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क्या हैं प्रत्येक ध्यान के सामान्य/COMMON..दो चरण ?


क्यों महत्वपूर्ण हैं ध्यान का पहला चरण?-

04 FACTS;- 1-अगर पहला चरण न हो, तो बड़े खतरे हैं। पहले चरण से आपके शरीर की पूरी विद्युत विकसित होकर आपके शरीर के चारों तरफ वर्तुल बना लेती है। अगर यह वर्तुल न बने, तो आपको ऐसी बीमारियां पकड़ सकती हैं जिनकी आपको कल्पना भी नहीं है। आप बीमारियों के लिए नॉन-रेसिस्टेंस की हालत में हो जाते हैं। इसलिए बहुत से लोग अजीब-अजीब बीमारियों से पीड़ित हो जाते हैं। इसलिए पहला चरण पूरा होना बहुत जरूरी है।

2-आपके चारों तरफ विद्युत का वर्तुल बनना जरूरी है।अन्यथा ध्यान में एक तरह की वल्नरेबल, एक तरह की ओपनिंग, एक तरह का द्वार खुलता है, उसमें से कुछ भी प्रवेश हो सकता है। और न केवल बीमारी प्रवेश हो सकती है, बल्कि अनेक साधकों को जो बड़ी से बड़ी कठिनाई हुई है वह यह कि कुछ दुष्ट आत्माएं उनमें प्रवेश कर सकती हैं। 3-ध्यान की हालत में आपके हृदय का द्वार खुला हो जाता है। उस वक्त कोई भी प्रवेश कर सकता है। और हमारे चारों तरफ बहुत तरह की आत्माएं निरंतर उपस्थित हैं। यहां आप ही उपस्थित नहीं हैं, और भी कोई उपस्थित हैं। इसलिए पहले चरण को हर हालत में पूरा करना जरूरी है। अगर पहला चरण पूरा है तो आपका शरीर एक तरह का रेसिस्टेंस, एक तरह की प्रतिरोध की दीवाल खड़ी कर लेता है, उसमें से कोई भी हानिकर चीज आपके भीतर प्रवेश नहीं पा सकती--एक। और आपके भीतर से कोई भी शक्ति बाहर नहीं जा सकती, वह दीवाल का काम करने लगती है।

4-जैसे कि हम अपने घर के चारों तरफ बिजली का तार दौड़ा दें, और उसमें करंट दौड़ रही हो, तो चोर भीतर न घुस सके, क्योंकि तार को छुए कि मुश्किल में पड़ जाए। भीतर का आदमी भी बाहर न जा सके, क्योंकि तार को छुए तो मुश्किल में पड़ जाए। ठीक पहले चरण का यही महत्वपूर्ण काम है कि वह आपके चारों तरफ विद्युत का वर्तुल बना दे। न तो भीतर से बाहर कुछ जा सके, न बाहर से भीतर कुछ आ सके।

सुरक्षा कवच धारण विधि ;- 05 POINTS;- 1-ध्यान के लिए बैठने में दो-तीन बातें ख्याल में लें।शरीर को सीधा रख कर बैठें..आराम से जितना सीधा हो सके;अकड़ाने की जरूरत नहीं है। रीढ़ सीधी हो, जमीन से नब्बे का कोण बनाती हो।पद्मासन /या सिद्धासन में बैठे । आंखें अधखुली, यानि आधी खुली आधी बंद।

2-ॐ/इष्टमंत्र/ गुरुमंत्र ..का जप करते हुए यह भावना करे की मेरे इष्ट की कृपा का शक्तिशाली प्रवाह मेरे अंदर प्रवेश कर रहा है और मेरे चारो ओर सुदर्शन चक्र जैसा एक इन्द्रधनुषी घेरा बनाकर घूम रहा है।

3-''इन्द्रधनुषी प्रकाश घना होता जा रहा है।वह अपने दिव्य तेज़ से मेरी रक्षा कर रहा है।दुर्भावनारूपी अंधकार विलीन हो गया है और सात्विक प्रकाश ही प्रकाश छाया है। सूक्ष्म आसुरी शक्तियों से मेरी रक्षा करने के लिए वह चक्र सक्रिय है और मै पूर्णतः निश्चित हूँ ,आश्वस्त हूँ।'' जितनी देर श्वास भीतर रोक सके.. उक्त भावना को दोहराये और मानसिक चित्र बना ले...

4-''आकाश के अंदर पृथ्वी है।पृथ्वी के अंदर अनेक देश, अनेक समुद्र, अनेक लोग है।उनमे से एक आपका शरीर आसन पर बैठा हुआ है।आप एक शरीर नहीं हो बल्कि अनेक शरीर ,देश,सागर ,पृथ्वी ,सूर्य ,चंद्र , ग्रह एवं पूरे ब्रह्मांड के दृष्टा हो,साक्षी हो।''

5- अब धीरे - धीरे ॐ का दीर्घ उच्चारण करते हुए श्वास बाहर निकाले।मन ही मन भावना करे कि मेरे सारे दोष विकार बाहर निकल गए है।मन, बुद्धि शुद्ध हो गया है।

क्या हैं ध्यान का दूसरा चरण ?-

06 FACTS;-

1- जब भी आपको शक्ति की जरूरत पड़ती है, चाहे आपको होश हो या न हो, आपकी श्वास की चोट से ही शक्ति सदा जगाई जाती है। आपने कभी खयाल न किया होगा, अगर आपको एक बड़ा पत्थर उठाना हो, तो अचानक आप गहरी श्वास लेकर भीतर रोक लेते हैं और फिर पत्थर को उठाते हैं। कभी आपने सोचा न होगा कि गहरी श्वास लेकर भीतर रोक लेने से पत्थर के उठाने का क्या संबंध है। गहरी श्वास के बिना उसी पत्थर को आप अगर साधारण श्वास लेते रहें तो न उठा सकेंगे।

2-जिन लोगों ने पिरामिड के पत्थर चढ़ाए, आज वैज्ञानिक बहुत परेशान हैं कि उस वक्त क्रेन नहीं थी, इतने बड़े पत्थर पिरामिड पर चढ़ाए कैसे गए हैं? तो उनको चमत्कार मालूम पड़ता है, दुनिया के मिरेकल्स में एक मालूम पड़ता है कि इतने-इतने बड़े पत्थर, इनको सौ-सौ आदमी मिल कर भी नहीं चढ़ा सकते! ये चढ़ाए कैसे गए हैं?उन्हें पता नहीं है,

कि जिस इजिप्त में पिरामिड बने, उस इजिप्त को एक साइंस का पता था, जो धीरे-धीरे भूल गई। और वह थी--श्वास की चोट से भीतर सोई हुई शक्ति को उठा लेने का रहस्य।

3-आपने राममूर्ति का नाम सुना होगा। वह अपनी छाती पर हाथी को खड़ा कर सकता था। या अपनी छाती पर से कार और ट्रक को निकल जाने दे सकता था। या खुद चलती हुई कार को पीछे से पकड़ ले, तो पहिए घूमते थे लेकिन कार आगे नहीं बढ़ सकती थी। और राज छोटा था। बहुत छोटा सा राज था। और राज यह था कि श्वास की चोट से, और श्वास को रोक लेने से भीतर की पूरी शक्ति को पुकारने की तरकीब उसको पता चल गई थी।

4-हमारे भीतर जो भी शक्ति पड़ी है उसे चोट देकर जगाना है। तो दस मिनट का जो दूसरा ध्यान का चरण है , उसमें इतने जोर से श्वास लेनी है कि भीतर कोई गुंजाइश ही न रह जाए कि हम इससे ज्यादा भी ले सकते थे। श्वास की पूरी ताकत लगा देनी है। और जब आप श्वास की पूरी ताकत लगाएंगे, तो शरीर डोलने लगेगा, शरीर कंपने लगेगा, शरीर झूलने लगेगा। उसको रोकना नहीं है। सख्त होकर खड़े नहीं हो जाना है।जब झूलने लगे तो उसको झूलने देना और श्वास की चोट मारनी शुरू करनी है। जितने जोर से चोट पड़ेगी, उतना ही शरीर डोलेगा।

5-दस मिनट में पूरी की पूरी हमारे फेफड़े में जितनी भी वायु है उस सबको रूपांतरित कर लेना है, बदल देना है।हमारे फेफड़े में कोई छह हजार छिद्र हैं।जिसमें मुश्किल

से डेढ़ या दो हजार तक हमारी श्वास पहुंचती है, बाकी चार हजार सदा ही बंद पड़े रह जाते हैं, उनमें कार्बन डाय-आक्साइड ही इकट्ठी होती रहती है। पूरे के पूरे फेफड़े के सारे छिद्रों में नई आक्सीजन, नई प्राणवायु पहुंचा देनी है। जैसे ही प्राणवायु की मात्रा भीतर बढ़ती है; वैसे ही शरीर की विद्युत जगनी शुरू हो जाती है। आप अनुभव करेंगे कि शरीर इलेक्ट्रिफाइड हो गया, उसमें बिजली दौड़ने लगेगी, रोआं-रोआं कंपने लगेगा।

6-यह दूसरा चरण है। इस चरण के और भी अर्थ हैं । अगर यह चरण पूरा नहीं किया गया, तो तीसरे चरण में प्रवेश नहीं हो सकेगा। ऐसे ही जैसे कोई पहली सीढ़ी पर न चढ़ा हो तो दूसरी सीढ़ी पर न जा सके। पहली सीढ़ी पर पैर रखना जरूरी है, तभी दूसरी सीढ़ी पर चढ़ा जा सकता है।

क्या महत्व हैं ध्यान के दूसरे चरण का ?-

06 FACTS;- 1-दूसरे चरण के संबंध में यह समझ लेनी जरूरी है कि जब आपकी शक्ति भीतर चोट खाकर जगेगी, तो आपको बहुत तरह के अनुभव शरीर में होने शुरू हो जाएंगे।उदाहरण के लिए, शरीर में अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरह के अनुभव होंगे। किसी को लगेगा शरीर बहुत बड़ा हो गया, किसी को लगेगा शरीर पत्थर की तरह भारी हो गया, किसी को लगेगा शरीर बहुत छोटा हो गया,और सबको घबड़ाहट होगी कि आंख खोल कर देखने का मन होगा कि मामला क्या है, मैं कहीं खो तो नहीं गया! लेकिन आंख खोल कर देखना नहीं है।

2-आप अपनी जगह हैं, कहीं कुछ खो नहीं गया है। ये सारी प्रतीतियां उस शरीर में नई शक्ति के जगने से होनी शुरू हो जाएंगी। किसी के शरीर में सांप-बिच्छू रेंगते हुए मालूम पड़ने लगेंगे। किसी को चींटियां चलती मालूम पड़ने लगेंगी। किसी के भीतर विद्युत की धारा बहती मालूम पड़ने लगेगी। किसी को लगेगा कि कोई चीज झरने की तरह ऊपर से नीचे गिर रही है। किसी को मालूम पड़ेगा नीचे से ऊपर की तरफ कोई चीज चढ़ रही है। इस तरह के बहुत तरह के अनुभव शरीर में होने शुरू हो जाएंगे।इसके साथ ही शरीर कुछ हरकतें, कुछ मूवमेंट करना चाहेगा, उनको रोकना नहीं है।

3-दस मिनट में जब शरीर पूरी तरह चार्ज्ड, शक्ति से भर जाता है, तो दूसरे चरण में हम शरीर को छोड़ेंगे, वह जो करना चाहे, उसे करने देंगे। दूसरे चरण में शक्ति को खेलने का मौका देना है। वह जो शक्ति जगी है उसको सहयोग करना है। साधारणतः हम रोकते हैं;क्योंकि हमारी जिंदगी भर की आदत हर चीज को रोकने की है। अगर हंसी भी आती है तो हम धीरे हंसते हैं, जोर से नहीं हंसते। रोना भी आता है तो सम्हाल लेते हैं, क्योंकि रोना शोभा नहीं देता। नाचने का तो कोई सवाल नहीं है। कूदने का कोई सवाल नहीं है। हाथ-पैर अव्यवस्था से हिलाने का कोई सवाल नहीं है। जिंदगी में हम सब रोके रहते हैं।

4-जब शक्ति आपके भीतर जगेगी तो आपके भीतर जो भी रुका है वह सब प्रकट होना चाहेगा।तो जैसे ही दूसरे चरण के बाद शक्ति पैदा होगी, आपका शरीर जो भी करना चाहे, उसे पूर्णता से सहयोग देना है। इसको आप चाहें कि रोक लें, तो आप रोक सकते हैं।लेकिन जो शक्ति जग गई है ;अगर आपने उसे रोका तो वह आपके लिए शारीरिक रूप से नुकसानकारी सिद्ध होगी।ध्यान का प्रयोग तो व्यर्थ चला ही जाएगा, और उस शक्ति की शरीर में ग्रंथियां और गांठें बन जाएंगी ,क्योंकि वह निकलना चाहेगी और आप रोकेंगे। 5-रोकने के नुकसान हैं, सहयोग देने के अभूतपूर्व फायदे हैं। अगर आपने पूरा सहयोग दे दिया तो आपके शरीर की न मालूम कितनी बीमारियां जो आपके पीछे पड़ी हों, अचानक विलीन हो सकती हैं। आपके मन के न मालूम कितने रोग जो चित्त को घेरे हों--क्रोध, काम, लोभ--अचानक आप पा सकते हैं कि मन हलका हो गया और वे बह गए। दुख, उदासी, पीड़ा, वैमनस्य, ईष्या, वे सब गिर जा सकते हैं।आपका शरीर ही नहीं,आपके

मन की भी कैथार्सिस हो जाती है, रेचन हो जाता है। और इस दस मिनट का जो सबसे बड़ा उपयोग है वह यही है कि शरीर का रेचन हो जाए।

6-शरीर और मन का सब कुछ जो रुग्ण हमने इकट्ठा किया हुआ है वह गिर जाए। उसके बाद ही हम ध्यान में प्रवेश कर सकते हैं।जैसे कोई पहाड़ पर चढ़ रहा हो, तो सब बोझ नीचे छोड़ जाता है। बोझ साथ में हो तो पहाड़ पर चढ़ना असंभव है। जैसे ऊंचाई बढ़ती है वैसे बोझ छोड़ना पड़ता है। ध्यान की बड़ी ऊंचाइयां हैं, गहराइयां हैं, उनमें जाने के लिए सब बोझ छोड़ जाना जरूरी है।इसलिए जो संकोच करे, शिष्टाचार का ध्यान रखे, उसका समय व्यर्थ होगा। और उसे पाजिटिव हार्म, सकारात्मक रूप से हानि पहुंचेगी। और अगर उसने इसका सहयोग दिया तो वह हैरान होगा कि वह इतना हलका, इतना वेटलेस अपनी जिंदगी में कभी भी नहीं था।

तीसरा चरण ;-

ध्यान विधि के अनुसार

...SHIVOHAM...