता—आहिस्ता थपकी दे—देकर मारता है। मारता वह भी है। क्योंकि तुम जब तक न मिटो, तब तक परमात्मा हो ही नहीं सकता। मिटना तो तुम्हें होगा। तुम्हारा होना ही बाधा है, इसलिए मिटना तो पड़ेगा। मिटने की तैयारी तो सीखनी ही पड़ेगी। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम परमात्मा हो। लेकिन जब तक तुम नहीं मिटे हो, इसका तुम्हें पता न चलेगा। जब तक तुम्हारी सीमा है, तब तक तुम परमात्मा हो, इसका तुम्हें पता न चलेगा। जब तुम्हारी सीमा खो जाएगी और तुम पाओगे कि तुम हो, पहले से भी ज्यादा, पहले से भी पूर्ण, तभी तुम पाओगे कि पहले तो तुम थे ही नहीं, अब पहली दफा हो। लेकिन वह तो मिटोगे तभी होगा।

वह तो बीज जब तक मिटेगा नहीं, तब तक अंकुर न हो पाएगा। और बीज कहता है, पहले भरोसा दिला दो। बीज कहता है, मैं बिना भरोसे के, जो हूं वह मिट जाऊं; फिर पता क्या कि मिटने के बाद जीवन की कोई नई श्रृंखला फूटेगी या नहीं!

अंडा टूटेगा, तब पक्षी बाहर आएगा। लेकिन पक्षी भीतर से ही कहता है, पहले मुझे भरोसा दिला दो। मेरी सुरक्षा है यह अंडा, इसके भीतर सुख—चैन है, यह टूट जाएगा, इसके टूटने पर मैं बचूंगा? मेरे घर के मिट जाने पर मैं बर्न?

तुम भी वही पूछते हो। यह अहंकार तुम्हारा खोल है, सुरक्षा है। इसके भीतर तुम बचे मालूम पड़ते हो। यह तुम्हारा अस्त्र—शस्त्र है, कवच है। और सारा धर्म कहता है, तोड़ो इस अहंकार को। तुम कहते हो, तोड़ तो दें, लेकिन फिर हम बचेंगे? इसके बिना तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम कैसे बचोगे।

और कठिनाई यह है कि जब तक न टूटो, तब तक पता कैसे चले। और जब तक पता न चले, तब तक तुम टूटने को राजी कैसे होओ!

इसलिए परमात्मा तुम्हें न फुसला सकेगा। वह वृक्ष है, तुम बीज हो। गुरु बीज भी था, अब वृक्ष हुआ है। तुमने उसे बीज की तरह भी जाना; अभी भी तुम बीज की खोल उसके चारों तरफ टूट गई है, लेकिन लिपटी हुई पाओगे। अभी भी बीज की खोल पड़ी है, टूट गई है; अंकुर हो गया है....।

गुरु तुम्हें पहले कदम से मिलता है, परमात्मा तुम्हें अंतिम कदम पर मिलेगा। अंतिम कदम बड़ा दूर है। पहला कदम पास मालूम पड़ता है। गुरु में एक सातत्य बन सकता है। परमात्मा में कोई सातत्य नहीं बनता।

इसलिए मैं कहता हूं कि गुरु के द्वार से तुम्हारा परमात्मा से मिलन होगा। और कोई उपाय नहीं है। गुरु के द्वार से ही सदा मिलन हुआ है।

इसलिए नानक ने तो अपने मंदिर को गुरुद्वारा नाम दे दिया। गुरुद्वारा है, वह सिर्फ द्वार है, वह एक खुला द्वार है, जिससे प्रवेश होना है। जिससे बस प्रवेश होना है और जिसे भूल जाना है। गुरु को सदा याद नहीं रखना है। द्वार को कोई याद रखता है? प्रविष्ट हो जाता है, भूल जाता है। मगर जब तक प्रविष्ट नहीं हुए हो, तब तक द्वार की तलाश रहती है। गुरु खाली जगह है।

लेकिन बड़ी कठिनाई है गुरु के साथ भी। कठिनाइयां ऐसी हैं, तीन तरह के गुरु होते हैं। एक तो गुरु होता है, जिसको शास्त्रों ने सदगुरु कहा है। उसे तो पहचानना जरा कठिन होता है। उसे समझना भी थोड़ा कठिन होता है। वह थोड़ा बेबूझ होता है, अतर्क्य होता है। उसके पास, उसको समझने को तो बड़ा धीरज चाहिए। उसका व्यवहार भी, उसका बोलना, उसका कहना, उसकी जीवन—विधि, सभी तुम्हारे गणित से थोड़ी अलग होती है। होगी ही। क्योंकि तुमने जो गणित सोचा हुआ है, वह पुराने गुरुओं के आधार पर सोचा है। और कोई एक गुरु दूसरे गुरु जैसा नहीं होता। अगर तुमने महावीर से गणित सीखा है गुरु का, तो तुम मेरे पास आकर देखोगे कि यह आदमी तो नग्न नहीं है, इसलिए ज्ञानी नहीं हो सकता। और ऐसा आज हो रहा है, ऐसा नहीं। महावीर के समय में भी महावीर से जिसने गणित सीखा गुरु होने का कि गुरु क्या है, वह बुद्ध के पास गया, तो उसने कहा, बुद्ध गुरु नहीं हो सकते, क्योंकि यह तो कपड़ा पहने हुए है। गुरु तो नग्न होता है।

बुद्ध के पास जिन्होंने गुरु होने का अर्थ सीखा, वे महावीर को देखकर समझे कि यह जरा जरूरत से ज्यादा है। यह दिखावा है। नग्न होने की क्या जरूरत है? नग्न रहने की जरूरत है, होने की थोडे ही जरूरत है।

उनका कहना भी ठीक है। अब यह बताने की क्या बात है! नग्न हो, यह पहचान लिया। अब कपड़े उतारकर बाजार में खड़े होना, यह तो जरा प्रदर्शन मालूम पड़ता है! गुरु प्रदर्शन थोड़े ही करता है। उनका कहना भी ठीक है। उनको महावीर गुरु न जंचे।

हिंदुओं को दोनों गुरु न जंचे। न महावीर, न बुद्ध। महावीर की तो हिंदुओं ने बात ही न की। महावीर की चर्चा ही न उठाई। चर्चा न उठाने का कारण था कि महावीर बिलकुल समझ में ही न आए। चर्चा भी उठाओ तभी, विरोध भी करो तभी, जब कुछ समझ में आता हो।

यह आदमी बिलकुल अतर्क्य मालूम पड़ा। बारह साल तो मौन रहा; नग्न घूमने लगा, महीनों उपवास करने लगा। इसका ढंग, शैली कुछ समझ में न आई। महावीर उकडूं बैठे थे, जब उनको समाधि हुई। उकडूं! जैसे कोई गौ को दोहता है, तब बैठता है, गौदोहासन में। कभी किसी को हुई थी ऐसी समाधि! लोग पालथी लगाकर समाधि के वक्त बैठते हैं। ये उकडूं काहे के लिए बैठे थे? कोई गौ का दूध लगा रहे थे? वह भी नहीं था। उकडूं बैठे थे। बडी हैरानी की बात है।

लेकिन अगर मनसविद से पूछो, शरीरशास्त्री से पूछो, तो इसमें थोड़ा राज मालूम पड़ता है। क्योंकि बच्चा मां के पेट में उकडूं होता है, उसके घुटने उसकी छाती से लगे होते हैं। वह गर्भ की अवस्था है। महावीर इतने सरल हो गए नग्न होकर, ऐसे निर्दोष हो गए, बचपन तो दूर छूट गया, गर्भ की अवस्था आ गई। जैसे छोटा बच्चा सिकुड़ा हुआ पड़ा हो, ऐसे वे उकडूं बैठे थे; जैसे यह सारा अस्तित्व गर्भ बन गया और महावीर उसमें लीन हो गए।

महावीर की सारी व्यवस्था पकड़ में न आ सकी। महावीर, को उपेक्षा कर दिया हिंदुओं ने, बात ही उठानी ठीक नहीं है। बात में से बात निकलेगी और यह आदमी कहीं भी पकड़ में नहीं आता।

बुद्ध की बात उठाई, क्योंकि बुद्ध की बात में उपनिषद के स्वर बिलकुल साफ थे। बुद्ध आधे हिंदू थे। महावीर बिलकुल हिंदू नहीं थे, ढंग में, जीवन—व्यवस्था में।

बुद्ध की बात उठाई; लेकिन बुद्ध को भी स्वीकार तो करना मुश्किल था, और अस्वीकार भी करना मुश्किल था। इसलिए आधा हिंदुओं ने स्वीकार किया, आधा अस्वीकार किया। दसवां अवतार स्वीकार किया बुद्ध को कि वे भी परमात्मा के अवतार हैं। लेकिन एक शर्त के साथ, कि वे गलत अवतार हैं; ठीक अवतार नहीं हैं। हैं तो अवतार परमात्मा के, लेकिन ठीक नहीं।

और एक कथा हिंदुओं ने गढ़ी, कि बनाया परमात्मा ने नरक और स्वर्ग। नरक कोई जाए ही न, क्योंकि कोई पाप ही न करे। लोग सरल थे, सभी स्वर्ग चले जाएं। तो जिनको नरक में बिठाया था प्रधान बनाकर, वे सब हाथ जोड़कर एक दिन खड़े हुए कि यह तो हम बेकार ही बैठे हैं। रजिस्टर खोले बैठे रहते हैं, कोई आता ही नहीं, खाली पड़ा है। यह काहे के लिए खोला है यह दफ्तर, बंद करो, या किसी को भेजो। उन पर दया करके परमात्मा ने बुद्ध अवतार लिया कि लोगों को भ्रष्ट करो, ताकि लोग नरक जा सकें। ऐसी हिंदुओं ने कहानी गढ़ी।

तो बुद्ध ने लोगों को भड्का दिया, भरमा दिया। हैं तो वे परमात्मा के अवतार, लेकिन नरक की जगह जो खाली पड़ी है, उसकी भरने के लिए पैदा हुए।

जैन कृष्ण को नहीं समझ सकते। कृष्ण को नरक में डाला हुआ है। जैन बुद्ध को नहीं समझ सकते। बुद्ध को जैनों ने भगवान कभी नहीं कहा; महात्मा कहते हैं ज्यादा से ज्यादा, अच्छी आत्मा है। लेकिन अभी बहुत दूर, भगवत्ता से बहुत दूर। बुद्ध को वे कभी भगवान नहीं कह सकते, महात्मा कहते हैं। और महात्मा से तुम आदर मत समझना; वह अनादर का शब्द है। क्योंकि महावीर को। भगवान कहते हैं, उनको वे महात्मा नहीं कहते।

तो बुद्ध को नीचे रखते हैं। बड़े होशियार लोग हैं; दुकानदार हैं। महात्मा कहने से कोई झगड़ा भी खड़ा नहीं होता, कोई कह भी नहीं सकता कि तुम कोई अनादर कर रहे हो, लेकिन वे अनादर कर रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि सिर्फ महात्मा ही हो; कोई भगवत्ता को उपलब्ध नहीं हो गए! अभी भगवान होना बड़ा दूर है।

लोग सीखते हैं एक गुरु से पाठ, फिर उस गुरु की शैली उनके मन में रम जाती है। फिर उसी शैली के आधार पर वे दूसरे गुरुओं की जांच करते फिरते हैं, अटकन हो जाती है। प्रत्येक गुरु अनूठा है, अद्वितीय है। उस जैसा न कभी हुआ है, न कभी होगा। इसलिए सदगुरु को पहचानना बहुत कठिन है। उसको तो वही पहचान सकता है, जो सभी नक्‍शे, सभी मापदंड नीचे गिरा दे और सीधा आख खोलकर देखे।

जैसे शास्त्र को वही पहचान सकता है, जो अज्ञानी की तरह। निर्दोष हो, वैसे ही सदगुरु को भी वही पहचान सकता है, जो निर्मल अज्ञानी है, सरल, खाली। सीधा देखता है, बीच में किसी को नहीं लेता, कि महावीर से सोचेंगे कि बुद्ध से कि कृष्ण से। किसी को बीच में नहीं लेता; आख में आख डालता है, सीधा हाथ में हाथ लेता है, साक्षात्कार करता है, तो सदगुरु की पहचान होती है।

मगर यह कठिन प्रक्रिया है। इसमें हिम्मत चाहिए, क्योंकि तुम्हें किसी दूसरे का सहारा नहीं मिलेगा। अकेले तुम ही जाओगे; अपनी किताब और गाइड और कुंजियां साथ न ले जा सकोगे। सब मापदंड छोड्कर जाओगे, भयभीत होने लगोगे; कई बार संदेह पकड़ेगा, संशय पकड़ेगा। सदगुरु के पास यह यात्रा तो करनी ही पड़ेगी।

सदगुरु की उपलब्धि कठिन है; मिल भी जाए, पहचान कठिन है। पहचान भी हो जाए, बहुत दफा छोड़ने का भाव पैदा होगा; बहुत दफा भाग जाना चाहोगे। लेकिन अगर टिके ही रहे, अगर हिम्मतवर रहे, अगर साहसी रहे, तो एक दिन उपलब्ध हो जाओगे। तब सदगुरु द्वार बन जाता है।

फिर दूसरे हैं, असदगुरु। असदगुरु से इतना ही मतलब है, जो द्वार हैं नहीं, लेकिन द्वार दिखाई पड़ते हैं। ये तुम्हें जल्दी से मिल जाएंगे। इनको तुम पहचान लोगे। क्योंकि ये बिलकुल तुम्हारी भाषा के भीतर आते हैं, ये तुम्हारे तर्क के नीचे पड़ते हैं; अतर्क्य नहीं हैं। ये तुम्हारे हिसाब से चलते हैं। तुम जैसा इनको चाहते हो, वैसा ही ये व्यवहार करते हैं। वस्तुत: ये तुम्हें अपना अनुयायी नहीं बनाएंगे, क्या बनाएंगे! ये तुम्हारे अनुयायी हैं।

तुम कहते हो, सिर घुटाए हुए होना चाहिए गुरु, तो वे सिर घुटाए बैठे हैं। तुम कहते हो, दाढ़ी बढ़ाए होना चाहिए, वे दाढ़ी बढ़ाए बैठे हैं। तुम कहते हो, नग्न होना चाहिए, वे नग्न बैठे हैं। तुम जो कहो, वे तुम्हारी आज्ञा पर हाजिर हैं। बस, तुम्हें ख्वाइश प्रकट करनी है। असदगुरु जड़ होता है, इस अर्थ में कि वह तुम्हारी आकांक्षा से अपने को ढालता है। वह तुम्हारी तरफ देखता है कि तुम कैसा चाहते हो। उसकी एकमात्र आकांक्षा यह है कि वह गुरु की भांति पूजा जाए, बस। तुम्हारी जो मांग हो, वह पूरी कर देगा। वह रेडीमेड गुरु है। वह तुम्हारी मांग के अनुसार तैयार हो जाता है।

सदगुरु तुम्हारी कोई मांग पूरी नहीं करेगा। वह सिर्फ अपने होने की मांग पूरी कर रहा है। तुम्हें जंचे, ठीक, तुम्हें न जंचे, ठीक। तुम प्रसन्न होओ, अच्छा; तुम अप्रसन्न होओ, अच्छा। तुम आओ तो ठीक, तुम चले जाओ तो ठीक। तुम्हारी भीड़ इकट्ठी हो जाए तो ठीक, सन्नाटा छा जाए, कोई भी न रहे, तो भी ठीक।

सदगुरु को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारा होना न होना अर्थ नहीं रखता। शिष्य की भीड़ का कोई भी मूल्य नहीं है। लाखों की भीड़ हो, तो भी ठीक है, इने—गिने लोग रह जाएं, तो भी ठीक है, सभी लोग चले जाएं, तो भी ठीक है। वह तुम्हारे आधार से नहीं

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सही गुरु की पहचान कैसे करें? अपनी प्रज्ञा होनी चाहिए यह जानने के लिए कि अनुभव की पूंजी किसके पास है। आज 99 प्रतिशत गुरु अपनी विद्वता, कर्मकांड और ज्योतिष के आधार पर गुरु बन गए हैं। ये गुरु कहलवा रहे हैं लेकिन गुरु हैं नहीं। जो एक प्रतिशत गुरु हैं अनुभव वाले, उनको ढूंढने की तरकीब कबीर ने बताई है- ‘हीरा परखे जौहरी, शब्दहि परखे साध। कबिरा परखे साध को ताको मता अगाध।।’ कबीर ने साफ कसौटी दी है- जहां ओंकार की चर्चा है, वहीं सत्संग है और जो नाद श्रवण और नाद के स्रोत तक ले जा सके, वही सद्गुरु है।

चलता, वह अपनी आत्मा की आवाज से चलता है। उसके साथ जिनकी चलने की हिम्मत हो, वे थोडे—से लोग चल पाएंगे। सदगुरु के साथ तो चुने हुए लोग होंगे।

जीसस के साथ मुश्किल से बारह आदमी चल सके। अब चल रहे हैं करोडों लोग, लेकिन अब उन्होंने अपनी कल्पना का जीसस पैदा कर लिया है, जो था ही नहीं। अब उन्होंने जो जीसस की धारणा बनाई है, वह झूठी है। जिंदा जीसस तो तोड़ देता उनकी धारणा, मरा जीसस क्या करे!

इसलिए सभी सदगुरु मरने के बाद धीरे— धीरे असदगुरु में परिणत हो जाते हैं—तुम्हारे कारण। अपने कारण नहीं, क्योंकि वे तो हैं ही नहीं। जिंदा में तो वे लडते रहते हैं तुमसे, तुम्हारी आकांक्षाओं को पूरा नहीं होने देते। लेकिन जब मर जाते हैं, तब तो कुछ भी नहीं कर सकते। तुम उनके संबंध में किताबें लिखते हो, चित्र बनाते हो; तुम जैसा चाहते हो, उनको बना देते हो। फिर तो वे परवश हैं।

इसलिए मरे हुए गुरुओं की बड़ी पूजा चलती है, सदियों तक चलती है। जिंदा गुरु के साथ बडा भय लगता है। जीसस को जिन्होंने सूली दी, उन्होंने ही मर जाने के बाद पूजा शुरू कर दी। कृष्ण को सामने देखकर जो डर जाते, वे हजारों साल से उनकी गीता पढ़ रहे हैं और सिर झुका रहे हैं! अभी भी तुम्हें कृष्ण मिल जाएं रास्ते पर, तो तुम भयभीत होओगे। तुम कहोगे, गीता भली है। आप कैसे चले आए? गीता के साथ बिलकुल ठीक चल रहा है। जो अर्थ निकालना है निकाल लेते हैं, जो नहीं निकालना है नहीं निकालते हैं। तुम्हारी सुनता कौन है! हम अपने को गीता में खोज लेते हैं। आपकी कोई जरूरत नहीं है, गीता काफी है। आप विश्राम करें वैकुंठ में, हम गीता पढें यहां संसार में, बिलकुल सब ठीक चल रहा है। आप यहां न आएं।

तुम थोड़ा सोचो, कृष्ण को घर में ठहरा सकोगे? भरोसे का आदमी नहीं है; पत्नी को भगाकर ले जाए!

अभी कल ही मैं अखबार में पढ रहा था कि यू .पी. में एक मुकदमा था अदालत में। एक जमीन का टुकड़ा है, छ: एकड़ जमीन का टुकड़ा है, वह राधा—कृष्ण के नाम है। अब एक झंझट खड़ी हो गई कि इतनी जमीन, छ: एकड़ बस्ती के भीतर, एक आदमी के नाम रह सकती है कि नहीं। छ: एकड़ बस्ती के भीतर, एक आदमी के नाम नहीं रह सकती।

तो वकीलों ने तरकीब निकाली और तरकीब सफल हो गई।

वकीलों ने कहा कि राधा कभी उनकी पत्नी तो थी नहीं, प्रेयसी थी। इसलिए दो व्‍यक्ति हैं ये। यह कोई परिवार नहीं है राधा—कृष्ण। इसलिए तीन — तीन एकड़ एक—एक के नाम है। तीन—तीन एकड़ रह सकती है। एक व्यक्ति के नाम पर पांच एकड़ तक रह सकती है; छ: में झंझट थी।

बात हल हो गई। अदालत ने फैसला दे दिया कि यह बात बिलकुल ठीक है। यह स्त्री राधा कभी इनकी पत्नी तो थी नहीं; पत्नी तो रुक्मिणी थी। यह तो परकीया थी, किसी और की पत्नी रही होगी। कतई गई थी।

तुम कृष्ण को घर में सुविधा से न ठहरा सकोगे। और अगर कहीं राधा—कृष्ण दोनों ही आ गए, तब तो बिलकुल न ठहरा सकोगे। कि यह तो जरा ज्यादा हो जाएगा। घर में बच्चों को भी देखना है, बिगड़ जाएं। आप कहीं और ठहर जाएं।

मर जाते हैं सदगुरु, तो लोग अपने अनुकूल उनको बना लेते हैं, साज—संवार लेते हैं, हाथ—पैर काट देते हैं, छांटकर उनकी ठीक मूर्ति बना देते हैं, फिर पूजा सुविधा से चलती है।

फिर तुम्हारा संबंध ही नहीं है गुरु से। जब तक तुम सदगुरु को भी असदगुरु की स्थिति में न ले आओ, तब तक तुम पूजा नहीं कर सकते। क्योंकि सदगुरु की स्थिति में जाने के लिए तो बड़ी कठिनाई से तुम्हें गुजरना पड़ेगा, यह ज्यादा आसान है कि सदगुरु को ही अपनी स्थिति में ले आओ। उन्हीं को उतार लेना आसान है, खुद का चढ़ना मुश्किल है। जिंदा गुरु तो लड़ता रहेगा, तुम्हें चढ़ाने की कोशिश करता रहेगा।

ये दो तरह के गुरु तो ठीक समझ में आते हैं। एक तीसरे तरह के गुरु हैं, जो गोबर—गणेश हैं; जैसे गणेशपुरी के मुक्तानंद। जिनको न तुम सदगुरु कह सकते, न असदगुरु कह सकते। असदगुरु तो बिलकुल नहीं हैं; कुछ बुराई नहीं है। सदगुरु भी बिलकुल नहीं हैं; कुछ पाया भी नहीं है। पर गोबर—गणेशों की पूजा सबसे आसान है। क्योंकि तुमसे कोई किसी तरह के रूपांतरण की अपेक्षा ही नहीं है। ऐसा हुआ कि मैं नारगोल शिविर को जाता था। गणेशपुरी आश्रम के एक भक्त ने निमंत्रण दिया कि मैं एक आधा घड़ी वहां रुक जाऊं। मैंने भी सोचा कि चलो, मुक्तानंद को देखते चलें। वह देखना बड़ा महंगा पड़ गया। रुका आधा घडी को, मेरे साथ मेरी एक शिष्या थी। महंगा इसलिए पड़ गया कि निर्मला श्रीवास्तव मेरे साथ थी। मुक्तानंद से तो ज्यादा समझदार है। क्योंकि मुक्तानंद को देखकर उसने जो बात मुझे कही, वह यह कि यह आदमी तो बिलकुल गोबर—गणेश है। आप यहां उतरे ही क्यों?

लेकिन उसी दिन मैंने देखा कि उसके मन में एक बीज आ गया, कि जब मुक्तानंद गुरु हो सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं हो सकती! यह आदमी तो बिलकुल गोबर—गणेश है। उसे उस दिन पता नहीं चला। लेकिन उस दिन मैं साफ—साफ देख सका कि उसके अंतर्भाव में एक नए अहंकार का जन्म हो गया कि जब मुक्तानंद जैसा आदमी, कुछ भी नहीं है जहां, यह जब गुरु हो सकता है, और सैकड़ों लोग इसकी पूजा कर सकते हैं, तो फिर मैं क्यों गुरु नहीं हो सकती! और यह तो मैं भी स्वीकार करता हूं कि अगर मुक्तानंद और निर्मला श्रीवास्तव में चुनना हो, तो निर्मला ज्यादा होशियार है। पर उसकी यात्रा अभी अधूरी थी। अभी शिष्यत्व के कदम ही उसने रखने शुरू किए थे और गुरु का भाव पैदा हो गया, जो कि होता है पैदा। इसलिए मैं कहता हूं वह मुक्तानंद के आश्रम में उस दिन घडीभर के लिए जाना महंगा पड़ गया, निर्मला की जिंदगी बिगड़ गई। उसे उस दिन पता भी नहीं चला, उसे आज भी शायद साफ नहीं होगा कि क्या हुआ। लेकिन यह बात देखकर कि जिस आदमी में कुछ भी नहीं है.।

मैंने उसे कहा भी नहीं कुछ कि कुछ भी नहीं है मुक्तानंद में। यह तो मैं आज कहता हूं। मैंने तो उसकी बात सुन ली। क्योंकि मैंने कहा, अगर मैं कुछ कहूंगा, तब तो और भी पक्का हो जाएगा इसको। मैंने कहा कि सब ठीक है; सब चलता है; लोगों को सब तरह के गुरुओं की जरूरत है। कुछ हैं, जिनको गोबर—गणेशों की जरूरत है, तो उनकी भी तो जरूरत पूरी होनी चाहिए। परमात्मा सभी का खयाल रखता है!

लेकिन उसका जीवन भ्रष्ट हो गया। जो उसने थोड़ा—सा पाया था, वह भी खो गया अहंकार में।

यह तीसरे गुरु से बचना बहुत जरूरी है। क्योंकि यह तुम्हें कहीं न ले जाएगा। सदगुरु कहीं पहुंचाता है, असदगुरु भटकाता है। और गोबर—गणेश केवल भरमाते हैं। भटकाते भी नहीं, भटकाएं तो भी चलो कुछ हुआ, कहीं तो ले गए! नरक भी ले गए, तो कुछ तो अनुभव होगा; पाप में उतारा, तो भी कुछ तो अनुभव होगा; गलत में ले गए, तो भी सही की तरफ आने के लिए कुछ तो रास्ता बनेगा। क्योंकि गलत का अनुभव भी सही की तरफ लाने के लिए कारण बन जाता है।

एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक एडीसन एक प्रयोग कर रहा था। वह ग्यारह सौ दफा असफल हो गया; तीन साल व्यतीत हो गए। उसके शिष्य सब घबड़ा गए। जो उसके कार्यकर्ता थे साथी, वे सब थक गए। लेकिन वह रोज सुबह चला आता है प्रसन्नचित्त, फिर प्रयोगशाला में लग जाता है, फिर आधी रात तक लगा रहता है। आखिर एक दिन उसके सहयोगी ने पूछा कि आप थकते ही नहीं! और आप उदास भी नहीं होते! और आप यह भी नहीं देखते कि ग्‍यारह सौ बार आप असफल हो चुके!

एडीसन ने कहा कि इससे तो मैं प्रसन्न हूं। कम से कम ग्यारह सौ गलतियां अब मैं न दोहराऊंगा। सत्य करीब आ रहा है। ग्‍यारह सौ रास्ते गलत सिद्ध हो गए; अब चुनने को बहुत थोडे ही बचे होंगे, किसी भी दिन ठीक रास्ता आ ही जाएगा हाथ में। मैंने खोया नहीं है इन ग्यारह सौ में कुछ, पाया ही है।

अगर मान लो दस रास्ते हैं, और नौ गलत हैं और एक सही है। तो नौ पर तुम भटके और लौट आए, तो दसवां करीब आ रहा है। हाथ में कुछ दिखाई नहीं पड़ता कि क्या पाया, लेकिन तुम कुछ पा रहे हो।

तो असदगुरु भी सदगुरु तक पहुंचाने का कारण हो जाए, लेकिन गोबर—गणेश भरमाते हैं। वे न तो भटकाते हैं, न पहुंचाते। तुम कोल्हू के बैल के चक्कर में पड जाते हो, घूमते रहते हो। उनमें इतना बुरा भी नहीं है कि उससे भी कुछ अनुभव ले लो; उनमें इतना कुछ अच्छा भी नहीं है कि जो तुम्हें उड़ा शिखरों पर ले जाए। उनमें कुछ भी नहीं है। वस्तुत: उनमें तुम जो भी देख रहे हो, वह तुम्हारा प्रोजेक्यान है।

सदगुरु में कुछ है, असदगुरु में भी कुछ है। कृष्णमूर्ति में भी कुछ है और रासपुतिन में भी कुछ है; ताकत है, शक्ति है। रासपुतिन भटकाएगा। अगर उसके चक्कर में पड़ गए, तो बुरे नरक में डाल देगा। लेकिन वह भी अनुभव होगा; वह भी शायद जरूरी था जीवन की प्रौढ़ता के लिए। शायद तुम अंधेरे में न गिरो, तो प्रकाश की अभीप्सा ही पैदा न हो। शायद आवश्यक था, अनिवार्य था।

लेकिन फिर गोबर—गणेश हैं, वे कुछ भी नहीं करते। उन पर तुम प्रोजेक्ट करते हो। तुम जो भी सोचते हो वे हैं, वह तुम्हारी धारणा है, वह तुम्हारी परिकल्पना है।

ऐसा हुआ, मेरे एक परिचित हैं, सीधे—सादे आदमी हैं। उनसे मैंने एक दिन कहा कि तुम्हें अगर गोबर—गणेश गुरु बनना हो, तो तुम बन सकते हो। तुम बिलकुल सीधे—सादे हो, जीवन में कुछ बुराई भी नहीं है, कुछ भलाई भी नहीं है। इधर—उधर का कुछ भी नहीं है, कोई अति नहीं है। न मांस खाते, न शराब पीते, न सिगरेट पीते। कुछ भी नहीं। न कोई चोरी की। उतनी भी हिम्मत नहीं है। न झूठ बोले कभी। सच को भी नहीं पा लिया है। झूठ भी नहीं बोले हो। तुम बिलकुल सज्जन आदमी हो, तुम गोबर—गणेश गुरु बन सकते हो।

उन्होंने कहा, क्या मतलब?

मेरे साथ यात्रा पर कलकत्ता जा रहे थे। तो मैंने कहा, तुम ऐसा करो, तुम सिर्फ चुप रहना; तुम बोलना भर नहीं कलकत्ते में। क्योंकि तुम बोले, तो पकड़े जाओगे। तुम बोलना भर नहीं। तुम चुप रहना। लोग मुझसे पूछेंगे, आप कौन हैं? मैं कहूंगा, आप बड़े गुरु हैं। बड़े पहुंचे ज्ञानी हैं। बोलते नहीं। मौन रहते हैं।

तीन दिन मेरे साथ रहे। हालत ऐसी आ गई कि लोग मेरे पैर पीछे छुए, पहले उनके छुए। तीन महीने रह जाते, तो लोग मुझे भूल ही जाते! लौटकर रास्ते में मुझसे कहने लगे, आपने ठीक कहा। और लोगों की कुंडलिनी जगने लगी उनके स्पर्श से। उनकी खुद नहीं जगी! मगर लोग मुझसे पूछने लगे कि ये बाबा तो बड़े चमत्कारी हैं। इन्होंने सिर पर हाथ रखा, हमारी कुंडलिनी जग गई। कल्पना, प्रक्षेपण, प्रोजेक्यान, तुम जो चाहते हो, वह होने लगा। किसी को रोशनी दिखने लगी। आदमी की कल्पना बड़ी प्रगाढ़ है!

तो पहले तो गोबर—गणेशों से बचना सर्वाधिक। अपने प्रक्षेपण, अपनी कल्पना, अपने सपनों को आरोपित करने से बचना।

सदगुरु कोई अनुभव नहीं देता, सदगुरु तो अनुभव छीनता है। वह तो तुम्हें उस जगह ले आता है, जहां सब अनुभव गिर जाते हैं। केवल तुम ही रह जाते हो, अत्यंत निर्दोष, अत्यंत निर्विकार।

अनुभव भी विकार है। कुंडलिनी जग रही है, प्रकाश दिखाई पड़ रहा है, कमल खिल रहे हैं, चक्र खुल रहे हैं—सब विकार हैं, सब रोग हैं। इनको तुम गुण मत समझ लेना, इन्हीं की वजह से गोबर—गणेश पुज रहे हैं। तुम पूज रहे हो, तुम ही प्रक्षेपण कर रहे हो। अनुभव भी तुम्हारा है, धारणा भी तुम्हारी है, घटना भी तुम्हें घट रही है, वहा